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Monday, May 20, 2024

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हस्तिनापुर एक्सटेंशन : कस्मै देवाय हविषा विधेम

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Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह, HASTINAPUR EXTENTION

हस्तिनापुर एक्सटेंशन : मनुष्य की जिज्ञासा हमेशा से, हमेशा के लिये पूर्णता की जिज्ञासा है। जिज्ञासा ही खोज में प्र्रवृत्त करती है। मनुष्य की खोज पूर्णता को पाने की खोज है। मनुष्य की अभीप्सा परिपूर्ण होने की अभीप्सा है। वह भर जाना चाहता है। वह तृप्त हो लेना चाहता है। वह आनन्द चाहता है। सारी इच्छाओं का मूल पूर्णता है। मगर मूल दिखाई नहीं देता। जड़ कहाँ दिखाई देती है? वह तो धँसी है। बिल्कुल अन्दर। अस्तित्व की आन्तरिक सतह में जड़ धँसी है। बाहर विस्तार है। विस्तार दिखाई देता है। मूल नहीं दिखाई देता। विस्तार मूल को ढँक देता है। बड़ा विचित्र है। मगर सच है। जीवन बड़ा विचित्र है।

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Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

जीवन का मूल क्या है? कुछ नहीं। जीवन का मूल जीवन ही है। जीवन से हटकर जब हम जीवन के मूल को तलाशने लगते हैं, तो उससे विमुख हो उठते हैं। चाहे हमारी तलाश ईश्वर के लिये हो, चाहे धर्म के लिये हो, चाहे तत्व के लिये हो। ईश्वर जीवन में ही है। धर्म जीवन में ही है। तत्व जीवन में ही है। हम भूल जाते हैं कि विस्तार भी मूल का ही है। बिना मूल के कोई विस्तार संभव नहीं है। बिना जड़ के कोई पेड़ हो ही नहीं सकता।
मूल सच है। मगर विस्तार झूठ नहीं है। जड़ सच है, मगर पेड़ भी सच है। तना, शाखा, टहनी, पत्ते, फूल, फल, बीज सब सच हैं। सच से झूठ का जनमता विश्वसनीय नहीं है। हम सच को खोजने चलते हैं और झूठ में उलझ कर रह जाते हैं।
कौन उलझाता है, हमें झूठ में? झूठ है नहीं और उसमें उलझे हैं हम। हमें उलझाती हैं, शास्त्रों की गलत समझ। बिना कुछ समझे, समझाने का लोलुप व्यापार। व्यापार का प्रसार। व्यापार का प्रचार। प्रचार का विज्ञापन। आदमी को अपना अनुगत बनाने की, अनुचर बनाने की दुर्ललित लालसा। हमें उमझाता है, विस्तार को मूल से भिन्न और झूठ बताने का झूठ। समूचे वृक्ष में जड़ से उत्प्रेरित ऊर्जा संचरित है। पत्ता-पत्ता जड़ से पोषित है।

हमारे शास्त्र, जिसे हमारे मनीषियों ने रचा है, उसमें जिज्ञासा है, खोज है, उपलब्धियाँ हैं। जिज्ञासा के बड़े गहरे स्रोत हैं। खोज की उत्कट उत्प्रेरणा है। उपलब्धियों का अपूर्व तोष है।
जिज्ञासा है, – कस्मै देवाय…? कस्मै देवाय हविषा विधेम।’’ किस देवता के लिए? हम यजन किस देवता के लिए करें? देवता कौन है? देने वाला कौन है? क्या देने वाला है? यज्ञ किसलिये करना है?
क्या देने वाला है? यज्ञ किसलिये करना है?
खोज है,- ‘‘आत्मने मोक्षार्थ जगत हिताय च’’। हमारी खोज स्वयं के मुक्त होने की खोज है। जगत के कल्याण की, जगत केक हित साधन की खोज है।
मुक्ति की खोज असीमता के बोध की खोज है। अस्तित्व असीम है। जगत असीम है। बिना मुक्त हुए जगत का हित साधन संभव नहीं।

