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Wednesday, October 21, 2026

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जनता के सम्मान के लिए रहूंगा समर्पितः रमेश जायसवाल

मुगलसराय विधायक रमेश जायसवाल को जीत की बधाई देते लोग।

नवनिर्वाचित विधायक को लोगों दी बधाई व शुभकामनाएं

Young Writer, मुगलसराय। विधानसभा चुनाव में मतगणना के पश्चात नवनिर्वाचित विधायकों को बधाईसंदेश व शुभकामनाएं देने का क्रम शुक्रवार को सुबह शुरू हो गया। इस क्रम में मुगलसराय से निर्वाचित विधायक रमेश जायसवाल को भी उनके समर्थकों ने आवास पर पहुंचकर शुभकामनाएं वह बधाई दी। लोगों द्वारा विधायक के आवास पर पहुंचकर उन्हें माल्यार्पण करने के साथ ही मिठाई खिलाकर खुशी जाहिर की।
इस क्रम में ग्राम सभा पचोखर के प्रधान प्रतिनिधि महेंद्र लाल श्रीवास्तव ने अपने गांव वासियों के साथ उनके आवास पर पहुंचकर गांव की जनता की तरफ से उन्हें बधाई व शुभकामनाएं दी। अपने स्वागत से अभिभूत होकर विधायक रमेश जायसवाल ने कहा कि मेरी जीत जनता के स्नेह व सम्मान की परिणाम है। मेरे लिए जनता ही सर्वाेपरी है। जनता के सम्मान के लिए सदैव समर्पित रहूंगा। यह जीत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व आमजन के दिलों में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की जीत है। हमारी जीत यहां की पूरी जनता की जीत है जनमानस के कार्यों के लिए सदैव समर्पित रहूंगा। इस मौके पर राकेश कुमार श्रीवास्तव, सोमारु बिंद, संजय तिवारी, पंकज सिंह, रमेश कुमार, मनीष प्रजापति, सुरेंद्र विश्वकर्मा, राजेश तिवारी, धर्मेंद्र मुखर्जी, पप्पू जायसवाल आदि मौजूद रहे।

बोर्ड परीक्षा: डीआईओएस ने लिया तैयारियां की जायजा

महेंद्र टेक्निकल इंटर कालेज सभागार में आयोजित बैठक में उपस्थित प्रधानाचार्य।

प्रधानाचार्यों व केंद्र व्यवस्थापकों के साथ बैठक कर दिए निर्देश

Young Writer, चंदौली। यूपी बोर्ड के हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की परीक्षाएं 24 मार्च से शुरू हो रही हैं, जो 12 अप्रैल तक चलेगी। अबकी बार हाईस्कूल के 32558 तथा इंटरमीडिएट के 27163 परीक्षार्थी परीक्षा में शामिल होंगे। इस तरह यूपी बोर्ड परीक्षा में 59721 परीक्षार्थी शामिल होंगे। इसे देखते हुए परीक्षा को सकुशल संचालन एवं तैयारियों के संबंध में जिला विद्यालय निरीक्षक डा. विजय प्रकाश सिंह ने शुक्रवार को महेंद्र टेक्निकल इंटर कालेज में केंद्र व्यवस्थापकों व प्रधानाचार्यों के साथ बैठक की।
इस दौरान डा. विजय प्रकाश सिंह ने जनपद के सभी केन्द्र व्यवस्थापकों को बोर्ड परीक्षा-2022 के आयोजन हेतु हाईस्कूल एवं इण्टरमीडिएट परीक्षार्थियों की संख्या के सापेक्ष 80 प्रतिशत उत्तर पुस्तिका 13 मार्च तक प्राप्त करने के निर्देश दिए। कहा कि महेंद्र टेक्निकल इंटर कालेज से उत्तर पुस्तिकाएं प्राप्त करने के बाद सीरियल नंबर व कोड नंबर रजिस्टर पर अंकित करें। बोर्ड परीक्षा से संबंधित प्रश्न-पत्रों को डबल लॉक वाले आलमारी में सीसीटीवी की निगरानी में सुरक्षित रखा जाए। शासन एवं विभागीय दिशा-निर्देशानुसार परीक्षा के सकुशल सम्पादन हेतु प्रत्येक परीक्षा कक्षों में परीक्षार्थियों के अनुसार फर्नीचर की व्यवस्था एवं कक्षों में सीसीटीवी कैमरा व वाइस रिकार्डर, राउटर, डीवीआर आदि उपकरणों को क्रियाशील रखा जाय। कहा कि प्रत्येक कक्षाओं में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था के साथ ही साफ-सफाई सुनिश्चित कर लें। केन्द्र व्यवस्थापकों को अवगत कराया कि विद्यालय की चहारदिवारी एवं मुख्य प्रवेश द्वार पर लोहे का गेट की व्यवस्था होनी चाहिए। केन्द्र पर शुद्ध पेयजल एवं छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय की आदि की व्यवस्था होनी चाहिए। केन्द्र पर विद्युत व जनरेटर की व्यवस्था के साथ कम्प्यूटर सिस्टम एवं दो दक्ष कम्प्यूटर आपरेटर की मौजूदगी होनी चाहिए। इन व्यवस्थाओं की जांच हेतु राजकीय माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाचार्यों को जांच अधिकारी नामित किया गया है। जांच रिपोर्ट अनुकुल न पाये जाने पर संबंधित केन्द्र व्यवस्थाकों की जिम्मेदारी तय करते हुए कार्यवाही की जाएगी। निर्देश दिया कि बिना अनुमति के कोई भी केन्द्र व्यवस्थापक मुख्यालय से बाहर अवकाश पर नहीं जाएंगे। इस अवसर पर डा. रामचंद्र शुक्ल, डा. कृष्ण लाल श्रीवास्तव आदि उपस्थित रहे।

सकलडीहा विधायक ने बाबा कीनाराम का किया दर्शन पूजन

रामगढ़ मठ में दर्शन पूजन करते विधायक प्रभु नारायण सिंह यादव।

Young Writer, चहनियां। सकलडीहा विधानसभा चुनाव जीतने के बाद शुक्रवार को विधायक प्रभु नारायण सिंह यादव रामगढ़ में बाबा कीनाराम का दर्शन पूजन किया। वहीं जगह-जगह विधायक का भव्य स्वागत हुआ। विधायक ने क्षेत्र में विकास कराने का दिया आश्वासन दिया।
विदित हो कि विधानसभा चुनाव-2022 सकलडीहा का इस बार फिर सपा के खाते में गया है। चुनाव जीतने के बाद शुक्रवार को विधायक प्रभु नारायण सिंह यादव समर्थकों संग बाबा कीनाराम मठ प्रांगण में पूरे विधि-विधान के साथ दर्शन पूजन किया। साथ ही जनकल्याण की मंगल कामना भी की। इसके पश्चात चहनियां कस्बा, गुरेरा, रामगढ़, मारूफपुर आदि जगहों पर भव्य स्वागत किया गया। इस दौरान विधायक प्रभु नारायण सिंह यादव ने कहा कि क्षेत्र का विकास कराना ही प्रथम लक्ष्य है। जनता ने जो सम्मान दिया है उसके लिए क्षेत्रवासियों का सदैव आभारी एवं ऋणि हूं और अगले पांच साल जनहित के कार्यों को अपने-आप को समर्पित करता हूं। सकलडीहा विधानसभा में आमजन की सुविधाओं को ध्यान में रखकर विकास कार्य को गति दिलाने पर ध्यान दिया जाएगा। इस दौरान जिला पंचायत सदस्य अजीत यादव, प्रधान रमाकांत यादव, बलवंत सिंह, अनिल यादव, सुभाष यादव, रविन्द्र यादव, परवेज अहमद, सन्तोष यादव, धर्मेंद्र यादव, सरिद्वार यादव, भोला यादव, बृजमोहन कुशवाहा, मुन्ना सिंह, रामअवध, शुभम चौहान, तौकिर अहमद, पप्पू टाइगर आदि लोग उपस्थित थे।

मझवां विधायक डा.विनोद कुमार बिंद का हुआ सम्मान

पचोखर में डा. विनोद कुमार बिंद का स्वागत एवं सम्मान करते ग्रामीण।

पचोखर में ग्रामीणों ने फूल-माला पहनाकर किया स्वागत

Young Writer, नियामताबाद। क्षेत्र पचोखर गांव में शुक्रवार को मझवा से निर्वाचित विधायक डा.विनोद कुमार बिंद के आगमन पर ग्रामीणों ने भव्य स्वागत एवं सम्मान किया। इस दौरान भाजपाइयों के साथ ही बिंद समाज के अग्रणी नेताओं ने फूल माला पहनाने के साथ ही समर्थन में गगनभेदी नारे भी लगाए
बताते चलें कि गोधना स्थित रमादेवी फैक्चर हॉस्पिटल एंड ट्रामा सेंटर के निदेशक डा. विनोद कुमार बिंद चार साल पहले से ही मिर्जापुर की मझवा विधानसभा में अपनी राजनीतिक सक्रियता बनाने के साथ ही उसे अपनी कर्मभूमि बनाने में पूरी शिद्दत के साथ जुटे थे। लेकिन विधानसभा चुनाव-2022 में समाजवादी पार्टी ने डा. विनोद बिंद को मझवा की जगह ज्ञानपुर सीट देकर विधानसभा प्रत्याशी बनाया और डॉक्टर विनोद बिंद ने टिकट को लौटा कर निषाद पार्टी के टिकट पर मझवा सीट से चुनाव लड़ें और विधायक निर्वाचित हुए। विधायक बनकर पहली बार लौटे डा. विनोद कुमार बिंद का शुक्रवार को स्थानीय कार्यकर्ताओं ने ढोल नगाड़ों से विधायक का सम्मान किया। इस अवसर पर शुभम चश्मा घर के निदेशक डा.चंद्र प्रकाश बिंद, नीलू पठान, बृजेश बिंद, राणा प्रताप सिंह, डा.सुदर्शन, पन्ना सेठ, गब्बर सिंह, सोहन लाल बिंद, महेश बिंद, आदि उपस्थित रहे।

चंदौली सपा की हार से बेरोजगार युवक ने जला दिया अपना शैक्षणिक सर्टिफिकेट, बोला फौज की भर्ती रोजगार की उम्मीद खत्म


