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Thursday, February 29, 2024

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हस्तिनापुर एक्सटेंशन : कितने बजे हैं, मालूम नहीं

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Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह, HASTINAPUR EXTENTION

हस्तिनापुर एक्सटेंशन : रामदरश मिश्र जी की एक किताब है, – कितने बजे हैं। किताब में उनके ललित निबन्ध हैं। निबन्धों में सहज जीवन का सौन्दर्य है। उल्लास की उष्मा है। संघर्ष का ताप है। हास-हुलास के रंग है। पीड़ाओं की पुकार है। परेशानियों के बेधक दंश हैं। बहुत कुछ है। अपने समय की मुकम्मल जिन्दगी की धड़कन कानों में बजने लगती है। मरते हुए गाँवों की बची हुई जिन्दगी चहकती दिखाई देती है। चहकते हुए महानगरों की मरती हुई जिन्दगी कीकराह सुनाई देती है। जिन्दगी के विविध तरह के रंग इसमें खूब टहक हैं। पढ़ते-पढ़ते खूब मजा आ जाता है। प्रकृति के साथ-साथ मनुष्य की प्रकृति का निदर्शन चित्त को खूब उत्प्रेरित करता है। मिश्र जी के निबन्ध अपने समय में मूलधारा मान लिये गये निबन्धों से भिन्न धारा की उपस्थिति का बोध भी कराते हैं और उनकी शक्ति का भी प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। इस संग्रह के निबन्ध कई दृष्टि से महत्वपूर्ण और मूल्यवान हैं। मगर यह सब बाद में। पहले तो कितने बजे हैं।

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औचक आप किसी से पूछ दें- कितने बजे हैं? आदमी अचकचा जायेगा। अगर उसके हाथ में घड़ी नहीं है, तो फिर उत्तर दे पाना कठिन है। हमारी सभ्यता ने आदमी को उपकरणों पर अवलम्बित करके उसे अपाहिज बना डाला है। हमारे पास समय को जाँचने-परखने के, जानने-बूझने के तमाम साधन थे। तमाम तरीके थे। हम आसमान की तरफ देखकर समय का अन्दाज लगा लेते थे। हमारे आँगन की छाया हमें समय की जानकारी दे देती थी। पेड़ दे देते थे। गाय-घोड़े दे देते थे। रात में तारे हमें समय बता देते थे। चिड़ियाँ हमें समय बता देती थीं। मगर हमने सबकी तरफ से आँख मूँँद ली और घड़ी के भरोसे हो गये। अब एक घड़ी के भरोसे आदमी कितना दयनीय है। घड़ी ने धोखा दे दिया तो चारों खाने चित्त। मेरी घड़ी तो कई दिनों से रूकी पड़ी है। वह केवल बैटरी खत्म होने से ही नहीं रुक जाती है। वह बैटरी रहते भी बहुत बार रुक जाती है। पता नहीं क्यों? रुकने का उसका मन हो आता होगा। घड़ी रुकी पड़ी हो तो भी बार-बार आँख घड़ी पर जाती ही रहती है।

