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Thursday, October 8, 2026

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रावण का इंटरव्यू

रामजी प्रसाद भैरव
रामजी प्रसाद भैरव

Young Writer, साहित्य पटल। रामजी प्रसाद “भैरव” की रचना

रावण मर रहा था । अभी वह पूरी तरह से मरा नहीं था । उसे मरने में अभी समय था । वह जल्दी मर भी नहीं सकता । उसका मरना आसान नहीं था । उसे तिल तिल मरना था , घुट घुट मरना था । उसे अभी अपने पापों का हिसाब देना था । राम ने बाण मार कर घायल कर दिया था । उसकी नाभि का अमृत कुंड सूख गया । वह बेबस और लाचार मृत्यु की घड़ियां गिन रहा था । राम की सेना खुशियां मनाते हुए वापस लौट गयीं । रावण की बची खुची सेना, रावण के रणभूमि में गिरते ही भाग गई । झुटपुटे का समय था, झेंगुरों ने बोलना शुरू कर दिया था । रावण के कानों में लंकेश की जय का शोर गूँज रहा है । उसकी ऑंखें बन्द थी, पर होठों पर मुस्कान तैर रही थी । उसके कानों में पुनः लंकेश की जय सुनाई दी, पर वह बोला नहीं । उसी तरह मुस्कुराता रहा । ध्वनि फिर टकराई लंकेश की जय हो ।रावण ने आंखे खोली , सामने किसी अपरिचित को देखकर क्रोध से बोला -” कौन हो तुम ।”
” मैं हूँ , बंशीलाल पत्रकार, आप का इंटरव्यू लेने आया हूँ ।
रावण ने मुँह फेर कर आँखें बंद कर ली । बंशी लाल कुछ देर प्रतीक्षा किया फिर बोला -” महाराज, आप कुछ तो सन्देश दीजिये , आने वाले समय में लोग रावण को केवल लम्पट न समझ लें, इसलिए आप का बोलना जरूरी है ।”
रावण ने आँखें खोली -” क्या बोलूं , मनुष्य के लिए अहंकार ठीक नहीं है, अपना सर्वस्व नाश करा लेता है, जहाँ तक हो सके उसे बचना चाहिए । मैंने अहंकार को अपना बना लिया था , मेरी दशा देख रहे हो ।”
” महाराज ,मैं आप से क्या पूछूं , आप तो खुद ही महा पण्डित हैं । लेकिन एक बात समझ में नहीं आयी कि आप इतने बड़े ज्ञानी होकर सीता हरण जैसा जघन्य अपराध क्यों किया । “
” राम से प्रतिशोध लेने के लिए , वह असुरों का अहित कर रहा था ।”
” महाराज , आप सर्व शक्तिमान भी थे , जिसके चलने मात्र से धरती काँपती थी , किसी देवता में भी रावण से टक्कर लेने की क्षमता नहीं थी । फिर भी आप राम के डर से , चोरी से उनकी पत्नी को हर लाये , क्या यह उचित कदम था ।”
” राम के डर से नहीं , उसकी रूपवती स्त्री के आकर्षण में में मैं बंधा चला गया । उसे देखते ही उसके सौंदर्य पर मुग्ध हो उठा , फिर मौका देखकर हरण कर लिया । सोचा , पत्नी वियोग में राम सिर पटक कर मर जायेगा और या रोते बिलखते अयोध्या चला जायेगा । इस प्रकार मेरे प्रिय राक्षसों को मारने का दण्ड भी पा जाएगा ।”
” लेकिन आप ने एक स्त्री का हरण कर किस परम्परा की शुरुआत कर दी , लोग अपने प्रतिशोध के लिए स्त्रियों का अपहरण करेंगे और आप का उदाहरण देंगे “
रावण गम्भीर जो गया , कुछ देर चुप रहा फिर बोला -” मैंने प्रतिशोध में अंधे होकर सीता का हरण किया था , मुझे अब लगता है , यह मेरा अनुचित कदम था । जिसकी कीमत मैंने लंका को युद्ध के अनावश्यक आग में झोंककर , कुल का नाश करा कर चुकाई है । शायद लोगों को इससे सीख मिले । “
“आप पर व्यभिचार का भी आरोप लगता है , रम्भा और वेदवती इसके उदाहरण हैं । “
बंशीलाल के सवाल पर रावण कुछ देर फिर चुप रहा , फिर बोला -” जब मनुष्य के पास शक्ति आती है , वह भले बुरे कर्मों में भेद करना भूल जाता है । इसी अहंकार में मैंने रम्भा के साथ बलात सम्भोग किया । युगों युगों से मनुष्य अपनी इस कमजोरी पर नियंत्रण नहीं पा सका । उस समय मैं इतना मदान्ध था कि स्त्री को केवल भोग्या ही समझता था । मुझे लगता था सृष्टि की यह सुंदर कृतियाँ केवल भोग के लिए बनाई गई हैं । इसलिए मैं रमणियों के साथ भोग करता रहा “
” सीता को आप ने अशोक वाटिका में ही क्यों रखा । आप के पास महल थे , सुविधाएं थी ।”
” रम्भा के प्रेमी नल कुबेर ने मुझे , उस घटना के बाद श्राप दिया था ” यदि मैंने किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध , बल पूर्वक भोगने की चेष्टा की तो , उसी छण मेरे मस्तिष्क के टुकड़े हो जाएंगे ।इस डर से मैं सीता को महल से दूर वाटिका में रखा । सोचा धीरे धीरे वह अपने पति को भूल जाएगी , और मुझे स्वीकार कर लेगी ।”
” आप के भाई विभीषण ने भी आप को समझाने की बहुत कोशिश की , उसने राम से बैर न करने की सलाह दी । सीता को सकुशल वापस लौटने को कहा , परंतु आप ने एक न सुनी , उसे लात मार कर खदेड़ दिया । “
” उस समय मैं राजा था , ऐश्वर्य मेरे चरणों में लोट रहा था । समस्त संसार में मेरे जैसा शक्तिशाली कोई नहीं था । विभीषण बार बार राम के आगे घुटने टेकने को कहता तो मेरा खून जल जाता । जिस राम के पैरों में पादुका तक नहीं थी । ऐसे राम के आगे मैं रावण कैसे घूटने टेक देता । जिस रावण का नाम सुनते ही बड़े बड़े राजा , सामने पड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे । उस रावण को वह बार बार झुकने की सलाह दे रहा था । इसलिए मैंने गुस्से में लात मार कर निकाल दिया ।यहाँ भी मेरा अहंकार ही प्रभावी था । जो मैं राम की शक्ति को नहीं भांप सका , और अपना अहित करा बैठा , इस बात से मुझे ये सीख मिली , शत्रु को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए । “
” युद्ध तो किसी देश के हित में नहीं होता महाराज , लेकिन आप तो जैसे युद्ध की कामना ही की । जब अंगद मैत्री प्रस्ताव लेकर गया , उसे भी आप ने अपमानित करके लौटा दिया ।”
” तुम सही कह रहे हो , युद्ध किसी भी देश के लिए हितकर नहीं होता । युद्ध में यदि कोई बड़ी हानि होती है तो वह है जनहानि , कोई इसकी पूर्ति नहीं कर सकता । मैं अपनी ताकत के अहंकार में इतना मत्त था कि राम जैसे वनवासी को चुटकियों में मसलने की कल्पना करता था । इसलिए युद्ध को बहुत गम्भीरता नहीं लिया। सोचा युद्ध समाप्ति के लिए मेरे छोटे मोटे वीर योद्धा ही काफी है । लेकिन परिणाम तुम स्वयं देख रहे हो , मेरे जैसा विश्व विजेता अंतिम साँसे गिन रहा है । “
” हनुमान जी द्वारा लंका दहन के बाद भी आप की चेतना नहीं लौटी , आप राम से समझौता कर निष्कंटक राज्य कर सकते थे ।”
” तुम सही कह रहे हो , मैं ऐसा कर सकता था । लेकिन एक योद्धा को बिना युद्ध किये हथियार डाल देना क्या उचित होता , जब मेरे पास प्रशिक्षित योद्धा थे , मै स्वयं शक्तिशाली था , इतनी सहजता से कैसे हार मान लेता , आज रावण भले पराजित हो गया , लेकिन संसार रावण को प्रतिभट के रूप में जरूर याद करेगा ।”
” सुना है अभी अभी लक्ष्मण जी आये थे आप से शिक्षा ग्रहण करने , आप ने उनको जो कुछ बताया , मुझे भी बताने का कष्ट करें , ताकि संसार उन बातों को जान सके ।” बंशी लाल ने कहा ।
” मैं समर्थ राजा था , जो चाहता था , पा लेता था । परंतु सामान्य लोगों की तरह मेरे अंदर भी आलस्य भरा था । जो कार्य तत्काल करना चाहिए था , उसे कल पर टालता रहा । इस कारण मेरे जीवन की तीन इच्छाएं पूरी न हो सकी , जो अब मेरे मरने के साथ खत्म हो जाएगी । समय बड़ा मूल्यवान होता है । हर क्षण की कीमत होती है । हर क्षण में ग्रह नक्षत्रों का अलग अलग योग होता है । मनुष्य जो काम कल पर टाल देता है , उसका संयोग भी टल जाता है । हर मनुष्य इसके फलाफल को नहीं जानता । इसलिए वह आलस्य करता है । मैं जानता था , फिर भी आलस्य किया । जिसका परिणाम है कि मैं वो न कर सका जो , जो मेरे लिए सहज था । मनुष्य को सकारात्मक सोच वाले काम शीघ्र कर लेना चाहिए ,और नकारात्मक सोच वाले काम को कल पर टाल देना चाहिए । “
” आखिर आप करना क्या चाहते थे । ” बंशी लाल ने पूछा
रावण ने बंशी लाल की ओर देखा , वह लिखने को उद्दत था । रावण बोला -” पहला मैं सोने में सुगन्ध पैदा करना चाहता था , दूसरा स्वर्ग तक सीढ़ी लगाना चाहता था और तीसरा समुद्र के खारे पानी को मीठा करना चाहता था । यह सब करने में मैं सक्षम था , फिर भी अपने आलस्य के कारण नहीं कर पाया । मैंने लक्ष्मण को यही शिक्षा दी , मनुष्य के लिए आलस्य अच्छी चीज नहीं है । इसका त्याग कर देना ही उचित होता है ।”
अचानक रावण चौंका -” अरे , यह शोर कैसा , लगता है कुछ लोग मुझसे मिलने आ रहे हैं , अब तुम जाओ । ” रावण ने इतना कहकर पुनः आँखें बंद कर ली । बंशीलाल चुपचाप लौट गया ।