चंदौली। विधानसभा चुनाव में सपा की हार से हताश रेवसा गांव निवासी युवक ने गुस्से में अपना शैक्षणिक सर्टिफिकेट को आग लगा दिया। बोला कि सपा की हार से अब नौकरी व रोजगार की उम्मीद खत्म हो गई है। सपा की सरकार बनती को युवाओं के लिए फौज में भर्ती समेत रोजगार के अन्य दरवाजे खुलते। पूरे प्रकरण का वीडियो सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रहा है। इसको लेकर लोगों में तरह-तरह की चर्चाएं व्याप्त हैं।
अजीत को मतगणना से पहले तक उम्मीद थी। कि सपा ही सरकार बनाएगी। इसके बाद जिले में सेना भर्ती होगी। वहीं युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खुलेंगे। इसको लेकर सपा नेताओं व प्रत्याशियों ने मंच से खूब वादे भी किए थे। लेकिन चुनाव में पार्टी की बड़ी हार हुई। इससे न सिर्फ पार्टी के नेता व प्रत्याशी मायूस हैं, बल्कि सपा समर्थक सदमे में हैं। अजीत ने अपना शैक्षणिक सर्टिफिकेट आग के हवाले कर दिया। किसी ने इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया में वायरल कर दिया।

मनुष्य जाति में पारस्परिकता की प्रस्तावना

वरिष्ठ साहित्यकार डा. उमेश प्रसाद सिंह।
वरिष्ठ साहित्यकार डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

हमारी चिन्तन परम्परा में नैतिक मूल्यों का सम्बन्ध मनुष्य से उतना नहीं है, जितना मनुष्य जाति की पारस्परिकता से है। हमारे समाज में मनुष्य के उत्कर्ष का मानदण्ड हमेशा से उसके सामाजिक अवदान पर अवलम्बित रहा है। व्यक्ति इकाई चाहे जितनी समृद्ध हो, शक्तिशाली हो, बुद्धिमान हो, उसका कोई मतलब नहीं है। मतलब केवल इस बात से है कि वह दूसरों के काम का कितना है। इसीलिये वैयक्तिक उत्कर्ष को हमारे यहाँ कभी भी अभ्यर्थना का आधार नहीं समझा गया है। कबीर का दोहा हमारे पारंपरिक विश्वास का प्रवाचक बनकर जनचेतन की स्मृति में उद्भासित है-
बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।
मनुष्य की सत्ता निरपेक्ष सत्ता नहीं है। व्यक्ति सत्ता हमेशा ही व्यक्ति की सामूहिक सत्ता के साथ मनुष्येत्तर और प्राकृतिक सत्ता की पारस्परिकता में ही अपना अर्थ ग्रहण करती है। नीति उसे ही कहा जाता है, जो मनुष्य को मनुष्य, पशु-पक्षी, प्रकृति और यंत्र के साथ उसके आपसी सम्बन्ध के अर्थ का बोध कराती है। इसी नीति को धारण करने की शक्ति को नैतिकता कहा जाता है। नीति हमें एक-दूसरे के नजदीक ले आने का काम करती है। एक-दूसरे के नजदीक होने की प्रविधि को ही पुरानी भाषा में नीति कहा जाता है। इस विद्या की विरासत को ही नैतिकता के नाम से पुकारा जाता है।
नैतिकता को लेकर आज हमारी अवधारणा कुछ भिन्न तरह की हो चुकी है। इस अवधारणा को विकसित करने में पाश्चात्य चिन्तन प्रणाली की प्रभावी भूमिका है। आज नैतिकता का नाम लेते ही हमारे नथुनोें में जो गन्ध आती है, उसमें सबसे अधिक मात्रा में पुरानेपन की बू होती है। इसके साथ ही पिछड़ेपन की, अव्यावहारिकता की, दकियानूसी की, अवैज्ञानिकता की और आधुनिकता विरोध के साथ-साथ किसिम-किसिम की न जाने कौन-कौन-सी गन्ध भी गड्मड् रहती है। हमारे समय की एक बिडम्बना यह भी है कि बहुत-सी भ्रांतियां न जाने कैसे हमारा विश्वास बन गई हैं। अपने विश्वासों से विलग होते जाने और भ्रांतियों के विश्वास बनते जाने की प्रक्रिया से बेखबर बने रहना हमारा विकट दुर्भाग्य है। इस दुर्भाग्य से जूझने के लिये यह संगोष्ठी हमें उत्प्रेरित करने में सहायक सिद्ध होगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
नैतिकता कुछ वैयक्तिक सदगुणों के समुच्चय का नाम नहीं है।
नैतिकता आदमी को आन्तरिक रूप से उस शक्ति से सम्पन्न करती है, जिससे वह अपने समय में समाज और राष्ट्र को सही मायने में उन्नत और मजबूत बनाने में कारगर हो सके। यह केवल धर्म सम्बन्धी क्षेत्र तक सीमित नहीं है, अपितु यह धर्म, अर्थ, काम के साथ सम्पूर्ण जीवन को अपने में समाहित करती है। नैतिकता उन्नत और समृद्ध के लिये परीक्षित और परिणाम में असंदिग्ध विश्वासों का अभिधान है। वैयक्तिक अभ्युन्नति के असीम आयामों को सुलभ रखते हुये पारस्परिकता के विकास का संधान नैतिकता का लक्ष्य होता है। अपने सुख के विस्तार के साथ सबके सुख को विस्तार देने का भाव नैतिकता की निर्मिति है। नैतिकता समूचे जीवन व्यवहार के नियमन की वह संहिता है, जिसमें मानवीय चेतना के विकास के दीर्घकालीन अनुभव की धरोहर संरक्षित और सुरक्षित है।
साहित्य मनुष्य जाति के जीवन में नैतिक मूल्यों के सृजन और संपोषण का सबसे सशक्त माध्यम है। साहित्य का उद्देश्य ही मनुष्य के जीवन में पारस्परिकता के मूल्य की प्रतिष्ठा है। हमारे उपनिषदों में जो साथ-साथ होने की प्रार्थना है, वह मनुष्य जाति में सहकार के मंगलमंत्र का महत प्रतिमान है। हम साथ-साथ बोलें, साथ-साथ चलें, साथ-साथ बढ़ें और साथ-साथ एक-दूसरे के मन को जानें। यह एक-दूसरे के मन को, उसके सुख-दुख को जानने-समझने का जो भाव है, वह कितना मूल्यवान है, यह कहने की जरूरत नहीं है। यह जितना ही पुराना है, उतना ही नया भी। यह नित नवीन है। साहित्य मनुष्य के जीवन में नैतिकता को बाहर से थोपता नहीं है, वह आन्तरिक चेतना में उसका सृजन करता है। नैतिकता का सृजन साहित्य का मूल केन्द्र है। यह बात अलग है कि भिन्न-भिन्न काल में साहित्य की भाषा और उसका व्यवहार स्वरूप बदलता रहता है। आदिकवि बाल्मीकि के मन में क्रौंचवध को देखकर जो क्षोभ उपजा था, वह पारस्परिकता की मर्यादा की अवमानना के कारण ही उपजा था। ऋषि का रोष ही कविता की उत्पत्ति का कारण बना। पारस्परिकता के गौरव का अभिनन्दन और पारस्परिकता के तिरस्कार की भर्त्सना साहित्य की सनातन उत्तरदायिता है। मनुष्य की स्वतंत्रता का समादर, चेतना के धरातल पर समत्व का बोध और आपस में बन्धुत्व का विकास ही साहित्य की नैतिकता है और यही नैतिकता का साहित्य है। दोनों का मकसद मनुष्य जाति का आपसी सौहार्द्र और सामूहिक अभ्युन्नति है।
इस सन्दर्भ में समझ की ऊपरी सतह पर बहुत-सी भ्रांतियां और रूढ़ियाँ अवरोध बनकर खड़ी हो जाती हैं। कभी हमें नैतिकता साहित्य के विरूद्ध और साहित्य नैतिकता के विरूद्ध दिखाई पड़ने लगता है। प्रायः ऐसा हमारे गलत और अमौलिक पाठ के कारण घटित होता है।
साहित्य नैतिकता का- नैतिक मूल्यों का प्रहरी नहीं है। रक्षक नहीं है। साहित्य संरक्षक है, पोषक है, नैतिकता का। वास्तव में नैतिक मूल्य मानवीय मूल्य ही है। मानवीय मूल्य चिरादिम भी हैं और चिर नवीन भी है। नदी की धारा की तरह। नदी अपने उद्गम में चिरादिम है, अपने प्रवाह में नित नवीन। यही सातत्य है। हर क्षण परिवर्तित होते हुये भी परिवर्तित होने का दिखाई न पड़ना ही सातत्य है। परिवर्तन की प्रक्रिया का अस्तित्व में अन्तर्भुक्त हो जाना ही सातत्य है। जो सतत रहा है और है और जो रहेगा मनुष्य की वैयक्तिक अस्मिता के लिये जरूरी और मूल्यवान और उसकी निजी अस्मिता के अर्थ को सामूहिक अस्तिमता की परस्परता से जोड़ता है, उसे ही नैतिक मूल्य समझना चाहिये।
बाकी सारी संज्ञाओं और विशेषणों की तरह नैतिकता का रूढ़ अर्थ, आज भी हमारे मस्तिष्क में नैतिकता के लिये भी अनायास ही उभर आता है। यही हमें अड़चन मे डालता है। यही हमें सोचने को विवश करता है कि नैतिकता कोई ऐसी चीज है जिसका मनुष्य जीवन से अनिवार्य रिश्ता नहीं है। वैकल्पिक रिश्ता हो सकता है। आप रिश्ता रख भी सकते हैं। चाहे तो नहीं भी रख सकते हैं। मंगर यह भ्रांत धारणा है। यह वास्तविकता नहीं है। भ्रांत धारणा के कारण ही हमें महसूस होता है कि नैतिकता कोई धार्मिक चीज है, अव्यावहारिक है, सरल नहीं है, विरल है। सामान्य नहीं है, विशिष्ट है। यथार्थ नहीं है, आदर्श है। अधुनिक नहीं है, पुरातन है; पोंगापंथी है। व्यावहारिक नहीं है, विचार की वस्तु है। यह सच नहीं है। ऐसा नैतिकता के साथ नहीं, नैतिकता के पाखण्ड के साथ है। नैतिकता अन-आधुनिक नहीं है। नैतिकता का पाखण्ड अनाधुनिक है। आधुनिकता नैतिकता विहीन या नैतिकता विरूद्ध नहीं है, आधुनिकता का पाखण्ड नैतिकता विरूद्ध है। हमारा दुर्भाग्य यह है कि हम नैतिकता के बारे में विचार करते हुये नैतिकता के पाखण्ड को उसके पर्याय के रूप में मान लेते हैं। शायद इसी कारण हमारे विचार की प्रपत्तियां सार्थक नहीं हो पातीं।
नैतिकता का जन्म राजसत्ता से नहीं है। नैतिकता का जन्म जनसत्ता से होता है। नैतिक मूल्य किसी भी समाज व्यवस्था में राजसत्ता से नहीं जनमते है। उनका जन्म जनसत्ता से ही होता है। यहाँ तक कि नैतिक मूल्य जो राजसत्ता को भी अनुशासित करते हैं, जनसत्ता की ही उपज होते हैं। नैतिक मूल्य समाज व्यवस्था में जनसत्ता की महत्ता के अमिट साक्ष्य हैं।
दुनिया चाहे जितनी बदल जाय, चाहे जितनी अधिक संवेदनहीन हो जाय, चाहे जितनी अधिक यांत्रिक हो जाय, फिर भी वह नैतिक मूल्योें को नकार सकने की स्थिति में नहीं हो सकती। नैतिक मूल्यों के नकारने का अर्थ, मनुष्य के सामूहिक अस्तित्व की पारस्परिकता को नकारना है। यह कभी संभव नहीं है।
हम चाहे जितने बेईमान हो जाय मगर हम फिर भी ईमानदारी की महत्ता को-महिमा को गरियाने की हिमाकत कभी नहीं कर सकते। हम सार्वजनिक रूप से बेईमानी का अभिनन्दन शायद कभी नहीं आयोजित कर सकते। यह इसलिये नहीं हो सकता कि नैतिकता हमारे बीच हमारे पतन की पराकाष्ठा में भी न जाने कैसे कहीं उपस्थित है, किसी भी रूप में। नैतिक मूल्य निश्चय ही जहाँ भी मनुष्य होगा, किसी न किसी रूप में उपस्थित रहेगा ही।
नैतिकता कोई केवल विचार की वस्तु नहीं है; वह आचरण की सभ्यता है। नैतिक मूल्य हमेशा एक जीवित अस्तित्व है। वह जीवन में ही हो सकता है। जीवन के बाहर उसका कहीं और हो सकना संभव नहीं है। नैतिक मूल्य मानव सभ्यता के विकास में हमेशा नायकों से प्रतिष्ठित होते हैं। नायक का निर्माण हमेशा जनसत्ता से होता है। नायक की प्रतिष्ठा हमेशा जनमानस में साहित्य करता है। हमारे इनते सुदीर्घ इतिहास में राजसत्ता से प्रतिष्ठित एक नायक भी आप खोजकर नहीं पा सकते। जनसत्ता के अनगिनत नायक पुराकाल से लेकर आधुनिक काल तक हर मोड़ पर आपको मिलेंगे, जिन्होंने नैतिक मूल्य को अपने जीवन में प्रतिष्ठित किया है। राम से लेकर गाँधी तक हमारे जीवन में जीवन मूल्योें के प्रतिष्ठिापक के रूप में पूजित हैं।
तुलसी का काव्य नैतिक मूल्य की जीवन में प्रतिष्ठा जिस कौशल से करता है, वह कला के क्षेत्र में अद्वितीय है। बगैर विद्रोह के, किसी शोर के तुलसी जिन मूल्यों को अपनी कविता में अपने चरित्र के माध्यम से रचते हैं, वह स्पृहणीय है। मैं यहाँ केवल एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ-
‘‘ कागर कीर ज्यों भूसन चीर, सरीर लस्यो तजि नीर ज्यों काई’
राम ने पिता के लिये अयोध्या की राजगद्दी छोड़ दी। उन्होंने राजसी वस्त्र उतार दिये। राजसी वस्त्र उतारते ही राम का सौन्दर्य वैसे ही उद्भासित हो उठा जैसे काई के हट जाने से जल की सुषमा चमक उठती है। पिता के लिये, सम्बन्ध की गरिमा के लिये, प्रेम की पारस्परिकता के लिये, राजपद की अवलेहना को तुलसी नैतिक मूल्य के रूप में स्थापित करते हैं। उसके सौन्दर्य के निरूपण की अद्वितीय कला का आविष्कार करते हैं,- कविता में।
सुदर्शन की कहानी ‘हार की जीत’ मे ंजिस नैतिक मूल्य की प्रतिष्ठा है, ‘उसने कहा था’ कहानी में जो मूल्यबोध है, प्रसाद की ‘पुरस्कार’ में प्रेमचन्द के ‘पंच परमेश्वर’ में जो नैतिकता का सौन्दर्य है, वह भुलाने योग्य नहीं है।
आज का हमारा समय बड़ा भयावह समय है। बिल्कुल अघोषित युद्धकाल जैसा। हर आदमी बिना किसी युद्धभूमि में हुये भी लड़ रहा है। हर कोई अपने घर में लड़ रहा है। हर कोई घायल हो रहा है, हर घड़ी। दुश्मन कौन है, पता नहीं। शायद हर कोई दुश्मन है। शायद कोई दुश्मन नहीं है। मगर हर कोई घायल है। निरन्तर घायल होता जा रहा है। बड़ा विस्मयजनक है। मगर सच है। हमारे सामने मनुष्य पद पर बचे रहने, बने रहने के लिये हर घड़ी नाना प्रकार के आक्रमणों की झड़ी लगी है। इसमें हम सब शामिल हैं। हम खुद भी, और हमारे सारे अपने भी। हर आदमी को ‘मनुष्य पद’ से विस्थापित करने के लिये लोग निरन्तर बेध रहे हैं। ऐसे समय में नैतिक मूल्य ही हमें, हमारे भीतर बल की तरह सम्बल दे सकते हैं।
अपने समय में हम अपने साहित्य में असुन्दर को अप्रतिष्ठित करके नैतिक मूल्यों को प्रतिष्ष्ठित रखने में अपना योगदान दे सकते हैं। मनुष्य जाति की पारस्परिकता को बचाकर ही मनुष्य का बचे रहना संभव हो सकता है।