मेरी घड़ी बन्द है। मेरे हाथ में किताब है। दिमाग में सवाल कुलबुला रहा है,- कितने बजे हैं?
समय के सवाल को थोड़ी देर सुलाकर मैं किताब खोल लेता हूँँ। किताब खोल लेता हूँँ तो सवाल अपने आप किताब में डूब जाता है। मैं अनुभव करता हूँ कि मैं भी किताब में डूबता जा रहा हूँ।
‘‘मैं जहाँ खड़ा हूँँ’’ निबन्ध पढ़ते-पढ़ते मैंने अनुभव किया कि यहाँँ रामदरश मिश्र जी भी डूबे हुये हैं। इसमें बचपन का स्मृति-चित्र बड़ा जीवन्त है। अपने निबन्ध में लेखक खुद डूबा हुआ मौजूद मिल गया, इससे बड़ीबात, इससे सुखद बात और क्या हो सकती है। इतने से ही तो निबन्ध, ललित निबन्ध हो उठता है। इतने से ही तो सम्बन्ध सजीव हो उठते हैं। साक्षात मिल-मिलकर भी, गले लिपट-लिपट कर भी मिल न सकने के दारुण दौर में किसी रचना में लेखक से मिल लेने कीपुलक कैसी हो सकती है, आप अनुमान कर सकते हैं। इस निबंध में बाढ़ग्रस्त गाँँव मेें आदमी की दुर्दशाग्रस्त जिन्दगी का बड़ा ही मार्मिक उद्घाटन है। मगर मैं तो रामदरश मिश्र जी से ऐसा टकराया कि उनकी स्मृतियों में ही बह गया।
स्मृतियाँ मुझे बहा ले गईं। मैंने विरोध नहीं किया। मैं बहता गया। रोमांच की पुलक सहता गया। बहता गया। अनेकों बार उनके काशी में होने पर उनके साथ होने का अनुभव अपने आलिंगन में कसता गया। रामदरश मिश्र जी के व्यक्तित्व में दो चीजें मुझे बेहद प्रभावित करती हैं। पहला तो उनके श्वेत केश। उनके सफेद बाल उनके मुखमण्डल को अधिक दीप्तिपूर्ण बना देते हैं। दूसरी चीज उनकी निर्व्याज हँँसी। हँसी-ठहाके तो औरों के पास भी हैं, मगर रामदरश मिश्र जी की हँसी में इतनी हार्दिकता और धवलता एक साथ है कि वह सामने वाले को नहवा देती है। नहवा कर स्निग्ध कर देती है। ठाकुर प्रसाद सिंह जी के ईश्वरगंगी निवास पर कई सुबहों का उजास और डा. चन्द्रकला त्रिपाठी के बी.एच.यू परिसर वाले फ्लैट की कई शामों का गुंजन बहुत कुछ कहता रहा। पहली बार उनकी बहुत प्रसिद्ध कविता-

‘‘बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे,
खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे’’
पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी
उठाता गया सर यूँ ही धीरे-धीरे’’

मैंने वहीं चन्द्रकला त्रिपाठी जी के घर पर सुनी थी। तबसे वह पूरी गजल वैसे ही याद है। मुझे पता नहीं क्यों लगता है, वह मेरी ही कविता है। न जाने क्यों बेहद प्रिय चीजें अपनी लगने लगती हैं। खैर, उस गोष्ठी में ठाकुर प्रसाद जी भी थे। जब रामदरश मिश्र जी ने आगे का शेर पढ़ा – ‘‘जहाँ तुम हो पहुँचे छलाँगे लगाकर, वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे-धीरे।’’ तो ठाकुर जी ने उन्हें रोककर मजाक किया- ‘‘यह नामवर के लिये है।’’ फिर…. फिर…… खूब निष्कलुष हँसी गूँँजती-गुदगुदाती रही। मिश्र जी संयोग से मेरी पी.एच.डी. की मौखिकी के परीक्षक भी रहे। मुझे तनिक भी लगा ही नहीं कि मैं परीक्षा दे रहा हूँ।

रामदरश मिश्र जी की एक और विलक्षणता मुझे बेहद प्रभावित करती है। मैं उनके घर पर भी उनसे मिला हूँ। जितनी देर मैं उनके घर में रहा, मुझे महसूस नहीं हुआ कि मैं घर से बाहर का आदमी हूँँ। एक अल्प परिचित आदमी का यह अनुभव आतिथेय की विलक्षण सहजता ओर उच्छल रागात्मकता के बिना घटित हो ही नहीं सकता। मैंने बहुत बार बड़े-बड़े साहित्यकारों को बड़े-बड़े मंच पर देखा है। मंच पर उनकी भव्यता को देखा है। उनकी गरिमा को देखा है। उनके प्रभामण्डल की दमक देखा है। मन में सवाल उठा है कि क्या साहित्य की जगह मंच ही है? घर में साहित्य के रहने की कोई जगह नहीं हैं? मगर रामदरश जी उन विरले साहित्यकारों में हैं, जो जैसे मंच पर हैं, समारोह में हैं, सार्वजनिक जगहों पर हैं, वैसे ही घर में भी हैं। बल्कि घर में और अधिक उत्फुल्ल। और अधिक उत्सुक। और अधिक मिल लेने को आकुल। मैं कहना चाहता हूँ कि अपने घर में वे मुझे पूरा-पूरा मिले हैं। मैं उनसे हिल-मिल सका हूँ। मिलकर खिल सका हूँ। मगर देखिये न किताब की बात छोड़कर मैं कहाँ बहक गया। क्षमा करियेगा।

