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Wednesday, October 7, 2026

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Chandauli जिला मुख्यालय व न्यायालय के मुद्दे पर फिर आंदोलित नजर आएंगे अधिवक्ता

आज से आंदोलित नजर आएंगे चंदौली के अधिवक्ताः संयुक्त बार
बार सभागार में प्रेसवार्ता करते संयुक्त बार के पदाधिकारी।

जिला मुख्यालय व न्यायालय के मुद्दे पर बुलंद करेंगे जन-जन की आवाज

Young Writer, चंदौली। डिस्ट्रिक्ट डेमोक्रेटिक बार एसोसिएशन व सिविल बार एसोसिएशन ने शुक्रवार को संयुक्त रूप से बार सभागार में प्रेसवार्ता की। इस दौरान अध्यक्ष जय प्रकाश सिंह व चन्द्रभानु सिंह ने जिला न्यायालय निर्माण व मुख्यालय के विकास के मुद्दे पर आगामी आंदोलन की रूपरेखा पर प्रकाश डाला। कहा कि जिला प्रशासन ने एक माह की समयावधि में मुख्यालय व जिला न्यायालय निर्माण के संबंध में कोई कार्यवाही नहीं की। लिहाजा अब उन्हें अधिवक्ताओं के आंदोलन का सामना करना पड़ेगा।
इस दौरान अध्यक्ष चन्द्रभानु सिंह व जय प्रकाश सिंह ने जिला न्यायालय निर्माण व मुख्यालय के विकास में हो रही अतिविलंब के लिए चंदौली के सांसद समेत जनपद के सभी विधायकों व अन्य जनप्रतिनिधियों को सीधे तौर पर जिम्मेदार बताया। कहा कि चंदौली की जनता द्वारा निर्वाचित एक भी जनप्रतिधि ने जनहित में जिला मुख्यालय का विकास व न्यायालय के निर्माण में सहयोग नहीं दिया। इन नेताओं के आपसी राजनीतिक द्वंद्व के कारण चंदौली जिला मुख्यालय का विकास अधर में लटका पड़ा है। आरोप लगाया कि चंदौली जिला मुख्यालय पर आवंटित सरकारी विभागों को षड्यंत्र के तहत यहां-वहां ले जाया जा रहा है।
महामंत्री राज बहादुर सिंह व अनिल सिंह ने कहा कि चंदौली मुख्यालय से रोडवेज को नौबतपुर ले जाया गया, पुलिस लाइन को भोजापुर, जिला स्टेडियम को धरहरा, विकास भवन को मुगलसराय तहसील अंतर्गत झांसी ले जाया गया है। कहा कि इन दफ्तरों के निर्माण व जिला न्यायालय भवन के निर्माण के लिए 15 जुलाई से अधिवक्ता कलमबंद हड़ताल के साथ ही कचहरी का चक्रमण व धरना-प्रदर्शन करेंगे। चेताया कि आंदोलन के बाद भी अगर जनप्रतिनिधि व अधिकारी जिला मुख्यालय के विकास के प्रति सजग व संवेदनशील नहीं हुए तो उनका जोरदार प्रतिकार किया जाएगा। आंदोलन को मुकाम तक पहुंचाने के लिए जिला न्यायालय एवं मुख्यालय निर्माण संघर्ष समिति की गठन किया गया है। इस अवसर पर सीएम त्रिपाठी, महेंद्र चतुर्वेदी, राकेश रत्न तिवारी, अमरेंद्र सिंह, पंचानन पांडेय, संतोष सिंह, आनंद सिंह, अनिल सिंह, विद्या सिंह, शहाबुद्दीन, शमशुद्दीन, पंकज सिंह, चन्द्रभूषण यादव, रामप्रकाश मौर्या, धनंजय सिंह, नवीन सिंह, अजीत सिंह, अरुण मिश्रा, संजय मिश्रा, राजेश मिश्रा आदि अधिवक्ता उपस्थित रहे। पूर्व महामंत्री संचालन झन्मेजय सिंह ने किया।

जमीन आवंटित, फिर भी नहीं हुआ निर्माण
चंदौली। अधिवक्ताओं ने कहा कि जिला आबकारी विभाग के लिए भिखारीपुर, एआरटीओ दफ्तर के लिए कटसिला, एडीआर सेंटर के लिए धूरीकोट, अभियोजन दफ्तर के लिए धूरीकोट, जिला सेवायोजन के लिए धूरीकोट, पुलिस अधीक्षक आवास के लिए जसुरी, अधिकारियों के आवास के लिए जसुरी, ट्रांजिट हास्टल के लिए हिनौता उर्फ जगदीशसराय, फायर स्टेशन के लिए हिनौता उर्फ जगदीशसराय में जमीन आवंटित होने के बाद भी भवन का निर्माण कार्य नहीं कराया गया। यह जिला प्रशासन व जनप्रतिनिधियों की उदासीनता व जनहित के मुद्दे पर उनकी उपेक्षा को प्रदर्शित करता है।

Chandauli: पुलिस ने 18.32 लाख के 101 स्मार्टफोन को किया बरामद


चंदौली। जनपद पुलिस ने विभिन्न थाना क्षेत्र से गुम हुए 101 स्मार्टफोन बरामद किया है। एसपी के निर्देश पर सर्विलान्स टीम ने आवश्यक कार्यवाही करते हुए मोबाइल फोन को बरामद करने में सफलता प्राप्त की है। शुक्रवार को पुलिस लाइन सभागार में बरामद हुए मोबाइल फोन को उनके स्वामियों के बीच वितरण किया गया।
इस दौरान गुम मोबाइल फोन को पाकर लोगों के चेहरे खुशी से खिल उठे। एएसपी और सीओ अपराध के मार्गदर्शन में पुलिस को मिली सफलता से न केवल पुलिस टीम गदगद नजर आई, बल्कि उन लोगों के चेहरे भी खिल उठे, जो अपना कीमती फोन गुम होने से उदास थे। एसपी अंकुर अग्रवाल ने मोबाइल फोन का उनके स्वामियों के बीच वितरण किया। इस मौके पर लोगों ने पुलिस के कार्य की जमकर सराहना भी की। एसपी ने बताया कि सर्विलांस व स्वाट की तत्परता व प्रयास से प्राप्त हुए 101 स्मार्टफोन की कीमत 18 लाख 32 हजार रुपये आंकी गई है। पुलिस टीम में प्रभारी सर्विलांस श्यामजी यादव, प्रेम प्रकाश यादव, देवेन्द्र सरोज, अजीत कुमार सिंह, मनीष कुमार, गणेश तिवारी, सन्दीप, मनोज, प्रभारी स्वाट टीम शैलेन्द्र प्रताप सिंह, राणा प्रताप सिह, आनन्द कुमार सिंह, अमित कुमार, प्रीतम बिन्द, राजेश कुमार यादव, विजेन्द्र कुमार सिंह शामिल रहे।