शवयात्रा

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

वहाँ मैं बहुत सवेरे ही पहुंच गया था। उनके मरने की खबर तो मुझे रात में ही मिल गई थी। रात में हम घर से चलने को तैयार भी हो चुके थे। मगर चलेन से पहले उन्हीं लोगों ने फोन करके रात में आने से मना कर दिया था। बताया था कि अन्तिम यात्रा का समय सुबह के लिए ही निश्चित किया गया है, जिससे अधिकांश लोगों का सम्मिलित होना भी संभव हो जायेगा और आने-जाने में लोगों को सहूलियत भी रहेगी। इस प्रकार हमें रात अपने घर में एक मृत्यु की सूचना के साथ ही काटनी पड़ी थी। मैंने अनुभव किया कि पता नहीं कैसे टेलीफोन से आये हुए कुछ शब्द हमारे घर के समूचे विस्तार में किसी विषैले विस्फोट के धुंए की तरह फैलकर भर गए थे और पूरे घर को उदास और दमाघोंटू बना चुके थे। रात में मैं ध्वनियों में व्याप्त प्रभाव के विस्तार के बारे में सोचते हुए देखता रहा- रात मुझे बहुत बेहूदी और भद्दी लग रही थी।
मैं जब घर से चला था मुझे लगा था मैं बिल्कु समय से चला हूँ। उनके घर के पास पहुंचते-पहुंचते लगा कि मुझे थोड़ी देर हो गई है। मैंने उनके घर के ठीक सामने पहुंचर देखा कि लोग उनके घर से निकलते आ रहे हैं। आगे-पीछे, अगल-बगल बेतरतीब ढंग से लोग भीड़ की शक्ल में बढ़े आ रहे हैं। मैंने अपनी गाड़ी जल्दी से बगल के मकान की आड़ में खड़ी कर दी और सड़क के किनारे उदासीन मुद्रा में खड़ा हो गया। मैं पूरी सावधानी के साथ अपनी मुद्रा और अपने हाव-भाव को इस तरह प्रदर्शित करने में तल्लीन हो गया कि लोग यह समझ सकें कि मैं पहले से ही यहाँमौजूद रहा हूँ। लोगों के साथ उनके घर से चलकर यहाँ पहुँचा हूँ मुझे इस बात से बड़ सुकून मिला कि पूरी भीड़ में मिल जाने से पहले मुझको कोई परिचित और खास तौर से उनके घर का कोई सदस्य देख नहीं सका। जब लोगों ने मुझे देखा मैं पूरी तरह भीड़ का हिस्सा बन चुका था।
मुझे अपने ही भीतर अपने ऊपर बड़ा कोफ्त हो रहा था। मुझे अपनी आंखों में अपना चेहरा बड़ा विद्रूप लगा था। मुझे अपने एकान्त में अपना ही आचरण बड़ा बेहूदा लग रहा था। शायद लोगों के अनुमानों और उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप अपने को दिखा सकने का एक दबाव जो हमें हमेशा दबाये रहता है, हमारे व्यवहार को बासी जूठन की तरह भद्दा और बेहूदा बना देता है। हमारी जिन्दगी हमारे हाथ से छूट जाती है और संसार में हम मुर्दा भावों के शववाहक बन जाते हैं। मुझे लगता है हम कहीं भी जाते-जाते पता नहीं कैसे मरघट की तरफ मुड़ जाते हैं। खैर आज तो मरघट जाने के लिए निकला ही हूँ।
कुछ ही कदम आगे बढ़ने के बाद भीड़ एकाएक रुक गई। बगल की खुली जगह में अरथी उतार दी गई थी। लोग एक-दूसरे के आगे पीछे घेरा बनाकर खड़े थे।
मैंने पीछे मुड़कर देखा, कोई पूछ रहा था- ’’का हो अरथी काहीं इहां उतार गयी।‘‘ वे शायद रिश्तेदार थे।
’’इहां कुछ समय लग जाई। सोचा गया है कि घाट का सब करमठ यहीं निबटा दिया जाय। उनकी वाणी में उनकी वरिष्ठता और पारिवारिक निकटता का रंग साफ झलक रहा था।‘‘ अब समझ लीजिए कि बरसात का मौसम होने के कारण घाट पर बड़ी मुसीबत उठानी पड़ रही है। सारी जगह तो गंगा जी की बाढ़ में डूब गई है। धारा सीढ़ी से ऊपर चल रही है। इस समय तो सब चिता बस छत के ऊपर ही जल रही है- नम्बर के मुताबिक।‘‘
तब तो बड़ी भारी मुसीबत है, भइया। ई किचिर-पिचिर अउर धक्का-मुक्की में तो मणिकर्णिका की दशा सोचकर जी कांप जाता है। ऊपर से बरसात होने लगे तो फिर पूछना ही क्या? कोढ़ में खाज की तरह दुखदायी। राम, राम् उन्होंने गहरी विरक्ति में मुंह बिल्कुल कसैला बना लिया।
‘‘बादल का रुख तो देखी रहे हैं न। लग रहा है कि पानी जब न बरस पड़े। इसी से तो मैंने तय किया कि पंचक के पिण्डदानके साथ ही मुण्डन अउर मुंह में आग वगैरह देने के कर्मठ यहीं कर दिये जाएं। वहाँ चिता की बगल में घूमने भर की जगह भी इस समय मिलना मुश्किल है। और यह सब काम यहीं निबटा रहेगा तो वहाँ के समय में घण्टे भर की बचत भी आराम से मिल जायेगी।
‘‘बहुत ठीक सोचा है, आप लोगों ने। बरसात में तो हमको घाट पर जाने में नरक में जाने से भी जियादा डर लगता है।’’
मैंने देखा, उधर अरथी की बगल में नाई उनके लड़के के बाल मूड़ने लगा था। पुरोहित जी पिण्डदान के लिए जौ के आटे में जरूरी तिल-गुड़ आदि मिलाने के लिए हिदायत दे रहे थे। कुछ लोग अरथी पर आने वालों के पिताम्बर ले लेकर बांधने-सजाने में मशगूल थे। भीड़ में अधिकतर लोग अगल-बगल वालों से बलियाने लगे थे। कुछ पेशाब करने की जगह ढूंढने में आगे पीछे आने-जाने लगे थे। कुछ लोग दो-चार के ग्रुप में चाय-पान की दुकानों की तरफ सरकने लगे थे। प्रायः हर लोग अपने-अपने ढंग से समय काटने की अलग-अलग तरकीब चुनने में लग गये थे।
लगभग 20 मिनट बीतते-बीतते फिर सारे लोग जहाँ-तहां से लौटकर मंडलाकार खड़े हो गए।
‘‘का भाई अब का देर है।‘‘ एक सज्जन काफी उकताये हुए से कह रहे थे। मैंने तो सोचा था कि इनको सड़क तक पहुंचाकर आठ बजे तक घर लौट आऊंगा। देख रहा हूँ, आठ यहीं बज गये। अब क्या बताऊं उनको मरना भी था तो आज ही। बड़े बेमौके मरे हमारे लिये।’’
’’कवनो परेशानी में पड़े हैं, का भइया’’ उनके बगल वाले सज्जन ने उनकी व्यग्रता और उनके विषादसे द्रवित होते हुए पूछा।
‘‘अरे अब परेशानी का बतायें, भइया। परेशानी कोई तनी-मनी है क्या? हमारी तो साँप-छछूंदर वाली हाल हो रही है। न इधर का हो रहा हूँ, न उधर का। देखिये न, पांच दिन से हेंगा-वेगा देकर खेत तैयार करके जोह रहा था। न रोपना मिल रहे थे, न रोपनी। कल जाकर बड़ी दौड़-धूप और चिरौरी मिनती के बाद पचास ठो रोपनी मिली हैं, आन गाँव से। ट्रैक्टर से ले आने और पहुँचाने की शर्त पर। ड्राइवर को भेजकर इधर आया। अब मजदूर खेत पर पहुंच रहे होंगे। अभी यहाँ लाश ही नहीं उठ पा रही है। पट्टीदारी का मामला है, इधर। लाश उठाने में न रहे तो बुरा। उधर खेत पर न पहुंचे तो बुरा। कुछ समय में नहीं आ रहा है, क्या करूं। पता नहीं अभी कितनी देर लगायेंगे लोग यहां।’’
तभी किसी ने उनके लड़के के पास जाकर कहा ‘‘का हो अब का देर है?’’
मैंने देखाउनके लड़के कुछ बोले नहीं मगर उनके चेहरे पर तनाव का ताप इस तरह छा रहा था कि उनका चेहरा लाल हो गया था। वे अपनी लाल-लाल चढ़ी हुई आंखें तरेर-तरेर कर बाजार की तरफ से आने वाले रास्ते पर न जाने किसे घूर रहे थे, जो अभी दिखाई नहीं दे रहा था। मुझे लगा उनके भीतर कोई भयानक हलचल बेकाबू होने को मचल रही है।
उनके रोये-रोये से जैसे आवाज फूट रही थी, किसी भयानक विस्फोट की तरह। ‘‘नहीं, नहीं, बाऊ जी की लाश ऐसे ही नहीं उठेगी। इतने चुपचाप ढंग से उन्हें कैसे विदा किया जा सकता है। यह तो हमारे लिये बड़ी हेंठी की बात होगी।
‘‘क्या कुछ नहीं किया है, बाऊ जी ने अपने जीवन में। अकेले बूते सत्तावन कीता मुकदमा लड़ते रहे हैं। किसी की दाल नहीं गलने दी उन्होंने अपने जीते-जी। अपने दुश्मनों को हमेशा छकाते रहे। कभी किसी का दांव नहीं लगने दिया। किस-किस के हक से, किस-किस के हाथ से जमीनें खींच-खींचकर वे न जाने कैसी-कैसी तरकीब से अपने हक में ले आते रहे हैं। भला उनकी लाश बिना बाजे-गाजे के, बिना फोटो कैमरे के, बिना वीडियो रिकार्डिंग के उठे तो लोग क्या कहेंगे। उनके दुश्मन मेरे जैसे उनके इकलौते वारिस पर भला कितना हँसेगे।
उनको लगा जैसे उनके चेहरे पर उनके दुश्मन थूक रहे हैं- बूड़ा वंश कबीर का…..’’ तभी वे अचानक फट पड़े।
’’अरे स्सालों जरा देख तो दौड़ के, सबके सब कहाँ मर गए। अभीतक भोंसड़ी के न बाजा वाले आये न फोटो कैमरा वाले, न वीडियो वाले। रात को ही सबको एडवांस दे चुका हूँ। हमको जानते नहीं हैं क्या? हमको अगर बेइज्जत किये तो साले सबको गोली मार दूँगा।’’
उनका रुख देखते ही, उनके लड़के सहम कर हड़बड़ी में मोटर साइकिल स्टार्ट करने लगे। मगर तभी डमडम डम-डिम डिम-डिम बाजे की आवाज गली का मोड़ पारकर सामने दिखाई पड़ने लगी। कैमरे और वीडियो वाले दौड़कर अरथी की फोटो उतारने में तल्लीन दिखाई पड़ने लगे। वे खिल उठे।
