चंदौली। जिले में बरसात के दृष्टिगत जिला प्रशासन ने एडवाइजरी जारी किया है। इसके तहत भरी वर्षा के दौरान सभी लोग को सावधानी बरतने की नसीहत दी गई है। वहीं समस्त राजकीय चिकित्सालयों को हाई अलर्ट पर रखने का निर्देश दिया है। साथ ही सर्पदंश, वज्रपात एवं जल जनित रोगों के उपचार की व्यवस्था चिकित्सालयों पर सुनिश्चित करने की हिदायत दी है।
जिलाधिकारी निखिल टी फुंडे ने कहा कि आकस्मिक सेवाओं में तैनात अधिकारी व कर्मचारी ड्यूटी पर उपस्थित रहें। दवाओं एवं रोगी वाहन की व्यवस्था भी सुनिश्चित कर ली जाए। वहीं आकाशीय विद्युत से होने वाली घटनाओं से बचाव एवं चेतावनी के लिए दामिनी व सचेत एप का प्रयोग करें। उन्होंने लोगों से भारी बारिश के दौरान पुराने व जर्जर भवनों से निकलकर सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की है। कहा कि आवश्यक कार्य होने पर ही घर से बाहर निकलना चाहिए। भीड़ भाड़ वाले व ट्रैफिक जाम वाले क्षेत्रों में जाने व खुले सीवर व बिजली के तारों से बच कर रहें। किसी भी सीवर समस्या जलभराव वृक्ष पातन आदि के लिए नगर पालिका में कंट्रोल रूम में हेल्पलाइन नंबर 05412-256296 पर सम्पर्क करें। विद्युत ब्रेक डाउन आदि के लिए हेल्पलाइन नम्बर पर जानकारी दें। पीने के पानी को उबाल कर पीएं। नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र से ब्लीचिंग पाउडर व क्लोरीन टैबलेट प्राप्त कर लें। किसी भी आपात स्थिति में मुख्य चिकित्साधिकारी के कन्ट्रोल रूम नंबर 05412-260084 पर सम्पर्क करें। वहीं किसी भी समस्या में अन्टीग्रेटेड कन्ट्रोल रूम नंबर 05412-200100 पर जानकारी दी जा सकती है। पशुओं को सुरक्षित स्थानों पर रखे उचित चारे एवं पानी की व्यवस्था करें। कहा कि मौसम की जानकरी के लिए टीवी, रेडियो आदि प्रसारण माध्यमों की जानकारी लेते रहें। नदी, तालाब, पोखरा, झील व गहरे गड्ढे आदि में जाने से बचें। आपात स्थिति में जिला प्रशासन की ओर से स्थापित कन्ट्रोल रूम नंबर 05412-260476, 260477, 262100 एवं 1121070 पर सम्पर्क किया जा सकता है।
Chandauli:भरी बरसात को लेकर डीएम ने समस्त राजकीय चिकित्सालयों को किया हाई अलर्ट,लोग को सावधानी बरतने की दी नसीहत
हस्तिनापुर एक्सटेंशन : कितने बजे हैं, मालूम नहीं
Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह, HASTINAPUR EXTENTION
हस्तिनापुर एक्सटेंशन : रामदरश मिश्र जी की एक किताब है, – कितने बजे हैं। किताब में उनके ललित निबन्ध हैं। निबन्धों में सहज जीवन का सौन्दर्य है। उल्लास की उष्मा है। संघर्ष का ताप है। हास-हुलास के रंग है। पीड़ाओं की पुकार है। परेशानियों के बेधक दंश हैं। बहुत कुछ है। अपने समय की मुकम्मल जिन्दगी की धड़कन कानों में बजने लगती है। मरते हुए गाँवों की बची हुई जिन्दगी चहकती दिखाई देती है। चहकते हुए महानगरों की मरती हुई जिन्दगी कीकराह सुनाई देती है। जिन्दगी के विविध तरह के रंग इसमें खूब टहक हैं। पढ़ते-पढ़ते खूब मजा आ जाता है। प्रकृति के साथ-साथ मनुष्य की प्रकृति का निदर्शन चित्त को खूब उत्प्रेरित करता है। मिश्र जी के निबन्ध अपने समय में मूलधारा मान लिये गये निबन्धों से भिन्न धारा की उपस्थिति का बोध भी कराते हैं और उनकी शक्ति का भी प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। इस संग्रह के निबन्ध कई दृष्टि से महत्वपूर्ण और मूल्यवान हैं। मगर यह सब बाद में। पहले तो कितने बजे हैं।
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औचक आप किसी से पूछ दें- कितने बजे हैं? आदमी अचकचा जायेगा। अगर उसके हाथ में घड़ी नहीं है, तो फिर उत्तर दे पाना कठिन है। हमारी सभ्यता ने आदमी को उपकरणों पर अवलम्बित करके उसे अपाहिज बना डाला है। हमारे पास समय को जाँचने-परखने के, जानने-बूझने के तमाम साधन थे। तमाम तरीके थे। हम आसमान की तरफ देखकर समय का अन्दाज लगा लेते थे। हमारे आँगन की छाया हमें समय की जानकारी दे देती थी। पेड़ दे देते थे। गाय-घोड़े दे देते थे। रात में तारे हमें समय बता देते थे। चिड़ियाँ हमें समय बता देती थीं। मगर हमने सबकी तरफ से आँख मूँँद ली और घड़ी के भरोसे हो गये। अब एक घड़ी के भरोसे आदमी कितना दयनीय है। घड़ी ने धोखा दे दिया तो चारों खाने चित्त। मेरी घड़ी तो कई दिनों से रूकी पड़ी है। वह केवल बैटरी खत्म होने से ही नहीं रुक जाती है। वह बैटरी रहते भी बहुत बार रुक जाती है। पता नहीं क्यों? रुकने का उसका मन हो आता होगा। घड़ी रुकी पड़ी हो तो भी बार-बार आँख घड़ी पर जाती ही रहती है।
मेरी घड़ी बन्द है। मेरे हाथ में किताब है। दिमाग में सवाल कुलबुला रहा है,- कितने बजे हैं?