प्यास का कुँआ : डा.उमेश प्रसाद

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह
प्यास का कुँआ : जो लोग यह सोचते हैं कि सभ्यता और संस्कृति बिल्कुल भिनन चीजें हैं, वे पता नहीं कैसे सोचते हैं। हमारे समय में सोचने के ,न जाने कितने-कितने ढंग निकल आये हैं। एक से एक निराले ढंग। एक से एक नए ढंग। हमारा गुमान है कि इनके रंग बिल्कुल नये है। बिल्कुल नए-नए हैं। रोमांच तो है। रोमांच की उत्तेजना तो है। मंगर नया होना ही सार्थक होना नहीं है। उपयोगी होना नहीं है। सार्थक होना नहीं है। कल्याणकारी होना नहीं है। ग्राह्य होने की संभावना से भरा हुआ होना नहीं है। नहीं, इन बातों पर विचार करने का हमारे पास समय नहीं है। हमारे समय में हमारे पास बहुत कुछ है। बहुत-बहुत कुछ है। अगर कुछ नहीं है तो अवकाश नहीं है। अपने जीवन के बारे में कुछ भी सोचने का कत्तई अवकाश नहीं है। सामाजिक सन्दर्भ में कुछ भी विचार करने का अवकाश नहीं है। अपने अस्तित्व और सामूहिक अस्तित्व के अन्तर्सम्बन्ध के बारे में सोचने का थोड़ा भी अवकाश नहीं है। मनुष्य जीवन में अन्य प्राणिसमुदाय और प्रकृति जगत के बीच हमारी संस्कृति में एक बड़ा ही सुदृढ़ सेतु बहुत लम्बे समय से विद्यमान रहा है। आज हम जिस सभ्यता के अनुवर्ती होकर इतरा रहे हैं, उसने इस सेतु को ही ध्वस्त करके धराशायी बना दिया है।

हमारे समय में आदमियों की अपार भीड़ में आदमी अकेला और असहाय होकर उद्भ्रान्त-सा बाजार के बीच में भागता हुआ दिखाई दे रहा है। आदमी के पास अपनी बस केवल प्यास है। बाकी सब कुछ पानी है। आदमी के पास अपनी बस केवल भूख है, बाकी जो कुछ है, सब भोजन है। केवल प्यास का बचे रह जाना और पानी का गायब हो जाना मनुष्य जाति का कितना भयावह दुर्भाग्य है, कह कहना बड़ा कठिन है। केवल भूख का बचे रह जाना और भोजन का नदारद हो जाना कैसी भीषण विडम्बना है, कौन कह सकता है। प्यासा आदमी, भूखा आदमी, भला किस काम का आदमी है! किसके काम का आदमी है? नहीं किसी के काम का नहीं है। न अपने काम का, न दूसरों के काम का। न किसी प्राणी के काम का, न प्रकृति के काम का। न इतिहास के काम का, न वर्तमान के काम का।

पुराना बिल्कुल बेकाम नहीं होता। निरा व्यर्थ नहीं होता। हर नया पुराने से ही निकलता है। हमारी संस्कृति पुरानी है। उसका मूल्य पुराना होने में ही है। आज की हमारी जड़ विहीन सभ्यता में जो पुराने के प्रति उपेक्षा और अवमानना का भाव विकसित हुआ है, वह हमारी संस्कृति को आहत करने वाला है। उससे हमारी संस्कृति के क्षरण का संकट जन्म ले रहा है। हमारे समय में पुराने आदमी की उपेक्षा, पुराने रिश्तों की उपेक्षा, पुराने परीक्षित विश्वासों की उपेक्षा हमें आगे ले जाने में सहायक नहीं है। जब भी कोई राष्ट्र अपनी संस्कृति को अभिसिंचित करने वाली अपनी पारंपरिक सभ्यता का परित्याग करके दूसरी जातियों की सभ्यता को अंगीकार करने के आकर्षण में उतावला होता है, उसकी संस्कृति का ध्वंस शुरू हो जाता है। भारतीय संस्कृति के केंद्र में त्याग है। यह संस्कृति भोग की विरोधी नहीं है। ऐश्वर्य की विरोधी नहीं है। भोग के गहरे अर्थ और प्रयोजन को हमारी संस्कृति ने अच्छी तरह से जाना है। जानकर उसे जीवन में प्रतिष्ठित किया है। भोग और ऐश्वर्य हमारे जीवन की परिधि है। वह हमारे जीवन में परिधि पर है। हमारी परिधि के विस्तार में भोग है, ऐश्वर्य है। खूब है। प्रकाशित है। पल्लवित है। फलित है। मगर उसका केन्द्र त्याग है। त्यागपूर्वक भोग हमारी संस्कृति का प्राण है। आज पश्चिम की सभ्यता के व्यामोह ने हमें हमारे जीवन के केन्द्र से काट दिया है। अपने केन्द्र से विच्युत होकर हमारे समय में आदमी टहनी से टूटे हुए पत्ते की तरह परिधि में उड़ रहा है। हवा में उधरा रहा है। आदमी का अपदार्थ हो जाना किसी के लिए भी ठीक नहीं है। न आदमी के लिए, न समय के लिए, न समाज के लिए, न राष्ट्र के लिए। मनुष्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। भारतीय संस्कृति इसीलिए श्रेष्ठ संस्कृति है कि उसमें साध्य मनुष्य है। उसमें साध्य मनुष्य का जीवन है। बाकी जो कुछ भी है, वह सब मनुष्य के जीवन के उत्कर्ष के लिए है। मनुष्य के सारे उत्पाद मनुष्य जीवन और समाज की अभ्युन्नति के साधन हैं। भारतीय समाज व्यक्ति में सन्निहित सामूहिक विराट अस्मिता की उपासना का समाज है। हमारी संस्कृति ने ऐसे समाज को निर्मित किया है, जिसमें एक में अनेक और अनेक में एक के समाहित होने की अद्भुत धारणा का प्रकाश है। हमारी संस्कृति एक बचन में समाहित बहुवचन की संस्कृति है। हमारी संस्कृति विराट संस्कृति है। हमारी संस्कृति विराट बोध की संस्कृति है। हमारी संस्कृति प्यास के शमन के लिए पानी के कुँए खोदने की संस्कृति है।