जीवन परिचय-
 रामजी प्रसाद " भैरव "
 जन्म -02 जुलाई 1976 
 ग्राम- खण्डवारी, पोस्ट - चहनियाँ
 जिला - चन्दौली (उत्तर प्रदेश )
मोबाइल नंबर- 9415979773
प्रथम उपन्यास "रक्तबीज के वंशज" को उ.प्र. हिंदी  संस्थान लखनऊ से प्रेमचन्द पुरस्कार । 
अन्य प्रकाशित उपन्यासों में "शबरी, शिखण्डी की आत्मकथा, सुनो आनन्द, पुरन्दर" है । 
 कविता संग्रह - चुप हो जाओ कबीर
 व्यंग्य संग्रह - रुद्धान्त
सम्पादन- नवरंग (वार्षिक पत्रिका)
             गिरगिट की आँखें (व्यंग्य संग्रह)
देश की  विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन      
ईमेल- ramjibhairav.fciit@gmail.com

अजब–गजब: 36 वर्ष में दलित के नाम आवंटित भूमि नहीं ढूंढ सका राजस्व विभाग

चहनियां के गजेंद्रपुर में नापी के दौरान मौजूद ग्रामीण। Young Writer
चहनियां के गजेंद्रपुर में नापी के दौरान मौजूद ग्रामीण।

लेखपाल पर गलत नापी कर गजेंद्रपुर के ग्रामीणों को परेशान करने का लग रहा आरोप
सात बार हुई नापी, हर बार अलग अलग भूमि का सीमांकन होने से लोगों में रोष

Young Writer, चंदौली‚ चहनियां। धानापुर ब्लॉक अंतर्गत गजेंद्रपुर (प्रसादपुर) गांव निवासी दलित जयप्रकाश राम के नाम 36 वर्ष पहले आवंटित हुई भूमि को राजस्व विभाग अभी तक नहीं ढूंढ पाया है। लेखपाल व कानूनगो ने इसके लिए सात बार नापी किया। और हर बार अलग अलग स्थान पर सीमांकन करके चले गए। जिसे लेकर दलित परिवार और दूसरे अन्य किसानों के साथ विवाद उत्पन्न हो गया है। आलम यह है कि यदि समय रहते यहां पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब गांव में वर्ग संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
दरअसल वित्तीय वर्ष 1987 में जयप्रकाश के पिता श्यामा के नाम तत्कालीन ग्राम प्रधान ने जिस जमीन का पट्टा किया था, वह कोई खेत नहीं, बल्कि पोखरी थी। जिसपर कब्जा दिलाने के नाम पर राजस्व विभाग के अधिकारी कर्मचारी उसे सिर्फ और सिर्फ आश्वासन देते रह गए। अब लगभग 36 वर्ष बीत गए हैं। जयप्रकाश क्षेत्रीय लेखपाल और कानूनगो के साथ मिलकर उक्त भूमि को ढूंढ रहे हैं। किंतु उन्हें उक्त भूमि नहीं मिल रही है। जयप्रकाश का आरोप है कि उनके नाम आवंटित भूमि के लिए अब तक 7 बार नापी हो चुकी है। हर बार लेखपाल और कानूनगो अलग अलग किसानों के भूमि में सीमांकन करके चले जाते हैं। इस वजह से पूरे गांव का माहौल खराब हो गया है। गांव निवासी एक व्यक्ति ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि एक जाति विशेष के दबंग लोग 4 डिसमिल जमीन दूसरे का कब्जा करके अपना घर बना लिए हैं और अपनी चोरी छिपाने के लिए वे लोग लेखपाल व कानूनगो को अनुचित लाभ देकर आस पास के सीधे साधे काश्तकारों के खेत में सीमांकन करा दे रहे हैं। इस वजह से गरीब परिवार को उनके नाम आवंटित भूमि तो नहीं मिली। ग्रामीणों का कहना है कि गजेंद्रपुर के हल्का लेखपाल दबंगों के जाल में फंसकर पूरे गांव को परेशान किये हुए हैं। इस बारे में पूछे जाने पर लेखपाल निवास वर्मा से उनके मोबाइल नंबर पर सम्पर्क करने की बहुत कोशिश की गई। किंतु उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।