वे मगन होकर अरथी के सिरहाने खड़े हो गए। उनकी आंखें जैसे कह रही थीं- ’बाऊ जी देख सको तो देखो। जैसा तू ने अपने मालिकाने में कोई तिलक-ब्याह नहीं किया था, उससे जोरदार मैं तुम्हारी मातम पुरसी कर रहा हूँ।‘‘ तभी कैमरे वाले ने इशारा किया और उन्होंने माला अरथी पर डाल दी। कैमरे की फ्लैश लाइटें उनके चेहरे पर चमक उठीं। वे गर्व में फूल उठे। चारों ओर नजरें घुमा-घुमा कर वे चुनौती भरे लहजे में जैसे सबको गरिया रहे थे- देखो स्सालों देख लो। आज तक पूरे गाँव में, पूरी बाजार में किसी ने अपने बाप की लाश इस तरह से धूमधाम और तामझाम के साथ उठाई है।’’
उन्होंने अरथी का एक बाँस छूकर लाश उठाने का इशारा किया। आगे बढ़कर चार लोगों ने कंधे दिये। यात्रा चल पड़ी। राम नाम सत्य है……… राम नाम सत्य है। सड़क से गुजर रहे किसी गाड़ी में खूब तेज बज रहे गाने की आवाज शवयात्रा के ऊपर से गुजर रही थी- ’’बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है-‘‘
मैं शव यात्रा में शरीक था। मेरी बगल से गाने वाली गाड़ी गुजर रही थी। सामने की रेलवे लाइन पर जोर से सीटी बजाती कोई तेज रफ्तार सवारी गाड़ी जा रही थी। कितना अद्भुत है, यह संसार। कितना विस्यमजनक। कोई यात्रा पूरी करके यहां से जा रहा है। कोई यात्रा शुरू करने के लिए आ रहा है। सुख-दुख का कितना अद्भुत सम्मिश्रण है, संसार। आदमी चला जाता है। उसके चले जाने से उसका अधिकार उससे छूट जाता है। फिर उसका छूटा हुआ अधिकार कोई पा लेता है। पाकर फूल उठता है। कोई यह नही ंसोच पाता आखिर यह अधिकार उससे भी एक दिन छूट जायेगा। कितना अबूझ है, जीवन। जीवन भर आदमी जिन्दगी को बूझने में लगा रहता है मगर बिना कुछ बूझे जिन्दगी से विदा हो जाता है। सचमुच कितना विस्मयजनक है।
अरथी सड़क पर पहुँच गई। सड़क पर पहुँचकर एक गाड़ी पर ऊपर शव रखकर बाँध दिया गया। जिन लोगों को घाट तक जाना था, उन्हेें गाड़ियों में बैठाया जाने लगा। अधिकांश लोग जाने वालों को रवाना कर घरों को लौट पड़े थे।
शव वाली गाड़ी के पीछे-पीछे कई गाड़ियां चल रही थीं। एक में मैं भी बैठा चल रहा था। मेरे दिमाग में मेरे रिश्तेदार से संबंधित अतीत की तमाम घटनाओं की स्मृतियां भी चल रही थी। मैं सोच रहा था कि उनके लड़के जो कुछ कर रहे थे- वे अपनी पितृभक्ति के कारण कर रहे थे या अपनी अहं की तुष्टि के लिये? उनके कर्तव्य उनकी आन्तरिक निष्ठा पर आधारित थे या दूसरों में अपनी श्रेष्ठता कायम करने के लिए? उनके क्रिया कलाप अपनी शान दिखाने और शेखी बघारने के लिए किए जा रहे थे, या आन्तरिक श्रद्धा की उत्प्रेरणा की उपज थे?
जहाँ तक मैं समझता हूँ ये सवाल मेरे विचार की उपज नहीं थे। ये प्रश्न तो उनके अतीत के लम्बे आचरणों और उनकी जीवन शैली से ही उपजे हुए थे। आज जिन्होंने अपनी पितृभक्ति के प्रदर्शन के लिए यह विराट आयोजन रचा है, कभी अपने पिता के जीवन काल में उन्होंने पिता या पिता के समतुल्य किसी संबोधन से पुकारा हो इसका गवाह कोई नहीं है। हां पिता के लिए उनकी जिह्वा पर दो-चार स्थायी गालियां हमेशा मौजूद रहा करती थीं। उनका जिक्र आते ही वे अनायास फट पड़ते थे और अपनी स्थायी उपाधियों से बराबर उन्हें नवाजा करते थे।
इन्होंने जवान होते ही अपने पिता की सत्ता के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया था। वे सदा से घर में उनके निर्णयों की अवहेलना किया करते थे। उनके हर काम का विरोध अपनी पूरी शक्ति से किया करते थे। वे अपने पिता से समूची सत्ता अपने लिये पाना चाहते थे। इसके लिए इन्होंने भयानक युद्ध छेड़ रखा था। घर को युद्धभूमि बना रखा था। ये अपने पिता से कहा करते थे- ‘तुमने अपने पिता से सारी सत्ता सारा अधिकार अट्ठारह की उम्र में ही छिन लिया था फिर उसी न्याय से तुम अपने अधिकार मुझे क्यों नहीं सौंप रहे हो। मेरीउमर पैंतालीस साल गुजर चुकी अभी तक तुम सारी सम्पत्ति पर कुंडली मार कर विषधर साँप की तरह बैठे हो। भला मैं अपने धन सम्पत्ति का उपभोग कब करूंगा?’’ मगर इनके पिता टस से मस नहीं हुए। उन्होंने अपना अधिकार क्या अधिकार का एक अंश भी जीते-जी नहीं छोड़ा। पता नहीं उनको अपने पुत्र की योग्यता और निष्ठा पर यकीन नहीं था या उन्हें अपनी योग्यता के सम्मुख कोई योग्य और अपनी निष्ठा के आगे कोई निष्ठावान ही नहीं मालूम पड़ता था। या शायद उनको अपना अधिकार ही अपना जीवन लगता था। जो भी हो मगर उनके मरने तक उनके और उनके पुत्र के बीच लड़ाई अनवरत जारी रही। दोनों एक ही घर में एक-दूसरे के दुश्मन की तरह लड़ते हुए रहते रहे। आज उस लड़ाई का अंत हो गया है।
मैं सोच रहा हूँ कहीं इस विराट आयोजन में इस लम्बी लड़ाई के अंत की उद्घोषणा के भी अंश हैं क्या? कहीं उनकी शवयात्रा में इनकी जयात्रा भी सम्मिलित है क्या? क्या संसार में शवयात्राएं और जय यात्राएं साथ-साथ और समान्तर नहीं चलती रहती हैं। जो भी हो। मैं यकीन के साथ कुछ कैसे कह सकता हूँ। जीवन में सत्य इतना सरल और सुबोध तो नहीं है कि बिना किसी दुुविधा के उसका उद्घोष किया जा सके। मुझे बार-बार ही शवयात्रा और जययात्रा के बीच फैला हुआ यह संसार बड़ा पाखण्डपूर्ण विद्रूप और वितृष्णाजनक लगता है। मगर मेरे लगने से क्या फर्क पड़ता है।
लम्बे इन्तजार के बाद चिता लगाने का अवसर मिला। चिता से संबंधित सारा काम ठेके पर तय कर दिया गया था। इसलिये चिता में आग दे देने के बाद कोई जिम्मेदारी शेष नहीं थी।
चिता में आग लगने के थोड़ी देर बाद एक सज्जन लकदक धोती कुर्ता में सजे पूरे लाव-लश्कर के साथ अंगरक्षकों से घिरे हुए आये। उन्होंने देर से सूचना देने के लिए उनके लड़के से शिकायत की।उनकी मृत्यु पर शोक व्यक्त किया। फिर कैबिनेट की मीटिंग से पहले राज्य लोक निर्माण मंत्री जी से मिलना पहले से तय और अत्यंत जरूरी होने के कारण क्षमा मांगकर लखनऊ की यात्रा के लिए चले गए।
अब घाट पर सारे लोग बेहाल और बदहाल दशा में इधर-उधर मारे-मारे फिर रहे थे। मुर्दों के साथ आये हुए लोग केवल अपने अपने मुर्दे के जलने की चिंता में जल रहे थे। हर किसी की केवल एक ही चाह थी, मुर्दा कितना जल्दी जल जाय। हर कोई हर किसी से हर क्षण यही पूछने की विकलता में व्याकुल था कि अभी कितनी देर और……। पूरे श्मशान घाट पर घाट से भागने की उकुलाहट के अलावा और किसी भी भाव का पूरा-पूरा अभाव था। मुर्दे जल रहे थे मगर जल्दी नहीं जल रहे थे। मुर्दों के जलने तक लोग उठते-बैठते, हिलते-डुलते, बोलते-बतियाते, चाय पीते, पान खाते एक मुर्दा बोझ से दबे मुर्दा बने से दीख रहे थे।
अब शाम होने लगी है। सूरज का ताप और सूरज का प्रकाश लग रहा है किसी चिता से उठने वाले विशाल और भयानक धुंए के विस्तार में डूबता जा रहा है। मैं शवयात्रा से लौट रहा हूँ। सड़क पर भारी भीड़ है। भीड़ में भयानक चिल्ल-पों है। हर आदमी हड़बड़ी में है। उकताया है। घवराया है। बोझ से दबा हुआ है। उदास है। मुझे लग रहा है हर आदमी अपना-अपना मुर्दा फूंककर लौट रहा है। हर आदमी फिर घर में किसी मुर्दा होने की आशंका से ग्रसित है। हमारा समय कैसा समय है, भाई। मुर्दा समय! हमारे समय में हमारा रिश्ता मर गया है, हमारा विश्वास मर गया है, हमारा कर्तव्य मर गया है, हमारा उल्लास मर गया है। मुझे लग रहा है, हम निरंतर किसी शवयात्रा से आ रहे हैं; किसी शवयात्रा में जा रहे हैं। हमारी यात्रा रिश्तों की शवयात्रा बन गई है।
मुझे लगता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है। कहीं कुछ गड़बड़ है मगर हम उसे पकड़ नहीं पा रहे हैं। हम जो कुछ कर रहे हैं, वह सब हमारी स्वेच्छा नहीं है। हम वह सब कुछ करने को विवश हैं। हम बहुत कुछ करना चाह रहे हैं। मगर कर नहीं पा रहे हैं। हम जिधर जा रहे हैं, वह हमारे घर का रास्ता नहीं है मगर हम जा रहे हैं। हमारे समय में हमारी जययात्रा का शवयात्रा में शामिल हो जाना और शवयात्रा में जययात्रा का सम्मिलित हो जाना कितना विडंबनापूर्ण और खेदजनक है।
बहरहाल मैं अपने समय में रिश्तों की शवयात्रा से लौट रहा हूँ। मेरा मन घर पहुंचने के लिए उत्सुक हो रहा है। मैं अंधेरे में रास्ते के गुम होने से पहले घर पहुंच जाना चाहता हूँ।