समय के सवाल को थोड़ी देर सुलाकर मैं किताब खोल लेता हूँँ। किताब खोल लेता हूँँ तो सवाल अपने आप किताब में डूब जाता है। मैं अनुभव करता हूँ कि मैं भी किताब में डूबता जा रहा हूँ।
‘‘मैं जहाँ खड़ा हूँँ’’ निबन्ध पढ़ते-पढ़ते मैंने अनुभव किया कि यहाँँ रामदरश मिश्र जी भी डूबे हुये हैं। इसमें बचपन का स्मृति-चित्र बड़ा जीवन्त है। अपने निबन्ध में लेखक खुद डूबा हुआ मौजूद मिल गया, इससे बड़ीबात, इससे सुखद बात और क्या हो सकती है। इतने से ही तो निबन्ध, ललित निबन्ध हो उठता है। इतने से ही तो सम्बन्ध सजीव हो उठते हैं। साक्षात मिल-मिलकर भी, गले लिपट-लिपट कर भी मिल न सकने के दारुण दौर में किसी रचना में लेखक से मिल लेने कीपुलक कैसी हो सकती है, आप अनुमान कर सकते हैं। इस निबंध में बाढ़ग्रस्त गाँँव मेें आदमी की दुर्दशाग्रस्त जिन्दगी का बड़ा ही मार्मिक उद्घाटन है। मगर मैं तो रामदरश मिश्र जी से ऐसा टकराया कि उनकी स्मृतियों में ही बह गया।
स्मृतियाँ मुझे बहा ले गईं। मैंने विरोध नहीं किया। मैं बहता गया। रोमांच की पुलक सहता गया। बहता गया। अनेकों बार उनके काशी में होने पर उनके साथ होने का अनुभव अपने आलिंगन में कसता गया। रामदरश मिश्र जी के व्यक्तित्व में दो चीजें मुझे बेहद प्रभावित करती हैं। पहला तो उनके श्वेत केश। उनके सफेद बाल उनके मुखमण्डल को अधिक दीप्तिपूर्ण बना देते हैं। दूसरी चीज उनकी निर्व्याज हँँसी। हँसी-ठहाके तो औरों के पास भी हैं, मगर रामदरश मिश्र जी की हँसी में इतनी हार्दिकता और धवलता एक साथ है कि वह सामने वाले को नहवा देती है। नहवा कर स्निग्ध कर देती है। ठाकुर प्रसाद सिंह जी के ईश्वरगंगी निवास पर कई सुबहों का उजास और डा. चन्द्रकला त्रिपाठी के बी.एच.यू परिसर वाले फ्लैट की कई शामों का गुंजन बहुत कुछ कहता रहा। पहली बार उनकी बहुत प्रसिद्ध कविता-
‘‘बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे,
खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे’’
पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी
उठाता गया सर यूँ ही धीरे-धीरे’’
मैंने वहीं चन्द्रकला त्रिपाठी जी के घर पर सुनी थी। तबसे वह पूरी गजल वैसे ही याद है। मुझे पता नहीं क्यों लगता है, वह मेरी ही कविता है। न जाने क्यों बेहद प्रिय चीजें अपनी लगने लगती हैं। खैर, उस गोष्ठी में ठाकुर प्रसाद जी भी थे। जब रामदरश मिश्र जी ने आगे का शेर पढ़ा – ‘‘जहाँ तुम हो पहुँचे छलाँगे लगाकर, वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे-धीरे।’’ तो ठाकुर जी ने उन्हें रोककर मजाक किया- ‘‘यह नामवर के लिये है।’’ फिर…. फिर…… खूब निष्कलुष हँसी गूँँजती-गुदगुदाती रही। मिश्र जी संयोग से मेरी पी.एच.डी. की मौखिकी के परीक्षक भी रहे। मुझे तनिक भी लगा ही नहीं कि मैं परीक्षा दे रहा हूँ।
रामदरश मिश्र जी की एक और विलक्षणता मुझे बेहद प्रभावित करती है। मैं उनके घर पर भी उनसे मिला हूँ। जितनी देर मैं उनके घर में रहा, मुझे महसूस नहीं हुआ कि मैं घर से बाहर का आदमी हूँँ। एक अल्प परिचित आदमी का यह अनुभव आतिथेय की विलक्षण सहजता ओर उच्छल रागात्मकता के बिना घटित हो ही नहीं सकता। मैंने बहुत बार बड़े-बड़े साहित्यकारों को बड़े-बड़े मंच पर देखा है। मंच पर उनकी भव्यता को देखा है। उनकी गरिमा को देखा है। उनके प्रभामण्डल की दमक देखा है। मन में सवाल उठा है कि क्या साहित्य की जगह मंच ही है? घर में साहित्य के रहने की कोई जगह नहीं हैं? मगर रामदरश जी उन विरले साहित्यकारों में हैं, जो जैसे मंच पर हैं, समारोह में हैं, सार्वजनिक जगहों पर हैं, वैसे ही घर में भी हैं। बल्कि घर में और अधिक उत्फुल्ल। और अधिक उत्सुक। और अधिक मिल लेने को आकुल। मैं कहना चाहता हूँ कि अपने घर में वे मुझे पूरा-पूरा मिले हैं। मैं उनसे हिल-मिल सका हूँ। मिलकर खिल सका हूँ। मगर देखिये न किताब की बात छोड़कर मैं कहाँ बहक गया। क्षमा करियेगा।
जो लोग गाँव से जाकर गाँव की कृतार्थता से कृतघ्न होने से बचे रह गये हैं, उनमें रामदरश जी महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। ग्रामीण जीवनमूल्यों के प्रति उनका अगाध अनुराग कहीं भी कुम्हलाया हुआ नहीं दिखता है। ग्रामीण जीवन संस्कृति में ही मनुष्य के बीच मनुष्य के होने का उनका विश्वास अडिग विश्वास है। युवाओं के प्रति उनकी वेदना और विक्षोभ का स्वर उनके गाँव के प्रति प्रेम को उजागर करता है। ‘गाँव के बीच एक चेहरे की खोज’ में स्वार्थ की बाढ़ में अपनत्व के विलोप की पीड़ा बड़े प्रभावी रूप में अंकित है। ‘बबूल और कैक्टस’ में जिजीविषा विहीन जीवन की व्यर्थता का विषाद चित्रित है। धार्मिक पाखण्ड और आडम्बर की भर्त्सना बड़े स्पष्ट रूप में ‘शोर मत करो आदमी सो रहे हैं’ में सुनाई देती है। ‘नगर जहाँ सपने टूटते हैं’ निबन्ध में आधुनिक सभ्यता के पाखण्ड का उद्घाटन है। जड़ता के विशाल जबड़े जिन्दगी को किस कदर लील रहे हैं, सोचकर कलेजा काँप उठता है।
मैं धीरे-धीरे पूरी किताब पढ़ लेता हूँ। ‘फागुन’ भी पढ़ लेता हूँ। फागुन पढ़ते-पढ़ते मन उमग उठता है। जीवन में उछाह को जगाकर प्रकृति धन्य हो जाती है। सौन्दर्य सज उठता है। उछाह केवल उत्साह नहीं है। केवल उल्लास नहीं है। केवल उमंग नहीं है। यह सब उसमें है। मगर इसके अलावा कुछ और भी है। उछाह में बहुत कुछ है। वह एक मनोभाव नहीं है। कई-कई मनोभावों का संवाहक समुच्चय है। आज हमारे पास बहुत कुछ है। उछाह नहीं है। बड़ा कचोटता है, मन फागुन पढ़कर। हम कितने विपन्न होते जा रहे हैं। ‘महानगर की छाया में’ विकृतियों के बीच की उद्विग्नता उन्मथित करती है। ‘गलत नाम में’ अस्तित्व रक्षण और पहचान की समस्या से सामना होता है। शिलाँग की रम्य यात्रा का भावपूर्ण वर्णन पढ़कर मन उल्लसित हो उठता है।
‘सर्जना ही बड़ा सत्य है’ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उदात्त व्यक्तित्व का भावपूर्ण रेखांकन प्रस्तुत करता है। आचार्य द्विवेदी एक व्यक्ति नहीं हैं, उनमें पूरी परम्परा प्रगट है। किसी भी बहाने द्विवेदी जी का साक्षात्कार व्यक्ति को विस्तार देने का निमित्त बन जाता है। द्विवेदी जी की स्मृति धन्यता बोध को जागृत करने का हमेशा ही आधार बन जाती है। ‘बड़ौदे की शाम’ निबन्ध में रचनाकार के सर्जनात्मक चिन्तन का व्यापक धरातल उन्मोचित है। इसमें स्मृतियों के माध्यम से रचनायात्रा के नेपथ्य का निदर्शन है। निबन्धों की भाषा में व्यवहार की भाषा की विदम्धता विमुग्ध करती है। किताब पढ़कर मन में बड़ा तोष होता है। मगर….