जो लोग गाँव से जाकर गाँव की कृतार्थता से कृतघ्न होने से बचे रह गये हैं, उनमें रामदरश जी महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। ग्रामीण जीवनमूल्यों के प्रति उनका अगाध अनुराग कहीं भी कुम्हलाया हुआ नहीं दिखता है। ग्रामीण जीवन संस्कृति में ही मनुष्य के बीच मनुष्य के होने का उनका विश्वास अडिग विश्वास है। युवाओं के प्रति उनकी वेदना और विक्षोभ का स्वर उनके गाँव के प्रति प्रेम को उजागर करता है। ‘गाँव के बीच एक चेहरे की खोज’ में स्वार्थ की बाढ़ में अपनत्व के विलोप की पीड़ा बड़े प्रभावी रूप में अंकित है। ‘बबूल और कैक्टस’ में जिजीविषा विहीन जीवन की व्यर्थता का विषाद चित्रित है। धार्मिक पाखण्ड और आडम्बर की भर्त्सना बड़े स्पष्ट रूप में ‘शोर मत करो आदमी सो रहे हैं’ में सुनाई देती है। ‘नगर जहाँ सपने टूटते हैं’ निबन्ध में आधुनिक सभ्यता के पाखण्ड का उद्घाटन है। जड़ता के विशाल जबड़े जिन्दगी को किस कदर लील रहे हैं, सोचकर कलेजा काँप उठता है।

मैं धीरे-धीरे पूरी किताब पढ़ लेता हूँ। ‘फागुन’ भी पढ़ लेता हूँ। फागुन पढ़ते-पढ़ते मन उमग उठता है। जीवन में उछाह को जगाकर प्रकृति धन्य हो जाती है। सौन्दर्य सज उठता है। उछाह केवल उत्साह नहीं है। केवल उल्लास नहीं है। केवल उमंग नहीं है। यह सब उसमें है। मगर इसके अलावा कुछ और भी है। उछाह में बहुत कुछ है। वह एक मनोभाव नहीं है। कई-कई मनोभावों का संवाहक समुच्चय है। आज हमारे पास बहुत कुछ है। उछाह नहीं है। बड़ा कचोटता है, मन फागुन पढ़कर। हम कितने विपन्न होते जा रहे हैं। ‘महानगर की छाया में’ विकृतियों के बीच की उद्विग्नता उन्मथित करती है। ‘गलत नाम में’ अस्तित्व रक्षण और पहचान की समस्या से सामना होता है। शिलाँग की रम्य यात्रा का भावपूर्ण वर्णन पढ़कर मन उल्लसित हो उठता है।

