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Sunday, March 3, 2024

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एक व्यंग कविता गधों पर – रामजी ‘भैरव‘

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Young Writer, साहित्य पटल। रामजी प्रसाद “भैरव” की कविताएं

गदहे पेशोपेश में पड़ गए
किसको दें धन्यवाद
बहुत दिनों से दबी पड़ी थी
किस्मत चमकी है आज । 1।

सिने जगत के महानायक ने
किया प्रचार प्रसार
रूठी किस्मत जाग उठी
बनेगी अब अपनी सरकार ।2।

सोते -जगते ,उठते -बैठते
करते हरदम जाप
बिन गदहों के होगी नहीँ
राजनीति की गंदगी साफ ।3।

युगों -युगों से नाम हमारा
सदा किया बदनाम
अब तो भइया स्वीकार करो
हम गदहों का परनाम ।4 ।

कभी पीएम तो कभी सीएम
नाम हमारा लेते है
बदले में बस हमको
कोरा आश्वासन देते है ।5।

बहुत ढो लिया लादी गठरी
अब लेंगे सुविधा सरकारी
बातों से न पेट भरेगा
चाहिए सत्ता की भागीदारी ।6।

शर्त हमारी होगी यह
गदहा किसी को न कहोगे
और किसी की गलती को
हमारे सिर न मढोंगे ।7।

अबकी जनगणना में हम
गिनती अपनी करवाएंगे
जनधन खाता आधार सहित हो
पैन कार्ड भी बनवाएंगे ।8।

स्वास्थ्य सुविधा लेंगे
ए…

गुस्से को विदा करो

तुम्हें मेरी बात बुरी लगी हो
तब भी , ना लगी हो तब भी
एक बात मैं पूरी विनम्रता पूर्वक कहता हूँ
गुस्से को विदा करो
गुस्सा बहुत खराब चीज है
यह हँसते खेलते आदमी का खून
एक झटके में पी जाती है
बदले में दे जाती है
लाइलाज बीमारियां
बी पी , सुगर और जाने क्या क्या
तुम हँसते हुए ही अच्छी लगती हो
गुस्सा तो तुम पर जरा भी नहीं फबता
छोड़ो जाने दो गुस्सा थूंक दो
गुस्सा अच्छी चीज नहीं है
मैंने देखा है बहुतों को गुस्से में
अपना ही घर फूंकते हुए
अपनी मूर्खता से जग हँसाई कराते हुए
गुस्सा पी जाओ कड़वी दवा समझकर
तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा होगा
अब हँस दो और गुस्से को विदा करो ।

तुम क्या कहते हो

उस दिन पूछा था
किसी का रूप
यदि आँखों में अट न पाए
किसी की बातें
यदि कानों में घुलती चली जाए
किसी का सामीप्य
यदि बार बार मन को भाए
किसी से रूठने का मन करे
और वो मनुहार करे
तो प्रेम कह सकते हो?
बोलो , तुम क्या कहते हो
उसने गिलास में रखे पानी को
घूँट घूंट मुंह में भरा
मेरी ओर देखा
और बिना उत्तर दिए
चुपचाप निकल गया ।

औरतों के चेहरे का दर्द

पुरुष औरतों के चेहरे पर
सौंदर्य ढूंढ कर मुग्ध होता है
उनमें स्वर्गीय अप्सराओं की
कल्पित काम कला की
झलक पाना चाहता है
उसके लिपे पुते चेहरे के पीछे छिपे
दर्द को कहाँ जान पाता है
एक औरत अभी अभी
अपने बीमार बच्चे को दवा दिलाकर
काम पर लौटी है
उसकी मुस्कुराहट पर लट्टू हैं
कई लम्पट पुरुष
एक औरत का पति कई महीनों से
किसी दूसरी औरत के साथ रह रहा है
वह अपने पति के लौटने की प्रतीक्षा में
पालती है उन बच्चों को
जो प्रेम की निशानी है
एक औरत प्रेम में पड़ी
अपने प्रेमी के बेवफाई का दंश
झेलती है इस उम्मीद में
कि उसका प्रेमी एक दिन लौट आएगा
अपराध बोध के साथ सिर झुकाए
एक औरत झेलती है
समाज की कामुक निगाहें
क्यों कि उसका बीमार पति
दुष्टों का प्रतिकार की स्थिति में नहीं है
एक औरत भूख से लड़ते
अपने बच्चों के लिए
उतार देती है साड़ी
और…