मगर मैं सोचता हूँ, कितने बजे हैं? उत्तर तलाशना है। तभी एक विचार मन में कौंधता है। समय की शिनाख्त केवल घड़ी की सुइयों से नहीं चिपकी है। समय की तासीर मनुष्यों के चेहरे पर भी अंकित रहती है। मैं इस संग्रह के निबन्धों में मौजूद चरित्रों के चेहरों को एक बार गौर से देखता हूँ। अपने आस-पास मौजूद लोगों के चेहरों के सामने से फिर से गुजरता हूँ। मुझे लगता है, कुछेक को छोड़कर सारे चेहरों पर बारह बज रहा है। हमारे जनतंत्र के गरिमामय मुखमण्डल पर भी बारह बज रहा है। मेरी आँखों के आगे तमाम-तमाम हलकान चेहरे, परेशान चेहरे, लस्त चेहरे, पस्त चेहरे भीड़ और भगदड़ की शक्ल में तैरने लगते हैं।
ओफ्फ, क्या करूँ? बड़ा जटिल है, चेहरा पढ़ने का काम। बड़ा जोखिम का काम है। बड़ा घाटे का काम है। बेगार का काम है। फिर भी अपनातो यही काम है।
किसी को इत्तिफाक हो, न हो, मैं देख रहा हूँ, हमारे चारों तरफ बारह बज रहा है। हालाँकि कुछ लोग कह रहे हैं, यह सूर्योदय का समय है। कुछ लोगों के लिये भाग्योदय का समय है। कुछ के लिये यह समय सोने की थाली में जेवनार के सम्मुख होने का समय है। किसी-किसी के लिये आश्वास्ति का समय भी हो सकता है। किसी के लिये यह समय राज्यारोहण के स्वस्तिवाचन का समय भी हो सकता है। मगर अधिकांश के लिये यह समय मरघट की मुर्दनगी के आतंक से भरा समय है। हमारे जनतंत्र में हमारे विश्वास रोज-रोज मर रहे हैं। हम उन्हें रोज-रोज मरघट पहँुचा रहे हैं। फिर भी हम जी रहे हैं। फिर भी हम खा-पी रहे हैं। तानते-तानते फट-फट जा रही चादर को सी रहे हैं। हमारे चेहरे पर हमारे सपनों के चिताओं की राख लिपटी है। हवाइयाँ उड़ रही हैं। हमारा कुछ भी सुरक्षित नहीं है। मैं अपना चेहरा भी शीशे में देखता हूँ। साफ-साफ लग रहा है, – बारह बज रहे हैं।
बारह बजने के बोध के निबन्ध ललित निबन्ध नहीं हो सकते हैं, क्या?
मगर, नहीं। मुझे कोई प्रश्न नहीं पूछना है। हमारे समय के लोकतंत्र में प्रश्न पूछना गुस्ताखी है। अनुशासनहीनता है। निष्ठा का तिरस्कार है। देशभक्ति के खिलाफ है। विकास के विरूद्ध है। कानून व्यवस्था का मजाक है। इसलिये नहीं, नहीं। मुझे कोई प्रश्न नहीं पूछना है।
रामदरश मिश्र जी का कहना है कि हो सकते हैं। केवल संस्कृति विमर्श ही ललित निबन्ध का विषय नहीं है। जीवन की ऊबड़-खाबड़ सच्चाइयाँ भी ललित निबन्ध की पहचान हैं। जीवन की छोटी-छोटी सच्चाइयों में दबी-छिपी जिजीविषा की शक्ति और उसका सौन्दर्य मनुष्य के लिये हमेशा ही अभ्यर्थना के योग्य है। कोई भी चीज सामान्य होने के कारण तुच्छ नहीं हो जाती। मनुष्य जाति की जीवन यात्रा सामान्य जीवन बोध के बीच ही असामान्य और महनीय अनुभूति को उपलब्ध करने की विकास यात्रा है।
-Young Writer
चंदौली में पार्किंग की व्यवस्था नही होने से लोगो के लिए नासूर बना जाम
चंदौली में पार्किंग नहीं होने से लग रहा भीषण जाम
चंदौली। जिला मुख्यालय पर पार्किंग की समस्या ने लोगों की समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। नगर में पार्किंग की व्यवस्था नही होने के कारण आए दिन नगरवासी जाम की झाम में फसकर हलकान हो रहे हैं। चंद कदम की दूरी तय करने के लिए लोगों की लंबी परिक्रमा करना पड़ता है। जाम में फसकर सबसे ज्यादा परेशान महिलाएं व बच्चे होते हैं।
नगर के सब्जी मार्केट सहित अन्य बाजार क्षेत्र में व्यवस्थित पार्किंग व्यवस्था के अभाव में लोग फूटपाथ, सड़क या इधर-उधर खाली जगह देखकर वाहन खड़े कर देते हैं। मनमर्जी से खडे किए वाहन से आने जाने-वालों को तो परेशानी होती ही है। साथ ही सामने के दुकानदार भी परेशान रहते हैं। कई बार दुकानों तक पहुंचने के लिए भी रास्ता नहीं बचता। नगर के प्रमुख बाजारों में पार्किंग की व्यवस्था नहीं होने से समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। बाजारों में जगह नहीं होने के कारण लोग मनमर्जी से फूटपाथ और सड़कों के किनारे गाड़ी पार्क कर रहे हैं। जिसके चलते नगर में आए दिन सड़कों पर जाम जैसा दृश्य देखने को मिलता है। गौरतलब है कि नगर के मेन रोड, सब्जी मार्केट और बाजार हमेशा गुलजार रहते हैं। जहा पार्किंग की सुविधाओं पर खास ध्यान नहीं दिया गया। वही पुरानी बाजार में दुकानदार अपनी दुकान के सामने एक गज जगह भी पार्किंग या अन्य गतिविधियों के लिए नहीं छोड़ते। इस स्थिति में दुकान के सामने सड़कों पर ही वाहनों को लोग खड़ी कर खरीदारी करते हैं। जिससे बाजार की सड़कें चौड़ी होने के बावजूद भी चार पहिया वाहनों के प्रवेश से जाम की स्थिति बन जाती है। इस बाबत अधिशासी अधिकारी शिव कुमार ने बताया कि नगर में आम लोगो के लिए पार्किंग की कोई व्यवस्था नही है। डीएम के निर्देश पर कचहरी के बगल में अधिवक्ताओं के लिए पार्किंग की व्यवस्था की गई है।
गौशाला निर्माण में भ्रष्टाचार‚ 3 नंबर की ईंट व 2.5 सूत की सरिया का हो रहा इस्तेमाल