हमारी संस्कृति का आधार व्यक्ति नहीं है। हमारी संस्कृति का आधार धर्म है। धर्म व्यक्ति में समाहित विराट अस्मिता का संधान है। हमारी संस्कृति के मूल में व्यक्ति नहीं है, समूह है। वैयक्तिकता नहीं है, सामूहिकता है। यह अत्यन्त संश्लिष्ट संस्कृति है। भारतीय संस्कृति व्यक्ति की संस्कृति नहीं है। समाज की संस्कृति नहीं है। यह समष्टि की संस्कृति है। यह व्यष्टि में सन्निहित समष्टि और समष्टि में समाहित व्यष्टि की अद्भुत संस्कृति है। यह संस्कृति भेद में अभेद की प्रतिष्ठा की संस्कृति है। यह संस्कृति अर्जन की नहीं, विसर्जन की संस्कृति है। यहाँ व्यक्ति नहीं रह जाता। व्यक्ति मिट जाता है। सबमें समाहित, सबकुछ में समाहित व्यक्ति की विराटता रह जाती है। अस्तित्व की विराटता की उपासना भारतीय संस्कृति की अमूल्य उपस्थापना है। इस संस्कृति के मूल में महत्तम अद्वैत जीवन बोध की मार्मिक अभिव्यंजना है। यह बोध ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की महनीय धारणा को वास्तविक आधार प्रदान करने वाला है। हमारी पारंपरिक सभ्यता इस संस्कृति के मूल्यों को अभिव्यंजित करने वाली सभ्यता है। उसे आचरण में व्यवहृत करके अपनी संस्कृति को पोषण भी प्रदान करती है और उसकी प्राणधारा को जीवन में प्रवाहित करने का माध्यम भी बनती है।
भारतीय सभ्यता के समक्ष जो पश्चिमी सभ्यता है, वह इसके विपरीत विश्वासों की सभ्यता है। इस सभ्यता को बौद्धिक जगत आधुनिक सभ्यता के नाम से अभिहित करता है। जिस सभ्यता को अपनाने के लिए भारतीय बौद्धिक वर्ग जो अपने वर्चस्व का आकांक्षी है, व्यक्ति केन्द्रित सभ्यता है। इस सभ्यता के केन्द्र में मनुष्य नहीं है। मनुष्यजाति नहीं है। केवल व्यक्ति है। व्यक्ति जो अस्तित्व की क्षुद्रतम इकाई है। इसमें क्षुद्रतम इकाई के श्रेष्ठता बोध का अमानवीय दम्भ है। यह दम्भ की पोषक सभ्यता है। यह सभ्यता मनुष्य विरोधी सभ्यता है। यह व्यापक मानवीय बोध का दलन करके व्यक्ति के निजी हित की साधक सभ्यता है। यह व्यक्ति की सामर्थ्य को साधनों के सहारे विकसित करने की उपासक सभ्यता है। यह सभ्यता व्यापारिक सभ्यता है।

जीवन कोई व्यापार की चीज है, क्या? जीवन कोई घाटा और मुनाफा से बढ़ने और घटने वाली चीज है, क्या? नहीं, नहीं ऐसा नहीं है। ऐसी समझ तो बड़ी घटिया समझ है। यह समझ मनुष्य जीवन की गरिमा के लिए साधनों पर आधारित और अवलम्बित नहीं होती। सभ्यता का आधाार तो मनुष्य का जीवन है। सभ्यता का निमित्त तो मनुष्य जाति के जीवन को सजाना है। उसे सँवारना है। मनुष्य के जीवन का उत्कर्ष मनुष्यजाति के जीवन के उत्कर्ष से पृथक और भिन्न कभी नहीं हो सकता। मनुष्य की महत्ता हमेशा ही मनुष्य जाति के लिए उसके प्रदेयों पर ही निर्भर करती है।

आधुनिक सभ्यता साधनों को अधिक महत्व देकर मनुष्य की आत्मशक्ति को कमजोर बनाती है। उसे साधनों पर अवलम्बित रखकर पराश्रिता के भावबोध को प्रछन्न रूप से विकसित करती है। इस तरह से यह मनुष्य में पौरुष और साहस का ह्रास करती है। वैयक्तिक स्वतंत्रता के आग्रह को उकसाकर सामाजिक पारस्परिकता के मूल्य को ध्वस्त करती है। पारस्परिक सद्भाव से वंचित होकर इस सभ्यता में आदमी धीरे-धीरे अकेला और असहाय होने को अभिशप्त हो जाता है। सामूहिक संवेदना के उच्छिन्न होने से प्रतिरोध की शक्ति क्षय हो जाती है।

आधुनिक सभ्यता के केन्द्र में समाज नहीं है, व्यक्ति है। सामूहिकता नहीं है, वैयक्तिकता है। सार्वजनिकता नहीं है, निजता है। विराटता नहीं है, क्षुद्रता है। उदात्तता नहीं है, संकीर्णता है। समर्पण नहीं है, स्वामित्व है। त्याग नहीं है, भोग है। विसर्जन नहीं है, अर्जन है। अधिकार का, ऐश्वर्य का, भोग का निजीकरण है। प्रकृति को पराधीन बनाने का अपार उद्योग है। महान अस्तित्व की तमाम इकाईयों और घटकों पर स्वामित्व स्थापित करने की उद्दआम वांछा है। आधुनिक सभ्यता का कोई केन्द्र नहीं है। यह सभ्यता परिधि की सभ्यता है। अल्पजीवी सभ्यता है। प्रभुत्व की लोलुप सभ्यता है। यह सभ्यता प्रदर्शन की सभ्यता है। यह सभ्यता परदा की सभ्यता है। यह सभ्यता दोगली सभ्यता है। इसके दो-दो गाल हैं। यह गाल बजाने की सभ्यता है। यह आँख दिखाने की सभ्यता है। बहुत कुछ को छिपाना और बहुत कुछ को दिखाना इस सभ्यता का दोहरा मूल्य है। दूसरों को छोटा साबित करने के लिए प्रदर्शन और अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए अपनी तुच्छता का छिपाव इस सभ्यता की क्रूरता को उद्घाटित करता है। व्यक्ति की श्रेष्ठता का दम्भ आधुनिक सभ्यता का वह ओछा चरित्र है जो सामूहिक मनुष्यता के उदार ऐश्वर्य को पददलित करता है। यह वैश्विक सामुदायिक मनुष्य और व्यापक मनुष्यता के उदात्त मूल्य को विखण्डित करके उसका दलन करता है और व्यक्तियों के छोटे-छोटे समूह की उच्चता को प्रतिष्ठित करता है। शासक और शासित के अमानवीय विभाजन को गरिमामण्डित करता है।

भारतीय सभ्यता उदात्त जीवनबोध की सभ्यता है। यह सभ्यता पानी का कुँआ खोदने की विश्वासी सभ्यता है। हम प्यास बुझाने के लिए पानी का संधान करने का विश्वास न जाने कबसे बनाए रखे हुए हैं। पानी के लिए हम कुँआ बनाते रहे हैं। हमारे कुँए पीढ़ियों की प्यास बुझाने के लिए सक्षम होते आए हैं। आज जिस सभ्यता को हम सिर पर लादे दौड़ रहे हैं, वह पानी की नहीं प्यास की सभ्यता है। इस सभ्यता में आँखों में पानी नहीं है, प्यास है। यह सभ्यता प्यास का कुँआ खोदने की अन्धी सभ्यता है। यह सभ्यता सुख की ताजगी की उपासक सभ्यता नहीं है। यह सुख का भण्डारण करने वाली सभ्यता है। यह नहीं जानती कि भण्डारण करने से चीजें बासी हो जाती है। यह सभ्यता बासी सुख के उपभोग की अभागी सभ्यता है। जीवन प्यास के उन्माद में नहीं है। जीवन परितोष की पुलक में समाहित है। हमारी परंपरा की आराधना परितोष के पुलक की आराधना है।

सुख में डूब जाने की उद्दाम अतृप्ति आधुनिक सभ्यता का आदर्श है। सुख में डूब कर मर जाने की दुर्दान्त नियति को स्वीकार करके सुख को बचा लेने का उद्योग आधुनिक सभ्यता का अपनाउद्योग है। सुख को बलिदान करके मनुष्य जीवन की गरिमा को बनाए और बचाए रखने का आदर्श भारतीय सभ्यता के आदर्श की गरिमा है। हमारी सभ्यता मनुष्य जीवन के गौरव के निरन्तर उत्कर्ष की आराधना की सभ्यता है।