उपलब्धि है, -‘रसो वै सः’ वह ही रस है। रस ही वह है। रस ही जीवन है। रस ही जगत है। रस ही पूर्ण है। रस ही सब कहीं परिपूर्ण है। रस को ही अवशोषित करके मूल पत्ता-पत्ता में पहुँचा रहा है। डाल-डाल, पात-पात सब रस से आप्लुत है।
बड़ा आश्चर्यजनक है कि धर्म जिस रूप में हमारे जनजीवन में प्रचारित है, वह धर्म नहीं है। धर्म का धोखा है। हमारे समाज में धर्म का जो स्वरूप व्यवहार में है, वह भय को पैदा करने वाला है। अभय को प्रदान करने वाला धर्म भय को पैदा करने वाला कैसे है? कैसे हो गया है? किसने भय को बढ़ाने वाले व्यवहार को धर्म की शक्ल में खड़ा किया है। पुण्य के लोभ का प्रवर्तन वाला धर्म किसने बनाया है? मृत्यु में, शादी-विवाह में, जन्म-कर्म में तमाम मौकों पर ऐसा-ऐसा, ऐसे-ऐसे नहीं करोगे तो धर्म से च्युत हो जाओगे? दान दोगे तो पुण्य कमाओगे। पुण्य से ऐश्वर्य को प्राप्त करोगे। क्या समृद्धि को, ऐश्यवर्य को, वैभव को पाने का साधन ही धर्म नहीं है। धन क्या समृद्धि को, ऐश्वर्य को, वैभव को पाने का साधन ही धर्म नहीं है। धन-वैभव को प्राप्त करने के साधन और भी हैं। यह कौन-सा धर्म है? कैसा धर्म है? किसका धर्म है?

नहीं, ऐसा वेदों में नहीं है। उपनिषदों में नहीं है। रामायण में नहीं है। महाभारत में नहीं है। महाकाव्यों में नहीं है। बुद्धवाणी में नहीं है। महावीर चरित में नहीं है। फिर भी है। गाँव-गाँव में है। घर-घर में है। जन-जन में है।ै आदमी को कमजोर बनाने वाला धर्म, लालची बनाने वाला धर्म, कायर बनाने वाला धर्म, डरपोक बनाने वाला धर्म, स्वार्थी बनाने वाला धर्म, अन्धा बनाने वाला धर्म हर कहीं है।
धर्म के नाम पर हम इतने डरे हुए हैं कि कुछ कहने लायक नहीं। हमें डर है कि हम बलवान हो जायेंगे तो धर्म से वंचित हो जायेंगे। हमें डर है कि हम धनवान हो जायेंगे तो धर्म से विमुख हो जायेंगे। हमें डर है कि हम सुंदर दिखेंगे तो धर्म से पतित हो जायेंगे। हमें डर है कि हम बुद्धिमान हो जायेंगे तो धर्म से भ्रष्ट हो जायेंगे। राम, राम। यह भी कोई धर्म है। धर्म न हुआ, डर की दुकान हो गया। हर किसिम का डर यहाँ उपलब्ध है। मन्दिर जाओ तो डरे हुए जाओ। कोई अशुद्धता न हो जाय। कोई त्रुटि न हो जाय। कुफल न मिल जाय। मंदिर जाओ तो माँगने के लिए जाओ। बिना उचित कीमत चुकाये सब कुछ पाने के लिए देवता से कृपा की भीख माँगने जाओ। भक्ति को भिखमंगई का धन्ध बनाने का जवाबदेह कौन है?
जबाबदेह चाहे जो हो, धन्धा हम सभी कर रहे हैं। इस काले धन्धे में हम सब लिप्त हैं। इतने लिप्त हैं कि इसके बारे में सोचने का हमें अवकाश ही नहीं है।

कितना अजीब है, वैतरणी में रहने वाले लोग वैतरणी में गिरने के डर से धर्म का पालन करते है। नरक के दुखों को भोगने वाले लोग नरक में जाने के डर से धर्म का पालन करते हैं। गाय की पूँछ पकड़कर स्वर्ग में पहुँचने की लालच में धर्म का पालन करते हैं। यह पता नहीं कैसा धर्म है। धर्म की शक्ल में पता नहीं क्या है? हमारे तो पूर्वजों की पूजा की पीठिका ही बिल्कुल भिन्न है-

