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Monday, March 30, 2026

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Election जीतने के लिए सभी हथकंडे अपना रही BJP : Congress

Young Writer : कांग्रेस

Chandauli : डीडीयू नगर शहर कांग्रेस कमेटी की बैठक गुरुवार को कालीमहाल स्थित पार्टी कार्यालय में आहूत की गई। इस दौरान पीसीसी सदस्य आनंद शुक्ल द्वारा शहर कांग्रेस कमेटी के नवनियुक्त पदाधिकारीयों का स्वागत अभिनन्दन किया गया। नवनियुक्त पदाधिकारियों का मल्यार्पण कर एक दूसरे को मिठाई भी खिलाया गया। बैठक में पदाधिकारीयो को उनके कार्यक्षेत्र का प्रभार दिया गया।
प्रदेश महासचिव व प्रभारी सरिता पटेल ने कहा कि यह दिन पर दिन स्पष्ट होता जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी को कमज़ोर करने के लिए भारतीय जनता पार्टी की सरकार बहुत निचले स्तर पर उतर आयी है। कांग्रेस पार्टी के बैंक खातों को जब्त कर दिया गया है। लोकतंत्र की हत्या करने के लिए कांग्रेस की चुनी हुई सरकार गिरायी जाती है। उसके बाद नेताओं की ख़रीद फ़रोख्त की गई। जो नेता नहीं झुके उनके ऊपर जाँच एजेंसियों का अंकुश लगाया गया और अब ठीक चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी को आर्थिक रूप से पूरी तरह चौपट करने के लिए आयकर विभाग का उपयोग किया जा रहा है।

अध्यक्ष रामजी गुप्ता ने कहा राहुल गांधी एवं कांग्रेस पार्टी के न्याय के 5 स्तंभ एवं उनके तहत दी गई 25 गारंटियों को हम सभी हर घर तक, हर जन तक पहुंचाएंगे। पिछले 10 वर्षों में भाजपा ने लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक मूल्यों पर प्रहार किया है। अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई, महंगाई एवं बेरोजगारी से आज हर वर्ग प्रताड़ित है। पीसीसी सदस्य आनंद शुक्ल ने कहा लोकतंत्र की हत्या पर भाजपा आमादा है। इलेक्टोरल बॉण्ड का महाघोटाला करने वाली भाजपा ने कांग्रेस के बैंक खाते फ्रीज करके व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार करवाकर साफ कर दिया है कि वह चुनाव जीतने के लिए सारे हथकंडे अपनाएगी। भाजपा की यह तानाशाही प्रवृत्ति लोकतंत्र के आधार चुनावों का गला घोंटकर चीन व रूस जैसी व्यवस्था बनाने पर उतारू है।

बैठक में बृजेश गुप्ता, नेहाल अख्तर, डा.सुल्तान, परमानंद पटेल, मुजाहिद अख्तर, दशरथ चौहान, विजय गुप्ता, राकेश सिंह, कमरुल बारी, सतपाल सिंह, हम्मीर शाह जायवाल, तारिक अब्बास, नन्दलाल गुप्ता, भीम सिंह, ट्रिजा एलियट, मृत्युंजय शर्मा, कन्हैया केशरी, रामसेवक पटेल, फैयाज अंसारी, हंसराज शर्मा, दुर्गा जायसवाल, राजकुमार गोंड, भगवान दास, अजीत गिरी, इमरान, प्रमोद कांग्रेसजन उपस्थित रहे।

Court Order : लोन दिलाने के नाम पर ठगी करने के मामले में एफआईआर करने का आदेश

चंदौली न्यायालय- Young Writer
चंदौली न्यायालय परिसर का गेट।

Chandauli: मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने बीते 21 मार्च को भुक्तभोगी अमरजीत सिंह की ओर से धारा-156(3) के तहत प्रस्तुत लोन कराने के नाम पर धोखाधड़ी करने के मामले की सुनवाई करते हुए प्रार्थना-पत्र को स्वीकार किया। कोर्ट ने अपने आदेश में प्रभारी निरीक्षक चंदौली को निर्देशित किया कि वे संबंधित मामले में प्रार्थना-पत्र के आलोक में सुसंगत धाराओं में एफआईआर पंजीकृत नियमानुसार विवेचना करना सुनिश्चित करें।

पीड़ित अमरजीत सिंह ने प्रार्थना-पत्र के जरिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत को अवगत कराया कि उनके दूर के रिश्तेदार अमन सिंह जो बैंक का लोन वसूली का कार्य करते थे। अपने कार्य में सहयोग के लिए कुछ अन्य लोगों को भी साथ रखे थे। लगभग 7-8 माह पूर्व अमन सिंह ने उनसे बैंक आफ इंडिया शाखा चंदौली के सीसी एकाउंट के लोग को जोनल आफिस से माफ कराने की बात कही और 108300 रुपये की मांग की। बातों पर विश्वास करते हुए अमरजीत सिंह ने एक मई 2023 को 108300 रुपये नकद दे दिया। इसके बात अमन सिंह ने बैंक की जमा रसीद दी। कहा कि रुपये जमा हो गए हैं और लोन माफ हो गया है। कुछ दिनों बाद अमन सिंह ने कहा कि पत्नी सुनैना के नाम बैंक से 25 लाख रुपये का डेयरी पर लोन कराने की बात कही और बताया कि 38 प्रतिशत धनराशि माफ हो जाएगा तथा शेष धनराशि पर ब्याज नहीं देना होगा, जिस पर प्रार्थी सहमत हो गया और सारे कागजात अमन सिंह को दे दिए।

कुछ दिनों बाद बैंक का पेपर देते हुए अमन ने बताया कि लोन मंजूर हो गया, जिसे स्वीकृत कराने में दो लाख रुपये खर्च हुए हैं। पैसा देंगे तो लोन की धनराशि आपके खाते में आ जाएगी। ऐसे में अलग-अलग तिथियों को 108000 रुपये अमन सिंह को दिया, लेकिन लोन का पैसा नहीं आया। कहा कि कुछ दिनों बाद जब बैंक के सीसी एकाउंट के लोन के बाबत सूचना मिली तो बैंक जाकर पता किया। तब यह बात मालूम चली कि न तो लोन माफ हुआ है न ही बैंक में रुपया जमा हुआ है। अमन सिंह ने जो रसीद दे थी वह फर्जी है। इसी तरह अमन सिंह ने गांव के विकास कुमार सिंह से डेयरी लोन मंजूर कराने के नाम पर 253000 रुपये ले लिया है। उक्त प्रकरण से चंदौली कोतवाली व पुलिस अधीक्षक को अवगत कराया गया, लेकिन कार्यवाही नहीं हुई। प्रकरण को सुनने के बाद न्यायालय ने तथ्यों व परिस्थितियों को दृष्टिगत प्रार्थना-पत्र को स्वीकार करते हुए चंदौली कोतवाली को एफआईआर दर्ज कर कार्यवाही करने का आदेश दिया है। पीड़ित की ओर से अधिवक्ता राकेश त्रिपाठी ने पक्ष रखा।

