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Tuesday, January 27, 2026

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खोए हुए वसंत की पीड़ा : Dr. Umesh Prasad Singh

Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार Dr. Umesh Prasad Singh

चैता सुख के खो जाने का गान है। भारतीय जाति बड़ी कठकरेजी जाति है। इसका दिल बड़ा कोमल है। पर कलेजा बड़ा कठिन है। कठोर नहीं है, कठिन है। कठोर वह होता है, जो दूसरों को दुख पहुंचा कर दुखी नहीं होता। कठिन कुछ दूसरे तरह का होता है। यह दुख सह लेता है, मगर दुखी नहीं होता। दुर्बल जाति के लोग सुख के खो जाने के अवसर उपस्थित होने पर रोने लगते हैं। हमारी विरासत कुछ इस तरह की है कि सुख के खो जाने पर हमारे भीतर गान उठने लगता है। हम गाने लगते हैं। चैता गाने लगते हैं। सुख के विदा हो जाने की पीड़ा का गान चैता कहलाता है।

बसंत के बीत जाने के बाद। बसंत के उल्लास के विदा हो जाने के बाद उसकी उन्मद उदासी की त्रासद चुभन का एहसास चैता में मुखरित हो उठता है। चैता सुख की अदम्य उत्कंठा में उसके अभाव के कचोट का उद्वेलन है। वसंत था। अभी-अभी था। यहीं था। अपने अगल-बगल था। आसपास था। अपने में ही था, समाया हुआ। अपनी ही चेतना की आंतरिकता में मोजरे हुए आम की मादक गंध की तरह इठलाता हुआ। मगर अब नहीं है। सब कुछ है, मगर वह नहीं है। बहुत कुछ नया-नया भी है, लेकिन वह नहीं है। वही नहीं है, मगर उसकी छाया हमें अब भी छू रही है। उसका न होना मन को मथ डालता है। टीस से भर देता है। बेचैन कर देता है। उसके न होने से जो है, वह सब पीड़ा पहुंचाने वाला बन गया है।
मैं जब अपने समय को देखत हूं, वह बेचैन दिखाई पड़ता है। न जाने किस उधेड़-बुन में उन्मन। बेहद हड़बड़ी में भागता हुआ, न जाने क्या खो गया है कि हर छूंछी हांड़ी में हड़बड़ाया हाथ डालता अकुलाया हुआ है। लगता है, हमारे समय में हर आदमी का कुछ खो गया है। पता नहीं क्या खो गया है। मगर खो गया है, जरूर। जो खो गया है, उसे ही हम ढूंढ रहे हैं। हर कहीं ढूंढ रहे हैं। मगर वह कहीं भी मिल नहीं पा रहा है। हमारा समूचा समय बेचैन है। बेदह बेचैन है। मुझे लगता है कि हमारे समूचे भारतीय समाज की कोई बहुत ही प्रिय और बहुत ही जरूरीर चीज खो गई है।

हां, सच है। जरूर खो गई है। हमारे घरों में हमारा घर खो गया है। हमारे परिवार में हमारा परिवार खो गया है। हमारे पड़ोस में हमार पड़ोस खो गया है। यहां तक कि हममें हम ही खो गए हैं। बड़ा अजीब है। ऐसा क्यों है?
मुझ लगता है, हमारी समूची भारतीयजाति की अस्मिता ही खो गई है। हमारे पास बहुत कुछ है। हमने बहुत कुछ उपलब्ध किया है। फिर भी….। हमें लगता है, भारतीय जाति की आधुनिक अस्मिता का निर्माण हमारे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान सृजित मूल्यों से हुआ है। भारतीय जाति की आत्मिक अभीप्सा उन्हीं मूल्यों की जीवन में उपलब्धता की अभीप्सा है। हमारी मूल अभीप्सा प्यासी की प्यासी है। आजादी के बाद भी सरकारें विकास के दावों की उद्घोषणा गला फाड़-फाड़ कर करती आ रही हैं। आज भी कर रही हैं। हम कैसे कहें कि हमारी सरकार झूठ बोलती है। हम कैसे कहें कि हमारी सरकार सच बोलती है। नहीं, हमारी तो कुछ बोलते बोलती ही बंद हो जाती है। फिर सरकार के सामने हमारे कुछ भी बोलने का मतलब ही क्या है। जो कुछ भी हो, मगर भारतीयजाति की बेचैनी कम होने का नाम नहीं ले रही है। हमने सरकारें बदल-बदल कर भी देखा है। हमारा हर बदलाव छूंछी हांड़ी में हाथ डालने जैसा ही साबित हुआ है। जो खो गया है, वह कहीं नहीं मिलता। हाथ हर जगह जाता है।