-Young Writer, Chahaniya

हस्तिनापुर एक्सटेंशन : कब्र से उठती आवाज

हस्तिनापुर एक्सटेंशन
हस्तिनापुर एक्सटेंशन

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह, HASTINAPUR EXTENTION

कभी-कभी जब आस-पास कोई आवाज नहीं होती है, बहुत-सी आवाजें आने लगती है। कानों में गूँजने लगती हैं। मन पर छाने लगती हैं। गाने लगती हैं, तरह-तरह के रुदन के गान। नींद उचट जाती है।
मेरे गाँव में कोई कब्र नहीं है। फिर भी लगता है पूरा गाँव ही कब्रगाह है। घर-घर में कब्र है। बहुत कम लोग हैं, भाग्यशाली, जो शयनयान पर सोते हैं। हमारे देश में शयनागार में सोने वाले बड़े थोड़े-से लोग हैं। बड़े-थोड़े से लोग हैं, जिन पर लोकतंत्र की कृपा है। पता नहीं क्यों हमारे देश में लोकतंत्र बहुत थोड़े-से लोगों पर कृपालु है? ऐसा क्यों हैं? बार-बार सवाल उठता है। मगर किससे पूछें? सवाल जनमता है, फिर तुरत मर जाता है। हम उसे दफन कर देते हैं। हम जहाँ होते है, वहीं दफन कर देते हैं। हम जहाँ रहते हैं, वहीं दफन कर देते है। हम अपनी लाशें बिना कफन के दफन कर देते हैं।
हम जहाँ अपने सवाल दफन करते हैं, देखते हैं कि वहाँ पहले-से भी बहुत-सी लाशें दफन है। अपनी लालसा की तमाम लाशें वहाँ दफन हैं। अपने सपनों के तमाम शव वहाँ दफन हैं। अपने विरोध और विद्रोह के तमाम मुर्दे वहाँ गड़े है। अपनी जरूरतों का क्या कहना, उनके शव को दफनाने के लिए तो रोज-रोज गड्ढे खोदने पड़ते हैं। हम गड्ढे खोदते हैं, पाटते हैं फिर उन्हीं के ऊपर चारपाई डालकर सोने का प्रयत्न करते हैं। नींद आये तो ठीक। न आये तो ठीक। आज हमारे देश का अधिकांश आदमी कब्र के ऊपर चारपाई बिछाकर सोने को अभिशप्त है। क्यों? आजादी तो सबके लिये आयी थी। समूचे देश के लिये आई थी। लोकतंत्र तो सबका है? ‘‘हाँ, हाँ, हाँ…..’’ सब कहते हैं। सब झूठ कहते हैं। सब जो कहते हैं, झूठ कहते हैं। जो भी कुछ कहना जानते हैं, झूठ कहते हैं। बड़ा गजब हैं। जो, कुछ कहना नहीं जानते, वे कुछ भी नहीं जानते हैं। न सच जानते हैं। न झूठ जानते हैं। वे सिर्फ कहने वालों का कहा मानते हैं।

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हमारी व्यवस्था का दावा है कि आजादी के बाद हमारे देश में शिशुओं की मृत्यु दर में बहुत कमी आई है। यह सच है। मगर इससे ज्यादा यह सच है कि हमारे देश में सपनों की मृत्यु दर में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इस विशाल स्वप्नदर्शी देश की अधिकांश आबादी सपनों के शिशुओं से वंचित आबादी बन गई है। इस महान देश के समूचे गाँव सपनों के पूतों से निपूते गाँव बन गये हैं। वे सपनों के गर्भधारण के अयोग्य बनते जा रहे हैं। बंध्यापन की बीमारी आँख-आँख को अपनी गिरफ्त में लपेटती, लीलती जा रही है। गर्भपात की दुर्घटना अब आम बनती जा रही है। सपना कहीं किसी की आँख में कोटि जतन से पैदा हो भी गया तो पैदा होते ही उसका मरना भी तय है। उसे जमुआ दबा देता है। सपना पैदा होता है, पैदा होते ही मर जाता है। माटी जगाने की नौबत ही नहीं आती। यह रोज-रोज की मृत्यु का अवसाद अब तो मातम मनाना भी भूल गया है।

सपना देखने का अधिकार हर किसी का अधिकार हुआ करता था। मगर नहीं। अब ऐसा नहीं है। अब समूचे देश में यह अधिकार एक समय में केवल एक अदमी को होता है। वह समूचे देश और सारे देशवासियों के लिये सपना देखने का अकेला हकदार होता है। उसका ही सपना, सबका सपना होना चाहिए। सबके सपने, उसके सपने भले न हो सकें मगर उसका सपना सबका सपना हो सके, इसका वह पक्का संजाल रचता है। चूँकि एक समय में एक आदमी के ऊपर काम का बड़ा भारी बोझ रहता है, इसलिये वह और सब जरूरी कामों को संभालने के लिये सपने देखने के अपने अधिकार को अपने विश्वस्त शुभेच्छुओं को सुपुर्द कर देता है। वह अपने निकट के थोड़े-से चुनिन्दा लोगों को सपने देखने की खुली आजादी सौंप देता है। जो सपने देखने के हकदार चुने जाते है, उनकी आँखें बड़ी होती हैं। उनकी आँखे बड़ी-बड़ी आँखे होती हैं। उनकी बुद्धि विचक्षण होती है। उनके इरादे पक्के होते हैं, फौलादी। उनकी भूख बड़ी विकराल होती है। उनका हाजमा दुर्दान्त होता है। फिरे वे इतमिमान से सपने देखते हैं। दिन-रात देखते हैं। वे सपने ही खाते-पीते है। सपने ही बोलते-बतियाते हैं। सपने में डूबते-उतराते हैं। अपने सपने पर इतराते हैं। उनका सपना समूचे देश को अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में कैद कर लेता है। समूचा देश उनमें खो जाता है। बड़ी-बड़ी आँखों के बड़े-बड़े सपनों में समूचे देश के असंख्य छोटे-छोटे लोगों के छोटे-छोटे सपने विलीन होकर बिला जाते हैं।

उनका कहना होता है कि छोटे-छोटे सपने देश को छोटा बना देते हैं। तुच्छ बना देते हैं। दुनिया में देश की गरिमा को बौना बना देते हैं। यह ठीक नहीं है। दुनियाँ के बीच देश की नाक का सवाल है। देश का हाथ कट जाय, तो कट जाय। पाँव कट जाय चलेगा। कलेजा फट जाय, कोई बात नहीं। मगर नाक, साबूत रहनी चाहिए।
इधर हमारे गाँव हैं, जिन्हें देश की आत्मा कहा जाता है, उनकी आत्मा न जाने कहाँ अलोप हो गई है। उनके प्राण उनके शरीर से प्रयाण कर चुके हैं। फिर भी वे जी रहे हैं। जीवित बचे हुये हैं। काहे लिये? क्या प्रयोजन है, उनके जीवित बचे रहने का? बिल्कुल बेशरम हैं क्या? बिल्कुल बेहया हैं क्या? कौन कहे भला! नहीं, वे जी रहे हैं, अपने सपनों के शिशु शवों की कब्रगाह बनाने के लिये। वे कब्र खोदने के काम को करने के लिये जी रहे हैं। इसके लिये उनका जिन्दा रहना जरूरी है, इसलिये जी रहे हैं। जिन्दा रहना उनकी मजबूरी है, इसलिए जी रहे हैं।

अब हमार गाँव में अधिकांश के लिये घर बनाने का सपना अपने जनम के साथ ही मरा हुआ सपना है। अपनी संततियों के पोषण का सपना मरा हुआ सपना है। अपने बच्चों के लिये शिक्षा का सपना मरने के लिये बीमार सपना है, जिसके लिये कोई अस्पताल नहीं है। कोई डाक्टर नहीं है। कोई दवा नहीं है। अपनी बेटियों के ब्याह का सपना इतना डरावना सपना है कि उसके खौफ में नींद फटकती ही नहीं। भर पेट खाने का सपना, मन मुताबिक खाने का सपना, जवान मौत का शिकार सपना है। कुछ खरीदने का सपना, कुछ जोड़ने का सपना? पूछिये मत। ऐसे सपने अव्वल तो गर्भ में ही नहीं आते। गलती से आ भी जाते हैं तो दुर्दान्त नियति की गर्जना से गर्भपात को प्राप्त हो जाते हैं। हाँ, कुछ घटने के, कुछ हटाने के सपने जरूर बहुत-सी आँखों में उतराते हैं, जैसे विषैले पानी में मरी हुई मछली उतराई रहती है।