राकेश रोशन सिंह ने की मुगलचक में गौशाला निर्माण को रोकने की मांग
Young Writer, चंदौली। वर्ल्ड सोसाइटी के राकेश रोशन सिंह बागी ने सोमवार को जिलाधिकारी निखिल टीकाराम फुंडे से मुलाकात की। इस दौरान अलीनगर के मुगलचक में बन रहे कान्हा गौशालय के निर्माण में दोयम दर्जे सामग्री का इस्तेमाल किए जाने की शिकायत की। बताया कि छह जुलाई को निर्माण कार्य रोकने के डीएम चंदौली के आदेश के बावजूद निर्माण कार्य चल रहा है। वहीं जांच के लिए एकत्रित किए गए सैम्पल को लैब में भेजने की बजाए नगर पालिका कार्यालय में ही रखा गया है।
इस दौरान उन्होंने अवगत कराया कि गौशाला के निर्माण में निर्माण मान के विपरीत तीन नंबर की ईंटों व 2.5 सूत की सरिया का इस्तेमाल कालम व पिलर में किया जा रहा है। इसके अलावा भस्सी तथा दोयम दर्जे की सामग्री इस्तेमाल में लायी जा रही है। उक्त कान्हा गौशाला का नजरी नक्शा किसी भी आर्किटेक कम्पनी के इंजीनियर या जिम्मेदार संस्था से नहीं बनवाया गया है। बिना नक्शे के अवैध तरीके से निर्माण कार्य कराया जा रहा है। कहा कि जब नक्शा बना ही नहीं तो वास्तविक मूल्यांकन 1.65 करोड़ रुपये कैसे निर्धारित किया जा सकता है? कहा कि टेंडर में रनिंग पेमेंट करने का कोई शर्त अनुबंधित नहीं है फिर भी नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी व कार्यदायी संस्था के अधिशासी अभियंता आपसी गठजोड करके रनिंग पेमेंट करते आ रहे हैं, जिसे तत्काल रोका जाना चाहिए। कहा कि पूरी टेंडर प्रक्रिया ही कपोल, काल्पनिक व विधि-विरूद्ध है। भ्रष्टाचार से लिप्त है जिसमें किसी भी दशा में किसी भी संबंधित संस्थाओं से अनापत्ति प्रमाण पत्र न लेना व स्वीकृति न लेना इसका प्रमाण है। मांग किया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ड्रीम प्रोजेक्ट कान्हा गौशाला निर्माण को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने से रोकने की कृपा करें, ताकि सरकार की मंशा पूरी हो और भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके। कहा कि एकत्रित किए गए नमूनों की जांच कराकर कार्यदायी संस्था को ब्लैक लिस्टेड करने की कार्यवाही की जाए।
-News Chandauli
सरकारी अस्पताल में आईवीएफ का खर्चा: जानकारी और महत्वपूर्ण तत्व
Young Writer, Chandauli: सरकारी अस्पताल में आईवीएफ (IVF) का खर्चा विभिन्न प्रकार के तत्वों पर निर्भर करता है, जिनमें विशेषज्ञ चिकित्सक शामिल होते हैं, दवाओं और उपकरणों की लागत, प्रशासनिक शुल्क, अस्पताल के स्तर पर आधारित आवास की व्यवस्था आदि शामिल होती है।
आमतौर पर, आईवीएफ के लिए खर्चे को दो भागों में बांटा जाता है – दवाओं और उपकरणों की लागत और चिकित्सा खर्च। दवाओं और उपकरणों की लागत विभिन्न अस्पतालों में भिन्न हो सकती है, लेकिन आमतौर पर आईवीएफ का यह खर्च लागभग 1,50,000 रुपये से 3,00,000 रुपये तक हो सकता है।
इसके अलावा, चिकित्सा खर्च अस्पताल के स्तर पर आधारित होता है और यह भी विभिन्न अस्पतालों में भिन्न हो सकता है। सरकारी अस्पतालों में आईवीएफ का खर्च आमतौर पर निजी अस्पतालों के मुकाबले कम होता है। यहां भी आईवीएफ की सफलता दर और तकनीकी मापदंडों के आधार पर खर्चा अलग-अलग हो सकता है।
इसके अलावा, आईवीएफ का खर्चा सरकारी अस्पतालों में आपकी आय के आधार पर भी निर्धारित हो सकता है। कुछ सरकारी अस्पताल निशुल्क आईवीएफ सेवाएं प्रदान कर सकते हैं, जबकि कुछ अन्य अस्पताल आपकी आय के आधार पर आईवीएफ की लागत निर्धारित करते हैं। इसलिए, आपको अपने सरकारी अस्पताल के नियमों और निर्देशों के बारे में जानकारी प्राप्त करने की सलाह दी जाती है।
इस संदर्भ में स्थानीय सरकारी अस्पताल के प्रतिनिधि से संपर्क करके या अस्पताल की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर विस्तृत जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। वे आपको आईवीएफ की लागत, योग्यता मानदंड, आवश्यक दस्तावेज़ आदि के बारे में सही जानकारी देंगे।
आपको इस विषय में सटीक और विशेषज्ञ सलाह प्राप्त करने के लिए अपने विशेषज्ञ चिकित्सक या आईवीएफ के प्रशासनिक विभाग से भी संपर्क करना चाहिए। वे आपको आपकी स्थिति के अनुसार सरकारी अस्पताल में आईवीएफ का खर्चा और इसके लिए उपलब्ध सरकारी योजनाओं के बारे में संपूर्ण जानकारी प्रदान करेंगे।
आईवीएफ का खर्चा विभिन्न स्थानों और सरकारी अस्पतालों में अलग-अलग हो सकता है, और इसकी जानकारी मेरे पास नहीं है। आपको विशेषज्ञ सलाह और संदर्भ लेने की सलाह दी जाती है।
चंदौली पुलिस ने पकड़ी दो करोड़ 18 लाख की शराब, फर्जी बिल्टी पेपर व नंबर प्लेट बनाकर पुलिस को धोखा दे रहा था तस्कर