हमारे सुहाग का चिह्न हमारी झुलनी खो गई है। सौभाग्य तो है, मगर सौभाग्य का चिह्न खो गया है। हमारे लोकतंत्र के सौभाग्य का चिह्न हमारी सुरक्षा, हमारा स्वास्थ्य, हमारी शिक्षा, हमारे हाथ में नहीं है। हमारे साथ में नहीं है। वह खो गई है। वह अमेरिका में नहीं, इंग्लैण्ड में नहीं, चीन में नहीं, पाकिस्तान में नहीं खोई है। यहीं खो गई है। यहीं अपने घर में ही हेरा गई है। वह इसी ठांव कहीं गुम हो गई है।
अपनी सबसे प्रिय चीज, सबसे बहुमूल्य चीज अपनों के बीच ही खो गई है। सब तो अपने ही हैं। अपने ही प्रियजन है। किससे पूछें? कैसे पूछें? सास-ससुर से, ननद-देवर से पूछने में संकोच होता है। सैंया से पूछते तो लज्जा ही दबोच लेती है। द्वार-आंगन, ढूंढते, कोठे-अटारी ढूंढते हिचक होती है। अपनी सेज पर ढूंढते तो जी एकदम लजा ही जाता है। समूची भारतीय जाति, समूची भारतीय जनता हलकान है, बेहद। हलकान तो है मगर लज्जित भी है। वह पूछते-पूछते, ढूंढ़ते-ढूंढ़ते लजा उठती है। तो भी क्या? लज्जा में भी बेचैनी कम कहां हो पाती है। तनिक भी कम नहीं होती। कम होने का नाम नहीं लेती है।
कहने वाले कहते हैं कि आंख फैला कर देखो न। क्या रौनक है! क्या रंगीनी है। कैसा उजाला है। अब कहने वालों का क्या। कहना ही जिसका व्यापार है, कुछ भी कहे, कौन रोक सकता है। किसकी जीभ, किस-किस की जीभ कौन पकड़े। फिर जिनको बोल कर ही मालामाल होना है धन से, दौलत से, पद से प्रतिष्ठा से वे भला किसके रोके रुकने वाले हैं! जो सब कुछ अपने लिए देख रहा है, उसे भला दूसरे का देखा क्या दिखेगा। नहीं, दिखेगा। कभी नहीं दिखेगा। जो अपने सुख में अंधा है, उसे अंधेरा नहीं दिखता। अभाग नहीं दिखता। खोया हुआ सौभाग्य, सौभाग्य का चिह्न नहीं दिखता। नहीं दिख सकता है। सावन के अंधे को सब कुछ हरा-हरा ही दिखता है। अपने सुख में अंधे हुए को सब कुछ भला-भला ही दिखता है।
मगर सब कुछ भला-भला नहीं है। भारतीय जन के लिए भारतीय जनता के लिए सब कुछ भला-भला नहीं है। कुछ बुरा है, जो भले को भी शोभन नहीं होने देता। सुखद नहीं होने देता।
भारतीय जनता के सुहाग का चिह्न खो गया है। अपने ही घर-आंगन में, अपने ही कोठे-अटारी में, अपनी ही सेेज में, अपनी ही श्रृंगार-सामग्री में कहीं खो गया है। वह कबसे हेर रही है। खोज रही है। ढूंढ रही है। ढूंढ़ने मे व्यग्र है। उसका कहीं पता नहीं चल पा रहा है।
हमारी विरासत खोए हुए वसंत की पीड़ा को चैता में गाने की विरासत रही है। मगर अब तो हम अपनी विरासत से वंचित होकर वैश्विक जन होने का झुनझुना बजाने में लगे हैं। फिलहाल हम न गा पा रहे हैं, न तो रो ही पा रहे हैं। हम गाना भूल चुके हैं। रोना हमारे स्वभाव में कभी रहा ही नहीं है।
भारतीय जनता तो कबसे कह रही है- खोज दो न, खोजवा दो न। हमारे सुहाग का चिह्न तो हमारे स्वाधीनता-संघर्ष के संकल्प ही हैं। सपने ही है। सब अपनों की तू-तू, मैं-मैं में खो गया है। अपनों में ही, अपनों के बीच ही हमारा अपनापन कहीं खो गया है।

सद्यः सुहागन के लिए झुलनी से बढ़कर कुछ भी नहीं है। वह है तो सबका अर्थ है। वह नहीं है, तो सब व्यर्थ है। उसे तो उसके होने पर ही सब कुछ भला लगता है। जनतंत्र में जतना को क्या चाहिए? हमें सबसे पहले हमारी सुरक्षा चाहिए, शिक्षा चाहिए, स्वास्थ्य चाहिए, सम्मान चाहिए, पारस्प्रिकता चाहिए, पारिवारिकता चाहिए। हमें जीने के अवसर की सुलभता चाहिए। मगर यही नहीं है। यही तो नहीं है। यही खो गया है। यहीं कहीं खो गया है। किससे पूछें भला। कैसे पूछें भला।
कौन सुनेगा? कोई नहीं सब मगन हैं, मस्त हैं अपनी धुन में। अपनी लगन में। अपनी खुशी में। उनकी खुशी देखकर पूछने से पहले ही जी लजा जाता है। वसंत चला गया है। धूप तीखी होने लगी है। मन में बेचैनी भरी है। बेचैनी में चैता का बोल बज रहा है-
एहिं ठैंया झुलनी हेरानी हो, रामा, कासों मैं पूछं।
सास से पूछूं, ननदिया से पूछूं, सइयां से पूछत लजानी हो रामा…..।
जनतंत्र लजा रहा है। जनता लजा रही है। चारों तरफ बाजा बज रहा है। बधावा बज रहा है। उत्सव की तैयारी चल रही है। जिसे सुनना है सुन नहीं रहा है। किससे पूछें? 

