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Sunday, July 6, 2025

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अर्ध सत्य का दारुण दंश

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Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

सम्मानित सज्जनों,
आज की सभा में सबसे पहले मैं देश प्रेम में बलिदान के मूल्य के अमर प्रतिष्ठापक सरफरोशी की तमन्ना के गान के सर्जक शहीद सम्राट भगत सिंह और उनके अभिन्न साथियों की पुण्य-स्मृति के प्रति अपना नमन निवेदित करता हूँ। इसके साथ ही मैं भगत सिंह की विरासत में थोड़ी भी आस्था रखने वाली इस देश की नौजवान पीढ़ी को जो यहां उपस्थित है और जो उपस्थित नहीं भी है, उसके प्रति अपना सम्मान समर्पित करता हूँ।
मित्रों! आज विचार के लिए आपने जो प्रश्न हमसे पूछा है- क्या हमारा देश आजाद है? इसके लिए आपको हार्दिक धन्यवाद देना चाहता हूँ। धन्यवाद इसलिए देना चाहता हूँ कि आपने इस महान देश की मौजूदा समय में जड़ता से आक्रान्त चेतना के समक्ष एक जिन्दा सवाल खड़ा किया है। जिस समय हमारा देश तमाम-तमाम मुर्दा सवालों के स्वार्थपूरक जवाबों के बनावटी और दिखावटी जवाबों की तलाश में व्यर्थ का खून-पसीना बहाने का नाटक खेल रहा है, उस दौर में एक जीवित सवाल उठाने के लिए मैं अपनी ओर से आप सबकी अभ्यर्थना करता हूँ।
सच कहूँ तो आपका यह सवाल हमें हमारे समय में, हमारी सामाजिक चेतना और हमारे सामाजिक बोध की हथेली पर डंक उठाये बिच्छू की तरह महसूस हो रहा है। जिसकी हथेली पर डंक उठाये बिच्छू बैठ जाय उसका चैन से बैठे रहना संभव नहीं। वह बेचैन होगा ही।
आज मैं अनुभव करता हूँ कि हमें बेचैन करने वाले जिन्दा सवालों की बेहद जरूरत है। जब सवाल हमें बेचैन करेंगे, तो हम हाथ पर हाथ रखकर बैठे नहीं रह सकेंगे। तब हम सिर छुपाकर उनकी अनदेखी न कर सकेंगे। तब हम सर्वनाशी नींद के नशे में अपने जीवन की सच्चाई से विमुख नहीं हो सकेंगे। जब हम बेहद बेचैन होंगे, बौखलायेंगे, तिलमिलायेंगे तो जाहिर है कि हम तबियत से उनके बारे में, उनके जवाब हासिल करने के बारे में जरूर ही उन्मुख होंगे। मेरा विश्वास है, जब हम पूरी तबियत से किसी सवाल के सामने खड़े होंगे तो जरूर कुछ न कुछ होगा। कुछ होगा- कुछ असंभव को संभव करने वाला होगा-
‘‘कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।।
इस समय हमारे देश की चेतना स्वार्थ और निराशा से इतनी संकुचित और अच्छादित हो चुकी है कि कुछ भी सकारात्मक और सार्थक के घटित होने के प्रति हमारा विश्वास ही मर चुका है। इस विश्वास को जगाने के लिए हमें बेचैन करने वाले सवालों की जरूरत है। साथियों यह हमारा और हमारे देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि आज हमारे लिए बेधक और उत्पीड़क सवाल हमारे अस्तित्व के लिए सार्थक और प्रीतिकर हो रहे हैं।
उत्तर चाहे जो भी हो। मैं उत्तर को उतना महत्वपूर्ण नहीं समझता। मेरे विचार में उत्तर से अधिक महत्व का हमेशा सवाल ही होता है। सवाल अगर सही हो, अर्थपूर्ण हो, जीवन में आन्तरिक जरूरत से उपजा हो, चेतना की आन्तरिक गहराई को मथकर प्रगट हुआ हो, तो हमारा विश्वास है, वह हमें सही-सही दिशा में ले जायेगा। वह हमें सही प्रयत्न में नियोजित कर देगा और एक दिन निश्चय ही हमें सही जवाब को उपलब्ध करा देगा। जहाँ तक मैं समझता हूँ इस समय भारतीय जाति के सम्मुख एक सही प्रश्न, एक ईमानदार प्रश्न, एक जीवित प्रश्न की बेहद जरूरत है, जो उसे उन्मथित कर दे। व्यग्र कर दे। बेचैन कर दे। उसकी नींद और उसका चैन उससे छीन ले। मैं समझता हूँ आपका प्रश्न वैसा ही प्रश्न है। इतिहास साक्षी है, अर्जुन के प्रश्न के कारण ही गीता जैसा जीवन के मर्म को उद्घाटित करने वाला ज्ञान का ग्रन्थ और पार्वती के प्रश्न के कारण रामकथा का अमृतमय ‘रामचरित मानस’ जैसा उच्चतर जीवन मूल्यों का प्रतिष्ठापक प्रेम का ग्रन्थ हमें उपलब्ध हो सका है।