जिन्दगी की मँझधार में डूबा हुआ ’साहिल’

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

धर्मेन्द्र गुप्त से मिल-जुलकर बोल-बतियाकर भले आप सोच सकते हैं कि वे जिन्दगी के किनारे-किनारे चलकर कहीं आ-जा रहे हैं। मंगर उनका गजल संग्रह ‘अपना-अपना चाँद’ पढ़ा/पढ़कर देखा तो देखा कि इसमें तो ‘साहिल’ जिन्दगी की मँझधार में डूबा हुआ ‘साहिल‘ है। जिन्दगी के रस ने साहिल को साहिल नहीं रहने दिया। जीवन में डूबकर ही द्रष्टा अनुभोक्ता बनता है। वैयक्तिकता जीवन रस में विलीन होकर ही निर्वैयक्तिक चेतना की अनुभव थाती पाती है, जिससे काव्य रचना संभव होती है। जीवन रस का पान करके ही कवि इस रहस्य को समझ सकता है-
‘‘रोज सियाही पीता चाँद, फिर भी कितना उजला चाँद।’’
रोज-रोज अथाह कालिमा को पीकर-पचाकर भी

उज्ज्वलता की असीम आभा को बनाये रखने का बोध धमेन्द्र गुप्ता ‘साहिल‘ के काव्यबोध को ऊंचाई और गरिमा से अनायास जोड़ देता है, जो नितान्त अभ्यर्थना के योग्य है। यह संग्रह भले ही संक्षिप्त है, मगर इसमें धरती की छाती फोड़कर निकलने वाले उस अंकुर का आश्वासन मौजूद है, जिसमें विशाल वट वृक्ष की छाँह अपना रूप ग्रहण करने को मचल रही है।
धर्मेन्द्र गुप्त साहिल की काव्य संवेदना का केन्द्र प्रेम है। मगर यह भाषा का प्रेम नहीं है। भाषा में प्रेम नहीं है। मैं कहना चाहता हूँ ‘साहिल’ की काव्य संवेदना में, उनके काव्यबोध में जो प्रेम है, वह जीवन में है। जीवन के लिये प्रेम है। जीवन से अभिन्न है। वह बड़ा व्यापक भी है और गहरा भी है। साहिल की कविता में प्रेम विषय के रूप में नहीं है, वह उनकी कविता की अन्तर्वस्तु के रूप में है। इसीलिये वह विविध रूपों में व्यक्त हो सका है। बहुविध रूपों में व्यक्त हो सका है। हम देखते हैं कि उनके संघर्ष में प्रेम है, क्षोभ में प्रेम है, उलाहना में प्रेम है, पछतावा में प्रेम है, धोखे में प्रेम है, नींद में प्रेम है और सपने में भी प्रेम है। उन्हें अपने में यानी जिन्दगी में प्रेम है। तभी वे कह सके हैं –
खुद से मिलने जैसा मिलना केवल प्रेम में ही संभव हो सकता है। ध्यान से देखने पर साहिल की कविता में बहुत-सी विलक्षण ध्वनियां सुनाई देवी हैं, जो दुर्लभ रोमांच से भर देती है।
‘साहिल’ की कविता अपने समय के प्रचलित काव्य-उपादानों से भिन्न उपादानों के द्वारा भिन्न प्रविधि से रची गई कविता है। इनकी कविता का शिल्प एक बहुव्यवहृत विद्या में बिल्कुल अपनी निजता की मुकम्मल पहचान कायम करता है। यह पहचान विल्कुल सहज है, सादी है मगर इनकी सादगी बहुस्तरीय अर्थव्यंजना से संवलित होने के कारण बड़ी विलक्षण है। बड़े ही जटिल जीवन अनुभवों को बड़ी सूक्ष्मता से व्यक्त कर सकने की योग्यता के कारण ‘साहिल’ गजल में बहुत कुछ नया जोड़ने में समर्थ हो सके हैं। उनके कथन में भाव और भंगिमा दोनों की अद्भुत संगति उनके रचनाकर्म की मौलिकता को स्थापित करती है। बड़े ही सघन बिम्बों की रचनाधर्मिता कविता को बार-बार पढ़ने के लिये आमंत्रित करती है। कम कविताएँ होती हैं, जो अपने पाठ में बार-बार उतरने को उत्प्रेरित करती हैं। साहिल की काव्य रचना बार-बार पढ़ने को विवश करती है और हर नये अर्थ से अभिभूत करती है। मैं ‘साहिल’ की रचनात्मक प्रतिभा और सृजनात्मक कौशल का अभिनन्दन करता हूँ।
काँपती उंगलियों से सच लिखने का साहस, सामर्थ्य और कौशल ‘साहिल’ की कविता को सार्थक और श्रेष्ठ कविता बनाता है।
‘‘तेरी खातिर बदल लिया खुद को और अब खुद बदल गया है तू’’ जैसी बेधक अनुभूति को अनुरंजक रूप में कह सकना कवि के सामर्थ्य का साक्ष्य है। यहाँ प्रेम के माध्यम से वृहत्तर सामाजिक सच की बिडम्बना का उद्घाटन होता है। ‘साहिल’ के काव्यबोध में रेखांकित करने योग्य एक बात यह भी है कि जहाँ-जहाँ उनका आत्मबोध व्यक्त हुआ है, उसमें मनुष्य होने की ललक ही ईमानदार रूप में दिखाई देती है, किसी भी तरह के गर्व या ग्लानि से सर्वथा मुक्त। किसी भी अभियक्ति की कलात्मक विधा में किसी रचनाकार की उपस्थिति प्रायः एक-सी जीवन स्थितियों में उसके भिन्न जीवन बोध के आस्वाद पर निर्भर करती है। धर्मेन्द्र गुप्त ‘साहिल’ अपनी विद्या में अपनी मौलिकता के कारण अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं। उनकी रचना पारंपरिक विरासत में कुछ नया जोड़ती है।  