-Young Writer

Chandauli वृद्धाश्रम में धूमधाम से मना नाबार्ड का स्थापना दिवस

नाबार्ड के स्थापना दिवस कार्यक्रम में मौजूद स्थापना दिवस।
नाबार्ड के स्थापना दिवस कार्यक्रम में मौजूद स्थापना दिवस।

Young Writer, चंदौली। नाबार्ड का 42वां स्थापना दिवस गुरुवार को चंदौली स्थित वृद्धाश्रम में धूमधाम के साथ मनाया गया। इस दौरान डीडीएम नाबार्ड तनुज कुमार सेन ने आश्रम में मौजूद वृद्धजनों में फल, मिठाईयां, बिस्कुट, केक, मट्ठा बांटकर खुशियां साझा की। इसके साथ ही उनका हाल-चाल भी जाना। इसके अलावा उनसे संवाद स्थापित कर अपनी संवेदना व्यक्त की और उनके सुख-दुख को बांटा। साथ ही वृद्धजनों से दीर्घायु होने का आशीर्वाद प्राप्त किया।
इस दौरान उन्होंने नाबार्ड की स्थापना के बारे में संक्षिप्त बातें रखी और नाबार्ड की स्थापना की खुशियां वृद्धजनों के बीच साझा की। कहा कि वृद्धाश्रम में रहने वाले वृद्धजन को हमारे साथ व स्नेह की जरूरत है, वहीं हम भी उनके आशीर्वाद के आकांक्षी है। खुशियों के ऐसे अवसर को हमें ऐसे ही स्थान पर सृजन करना चाहिए, ताकि इसकी महत्ता और अधिक बढ़ जाए। इस कार्य में वृद्धा आश्रम केन्द्र संचालक आकाश कुमार, केएन राय, रामचन्द्र तथा अन्य समाजसेवी उपस्थित रहे।

Digital: मोबाइल ऐप से टीकाकरण और गोल्डेन कार्ड बनाएगी आशा कार्यकत्री

मोबाइल ऐप से टीकाकरण और गोल्डेन कार्ड बनाएगी आशा कार्यकत्री

Young Writer, सकलडीहा‚ चंदौली। प्रसव से पूर्व और प्रसव के बाद महिलाओं की विभिन्न प्रकार की जांच व बच्चों का टीकाकरण ऑनलाइन होगा। इसके लिये आशा कार्यकत्री मोबाइल ऐप के माध्यम से हर जच्चा और बच्चा का डाटा फिडिंग व निगरानी रखेंगी। इस पहल से बच्चों का समय से टीकाकरण और महिलाओं का समय से प्रसव की सुविधा प्राप्त होगा। इसके साथ ही आशा कार्यत्रियों द्वारा गोल्डेन कार्ड भी बनाया जायेगा। गुरूवार को दो दर्जन से अधिक आशा व संजनी को मोबाइल वितरण किया गया। मोबाइल मिलने से रजिस्टर लेकर घूमने से आशाओं को निजात मिल जोयगा।

सकलडीहा सीएचसी पर 286 आशा कार्यकत्री कार्यरत है। प्रत्येक आशा कार्यकत्री मिशन इन्द्रधनुश कार्यक्रम के तहत गर्भवती महिलाओं व छह वर्ष तक के बच्चों का पंजीकरण,एचआरपी हाई रिक्स प्रेगनेंसी, बच्चों का टीकाकरण, प्रसव और संस्थागत प्रसव सहित अन्य कार्य ई कवज पोर्टल पर दर्ज करेंगी। इससे जच्चा बच्चा को समय से टीकाकरण सहित प्रसव की सुविधा आसानी से प्राप्त होगा। इसके साथ ही आशा कार्यकत्री प्रधानमंत्री आयुष्मान योजना के तहत लाभार्थियों का गोल्डेन कार्ड भी बनायेगी। इस बाबत सीएचसी अधीक्षक डा. संजय यादव ने बताया कि मोबाइल ऐप के माध्यम से आशा कार्यकत्री जच्चा बच्चा का समय से टीकाकरण सहित अन्य सुविधा का लाभ दिलाने में सहयेाग करेंगी। इस मौके पर एचईओ रजनीकांत राय,शाहिद आलम अंसारी सहित अन्य आशा मौजदू रहे।

हस्तिनापुर एक्सटेंशन : कस्मै देवाय हविषा विधेम

हस्तिनापुर एक्सटेंशन
हस्तिनापुर एक्सटेंशन


Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह, HASTINAPUR EXTENTION

हस्तिनापुर एक्सटेंशन : मनुष्य की जिज्ञासा हमेशा से, हमेशा के लिये पूर्णता की जिज्ञासा है। जिज्ञासा ही खोज में प्र्रवृत्त करती है। मनुष्य की खोज पूर्णता को पाने की खोज है। मनुष्य की अभीप्सा परिपूर्ण होने की अभीप्सा है। वह भर जाना चाहता है। वह तृप्त हो लेना चाहता है। वह आनन्द चाहता है। सारी इच्छाओं का मूल पूर्णता है। मगर मूल दिखाई नहीं देता। जड़ कहाँ दिखाई देती है? वह तो धँसी है। बिल्कुल अन्दर। अस्तित्व की आन्तरिक सतह में जड़ धँसी है। बाहर विस्तार है। विस्तार दिखाई देता है। मूल नहीं दिखाई देता। विस्तार मूल को ढँक देता है। बड़ा विचित्र है। मगर सच है। जीवन बड़ा विचित्र है।

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Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

जीवन का मूल क्या है? कुछ नहीं। जीवन का मूल जीवन ही है। जीवन से हटकर जब हम जीवन के मूल को तलाशने लगते हैं, तो उससे विमुख हो उठते हैं। चाहे हमारी तलाश ईश्वर के लिये हो, चाहे धर्म के लिये हो, चाहे तत्व के लिये हो। ईश्वर जीवन में ही है। धर्म जीवन में ही है। तत्व जीवन में ही है। हम भूल जाते हैं कि विस्तार भी मूल का ही है। बिना मूल के कोई विस्तार संभव नहीं है। बिना जड़ के कोई पेड़ हो ही नहीं सकता।
मूल सच है। मगर विस्तार झूठ नहीं है। जड़ सच है, मगर पेड़ भी सच है। तना, शाखा, टहनी, पत्ते, फूल, फल, बीज सब सच हैं। सच से झूठ का जनमता विश्वसनीय नहीं है। हम सच को खोजने चलते हैं और झूठ में उलझ कर रह जाते हैं।
कौन उलझाता है, हमें झूठ में? झूठ है नहीं और उसमें उलझे हैं हम। हमें उलझाती हैं, शास्त्रों की गलत समझ। बिना कुछ समझे, समझाने का लोलुप व्यापार। व्यापार का प्रसार। व्यापार का प्रचार। प्रचार का विज्ञापन। आदमी को अपना अनुगत बनाने की, अनुचर बनाने की दुर्ललित लालसा। हमें उमझाता है, विस्तार को मूल से भिन्न और झूठ बताने का झूठ। समूचे वृक्ष में जड़ से उत्प्रेरित ऊर्जा संचरित है। पत्ता-पत्ता जड़ से पोषित है।

