निकाय चुनावः चंदौली के रण से नगण्य नजर आ रहे अनुसूचित जाति के रणबांकुरे

Young Writer: नगर निकाय

चुनावी प्रचार व चर्चाओं से गायब है अनुसूचित जाति के भावी उम्मीदवारों के नाम व चेहरे

Young Writer, चंदौली। नगर निकाय चुनाव का शंखनाद अघोषित रूप से हो चुका है। इसकी बस औपचारिक घोषणाएं ही शेष है। चुनावी रण की पृष्टभूमि कैसी और किसके अनुकूल होगी इसका निर्धारण अभी राज्य निर्वाचन आयोग तय करेगा। लेकिन संभावित रण बांकुरे अभी से ही दो-दो हाथ करने की अपनी भूमिका बना और सजा रहे हैं। उनकी इस तैयारी में समर्थकों की चुनावी ललकार व जयकार रंग भरती नजर आ रही है। इन तमाम कवायदों व गतिविधियों के बीच कुछ ऐसा भी है जो नगण्य प्रायः है, अदृश्य है जिसकी मौजूदगी नाम मात्र नजर नहीं आ रही है। देखा जाए तो चंदौली नगर में पिछला निकाय चुनाव इन्हीं की भूमिका पर लड़ा गया। यही जीते और इन्हीं की हार हुई। लेकिन इस बार ऐसा न जाने क्या हुआ कि न तो हारा हुआ प्रत्याशी संभावित उम्मीदवारों की दौड़ में है और ना ही जीते हुए उम्मीदवार में फिर से जीतने की लालसा नजर आ रही है। जी हां! यह संकेत अनुसूचित जाति के उन उम्मीदवारों की ओर है। जिनकी गतिविधियां व चुनावी हलचल अबकी बार भी होनी चाहिए थी। इसके विपरीत चुनावी रण में इनकी शून्यता और गैरहाजिरी कई सारे सवाल खड़े कर रही है।
विदित हो कि राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से नगर निकाय चुनाव के मद्देनजर आरक्षण चक्र का निर्धारण व प्रकाशन अभी नहीं किया गया है जिसका सभी वर्ग व समुदाय के लोगों को बेसब्री से इन्तजार है। बावजूद इसके मामला चाहे अनारक्षित कोटे का हो या पिछड़े समुदाय से ताल्लुक रखने वाले भावी उम्मीदवारों का। उनकी संभावित दावेदारी व उम्मीदवारी की चर्चाएं नगर में चल रही है। जगह-जगह टंगे इनके बैनर-पोस्टर इस बात की गवाही व तसदीक कर रहे हैं कि ये भी संभावित प्रत्याशी हो सकते हैं और चंदौली की जनता का साथ व समर्थन मिला तो इनकी संभावित उम्मीदवारी जीत में भी बदल सकती है।

फिलहाल यह भविष्य की बातें हैं लेकिन चंदौली चेयरमैन बनने का सपना पाले हरएक उम्मीदवार की तस्वीर कहीं न कहीं जरूर टंगी हुई मिल जाएगी। हालात ऐसे हैं कि कोई दीवार पर टंगा है तो कोई झाड़ पर। इसके पीछे मंशा यह है कि लोगों के दिल ही नहीं बल्कि दिमाग में भी इनकी छवि व छाप बनी रहनी चाहिए, ताकि चुनावी डुगडुगी बजते ही ये अपनी उम्मीदवारी के रंग को और चटख कर सके। फिलहाल सभी की मौजूदगी से पूरा का पूरा नगर चुनावी रंग में रंगा हुआ और रमा हुआ दिख रहा है। लेकिन अनुसूचित जाति के भावी उम्मीदवारी के नाम व तस्वीर का कहीं दूर दूर तक पता नहीं है। ऐसा किसी दल विशेष का नहीं, बल्कि सभी दलों का हाल है। यहां तक की अनुसूचित जाति के किसी निर्दल उम्मीदवार ने अघोषित अपनी उम्मीदवारी को घोषित नहीं किया है।

नगर में ऐसे उम्मीदवारों के बैनर पोस्टर का अभाव अपने आप में चर्चा है और ऐसा होना भी लाजिमी है। क्योंकि पिछले चुनाव में सभी रण बांकुरे अनुसूचित जाति के थे जो पूरी शिद्दत के साथ निकाय चुनाव को लड़े। जनता के बीच गए, विरोधियों की खामियों के साथ ही अपनी खुबियों को भी गिनाया। वोटिंग तक मामला कांटे का चला और कई उम्मीदवारों के बीच दिलचस्प मुकाबला देखने को मिला। लेकिन इस बार अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले एक भी प्रत्याशी के नाम व उसके चुनाव लड़ने का  जिक्र ना होना कुछ लोगों के मन में फिक्र पैदा कर रहा है। आखिर! इसके पीछे वजह क्या है, यदि आरक्षण चक्र में पुनः अनुसूचित जाति के पुरुष या महिला की उम्मीदवारी के लिए चंदौली निकाय की सीट आरक्षित होती है तो वह कौन चेहरे होंगे जो आगे आएंगे। अबकी बार किनके बीच संभावित मुकाबला होगा। यह सारे सवाल आने वाले दिनों से जुड़े हैं लेकिन इसकी चर्चाएं अभी से हो रही है। वहीं कुछ लोग इस बात पर भी चिंतन-मंथन कर रहे हैं कि आखिर अनुसूचित जाति का प्रतिनिधित्व की लालसा अचानक से इतनी सुस्त और शिथिल क्यों पड़ गयी है।