यह सच है कि आपका प्रश्न नया नहीं है। सभी जानते हैं कि यह प्रश्न भारत की आजादी के साथ ही पैदा हुआ प्रश्न है। उस समय समाज निर्माण में संरचनागत बुनियादी परिवर्तन के प्रति गहन आस्था रखने वाले बुद्धिजीवियों ने यह सवाल उठाया था। उन्होंने इस देश की राजनीतिक आजादी को सिर्फ सत्ता हस्तान्तरण के रूप में देखा और उसे अपर्याप्त बताया था। उस समय व्यापक जनसमुदाय इससे उतना प्रभावित नहीं हुआ और यह प्रश्न एक राजनीतिक चिन्तन के संगठन का विरोध बनकर रह गया। बाद में एक बार यह प्रश्न फिर खड़ा हुआ, आर्थिक विषमता और अमानवीय उत्पीड़न के विरूद्ध आक्रोश से उन्मथित हस्तक्षेप के रूप में। इसने व्यवस्था में और विचार में विक्षोभ पैदा किया। एक सीमा में उसके परिणाम दिखाई पड़े। फिर भी सवाल अधिकांश में राजनीतिक और बौद्धिक हलकों को लांघकर व्यापक जन-जीवन में पैठ नहीं बना सका। मगर आज स्थितियां इतनी बदल गई हैं कि लगता है, अब यह सवाल राजनीतिक सवाल न रहकर एक सामाजिक सवाल के रूप में रूपान्तरिक हो रहा है। एक राजनीतिक सवाल का सामाजिक सवाल बन जाना ही सवाल के जिन्दा और जीवित होने का प्रमाण होता है। इसी कारण मैं आज इस सवाल को जिन्दा सवाल कहना चाहता हूँ। कह रहा हूँ। और कहते हुये प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ। एक पीड़ादायक प्रसन्नता से गुजरते हुये जिस दारुण नियति का साक्षात्कार होता है, कर रहा हूँ।
आज जब मैं इस प्रश्न के सम्मुख जवाबदेह की स्थिति में खड़ा हूँ, अपने को बड़ी असुविधाजनक स्थिति में पा रहा हूँ। नहीं, नहीं सुविधाजनक ढंग से कभी भी किसी भी सवाल का जवाब हासिल कर पाना संभव ही नहीं हो सकता। मैं अपनी द्विधाग्रस्त मानसिकता में देखता हूँ, मेरी नियति कितनी दयनीय है। हाँ, दिनकर जी का कहना है कि द्विधाग्रस्त मानव ही सबसे दयनीय आदमी होता है और उनका यह कहना मुझे बिल्कुल ठीक मालूम होता है। मेरी दुविधा अपने ही अन्तःसंघर्ष के द्वंद्व से उपजी दुविधा है, अपने ही विचार और अपनी ही संवेदना के, अपने ही हृदय और अपनी ही बुद्धि के, अपने ही विवेक और अपने ही अनुभव के अन्तर्विरोध की दुविधा है। मैं क्या कहूँ, जो कहना चाहता हूँ, वह कह नहीं पा रहा हूँ। जो सच है, वह कहते हुए मन सहम जा रहा है। जो सच नहीं है, उसे कहने में वाणी व्यथित हो जा रही है।
बड़ा अजीब है, बड़ा विचित्र है। कुछ भी कहना सुविधाजनक नहीं है, सही नहीं है। मगर अपने सही होने की प्रबल आकांक्षा से भरा हुआ है। मेरा मन कहता है कि- मैं कहूँ कि मेरा देश आजाद है। कौन भला ऐसा अभागा होगा जो यह कहना नहीं चाहेगा। जिस मन में ऐसा कहने की साध न हो, उसे तो मनहूस कहना ही मुनासिब होगा। मगर क्या करूँ स्थितियाँ इजाजत नहीं देतीं। स्थितियां आजादी का उपहास करती मुँह चिढ़ा रही हैं। मैं कहना चाहता हूँ कि हमारा देश आजाद है, हम आजाद हैं। मैं कहना चाहता हूँ कि आजाद होते हुए भी हमारा देश आजाद नहीं है, हम