ऊँ पूर्णमदः पूर्ण मिदमं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवाव शिष्यते।।

यहाँ सच और झूठ का। सत्य और मिथ्या का। मूल और विस्तार का विभेद नहीं है। खण्डों की आराधना नहीं है। अखण्ड का, असीम का स्तवन का। असीमता की, पूर्णता की स्तुति है। वह भी पूर्ण है। यह भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण उत्पन्न हुआ है। सत्य में से सत्य अविभूर्त हुआ है। पूरे में से पूरा निकाल लेने के बाद भी पूरा बचा रह जाता है।
हमारी परंपरा में हमारी प्रार्थना सब कुछ को पाने की प्रार्थना है। हमारी प्रार्थना खण्ड को नहीं, खण्डित को नहीं, पूर्ण को पाने की प्रार्थना है। सब कुछ मिलकर पूर्ण होता है। पूर्ण में सबकुछ होता है। सबकुछ में सब है, तेज है, बल है बुद्धि है, वीर्य है, ओज है, धन है। जीवन में यह सब है। इस सबमें जीवन है, इसलिये प्रार्थना है, कि-

तेजोऽसि तेजो मयि धेहि। बलमसि बलं मयि धेहि। वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि……।

जीवन में तेज हो, प्रकाश हो, प्रभा हो, दीप्ति हो। बल हो। वीर्य हो। बुद्धि हो। धन हो। ऐश्वर्य हो। सब हो। सब होगा तो जीवन पूर्ण होगा। जीवन में सब हो- धर्मार्थ काम मोक्षाणाम्।
जीवन में धर्म की प्रतिष्ठा हो, अर्थ की प्रतिष्ठा हो, काम की प्रतिष्ठा हो, मोक्ष की प्रतिष्ठा हो, तो जीवन पूर्ण होगा। केवल धर्म जीवन को पूर्ण बनाने के लिये पर्याप्त नहीं है। धर्म निरीह बनाने के लिये नहीं है। सबल बनाने के लिये है। समर्थ बनाने के लिये है। अर्थ, धर्म का विरोधी नहीं है। सहायक है। सहचर है। काम, धर्म का नाशक नहीं है। काम, धर्म का विलोम नहीं है। प्रकृति की मूलशक्ति का निदर्शन है। काम जीवन के विस्तार का वाच्यार्थ है। और मोक्ष? मोक्ष में ही जीवन है। जीवन की पूर्णता का बोध है। सीमा पूर्ण नहीं है। असीमता पूर्ण है। पूर्णता का बोाध ही मुक्ति है। असीमता ही अविनाशी है। अस्तित्व के अविनाश का बोध ही मोक्ष है।

जीवन, मुक्त है। बँधा नहीं है। जो चीज हमें मुक्त होने की तरफ ले जाती है, जीवन की तरफ ले जाती है। जीवन कीतरफ ले जाने वालाा रास्ता ही हमारे लिये वरेण्य है। इसलिये प्रश्न है,- कस्मै देवाय? किस देवता के लिए?
कौन है, जो हमारे जीवन को पूर्ण बनाने में, परिपूर्ण बनाने में सहायक है। जीवन की पूर्णता की आराधना ही, हमारी आराधना है।
जीवन केवल धर्म में पूर्ण नहीं है। केवल अर्थ में पूर्ण नहीं है। केवल काम में पूर्ण नहीं है। केवल मोक्ष में पूर्ण नहीं है। वह सबमें है। सबमें होकर पूर्ण है।
पता नहीं किसने, धर्म की श्रेष्ठता सुनिश्चित करने के लिये धन से उदासीन होने का विचार प्रसारित कर दिया। पता नहीं किसने मोक्ष की महिमा बताने के लिये काम से दूर रहने का उपदेश प्रचारित कर दिया। यह मनीषियों का नहीं, पाखण्डियों का पाण्डित्य है। खण्ड की आराधना पाखण्ड है।

