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Saturday, January 31, 2026

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चंदौली में धूमधाम से मनी गौतम बुद्ध की जयंती

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Young Writer, चंदौली। नगर स्थित वार्ड नम्बर 6 इंदिरा नगर में मौर्य समाज द्वारा शुक्रवार की रात्रि गौतम बुद्ध का जन्मोत्सव समारोह पूर्वक मनाया गया। इस दौरान गौतम बुद्ध के जीवन पर प्रकाश डालते हुए नागेंद्र प्रताप मौर्य ने कहाकि इनका जन्म लुंबिनी में 563 ईसा पूर्व इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था। उनकी माँ का नाम महामाया था जो कोलीय वंश से थीं। जन्म के सात दिन बाद महामाया का निधन हो गया। उनका पालन महारानी की छोटी सगी बहन महाप्रजापती गौतमी ने किया।

जन्म समारोह के दौरान, साधु द्रष्टा आसित ने अपने पहाड़ के निवास से घोषणा की- बच्चा या तो एक महान राजा या एक महान पवित्र पथ प्रदर्शक बनेगा। शुद्दोधन ने पांचवें दिन एक नामकरण समारोह आयोजित किया और आठ ब्राह्मण विद्वानों को भविष्य पढ़ने के लिए आमंत्रित किया। सभी ने एक सी दोहरी भविष्यवाणी की, कि बच्चा या तो एक महान राजा या एक महान पवित्र आदमी बनेगा। दक्षिण मध्य नेपाल में स्थित लुंबिनी में उस स्थल पर महाराज अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व बुद्ध के जन्म की स्मृति में एक स्तम्भ बनवाया था। बुद्ध का जन्म दिवस व्यापक रूप से कई देशों में मनाया जाता है।
सिद्धार्थ का मन बचपन से ही करुणा और दया का स्रोत था। इसका परिचय उनके आरंभिक जीवन की अनेक घटनाओं से पता चलता है। घुड़दौड़ में जब घोड़े दौड़ते और उनके मुँह से झाग निकलने लगता तो सिद्धार्थ उन्हें थका जानकर वहीं रोक देता और जीती हुई बाजी हार जाता। खेल में भी सिद्धार्थ को खुद हार जाना पसंद था क्योंकि किसी को हराना और किसी का दुःखी होना उससे नहीं देखा जाता था। सिद्धार्थ ने चचेरे भाई देवदत्त द्वारा तीर से घायल किए गए हंस की सहायता की और उसके प्राणों की रक्षा की।
इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। 16 वर्ष की अवस्था में इनका विवाह शाक्य कुल की कन्या यशोधरा से हुआ। इनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम राहुल रखा गया। उन्होंने कहाकि 6 वर्ष की अथक प्रयत्न और घोर तपस्या के बाद 35 वर्ष की अवस्था में वैशाख पूर्णिमा की रात निरंजना नदी के तट पर पीपल / वट (बोधिवृक्ष) के नीचे इन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुयी। उसी दिन से ये ‘तथागत‘ कहलाये जाने लगे। ज्ञान प्राप्ति के बाद ही ये गौतम बुद्ध नाम से प्रचलित हुए। इन्होंने अपना पहला उपदेश ऋषिपट्टनम / मृगदाव (सारनाथ) में 5 ब्राह्मण सन्यासियों को दिया। इसी प्रथम उपदेश को बौद्ध धर्म में धर्मचक्रप्रवर्तन के नाम से जाना जाता है। इस दौरान सुरेश मौर्या, त्रिभुवन मौर्या, मगरु मौर्या, चुन्नीलाल, रामकवल, रामआधार, राजकुमार मौर्या, विकास मौर्य, प्रकाश मौर्य, धर्मवीर, राजेंद्र गोड़, ईश्वरदत्त मौर्य, धनंजय, अभिनव, राहुल, संगम, भोला गोस्वामी, अमृता मौर्या, अमन मौर्या, तन्या मौर्य, सम्राट, अनिल मौर्या, अजय, गौतम, दिवेश सानंद सहित दर्जनों लोग उपस्थित रहे। अध्यक्षता बंशराज प्रसाद मौर्य व संचालन प्रह्लाद मौर्य ने किया।

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