हमारे शास्त्र, जिसे हमारे मनीषियों ने रचा है, उसमें जिज्ञासा है, खोज है, उपलब्धियाँ हैं। जिज्ञासा के बड़े गहरे स्रोत हैं। खोज की उत्कट उत्प्रेरणा है। उपलब्धियों का अपूर्व तोष है।
जिज्ञासा है, – कस्मै देवाय…? कस्मै देवाय हविषा विधेम।’’ किस देवता के लिए? हम यजन किस देवता के लिए करें? देवता कौन है? देने वाला कौन है? क्या देने वाला है? यज्ञ किसलिये करना है?
क्या देने वाला है? यज्ञ किसलिये करना है?
खोज है,- ‘‘आत्मने मोक्षार्थ जगत हिताय च’’। हमारी खोज स्वयं के मुक्त होने की खोज है। जगत के कल्याण की, जगत केक हित साधन की खोज है।
मुक्ति की खोज असीमता के बोध की खोज है। अस्तित्व असीम है। जगत असीम है। बिना मुक्त हुए जगत का हित साधन संभव नहीं।

उपलब्धि है, -‘रसो वै सः’ वह ही रस है। रस ही वह है। रस ही जीवन है। रस ही जगत है। रस ही पूर्ण है। रस ही सब कहीं परिपूर्ण है। रस को ही अवशोषित करके मूल पत्ता-पत्ता में पहुँचा रहा है। डाल-डाल, पात-पात सब रस से आप्लुत है।
बड़ा आश्चर्यजनक है कि धर्म जिस रूप में हमारे जनजीवन में प्रचारित है, वह धर्म नहीं है। धर्म का धोखा है। हमारे समाज में धर्म का जो स्वरूप व्यवहार में है, वह भय को पैदा करने वाला है। अभय को प्रदान करने वाला धर्म भय को पैदा करने वाला कैसे है? कैसे हो गया है? किसने भय को बढ़ाने वाले व्यवहार को धर्म की शक्ल में खड़ा किया है। पुण्य के लोभ का प्रवर्तन वाला धर्म किसने बनाया है? मृत्यु में, शादी-विवाह में, जन्म-कर्म में तमाम मौकों पर ऐसा-ऐसा, ऐसे-ऐसे नहीं करोगे तो धर्म से च्युत हो जाओगे? दान दोगे तो पुण्य कमाओगे। पुण्य से ऐश्वर्य को प्राप्त करोगे। क्या समृद्धि को, ऐश्यवर्य को, वैभव को पाने का साधन ही धर्म नहीं है। धन क्या समृद्धि को, ऐश्वर्य को, वैभव को पाने का साधन ही धर्म नहीं है। धन-वैभव को प्राप्त करने के साधन और भी हैं। यह कौन-सा धर्म है? कैसा धर्म है? किसका धर्म है?

नहीं, ऐसा वेदों में नहीं है। उपनिषदों में नहीं है। रामायण में नहीं है। महाभारत में नहीं है। महाकाव्यों में नहीं है। बुद्धवाणी में नहीं है। महावीर चरित में नहीं है। फिर भी है। गाँव-गाँव में है। घर-घर में है। जन-जन में है।ै आदमी को कमजोर बनाने वाला धर्म, लालची बनाने वाला धर्म, कायर बनाने वाला धर्म, डरपोक बनाने वाला धर्म, स्वार्थी बनाने वाला धर्म, अन्धा बनाने वाला धर्म हर कहीं है।
धर्म के नाम पर हम इतने डरे हुए हैं कि कुछ कहने लायक नहीं। हमें डर है कि हम बलवान हो जायेंगे तो धर्म से वंचित हो जायेंगे। हमें डर है कि हम धनवान हो जायेंगे तो धर्म से विमुख हो जायेंगे। हमें डर है कि हम सुंदर दिखेंगे तो धर्म से पतित हो जायेंगे। हमें डर है कि हम बुद्धिमान हो जायेंगे तो धर्म से भ्रष्ट हो जायेंगे। राम, राम। यह भी कोई धर्म है। धर्म न हुआ, डर की दुकान हो गया। हर किसिम का डर यहाँ उपलब्ध है। मन्दिर जाओ तो डरे हुए जाओ। कोई अशुद्धता न हो जाय। कोई त्रुटि न हो जाय। कुफल न मिल जाय। मंदिर जाओ तो माँगने के लिए जाओ। बिना उचित कीमत चुकाये सब कुछ पाने के लिए देवता से कृपा की भीख माँगने जाओ। भक्ति को भिखमंगई का धन्ध बनाने का जवाबदेह कौन है?
जबाबदेह चाहे जो हो, धन्धा हम सभी कर रहे हैं। इस काले धन्धे में हम सब लिप्त हैं। इतने लिप्त हैं कि इसके बारे में सोचने का हमें अवकाश ही नहीं है।

कितना अजीब है, वैतरणी में रहने वाले लोग वैतरणी में गिरने के डर से धर्म का पालन करते है। नरक के दुखों को भोगने वाले लोग नरक में जाने के डर से धर्म का पालन करते हैं। गाय की पूँछ पकड़कर स्वर्ग में पहुँचने की लालच में धर्म का पालन करते हैं। यह पता नहीं कैसा धर्म है। धर्म की शक्ल में पता नहीं क्या है? हमारे तो पूर्वजों की पूजा की पीठिका ही बिल्कुल भिन्न है-

ऊँ पूर्णमदः पूर्ण मिदमं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवाव शिष्यते।।

यहाँ सच और झूठ का। सत्य और मिथ्या का। मूल और विस्तार का विभेद नहीं है। खण्डों की आराधना नहीं है। अखण्ड का, असीम का स्तवन का। असीमता की, पूर्णता की स्तुति है। वह भी पूर्ण है। यह भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण उत्पन्न हुआ है। सत्य में से सत्य अविभूर्त हुआ है। पूरे में से पूरा निकाल लेने के बाद भी पूरा बचा रह जाता है।
हमारी परंपरा में हमारी प्रार्थना सब कुछ को पाने की प्रार्थना है। हमारी प्रार्थना खण्ड को नहीं, खण्डित को नहीं, पूर्ण को पाने की प्रार्थना है। सब कुछ मिलकर पूर्ण होता है। पूर्ण में सबकुछ होता है। सबकुछ में सब है, तेज है, बल है बुद्धि है, वीर्य है, ओज है, धन है। जीवन में यह सब है। इस सबमें जीवन है, इसलिये प्रार्थना है, कि-

तेजोऽसि तेजो मयि धेहि। बलमसि बलं मयि धेहि। वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि……।

जीवन में तेज हो, प्रकाश हो, प्रभा हो, दीप्ति हो। बल हो। वीर्य हो। बुद्धि हो। धन हो। ऐश्वर्य हो। सब हो। सब होगा तो जीवन पूर्ण होगा। जीवन में सब हो- धर्मार्थ काम मोक्षाणाम्।
जीवन में धर्म की प्रतिष्ठा हो, अर्थ की प्रतिष्ठा हो, काम की प्रतिष्ठा हो, मोक्ष की प्रतिष्ठा हो, तो जीवन पूर्ण होगा। केवल धर्म जीवन को पूर्ण बनाने के लिये पर्याप्त नहीं है। धर्म निरीह बनाने के लिये नहीं है। सबल बनाने के लिये है। समर्थ बनाने के लिये है। अर्थ, धर्म का विरोधी नहीं है। सहायक है। सहचर है। काम, धर्म का नाशक नहीं है। काम, धर्म का विलोम नहीं है। प्रकृति की मूलशक्ति का निदर्शन है। काम जीवन के विस्तार का वाच्यार्थ है। और मोक्ष? मोक्ष में ही जीवन है। जीवन की पूर्णता का बोध है। सीमा पूर्ण नहीं है। असीमता पूर्ण है। पूर्णता का बोाध ही मुक्ति है। असीमता ही अविनाशी है। अस्तित्व के अविनाश का बोध ही मोक्ष है।