एमडीएम का राशन लेकर जाने के मामले में प्रधानाध्यापक निलंबित,विभाग में मचा हड़कंप


शहाबगंज। प्राथमिक विद्यालय भुसीकृत पुरवा के प्रधानाध्यापक कंचन रानी के द्वारा 19 मार्च को गाड़ी मे एमडीएम का खाद्यान्न लेकर जाना महंगा पड़ गया। जांचोंपरांत बेसिक शिक्षाधिकारी सत्येन्द्र कुमार सिंह ने निलम्बन की कार्यवाही कर दी। कार्यवाही होते ही विभाग में हड़कंप मच गया।
प्रधानाध्यापक कंचन रानी ने 19 मार्च को विद्यालय बन्द होने के बाद एमडीएम खाद्यान्न का गेहूं अपनी गाड़ी में रखकर घर ले जाने लगी। जांच के दौरान विद्यालय में 275 छात्रों के सापेक्ष मात्र 75 उपस्थित पाये गए। जांच में पाया गया कि एमडीएम राशन लेकर जाने के कारण विभाग की छवि को धूमिल हुई है। वहीं शिक्षक आचरण व सेवा नियमों के उल्लंघन करने के कारण बेसिक शिक्षा अधिकारी सत्येन्द्र कुमार सिंह ने निलम्बन की कार्यवाही किया। साथ ही निलम्बन अवधि के दौरान बीआरसी चकिया से सम्बद्ध किया गया है।

सत्ता पक्ष के इशारे पर काम कर रही सैयदराजा पुलिसः मनोज डब्लू


डीएम से मिलकर की लोकसभा चुनाव की निष्पक्षता को बनाए रखने की मांग
चंदौली। सैयदराजा पुलिस के सत्ता पक्ष के दबाव में आकर की जा रही कार्यवाही से खफा सपा के पूर्व विधायक मनोज सिंह डब्लू ने गुरुवार को जिला निर्वाचन अधिकारी निखिल टीकाराम फुंडे से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने सैयदराजा पुलिस द्वारा 107/116 में पाबंद किए जाने की कार्यवाही समेत उन्होंने लोकसभा चुनाव में क्षेत्र से बदर किए जाने की कार्यवाही से अवगत कराते हुए इसे सत्ता पक्ष के दबाव में की जा रही कार्यवाही करार दिया।
इस दौरान उन्होंने कहा कि उन्हें षड्यंत्र के तहत सैयदराजा पुलिस लोकसभा सामान्य निर्वाचन-2024 में विधानसभा क्षेत्र सैयदराजा से दूर करने का प्रयास कर रही है, ताकि वह अपने पार्टी व प्रत्याशी के समर्थन में चुनाव प्रचार न कर पाएं, जिसका सीधा लाभ सत्ता पक्ष के प्रत्याशी होगा। इसके लिए सैयदराजा पुलिस जनहित के मुद्दों उठाने के कारण दर्ज हुए राजनीतिक मुकदमों को आपराधिक स्वरूप देकर उसे आधार बनाने का काम कर रही है, जो पूरी तरह से अनुचित है। लिहाजा लोकसभा चुनाव की निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए उचित कार्यवाही किए जाने की मांग की। साथ ही उन्होंने सत्ता पक्ष के इशारे पर काम कर रहे सैयदराजा थाने पर तैनात पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों को हटाने की मांग की। उन्होंने सैयदराजा विधायक सुशील सिंह को बाहुबली करार देते हुए वोटरों को प्रभावित करने का आरोप लगाया। कहा कि उनके व उनके सहयोगियों के असलहों की जांच की जाए। चुनाव को देखते हुए इलाके में पैरा मिलिट्री फोर्स तैनात की जाए. ताकि वोटर भयमुक्त होकर मतदान कर सके। जिलाधिकारी ने पूर्व विधायक मनोज सिंह डब्लू की बातों को सुना और उचित कार्यवाही का भरोसा दिया। विदित हो कि सैयदराजा थाना पुलिस ने 23 मार्च को उनके खिलाफ शांति भंग करने की आशंका के तहत रिपोर्ट एसडीएम के पास भेजी है। एसडीएम की ओर से रिपोर्ट लगाकर उच्चाधिकारियों को भेजी जाएगी। जिलाधिकारी या अपर जिलाधिकारी स्तर से जिला बदर घोषित करने की कार्रवाई की जा सकती है। बताया जा रहा है की मनोज सिंह डब्लू समेत आधा दर्जन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए भेजा गया है।

Chandauli:अस्पताल परिसर में गिरे डॉक्टर के लॉकेट को कस्बा इंचार्ज शिव यादव बाबू ने कराया वापस,महिला के ईमानदारी पर खिलाया मिठाई

चंदौली। जिला मुख्यालय स्थित पंडित कमल पति त्रिपाठी चिकित्सालय में बृहस्पतिवार को एक महिला डॉक्टर के गले पड़ा ओम लिखा लाकेट परिसर में गिर गया। डॉक्टर ने चोरी का अंदेशा जताते हुए उक्त मामले को अपने उच्च अधिकारी को अवगत कराया अस्पताल के अधिकारियों ने तत्काल इसकी सूचना पुलिस को सूचना मिलते ही जिला अस्पताल में पहुचे कस्बा इंचार्ज शिव यादव बाबू ने परिसर में लगे सीसी टीवी फुटेज को खंगाला जिसमे एक महिला जमीन से लाकेट उठाती दिखाई दी कस्बा इंचार्ज ने तत्काल महिला को खोजकर महिला से डॉक्टर का लाकेट वापस करा दिया। और महिला के ईमानदारी पर उन्होंने उसका मिठाई खिलाकर मुह मीठा कराया
दरसल जिला अस्पताल में तैनात महिला डॉक्टर कायमा शर्मा का पेशेंट देखने के दौरान गले के चैन का लॉक खुल गया और उसमें पड़ा ओम लिखा लॉकेट चेम्बर के बाहर ही गिर गया। और वो मरीजों को देखने में परेशान रही कुछ देर बाद किसी महिला मरीज ने बताया कि आप के गले का चैन खुल गया है। इस पर महिला डॉक्टर उसमें पड़े अपने लॉकेट को खोजने लगी कुछ देर बाद लॉकेट नही मिला डॉक्टर ने चोरी का अंदेशा जताते हुए। मामले की अपने अधिकारी को अवगत कराया जिसकी सूचना पर पहुचे कस्बा इंचार्ज ने सीसी टीवी कैमरे की मदद से महिला डॉक्टर के लॉकेट को खोज निकाला और लॉकेट पाकर देने वाली महिला के ईमानदारी पर उसका मुह मीठा कराया। इस दौरान कस्बा इंचार्ज शिव यादव बाबू ने बताया कि महिला डॉक्टर के चैन में पड़ा ओम लिखा लाकेट कही गिर गया था। जिसको उठा कर एक महिला ने अपने पास रख लिया था। सीसी टीवी के मदद से उक्त महिला से डॉक्टर का लॉकेट वापस करा दिया गया।

मुरदों के गाँव में : ललित निबंध

Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार Dr. Umesh Prasad Singh (डा. उमेश प्रसाद सिंह )