इन तमाम सपनों को रोज-रोज समाधि देनी होती है। कहाँ? यहाँ कोई मुर्दहिया नहीं है। कब्रगाह नहीं है। कुल मिलाकर एक गुजर करने भर की छोटी-सी जगह है। उसी जगह में कब्र खोदनी है। सपने दफनाने हैं। उसी कब्र पर नहाना है। खाना है। चारपाई डँसाकर सोना है। फिर चारपाई उठाकर, उड़ासकर फिर कब्र खोदना है। आस-पास कहीं कोई आवाज नहीं है। न हँसी-दिल्लगी की। न विरोध की। न विद्रोह की। न प्रतिरोध की। न आक्रोश की। ऐसे में चारपाई के नीचे से कब्र से आवाज आती है। नींद से जगाती है। फिर नींद को भी कब्र में खींच ले जाती है।

हम कब्र में पाँव लटकाये पड़े हैं। हम न सोये हैं, न जागे हैं। हम न सो पा रहे हैं। न जाग पा रहे हैं। हम केवल भाग पा रहे है। हम भाग रहे है। अपने से भाग रहे हैं। अपनों से भाग रहे हैं। सपनों से भाग रहे हैं। भाग-भाग कर भी वहीं हैं। वहीं कब्र पर खड़े। कब्र पर पड़े।
कब्र से आवाज उठ रही है। आवाज उठ रही है। आवाज गूँज रही है,- ‘‘छोटे-छोटे आदमी, आदमी नहीं हैं, क्या? छोटे आदमी देश के नहीं हैं, क्या? छोटी-छोटी आँखें, आँखें नहीं है, क्या? छोटे-छोटे सपने, सपने नहीं हैं, क्या? छोटी मछलियाँ, मछलियाँ नहीं है, क्या?
हमारा लोकतंत्र समूचे तालाब के लिये है, या सिर्फ तालाब की बड़ी मछलियों के लिये।
हमारा लोकतंत्र बहुमत का लोकतंत्र है? बहुजन का लोकतंत्र है? सर्वजन का लोकतंत्र है? या हुकूमत के हुनर का लोकतंत्र है?

हमारा लोकतंत्र छोटे-छोटे लोगों के मौलिक अधिकारों के कब्र खोदने के लिए बड़ी-बड़ी आँखों को बड़े-बड़े सपने अलाट करने वाला लोकतंत्र है। हमारे लोकतंत्र को हमारा राम, राम कहना।

-Young Writer

Nauragh के औरवाटांड़ में जानवर से बदतर स्थिति में जी रहे ग्रामीणः मनोज डब्लू

नौगढ़ के औरवाटांड गांव में ग्रामीणों की समस्याओं से रूबरू होते मनोज सिंह डब्लू।
नौगढ़ के औरवाटांड गांव में ग्रामीणों की समस्याओं से रूबरू होते मनोज सिंह डब्लू। फाइल फोटो।

एक माह बाद बिजली विभाग के एक्सईएन को बांधने की सपा नेता मनोज डब्लू ने दी चेतावनी

गांव में न बिजली, न सड़क और ना ही शिक्षा की है कोई व्यवस्था

Young Writer, Nauragh चंदौली। समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक मनोज सिंह डब्लू शुक्रवार को नौगढ़ क्षेत्र के दौरे पर रहे। इस दौरान वह औरवाटांड़ गांव पहुंचे, जहां अव्यवस्थाओं व दुश्वारियों को देखकर मर्माहत हो उठे और उनका दर्द ग्रामीणों के समक्ष झलक उठा। विकास के खोखले दावों के बीच जानवरों की तरह जी रहे ग्रामीणों के दर्द को महसूस किया और सरकार के स्वच्छ भारत अभियान समेत करोड़ों-अरबों की योजनाओं पर सवाल खड़े किए। साथ ही भाजपा के स्थानीय विधायक व सांसद को भी आड़े हाथ लिया। बिजली विभाग के एक्सईएन को खुली चेतावनी दी कि यदि एक माह के अंदर औरवाटांड में बिजली आपूर्ति व्यवस्था स्थापित नहीं हुई तो वह उन्हें आमजन के सहयोग से बांधने का काम करेंगे।

इस दौरान उन्होंने गांव के शौचालयों की दुर्दशा को देखा। साथ ही पेयजल किल्लत से भी रूबरू हुए। ग्राम प्रधान संतलाल समेत ग्रामीणों ने बताया कि गर्मी में हैंडपम्प जवाब दे जाते हैं। ऐसे में कर्मनाशा नदी का पानी ही उनके जीवन के एकमात्र सहारा बचता है, जिससे वह खाना बनाते हैं और उसी को ही पीकर अपनी प्यास बुझाते हैं। गांव में सोलर लाइटें लगी हैं लेकिन उनकी बैट्री गायब है। मनोज डब्लू ने कहा कि शौचालयों को इस कदर बनाया गया है कि वह उपयोग से बाहर हैं। जो अपने आप में कई सवाल खड़े करती है और सरकार के स्वच्छ भारत मिशन पर करारा तमाचा है। यहां सड़कें नहीं है गांव आने के लिए दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। बच्चों के लिए स्कूल नहीं है। हालात इतने खराब हैं कि छोटे बच्चों को एनजीओ के लोग पढा-लिखा रहे हैं।

Manoj Singh W ने कहा कि जो लोग जनहित के मुद्दे पर कटाक्ष करते हैं वह इस संदेश को देखने के बाद समय निकाले और जनता के बीच आकर उनकी समस्याओं को जानने के साथ ही उनके दर्द को महसूस करें। आजादी के इनते साल बाद भी औरवाटांड गांव में बिजली नहीं है जो आज भी ढिबरी युग में जी रहे है। केरोसिन का वितरण बंद होने से ग्रामीणों के समक्ष दुश्वारियां और बढ़ गयी है। औरवाटांड गांव के हालात इतने बुरे हैं कि ऐसी स्थिति में जानवर भी जिंदा नहीं रह पाए। बावजूद इसके यहां के बाशिंदे हरदिन तमाम दुश्वारियों के बीच किसी तरह अपना गुजर-बसर कर रहे हैं। कहा कि एक महीने बाद वह फिर से औरवाटांड जाएंगे और यहां व्यवस्था बदली नहीं हुई मिली तो अफसरों को बांधने का काम होगा। क्योंकि चंदौली जनपद को अब आगे बदहाल स्थिति में नहीं छोड़ा जाएगा।

-Young Writer Naugarh

Chandauli:कोतवाली पुलिस व स्वाट टीम ने घेरे बंदी कर हीरोइन तस्कर को दबोचा, 12 लाख की हिरोइन बरामद