जीवन, मुक्त है। बँधा नहीं है। जो चीज हमें मुक्त होने की तरफ ले जाती है, जीवन की तरफ ले जाती है। जीवन कीतरफ ले जाने वालाा रास्ता ही हमारे लिये वरेण्य है। इसलिये प्रश्न है,- कस्मै देवाय? किस देवता के लिए?
कौन है, जो हमारे जीवन को पूर्ण बनाने में, परिपूर्ण बनाने में सहायक है। जीवन की पूर्णता की आराधना ही, हमारी आराधना है।
जीवन केवल धर्म में पूर्ण नहीं है। केवल अर्थ में पूर्ण नहीं है। केवल काम में पूर्ण नहीं है। केवल मोक्ष में पूर्ण नहीं है। वह सबमें है। सबमें होकर पूर्ण है।
पता नहीं किसने, धर्म की श्रेष्ठता सुनिश्चित करने के लिये धन से उदासीन होने का विचार प्रसारित कर दिया। पता नहीं किसने मोक्ष की महिमा बताने के लिये काम से दूर रहने का उपदेश प्रचारित कर दिया। यह मनीषियों का नहीं, पाखण्डियों का पाण्डित्य है। खण्ड की आराधना पाखण्ड है।

हमारे मनीषियों ने शास्त्रों में ऐसा नहीं कहा है। धन की निन्दा धर्म नहीं है। धनिकों का निरस्कार धर्म नहीं है। धन निन्दनीय नहीं है। धर्म विहीन धन निन्दनीय है। काम तिरस्करणीय नहीं है, धर्म और धन से रहित काम, विमुख काम रिस्करणीय है। खण्ड की उपासना, खण्डित जीवन की उपासना मनुष्य के लिय मंगल विधायक नहीं है। पूर्ण की उपासना, जीवन में, जीवन के लिये मंगलकारी है।
हमें उस देवता के लिये यजन करना है, जिसके प्रसन्न होने से पर्जन्य पानी बरसते हैं। पानी बरसने से शस्य की वृद्धि होती है। शस्य से अन्न उपजता है। अनन्न से प्राणियों का, प्राणों का पोषण होता है। जो हमारी वनस्पतियों की रक्षा करता है। वृक्षें की रक्षा करता है। हमारे पशुओं की रक्षा करता है। जो हमारे वाक् को, श्रोत को, स्पर्श को, जाग्रत रखता है। प्राणों को पुष्ट करता है। जो हमें, पूर्ण के बोध की ओर उन्मुख करता है, उत्प्रेरित करता है, हमें उसकी उपासना करनी है। वही हमारा उपास्य है। हमें उसकी उपासना करनी है, जिसमें समूचा अस्तित्व समाहित है। हमारी उपासना अस्तित्व में समाहित होने की उपासना है। समूचे जीवन जगत की एकता की, एकरूपता की उपासना हमारी आराधना का, हमारी प्रार्थना का मूल है। यही हमारी प्राप्ति का आधार है।

मगर कहीं, न कहीं बड़ी भारी गड़बड़ है। गड़बड़ यह है कि धर्म की शक्ल में जिस धोखे को खड़ा किया गया है, हम सारी शक्ति लगाकर भी उसे इंकार नहीं कर पा रहे हैं। विचार के धरातल पर उसे झूठ समझकर भी व्यवहार में उसके आगे आत्मसमर्पण को विवश हो जाते हैं। यही विवशता मनुष्य जाति की दारुण नियति है। झूठ के प्रभाव में, झूठ के आतंक में, झूठ के समर्थन में बहुमत का होना हमारे जीवन की सबसे जटिल समस्या है। व्यापक जनजीवन में प्रचारित धर्म, धर्म जैसा क्यों नहीं है? हमारा धर्म, हमें डरपोक बनाता है। दयनीय बनाता है। निरीह बनाता है। निर्धन बनाता है। निष्काम बनाता है। कर्महीन बनाता है। लोभी बनाता है। स्वार्थी बनाता है। दँतनिपोर बनाता है। याचक बनाता है। यह सब भला धर्म का काम है? नहीं, नहीं, कत्तई है।

धर्म तो सत्य का अवबोध कराता है। सचाई के सामने आँख मिलाकर खड़ा होने का साहस देता है। पूर्णता के प्रत्यय को आत्मसात करने का उन्मुख करता है। सबमें अपने को, और अपने में सबको,- सबकुछ को अनुभव करने की सामर्थ्य देता है। धर्म अर्थ का सम्मान है। काम का समादर है। मोक्ष की प्रशस्ति है। धर्म सुख का विस्तार है। धर्म विस्तार का अभिनन्दन है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सभी विस्तार की अभ्यर्थना के माध्यम हैं। हमें विस्तार में ले जाकर असीमता के मर्म का उद्घाटन करते हैं। सौन्दर्य की उपासना का और प्रेम की पूजा का हमें मंत्र देते हैं। विस्तार में ही, विस्तृत हो लेने में ही सुख की स्थिरता है। आनन्द की स्थिति है।

‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वेसन्तु निरामयाा
‘‘सर्वे भद्राािण पश्यन्तु मा कश्चिद दुख भाग भवेत्।।’’

यह महानता के विचार का मंत्र नहीं है। यह सचाई के अनुभव का शंखघोष है। यह अस्तित्व के अवबोध की उद्घोषणा है। धर्म व्यक्ति पर अवलम्बित होने के लिये नहीं है। व्यक्ति धर्म में समाहित होने के लिये है। धर्म, जीवन में समाहित होने के लिये है। धर्म, व्यक्ति अस्मिता के सामूहिक अस्मिता में विलयन की अभिक्रिया का नाम है। वैयक्ति इयत्ताएँ जहाँ सामूहिक इयत्ता में विसर्जित होती हैं, वहीं धर्म की स्थिति है। वहीं धर्म की ध्वनि है। वहीं धर्म का प्रकाश है। धर्म का प्रकाश ही धन का गौरव है। काम की कीर्ति है। मुक्ति की महिमा है। सभी सुखी हों, यह मुक्ति की महिमा का ही उद्घोष है।
कौन है? कौन है वह, जो हमें धर्म से संयुक्त करेगा। धन से अभिबृद्ध करेगा। काम से परितुष्ट करेगा। मुक्ति के महत बोध से पूर्ण करेगा। वह कौन देवता है?