यह शीर्षक मेरा नहीं है। कबीर का है। इसे मैंने कबीर से पाया है। मगर उधार में देने का उनका स्वभाव ही नहीं है। मैंने माँगकर लिया है। फिर भी यह मेरे लिए मँगनी का नहीं है। अपने बाप-दादों की कोई चीज मंगनी की होती है क्या! हो सकती है, क्या? नहीं, नहीं वह अपने से भी ज्यादा अपनी है।
कबीर की वाणी बचपन से सुनता आ रहा हूँ। जब कुछ भी समझने की समझ नहीं थी तभी से। तब भी कबीर की वाणी उद्वेलित करती थी। उन्मथित करती थी। जहाँ हम थे, वहाँ से बाँह पकड़कर कहीं और खींच ले जाती थी। कविता के सौहार्द ने हमें बताया है समझदार होने का दावा दुनियां की सबसे बड़ी मूर्खता है। कविता समझदारी का कभी मुँह नहीं जोहती। कविता समझ से नहीं जीवन के अनुभव से पैदा होती है। अनुभव के रस से पैदा होती है। सौन्दर्य से पैदा होता है। रस और सौन्दर्य का उद्वेलन ही भाषा में कायातरित होकर कविता बन जाता है। कविता जब उद्वेलित करने लगती है, हजार-हजार सवाल पैदा हो जाते हैं। पैदा हो जाते हैं तो तरह-तरह से परेशान करने लगते हैं। मगर कविता केवल सवाल ही पैदा नहीं करती। वह समाधान भी पैदा करती है। हजार-हजार सवालों से घिरे आदमी को संबल भी प्रदान करती है। लड़खड़ाते पाँवों को उँगली थाम कर सहारा भी देती है। कबीर की कविता धक्के देकर डगमगा भी देती है। फिर सिर सहलाकर सँभाल भी लेती है।

कबीर की कविता में जीवन के विस्तार और उसकी गहराई के बोध का उद्भुत उजास है। इस अद्भुत उजास को कबीर अपनी वाणी में उजागर करते हैं। अनुभव सत्य के उद्घाटन का कबीर में असम साहस है। अनुभव को व्यक्त करने का उद्वेलन कबीर की वाणी की विलक्षणता है। वे जो जान लेते है, उसे कहने की आकुलता को किसी भी कारण से रोकने के लिए राजी नहीं होते। कितनी भी बड़ी, कितनी भी विकट असुविधा को वे अभिव्यक्ति के मार्ग में रुकावट नहीं बनने देते। कबीर की यही अदम्य उत्कण्ठा उनकी वाणी में वह आग पैदा करती है, जो सारी सुविधाओं और समझौतों को सूखे पत्तों की तरह जलाकर दहक उठती है। खुद को जलाकर दहकने वाली आग कबीर को कबीर बनाती है।
जानने को तो बहुत लोग बहुत कुछ जानते हैं। मगर बहुत-से लोग बहुत कुछ जानकर भी चुप रह जाते हैं। फिर चुप्पियों की चर्चा का क्या मतलब! कबीर कुछ भी जान जाते हैं तो उसे चिल्ला-चिल्लाकर कहने लग जाते हैं। कुछ भी छिपा लेने का, पचा जाने का उनका स्वभाव नहीं है। मगन होकर गाने लग जाते हैं। एक दिन कबीर ने जान लिया कि मनुष्य का सामूहिक वजूद, उसकी सामुदायिक अस्मिता मुर्दा बन गई है तो वे मस्त होकर गाने लगे थे- ‘‘साधो, यह मुर्दो का गाँव।’’
गाँव मुर्दों से भरा पड़ा है। गाँव के गाँव मुर्दों से पटे पड़े हैं। बड़ा अजीब है। बड़ा अविश्वसनीय है। मगर सच है। यह सच तरह-तरह के रंग-बिरंगे परिधानों को पहन कर सचमुच में मरा पड़ा है। कपड़ा जिन्दा है, आदमी मरा है। मरे हुए हैं मगर जीने का नाटक किए जा रहे हैं। नाटक में जिये जा रहे हैं।

मुर्दे केवल वे ही नहीं होते जो मुँह से कुछ खाते नहीं है। जो नाक से साँस खींचते और छोड़ते नहीं है, केवल वे ही मरे हुए नहीं होते। जो अपने पैरों से चलकर कहीं जा नहीं सकते, वे ही मुर्दे नहीं हैं। मुर्दे वे भी हैं जो जीने के सारे साधनों का उपयोग करते हैं, वे भी मरे हुए हैं। वे भी मरे हुए लोग हैं, जो केवल जिन्दा बचे रहने के लिए हर तरह के अन्याय, अत्याचार और अप्राकृतिक उत्पीड़न को सिर झुकाकर स्वीकार कर लेते हैं। जो न्याय को, धर्म को, मनुष्यजाति के सामूहिक हित को पीठ दिखाकर किसी का भी शासन स्वीकार कर लेते हैं, वे भी मरे हुए हैं। मरे हुए वे भी हैं जो लोभ से, भय से मोहित होकर किसी का भी झंडा उठाकर जय बोलने निकल पड़ते हैं। अन्यायी शासन के सत्ता के आधार ये मुर्दों के गाँव ही हैं। अन्याय सिर्फ मुर्दों के ऊपर ही किया जा सकता है। किसी भी काल में, किसी भी तरह की सामाजिक व्यवस्था में कभी भी जिन्दा मनुष्यों और जीवित जातियों पर अन्याय और अत्याचार संभव नहीं। प्रतिरोध की चेतना का न होना, मनुष्य के जीवित न होने का सबसे बड़ा सबूत है। चिकित्सा विज्ञान में जीवित और मृत मनुष्यों के जो लक्ष्ण बताए जाते हैं, मानीय चेतना के उत्थान के शास्त्र में उनका कोई महत्व नहीं होता।

पड़ोस के घर में आग लगी हो और उस जलते घर की लपटों की आँच जिन घरों में नहीं पहुँचती, उस घर में रहने वाले लोग जीवितों के सारे लक्षणों को धारण करने के बावजूद मरे हुए लोग ही होते हैं। पारस्परिकता से विच्छिन्न आदमी मरा हुआ आदमी है। मरने के डर से सिकुड़ा हुआ जी रहा आदमी भी मरा हुआ आदमी है। डरे हुए आदमी का सारा जीवन रस झर गया होता है। जिसका जीवन रस ही झर गया है, वह भला जिन्दा कैसे हो सकता है। कभी नहीं हो सकता। कदापित नहीं हो सकता।
जिनमें सत्य के स्वीकार का साहस नहीं है, वे मुर्दा हैं। मुर्दा को कन्धे पर उठाकर श्मश्यान ले जाने वाले लोग भी ऐसे करने लग जाते हैं, जैसे उनको कभी करना ही नहीं है। मृत्यु का उनको इतना गहरा भय समाया हुआ है कि मृत्यु की तरफ से उन्होंने आँख ही फेर ली है। नहीं, उधर देखना ही नहीं है। आदमी उधर न देखकर अपने को अन्धा बना लेता है। अन्धा आदमी जीवन का सौन्दर्य कैसे देख सकता है। मृत्यु से विमुख होकर जीवन की तरफ अभिमुख होना कैसे संभव हो सकता है। जो जीवन के सौन्दर्य में, जीवन के रस में डूब सकने के अयोग्य है, वह तो जीते-जी मरा हुआ है। जीते हुए मरा हुआ आदमी जीवन के बारे में नहीं परलोक के बारे में सोचने लग जाता है। फिर वह परलोक को सुधारने में लग जाता है। उससे जीवन छूट जाता है। परलोक के लिए वह पुण्य कमाने लग जाता है। पुण्य के लिए पैसे कमाने लग जाता हैं पैसे कमाने के चक्कर में वह अपने से दूर चला जाता है। अपने से दूर चला जाना, जीवन से दूर चले जाना है। दुख के दलदल में चले जाना है। दुख के दलदल में धँसा हुआ आदमी मरा हुआ आदमी है। मरे हुए लोग अपने दुख से दुखी नहीं होते वे दूसरों के सुख से दुखी होते हैं।