चंदौली। सदर कोतवाली पुलिस व सर्विलांस टीम ने शुक्रवार को एक हीरोइन तस्कर को धर दबोचा और उसको गिरफ्तार कर कोतवाली ले आयी वही न्यायालय के समक्ष पेश कर विभिन्न धाराओं में जेल भेज दिया।
दरसल सदर कोतवाल राजीव प्रताप सिंह सर्विलास सेल प्रभारी श्याम जी यादव व स्वाट टीम प्रभारी शैलेन्द्र प्रताप सिंह अपने हमराहियों के साथ मुख्यालय स्थित साव जी पोखरे के समीप चेकिंग अभियान चला रहे थे। कि एक व्यक्ति साव जी के पोखरे पर संदिग्ध दिखाई दिया। इसी दौरान वो पुलिस को देखकर भागने लगा पुलिस ने तत्काल घेरे बंदी कर हीरोइन तस्कर को धर दबोचा पूछताछ करने पर उसने अपना नाम हलीम अहमद वार्ड नंबर 9 मोहनिया जनपद भभुआ बिहार बताया पुलिस ने तस्कर का तलासी लिया तो उसके पास से 28 ग्राम नाजायज हिरोइन बरामद हुआ जिसकी अंतरराष्ट्रीय कीमत 12 लाख 50 हजार बतायी जा रही है। पूछताछ में बताया कि बिहार से हिरोईन खरीद कर लाता हूँ जिसे फुटकर के रूप में चंदौली के विभिन्न क्षेत्रों में बेच देता हूं पुलिस ने तस्कर को गिरफ्तार कर कोतवाली ले आयी और न्यायालय के समक्ष पेश कर एनडीपीएस एक्ट में मुकदमा पंजीकृत कर जेल भेज दिया। इस दौरान बंटी सिंह , रामआशीष, गौतम कुमार सरोज सुशील सिंह, नीरज कुमार,अजीत कुमार मौजूद रहे।

हस्तिनापुर एक्सटेंशन : रसो वै सः

हस्तिनापुर एक्सटेंशन
हस्तिनापुर एक्सटेंशन

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह
HASTINAPUR EXTENTION

कभी-कभी लगता है, हम बहुत कुछ जानते हैं। ठीक भी है। बरसों-बरस पढ़ने में बिता देने के बाद भी भला ऐसा क्यों न लगे? लगना ही चाहिए। मगर…..
मगर क्या?
मगर यह कि कभी लगता है कि हम कुछ भी नहीं जानते। हम जो जानते हैं, उसे जानने जैसा कहना बड़ा मुश्किल हो उठता है। दूसरों के लिये तो कहा जा सकता है। दूसरों को तो हम जनाते ही हैं कि हम बहुत कुछ जानते हैं। आपसे कम नहीं जानते हैं। ज्यादा ही जानते हैं। आप मानें, न मानें आपकी मर्जी। फिर भी कोई मानता कहाँ है। कोई नहीं मानता। मजबूरी में मानना पड़े भी तो कोई मानना तो नहीं ही चाहता। मगर खुद से कहना कि हम बहुत कुछ जानते हैं, नहीं हो पाता।

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बड़ी मुश्किल परेशानी है। बड़ा टेढ़ा है। बड़ी टेढ़ी खीर है। कुछ न जानने की हीनता को कैसे स्वीकार करें? नहीं, यह भी स्वाभाविक नहीं है। संभव नहीं है। कुछ जानने की महत्ता को कैसे सँभालें? नहीं, यह भी संभव नहीं है। सँभालने की शक्ति ही नहीं है। सामर्थ्य ही नहीं है। फिर….? फिर क्या रास्ता है?
हमें लगता है, कुछ जानने की उत्कण्ठा ही मनुष्य के जीवन में रस का संचार करने में समर्थ है। सक्षम है। यही हीनता की कुण्ठा से मुक्त करने में कामयाब है। यही महत्ता के दर्प से छुटकारा दिला कर मनुष्य को सहज रखने में सफल है।
कुछ जानने की उत्कण्ठा ही मनुष्य को जीवन में रस की तरफ ले जाती है। रस में ले जाती है। रस के स्रोत की ओर उन्मुख होने को उत्प्रेरित करती है।
रस क्या है? भला कौन नहीं जानता। अदना से अदना आदमी भी जानता है। जाहिल से जाहिल आदमी भी जानता है। हर कोई जानता है कि हर पदार्थ में रस है। सबका अपना स्वाद है। सबका अपना आस्वाद है। हर व्यक्ति में रस है। किसिम-किसिम का रस है।
बात में रस है,बतरस का सर। रूप में रस है, सम्मोहन का रस। दृश्य में रस है, आकर्षण का रस। ध्वनि में रस है, आमंत्रण का रस। गन्ध में रस है, मादन का रस। व्यंजन में रस है, आस्वाद का रस। साहित्य में रस है, तोष का रस। अध्यात्म से रस है, आनन्द रस। सृष्टि में सब तरफ रस ही रस है। हर जगह रस ही रस है।
सचमुच?
नहीं। शायद रस कहीं नहीं है। शायद रस किसी में नहीं है। रस अनुभव में नहीं है। रस की लालसा हर कहीं है। रस, कहीं नहीं है।
हर कोई रस के लिये लालायित है। हर किसी में रसपान की ललक है। मगर रस का कहीं पता नहीं है।
साहित्य का तो बच्चा-बच्चा रस के बारे में जानता है। रस की परिभाषा जानता है। लक्षण जानता है। कविता में उदाहरण जानता है। भेद जानता है। प्रकार जानता है। संख्या जानता है। सबकुछ जानता है, रस के बारे में। रस नहीं जानता है।
रस को जाने बगैर जीवन कितना नीरस है। मनुष्य कितना तुच्छ है। पदार्थ कितने अपदार्थ हैं। पद कितना सुन्न है। वस्तुएँ कितनी अवास्तविक हैं। सब कुछ कितना व्यर्थ है।
हमें लगता है, रस शायद जानने की चीज नहीं है। रस के सन्दर्भ में जानना बड़ा उथला मालूम पड़ता है। जो पाने लायक है, पीने लायक है, जीने लायक है, उसके लिये जानना बड़ा अपर्याप्त है।
रस क्या है? कह पाना बड़ा कठिन है। कुछ चीजें कहने में नहीं आतीं। गूँगा बना देती हैं। फिर भी…….। फिर भी कहने का सिलसिला कब थमा है। नहीं, गूँगे कण्ठ में भी बहुत देर तक वाणी विरम नहीं सकती। वाणी के प्रवाह को कण्ठ का स्तंभन कभी बाँध नहीं सका है। मूकता का अवरोध जब टूटता है, मूक वाचाल बन जाता है। मौन बहुत तरह से बोलना जानता है। सच कहें तो मौन ही वक्तृता का उत्स है। जो बिना मौन हुये बोलते रहते हैं, उनका बोलना बकवास बन जाता है। साहित्य तो मौन की ही अभिव्यंजना है। कविता गूँगे का गान है।
कविता करने वालों ने रस के बारे में कहा है। बार-बार कहा है। खूब-खूब कहा है। कहा है,- ‘‘रसो वै सः’’। रस ही वह है। जो रस है, वही वह है।
‘वह’, कौन? यह रस के बीच में वह कहाँ से आ गया? रस में वह कहाँ से आ गया?
नहीं, ऐसा नहीं है। वह कहीं से नहीं आया। वह रस में से भी नहीं आया है। वह, रस ही है। रस ही है। रस ही वह है। अभिन्न हैं दोनों। बस नाम ही दो है। अस्तित्व एक ही है।
फिर….? वही बात। वह क्या है? रस क्या है?
वह अस्तित्व का बोध है। रस अस्तित्व का बोध है। अस्तित्व असीम है। अनन्त है। अनादि है। सतत है। अव्याहत है। अव्यय है।
रस व्यक्ति नहीं है। व्यक्ति में नहीं है। वस्तु नहीं है। वस्तु में नहीं है। भाषा में नहीं है। वह सबमें है। सर्वत्र है। सर्वकाल में है। इसीलिये वह जनमता नहीं है। उसका जन्म नहीं होता। वह प्रगट होता है। वह निष्पन्न होता है।
वह है पहले से ही। निष्पन्न होता है, भाव में। भाव, चेतना का स्वभाव है। जब हम भाव में नहीं होते हैं, अभाव में होते हैं। भाव में न होना ही सीमा में होना होता है। खण्ड में होना होता है। मिटने के लिये होना होता है। बँटने के लिए होना होता है। लघुतम इयत्ता में होना होता है। मरने के लिये होना होता है। अभाव संसार का विस्तार है। झूठ का विस्तार है। दुःख का विस्तार है। भय का विस्तार है। भाव अस्तित्व का स्वभाव है। रस हमें अस्तित्व का बोध कराता है। रस अमृत है। रस मुक्ति है। वह हमें मुक्त करता है।ै लघुता से मुक्त करता है। सीमा से मुक्त करता है। खण्ड से मुक्त करता है। मृत्यु सीमा की ही होती है। असीम में मृत्यु है ही नहीं। रस हमें असीम में स्थिति देता है। रस असीम है। वह असीम है।
रस में असीम की व्याप्ति है। असीम में रस व्याप्त है। विराट का बोध हीरस का बोध है। लघु सत्ता का विराट अस्तित्व में विलय ही रस की निष्पत्ति है। अनुभोक्ता रस का आश्रय नहीं है। रस ही अनुभोक्ता का आश्रय है। रस अनुभोक्ता में विलीन नहीं होता। अनुभोक्ता ही रस में विलीन होता है। जब अनुभोक्ता नहीं रह जाता, रस रह जाता है। जब अनुभोक्ता होता है, रस नहीं होता। जहाँ अनुभोक्ता होता है, वहाँ रस नहीं होता।
रस वैयक्तिक नहीं है। वह वैयक्तिक सत्ता नहीं है। वह निर्वैयक्ति सत्ता है, जिसमें व्यक्तियों के अपार समूह समाहित हैं। व्यक्ति सत्ता का सामूहिक सत्ता में विलय ही रस का निष्पादन है। रस, वह लीला भूमि है, जहाँ सीमाओं का असीम से अभिसार होता है। रस, मिटने के मंगल उत्सव का आह्लाद है। साहित्य हमें इस आह्लाद को उपलब्ध कराने का सबसे सहज माध्यम है।
वैयक्तिक सत्ता के अतिक्रमण की उत्प्ररेणा ही साहित्य की अस्मिता है। साहित्य हमें भावदशा में स्थित करके रस का बोध देता है।ै व्यक्ति के सुख या दुःख का आख्यान साहित्य नहीं है। जो है, उसका निरूपण साहित्य नहीं है। जो नहीं है, उसका निदर्शन साहित्य नहीं है। साहित्य व्यक्ति के समूह में विलयन की व्यंजना है। साहित्य ‘जो नहीं है’, उसके ‘जो है’ उसमें समाहन का आह्वान हैै। साहित्य अस्ति में नास्ति और नास्ति में अस्ति के विलोपन और प्रगटन की संध्या का अपूर्व अस्तित्व है। साहित्य, वह संध्या का सौन्दर्य है, जिसमें दिन विलीन हो जाता है, रात प्रगट हो जाती है। जिसमें रात समाहित हो जाती है और दिन उग आता है। जहाँ व्यक्ति तिरोहित हो जाता है, समूह उद्भासित हो उठता है। समूह व्यक्ति में और व्यक्ति समूह में समाहित होते रहते हैं। साहित्य अद्भुत है। अद्भुत इस अर्थ में कि इसमें व्यक्ति समूह में समाहित होकर भी समूह के वाचक व्यक्ति के रूप में बना रह जाता है। सागर में सीपी का होना तो होता ही है, सीपी में सागर का होना भी साहित्य में है। सीपी में सागर का होना ही साहित्य का होना है। भाव का होना है। रस का होना है। सीमा में असीम का अनुप्रवेश ही साहित्य में रस का मर्म है।