Dr. Umesh Prasad Singh
Lalit Nibandhkar (ललित निबंधकार)
Village and Post – Khakhara,
District – Chandauli, Pin code-232118
Mobile No. 9305850728

जागरण की मुनादी : Dr. Umesh Prasad Singh

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार Dr. Umesh Prasad Singh

कवि धूमिल साहित्य की दुनिया में अपनी सोच और अपने भाषिक तेवर को लेकर एक मुहावरे की तरह स्थापित हैं। भाषा में मुहावरा बन जाना आसान नहीं होता। मुहावरे रोज-रोज नहीं बनते। धूमिल का काव्यबोध अपने समय की व्यवस्था से उग्र असहमति और उसकी बेधक भर्त्सना का काव्यबोध है। धूमिल ने कविता में सबसे नया भर्त्सना का सौन्दर्यबोध सृजित किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि धूमिल की भर्त्सना में किसी तरह की कुण्ठा नहीं है। उनकी भर्त्सना आकुंइ है। व्यवस्था में अव्यवस्था की अराजकता को भाषा की अराजक शक्ति से धूमिल ने जिस तरह उद्घाटित किया है, वह अन्यतम है। संवेदना और भाषा के क्षेत्र में नये इलाकों का उन्मोचन धूमिल का उद्वेलनकारी अवदान है।

धूमिल की कविता में उद्वेलन की अपूर्व क्षमता है। उनकी कविता अपने पाठक को आँधी की तरह हिला देती है। नहीं, वे केवल फुनगियों को, टहनियों को, डालों को नहीं हिलाते वे मजबूत तनों को झकझोर कर जड़ तक को हिला देते हैं। धूमिल की कविता पढ़ने वाले को उप्तप्त भी करती है और अनुतप्त भी करती है। उनकी कविता भ्रामक विश्वास को तोड़ सकने की सामर्थ्य से सम्पन्न है। भ्रम को विश्वास समझकर अपने को सम्पन्न समझने वाली समझ को धूमिल की कविता एक धक्के में ही एक बारगी विपन्न बना देती है। विपन्नता बोध का अद्भुत सौन्दर्य धूमिल की कविता का विलक्षण वैशिष्ट्य है।

भारतीय लोकतंत्र की विडम्बनामूलक भयावह सच्चाई को सबसे पहले महसूसने वाले और उसकी अभिव्यक्ति करने वाले धूमिल हिन्दी के सबसे बड़े कवि हैं। हमारे देश में जब लोकतंत्र की गरिमा का गौरव गान किसिम-किसिम के लोग किसिम-किसिम से गा रहे थे। गा-गाकर भारतीय जन को भरमा रहे थे धूमिल उसकी भयानक हिंस्र वृत्ति को परखकर-पहचानकर उसके दोगले इरादों को भाँप कर कविता में उसकी असलियत को उजागर करने के लिए सन्नद्ध भाषा को गढ़ने में तल्लीन हो रहे थे। जब हमारा लोकतंत्र मेकअप-मंडित मुखमण्डल में मंच पर अवतरित होकर विवश भारतीय जन की वंचना की वेदना को बहलाने और बहकाने की नौटंकी के आयोजन कर रहा था। धूमिल कविता के माध्यम से देश की जनचेतना को आगाह कर रहे थे।

दरअसल, अपने यहाँ प्रजातंत्र एक ऐसा तमाशा है जिसकी जान मदारी की भाषा है। वस्तुतः धूमिल की कविता, सिर्फ कला, कौशल के हलको से ताल्लुक रखने वाली वाहवाही लूटने वाली चीज नहीं बल्कि वह पाखण्ड को उजागर करने वाली एक बेधक प्रक्रिया है, जो केवल भाषा में नहीं बल्कि भाषा में होने से पहले भी और भाषा में हो लेने के बाद भी निरन्तर क्रियाशील रहती है। इसीलिये वे कहते हैं-
‘‘कविता क्या है?। कोई पहनावा है?। कुर्ता पायजामा है?
ना भाई ना। कविता। शब्दों की अदालत में
मुजरिम के कटघरे में खड़े बेकसूर आदमी का। हलफनामा है
क्या यह व्यक्तित्व बनाने की। खाने कमाने की। चीज है?
ना भाई ना। कविता। भाषा में। आदमी होने की तमीज है।……

धूमिल की कविता में आत्मबोध और युगबोध की आश्चर्यजनक संगति की अद्भुत और उद्दाम आकांक्षा अपने पूरे उफान में दिखाई देती है। उनकी यही आकांक्षा उन्हें भीड़ से अलग पहचान देती है और नारेबाजी के खोखलेपन से अलग धरातल पर प्रतिष्ठित करके व्यवस्था के बुनियादी प्रतिरोध का प्रतिनिधित्व प्रदान करती है।
धूमिल की कविता में आक्रोश की जबरदस्त गूँज गरगराती हुई सुनाई देती है। मगर वे सिर्फ सतही आक्रोश के कवि नहीं है। वे केवल तात्कालिक असहमतियों के कवि नहीं हैं। उनकी कविता केवल सामयिक विरोध की कविता नहीं है। धूमिल भावात्मक विद्रोह के कवि नहीं है। वे मुकम्मल विद्रोही कवि हैं। वे व्यवस्था की आन्तरिक संरचना में व्याप्त जनविरोधी चेतना की पहचान के कवि हैं। उनकी कविता जनपक्ष की जागृति के आह्वान की कविता है। उनकी कविता व्यवस्था के बुनियादी पाखण्ड को पहचानने के विवेक की कविता है। धूमिल की कविता अपने समय के विक्षोभ और विवेक का अद्भुत समन्वित स्वरूप रचने में समर्थ कविता है। वे भाषा में अपने समय के समग्र विक्षोभ को वाणी देते हैं और चेतना की जड़ता को जोतकर विवेक के बीज बोते हैं धूमिल सच्चे अर्थ में अपने समय के सचमुच किसान कवित हैं।