चंदौली। सर्विलांस व थाना बबुरी पुलिस को सोमवार को बड़ी सफलता हाथ लगी पुलिस ने चेकिंग के दौरान मुखबिर की सूचना पर पांडेयपुर के समीप से एक कंटेनर से दो करोड़ से अधिक का शराब पकड़ा उक्त मामले का खुलासा पुलिस अधीक्षक अंकुर अग्रवाल ने पुलिस लाइन में किया। एसपी ने पुलिस को टीम को 50 हजार रुपये का ईनाम देने की संस्तुति की
इस दौरान उन्होंने ने बताया कि सर्विलांस स्वाट टीम व थाना बबुरी पुलिस की संयुक्त कार्यवाही के दौरान मुखबिर की सूचना पर पाण्डेयपुर यात्री सेड के पास ट्रक टेलर वाहन संख्या RJ24GA1817 को रोककर चेक किया गया। तो ट्रक में 1210 पेटी अवैध अंग्रेजी शराब अनुमानित कीमत दो करोड 18 लाख बरामद हुआ। गिरफ्तार अभियुक्त द्वारा बताया गया कि फर्जी बिल्टी पेपर बनाकर पुलिस को धोखा देने के लिए गाड़ी पर फर्जी नम्बर प्लेट लगाकर हरियाणा पंजाब एवं अन्य प्रान्तों से बिहार में बिक्री के अवैध शराब की तस्करी होता है। जिससे अच्छी खासी पैसे का आमदनी होता है।गिरफ्तार शराब तस्कर मोहन राम निवासी ढढनियाँ थाना बालेशर जिला जोधपुर, राजस्थान का रहने वाला है। गिरफ्तारी एवं बरामदगी करने वाली टीम में प्रभारी सर्विलांस सेल श्याम जी यादव, प्रभारी स्वाट टीम शैलेन्द्र प्रताप सिंह, थानाध्यक्ष अमित कुमार, प्रेम प्रकाश यादव, राजेश यादव, अवधेश नारायण, देवेन्द्र सरो, आनन्द सिंह, मधुसूदन राय, नीरज मिश्रा, राणा प्रताप, चन्द्रशेखर यादव,अजीत सिंह, विजेन्द्र कुमार, अनुज वर्मा, मनीष कुमार, प्रितम कुमार, राहुल खरवार, गणेश तिवारी, अमित सिंह, कृष्ण कुमार यादव, मनोज यादव, सन्दीप कुमार, सत्येन्द्र यादव मौजूद रहे।
व्यंग्य: धनिया , पुदीना और कच्चा बादाम
Young Writer, साहित्य पटल। रामजी प्रसाद “भैरव” की रचना
एक दिन पीयूष तिवारी जी आये , कुछ अनमने थे , वैसे व्यंगकार अनमना नहीं होता , पर उनको चिढ़ सिनेमा वालों से था , आते ही विफर पड़े , मैंने कहा ” पहले चाय पानी कर लीजिए , फिर बातें होंगी ।
पर वे गुस्से से नथुने फुलाते हुए बोले – भाई साहब , कसम से ई सिनेमा वाले सारे विषयों का सत्यानाश कर रहे हैं ।”
मैंने उनकी इच्छा के विपरीत जल पीने को दिया , साथ में कुछ काजू कतली के टुकड़े भी प्लेट में , जो पत्नी ससुराल से झटक लायी थी ।
खैर इस समय पीयूष जी बार बार आपे से बाहर हो रहे थे , जब मैंने कई बार आग्रह किया तो काजू कतली उठा कर मुँह में डाला ,और उसके साथ शत्रु जैसा व्यवहार करने लगे , मतलब उसे दाँत से ऐसे पीसने की कोशिश कर रहे थे , जैसे कोई सिनेमाई उनके मसूढ़े के नीचे आ गया हो । उन्होंने ने ही एक बार मुझे बताया था , एक हादसे जैसी घटना के बाद वे वेदांती हो गए हैं । काजू कतली खाने के बाद पानी पी पी कर फिर गरियाने लगे । मुझे तसल्ली थी , चलिए अब बात हो सकती है ।मैंने पूछा -” भाई साहब , आखिर ये गुस्सा क्यों है ।”
उन्होंने लच्छेदार गालियों की ऐसी झड़ी लगाई कि अगर वहाँ सचमुच का कोई सिनेमाई होता तो , जूतम पैजार का शिकार हो ही जाता । बड़ा कुरेदने पर पीयूष जी ने बताया कि ” सिनेमा वाले हमारे विषय को चुरा कर गाना बना देते हैं , पहले धनिया फिर पुदीना और अब कच्चा बादाम । सालों ने नाक में दम कर दिया हैं , हम व्यंगकार क्या झख मारेंगे । फुलौरी बिना चटनी वाला गाना तो आप लोग पहले ही सुन चुके हैं । और तो और पान खाये सैया हमार , उसमें भी बनारस का जर्दा भी लिख दिया । इश्क , प्यार , मोहब्बत , जैसे विषय आदमी को अधूरा बनाते हैं , सो इस पर कलम चलाना तौहीन समझता हूँ । सुंदरी , अप्सरा , चाँद , तारे , हवा , पानी जैसी चीजों पर पूर्वजों ने इतना लिख मारा है कि हम लिख कर क्या उखाड़ लेगें , इनको भी मैं अपने विषय सूची से बाहर ही रखता हूँ । अब तो उम्र ही इस संधि वेला पर आकर ऐसी अटक गई है कि न भक्ति भाव वाले विचार आते हैं और न प्यार व्यार वाली फिलिंग । भारतीय दर्शन में हाथ डालते डर लगता है कहीं दाँत की तरह , बाल भी न खो दूँ । गांजा , भांग , शराब जैसे विषयों पर पहले से विश्वास नहीं है । सोचा शाकाहारी आदमी हूँ , शाकाहारी विषय पर ही लिखूंगा । पर साले मटियामेट करने पर उतारूँ हैं । अब आप ही बताइए । गुस्सा न करूं तो क्या करूँ ।”
मैं थोड़ा चिंतित हुआ , फिर बोला -” अच्छा तिवारी जी , आप चिंता न करें , कल कुछ विषय बताता हूँ ।”
वे सहृदय आदमी ठहरे , मुझ पर विश्वास कर मान गए , नमस्कार बन्दगी के बाद , जब वे बाहर निकले , मुझे लगा उनके होंठ कुछ बुदबुदा रहे थे ।शायद कच्चा बादाम वाले को गरिया रहे थे।
जीवन परिचय-
रामजी प्रसाद " भैरव "
जन्म -02 जुलाई 1976
ग्राम- खण्डवारी, पोस्ट - चहनियाँ
जिला - चन्दौली (उत्तर प्रदेश )
मोबाइल नंबर- 9415979773
प्रथम उपन्यास "रक्तबीज के वंशज" को उ.प्र. हिंदी संस्थान लखनऊ से प्रेमचन्द पुरस्कार ।
अन्य प्रकाशित उपन्यासों में "शबरी, शिखण्डी की आत्मकथा, सुनो आनन्द, पुरन्दर" है ।
कविता संग्रह - चुप हो जाओ कबीर
व्यंग्य संग्रह - रुद्धान्त