रस बड़ा मार्मिक है। वह स्थूल नहीं है। वह सूक्ष्म भी नहीं है। वह व्यक्ति नहीं है। वस्तु भी नहीं है। वह दृश्य नहीं है। वह दृष्टि भी नहीं है। वह स्थूल में भी है। सूक्ष्म में भी है। व्यक्ति में भी है। वस्तु में भी है। दृश्य में भी है। दृष्टि में भी है। जहाँ भी, जब भी खण्ड, अखण्ड में समंजित होने को पाँव उठाता है, रस आविर्भूत हो उठता है। भाव अखण्ड है। असीम है। अविनाशी है। भावसत्ता हजारों साल पहले भी थी। आज भी है। हजारों साल बाद भी रहेगी। भाव, मनुष्य पर आश्रित नहीं है। वह सिर्फ मनुष्य में व्यक्त होता है। भाव के व्यक्त होने से ही मनुष्य, मनुष्यत्व को उपलब्ध होता है। सार्थक होता है। भाव कभी मनुष्य में विलीन नहीं होता। वह मनुष्य में व्यक्त होकर फिर अपनी असीम और अविनाशी सत्ता में स्थित रह जाता है। मनुष्य जब भाव में होता है, रस बोध को उपलब्ध हो जाता है।

व्यक्ति जब भी भाव में होता है, भावदशा में होते ही वह व्यक्ति इकाई नहीं रह जाता। वह अपनी क्षुद्र इकाई की सीमा को अतिक्रांत कर जाता है। लाँघ जाता है। उलाँघ जाता है। भावदशा में व्यक्ति अपने में स्थित नहीं रहता। स्थिर नहीं रहता। वह अपने से इतर से सम्पन्न होते है। अपने से इतर से सम्पन्न होना ही व्याप्ति से सम्पन्न होना होता है। जब भी आदमी प्रेम में होता है, क्रोध में होता है, भय में होता है, जुगुप्सा में होता है, सिर्फ अपने में नहीं होता। रस, अपने में व्याप्ति के प्रसार का दुर्लभ बोध है। साहित्य दुर्लभ की सुलभता का आयोजन है।

रस, सीमा और असीम की सन्धि में है, क्या? हाँ, है। जहाँ सीमा, असीम में समाहित होती है, मृत्यु, अमरता में, विलीन होती है, अभाव, भाव में मग्न होता है, अहं, अस्तित्व में सम्मिलित होता है, वहीं रस स्थित है। जहाँ अनेकताएँ अपनी एकता का अभिज्ञान पा लेती है, अवबोध पा लेती है, रस फलित हो जाता है।
साहित्य मनुष्यजाति के लिये मूल्यवान थाती है, तो इसीलिए कि वह व्यक्ति में उसके आन्तरिक व्योम को उसकी व्याप्ति में व्याप्त होने को उत्प्रेरित करता है। सीपी के भीतर जो सागर समाहित है, उसे सागर का अनुभव देने में सहायता देता है। सार्वभौम अस्तित्व में वैयक्तिक अस्तित्व को समाहित होने का आमंत्रण, साहित्य का आमंत्रण है। साहित्य मनुष्य जीवन में व्याप्त रस का आस्वादन कराकर मनुष्य को रस के स्रोत की ओर उन्मुख करने का महत उद्योग है।

साहित्य, वैयक्तिक उद्योग कत्तई नहीं है। वह व्यक्ति की उपलब्धि कदापि नहीं है। साहित्य चेतना के सार्वभौम और सार्वजनिक स्वरूप की अस्मिता के बोध को आत्मसात करने का अभिक्रम है। स्थितियों के बदल जाने से, परिस्थितियों के परिवर्तित हो जाने से, जो अपनी अर्थवत्ता से विच्युत हो जाता है, वह साहित्य नहीं, साहित्य का प्रतिमास है। मनुष्य के बदल जाने से मनुष्य की चित्तवृत्तियाँ नहीं बदल जातीं। चित्तवृत्तियाँ सनातन हैं। चित्तवृत्तियाँ सार्वजनिक हैं। सबमें होने के कारण ही चित्तवृत्ति रसबोध में सक्षम है। चित्तभूमि का रसबोध के माध्यम से प्रसार ही साहित्य का ध्येय है। साहित्य सर्वजन की सम्पत्ति है। सम्पूर्ण मनुष्यजाति की विरासत है। साहित्य का सम्मान सामूहिक अस्मिता के गौरव का सम्मान है। साहित्य, मनुष्यजाति की विराट चेतना को उपलब्ध हो लेने की उत्कट अभीप्सा का संरक्षक है। पोषक है। पालक है।