अर्ध सत्य का दारुण दंश

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

सम्मानित सज्जनों,
आज की सभा में सबसे पहले मैं देश प्रेम में बलिदान के मूल्य के अमर प्रतिष्ठापक सरफरोशी की तमन्ना के गान के सर्जक शहीद सम्राट भगत सिंह और उनके अभिन्न साथियों की पुण्य-स्मृति के प्रति अपना नमन निवेदित करता हूँ। इसके साथ ही मैं भगत सिंह की विरासत में थोड़ी भी आस्था रखने वाली इस देश की नौजवान पीढ़ी को जो यहां उपस्थित है और जो उपस्थित नहीं भी है, उसके प्रति अपना सम्मान समर्पित करता हूँ।
मित्रों! आज विचार के लिए आपने जो प्रश्न हमसे पूछा है- क्या हमारा देश आजाद है? इसके लिए आपको हार्दिक धन्यवाद देना चाहता हूँ। धन्यवाद इसलिए देना चाहता हूँ कि आपने इस महान देश की मौजूदा समय में जड़ता से आक्रान्त चेतना के समक्ष एक जिन्दा सवाल खड़ा किया है। जिस समय हमारा देश तमाम-तमाम मुर्दा सवालों के स्वार्थपूरक जवाबों के बनावटी और दिखावटी जवाबों की तलाश में व्यर्थ का खून-पसीना बहाने का नाटक खेल रहा है, उस दौर में एक जीवित सवाल उठाने के लिए मैं अपनी ओर से आप सबकी अभ्यर्थना करता हूँ।
सच कहूँ तो आपका यह सवाल हमें हमारे समय में, हमारी सामाजिक चेतना और हमारे सामाजिक बोध की हथेली पर डंक उठाये बिच्छू की तरह महसूस हो रहा है। जिसकी हथेली पर डंक उठाये बिच्छू बैठ जाय उसका चैन से बैठे रहना संभव नहीं। वह बेचैन होगा ही।
आज मैं अनुभव करता हूँ कि हमें बेचैन करने वाले जिन्दा सवालों की बेहद जरूरत है। जब सवाल हमें बेचैन करेंगे, तो हम हाथ पर हाथ रखकर बैठे नहीं रह सकेंगे। तब हम सिर छुपाकर उनकी अनदेखी न कर सकेंगे। तब हम सर्वनाशी नींद के नशे में अपने जीवन की सच्चाई से विमुख नहीं हो सकेंगे। जब हम बेहद बेचैन होंगे, बौखलायेंगे, तिलमिलायेंगे तो जाहिर है कि हम तबियत से उनके बारे में, उनके जवाब हासिल करने के बारे में जरूर ही उन्मुख होंगे। मेरा विश्वास है, जब हम पूरी तबियत से किसी सवाल के सामने खड़े होंगे तो जरूर कुछ न कुछ होगा। कुछ होगा- कुछ असंभव को संभव करने वाला होगा-
‘‘कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।।
इस समय हमारे देश की चेतना स्वार्थ और निराशा से इतनी संकुचित और अच्छादित हो चुकी है कि कुछ भी सकारात्मक और सार्थक के घटित होने के प्रति हमारा विश्वास ही मर चुका है। इस विश्वास को जगाने के लिए हमें बेचैन करने वाले सवालों की जरूरत है। साथियों यह हमारा और हमारे देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि आज हमारे लिए बेधक और उत्पीड़क सवाल हमारे अस्तित्व के लिए सार्थक और प्रीतिकर हो रहे हैं।
उत्तर चाहे जो भी हो। मैं उत्तर को उतना महत्वपूर्ण नहीं समझता। मेरे विचार में उत्तर से अधिक महत्व का हमेशा सवाल ही होता है। सवाल अगर सही हो, अर्थपूर्ण हो, जीवन में आन्तरिक जरूरत से उपजा हो, चेतना की आन्तरिक गहराई को मथकर प्रगट हुआ हो, तो हमारा विश्वास है, वह हमें सही-सही दिशा में ले जायेगा। वह हमें सही प्रयत्न में नियोजित कर देगा और एक दिन निश्चय ही हमें सही जवाब को उपलब्ध करा देगा। जहाँ तक मैं समझता हूँ इस समय भारतीय जाति के सम्मुख एक सही प्रश्न, एक ईमानदार प्रश्न, एक जीवित प्रश्न की बेहद जरूरत है, जो उसे उन्मथित कर दे। व्यग्र कर दे। बेचैन कर दे। उसकी नींद और उसका चैन उससे छीन ले। मैं समझता हूँ आपका प्रश्न वैसा ही प्रश्न है। इतिहास साक्षी है, अर्जुन के प्रश्न के कारण ही गीता जैसा जीवन के मर्म को उद्घाटित करने वाला ज्ञान का ग्रन्थ और पार्वती के प्रश्न के कारण रामकथा का अमृतमय ‘रामचरित मानस’ जैसा उच्चतर जीवन मूल्यों का प्रतिष्ठापक प्रेम का ग्रन्थ हमें उपलब्ध हो सका है।
यह सच है कि आपका प्रश्न नया नहीं है। सभी जानते हैं कि यह प्रश्न भारत की आजादी के साथ ही पैदा हुआ प्रश्न है। उस समय समाज निर्माण में संरचनागत बुनियादी परिवर्तन के प्रति गहन आस्था रखने वाले बुद्धिजीवियों ने यह सवाल उठाया था। उन्होंने इस देश की राजनीतिक आजादी को सिर्फ सत्ता हस्तान्तरण के रूप में देखा और उसे अपर्याप्त बताया था। उस समय व्यापक जनसमुदाय इससे उतना प्रभावित नहीं हुआ और यह प्रश्न एक राजनीतिक चिन्तन के संगठन का विरोध बनकर रह गया। बाद में एक बार यह प्रश्न फिर खड़ा हुआ, आर्थिक विषमता और अमानवीय उत्पीड़न के विरूद्ध आक्रोश से उन्मथित हस्तक्षेप के रूप में। इसने व्यवस्था में और विचार में विक्षोभ पैदा किया। एक सीमा में उसके परिणाम दिखाई पड़े। फिर भी सवाल अधिकांश में राजनीतिक और बौद्धिक हलकों को लांघकर व्यापक जन-जीवन में पैठ नहीं बना सका। मगर आज स्थितियां इतनी बदल गई हैं कि लगता है, अब यह सवाल राजनीतिक सवाल न रहकर एक सामाजिक सवाल के रूप में रूपान्तरिक हो रहा है। एक राजनीतिक सवाल का सामाजिक सवाल बन जाना ही सवाल के जिन्दा और जीवित होने का प्रमाण होता है। इसी कारण मैं आज इस सवाल को जिन्दा सवाल कहना चाहता हूँ। कह रहा हूँ। और कहते हुये प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ। एक पीड़ादायक प्रसन्नता से गुजरते हुये जिस दारुण नियति का साक्षात्कार होता है, कर रहा हूँ।
आज जब मैं इस प्रश्न के सम्मुख जवाबदेह की स्थिति में खड़ा हूँ, अपने को बड़ी असुविधाजनक स्थिति में पा रहा हूँ। नहीं, नहीं सुविधाजनक ढंग से कभी भी किसी भी सवाल का जवाब हासिल कर पाना संभव ही नहीं हो सकता। मैं अपनी द्विधाग्रस्त मानसिकता में देखता हूँ, मेरी नियति कितनी दयनीय है। हाँ, दिनकर जी का कहना है कि द्विधाग्रस्त मानव ही सबसे दयनीय आदमी होता है और उनका यह कहना मुझे बिल्कुल ठीक मालूम होता है। मेरी दुविधा अपने ही अन्तःसंघर्ष के द्वंद्व से उपजी दुविधा है, अपने ही विचार और अपनी ही संवेदना के, अपने ही हृदय और अपनी ही बुद्धि के, अपने ही विवेक और अपने ही अनुभव के अन्तर्विरोध की दुविधा है। मैं क्या कहूँ, जो कहना चाहता हूँ, वह कह नहीं पा रहा हूँ। जो सच है, वह कहते हुए मन सहम जा रहा है। जो सच नहीं है, उसे कहने में वाणी व्यथित हो जा रही है।
बड़ा अजीब है, बड़ा विचित्र है। कुछ भी कहना सुविधाजनक नहीं है, सही नहीं है। मगर अपने सही होने की प्रबल आकांक्षा से भरा हुआ है। मेरा मन कहता है कि- मैं कहूँ कि मेरा देश आजाद है। कौन भला ऐसा अभागा होगा जो यह कहना नहीं चाहेगा। जिस मन में ऐसा कहने की साध न हो, उसे तो मनहूस कहना ही मुनासिब होगा। मगर क्या करूँ स्थितियाँ इजाजत नहीं देतीं। स्थितियां आजादी का उपहास करती मुँह चिढ़ा रही हैं। मैं कहना चाहता हूँ कि हमारा देश आजाद है, हम आजाद हैं। मैं कहना चाहता हूँ कि आजाद होते हुए भी हमारा देश आजाद नहीं है, हम आजाद नहीं हैं। हम किसी के प्रत्यक्षतः गुलाम नहीं हैं, मगर कोई है, जो हमें अपना गुलाम समझता है। हम अपने को आजाद समझने के सपने में आँखें बंद किए हैं और कोई है, जो हमें अपने उपभोग के, उपयोग के अनुकूल बना लेने का इंतजाम रच रहा है। हम आजाद हैं सिर्फ जिन्दा रहने के लिए मगर हमारे जीवन के सारे निर्णय किसी दूसरे के हाथ में हैं। हम आजाद हैं, जीने की कोशिश में अपराधी ठहरा दिये जाने के लिए और निरपराध रहकर मौत के मुँह में समा जाने के लिए। जरा देखिये न! हमारी नियति कितनी दारुण है। इससे आँख मिलाना कितना दुःस्सह है।
मेरी पीड़ा, मेरे दुःख, मेरे अपमान और वंचनायें कहती हैं कि मैं कह दूँ कि हमारा देश आजाद नहीं है, हम आजाद नहीं हैं। हमसे हमारी व्यवस्था के पाखण्ड, व्यवस्थापकों के छल कहते हैं कि मैं कह दूँ कि हमारा देश आजाद नहीं है, हम आजाद नहीं है। मगर कैसे कहूँ? जब भी कहना चाहता हूँ, मेरी जीभ पत्थर की हो जाती है। सिर शर्म से झुक जाता है। मैं मुँह ताकता रह जाता हूँ।
