13.9 C
Chandauli
Monday, January 26, 2026

Buy now

गणतंत्र दिवस: सदैव स्मरणीय रहेगा शहीद हीरा सिंह, महानंद और रघुनाथ का बलिदान

- Advertisement -

Young Writer: भारत का गणतंत्र केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि लाखों क्रांतिकारियों के ‘सर्वोच्च बलिदान’ की परिणति है। जब हम 26 जनवरी को तिरंगा फहराते हैं, तो उसकी लहरों में उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले की उस पावन मिट्टी की महक भी शामिल होती है, जिसने आजादी की वेदी पर अपने सपूतों को न्योछावर कर दिया।

धानापुर का ऐतिहासिक शौर्य

जब हम भारतीय गणतंत्र की स्थापना के नायकों का स्मरण करते हैं, तो चंदौली के धानापुर कांड का जिक्र अनिवार्य हो जाता है। सन 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान धानापुर के निहत्थे क्रांतिकारियों ने फिरंगी हुकूमत को सीधी चुनौती दी थी। 16 अगस्त 1942 को थाने पर तिरंगा फहराने की जिद में शहीद हीरा सिंह, शहीद महानंद और शहीद रघुनाथ ने अंग्रेजी गोलियों का सामना सीना तानकर किया। इन वीर सपूतों का यह ‘सर्वोच्च बलिदान’ ही था जिसने पूर्वांचल में क्रांति की ऐसी ज्वाला प्रज्वलित की, जिसने अंततः ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला दीं।

संविधान: बलिदानों को मिला कानूनी सम्मान

आजादी के बाद, उन महान क्रांतिकारियों के सपनों को धरातल पर उतारने का दायित्व हमारे संविधान निर्माताओं पर था। डॉ. बी.आर. अंबेडकर के प्रकांड पांडित्य, पंडित नेहरू की दूरदर्शिता और लौह पुरुष सरदार पटेल की दृढ़ता ने देश को एक ऐसा संविधान दिया, जिसने सत्ता की शक्ति ‘जनता’ के हाथों में सौंप दी। 26 जनवरी 1950 को जब भारत पूर्ण गणतंत्र बना, तब असल में धानापुर और पूरे देश के शहीदों का ‘पूर्ण स्वराज’ का सपना साकार हुआ।

आज एक सशक्त भारत के नागरिक के रूप में, विशेषकर कानून के रक्षकों (अधिवक्ताओं) के लिए, यह दिन आत्म-चिंतन का है। गणतंत्र हमें अधिकार देता है, तो उन अधिकारों की रक्षा का कर्तव्य भी सौंपता है। चंदौली के शहीदों की शहादत और बाबा साहेब के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि हम न्याय, समता और बंधुत्व के मूल्यों को जीवित रखें।

Related Articles

Election - 2024

Latest Articles

You cannot copy content of this page

Verified by MonsterInsights