साहित्य में जो रस है, वह जीवन में व्याप्त रस से अभिन्न है। जो रस है, वही वह है। वह, यानी विराट अस्तित्व। वह विराट अस्तित्व, जिसमें सब समाहित हैं। जिसमें, सारी वैयक्तिक इकाइयाँ सन्निहित है। विराट अस्तित्व ही व्यक्ति इकाई में विभक्त है। विभक्त की अविभक्त की ओर यात्रा ही साहित्य की यात्रा है। साहित्य की यात्रा पूर्णता में पर्यवसित होने की यात्रा है। रस, पूर्णता के बोध का उद्बोधन करता है।
रस, जीवन को जानने का, अस्तित्व को जानने का, उसकी विराटता को, उसकी असीमता को जानने का आधार है। रस को उपलब्ध हुये बिना कुछ भी जानना संभव नहीं।
जीवन सारी स्थितियों को अपने में समवा लेता है। सारी विकटताएँ और उत्कटताएँ जीवन में समा जाती हैं। सारी विरसताएँ रस में समाहित हो जाती हैं। रस कितना विराट है।
जो रस है, वही जीवन है। वही अस्तित्व है। वही विराट है। वही असीम है। वही सबकुछ है। रसो वै सः।

आह्वानः गौशाला के मवेशियों के लिए चारा व नकदी दान कर बने पुण्य के भागी

चंदौली‚ कंदवा। गौशाला में पल रहे पशुओं को आमजन चारा दान कर पुण्य का भागी बन सकता है। इसमें बढ़-चढ़कर सहयोग करने वाले नागरिकों को पुरस्कृत भी किया जाएगा। यह जानकारी देते हुए खंड विकास अधिकारी बरहनी विकास सिंह ने बताया कि विकास खंड बरहनी के कुशहां मे गौशाला है शासन की पहल पर छुट्टा निराश्रित पशुओं के लिए बने। इस गौशाला में पल रहे पशुओं के लिए शासन स्तर से तो चारा का प्रबंध किया जाता ही है साथ ही साथ इच्छुक ग्रामीण, समाजसेवी यदि इन पशुओं को चारा दान करना चाहें तो निःसंकोच कर सकते हैं। बताया कि चारा ही नहीं नकद राशि भी दान कर दानदाता की सूची में सम्मिलित होकर ब्लाक मुख्यालय से रसीद प्राप्त कर पुरस्कृत हो सकते हैं। बताया कि गौ सेवा से बढ़कर कोई सेवा नहीं है ऐसे मे आमजन को सहयोग कर पुण्य का भागी बनना चाहिए।खंड विकास अधिकारी ने बताया कि ब्लाक में सुनील गुप्ता को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि ऐसे दानदाताओं का नाम रजिस्टर मे बकायदे अंकित करते हुए चारा या नकद राशि उपलब्ध कराने वाले दानदाता को प्राप्ति रसीद भी उपलब्ध कराएं। बताया कि दानदाताओं के दान से जहां पशुओं को संजीवनी प्रदान होगी वहीं दानदाता पुण्य के भागी भी बनेगें।

-Young Writer

चहनिया से मुग़लसराय पैदल यात्रा में उमड़े हजारो लोग‚ पीडब्ल्यूडी पहुंचे मनोज, पूछा क्यों नहीं बन पा रही सड़क?

Young Writer, चंदौली। समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक मनोज सिंह डब्लू गुरुवार को अपने वादे के मुताबिक सुबह छह बजे चहनियां मंदिर में दर्शन कर पदयात्रा का आगाज किया। दर्जनों गांव से होते हुए जर्जर व गड्ढे में तब्दील हो चुकी चहनियां-मुगलसराय मार्ग पर चले। इस दौरान जगह-जगह ग्रामीण ने पदयात्रा में जुड़कर वृहद आकार प्रदान किया। वहीं ग्रामीण पदयात्रा में शामिल लोगों की सेवा व खिदमत करते दिखे। वहीं किसी ने जल-पान कराया तो किसी ने माल्यार्पण कर जनहित के मुद्दे पर आवाज बुलंद करने वालों का स्वागत व हौसला बढ़ाया। धीरे-धीरे यह कारवां मुगलसराय की तरफ बढ़ा और करीब 11 बजे पदयात्रा नगर क्षेत्र में दाखिल हुआ।


इस दौरान पहले से शरहद पर भारी तादात में स्थानीय लोगों के साथ ही समाजवादी पार्टी के नेता व कार्यकर्ता पदयात्रा के इंतजार में खड़े नजर आए और पदयात्रा के साथ नगर में नारेबाजी करते हुए पीडब्ल्यूडी आफिस पहुंचे। वहां मनोज सिंह डब्लू ने एक्सईएन पीडब्ल्यूडी से मुगलसराय-चहनियां मार्ग के निर्माण संबंधित फाइलों को तलब किया। इस दरम्यान किसी बात को लेकर मुगलसराय कोतवाल व सपा नेता मनोज सिंह डब्लू में तनातनी भी हुई। एक्सईएन से सड़क न बनने की वजह जाननी चाही। साथ ही भाजपा के नेताओं पर जमकर हमला बोला। कहा कि चहनियां-मुगलसराय बहुत खराब हो चुकी है और यह सड़क चुनावी सड़क बनकर रह गयी है। यह कोई हवाहवाई बातें नहीं, बल्कि पीडब्ल्यूडी विभाग के दफ्तर की फाइल इसे पुष्ट कर रही है। क्योंकि जिस सड़क का स्टीमेट 2018 में 28 करोड़ का बना और उसे अपनी उपलब्धि बताते और गिनाए हुए भाजपा के नेताओं ने 2019 का चुनाव लड़ा और जीते भी। इसके बाद यही सड़क फिर से चुनावी मुद्दा बनी 2021 में स्टीमेट को बढ़ाकर 35 करोड़ कर दिया गया और इसके निर्माण के नाम पर एक बार फिर भाजपा नेताओं ने 2022 का चुनाव लड़े। इसके बाद अब 2023 में एक फिर से सड़क का स्टीमेट नए सिरे से तैयार करते हुए बजट को 78 करोड़ कर दिया है, क्योंकि एक बार फिर इसी सड़क के मुद्दे पर भाजपा 2024 का चुनाव लड़ने की तैयारी में है। हालांकि सड़क नहीं बनने के सवाल का पीडब्ल्यूडी के पास कोई जवाब नहीं है। लेकिन अब यह सड़क नहीं बनी तो पीडब्ल्यूडी को अबकी बार बड़ा आंदोलन होगा और महकमे के साथ ही भाजपा को भी जनता के सवालों का जवाब देना होगा।


28 करोड़ की सड़क के निर्माण पर खर्च होंगे 78 करोड़
चंदौली। पीडब्ल्यूडी विभाग के मुताबिक 15 किलोमीटर लम्बी मुगलसराय-चहनियां का पहला स्टीमेड 2018 में विभाग ने तैयार किया था। उस वक्त उक्त सड़क बनती तो सरकारी खजाने पर 28 करोड़ का बोझ पड़ता, लेकिन चुनावी साल होने के कारण सड़क नहीं बनी और मामला ठंडे बस्ते में चला। एक बार फिर उक्त सड़क के निर्माण का याद 2021 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आया। पीडब्ल्यूडी विभाग ने एक बार फिर सड़क निर्माण का स्टीमेट तैयार किया, जो 35 करोड़ था। फिर भी उक्त सड़क नहीं बन सकी। ऐसे में 2023 में एक बार फिर विभाग की ओर से नया स्टीमेट तैयार किया गया है जो 78 करोड़ का है फिलहाल सड़क अभी भी जर्जर व क्षतिग्रस्त हाल में है उसका निर्माण होना है। यदि मुगलसराय-चहनियां सड़क का निर्माण 2018 में होता तो उस पर 28 करोड़ ही खर्च होते, लेकिन अब उस पर 50 करोड़ रुपये अधिक यानी 78 करोड़ होने है। फिलहाल सड़क कब बनेगी यह तो पीडब्ल्यूडी विभाग भी नहीं बता पा रहा है।