जनतंत्र के छद्म को जिस गहराई और बारीकी से धूमिल ने व्यंजित किया है, अन्यत्र दुर्लभ है। रोटी से खिलवाड़ करने वाले आदमी की पहचान का प्रश्न जिस पर समूची संसद मौन है, धूमिल की कविता का नितान्त मौलिक और जनतंत्र का सबसे मूल्यवान प्रश्न है। जैसे-जैसे लोकतंत्र का छद्म उजागर होता जा रहा है, इस प्रश्न की मूल्यवत्ता बढ़ती जा रही है। आज तो हालत ऐसी हो चली है कि रोटी से खिलवाड़ करने वाली प्रजाति के लोग संसद के भीतर धँसते जा रहे हैं।
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ
यह तीसरा आदमी कौन है?…
मेरे देश की संसद मौन है’’

कहने की जरूरत नहीं है कि आज वह तीसरा आदमी संसद के भीतर ही है और हर दूसरे आदमी के बाद तीसरी सीट बैठा आदमी धूमिल की कविता का तीसरा आदमी है। धूमिल की कविता की अन्तरात्मा प्रश्नों की आकुलता से भरी हुई है। उनके प्रश्न उत्तरों के भुखापेक्षी प्रश्न नहीं है। धूमिल के सवाल सच को छू लेने की उत्कट लालसा से उपजे हुए हैं, इसीलिए वे गढ़े हुए उत्तरों से लाख गुना संगत और सार्थक हैं।

धूमिल विपक्ष के कवि नहीं है। उनकी कविता विपक्ष की कविता नहीं है। विपक्ष भी व्यवस्था के भीतर एक दल है। वह सत्ता में नहीं है मगर वह भी सत्ता का उतना ही आकांक्षी है, जितना सत्तारूढ़ दल है। धूमिल का विरोध सिर्फ सत्ता का विरोधी नहीं है, वह व्यवस्था के समूचे खड़यत्र के विरूद्ध हैं। उनका विरोध व्यवस्था के आन्तरिक गठन के मनुष्य विरोधी चरित्र का विरोध है। वे व्यवस्था के ढाँचे को ध्वस्त करने के लिए प्रहार नहीं करते वे व्यवस्था की आत्मा पर चोट करने वाले अन्यतम कवि हैं। उनमें अस्वीकार का, इंकार का असम साहस है। उनके लिए उनकी कविता में उकना साहस और तेवर की तीक्ष्णता उनका साध्य नहीं है, वह उनके लिए जीवन की सचाई को पाने का साधन है। उनकी कविता एक मुकम्मल प्रतिपक्ष का सृजन करती है, जिसके मूल में सहज की अनिवार अभीप्सा है-
मैं साहस नहीं चाहता
मैं सहज होना चाहता हूँ
ताकि आम को आम और
चाकू को चाकू कह सकूँ।’’

धूमिल की कविता घोड़े की भाषा में आदमी के घोड़ा बन जाने की दारुण नियति और दुःसह दर्द की कविता है। धूमिल की कविता सवार नहीं, सवारी की कविता है। धूमिल की कविता अपने लिये नहीं किसी दूसरे के लिए पीठ पर बोझ लादकर फेचकुर फेकते दौड़ते रहने की कविता है। धूमिल की कविता हिन्दी में पहली बार घोड़े के मुँह से लगाम के असली स्वाद की कविता है। धूमिल की कविता प्रजातंत्र में मनुष्य होने की समूची ग्लानि को उसके संभाव्य आयामों में समूचे विस्तार और गहन गहराई में अभिव्यंजित करती कविता है। धूमिल का काव्यबोध भारतीय जनतंत्र की आन्तरिक असलियत का प्रमाणिक और संग्रहणीय दस्तावेज है। उनकी कविता केवल कविता नहीं है, वह मनुष्यता के सही इतिहास के लिये आधारभूत सामग्री के लिए स्रोत है। उनकी कविता निष्ठा की जगह केवल तुक के कारण विष्ठा की प्रतिष्ठापना घोर भर्त्सना की कविता है।

Dr. Umesh Prasad Singh
Lalit Nibandhkar (ललित निबंधकार)
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हेरत-हेरत हे सखी : Dr. Umesh Prasad Singh

Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार Dr. Umesh Prasad Singh

मैं कबीर नहीं हूँ। मगर मैं कुछ खोज रहा हँू। मैं जो खोज रहा हँू , वह कोई बड़ी चीज नही है। मैं बहुत ही मामूली चीज को अपने आस-पास के जन जीवन में अपनी समाज व्यवस्था में ढूंढ रहा हँू। जाने कबसे हलकान हँू। खोजकर थक रहा हूँ। हार रहा हूँ। कहीं मिल नहीं पा रही है। मैं अपने देश के जनतंत्र में जन को खोज रहा हूँ। जन कहाँ है? जन के लिए क्या है?
हमारे जनतंत्र में जन सिर्फ एक दिन दिखाई पड़ता है। उस दिन वह हर कहीं दिखाई पड़ता है। शहर में, बाजार में, गाँव में हर जगह वह दिखाई देता है। खुले हुए आकाश के नीचे तपती हुई धूप में, पसीने-पसीने वह लम्बी-लम्बी लाइन में लस्त-पस्त लगा हुआ हर किसी को दिखाई देता है। मतदान के दिन मतदान के लिये वह हर कहीं आसानी से देखा जाता है। हलॉकि मतदान केवल लोकतंत्र की किताबों में मात्र एक शब्द है, जिसका व्यवहार में कोई अर्थ नही होता। मत जैसी कोई चीज अगर है भी तो दान से उसका कत्तई कोई लेना-देना नहीं है। हमारे समय में वह केवल हथियाने की, हड़पने की और लूटने की चीज बनकर रह गया है। धनबल से, बाहुबल से, बुुद्धिबल से जो बीस पड़ता है, बटोर लेता है। फिर उस एक दिन के बाद जन हमारे जनतंत्र में पता नही कहाँ खो जाता है। ऐसा खो जाता है कि खोजे कही नहीं मिलता। हेरे से हाथ नहीं लगता।

जिसे हर कही होना चाहिए वह कही नही है। न देश में न प्रदेश में। न शहर में न, गाँव में। न बाजार में न खेत में। कहाँ गया जन? कुछ पता नहीं। जनतन्त्र में जन का कही पता नही है। हमारे जनतन्त्र में जन बूॅद हैै। सरकार सागर है। बूँद समुद्र में समा गई समाहित हो गई। बूँद समानी समद मो। सरकार के अस्तित्व में आते ही सारी जनता सरकार में विलीन होे गई। अब जन नहीं है। जनता नहीं बस सरकार है। हाँ सरकार है, देश में है, प्रदेश में है, गाँव में गाँव की सरकार है। जन कहीं नहीं है। जनता कहीं नहीं है।
जनता में महामारी है। महामारी जनता को मार रही है। जनता मर रही है। जनता काहे लिये है, मरने के लिये है। जनता में बीमारी है। दवा नही है। अस्पताल नहीं है। इलाज नहीं है।

जो अस्पताल हैं, वे अस्पताल नहीं हैं। अस्पताल की शक्ल में कानून के संरक्षण में धन उगाही के बेशर्म अड्डे हैं। जनता में भूख है। भय है। अशिक्षा है, असुरक्षा है। स्कूल कहीं नहीं हैं। सुरक्षा का आश्वासन कहीं नहीं है। क्यों नहीं है? इसी लिए कि जनता में भूख को भय को अशिक्षा को असुरक्षा को बने रहने देना है। इसके साथ रहनेे से ही जनता- जनता जैसी रह सकती है।

जनता तो सरकार के लिये है। मगर सरकार किसके लिये है? नहीं यह प्रश्न ठीक नही है। यह प्रश्न कानून के खिलाफ है। यह प्रश्न लोकतंत्र की मर्यादा के विरूद्ध है। इससे जुड़े और भी बहुत प्रश्न है, जिन्हे पूछने की मनाही है। प्रश्न यह भी है कि क्या सरकार और देश एक ही चीज है? मगर नहीं। नहीं पूछना है। कुछ भी पूछना किसी से भी पूछना मना है।
हमारे समय में किताबें भयानक रूप में झूठ बोलने लगी हैं। हम क्या करें? आखिर किसका विश्वास करें? किताब कहती है कि सरकार जनता के लिये है। सरकार देश के लिये है। मगर ऐसा दिखता नहीं है। दिखता यह है, कि सरकार सिर्फ सरकार के लिये है। सरकार को बनाये रखने के लिये समूचा देश सरकार के लिये है। हमारी किताबो में जो कुछ लिखा है। वह हमारे जीवन में दिखता क्यों नही है? जनतन्त्र के कानून की किताब में जनता के प्राथमिक अधिकारो के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता घोषित की गई है। अपने प्राथमिक कर्त्तव्य से सरकार अपना पीछा क्यों छुड़ा रही है, कौन पूूछे।
हमारे देश में सरकार है, अपनी पूरी ठकस के साथ है। मगर जनता के लिये नहीं है। जनता अपने बच्चो कोे पढाने में पसीने-पसीने है। निजी स्कूलो को फीस देते-देते बेहाल हो रही है। एक ही कोर्स को पूरा करने के लिये तीन-तीन तरह से फीस भर रही है। स्कूल में अलग ट्रयूशन में अलग, कोचिंग में अलग। सब कुछ करके केवल कागज की डिग्रियाँ पा रही है। जो आँस पोछने के काम भी नही आ रही है। मामूली सी बीमारी के लिये निजी अस्पतालों में लाखांे का बिल चुका रही है। हाँफ रही है। नाक से ऊपर चढते पानी में अफना रही है। सुरक्षा की तो बात ही छोड़िये। फिर भी सरकार है। पता नहीं किसके लिए है। इधर महामारी ने पूरे तंत्र को नंगा करके रख दिया है।