दूसरों के दुख को दूर करने का उद्योग-धन्धा चलाने वाले लोग भी मरे हुए लोगों की श्रेणी में आते हैं। जो कल-कारखाने लगाने की स्थिति में नहीं होते वे दुख दूर करने का ऐसा कारखाना लगा रहे हैं, जो किसी के देखने में नहीं आता है। जिसमें केवल लाभ-लाभ ही है। जिसको लगाने में कोई लागत नहीं लगानी होती है। जिसकी कुंडली में घाटे का कोई खाना नहीं लिखा होता। दूसरों को सुख पहुंचाने के लिए हमारे समय में जनसेवा का धन्धा इस कदर पनप पड़ा है कि समूचा देश ही जनसेवा में कमर कसकर कूद पड़ा है। लगता है कि सारे के सारे लोग जनसेवक ही हो जाएंगे, जन कोई बचेगा ही नहीं। जनसेवा का मुँह सुरसा के मुँह से भी बड़ा हो जाने को व्याकुल है। वह अपने विशाल जबड़े में लोकतंत्र की समूची गरिमा को ही निगल जाने को आमादा है। मुर्दों की भूख इतनी बढ़ गई है कि जिन्दा आदमी को अपने को उनका भोजन बनने से बचाए रखना ही उनके सारे संघर्ष का केन्द्र बन गया है। मुर्दों का आतंक बस्ती-बस्ती में व्याप्त है। हमारे समय में जिन्दा आदमी डरे सहमे, सिकुड़-सिमट कर वैसे ही रह रहे हैं, जैसे दातों के बीच में किसी तरह जीभ रह लेती है। धत्तेरे की ऐसा भी जीना कोई जीना है!

हमारे समय में कहने और करने के बीच कोई सम्बन्ध ही नहीं रह गया है। केवल सामाजिक स्तर पर ही सम्बन्धहीनता का विस्तार नहीं हुआ है। जीवन के सूक्ष्म दिगन्तों में भी यह सम्बन्धहीनता खूब विकसित हुई है। वाणी और उसके अर्थ के बीच भी खटास काफी बढ़ चुकी है। कहा कुछ और जा रहा है, समझा कुछ और जा रहा है। महात्मा धर्म का उपदेश दे रहे हैं। जनता उपदेश सुन नहीं रही है। वह उपदेश सुनने नहीं जाती। उपदेश में, धर्म में उसकी कोई रूचि नहीं है। उसकी रूचि केवल धार्मिक दिखने में है। किसी बड़े महात्मा, किसी बड़े देवता के मंदिर में आने-जाने से उसकी धार्मिक दिखने की वासना सफल हो जाती है। लोग जा रहे हैं तो इसलिए नहीं कि देश में कोई धार्मिक जागृति पैदा हो गई है। नहीं यह कोई जागृति कत्तई नहीं है। यह पाखण्ड का प्रदर्शन है। ग्लैमर की भूख है। यह जागृति होती तो चेतना के धरातल पर बड़ा बदलाव दिखाई देता। हमारे आचरण में संयम और नैतिकता की कुछ न कुछ झलक अवश्य दिखाई देता। मगर यहाँ तो आचरण में अराजकता की बाढ़ उमड़ रही है। लोग डूब रहे हैं। उतरा रहे हैं। अपनी जगहों से विस्थापित होकर सुरक्षित ठिकानों की तलाश में पागल बने फिर रहे हैं। महात्मा भी भीड़ जुटाने के पीछे पागल बने पड़े हैं। भीड़ ही है, जो उनके ग्लैमर का मापदण्ड बनी हुई है। भक्त बड़े गुरु के दरबार में हाजिरी लगाकर बड़प्पन की बिल्ला लटकाए धूम रहे हैं। बड़े गुरु अधिक से अधिक भीड़ जुटाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर रहे हैं। बड़ा अजीब खेल है। आसमानी हरियाली पर इतराने वाली खोखली सभ्यता के मानदण्ड अपने में कितने हास्यापस्पद हैं, यह कहने की जरूरत नहीं। जिस दौर में आस्था सजावट का सामान बन गई है और निष्ठाएँ मोल-भाव की वस्तु उसके दुर्भाग्य का आकलन भला कौन कर सकता है। ऐसी खोखली और मिट्टी से दूर जड़ वाली सभ्यता के लिए अत्यल्प काल में ही अवसान की असंदिग्ध घोषणा कबिवर रहीम बहुत पहले कर चुके हैं- ‘‘कहु रहीम कबलौं हरी, छपरे पर की घास।’’

मगर देखिए न मेरा पागलपन। मैं अपने समय का रोना लेकर बैठ गया। रोने-धोने से भला कोई दुख दूर होता है, क्या?
कबीर रोने वाले कवि नहीं हैं। रो-धोकर अपना बुरा हाल बना लेने में उनका रंचमात्र भी विश्वास नहीं। रोना दीनता की अभिव्यक्ति है। रोना हीनता की अभिव्यक्ति है। कबीर जीवन के विराट बोध के कवि हैं। वे मनुष्य जीवन में व्याप्त अपार ऊर्जा के यशगायक कवि हैं। वे मुर्दों में जीवन की जागृति के बीज बोने वाले कवि हैं। कबीर मुर्दों का उपहास नहीं करते हैं। वे मुर्दों को धिक्कारते नहीं हैं। उनकी कविता मुर्दों में सोए हुए जीवन को जगाने की कविता है। जीवन की अपार संभावनाओं में उनका अटल विश्वास है। उसी विश्वास से उपजे साहस के सहारे कहते हैं कि यह गाँव मुर्दों का गाँव है। मरे हुए समाज की दीनता के खिलाफ यह कबीर की वाणी की मुनादी है। कबीर के लिए कविता मृत संजीवनी के संधान की विद्या है। मरे हुए में वाणी से जीवन का संचार कर देने का उद्योग कविता की संकल्पना है। कबीर इस महत संकल्पना के कवि हैं।

मनुष्य की गरिमा से गिरा हुआ आदमी कबीर के लिए मरा हुआ आदमी है। अपनी गरिमा में जाग जाने की अकुंठ उत्प्रेरणा कबीर की कविता में तरंगित है। वे मनुष्य की असमर्थता का महिमा मंडन करने वाले कवि नहीं है। वे दाँत निपोरने वाली दीनता को करुााभिसिंचित करने वाले कवि नहीं हैं। वे केवल पेटल भरने की खातिर अँजुरी भर अनाज के लिए किसी के तलवे चाटने की नियति को पोषण प्रदान करने वाले कवि नहीं है। वे उन्मादी तलवारों के सामने गर्दन लटका देने की कायरता को लाचारी कहने वालों के समर्थक नहीं हैं। इन सबके विरूद्ध उनकी कविता विद्रोह के ललकार की कविता हैं मृत्यु से डरा हुआ आदमी जीवन को जानने की योग्यता खो देता है। जीवन के गौरव को बचाए रखने के लिए भर जाने का साहस रखने वाले ही कबीर की दृष्टि में मरकर भी जीवित रहने वाले लोग हैं। कबीर की कविता जीवित रहकर मर जाने वाले लोगों की भर्त्सना की कविता है और मरकर जीवित रहने वाले लोगों के लिए अभिनन्दन की कविता है। कबीर की कविता में जीवन का अदम्य अभिनन्दन है।