सकलडीहा व मुगलसराय में नहीं दिखे दिग्गज
चंदौली।
समाजवादी पार्टी के दिग्गज व फायर ब्रांड नेता मनोज सिंह डब्लू जनहित के मुद्दे पर अपनी सक्रियता व मुखरता के लिए हमेशा सुर्खियों में रहते हैं। हाल-फिलहाल वह भाजपा के नौ साल चंदौली बदहाल अभियान को लेकर चर्चा में रहे। अभियान खत्म होते ही एक बार फिर से नए सिरे से जनहित के मुद्दों को उठाने में लगे पड़े है। चहनियां से उन्होंने पदयात्रा का आगाज किया। इस दौरान लोग तो जमा हुए, लेकिन सकलडीहा इलाके के समाजवादी पार्टी का कोई बड़ा नेता उनके साथ चलता नजर नहीं आया। पैदल चलकर वह लोगों का स्नेह व आशीष प्राप्त करते हुए वह मुगलसराय पहुंचे। वहां भी कोई भी दिग्गज नेता जनहित के मुद्दे पर निकली पदयात्रा में नहीं दिखा। जबकि सर्वविदित है कि सकलडीहा में विधायक प्रभुनारायण सिंह यादव व मुगलसराय में पूर्व सांसद रामकिशुन यादव वरिष्ठ समाजवादी नेता हैं, लेकिन न तो ये खुद नजर आए और ना ही उनके परिवार या उनके समर्थक ही पदयात्रा में दिखे। जिसे लेकर आमजन के साथ ही राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं रहीं।

Chandauli:घर में घुसकर चोरी की घटना को अंजाम देने वाले चोरों को पुलिस ने किया गिरफ्तार,लाखो के गहने व नगदी बरामद

चंदौली। धानापुर पुलिस ने चेकिंग के दौरान बुधवार को मुखबिर की सूचना पर चोरी की घटना को अंजाम देने वाले चार चोरो को धर दबोचा और उनको गिरफ्तार कर कोतवाली ले आयी वही न्यायालय के समक्ष पेश कर विभिन्न धाराओं में जेल भेज दिया।
दरसल धानापुर थाना प्रभारी प्रशांत सिंह अपने हमराहियों के साथ चेकिंग अभियान चला रहे थे। तभी मुखबिर से सूचना मिली कि धराव गांव में चोरी करने वाले चोर गहने व रूपयों का बटवारा कर के सीतापोखरी से बिरना जाने वाले रास्ते से भागने के फिराक में हैं। उक्त सूचना पर पुलिस टीम सीता पोखरी से बिरना जाने रास्ते पर घेरे बंदी कर चोरो को धर दबोचा पुलिस ने जब चोरो से पूछताछ किया तो उन्होंने अपना नाम रितेश राम सुजीत राम दोईज कुमार विरेन्द्र गांव धरांव बताया। पुलिस ने जब चोरो की तलासी लिया तो उनके पास से चोरी के पीली धातु का एक हार व एक जोड़ी हार के सेट कान का झाला तथा सफेद धातु का एक सेट हाथ पहनने वाली मेंहदीं पीली धातु की चार चूड़ी व सफेद धातु का एक चाभी का छल्ला सफेद धातु की एक जोड़ी पैजनी पीली धातु का एक मंगलसूत्र एक पीली धातु का मारवाड़ी नथिया सफेद धातु का एक जोड़ी पैजनी एक जोड़ी छागल एक जोड़ी पायल पीली धातु का एक मांग टीका पीली धातु की एक लेडीज व एक जेन्ट्स अंगूठी व सफेद धातु की कर्धनी व चार जोड़ी सफेद धातु की मीना तथा 200 रूपये करेंसी नोट 60000 रूपये व 100 रूपये की करेंसी नोट 29400 रूपये व 10 रूपये की करेंसी नोट 370 रूपये कुल 89770 रूपये बरामद हुआ। चोरो ने बताया कि कि मेरे गांव के पंकज कुमार के घर में कई दिन से ताला लगा था तो हम लोग रात्रि में चहारदिवारी कूद कर अन्दर घुस गए और हथौड़ी रम्मा से कुन्डी का ताला तोड़कर घर रखे बक्से व आलमारी से रूपये व गहने को चुरा लिये। घटना के कुछ दिन बीत जाने व माहौल शान्त हो जाने पर हम लोग बटवारा करके जा रहे थे की पुलिस ने पकड़ लिया गया। पुलिस ने तत्काल चोरो को गिरफ्तार कर कोतवाली ले आयी और न्यायालय के समक्ष पेश कर जेल भेज दिया।

Chandauli:आकाशीय बिजली का कहर एक की मौत आधा दर्जन गंभीर


चकिया। कोतवाली क्षेत्र के भीषमपुर गांव में बुधवार को आकाशीय बिजली की चपेट में आने से खेत में शौच करने गई 75 वर्षीय वृद्धा भागीरथी कि मौत हो गई। सूचना पर मौके पर पहुंची कोतवाली पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पंचनामा कर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया। वही आकाशीय बिजली के झटके से अलग-अलग गांव में कुल 5 लोग आंशिक रूप से झुलस गए जिनका इलाज जिला संयुक्त चिकित्सालय में किया जा रहा है।
भीषमपुर गांव निवासी स्वर्गीय धनराज की पत्नी भागीरथी बुधवार की दोपहर खेत में शौच करने गई थी। उसी दौरान तेज बारिश आगयी जब तक वह अपने घर पहुंच पाती थी बीच तेज गड़गड़ाहट के साथ गिरी आकाशीय बिजली की चपेट में आ गई जिससे उसकी घटनास्थल पर ही मौत हो गई। सूचना मिलते ही कोतवाली पुलिस तत्काल मौके पर पहुंच गए जहां से सबको कब्जे में ले लिया। भागीरथी की मौत से उसके पुत्र कपिल देव और महादेव का रो रो कर बुरा हाल था। वहीं आकाशीय बिजली की चपेट में आने से भीषमपुर गांव निवासी माला देवी 45 वर्ष, और मुजफ्फरपुर गांव निवासी सरोज मौर्य 45 वर्ष आंशिक रूप से झुलस गए जिनका इलाज जिला संयुक्त चिकित्सालय में किया जा रहा है। इसके अलावा राजदरी पर्यटक स्थल पर घूमने जा रहे अलीनगर थाना क्षेत्र के गोधना गांव निवासी पप्पू 50 वर्ष और अनवर 26 वर्ष मुरारपुर तिराहे के पास सड़क किनारे बनी मडई में बारिश से बचने के लिए खड़े थे। वही उसी मडई के नीचे शिकारगंज क्षेत्र के मुड़हुआ दक्षिणी गांव निवासी आकांक्षा 16 वर्ष भी मौजूद थी। जो आंशिक रूप से झुलस गई तेज जिन्हें जिला संयुक्त चिकित्सालय में भर्ती कराया गया जहां उनका इलाज चल रहा है घटना की सूचना मिलते ही मौके पर पहुंचे पूर्व जिला पंचायत सदस्य डॉ प्रदीप मौर्या थाना प्रभारी मिथिलेश तिवारी ने उनका हालचाल जाना

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