आजाद नहीं हैं। हम किसी के प्रत्यक्षतः गुलाम नहीं हैं, मगर कोई है, जो हमें अपना गुलाम समझता है। हम अपने को आजाद समझने के सपने में आँखें बंद किए हैं और कोई है, जो हमें अपने उपभोग के, उपयोग के अनुकूल बना लेने का इंतजाम रच रहा है। हम आजाद हैं सिर्फ जिन्दा रहने के लिए मगर हमारे जीवन के सारे निर्णय किसी दूसरे के हाथ में हैं। हम आजाद हैं, जीने की कोशिश में अपराधी ठहरा दिये जाने के लिए और निरपराध रहकर मौत के मुँह में समा जाने के लिए। जरा देखिये न! हमारी नियति कितनी दारुण है। इससे आँख मिलाना कितना दुःस्सह है।
मेरी पीड़ा, मेरे दुःख, मेरे अपमान और वंचनायें कहती हैं कि मैं कह दूँ कि हमारा देश आजाद नहीं है, हम आजाद नहीं हैं। हमसे हमारी व्यवस्था के पाखण्ड, व्यवस्थापकों के छल कहते हैं कि मैं कह दूँ कि हमारा देश आजाद नहीं है, हम आजाद नहीं है। मगर कैसे कहूँ? जब भी कहना चाहता हूँ, मेरी जीभ पत्थर की हो जाती है। सिर शर्म से झुक जाता है। मैं मुँह ताकता रह जाता हूँ।
मुझे लग रहा है, मैं जो कह रहा हूँ वह पूरा-पूरा सच नहीं है। मैं जो कह रहा हूँ- जो कहना चाह रहा हूँ- वह झूठ नहीं है। बड़ा अद्भुत है। बड़ा विस्मयजनक है। मैं जो कुछ कह रहा हूँ वह एक तरफ से सच है, दूसरे तरफ से झूठ है। एक सिरे से टटोलकर देखता हूँ तो लगता है सच है, दूसरे सिरे को परखता हूँ तो झूठ निकल जाता है। क्या करूं? जी बड़ा हलकान है। मैं देख रहा हूँ जो कुछ भी हमारे सामने है- वह आधा सच है, आधा झूठ है। आज हमारे जीवन का यथार्थ आधा सच और आधा झूठ का गजब समिश्रण बन गया है। आज हमारे देश का सामाजिक यथार्थ दूध में मिल गये पानी की तरह सच और झूठ का विचित्र घोल बन गया है। हम पानी को दूध मानकर और दूध को पानी समझ कर पी रहे हैं। पीने केा विवश हैं। पी रहे हैं, पीते जा रहे हैं, पीते हुए बिदक रहे हैं, मुँह बिचका रहे हैं, नाक-भौ सिकोड़ रहे हैं, मगर पी रहे हैं। अभी हम दूध और पानी को, सच और झूठ को, दोस्त और दुश्मन को ठीक-ठीक अलगा देने की तरकीब को उपलब्ध नहीं कर सके हैं। हम सभी उस तरकीब को खोज लेने के लिए तत्पर भी नहीं हो सके हैं। मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि हमारी सामूहिक चेतना के सम्मुख दूध का दूध और पानी का पानी कर देने के लिए संकल्पबद्ध और तत्पर हो जाने का उचित समय उपस्थित हो गया है। आज हमारा चिंतन दलों के दलदल में दुर्दशाग्रस्त सत्ता पर अधिकार जमाने की गर्हित सोच से उबरकर समाजिक और मानवीय अभ्युन्नति के प्रति उन्मुख होना चाहिए। इसके लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर अपने को बुद्धिजीवी कहने और समझने वाले लोगों को और इस देश की महान संघर्षशील परम्परा का उत्तराधिकारी मानने वाले लोगों को जन-जागरण के लिए कुरूक्षेत्र में अटल भाव से जूझ पड़ने की खातिर उतर पड़ना चाहिए।
मुझे लगता है कि महाराणा प्रताप का अकुंठ शौर्य, झांसी की रानी की आनाक्रान्त ललकार, टीपू की अदम्य युयुत्सा, दाराशिकोह की व्यापक सहृदयता, स्वामी विवेकानन्द का उत्तुंग आत्मगौरव, भगत सिंह की बलिदानी देशभक्ति व महात्मा गांधी की अहिंसक करुणा, अडिग राष्ट्रप्रेम इस महान देश की अक्षुण्ण विरासत को संभालने और संवारने के लिए जो भी अपने को इस देश का सुयोग्य नागरिक समझते हैं, उन्हें दोनों हाँथ उठा-उठाकर पुकार रहा है- जागो, जागो, आओ, आओ इस देश की दुर्भाग्यपूर्ण नियति को अर्धसत्य के दारुण दंश से मुक्त करने के लिए अभियान के तुम्हीं नायक हो। इस नियति को बदलने का उत्तरदायित्व ही तुम्हारा उत्तरदायित्व है।