जीते-जी मनुष्य के मर जाने से मनुष्यता मर जाती है। आदमीयत के मर जाने से समाज अपंग हो जाता है। सामूहिकता गूँगी हो जाती है। पारस्परिकता बहरी हो जाती है। समाज के बीमार हो जाने से राष्ट्र कमजारे हो जाता है। कमजोर राष्ट्र का कोई स्वाभिमान नहीं रह जाता। कबीर की कविता राष्ट्रीय स्वाभिमान की संरक्षक कविता है। मनुष्यजाति के गौरव की उन्नायक कविता है। मनुष्यजाति की चेतना के उत्थान में जरूरी और सहायक तत्व जो मर रहे हैं, जो मरते जा रहे हैं, उनको पुनजीर्वितकरने का संकल्प कबीर की कविता में प्राणतत्व की तरह समाहित है। मरे हुए को, मरते हुए में जीवन का पुनः संचार कर देने की शक्ति का संधान ही कविता की सार्थकता है। कबीर कविता की सार्थकता को अपनी कविता में प्रतिष्ठित करने वाले अप्रतिम कवि है।

कबीर की कविता कब से टेर रही है। देखो, मनुष्य के जीवन में बहुत कुछ जो महत्तम है, मर रहा है। महत्तम के मरते जाने से हमारा गाँव, हमारे गाँव मुर्दों के गाँव बनते जा रहे हैं। ऊपर-ऊपर सबकुछ हरा-हरा दिखता है मगर भीतर-भीतर आदमीकी जिजीविषा की जड़े सूख रही हैं। जीवनधारा सूख रही है। मनुष्य का जीवन मरी हुई चीजों से पटता जा रहा है। मरे हुए आदमी को, मरते जा रहे आदमी को मरने से बचाना बेहद जरूरी है। यह काम कौन करेगा? कौन कर सकता है? कविता के अलावा कोई नहीं कर सकता। कविता की मृतसंजीवनी शक्ति का संधान बहुत जरूरी है। मुरदों के गाँव बसने का विष मत पीयो। कविता का रास्ता भटक जाएगा तो मनुष्यता का आखिरी भरोसा भी टूट जाएगा। कविता का रास्ता रचने का रास्ता है। रचने का रास्ता मरे हुए को जीवित करने का रास्ता है। जीवन के अभिनन्दन का मार्ग मनुष्यजाति के मंगल के आयोजन का मार्ग है। यही मार्ग हमारी विरासत का उज्वल मार्ग है। कबीर की कविता हमें हमारे विरासत के मार्ग की पहचान कराने वाली कविता है।

पाँड़े कवन कुमति तोंहे जागी

Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार Dr. Umesh Prasad Singh (डा. उमेश प्रसाद सिंह )

कुमति और सुमति सबके हृदय में हमेशा रहती है। सभी कहने वालों ने ऐसा कहा है। ऐसा ही कहा है। रहती है, दोनों साथ-साथ। एक जागती है तो एक सोई रहती है। एक जाग जाती है तो दूसरी सो जाती है। जिसके हृदय में सुमति जागती है, वह धन-धान्यपूर्ण हो जाता है। धन्य हो जाता है। जिस जाति में सुमति का जागरण होता है, उसका राष्ट्र उन्नत, समृद्ध और सुखी होता है। जिसके हृदय में कुमति जाग जाती है, वह अथाह विपत्ति में डूब जाता है। व्यक्ति डूब जाता है। समाज डूब जाता है। राष्ट्र डूब जाता है। उसकी विरासत डूब जाती है। उसका भविष्य डूब जाता है। अतल अन्धकार में निरन्तर डूबता जाता है।
कबीर की कविता अद्भुत कविता है। वह जीवन के दोनों छोरों को छूती हुई जीवन के विस्तार की कविता है। जीवन की गहराई की कविता है। जीवन के रस की कविता है। जीवन के आस्वाद की कविता है। कबीर की कविता में कडुवा भी है, जी को छनछना देने वाला। कसैला भी है, कण्ठ को भरभरा देने वाला। मीठा भी है। बेहद मधुर, स्निग्ध। स्वाद की समस्त ग्रन्थियों को रस से आप्लुत करके जी को जुड़ा देने वाला। कबीर की कविता में धिक्कार भी है और धन्यता भी है। एक छोर धिक्कार का है। एक छोर धन्यता का। धिक्कार और धन्यता के दो छोरों के बीच जीवन का समूचा प्रवाह अपनी अजस्र गति में, अकुंठ गान में प्रवाहित है।

जहाँ केवल धिक्कार है, वहाँ जिन्दगी नहीं है। जहाँ केवल धन्यता है, वहाँ भी जीवन नहीं है। नदी कभी एक किनारे में नहीं बँध सकती। नहीं बह सकती है। नदी जब भी होगी दो कूलों के बीच ही होगी।
नदी के इस छोर पर, धारा की सबसे ऊपरी सतह पर नहाने-धोने वालों को, पुण्य के प्रलोभन से धर्म का व्यापार करने वालों को कबीर पॉड़े कहकर संबोधित करते हैं। कबीर की कविता में पॉड़े मिथ्याभिमान का संबोधन है। कुमति की कठपुतली का संबोधन है। अन्धकार के यशगायक का सम्बोधन है। अन्धों की पथ प्रदर्शक अन्धता का संबोधन है। भावहीन कर्म के आयोजक का संबोधन है। क्रियाहीन फल के आश्वासन का संबोधन है। बड़ा संश्लिष्ट संबोधन है।
जीवन में जो प्रवेश का किनारा है, उस किनारे आदमियों की भारी भीड़ किनारा पकड़कर खड़ी है। किनारा छोड़ दे, तट को छोड़ दे तो नदी में उतर जाय। जिन्दगी में प्रवेश हो जाय। मगर नहीं वह किनारे खड़ी है। तट पर खड़ी है और नदी के बारे में सब कुछ जान लेना चाहती है। वह किनारे खड़ी रहकर नदी में जलपान का, स्नान का आनन्द चाहती है। वह नदी की गहराई का, नदी के विस्तार का मर्म जान लेना चाहती है। भला यह संभव है? कैसे संभव हो सकता है। यह निपट असंभावना है। किनारे खड़ी इस भीड़ का जो अगुवा है, जो उसे झूठे आश्वासन में उलझाये है, जो उसे भरोसे के भ्रम में भरमाये है, वह ही कबीर की कविता में पॉड़े है।

कबीर भाषा के कवि नहीं हैं। कबीर ही नहीं समूचे भक्तिकाल के कवि भाषा के कवि नहीं है। वे अनुभव के कवि हैं। आचरण के कवि हैं। व्यवहार के कवि हैं। जीवन के कवि हैं। उनकी भाषा जीवन की भाषा है। कबीर कविता के लिये भाषा नहीं सीखते। वे जीवन की समृद्धि के लिये, सौन्दर्य के लिये, शक्ति के लिये, अनुभव उपलब्ध करते हैं। कबीर कविता से कुछ पाने के आकांक्षी कवि नहीं हैं। वे कविता को कुछ देने की लालसा के कवि है। वे कविता के पुजारी हैं। प्रेमी हैं। वे जानते हैं प्रेम अपने को दे देना ही होता है। कबीर के लिये भाषा व्यापार की चीज नहीं है। जीवन व्यापार की वस्तु नहीं है। व्यापार की भाषा में कबीर की कविता विद्रोह की कविता है। वस्तुतः कबीर की कविता मनुष्य के प्रति व्यवस्था के विद्रोह के विरूद्ध विद्रोह की कविता है। कबीर की कविता जीवन रस से उद्वेलित मनुष्य की कविता है। जीवन सत्य के उजास से आलोकित मनुष्य की कविता है। उनकी कविता मृतक जीवन के संवाहक मनुष्यों की कविता नहीं है।
कबीर की कविता में पॉड़े मृतक जीवन के संचालक है। पॉड़े एक प्रवृत्ति के प्रतिनिधि हैं। अपने लाभ के लिये लोगों में लोभ को जगाने की प्रवृत्ति के प्रतिनिधि हैं। अपने लाभ के लिये लोगों में लोभ को जगाने की प्रवृत्ति के प्रतिनिधि। यह प्रवृत्ति घृणित प्रवृत्ति है। मनुष्य जाति को जीवन से विमुख कर देने वाली प्रवृत्ति है। जीवन सत्य से वंचित कर देने वाली प्रवृत्ति है। जीवन रस से विलग कर देने वाली प्रवृत्ति है। यह गर्हित प्रवृत्ति है। यह धिक्कृत वृत्ति है। कबीर अपनी कविता में इस प्रवृत्ति की भर्त्सना है।