हमारे देश की संस्कृति और सुगंधि

हमेशा की तरह सिकंदर
इस बार भी
संसार को जीतने की
जिजीविषा में
बीच रास्ते मर जायेगा
उसके दोनों हाथ
खुले रह जाएंगे
वह घर नहीं पहुंच पाएगा
सिकंदरों !
दुनियां को जीतने का भ्रम छोड़ दो
अंत में हाथ कुछ न आयेगा
तुम्हारी महत्वाकांक्षा
तुम्हारी आहुति लेकर मानेगी
युवाओं !
तुम सिकंदर बनने की क्षमता रखते हो
लेकिन यह बात तो जान लो
सिकंदर अपने अंतिम दिनों में खुश नहीं था
उसे यह अहसास हो चुका था
अपनी महत्वाकांक्षा को पूर्ण करने में
क्या क्या गलतियां की
उन्हीं गलतियों से सीख लेते हुए
पछता रहा था
हाथ मल रहा था
अफ़सोस कर रहा था
उसे क्या नहीं करना चाहिए था
दुनियां को जीतने का ख़्वाब
क्या सही था
उसे देखना चाहिए था
जो बात मृत्यु शैय्या पर समझ आयी
वह कुछ पहले क्यों नहीं आ गयी
युवाओं!
अपनी महत्वाकांक्षा को इतना मत बढ़ा दो
जो मृत्यु शैय्या पर समझ आए
अपने सपनों में घर परिवार शामिल करो
यार दोस्तों को शामिल करो
सगे संबंधियों को शामिल करो
बड़े सपनों के आगे छोटे सपनों की
अवहेलना मत करो
गरीब अमीर सबको शामिल करो
कोई न छोटा है
न कोई बड़ा
ईश्वर के यहां सब बराबर हैं
सब एक रास्ते से आते और जाते हैं
सारे विचार तुम्हारे गढ़े है
उच्च भी ओछे भी
खुद को बदल डालो युवा !
हमारे देश में और भी
सभ्याचरण वाले लोग हुए है
कुछ सीख उनसे लो
हमारे देश की संस्कृति और सुगंधि
उनसे सात समंदर पार तक जाती है ।

जीवन की उपयोगिता

दुनियांदार लोग जब मिलते हैं
तो बहुत पीड़ा पहुंचाते हैं
उनकी छल प्रपंच से भरी बातें
मेरे सर के ऊपर से निकल जाती हैं
कई बार लगता है
मुझे सीखना चाहिए
जीवन की इस बहुमूल्य नसीहत को
इसकी उपयोगिता कभी तो होगी
पर कहां होगी यह समझ के परे है
जब मुझे गला काट स्पर्धा में नहीं जीना है
मुझे जब झूठ बोलकर
किसी के भोलेपन को नहीं छीनना है
जब मुझे किसी के सिर पर पांव रखकर
आगे नहीं बढ़ना है
मुझे आस्तीन के सांप बनकर नहीं रहना है
मुझे ठग और दस्यु गैंग नहीं बनाना है
जब मुझे क्रूर , नृसंश और अत्याचारी नहीं बनना है
मुझे गिरगिट से स्पर्धा नहीं जीतनी हैं
तो उनकी इस सीख की
मेरे जीवन में क्या उपयोगिता
मैं वैसे ही ठीक हूं
इंसान के रूप में ।

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