‘सर्जना ही बड़ा सत्य है’ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उदात्त व्यक्तित्व का भावपूर्ण रेखांकन प्रस्तुत करता है। आचार्य द्विवेदी एक व्यक्ति नहीं हैं, उनमें पूरी परम्परा प्रगट है। किसी भी बहाने द्विवेदी जी का साक्षात्कार व्यक्ति को विस्तार देने का निमित्त बन जाता है। द्विवेदी जी की स्मृति धन्यता बोध को जागृत करने का हमेशा ही आधार बन जाती है। ‘बड़ौदे की शाम’ निबन्ध में रचनाकार के सर्जनात्मक चिन्तन का व्यापक धरातल उन्मोचित है। इसमें स्मृतियों के माध्यम से रचनायात्रा के नेपथ्य का निदर्शन है। निबन्धों की भाषा में व्यवहार की भाषा की विदम्धता विमुग्ध करती है। किताब पढ़कर मन में बड़ा तोष होता है। मगर….
मगर मैं सोचता हूँ, कितने बजे हैं? उत्तर तलाशना है। तभी एक विचार मन में कौंधता है। समय की शिनाख्त केवल घड़ी की सुइयों से नहीं चिपकी है। समय की तासीर मनुष्यों के चेहरे पर भी अंकित रहती है। मैं इस संग्रह के निबन्धों में मौजूद चरित्रों के चेहरों को एक बार गौर से देखता हूँ। अपने आस-पास मौजूद लोगों के चेहरों के सामने से फिर से गुजरता हूँ। मुझे लगता है, कुछेक को छोड़कर सारे चेहरों पर बारह बज रहा है। हमारे जनतंत्र के गरिमामय मुखमण्डल पर भी बारह बज रहा है। मेरी आँखों के आगे तमाम-तमाम हलकान चेहरे, परेशान चेहरे, लस्त चेहरे, पस्त चेहरे भीड़ और भगदड़ की शक्ल में तैरने लगते हैं।

ओफ्फ, क्या करूँ? बड़ा जटिल है, चेहरा पढ़ने का काम। बड़ा जोखिम का काम है। बड़ा घाटे का काम है। बेगार का काम है। फिर भी अपनातो यही काम है।
किसी को इत्तिफाक हो, न हो, मैं देख रहा हूँ, हमारे चारों तरफ बारह बज रहा है। हालाँकि कुछ लोग कह रहे हैं, यह सूर्योदय का समय है। कुछ लोगों के लिये भाग्योदय का समय है। कुछ के लिये यह समय सोने की थाली में जेवनार के सम्मुख होने का समय है। किसी-किसी के लिये आश्वास्ति का समय भी हो सकता है। किसी के लिये यह समय राज्यारोहण के स्वस्तिवाचन का समय भी हो सकता है। मगर अधिकांश के लिये यह समय मरघट की मुर्दनगी के आतंक से भरा समय है। हमारे जनतंत्र में हमारे विश्वास रोज-रोज मर रहे हैं। हम उन्हें रोज-रोज मरघट पहँुचा रहे हैं। फिर भी हम जी रहे हैं। फिर भी हम खा-पी रहे हैं। तानते-तानते फट-फट जा रही चादर को सी रहे हैं। हमारे चेहरे पर हमारे सपनों के चिताओं की राख लिपटी है। हवाइयाँ उड़ रही हैं। हमारा कुछ भी सुरक्षित नहीं है। मैं अपना चेहरा भी शीशे में देखता हूँ। साफ-साफ लग रहा है, – बारह बज रहे हैं।

बारह बजने के बोध के निबन्ध ललित निबन्ध नहीं हो सकते हैं, क्या?
मगर, नहीं। मुझे कोई प्रश्न नहीं पूछना है। हमारे समय के लोकतंत्र में प्रश्न पूछना गुस्ताखी है। अनुशासनहीनता है। निष्ठा का तिरस्कार है। देशभक्ति के खिलाफ है। विकास के विरूद्ध है। कानून व्यवस्था का मजाक है। इसलिये नहीं, नहीं। मुझे कोई प्रश्न नहीं पूछना है।

रामदरश मिश्र जी का कहना है कि हो सकते हैं। केवल संस्कृति विमर्श ही ललित निबन्ध का विषय नहीं है। जीवन की ऊबड़-खाबड़ सच्चाइयाँ भी ललित निबन्ध की पहचान हैं। जीवन की छोटी-छोटी सच्चाइयों में दबी-छिपी जिजीविषा की शक्ति और उसका सौन्दर्य मनुष्य के लिये हमेशा ही अभ्यर्थना के योग्य है। कोई भी चीज सामान्य होने के कारण तुच्छ नहीं हो जाती। मनुष्य जाति की जीवन यात्रा सामान्य जीवन बोध के बीच ही असामान्य और महनीय अनुभूति को उपलब्ध करने की विकास यात्रा है।

-Young Writer

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