यह सच है कि मौजूदा समय में हमारा वैश्विक परिदृश्य भयानक रूप से विषैला, मूल्यहीन और मनुष्य विरोधी हो गया है। यह वास्तविकता अब किसी से भी नहीं छिपी है कि दुनियाँ में अपना आर्थिक प्रभुत्व एकछत्र स्थापित करने की हवस में अमरीका अपने कुछ मित्र राष्ट्रों के साथ दुनिया के तमाम देशों की निजी पहचान को रौंदकर उन्हें अपना गुलाम बनाने को आतुर है। केवल कुछ सुनहले और लुभावने शब्दों का भ्रमजाल फैलाकर बेहयाई और बेशर्मी की सारी हदें पाकर वह अभानुषिक अत्याचारों से परिपूर्ण आर्थिक विश्वयुद्ध का जैसा नंगा नाच कर रहा है।, उसकी भर्त्सना और उसके कारगर प्रतिरोध के लिए हमें निर्भ्रान्त भव से खड़ा होना होगा। मगर यह भी सच है कि हम अपनी आजादी की सारी दुर्दशा और मूल्यहीनता के लिये, अपने बदतर और बेईमान आचरण के लिये, अपनी बदहाली की तमाम विसंगतियों और बिडम्बनापूर्ण स्थितियों के लिए सबसे अधिक खुद ही जिम्मेदार हैं।
मेरे विचार से हमें अकुंठ भाव से बिना किसी हीलाहवाली के पतनशील मूल्यों में अपनी आस्था और अपने कदाचार की आत्मस्वीकृति सार्वजनिक रूप से करनी होगी। केवल सत्ता हासिल करने के एकमात्र राजनीतिक उद्योग के समान्तर राष्ट्र निर्माण और समाज को समृद्ध बनाने के प्रति समर्पित राजनीतिक चेतना का विकल्प तैयार करना होगा। भ्रष्टाचार से विमुख और विलग रहने का हार्दिक संकल्प होना होगा। व्यक्ति हित के स्थान पर सामूहिक और सामुदायिक हित केा वरीयता देने की आस्था उपजानी होगी। कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के बाद हमने तमाम वस्तुओं को बनाने के लिए तो बहुत सजग और यत्नशील हुए मगर जहाँ से आदमी बनता है, जहाँ आदमी का चरित्र गढ़ा जाता है, उस केन्द्र को बिल्कुल ही उपेक्षित छोड़ दिया। उधर हमारा कोई ध्यान ही नहीं है। आज हमारे विद्यालयों में जो कुछ भी सिखाया और पढ़ाया जा रहा है, उसका व्यवहार हमारे जीवन में भूलकर भी होता दिखाई नहीं देता। जो कुछ कभी भी पढ़ाया और सिखाया नहीं जा रहा है उसी का व्यवहार हम समूचे जीवन में करने को अभिशप्त हैं। यह कितना दारुण सच है।
आज हमारे देश का सामान्य सामूहिक जीवन इतना वेदनामय हो गया है कि उसका निरूपण हृदय को विदीर्ण कर देने वाला है। बड़ा लोमहर्षक दृश्य है और हम केवल दर्शक से अधिक कुछ भी नहीं हैं। आज हमारे देश में बाघ और बकरी को एक ही घाट पर पानी पीने की खुली आजादी है। आज हमारे देश में घोड़े और घास को अपनी अस्मिता बचाने का एक समान अवसर उपलब्ध है। हाँ आज हमारा देश आजाद है। उनके लिये आजाद है, जिनके पेट में इस देश को खा जाने भर की भूख भरी है। उनके लिये आजाद है, जिनके पास वर्दी है- खाकी वर्दी है या खादी की सफेद वर्दी है। उनके लिये आजाद है- ‘जिनका हृदय उतना मलिन, जितना की शीर्ष वलक्ष है‘। उनके लिए आजाद है, जो कानून को रखैल बना लेने की ताकत और हैसियत रखते हैं। वे सभी कहते हैं देश आजाद है। हम आजाद हैं। देश हमारा है। देश हमारे बाप की मौरुसी मिल्कियत है। वे कहते हैं। वे दिन रात कहते हैं। हम सुनते हैं। हम सहते हैं। यही शायद हमारी नियति है। हम बार-बार विश्वास करते हैं, बार-बार ठगे जाते हैं। हमने तो हर विश्वास की पूँछ उठाकर देखा है।, सबके सब मादा निकले हैं। हम किससे पूछें हमारी आज जो नियति है, वह हमारी क्यों है?