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Chandauli News: मुगलसराय में दुकानों को ना तोड़ने के लिए अधिकारियों से वार्ता हुई
प्रस्ताव दिया गया है कि अर्जुन योजना के उपर से ओवरब्रिज बना दिया जाय
Young Writer, डीडीयू नगर। केंद्रीय मंत्री व सांसद डॉ महेन्द्रनाथ पांडेय ने रविवार को स्थानीय व्यापारियों की समस्याएं सुनी। इस दौरान जीटी रोड की दुकानों को तोड़ने के मुद्दे पर चर्चा हुई। इस पर डॉ. पांडेय ने आश्वासन दिया कि इस मसले पर अधिकारियों से वार्ता हुई है। दुकानों को न तोड़ने और समस्या के समाधान के लिए प्रस्ताव दिया गया है।
नगर के गल्ला मंडी मैनाताली स्थित एक आवास पर पहुंचे केंद्रीय मंत्री और चंदौली सांसद डॉ. महेन्द्रनाथ पांडेय का व्यापारियों ने भव्य स्वागत किया।
इस मौके पर हुई चर्चा में केंद्रीय मंत्री डॉ. महेन्द्रनाथ पांडेय ने कहा कि जीटी रोड की समस्या के बारे में अधिकारियों से वार्ता हुई है। प्रस्ताव दिया गया है कि अर्जुन योजना के तहत नीचे से सड़क के अलावा उपर से ओवरब्रिज बना दिया जाय। ताकि लोगों को जाम से छुटकारा मिले और दुकानें भी न टूटे। भाजपा शासन की उपलब्धियां गिनाते हुए उन्होंने कहा कि डीएफसीसी कार्य योजना के तहत किसानों की कम जमीन जाने और उन्हे मुआवजा दिलाने का काम किया गया। इसी तरह चंदौली मे रेलवे क्रासिंग पर ब्रिज ,सैयदराजा में ब्रिज दे कर आम लोगों को सुविधा प्रदान की गई है। कहा कि जिले में मेडिकल कॉलेज और ट्रामा सेंटर का निर्माण जल्द ही पूरा हो जाएगा। इसके पूर्व डॉ. महेन्द्रनाथ पांडेय नगर के कैलाशपुरी स्थित पोद्दार भवन में आयोजित संघ के गुरु दक्षिणा कार्यक्रम में शामिल हुए। यहां गुरुदक्षिणा करने के बाद संघ के काशी प्रांत प्रचारक रमेश जी के विचारों को सुना।
इसके बाद ईस्टर्न बाजार में भुपेंद्र चौरसिया के तेरहवीं कार्यक्रम में शामिल हुए। यहां से डॉ. महेन्द्रनाथ पांडेय इसी मुहल्ले के मृत दिमेश जायसवाल के घर पहुंचकर अंतिम दर्शन किए।डीडीयू नगर के बाद चंदौली में पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस में कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुनी। इस अवसर पर भाजपा जिलाध्यक्ष अभिमन्यु सिंह, राजकिशोर सिंह, लोकसभा मीडिया प्रभारी हरिवंश उपाध्याय, अखिल पोद्दार, शिवशंकर पटेल, सुर्यमुनी तिवारी, ओमप्रकाश सिंह,रीना तिवारी, गीता रानी गुप्ता, किरन शर्मा, आशीष कुमार गुप्ता, रंजन यादव, अमित केशरी, मनीष गुप्ता, नंदू गुप्ता, उत्तम कुमार जायसवाल, अमित कुमार, विवेक, राहुल जायसवाल, भागवत चौरसिया, आलोक सिंह, जैनेन्द्र कुमार, अनिल तिवारी, राकेश मिश्रा, उमाशंकर सिंह, सुजीत जायसवाल, आलोक बरून, आशीष गुप्ता, सुधीर घोष, संजय अग्रवाल, महेंद्र पटेल, भानू तिवारी,सुनील श्रीवास्तव, सियाराम पाठक आदि लोग शामिल रहे।
हस्तिनापुर एक्सटेंशन : भाषा में अस्मिता का विस्तार
Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह, HASTINAPUR EXTENTION
हस्तिनापुर एक्सटेंशन :– सृष्टि की मूल उत्प्रेरणा विस्तार की उत्प्रेरणा है। अस्तित्व का मूल स्वभाव विस्तार का स्वभाव है। संसार में मनुष्य सबसे अधिक विलक्षण है। जितना मनुष्य विलक्षण है, उतनी ही भाषा भी विलक्षण है। धर्म के माध्यम से, अर्थ के माध्यम से, काम के माध्यम से और मोक्ष के माध्यम से मनुष्य जाति की विस्तार की यात्रा अविरल जारी है। इस यात्रा का आख्यान भाषा जाने कबसे संवहन करती आ रही है।
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हमें लगता है भाषा का स्वरूप हमारी अस्मिता से भिन्न नहीं है। वह भिन्न भी है। मगर अभिन्न भी है। भाषा जब हमसे अभिन्न होती है तब भी उसकी अस्मिता वैसी ही होती है, जैसे भिन्न होने पर होती है। मनुष्य जाति के पास जो थोड़ी-सी बहुत बहुमूल्य चीजें हैं, उनमें भाषा सबसे अधिक मूल्यवान चीज है। भारतेन्दु ने ऐसे ही नहीं कह दिया है, – निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।’’ उनके कहने के गहरे अर्थ हैं।
भाषा हमारे अस्तित्व की अस्मिता भी है और अभिव्यंजना भी है। बिना अभिव्यंजना के अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं है। हमारे होने का कोई मतलब नहीं है, अगर हम अभिव्यक्त नहीं हो रहे हैं। ऐसा यहाँ कुछ भी नहीं है, जिसमें अभिव्यक्ति की आकुलता नहीं है। नदी में है, पहाड़ में है, पेड़ में है, फूल-फल में है, पत्ती-पत्ती में है। सबसे अधिक मनुष्य में है। मनुष्य की भाषा में मनुष्य जाति की स्मृति की समस्त अमूूल्य संपदा संरक्षित है। सच में बड़ी अद्भुत है, भाषा। तुलसीदास ने भाषा को अद्भुत कहा है। बहुत ठीक कहा है।