पूरा देश बिलबिला रहा है। मर रहा है। पिट रहा है। मिट रहा है।
आदमी एक बार नहीं बार-बार मर रहा है। वह मरने से पहले भी मर रहा है। मरने के समय भी मर रहा है। मरने के बाद फिर मर रहा है।
न जाने कैसे त्रासदी है। न जाने कैसे संकट है, अभूतपूर्व। नहीं,
इससे पहले ऐसा नहीं हुआ था। कुछ समझ नही आ रहा है। कोई कुछ समझ नही पा रहा है। क्या करे। आलम्ब के अवलम्ब के सहारे के सारे आश्रय छिन गए हैं। आदमी जहाँ भी है अकेला है। असहाय है। लाचार है। सरकार कहीं नहीं है।
सरकार जहाँ भी है, आदमी से बहुत दूर है। आदमीयो के बीच में केवल लाचारी है। दहशत है। आतंक है। असहायता है।
कोरोना इस महादेश के गाँवों में पॉव पसार रहा है। यहाँ बीमारी से संर्घष की कोई बात नहीं है। केवल आत्मसमर्पण है। बीमारी का आक्रमण हो और लोग मर जाय।
हमारे गाँव में कही भी सरकार का कोई नाम निशान तक नही है। अखबारों में, टेलीविजन के समाचारों में सरकार के वक्तव्य है। लडने की उद्घोषणए है। मैदान में कोई नहीं है।
मै एक गाँव में रहता हूँ कितने दिन से रोज सुन रहा हूँ सरकार आ रही है। बचाव के सारे इंतजाम के साथ आ रही है। मगर पता नहीं कहाँ है। यहाँ तो कहीं नहीं है।

हमारे जनतंत्र में समूचा जन सरकार में समहित है। मैं सरकार में खोज रहा हूँ- जन कही नहीं है। मैं आपदा काल में जनता के बीच सरकार को खोज रहा हूँ कही नही है। मै खोेजते-खोजते थक रहा हूँ। पक रहा हूँ।
मुझे लगता है मैं खुद ही खो गया हूँ मैं न सरकार में हॅँू न जनता में हूँ।
हेरत-हेरत हे सखी गया कबीर हेराय। मै भी हेराय गया हूँ खो गया हूँ मगर कबीर की तरह नहीं बिल्कुल अपनी तरह। बूँद, बूँद में ही सूख गई है। हर जगह महामारी है। आदमी कही नहीं।

Chandauli:किसान कांग्रेस ने युद्ध में शहीद हुए सैनिकों को दीप जलाकर दी श्रद्धांजलि,जवानों के बलिदान को किया याद


चंदौली। मुख्यालय स्थित पंडित कमलापति त्रिपाठी उद्यान में बुधवार को किसान कांग्रेस कमेटी के तत्वावधान में भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध में शहीद हुए भारतीय जांबाज़ सैनिकों की याद में कैंडल जलाकर और पुष्पांजलि अर्पित कर उनको श्रद्धांजलि दी गई।
इस दौरान किसान कांग्रेस के जिलाध्यक्ष प्रदीप मिश्रा ने कहा कि दुश्मन देश पाकिस्तान ने जब भी भारत की सीमा के अंदर आतंकवाद को बढ़ावा दिया भारत की तीनों सेनाओं के शूरवीर सैनिकों ने अपने जान की परवाह किए आतंकवाद को जड़ से समाप्त करने का काम किया। हमारे देश के जवान सीमा को सुरक्षित रखते हैं तभी हम अपने घरों में चैन की नींद सो पाते है। युद्ध की त्रासदी भारत ने देखी है। और संकट के समय मे प्रत्येक भारतवासी अपने सैनिकों के साथ तन-मन-धन से हरदम खड़ा रहा है। पूर्व जिलाध्यक्ष धर्मेंद्र तिवारी ने कहा कि दुनिया ने भारत की सैन्य शक्ति को देखा और आकाशीय युद्ध के पराक्रम को सराहा है। वर्तमान सैन्य क्षमता ऐसी है। कि युद्ध की स्थिति में दुश्मन देश के घर मे घुस कर मारने और सकुशल वतन लौट आने की कूबत हमारी सेना रखती है। लड़ाई अगर और खिंचती तो पाकिस्तान के फिर से टुकड़े होते इस समय इंदिरा गांधी को यह देश बड़ी शिद्दत से याद कर रहा है। जिन्होंने पाकिस्तान के दो टुकड़े किए थे। इस दौरान गंगा प्रसाद, श्रीकांत पाठक, सतीश बिंद, विनोद सिंह, असगर अली, नरेंद्र तिवारी सहित अन्य कार्यकर्त्ता उपस्थित रहे।

Chandauli:तेज़ धमाके के साथ धुँ-धुँ कर जलने लगा सिलेंडर के साथ पिकअप,मौक़े पर मच गई अफरा-तफरी,ऐसे किया गया आग पर नियंत्रण


नियामताबाद। अलीनगर थाना क्षेत्र के सैदपुरा गांव के समीप रिंग रोड निर्माण के दौरान पेंट करने में लगे मजदूरों की पिकअप पर रखे जनरेटर व पेंट मशीन में अचानक धमाके के साथ आग लग गई। घटना को लेकर वहा मजदूरों में अफरा-तफरी मच गया। हालांकि रिंग रोड में लगे पानी के टैंकर से लगभग आधे घंटे बाद आग पर काबू पाया गया।
दरसअल पचफेड़वा से मवई तक रिंग रोड निर्माण का कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है। इसमें डिवाइडर का पेंट सहित गंगा पुल व रेलवे पुल का निर्माण भी कराया जा रहा है। इसी दौरान बुधवार को सैदपुरा गांव के समीप पिकअप पर जनरेटर व पेंट करने वाली मशीन लादकर डिवाइडर पेंट करने का काम चल रहा था। तभी अचानक जनरेटर में आग लग गई। जिससे पेंट करने वाली मशीन का सिलेंडर ब्लास्ट कर गया और आग ने विकराल धूप धारण कर लिया। लेकिन रिंग रोड में लगे पानी देने वाली टैंकर से मजदूरों ने कड़ी मस्कत के बाद आग पर काबू पलिया।