हमारे मनीषियों ने शास्त्रों में ऐसा नहीं कहा है। धन की निन्दा धर्म नहीं है। धनिकों का निरस्कार धर्म नहीं है। धन निन्दनीय नहीं है। धर्म विहीन धन निन्दनीय है। काम तिरस्करणीय नहीं है, धर्म और धन से रहित काम, विमुख काम रिस्करणीय है। खण्ड की उपासना, खण्डित जीवन की उपासना मनुष्य के लिय मंगल विधायक नहीं है। पूर्ण की उपासना, जीवन में, जीवन के लिये मंगलकारी है।
हमें उस देवता के लिये यजन करना है, जिसके प्रसन्न होने से पर्जन्य पानी बरसते हैं। पानी बरसने से शस्य की वृद्धि होती है। शस्य से अन्न उपजता है। अनन्न से प्राणियों का, प्राणों का पोषण होता है। जो हमारी वनस्पतियों की रक्षा करता है। वृक्षें की रक्षा करता है। हमारे पशुओं की रक्षा करता है। जो हमारे वाक् को, श्रोत को, स्पर्श को, जाग्रत रखता है। प्राणों को पुष्ट करता है। जो हमें, पूर्ण के बोध की ओर उन्मुख करता है, उत्प्रेरित करता है, हमें उसकी उपासना करनी है। वही हमारा उपास्य है। हमें उसकी उपासना करनी है, जिसमें समूचा अस्तित्व समाहित है। हमारी उपासना अस्तित्व में समाहित होने की उपासना है। समूचे जीवन जगत की एकता की, एकरूपता की उपासना हमारी आराधना का, हमारी प्रार्थना का मूल है। यही हमारी प्राप्ति का आधार है।

मगर कहीं, न कहीं बड़ी भारी गड़बड़ है। गड़बड़ यह है कि धर्म की शक्ल में जिस धोखे को खड़ा किया गया है, हम सारी शक्ति लगाकर भी उसे इंकार नहीं कर पा रहे हैं। विचार के धरातल पर उसे झूठ समझकर भी व्यवहार में उसके आगे आत्मसमर्पण को विवश हो जाते हैं। यही विवशता मनुष्य जाति की दारुण नियति है। झूठ के प्रभाव में, झूठ के आतंक में, झूठ के समर्थन में बहुमत का होना हमारे जीवन की सबसे जटिल समस्या है। व्यापक जनजीवन में प्रचारित धर्म, धर्म जैसा क्यों नहीं है? हमारा धर्म, हमें डरपोक बनाता है। दयनीय बनाता है। निरीह बनाता है। निर्धन बनाता है। निष्काम बनाता है। कर्महीन बनाता है। लोभी बनाता है। स्वार्थी बनाता है। दँतनिपोर बनाता है। याचक बनाता है। यह सब भला धर्म का काम है? नहीं, नहीं, कत्तई है।

धर्म तो सत्य का अवबोध कराता है। सचाई के सामने आँख मिलाकर खड़ा होने का साहस देता है। पूर्णता के प्रत्यय को आत्मसात करने का उन्मुख करता है। सबमें अपने को, और अपने में सबको,- सबकुछ को अनुभव करने की सामर्थ्य देता है। धर्म अर्थ का सम्मान है। काम का समादर है। मोक्ष की प्रशस्ति है। धर्म सुख का विस्तार है। धर्म विस्तार का अभिनन्दन है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सभी विस्तार की अभ्यर्थना के माध्यम हैं। हमें विस्तार में ले जाकर असीमता के मर्म का उद्घाटन करते हैं। सौन्दर्य की उपासना का और प्रेम की पूजा का हमें मंत्र देते हैं। विस्तार में ही, विस्तृत हो लेने में ही सुख की स्थिरता है। आनन्द की स्थिति है।

‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वेसन्तु निरामयाा
‘‘सर्वे भद्राािण पश्यन्तु मा कश्चिद दुख भाग भवेत्।।’’