जीवन की सरिता के तट पर खड़ी भीड़ को पॉडे़ बरगला रहा है। वह नदी में बगैर उतरे भींग जाने की तरकीब के मंत्र उचार रहा है। वह बिना पानी पिये पानी-पानी जपकर प्यास बुझा देने के अविश्वासनीय उपायों में विश्वास बना रहा है। गुड़ कहकर मुँह मीठा करने का भाषा में झाँसा दे रहा है। पानी-पानी चिल्लाने से कण्ठ तो सूख सकता है मगर प्यास कदापि नहीं बुझ सकती। आग-आग कहने से खाना कभी नहीं पक सकता। कबीर के लिये भाषा झाँसा देने के लिये नहीं है। पदार्थ के परिज्ञान के लिये है। अर्थ के संधान के लिये है। कबीर के लिये कविता शब्दों को उनके अर्थ के स्रोत तक ले जाने की माध्यम है।
कबीर भाषा में व्यापार के विरूद्ध कवि हैं। वे बौद्धिक सम्पदा की बिक्री के विरूद्ध कवि हैं। कबीर की कविता यश के लाभ के, अर्थ के लाभ के, सम्मान के लाभ के हर तरह के लाभ के निषेध की कविता है। कबीर की कविता जीवन के आस्वाद की कविता है। कबीर की कविता जोखिम की कविता है। जोखिम उठाने के साहस की कविता है। जान जोखिम में डालकर भी जीवन को जान लेने के आमंत्रण की कविता है। कबीर के लिये कविता सुविधाओं की तलाश नहीं है, बल्कि दुविधाओं के उन्मूलन की अभियान है। वे हवा में हाथ-पाँव पीटकर तैराकी सिखाने वाली पाठशालाओं के पाखण्ड उजागर करने वाले कवि हैं। कबीर अपनी कविताओं में नदी की धारा में उतरकर तैरना सीखने का आग्रह करने वाले कवि हैं। कबीर की कविता का मूल स्वर जीवन में उतरने का आग्रह है।

इसीलिये कबीर बार-बार अपनी कविता में पाँड़े को सम्बोधित करते हैं। समूचे कर्मकाण्ड की प्रवर्तक चेतना की भत्सर्ना करते हैं। भावहीन कर्म की निन्दा करते हैं। क्रियाहीन फल की लालसा को लताड़ते हैं। वे झूठ को पूरी आत्मिक गहराई के साथ झूठ कहते हैं। हृदय के समूचे आवेग के साथ कहते हैं। बड़ी त्वरा है कबीर की वाणी में। पहाड़ की बरसाती नदी जैसा वेग है। पाँव टिकने नहीं देती बहा ले जाती है। डुबा देती है। जड़ता की नाक में पानी भर देती है। कबीर की वाणी के आगे तटस्थता टिक नहीं सकती। कबीर की कविता तटस्थ कविता नहीं है। आप कबीर की कविता पढ़कर चुप नहीं रह सकते। तटस्थ नहीं रह सकते। आपको सहमत या असहमत होना पड़ेगा। असहमत होने का बूता किसके पास है? असहमति की चट्टान टकराकर बालू बन जाती है। कबीर की कविता निष्क्रिय कविता नहीं है। वह जिसके भीतर पहुँचती है, क्रियाशील कर देती है। सक्रिय कर देती है। कबीर की वाणी में प्रतिक्रिया की अनिवार्य परिणति है।
कबीर की कविता में आग है। लहकती हुई आग। दहकती हुई आग। कबीर की कविता को पढ़ना, कविता को सुनना आग में होने से अलग नहीं है। कबीर की कविता का पाठ आग में होकर गुजरना है- इक आग का दरिया है और डूबकर जाना है। कबीर को पढ़ने में बड़ा डर है। कुछ के जल जाने का डर। बहुत कुछ के जल जाने का डर। जो जलने से डरते हैं। जो कुछ भी जलाने से डरते हैं, वे कबीर की कविता के पाठक नहीं हो सकते। परीक्षार्थी हो सकते हैं। शिक्षार्थी हो सकते हैं। शोधार्थी हो सकते हैं। शिक्षक हो सकते हैं। परीक्षक हो सकते हैं। ऊँचे अंक दे सकते हैं। मगर पाठक नहीं हो सकते। कविता का पाठ कुछ और होता है। कविता के पाठ में पूरी-पूरी कविता समा जाती है, पाठक में। जैसे नदी पूरी-पूरी समा जाती है। हरहराती हुई। गरगराती हुई। जैसे नदी पूरी-पूरी समा जाती है, सागर में। मगर नदी से कविता भिन्न है। इसलिये भिन्न है कि नदी सागर में समाकर खो जाती है। कविता खो नहीं जाती। वह बस किसी में समाकर होे जाती है। कविता खो नहीं जाती। वह बस किसी में हो जाती है। कविता किसी में समाकर कर भी खोने से बची रह जाती है। फिर किसी में समा जाने के लिये।

कबीर की वाणी में अद्भुत प्रवाह है। इतना ओज है, इतना तेज है, इतनी उष्मा है, इतनी ऊर्जा है कि भाषा विश्रृंखलित हो जाती है। भाषा का बन्ध टूट जाता है। वह बिखर जाती है। बिहला जाती है। शब्द विस्फोट करने लग जाते हैं। शब्दों के भीतर बाहर निकल कर फैल जाने को आकुल अर्थसत्ता का दबाव इतना बढ़ जाता है कि शब्द विस्फोट कर जाते हैं। शब्द ध्वस्त हो जाते हैं। अर्थ की ध्वनि गूँज उठती है। जैसे बीज को तोड़कर वनस्पति में हरियाली उग आती है, वैसे ही कबीर की कविता में शब्दों को तोड़कर अर्थ प्रभाव छा जाता है। जो अपने ही घर में होली जलाने का हुलास नहीं रखते उनके लिये कबीर की कविता का कोई अर्थ नहीं है।
ध्वनि-स्फोट की जो गरिमा कबीर की कविता में है वह कहीं नहीं है। समूचे हिन्दी साहित्य में कबीर ध्वनि-स्फोट के अकेले कवि हैं। कबीर की कविता के शब्द कण्ठ में ही फूटते हैं, पटाखे की तरह। अन्दर और बाहर का समूचा अन्तराल गूँज उठता है। बहुत देर तक गूँजता रहता है। काफी देर तक प्रतिध्वनि सुनाई देती रहती है।
वे पाँड़े को सम्बोधित करके कहते हैं कि पाँड़े तुम्हारे में सुमति सो गई है। सुमति सो गई है और कुमति जाग गई है। यह कैसी कुमति है? जरा देखो तो। जिन्दगी बिल्कुल पास है। एकदम सामने बह रही है। लहरों के साथ हिला-हिलाकर बुला रही है अवगाहन के लिये। मगर तुम हो कि किनारा पकड़ कर खड़े हो। खुद ही खड़े नहीं हो न जाने कितनों-कितनों को राह रोककर खड़े किये हो। जिन्दगी को जिन्दगी में उतरने के लिये बाधा बनाकर, अवरोध बनकर खड़े हो। बड़े खेद की बात है। बड़ी लज्जा की बात है। बड़ी ग्लानि की बात है। मगर तुम इतने निर्लज्ज हो, इतने कसाई हो, इतने क्रूर हो कि हर ग्लानि की बात को गर्व की बात की तरह बखानते रहते हो।