Chandauli:पत्नी की बेवफ़ाई से टूट गई पति की सांसें,सुसाइड नोट पर अपने जख्मों को उतारकर ऐसे लगा लिया मौत को गले


अलीनगर। थाना क्षेत्र के भूपौली गांव में मंगलवार को एक 40 वर्षीय युवक ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली घटना से परिजनों सहित रिश्तेदारों में कोहराम मच गया। घटनास्थल पर मृतक के पास से एक सुसाइड नोट मिला है। जिसमें उसने पत्नी का साढू के साथ अवैध संबंध होने की बात लिखी है। घटना की सूचना मिलते ही मौक़े पर पहुची पुलिस व फॉरेंसिक टीम ने घटनास्थल पर जांच पड़ताल के दौरान सुसाइड नोट बरामद किया। साथ ही शव को कब्जे में कर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया।


दरसअल भूपौली गांव निवासी रतन की शादी दो दशक पहले मंजू से हुई थी। मृतक ने सुसाइड नोट पर लिखा है कि उसकी पत्नी का उसी के साढू के साथ अवैध संबंध था। कुछ महीने पहले रतन ने अपने पत्नी को साढू के साथ कमरे में आपत्तिजनक हाल में पकड़ा था। इसको लेकर दोनों में कहासुनी के बाद काफी विवाद भी हुआ था। इस बात से नाराज पत्नी व साढू ने रतन के बेटे अमन से उसे पिटवाया दिया।

इस सदमे को रतन बर्दाश्त नही कर सका और आत्मघाती कदम उठाकर अपनी ई लीला समाप्त कर ली। फिलहाल पुलिस सुसाइड नोड के आधार पर घटना की जांच पड़ताल में जुट गई है। इस बाबत थानाध्यक्ष बिनोद मिश्रा ने बताया कि युवक ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर लिया है। शव को कब्जे में कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। फोरेंसिक टीम की सहायता से मामले की जांच पड़ताल की जा रही है।

खजुरा गोलीकांड:भतीजा गांव में पीड़ित परिवार से मिले बसपा नेता अमित यादव लाल,संभव मदद का दिया आश्वासन

चंदौली। यूपी बिहार बॉर्डर के समीप खजुरा बाजार में बदमाशों ने दिनदहाड़े यूपी के दो युवकों को गोली मारकर फरार हो गए थे। जिसमें भतीजा गांव निवासी तारकेश्वर की मौत हो गई थी। वही झांसी गांव निवासी कृष्णा गंभीर रूप से घायल हो गया था। मंगलवार को बसपा नेता व सैयदराजा के पूर्व प्रत्यासी अमित यादव लाल व मंडल प्रभारी डॉ बिनोद कुमार पीड़ित परिवार से मिले। और उनको ढाढ़स बधाया। साथ ही और हर संभव मदद का आश्वासन दिया।
इस दौरान डॉ बिनोद कुमार ने कहा कि प्रदेश की कानून व्यवस्था स्थिर पड़ी है। जिससे बदमाशों के हौसले बुलंद हो रहे हैं। प्रदेश में बेखौफ बदमाश सरेआम हत्या लूट अराजकता जैसे अपराध को अंजाम दे रहे हैं। लेकिन पुलिस निर्दोष लोगों को ही प्रताड़ित कर रही है। अमित यादव लाल ने कहा कि विगत दिनों पूर्व धानापुर में बदमाशों ने दिनदहाड़े हत्या जैसी घटना को अंजाम देकर फरार हो गए। और पुलिस बदमाशों के पकड़ से दूर रही भाजपा सरकार में जनता के लिए पुलिस का व्यवहार शोषण और अत्याचारी बन चुका है। प्रदेश में प्रतिदिन कहीं लूट कहीं हत्याएं हो रही है। जिससे जनता का भाजपा सरकार और पुलिस से भरोसा उठ चुका है।इस दौरान अवधेश यादव, मुन्ना यादव,छोटे लाल यादव, उमा राम, मुरली,राजन खान मौजूद रहें।