मुझे लग रहा है, मैं जो कह रहा हूँ वह पूरा-पूरा सच नहीं है। मैं जो कह रहा हूँ- जो कहना चाह रहा हूँ- वह झूठ नहीं है। बड़ा अद्भुत है। बड़ा विस्मयजनक है। मैं जो कुछ कह रहा हूँ वह एक तरफ से सच है, दूसरे तरफ से झूठ है। एक सिरे से टटोलकर देखता हूँ तो लगता है सच है, दूसरे सिरे को परखता हूँ तो झूठ निकल जाता है। क्या करूं? जी बड़ा हलकान है। मैं देख रहा हूँ जो कुछ भी हमारे सामने है- वह आधा सच है, आधा झूठ है। आज हमारे जीवन का यथार्थ आधा सच और आधा झूठ का गजब समिश्रण बन गया है। आज हमारे देश का सामाजिक यथार्थ दूध में मिल गये पानी की तरह सच और झूठ का विचित्र घोल बन गया है। हम पानी को दूध मानकर और दूध को पानी समझ कर पी रहे हैं। पीने केा विवश हैं। पी रहे हैं, पीते जा रहे हैं, पीते हुए बिदक रहे हैं, मुँह बिचका रहे हैं, नाक-भौ सिकोड़ रहे हैं, मगर पी रहे हैं। अभी हम दूध और पानी को, सच और झूठ को, दोस्त और दुश्मन को ठीक-ठीक अलगा देने की तरकीब को उपलब्ध नहीं कर सके हैं। हम सभी उस तरकीब को खोज लेने के लिए तत्पर भी नहीं हो सके हैं। मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि हमारी सामूहिक चेतना के सम्मुख दूध का दूध और पानी का पानी कर देने के लिए संकल्पबद्ध और तत्पर हो जाने का उचित समय उपस्थित हो गया है। आज हमारा चिंतन दलों के दलदल में दुर्दशाग्रस्त सत्ता पर अधिकार जमाने की गर्हित सोच से उबरकर समाजिक और मानवीय अभ्युन्नति के प्रति उन्मुख होना चाहिए। इसके लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर अपने को बुद्धिजीवी कहने और समझने वाले लोगों को और इस देश की महान संघर्षशील परम्परा का उत्तराधिकारी मानने वाले लोगों को जन-जागरण के लिए कुरूक्षेत्र में अटल भाव से जूझ पड़ने की खातिर उतर पड़ना चाहिए।
मुझे लगता है कि महाराणा प्रताप का अकुंठ शौर्य, झांसी की रानी की आनाक्रान्त ललकार, टीपू की अदम्य युयुत्सा, दाराशिकोह की व्यापक सहृदयता, स्वामी विवेकानन्द का उत्तुंग आत्मगौरव, भगत सिंह की बलिदानी देशभक्ति व महात्मा गांधी की अहिंसक करुणा, अडिग राष्ट्रप्रेम इस महान देश की अक्षुण्ण विरासत को संभालने और संवारने के लिए जो भी अपने को इस देश का सुयोग्य नागरिक समझते हैं, उन्हें दोनों हाँथ उठा-उठाकर पुकार रहा है- जागो, जागो, आओ, आओ इस देश की दुर्भाग्यपूर्ण नियति को अर्धसत्य के दारुण दंश से मुक्त करने के लिए अभियान के तुम्हीं नायक हो। इस नियति को बदलने का उत्तरदायित्व ही तुम्हारा उत्तरदायित्व है।
यह सच है कि मौजूदा समय में हमारा वैश्विक परिदृश्य भयानक रूप से विषैला, मूल्यहीन और मनुष्य विरोधी हो गया है। यह वास्तविकता अब किसी से भी नहीं छिपी है कि दुनियाँ में अपना आर्थिक प्रभुत्व एकछत्र स्थापित करने की हवस में अमरीका अपने कुछ मित्र राष्ट्रों के साथ दुनिया के तमाम देशों की निजी पहचान को रौंदकर उन्हें अपना गुलाम बनाने को आतुर है। केवल कुछ सुनहले और लुभावने शब्दों का भ्रमजाल फैलाकर बेहयाई और बेशर्मी की सारी हदें पाकर वह अभानुषिक अत्याचारों से परिपूर्ण आर्थिक विश्वयुद्ध का जैसा नंगा नाच कर रहा है।, उसकी भर्त्सना और उसके कारगर प्रतिरोध के लिए हमें निर्भ्रान्त भव से खड़ा होना होगा। मगर यह भी सच है कि हम अपनी आजादी की सारी दुर्दशा और मूल्यहीनता के लिये, अपने बदतर और बेईमान आचरण के लिये, अपनी बदहाली की तमाम विसंगतियों और बिडम्बनापूर्ण स्थितियों के लिए सबसे अधिक खुद ही जिम्मेदार हैं।
मेरे विचार से हमें अकुंठ भाव से बिना किसी हीलाहवाली के पतनशील मूल्यों में अपनी आस्था और अपने कदाचार की आत्मस्वीकृति सार्वजनिक रूप से करनी होगी। केवल सत्ता हासिल करने के एकमात्र राजनीतिक उद्योग के समान्तर राष्ट्र निर्माण और समाज को समृद्ध बनाने के प्रति समर्पित राजनीतिक चेतना का विकल्प तैयार करना होगा। भ्रष्टाचार से विमुख और विलग रहने का हार्दिक संकल्प होना होगा। व्यक्ति हित के स्थान पर सामूहिक और सामुदायिक हित केा वरीयता देने की आस्था उपजानी होगी। कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के बाद हमने तमाम वस्तुओं को बनाने के लिए तो बहुत सजग और यत्नशील हुए मगर जहाँ से आदमी बनता है, जहाँ आदमी का चरित्र गढ़ा जाता है, उस केन्द्र को बिल्कुल ही उपेक्षित छोड़ दिया। उधर हमारा कोई ध्यान ही नहीं है। आज हमारे विद्यालयों में जो कुछ भी सिखाया और पढ़ाया जा रहा है, उसका व्यवहार हमारे जीवन में भूलकर भी होता दिखाई नहीं देता। जो कुछ कभी भी पढ़ाया और सिखाया नहीं जा रहा है उसी का व्यवहार हम समूचे जीवन में करने को अभिशप्त हैं। यह कितना दारुण सच है।
आज हमारे देश का सामान्य सामूहिक जीवन इतना वेदनामय हो गया है कि उसका निरूपण हृदय को विदीर्ण कर देने वाला है। बड़ा लोमहर्षक दृश्य है और हम केवल दर्शक से अधिक कुछ भी नहीं हैं। आज हमारे देश में बाघ और बकरी को एक ही घाट पर पानी पीने की खुली आजादी है। आज हमारे देश में घोड़े और घास को अपनी अस्मिता बचाने का एक समान अवसर उपलब्ध है। हाँ आज हमारा देश आजाद है। उनके लिये आजाद है, जिनके पेट में इस देश को खा जाने भर की भूख भरी है। उनके लिये आजाद है, जिनके पास वर्दी है- खाकी वर्दी है या खादी की सफेद वर्दी है। उनके लिये आजाद है- ‘जिनका हृदय उतना मलिन, जितना की शीर्ष वलक्ष है‘। उनके लिए आजाद है, जो कानून को रखैल बना लेने की ताकत और हैसियत रखते हैं। वे सभी कहते हैं देश आजाद है। हम आजाद हैं। देश हमारा है। देश हमारे बाप की मौरुसी मिल्कियत है। वे कहते हैं। वे दिन रात कहते हैं। हम सुनते हैं। हम सहते हैं। यही शायद हमारी नियति है। हम बार-बार विश्वास करते हैं, बार-बार ठगे जाते हैं। हमने तो हर विश्वास की पूँछ उठाकर देखा है।, सबके सब मादा निकले हैं। हम किससे पूछें हमारी आज जो नियति है, वह हमारी क्यों है?
यह देश आज भी उनके लिये कत्तई आजाद नहीं है, जो देश को प्रेम करते हैं, जो देश को अपना नहीं, अपने को देश का समझते हैं, उनके लिऐ यह देश आजाद नहीं है। जिन्हें केवल अपनी आस्था पर अपनी निष्ठा पर, अपनी मेहनत पर और अपने संघर्ष पर सजाने का संवारने का कोई भी सपना है, जो लोग इस देश को बनाने का, सजाने का, संवारने का कोई भी सपना अपनी आँखों में पाले हैं, यह देश उनके लिए आजाद नहीं है। आज भी हमारे देश में ऐसे बहुतायत लोग हैं, जिनके लिए पेट भरने के अलावा जिन्दगी का और कोई मतलब ही नहीं मालूम। ऐसे लोगों के लिये आजादी का कोई अर्थ नहीं है।
क्या कहें, बड़ा अजीब है। अपने ही देश में अपना ही देश न जाने कितने टुकड़ों में बंटा है- कितने हिस्सों में बँटा है। समर्थों के लिए एक अलग देश है, वहीं असमर्थों के लिए अलग देश है। दोस्त और दुश्मन की भाषा एक हो गई है। फर्क करना मुमकिन नहीं रह गया है। हम मित्र समझकर अपना हितैषी समझकर गले लगाते हैं मगर वह हर बार हमारी पीठ में छुरा घोंपकर पलायित हो जाता है। संवेदना अपरिचित हो गई है। सामूहिकता और परस्परिकता से हमारी जान-पहचान मिट चुकी है। हर चीज संदिग्ध है। पता नहीं सच है। पता नहीं झूठ है। हमारे सामने जो कुछ भी है, आधा सच है। आधा झूठ है। हमारी नियति इस समय अर्धसत्य को जीने की दारुण नियति बन गई है। हम अर्धसत्य का दारुण दंश झेलने के लिए अभिशप्त हैं।
क्या हम अपनी नियति को तोड़ने के लिए उसके सामने खड़े नहीं हो सकते? हम अगर खुद खड़े नहीं होंगे तो औरों से उम्मीद करना व्यर्थ होगा। हम खड़े क्यों नहीं हो सकते? तो कब खड़े होंगे?
इसी प्रश्न के साथ आज मैं आपसे विदा लेना चाहता हूँ। आपके प्रश्न के लिए मेरे पास कोई ठीक-ठीक उत्तर नहीं है। मैं भी प्रश्नों की भीड़ में घिरा हूँ। मुझे भी प्रश्न चारों ओर से घेरे हैं। मुझे प्रश्नों के उत्तर देेने में उतनी रूचि नहीं है, जितनी उत्तर बन जाने में। फिलहाल प्रश्न के बदले एक प्रश्न ही- कब, आखिर कब हम अपनी नियति को नकार कर उसे बदलने को उठ खड़े होंगे। हम परिवर्तन को पुकारने कब खड़े होंगे। हम अपने कवि से कब कहेंगे-
कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ,
जिससे उथल-पुथल मच जाये।
एक हिलोर इधर से आये एक हिलोर उधर से आये….।
=जय भारत
वन्दे मातरम्।