यह देश आज भी उनके लिये कत्तई आजाद नहीं है, जो देश को प्रेम करते हैं, जो देश को अपना नहीं, अपने को देश का समझते हैं, उनके लिऐ यह देश आजाद नहीं है। जिन्हें केवल अपनी आस्था पर अपनी निष्ठा पर, अपनी मेहनत पर और अपने संघर्ष पर सजाने का संवारने का कोई भी सपना है, जो लोग इस देश को बनाने का, सजाने का, संवारने का कोई भी सपना अपनी आँखों में पाले हैं, यह देश उनके लिए आजाद नहीं है। आज भी हमारे देश में ऐसे बहुतायत लोग हैं, जिनके लिए पेट भरने के अलावा जिन्दगी का और कोई मतलब ही नहीं मालूम। ऐसे लोगों के लिये आजादी का कोई अर्थ नहीं है।
क्या कहें, बड़ा अजीब है। अपने ही देश में अपना ही देश न जाने कितने टुकड़ों में बंटा है- कितने हिस्सों में बँटा है। समर्थों के लिए एक अलग देश है, वहीं असमर्थों के लिए अलग देश है। दोस्त और दुश्मन की भाषा एक हो गई है। फर्क करना मुमकिन नहीं रह गया है। हम मित्र समझकर अपना हितैषी समझकर गले लगाते हैं मगर वह हर बार हमारी पीठ में छुरा घोंपकर पलायित हो जाता है। संवेदना अपरिचित हो गई है। सामूहिकता और परस्परिकता से हमारी जान-पहचान मिट चुकी है। हर चीज संदिग्ध है। पता नहीं सच है। पता नहीं झूठ है। हमारे सामने जो कुछ भी है, आधा सच है। आधा झूठ है। हमारी नियति इस समय अर्धसत्य को जीने की दारुण नियति बन गई है। हम अर्धसत्य का दारुण दंश झेलने के लिए अभिशप्त हैं।
क्या हम अपनी नियति को तोड़ने के लिए उसके सामने खड़े नहीं हो सकते? हम अगर खुद खड़े नहीं होंगे तो औरों से उम्मीद करना व्यर्थ होगा। हम खड़े क्यों नहीं हो सकते? तो कब खड़े होंगे?
इसी प्रश्न के साथ आज मैं आपसे विदा लेना चाहता हूँ। आपके प्रश्न के लिए मेरे पास कोई ठीक-ठीक उत्तर नहीं है। मैं भी प्रश्नों की भीड़ में घिरा हूँ। मुझे भी प्रश्न चारों ओर से घेरे हैं। मुझे प्रश्नों के उत्तर देेने में उतनी रूचि नहीं है, जितनी उत्तर बन जाने में। फिलहाल प्रश्न के बदले एक प्रश्न ही- कब, आखिर कब हम अपनी नियति को नकार कर उसे बदलने को उठ खड़े होंगे। हम परिवर्तन को पुकारने कब खड़े होंगे। हम अपने कवि से कब कहेंगे-
कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ,
जिससे उथल-पुथल मच जाये।
एक हिलोर इधर से आये एक हिलोर उधर से आये….।
=जय भारत
वन्दे मातरम्।

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