Chandauli:दो बाइकों की आमने-सामने टक्कर में तीन युवकों की मौत,परिजनों में कोहराम


चंदौली। सकलडीहा थाना क्षेत्र के वर्दीसाडा नहर पर मंगलवार को दो बाइको की आमने सामने टक्कर में तीन युवक गंभीर रूप से घायल हो गए। मौक़े पर जुटे आस पास के ग्रामीणों ने तत्काल तीनो को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया जहा चिकित्सकों ने तीनों को मृत घोषित कर दिया। सूचना पर पहुची पुलिस ने तीनों के शव को कब्जे में कर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया। वही युवकों के मौत की खबर लगते ही परिजनों में कोहराम मच गया।
बताते हैं कि धानापुर थाना क्षेत्र के अमरा गांव निवासी प्रदीप राय 21 वर्ष अपने चचेरे भाई अभिषेक राय 16 वर्ष के साथ वर्दीसाडा नहर की तरफ किसी काम से गया था। इसी दौरान सकलडीहा थाना क्षेत्र के पौरा गांव निवासी नीरज कुमार 18 वर्ष के बाइक में आमने सामने टक्कर हो गई। घटना में तीनों सड़क पर गिरकर लहूलुहान हो गए। घटनास्थल पर जुटे आस पास के ग्रामीणों ने तत्काल तीनो को धानापुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया जहा चिकित्सकों ने तीनों को मृत घोषित कर दिया। सूचना पर पहुची पुलिस ने तीनों के शव को कब्जे कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।इस बाबत थानाध्यक्ष हरि नारायण पटेल ने बताया कि दो बाइको की टक्कर में तीन युवकों की मौत हो गई है शव को कब्जे में कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है।

Chandauli:सपा नेता चंद्रशेखर यादव ने पीड़ित परिजनों से मिलकर बाटा दर्द,संभव मदद का दिया आश्वासन


बबुरी। थाना क्षेत्र के एकौनी गांव में दो बालको की मौत से गांव ने मातम के साथ परिजनों में कोहराम मचा हुआ है। देर शाम सपा नेता चन्द्र शेखर यादव ने पोस्टमार्टम हाउस पर मृतक बच्चों के परिजनों से मिलकर उनका दुख दर्द बाटा और हर संभव मदद दिलाने का आश्वासन दिया।
दरसअल मृतक करण और ईशान एक-दूसरे के पड़ोसी थे। कुछ साल पहले हरि नारायण विश्वकर्मा गांव से थोड़ी दूर पर अपना नया मकान बनाकर रहने लगे थे। इसके बाद भी करण के साथ ईशान हमेशा खेल कूदा करता था। रविवार को भी दोनों नहाने से पहले क्रिकेट खेल रहे थे। करण जहां पांच बहनों में इकलौता भाई था। वही ईशान दो भाई थे। पोखरे में डूबने के बाद जब ग्रामीणों ने दोनों बालकों के शवों को बाहर निकाला तो दोनों परिवारों की चीत्कार व करुण रूदन को सुनकर सभी की आंखें नम हो गई। ईशान की मां तरन्नूम गश खा कर गिर पड़ी और उसके पिता अख्तर अपने बड़े बेटे के शव को देखकर बदहवास हो गए। छोटे भाई अनश की हालत भाई का शव देखकर खराब हो गई। वहीं करण के स्वजन देर शाम तक करण के मौत की खबर को उसकी मां सरोजा देवी से बचाते रहे। लेकिन देर शाम जानकारी होने पर सरोजा देवी बेहोश होकर गिर पड़ी।

खजुरा गोलीकांडः बसपा ने पीड़ित परिवार का बांटा दर्द, 10 लाख की आर्थिक मदद संग मांगा न्याय

बोले, अपराधियों की पहचान के साथ घायल की सुरक्षा का हो बंदोबस्त

Young Writer, चंदौली। खजुरा गोलीकांड की घटना से मर्माहत बहुजन समाज पार्टी के पदाधिकारियों ने सोमवार को मंडल प्रभारी डा. विनोद कुमार व जिलाध्यक्ष घनश्याम प्रधान की अगुवाई में भतीजा गांव पहुंची। इस दौरान बसपा ने मृतक परिजनों से मुलाकात की। घटना के बाबत जानकारी ली और पीड़ित परिवार के दर्द को बांटा। साथ ही भरोसा दिया कि न्याय मिलने तक बसपा परिवार के साथ खड़ी रहेगी। अंत में बसपा ने हत्या को अंजाम देने वाले बदमाशों की गिरफ्तारी, पीड़ित परिवार को 10 लाख की आर्थिक मदद व घायल युवक को सुरक्षा मुहैया कराने की बात कही।

इस दौरान बसपा जिलाध्यक्ष घनश्याम प्रधान ने कहा कि चंदौली और बिहार बार्डर से सटे हुए इलाकों में अपराध अपने चरम पर है। आए दिए हत्याएं हो रही है। बावजूद इसके पुलिस अपराध को रोकने में नाकाम है। कहा कि घटना में घायल कृष्णा पासवान हत्यारों को पहचानता है। ऐसे में उसकी भी जान को खतरा है। जिसे देखते हुए चंदौली पुलिस, बिहार में पकड़े गए दो हत्यारोपियों को रिमांड पर लेकर कृष्णा पासवान से पहचान कराए।

बसपा मंडल प्रभारी डॉ विनोद कुमार ने एसपी चंदौली से टेलिफोनिक बातचीत की और घायल युवक को सुरक्षा मुहैया कराने सहित अपराधियों की पहचान कराने को लेकर अपनी बातों को रखा। कहा कि बहुजन समाज पार्टी पीड़ित परिवार के साथ है। मांग किया कि दुख की इस घड़ी में शासन व प्रशासन पीड़ित परिवार को न्याय दिलाए। साथ ही 10 लाख रुपये की आर्थिक मदद देकर उनके दर्द को बांटने की पहल करे। इस अवसर पर अमित यादव लाल, राजन खान, संतोष कुमार भारती, विनोद प्रधान, पंकज पांडेय, उमाकांत, छोटेलाल यादव, भगवान प्रधान प्रसाद, फूलचंद प्रसाद, मुन्ना यादव परिवा आदि उपस्थित रहे।

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