‘‘मातृ देवो भव…’’ जो तुम्हारे अस्तित्व की प्रसूता माता है; देवता है।
‘‘पितृ देवो भव….’’ पिता, जो तुम्हारी अस्मिता का स्थापक है, देवता है।
‘‘आचार्य देवो भव….’’ तुम्हारी अस्मिता का प्रकाशक, आचार्य देतवा है।

तुम्हारे अलावा जो कुछ है, उदसमें भी तुम्ही हो, इस प्रकाश का प्रबोध करने वाला आचार्य, देवता है।
‘‘अतिथि देवो भव…’’ जो स्वयं चलकर तुम्हारे पास आता है, तुम्हारे साथ रहता है, वह अनुभव, देवता है।
साथ रहता है, वह अनुभव, देवता है।
जो अस्तित्व का संस्थापक है, पिता है, देवता है। जो अस्तित्व की उद्घाटक है, माता है, देवता है। जो अस्तित्व का प्रकाशक है, आचार्य है। जो अपने को ही भेदकर अपने में आता है, अतिथि है, अनुभव के स्वरूप में, देवता है।
देवता की पूजा करो। देवता का यजन करो। हमारा यजन अस्तित्व का अस्तित्व में यजन है। अपनी समस्त वैयक्तिकता का सार्वजनिकता में, सार्वभौमिकता में यजन यज्ञ है। अपने अस्तित्व में अपने धर्म की आहुति, अपने धन की आहुति, अपने काम ही आहुति, मुक्ति में फलित होती है।

मुक्ति के फलित होते ही सबकुछ फलित हो उठता है। जीवन फलित हो जाता है। पूर्णता फलित हो जाती है। असीमता फलित हो जाती है। रस फलित हो जाता है। अमरत्व फलित हो जाता है। सब अपनाहो जाता है। अपनत्व का असीम विस्तार घटित हो उठता है,- वसुधैव कुटुम्बकम्। सारी पृथ्वी में सब अपना ही है। अपना ही विस्तार है। अपना ही परिवार है।
पूर्णता का बोध ही, जीवन है। जीवन का मकसद है। जीवन का अर्थ है। जीवन की व्यंजना है।
यही हमारी पूजा है। यही हमारी प्रार्थना है। यही हमारा यज्ञ है। यही हमारा यजन है।

किस देवता के लिये?
किस देवता के लिये हम हवि डालें?
जीवन देतवा के लिये।
पूर्णता के देवता के लिये। पूर्ण देवता के लिये।

हमारी जिज्ञासा पूर्णता की जिज्ञासा है। हमारी खोज पूर्णता की खोज है। हमारी प्राप्ति, पूर्णता की प्राप्ति है। हमारी उपलब्धि, पूर्णता की उपलब्धि है। हम खण्ड के उपासक हभी नहीं रहे है। हम टुकड़खोर जाति के उत्तराधिकारी नहीं है। हमारी विरासत पूर्ण की विरासत है। परिपूर्ण की विरासत है। हमारी विरासत पूर्ण की प्रतिपादक विरासत है।

-Young Writer

Chandauli: नहर में डूबने से बालक की मौत, परिजनों में मचा कोहराम


दोस्तो के साथ जसुरी नहर में नहाने गया था अरमान तेज़ बहाव के कारण डूबने से मौत
चंदौली सदर कोतवाली क्षेत्र के नेगुरा गांव के समीप बुधवार को नहर में 13 वर्षीय बालक को पानी में बहता देख ग्रामीणों ने हड़कंप मच गया। मौके पर जुटे आस पास के ग्रामीणों ने तत्काल नहर में कूदकर बालक को बाहर निकाला और इलाज़ के लिए जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया जहा चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। वही मौत की खबर सुनते ही परिजनों में कोहराम मच गया। परिजन रोते बिलखते पोस्टमार्टम हाउस पहुच गए।
बताते हैं कि बबुरी रोड वार्ड नंबर 9 लोहिया नगर निवासी गुलाम मुहम्मद (उर्फ गामा) का पुत्र अरमान अली 13 वर्ष अपने दोस्तों के साथ जसुरी नहर में नहाने गया था। इसी दौरान नहर में पानी का बहाव तेज़ होने के कारण वो बहने लगा। और नेगुरा गांव के समीप पहुच गया। ग्रामीणों की नजर जब बालक पर पड़ी तो ग्रामीणों में हड़कंप मच गया। लोगो ने किसी तरह नहर में कूद कर बालक को बाहर निकाला और तत्काल जिला अस्पताल में भर्ती कराया जहा चिकित्सकों ने उसे इलाज के दौरान मृत घोषित कर दिया। इस बाबत सदर कोतवाल राजीव कुमार सिंह ने बताया कि अरमान दो दोस्तों के साथ जसुरी गांव ने नहाने गया था उसी दौरान गहरे पानी मे डूब गया। और उसकी मौत हो गयी। शव को कब्जे में कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। आगे की कार्यवाही की जा रही है।
इनसेट…….
दो भाइयों में सबसे बड़ा था अरमान
चंदौली। अरमान की मौत से उसकी माँ का रो-रो कर बुरा हाल है। भीगी पलको से बस एक टक अपने बेटे अरमान के घर आने का इंतज़ार कर रही है। और बेसुध बेहोश हो जा रही थी। साथ ही दोनों भाई अयान व आदिल का भी रो कर बुरा हाल है। पिता गुलाम मुहम्मद बेटे की सदमे से उभर नही पा रहे हैं। अरमान की मौत से पूरे घर मे मातम छा गया है।

Chandauli:पुलिस ने तीन अंतर्राज्यीय गांजा तस्कर को दबोचा, 46 किलो गांजा बरामद

चंदौली। सैयदराजा पुलिस को चेकिंग के दौरान  बड़ी सफलता हाथ लगी पुलिस ने बुधवार को मुखबिर की सूचना पर नौबतपुर पुलिस बूथ के पास कार से गांजा तस्करी करने जा रहे तीन अंतर्राज्यीय गांजा तस्कर को धर दबोचा जिनके पास से 46.250 किलो गांजा बरामद किया गया। उक्त मामले का खुलासा अपर पुलिस अधीक्षक सुखराम भारती व सीओ रामवीर सिंह ने पुलिस लाइन में किया।

 इस दौरान उन्होंने बताया कि विगत काफी दिनों से उड़ीसा प्रान्त से अन्तर्राज्यीय गिरोह द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य मे गांजा तस्करी सूचना मिल रही थी। इसी क्रम में प्रभारी निरीक्षक संतोष कुमार सिंह नौबतपुर पुलिस बूथ के पास के पास चेकिंग अभियान चला रहे थे। तभी मुखबिर से सूचना मिली कि उड़ीसा प्रान्त से कुछ गांजा तस्कर कार से गांजा लेकर प्रयागराज जा रहे हैं। सूचना पर प्रभारी निरीक्षक संतोष कुमार सिंह ने चेकिंग अभियान चला रहे थे। कि बिहार की तरफ से आ रही टाटा टिगोर कार को रोका गया। कार सवार व्यक्ति पुलिस टीम को देख भागने लगे। पुलिस ने तत्काल घेरे बंदी कर कार सहित उसमें बैठे सवारों को धर दबोचा और कार को खुलवाकर चेक किया गया तो उसमें कुल 46.250 कि0ग्रा0 गांजा बरामद किया गया। जिसकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार मे अनुमानित कीमत करीब सात लाख रूपये  है । 