पाँड़े! क्या तुम जानते हो कि वैतरिणी क्या है? कैसी है? किसने बनाई है? वैतरिणी हमारे कर्मों की ही निर्मिति है। हमारे कर्मों का ही परिणाम है। फल है। अपने ही कर्मों के फल को प्राप्त करने से तू लोगों को क्यों डराता है? तू भय का विस्तार क्यों करता है? तू आदमी को कायर और डरपोेंक क्यों बनाता है? द्रव्य और दक्षिणा के लिये? तू धूर्त है। तू लोभी है। पाखण्डी है। परजीवी है। आजीविका के अन्य भी साधन हैं। तू धोखे का धन्धा क्यों करता है। धिक्कार है तुझे।
गतात्मा को गाय की पूँछ पकड़कर कैसे वैतरिणी पार करा देता है। अरे मूर्ख! गाय की पूँछ पकड़कर कोई वैतरणी पार हो सकता है। गाय को तो तुम अपने घर ले आते हो। दूध पीते हो, घी खाते हो मौज उड़ाते हो। अपने जीवित जजमान को अभाव की वैतरणी में ढकेल आते हो और गतात्मा को वैतरणी पार करा देने का नाटक रचते हो। यह सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा लोभ है।
पाँड़े! सच बताना क्या तुम गतात्मा को देख पाते हो। क्या तुम्हारे में स्थूल शरीर से पृथक चेतन अस्तित्व को देख सकने की दृष्टि है? सामर्थ्य है? योग्यता है? विवेक है? क्या तुम कर्म विपाक के द्रष्टा हो? फिर तुम कर्म के बन्ध को काटने की, पार पाने की बात कैसे करते हो?

अपने कर्म फल को अपने कर्म से ही काटा जा सकता है। गाय के सहारे नहीं। अगर गाय की पूँछ पकड़कर स्वर्ग में पहुँच पाना संभव होता तो संसार में सिंहासन के लिये नहीं गाय के लिये ही भयानक युद्ध छिड़ जाता। गाय को लेकर दुनियां में लोमहर्षक मारा-मारी मच जाती। मगर नहीं, यह संभव ही नहीं है। पाँड़े तुम बुद्धिजीवी नहीं हो। तुम्हारे में केवल बुद्धिजीवी होने का दंभ है। अभिमान है। अभिमान आदमी को अंधा कर देता है। अन्धा-अन्धों को ठेलता है। दोनों कुँए में गिर जाते हैं। कुँए में जिन्दगी नहीं है। किताब में जिन्दगी नहीं है। तुम किताबें पढ़ते-पढ़ते मर-खप जाते हो। किताब पढ़ने से कोई पण्डित नहीं होता है। मूर्ख जरूर हो जाता है। तुम मुर्दा शब्दों की कब्रगाह बन गये हो। बुद्धिजीवी, आदमी बुद्धि की जागृति से होता है। बुद्धि की पहचान से, दृष्टि से, देखकर जीवन जीने से होता है।
दान, वस्तु का नहीं होता पाँड़े। दान, लोभ का होता है। लोभ को कम कर लेना, अपने से बाहर कर देना, बाहर कर देने की, दे देने की प्रक्रिया को ही दान कहा जाता है। मगर तुम्हारा तो उपदेश ही उल्टा है। तुम तो दान के द्वारा भी लोभ को बढ़ाने का ही व्यापार करते हो। तुम तो गाय का दान करके, स्वर्ण का दान करके, जमीन का दान करके, अन्न और द्रव्य का दान करके स्वर्ग को पाने के लोभ का विस्तार करते हो। तुम्हारा उपदेश पाखण्ड का उपदेश है। तुम पोथियां पढ़ते हो, पढ़ाते हो, सुनाते हो और प्रेम तुमसे दूर होता जाता है। प्रेम मरता जाता है। अभिमान बढ़ता जाता है। अभिमान के होने से सत-असत का परीक्षण संभव नहीं हो पाता।

पुष्कल पोथियों को पढ़कर मुर्दा विश्वासों का शव वाहक बन जाना जीवन का तिरस्कार है। मनुष्यता के प्रति कृतध्नता है। केवल ढाई अक्षर के प्रेम को जीवन में पढ़ लेने से, जीवन सार्थक हो जाता है। प्रेम को जीवन में पा लेने से जीवन सुफल हो जाता है। सफल हो जाता है। प्रेम किसी के प्रति नहीं होता। प्रेम सिर्फ उपलब्ध होता है। जो प्रेम को उपलब्ध हो जाता है, सब कुछ जान जाता है। उसमें सब कुछ समाहित हो जाता है। समूचा जगत उसका हो जाता है। वह समूचे जगत का हो जाता है। सारे भेद मिट जाते हैं। सारी श्रेष्ठताएँ और सारी हीनताएँ विरोहित हो जाती हैं। प्रेम के साम्राज्य में वैतरणी का कोई वजूद नहीं होता। वैतरणी नहीं होती। वैतरणी पार कर लेने की चिन्ता नहीं होती। चिन्ताओं के विस्तार के नायक पाँड़े का कोई प्रयोजन नहीं होता।
पाँड़े, तुम तनिक सोचो तो, क्या कर रहे हो? क्यों कर रहे हो? किसके लिये कर रहे हो? लाभ के लिये कुछ भी किया जाना लोभ को बढ़ावा देता है। लोभ के कारण ही पाखण्ड फैलता है। नहीं, जीवन व्यापार नहीं है। व्यापार चाहे धर्म का हो, ज्ञान का हो, चाहे विद्या का हो आदमी को कमजोर बनाता है। आदमी को कमजोर बनाने का काम धिक्कृत काम है। किसी को अपना पिछलग्गू बनाने का विचार निन्दनीय विचार है। यह अमानुषिक वृत्ति है। यह वृत्ति कुमति से पैदा होती है। कुमति किसी के लिये भी ठीक नहीं है। न अपने लिये न दूसरों के लिये।

प्रेम अद्भुत चीज है। प्रेम की अभ्यर्थना कबीर अनन्य भाव से करते हैं। कबीर की कविता प्रेम के प्रशस्ति की कविता है। प्रेम खेत में पैदा नहीं होता है। प्रेम कबीर की कविता में पैदा होता है। जहां पाखण्ड खत्म होता है, वहीं प्रेम पैदा हो जाता है। प्रेम बाजार में नहीं बिकता। प्रेम कविता में उपलब्ध होता है। प्रेम अहं के विलोप से उत्पन्न होता है। प्रेम, मूल्य के रूप में अपने को देकर पाया जाता है। प्रेम में दो नहीं होता। दो के मिटने से, द्वैत के मिटने से प्रेम प्रगट हो जाता है। प्रेम का अपना रंग होता है। दो के मिलकर एक हो जाने का रंग प्रेम का रंग है। अनेक के मिलकर असीम हो जाने का रंग प्रेम का रंग है। अन्त का अनन्त हो जाना प्रेम है।
प्रेम को उपलब्ध कर लेने को उन्मुख न होना कुमति है। जिसमें कुमति जाग रही है, वह सब कबीर की कविता में पाँड़े हैं। कबीर की कविता में कुमति की संवाहक और संरक्षक चेतना के लिये घोर धिक्कार है। जीवन में धन्यता के बोध के लिये विकलता कबीर की कविता में धिक्कार की जननी है।
कबीर की कविता विराट कविता है। विराट के लिये कविता है। विराट होने के लिये कविता है। वह मनुष्य की विराटता की आकांक्षी कविता है। कबीर की कविता विराट होने के लिये लघुता को धिक्कारती कविता है। लघुता को बनाये रखकर, बचाये रखकर, कबीर की कविता के साथ होना संभव नहीं है। कविता के बाजार में कबीर की कविता बाजार के पाखण्ड को धिक्कारती कविता है। कबीर की कविता धन्यता को दुलारती कविता है।