भाषा पूरी-पूरी लौकिक है। मगर पूरी-पूरी लौकिक ही नहीं है। वह अलौकिक भी है। भाषा पूरी-पूरी मूर्त है। मगर वह पूरी-पूरी अमूर्त भी है। भाषा पूरी-पूरी भौतिक है। मगर वह सिर्फ भौतिक ही नहीं है। वह अभौतिक भी है। भाषा पूरी-पूरी आन्तरिक है। हृदय की अतल गहरी से निकलती हुई। अपनी जरूरतों को पूरा करने की आकुलता से भरी हुई। आकांक्षा के ताप से दहकती हुई। प्यास के प्रवाह में उफनती हुई। परितोष की पुलक से पंख फैला कर उड़ती हुई। सुगन्धि के बवण्डर उड़ाती हुई। किसी दर्द से फनफना कर फुँफकारती हुई। न जाने क्या-क्या करती हुई भाषा समूची आन्तरिकता में उमड़कर बाहर आ जाती है। बाहर हो जाती है। पूरी तरह बाहर हो जाती है। दूर चली जाती है। सुदूर चली जाती है। मनुष्य की समूची आन्तरिकता को बाहर ले आने में सिर्फ और सिर्फ भाषा समर्थ है।
भाषा प्रयोग की परम्परा बड़ी असीम परम्परा है। अथाह परम्परा है। भाषा का प्रयोग नितान्त व्यक्तिगत भी है और पूरा-पूरा सामाजिक भी है। भाषा के व्यवहार का आधार ही समाजवाद की धारणाका जनक है। भाषा के रूप में व्यक्ति की उपोषित संपत्ति का सार्वजनिक संपदा मे बदल जाना बड़ा अद्भुत है।
भाषा हमारे जितनी ही निकट है, उतनी की पकड़ से दूर है। भाषा पर किसी का अधिकार नहीं है। भाषा का प्रवाह अधिकार के अतिक्रमण की प्रक्रिया का वाचक है। भाषा, आपका कहा मान लेगी। आपका मान रख लेगी। मगर आपके कहने में नहीं रहेगी। वह पूरी-पूरी आपकी होकर भी आपसे पूरी-पूरी स्वतंत्र है। वह जितनी आपकी है, उतनी ही दूसरे की भी है। जो भाषा पर आधिपत्य की बात सोचते है, उनका आधिपत्य ही मिट जाता है। भाषा आधिपत्य की वस्तु नहीं है। अधिकार की वस्तु नहीं है। भाषा उपासना के लिये है। आराधना के लिये है, जीवन की तरह। भाषा अर्जित करने की चीज नहीं, उपलब्ध करने के योग्य है।
संसार की सारी वस्तुएँ भाषा में समाहित हैं। पता नहीं कैसे। किसी को मालूम नहीं। भाषा कितनी सूक्ष्म है कि उसमें सारा स्थूल समाहित है। भाषा में सबकुछ है। आग है। पानी है। नदी-पहाड़ है। पृथ्वी-आकाश है। भाषा में सब बँधा है। मगर भाषा किसी में नहीं बँधी है। भाषा में सब है। प्रेम है। घृणा है। स्तुति है। अभिनन्दन है। धिक्कार है। ऐसा कुछ नहीं है, जो भाषा में नहीं है। युद्ध भी है, शान्ति भी है। फिर भी भाषा में कुछ भी नहीं है। सबकुछ होकर भी कुछ भी न होने जैसा। कैसा विचित्र है। भाषा पूरी-पूरी भरी है। फिर भी पूरी-पूरी खाली है। पूरा खाली होकर ही पूरा भरना हो पाता है, क्या? सारे रूपों को अपने में समवा कर भी भाषा अरूप है। कितनी अपरूप है, भाषा!
भाषा का व्यवहार हम अपनी जरूरतों के लिये करते हैं। हमारी जरूरतें अनगिनत हैं। अनन्त हैं। अनन्त का भार अनन्त ही उठा सकता है। भाषा में अमित ऊर्जा है। आप चाहे जितना भी खर्च कर लें, फिर भी खर्च करने के लिये वह पूरी बची रहती है। भाषा में ऐसी ताजगी है कि वह दुहराव में कभी बासी नहीं होती। बासन का घिसने से भले मुलम्मा छूट जाय मगर भाषा की चमक घिसने से बढ़ती ही जाती है। भाषा की आत्मशक्ति कभी क्षरित नहीं होती।
बोल-चाल की भाषा, साहित्य की भाषा, विज्ञान की भाषा, व्यापार की भाषा, चिकित्सा की भाषा अलग-अलग भाषा नहीं है। ये सब भाषा के भोड़े भेद हैं। भाषा के अलग-अलग रूप हैं। जितने आदमी है, उतने रूप हैं। आदमी में जितने मनोभाव हैं, उतने रूप हैं। जितने मनोवेग हैं, उतने रूप हैं। भाषा एकदम निजी भी है और एकदम सार्वजनिक भी। भाषा जैसी सार्वजनिक निजता अन्यत्र दुर्लभ है। भाषा के साथ हमारे सम्बन्ध गोपन सम्बन्ध भी हैं और प्रकट सम्बन्ध भी हैं।
भाषा का स्रोत मनुष्य का जीवन ही है। भाषा की शक्ति, सामर्थ्य और समूची कुशलता भाषा के व्यवहार में ही निहित है। किसी भी शब्द में तयशुदा अर्थ पहले से भरा हुआ नहीं है। अर्थ हमेशा प्रयोक्ता ही भरता है, जितना भर सकता है।
जितना अर्थ उसके पास है। भाषाशास्त्र में हम जो भाषा के बारे में अध्ययन करते हैं, वह हमारी भाषा सम्बन्धी समझ को बढ़ाने के लिए है। उससे भाषा की अभिव्यंजना शक्ति में कोई फर्क नहीं आता। भाषा की अभिव्यंजना में जो कुछ भी इजाफा होता है, बोल-चाल के आवेग की पकड़ से होता है। साहित्य की भाषा में जो परिष्कार की प्रविधि है, वह इसी आवेग को आत्मसात करने की प्राविधि है, वह इसी आवेग को आत्मसात करने की प्रक्रिया में निहित है। किसी भी साहित्यकार का प्रशिक्षण भाषा का प्रशिक्षण नहीं है, वह जीवन-व्यवहार का अनुशीलन है। जीवन व्यवहार के रहस्यों के विदित होने से भाषा के प्रवाह और प्रभाव की बारीकियाँ स्वतः प्रगट हो उठती हैं।
नदी के प्रवाह को व्यंजित करने के लिये लोकभाषा में एक शब्द है-तरखा। यह शब्द ती्रवता का बोधक नहीं है, तीक्ष्णता का बोधक नहीं है, तिर्यकता का बोधक नहीं है। केवल वेग का बोधक नहीं है। जल की सघनता का बोधक नहीं है। इन सबका सम्मिलित बोधक वह है, मगर इनके अलावा वह कुछ और का भी बोधक है। इन सबके अतिरिक्त वह ठहराव के विपरीत शक्ति के उद्दाम आवेग का बोधक सबसे अधिक है। यही तरखा भाषा का प्राण है। यही उसकी प्राणशक्ति है। भाषा की प्राणशक्ति उसके प्रयोक्ता की प्राणशक्ति में सन्निहित है। भाषा अक्षत यौवना है। वह चिर कुमारिका है। वह द्रौपदी की तरह एक विवाह की सुहागरात के बाद फिर से दूसरे विवाह के लिये कुमारी हो उठती है। भाषा सचमुच पुनर्नवा है। क्षण-क्षण, प्रतिक्षण नया होने का, नया हो उठने का स्वभाव भाषा का स्वभाव है।