पुलिस ने गिरोह के तीन तस्करों को गिरफ्तार कर थाने ले आयी पूछताछ में गांजा तस्कर अमन सिंह ने बताया गया कि आकाश सिंह पुत्र अमर सिंह निवासी ढकवा जनपद प्रतापगढ और विक्की शर्मा आकाश सिंह व  विक्की सिंह दोनो मिलकर गांजा तस्करी का काम करते हैं। यह माल भी उन्ही का है। हम लोगो के साथ आकाश सिंह भी सम्भलपुर उड़ीसा गया था। हम लोगो को बस स्टाप के सामने बसन्ती लाज मे रूकवाकर अपने गाड़ी लेकर गया। और तीन चार घंटे बाद गांजा गाड़ी मे लोडकर ले आया। और गाड़ी हम लोगो को दे दिया और वह वहीं रूक गया। हम लोग यहां गाड़ी लेकर आये और पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया। नाजायज गाजा की बरामदगी व गिरोह के तीन तस्करों की गिरफ्तारी के आधार पर उनके विरुद्ध थाना सैयदराजा में एनडीपीएस एक्ट मुकदमा पंजीकृत कर जेल भेज दिया गया। पुलिस टीम में 

निरीक्षक अशोक कुमार मिश्रा, जमीलुद्दीन खान,गुंजन तिवारी, आलोक कुमार,मुकेष निषाद, अभिषेक राय, थाना, सन्दीप कुमार, अजय सिंह, मौजूद रहे।

आकाशीय बिजली का आघात‚ गंजबसनी में 85 भेड़ों की मौत

आकाशीय बिजली का आघातः घटना के बाद गंजबसनी में भेड़ों की मौत की घटना की जानकारी लेते एसडीएम।
घटना के बाद गंजबसनी में भेड़ों की मौत की घटना की जानकारी लेते एसडीएम।


आकाशीय बिजली के आघात से दो पशुपालकों को लाखों का हुआ नुकसान

Young Writer, नियामताबाद। अलीनगर थाना क्षेत्र के गंजबसनी गांव में आकाशीय बिजली गिरने से 85 भेड़ों की मौके पर ही मौत हो गई। मंगलवार की रात्रि को रामअवध और रामजनम पेड़ के नीचे भेड़ों के पास बैठे थे। अचानक मौसम ने करवट बदली और आसमान में काले बादल छा गए। थोड़ी देर में गरजने की आवाज हुई उसी समय आकाशीय बिजली भेड़ों के ऊपर गिर पड़ी। बिजली गिरने से मौके पर ही 85 भेड़ो की मृत्यु हो गई। उपजिलाधिकारी पीडीडीयू नगर अविनाश कुमार मौके पर पहुंच कर घटनास्थल का जायजा लिया। ग्रामीणों से घटना के बारे में विस्तृत रूप से जानकारी ली और सरकार द्वारा हर संभव सहायता देने की बात कही।

आकाशीय बिजली के आघात से गंजबसनी में मृत पड़ी भेंड़।
आकाशीय बिजली की चपेट में आने से गंजबसनी में मृत पड़ी भेंड़।

पशु अधिकारी डा.राजकुमार यादव ने बताया कि रामअवध पाल की 56 भेड़ और रामजनम की 29 भेड़ों की मृत्यु हो गई और 10 भेड़ घायल हो गये। रामजनम और रामअवध पाल बाल बाल बच गये। हादसे की जानकारी देते हुए ग्रामीणों ने बताया कि 250 भेड़ों के साथ राम अवध और रामजनम रात्रि में पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे उसी बीच आकाशीय बिजली गिरने से मौके पर ही 85 भेड़ों की मौत हो गई और 10 घायल हो गए। सूचना पर पहुंची पुलिस ने घटनास्थल का जायजा लिया। लौंदा चौकी प्रभारी जितेंद्र उपाध्याय मौके पर उपस्थित होकर घटनास्थल की जानकारी ली। इस अवसर पर नायब तहसीलदार नीरज चतुर्वेदी, लौंदा चौकी प्रभारी जितेंद्र उपाध्याय, पशु अधिकारी डा.राजकुमार यादव सहित ग्राम वासी उपस्थित रहे।

Hand Wash : स्वच्छता को अपनाएं और बीमारियों को दूर भगाएंः कुंवर बीपी सिंह

Hathiyani हथियानी स्कूल में बच्चों को हैंडवास के बारे में जानकारी देते प्रधान व प्रधानाध्यापक।
हथियानी स्कूल में बच्चों को हैंडवास के बारे में जानकारी देते प्रधान व प्रधानाध्यापक।

चंदौली ब्लाक के हथियानी विद्यालय में हैंडवास विशेष कक्ष का प्रधान ने किया उद्घाटन

Young Writer, चंदौली। सदर ब्लाक के क्षेत्र के हथियानी कंपोजिट विद्यालय में हैंडवास को लेकर विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस दौरान ग्राम प्रधान राजेश यादव द्वारा हैंडवास के लिए बनाए गए विशेष कक्ष का फीता काटकर उद्घाटन किया। वहां ग्राम प्रधान व प्रधानाध्यापक कुंवर वीरेंद्र प्रताप सिंह ने छात्र-छात्राओं को हैंडवास के तरीके बनाए गए। साथ ही इसके फायदे को भी गिनाया व बताया गया।

 हथियानी स्कूल में बच्चों को हैंडवास के बारे में जानकारी देते प्रधान व प्रधानाध्यापक।

इसके बाद ग्राम प्रधान राजेश यादव, प्रधानाध्यापक कुंवर वीरेंद्र प्रताप सिंह के साथ ही शिक्षकों ने संचारी रोग कार्यक्रम के तहत गांव का भ्रमण किया। इस दौरान ग्रामीणों से संवाद स्थापित कर जनपद में चलाए जा रहे संचारी रोग कार्यक्रम की जानकारी दी गई। कुंवर वीरेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि हैंडपम्प व अन्य पेयजल स्रोतों के पास गंदे पानी का जमाव ना होने दें। इसके अलावा बारिश के मौसम में छतों के ऊपर व आसपा गड्ढों में किसी तरह का पानी जमा न होने दें। इससे कई तरह की संक्रामक बीमारियां फैलने का खतरा बना रहता है।

Hand Wash : स्वच्छता को अपनाएं और बीमारियों को दूर भगाएंः कुंवर बीपी सिंह

मच्छरों का प्रकोप बढ़ने के साथ ही मलेरिया व डेंगू जैसी खतरनाक बीमारियां फैलने की आशंकाएं बनी रहती है। बारिश के मौसम में स्वच्छता पर विशेष ध्यान रखकर इन बीमारियों से बचा जा सकता है। स्कूली बच्चों को बताया कि खाना खाने से पहले व शौच करने के बाद हाथ को साबुन या हैण्डवास से अच्छी तरह साफ कर लें। स्वच्छता को अपनाकर ही अपने आप को स्वस्थ व बीमारियों से सुरक्षित रखा जा सकता है। स्वास्थ्य को अपनाएं और दूसरों को स्वच्छता को अपनाने के लिए प्रेरित करें। इस अवसर पर रामाज्ञा तिवारी, आरसी मिश्रा, अजीत, विजय, स्वाती, नीलम, निधि, सरिता आदि उपस्थित रहीं।

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