प्राचार्य
मां गायत्री महिला महाविद्यालय
हिंगुतरगढ़ चन्दौली
मो0नं0- 9450551160

Help: अनाथ बच्चे की शिक्षा का जिम्मा संभालेंगे पूर्व प्रमुख Babulal Yadav

मृतक के पुत्र को पूर्व ब्लाक प्रमुख ने पढ़ाने का उठाया बीड़ा। Young Writer
मृतक के पुत्र को पूर्व ब्लाक प्रमुख ने पढ़ाने का उठाया बीड़ा।

Chandauli: क्षेत्र के जलालपुर गांव के पास गत शनिवार को ट्रेन से कटकर रेवासा गांव निवासी बलवंत 42 वर्ष व प्रेम शिला 40 वर्ष के  समूह लोन कर्ज से डूबने के बाद आत्मा हत्या कर लिया।
पूर्व सांसद रामकिशुन यादव के निर्देश पर ब्लॉक प्रमुख बाबू लाल यादव को मृतक परिजनों के पास भेजा। इस दौरान बाबूलाल ने मृतक परिवार को आर्थिक सहायता देने का आश्वासन दिया। साथ ही उसके छोटे पुत्र को पढाने का बीड़ा उठाया। इस दौरान ब्लॉक प्रमुख ने कहा कि सरकार को ऐसे लोगों को लोन देने के पूर्वक परिवार की आर्थिक स्थिति को जानना चाहिए। विषम स्थितियों में लोन अदायगी न करने पर उसे माफ़ करने का प्राविधान होना चाहिए, जिससे भविष्य में और भी लोग आत्महत्या करने के लिए मजबूर न हो। इस दौरान आशुतोष, आशीष, मुन्ना, पप्पू राम, विलास, रामनाथ, घूमना अधिकारी संख्या में लोग मौजूद रहे।

Naugarh के गंगापुर में दिसंबर से नहीं हो रही पेयजल की आपूर्ति

Naugarh के गंगापुर में शोपीस बनी पानी टंकी।
Naugarh के गंगापुर में शोपीस बनी पानी टंकी।

Naugarh: क्षेत्र के ग्राम पंचायत गंगापुर में बनी टंकी का मोटर बीते दिसंबर माह से ही जल हुआ है। जिस कारण उपभोक्ताओं को शुद्ध पेयजल का लाभ नहीं मिल पा रहा है, जिससे हैण्डपंपो का आयरन युक्त गंदा पानी का सेवन करने को विवश ग्रामीण विवश है। साथ ही ग्रामीणों ने समस्या के समाधान के लिए समाधान दिवस पर जिलाधिकारी जल निगम को समस्या से अवगत कराया, जिसका समाधान नहीं किया जा सका।

क्षेत्रीय विधायक कैलाश खरवार की पहल पर बीते सप्ताह जले मोटर का मरम्मत कराए जाने पर भी होली पर्व पर पानी की आपूर्ति नहीं की गई, जिससे उपभोक्ताओं में काफी आक्रोश व्याप्त है। ग्राम प्रधान मौलाना यादव का कहना है कि ग्राम पंचायत में लगभग 250 उपभोक्ता हैं। जिनमें से अधिकांश लोग जलकर का भुगतान वर्षों से नहीं कर पा रहे हैं, जिससे पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित किए जाने में कठिनाई हो रही है।

गांववासी शिवपूजन मोदनवाल द्वारिका प्रसाद रवि कुमार राकेश महेंद्र सुनील विरेन्द्र राजेश जगदीश सूरज आदि ने बताया कि ग्राम प्रधान की व्याप्त मनमानी से गांव में उपभोक्ताओं को शुद्ध पेयजल का लाभ नहीं मिल पा रहा है। जलकर का भुगतान करने के लिए हर महीने निर्धारित बिल मिलने पर ससमय भुगतान करने के लिए उपभोक्ता तैयार हैं। ग्राम पंचायत से जलकर का भुगतान करने संबंधित बिल नहीं देय होती है। ग्राम पंचायत गंगापुर में स्थित पानी टंकी से शुद्ध पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आपरेटर भी नियुक्त किया गया है। आरोप लगाया कि ग्राम पंचायत निधि से आपरेटर का वेतन यांत्रिक यंत्रों पाईप लाईनो चाहरदीवारी एवं भवन का मरम्मत ईत्यादि कार्यों का भुगतान करा लिया जाता है। शुद्ध पेयजल नहीं मिल पाने से गांव में अनेकों लोग पेट संबन्धित बीमारियों से पीड़ित हैं।

Loksabhs Election 2024: CVIGIL App पर करें चुनाव संबंधित शिकायत

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Chandauli: जिला निर्वाचन अधिकारी निखिल टीकाराम फुंडे ने बुधवार को बताया कि CVIGIL App के माध्यम से आम नागरिक आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत कर सकते हैं। मोबाइल से प्ले स्टोर या एप स्टोर से सी-विजिल एप डाउनलोड कर आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत, लाइव फोटो अथवा लाइव वीडियो अपलोड कर शिकायत की जा सकती है।

उन्होंने बताया कि आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन होने पर सी-विजिल एप में अपने मोबाइल नम्बर से लॉगिन करके नागरिक अपने शिकायत की सतत निगरानी भी कर सकता है। CVIGIL App पर शिकायत करने के लिए नाम व मोबाइल नम्बर की कोई बाध्यता नहीं है, परन्तु अगर शिकायतकर्ता द्वारा अपना नाम व मोबाइल नम्बर देता है तो शिकायतकर्ता एप के माध्यम से अपनी शिकायत की निगरानी भी कर सकता है। शिकायत निस्तारण की नियत समयावधि 100 मिनट है। शिकायत दर्ज होने पर सम्बन्धित रिटर्निंग आफिसर द्वारा अपने नजदीक के उड़नदस्ता टीम (एफएसटी) को शिकायत स्थल पर भेजा जाता है। शिकायत को निर्धारित करके सम्बन्धित रिटर्निंग आफिसर के पोर्टल पर अग्रसारित किया जाता है। तथा सम्बन्धित रिटर्निंग आफिसर द्वारा शिकायत के निस्तारण के क्रम में निर्णय लिया जाता है। उन्होंने बताया कि आम तौर पर सी-विजिल एप में धनराशि वितरण, गिफ्ट, कूपन वितरण, शराब वितरण आदि शिकायतों के अतिरिक्त बिना अनुमति पोस्टर, बैनर लगाना, बिना अनुमति बैठक करना, बिना अनुमति के प्रचार में गाड़ी लगाना, धार्मिक तथा उन्मादी भाषणबाजी करने सम्बन्धी परिवाद अंकित किये जाते है।

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