किसी को भाषा पर अधिकार होने का भ्रम हो सकता है। आलोचना उसके भ्रम को पुष्ट कर सकती है। मगर, नहीं। भाषा पर किसी का अधिकार संभव नहीं है। भाषा का अस्तित्व सारे अधिकारों को, अधिकारों की अवधारणा को निरस्त करती हुई अस्मिता है।
भाषा आदमी को पवित्र करती है। इस अर्थ में पवित्र करती है कि भीतर के भावों के उत्ताप को, उल्लास को उनकी अर्थवत्ता में व्यक्त कर देती है। भाषा आदमी को भर देती है। अपनी अंजलि से उलीच उलीच कर भर देती है। भाषा के समान मनुष्य को भरने वाला दूसरा कोई नहीं है।
हमारी भाषा चिरपुरातन होकर भी चिरनवीन है। हम शब्दों को बनाते नहीं हैं। भावदशा के अनुरूप शब्द हमारे सम्मुख प्रकाशित हो उठते हैं। हम उन्हें देख लेते हैं। उनको देख पाने की साधना ही साहित्य-साधना है। हमारी पारंपरिक भाषा में जो ‘द्रष्टा’ शब्द है, वह शब्दों के लिये भी उतना ही अर्थवान है। जब भाव और शब्द दोनों देखने में आ जाते हैं, जब दोनों भासित हो उठते हैं, भाषा चरितार्थ हो उठती है। भाषा की चरितार्थता की प्रक्रिया बड़ी लम्बी है। बड़ी कठिन है। वह दो दिन की नहीं है। दो पैसे की तो कत्तई नहीं है। उसके लिये अपने भीतर हमें उत्कण्ठा, आकुल अनुरोध, कठिन धैर्य और सबसे अधिक अथक प्रतीक्षा के सम्मुख बिना विचलित हुए खड़ा रहना होता है। हमारे पूर्वजों ने यह कठिन तप किया है। कठिन तप करके भाषा को उपलब्ध किया है। हमने भाषा को समृद्ध नहीं किया है। भाषा ने अपनी समृद्धि से हमें गौरव दिया है।
हमारी चिन्तन परम्परा में जो भाषा है, जो वाक है, वह मूल अस्तित्व से भिन्न नहीं है। अभिन्न है। वह उपार्जित नहीं है। उपलब्ध है। उपलब्ध और उपार्जित में जो अन्तराल है, वही भारतीय चिन्तन परंपरा और पाश्चात्य चिन्तन परंपरा का अन्तराल है।
भाषा के क्षेत्र में हमारी जो परंपरा है, वहीं हमारे भाषा प्रयोग को नियमित औरनर्देशित करने के लिये शुभ है। मंगलकारी है। समूची मनुष्य जाति के लिये कल्याणकारी है। हमारे लिये भाषा मनुष्य जाति के अस्तित्व को अभिव्यंजित करने का आधार है।
-Young Writer
बहुद्देशीय प्रेक्षागृह का 30 लाख बिल बकाया, कटेगा बिजली कनेक्शन
केंद्रीय विद्यालय पीडीडीयूनगर को बिजली विभाग ने जारी किया नोटिस‚ कभी काट सकते हैं कनेक्शन
Young Writer, डीडीयू नगर। केंद्रीय मंत्री व स्थानीय सांसद डॉ महेंन्द्रनाथ पांडेय के प्रयास से केंद्रीय विद्यालय परिसर में बहुद्देशीय प्रेक्षागृह पर तीस लाख रुपये का बिजली का बिल बकाया है। बकाए में बिजली विभाग कभी भी प्रेक्षागृह की बिजली काट सकता है। केंद्रीय विद्यालय परिसर में बने प्रेक्षागृह के संचालन की जिम्मेदारी केंद्रीय विद्यालय के पास है। करोड़़ों की लागत से बने प्रेक्षागृह का बिजली बिल अब तक नहीं दिया गया, यह एक प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
नगर सहित जनपद में प्रेक्षागृह और स्टेडियम की मांग लंबे समय से की जा रही थी। इसको देखते हुए केंद्रीय विद्यालय परिसर में 14 करोड़ की लागत से बहुद्देशीय प्रेक्षागृह का निर्माण किया गया। वर्ष 2018 में तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडे़कर ने इसका शिलान्यास किया था। देश भर में 12 हजार 500 केंद्रीय विद्यालयों में डीडीयू नगर का यह प्रेक्षागृह दूसरा सबसे बड़ा है। निर्माण के बाद 12 दिसंबर 2021 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, सांसद डॉ. महेन्द्रनाथ पांडेय ने संयुक्त रूप से इसका लोकार्पण किया था। इस दौरान वादा किया था कि बहुद्देशीय प्रेक्षागृह न सिर्फ धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए ठीक होगा, बल्कि इंडोर खेल में भी सहायक होगा। 820 लोगों की बैठने की क्षमता वाला आडिटोरियम पूरी तरह अत्याधुनिक है। पूरी तरह वातानुकूलित प्रेक्षागृह में अत्याधुनिक हाईक्वालिटी साउंड सिस्टम लगे हैं। वहीं यह पूरी तरह साउंड प्रूफ भी है। इसे सीपीडब्लू ने तैयार किया है। उद्घाटन के आठ माह बाद जुलाई 2022 में प्रेक्षागृह को केंद्रीय विद्यालय के हवाले किया गया। उद्धाटन के बाद अब तक यहां इक्का दुक्का छोड़ कर कोई कार्यक्रम नहीं हुआ है। इसमें भी अधिकतर स्कूल के कार्यक्रम हुए हैं। इस बीच लगभग दो वर्ष का बिजली बिल तीस लाख रुपये हो गया। इसका भुगतान नहीं किया गया है। ऐसे में बिजली विभाग ने बिजली काटने की नोटिस जारी कर दिया। बिजली बिल बकाए को लेकर नगर में चर्चाओं का बाजार गर्म है।