यह महानता के विचार का मंत्र नहीं है। यह सचाई के अनुभव का शंखघोष है। यह अस्तित्व के अवबोध की उद्घोषणा है। धर्म व्यक्ति पर अवलम्बित होने के लिये नहीं है। व्यक्ति धर्म में समाहित होने के लिये है। धर्म, जीवन में समाहित होने के लिये है। धर्म, व्यक्ति अस्मिता के सामूहिक अस्मिता में विलयन की अभिक्रिया का नाम है। वैयक्ति इयत्ताएँ जहाँ सामूहिक इयत्ता में विसर्जित होती हैं, वहीं धर्म की स्थिति है। वहीं धर्म की ध्वनि है। वहीं धर्म का प्रकाश है। धर्म का प्रकाश ही धन का गौरव है। काम की कीर्ति है। मुक्ति की महिमा है। सभी सुखी हों, यह मुक्ति की महिमा का ही उद्घोष है।
कौन है? कौन है वह, जो हमें धर्म से संयुक्त करेगा। धन से अभिबृद्ध करेगा। काम से परितुष्ट करेगा। मुक्ति के महत बोध से पूर्ण करेगा। वह कौन देवता है?

‘‘मातृ देवो भव…’’ जो तुम्हारे अस्तित्व की प्रसूता माता है; देवता है।
‘‘पितृ देवो भव….’’ पिता, जो तुम्हारी अस्मिता का स्थापक है, देवता है।
‘‘आचार्य देवो भव….’’ तुम्हारी अस्मिता का प्रकाशक, आचार्य देतवा है।

तुम्हारे अलावा जो कुछ है, उदसमें भी तुम्ही हो, इस प्रकाश का प्रबोध करने वाला आचार्य, देवता है।
‘‘अतिथि देवो भव…’’ जो स्वयं चलकर तुम्हारे पास आता है, तुम्हारे साथ रहता है, वह अनुभव, देवता है।
साथ रहता है, वह अनुभव, देवता है।
जो अस्तित्व का संस्थापक है, पिता है, देवता है। जो अस्तित्व की उद्घाटक है, माता है, देवता है। जो अस्तित्व का प्रकाशक है, आचार्य है। जो अपने को ही भेदकर अपने में आता है, अतिथि है, अनुभव के स्वरूप में, देवता है।
देवता की पूजा करो। देवता का यजन करो। हमारा यजन अस्तित्व का अस्तित्व में यजन है। अपनी समस्त वैयक्तिकता का सार्वजनिकता में, सार्वभौमिकता में यजन यज्ञ है। अपने अस्तित्व में अपने धर्म की आहुति, अपने धन की आहुति, अपने काम ही आहुति, मुक्ति में फलित होती है।

मुक्ति के फलित होते ही सबकुछ फलित हो उठता है। जीवन फलित हो जाता है। पूर्णता फलित हो जाती है। असीमता फलित हो जाती है। रस फलित हो जाता है। अमरत्व फलित हो जाता है। सब अपनाहो जाता है। अपनत्व का असीम विस्तार घटित हो उठता है,- वसुधैव कुटुम्बकम्। सारी पृथ्वी में सब अपना ही है। अपना ही विस्तार है। अपना ही परिवार है।
पूर्णता का बोध ही, जीवन है। जीवन का मकसद है। जीवन का अर्थ है। जीवन की व्यंजना है।
यही हमारी पूजा है। यही हमारी प्रार्थना है। यही हमारा यज्ञ है। यही हमारा यजन है।

किस देवता के लिये?
किस देवता के लिये हम हवि डालें?
जीवन देतवा के लिये।
पूर्णता के देवता के लिये। पूर्ण देवता के लिये।

हमारी जिज्ञासा पूर्णता की जिज्ञासा है। हमारी खोज पूर्णता की खोज है। हमारी प्राप्ति, पूर्णता की प्राप्ति है। हमारी उपलब्धि, पूर्णता की उपलब्धि है। हम खण्ड के उपासक हभी नहीं रहे है। हम टुकड़खोर जाति के उत्तराधिकारी नहीं है। हमारी विरासत पूर्ण की विरासत है। परिपूर्ण की विरासत है। हमारी विरासत पूर्ण की प्रतिपादक विरासत है।

-Young Writer

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