संस्कृत सुभाषितों के गर्भ में

वरिष्ठ साहित्यकार डा. उमेश प्रसाद सिंह।
वरिष्ठ साहित्यकार डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

संस्कृत साहित्य में सुभाषितों की गरिमामय परम्परा है। मानव जीवन की अभ्युन्नति और उसके उत्कर्ष के लिये उपयोगी और मूल्यवान अनुभव-कथ्यों को जगह-जगह से चुनकर संकलित करने की परिपाटी संस्कृत में प्रचलित है। सुभाषित का मुख्य सम्प्रेष्य अर्थ जीवन के लिये कल्याणकारी होता है।
सच है कि संस्कृत काव्य में मनुष्य जीवन के लिये बहुत कुछ महत्तम उपलब्ध है। मगर यह भी सच है कि संस्कृत साहित्य के महान रचनाकारों में अनुभव की जो व्यापकता, दृष्टि की जो गहराई और अभिव्यंजना का जो कौशल है, वह उस परम्परा के परवर्ती संकलनकर्ताओं और व्याख्याताओं की पकड़ से अछूता ही रह गया है। टीका की समृद्ध परम्परा के बावजूद ‘मेघदूत- एक पुरानी कहानी’ में हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कालिदास की संवेदना का जैसा पुनर्सृजन किया है, वह टीकाकारों की पकड़ से बाहर की चीज है। रचनात्मक भाषा की विलक्षणता में जो संवेदना की व्यंजना है, वह केवल भाषा के विच्छेदन से प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है।
सुभाषितों के गर्भ में सुभाषित के अलावा भी बहुत कुछ है, जो सुभाषित के आवरण को तोड़कर बाहर आने के लिये न जाने कितनी छटपटाहट से भरा है, मगर हम उधर देखने को उन्मुख ही नहीं हो पाते। जीवन-सत्य कितने-कितने रूपों में कविता की आन्तरिक संरचना में ध्वनित होने को मचलता रहता है, मगर हम उसके किसी एक रूप में ही इतने अनुरक्त पड़े रहते है कि बाकी रूप अनदेखे ही रह जाते हैं।
शिक्षा के शुरुआती दौर में किसी कक्षा के पाठ्यक्रम में संकलित सुभाषित संग्रह में मैंने एक पद पढ़ा था –
यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः स पण्डितः स श्रुतिवान् गुणज्ञः।
स एव वक्ता स च दर्शनीयः सर्वे गुणा कांचनमाश्रयन्ति।।
पता नहीं क्यों तब भी यह श्लोक मुझे सुभाषित नहीं लगा था। आज भी नहीं लगता। तब से आज तक तमाम कोशिशों के बावजूद इस उक्ति को मैं सुभाषित की श्रेणी में स्वीकार नहीं कर सका। इस छन्द में मुझे बराबर बजती हुई कोई और ध्वनि सुनाई देती है, जो कविता के मूल कथ्य को कविता से बाहर ले जाती है। इस कविता की अर्थव्यंजना शब्दों में ही आबद्ध नहीं है। वह शब्दों से फूटकर शब्दों का अतिक्रमण कर जाती है और अर्थ शब्दों के बाहर निकल कर जीवन के विस्तार में झंकृत हो उठता है। शायद हर महत्वपूर्ण कविता शब्दों को भेदकर सुदूर संवेदना के विस्तार में अर्थवती होती है, जैसे बीज को तोड़कर वृक्ष फलित होता है।
भाषा के विच्छेदन से कविता का अर्थ पाने की प्रणाली वाणी का व्यायाम भर है। महत्वपूर्ण कविता हर समय में भाषा की खोल को तोड़कर ही प्रतिष्ठित होती है। खैर!
यह कविता भर्तृहरि की कविता है। इसमें एक प्रेमी कवि के जीवन का अनुभव है। इसमें एक राजा कवि का अनुभव है। इसमें एक विरक्त वैरागी कवि के जीवन का बोध है। भर्तृहरि कोई अदना से आदमी नहीं थे। कोई मामूली-सी बात कहने के लिये उन्होंने कविता का आश्रय नहीं लिया था। जीवन के विविध पक्षों की सूक्ष्मता और गहराई का उन्हें सम्यक बोध था। उनकी कविता उस गहन बोध की सहज अभिव्यक्ति की मिशाल है।
कविता में अर्थ-निष्पादन की कोई एक ही चिराचरित प्रणाली नहीं है। अर्थ-व्यंजना की अनगिनत प्रणालियाँ है जिनका प्रयोग कवि अपनी सूझ के अनुसार करते हैं। ऐसे में हम यदि किसी एक ही प्रधान प्रणाली को पकड़ कर कविता में अर्थग्रहण का आग्रह करते हैं, तो यह कविता के प्रति अन्याय ही नहीं अत्याचार बन जाता है।
भर्तृहरि की इस कविता में अर्थ की गरिमा का आख्यान नहीं है। अर्थ के आतंक का उपहास है। इस कविता में कवि के अपने विश्वास की प्रतिष्ठा नहीं है। लोक विश्वास की अन्धता का उद्घाटन है। अतिरेक का उन्मोचन है। उसकी अतार्किकता से निर्मित असंगति के प्रति क्षोभ है। कविता की व्यंजना अर्थ की प्रशस्ति की नहीं बल्कि अर्थ के प्रति सामूहिक सोच की विपन्नता और विद्रूपता के प्रति खेद की है।
कवि लोकमान्यता के बिडम्बना मूलक सच का उद्घाटन करते हुये कहता है कि जिसके पास प्रचुर धन है, वह कुलीन है। ऊँचे कुल में जन्म लेने के कारण समाज में जो सम्मान कुलीन व्यक्ति को प्राप्त होता है, वह सम्मान धनवान व्यक्ति को धन की उपलब्धि के कारण उसी के साथ बिना प्रयास मिल जाता है। धनवान व्यक्ति को लोग पण्डित यानी विविध विषयों का जानकार भी मान लेते हैं। उसे लोग श्रुतिवान यानी सुनने योग्य बातों को सुने हुये भी मान लेते हैं। उसमें लोगों को गुणों का भंडार भी दिखाई पड़ता है। धनवान व्यक्ति की बातों को दुनिया बड़े महत्व के साथ सुनती है, इसलिये वह कुशल वक्ता मान लिया जाता है। धन की प्रतिष्ठा के कारण धनवान व्यक्ति के चर्चे सुदूर तक फैल जाते हैं। उसमें लोगों को आकर्षण पैदा हो जाता है। लोग उसे देखने को उत्सुक बने रहते हैं, इसलिये वह दर्शनीय हो जाता है। लोक में सारे गुण अर्थात् सारे सद्गुण, कांचन यानी धन का ही आश्रय ग्रहण करते हैं।
यह लोक जीवन का सच है। दुनियाँ में ऐसा दिखाई देता है। दुनिया में ऐसा ही होता है। ऐसा ही है। किसी एक समय में ही नहीं बल्कि हर समय का यह सच है। मगर यह सच, सच न होते हुये भी सच जैसा क्यों है? कविता के शब्दों में यह क्यों नहीं है मगर कविता की अर्थ-व्यंजना में सारे शब्दों में सन्निहित अर्थ का अतिक्रमण करके यह क्यों ही ध्वनित हो उठता है, प्रधान रूप में। कविता के शब्द-कथ्य में कविता के अर्थ की सिर्फ प्रस्तावना है। कविता की पूरी अर्थ ध्वनि कविता के शब्दों से बाहर है। और यह अर्थध्वनि लोक मान्यता के प्रति खेद की अर्थध्वनि है।
धनवान आदमी समाज में धनवान के रूप में सम्मानित और पूजित हो तो कोई दिक्कत की बात नहीं है। कोई विसंगति की बात नहीं है। जीवन-सत्य के सन्दर्भ में कोई व्याघात नहीं है। मगर धनवान व्यक्ति, विद्वान की तरह, वक्ता की तरह, गुणवान की तरह और दर्शनीय की तरह आदृत और पूजित हो, यह बड़ी बेधक विसंगति है। यह सामूहिक जीवन धारा के सहज प्रवाह में व्यवधान की वृत्ति है, व्याघात की स्थिति है। यह स्थिति, यह धारणा जीवन के उत्कर्ष के अनुकूल नहीं है।
धन अपनी अर्थवत्ता में जीवन में उद्भासित हो, अच्छा है। बहुत अच्छा है। शुभ है। स्वागत योग्य है। मगर धन बाकी सबको तिरस्कृत करता हुआ अभिनन्दित हो यह शुभ नहीं है। धन जीवन के लिये बहुत मूल्यवान है। धन की महिमा अपनी जगह शोभित हो, यह शुभ है। मगर धन का और सबको विस्थापित करके सबकी जगह कब्जा जमाकर पूजित होना शुभ नहीं है। धन का कुलीनता को विस्थापित कर देना, विद्वत्ता को विस्थापित कर देना, वक्तृत्ता को विस्थापित कर देना, सौन्दर्य को विस्थापित कर देना, विचार को विस्थापित कर देना आतंक के अधिनायक शासन जैसा विद्रूप है। इस विद्रुप स्थिति का अंकन करके कवि यहाँ इस स्थिति के प्रति अपनी कविता में खेद का भाव जगा रहा है। यह खेद का भाव कविता में व्यंग्य की बेधक व्यंजना का सृजन करता है।
यह सिर्फ संस्कृत सुभाषितों का एक उदाहरण भर है। ऐसे सुभाषितों की संख्या काफी है, जिनके गर्भ में सुभाषित के अलावा और बहुत कुछ मौजूद है। मैं तो संस्कृत के वाग्वैभव से बिल्कुल अनभिज्ञ और अनधिकारी हूँ। संस्कृत के मनीषी विद्वान यदि इधर ध्यान दें तो सुभाषितों के गर्भ में जो व्यंग्य के बीज मौजूद हैं, उनकी हरियाली का वैभव हमें प्रफल्लता प्रदान कर सकता है। तब हमारे हिन्दी व्यंग्य की पृष्टभूमि के लिये एक समृद्ध रिक्थ हमें सहज सुलभ हो जायेगा।
किसी एक का बाकी सबकी जगह हथिया कर सब पर कब्जा कर लेना किसी भी समाज के लिये बेहद विद्रूप है। इस विद्रूप का उद्घाटन व्यंग्य का सबसे प्रधान विषय है।

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