जावेद जाफरी
चंदौली। दीपावली का नाम सुनते ही कभी आंखों के सामने मिट्टी के घरौंदे, टिमटिमाते दीये, रंगोली और भाई-बहनों की खिलखिलाहट तैरने लगती थी। 90 के दशक और उससे पहले का बचपन जीने वाली पीढ़ी के लिए घरौंदा बनाना दीपावली का सबसे बड़ा आकर्षण हुआ करता था। लेकिन बदलते वक्त और आधुनिकता की चकाचौंध ने बचपन की इस खूबसूरत परंपरा पर ऐसा ग्रहण लगाया है कि अब घरों के आंगन से मिट्टी के घरौंदे लगभग गायब होते जा रहे हैं। कभी बच्चों के लिए सालभर का इंतजार रहने वाली दीपावली अब डिजिटल मनोरंजन और इलेक्ट्रॉनिक रोशनी के बीच सिमटती नजर आ रही है।
एक दौर था जब दीपावली से कई दिन पहले ही बच्चे घर के आंगन में मिट्टी इकट्ठा कर घरौंदा बनाने में जुट जाते थे। कोई दीवारें खड़ी करता तो कोई दरवाजे और खिड़कियां सजाता था। घरौंदे को आकर्षक बनाने के लिए मिट्टी के छोटे-छोटे बर्तन, खिलौने और दीये खरीदे जाते थे। छोटी बच्चियां गुड़िया की शादी रचाती थीं, जबकि भाई-बहन मिलकर घरौंदे में दीप जलाकर खुशियां मनाते थे। मिट्टी की सौंधी खुशबू और चूने की सफेदी के बीच तैयार होने वाला यह छोटा सा घर बच्चों की कल्पनाओं की पूरी दुनिया हुआ करता था। समय बदला तो त्योहार मनाने का अंदाज भी बदल गया। अब बच्चों के हाथों में मिट्टी और खिलौनों की जगह मोबाइल फोन दिखाई देते हैं। इंटरनेट, वीडियो गेम और डिजिटल मनोरंजन ने बच्चों को घर के आंगन से दूर कर दिया है। वहीं मिट्टी के दीयों की जगह रंग-बिरंगी चाइनीज झालरों और इलेक्ट्रॉनिक लाइटों ने ले ली है। घर का कोना-कोना रोशनी से जगमगा रहा है, लेकिन उस रोशनी में बचपन की मासूम खुशियां कहीं खोती जा रही हैं। इस बदलाव का असर परंपरागत कुम्हारों पर भी पड़ रहा है। मिट्टी के दीयों और छोटे बर्तनों की मांग घटने से उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है। दीपावली आज भी रोशनी का त्योहार है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ बिजली की चमक से त्योहार की असली खुशियां लौट सकती हैं जरूरत है कि अभिभावक बच्चों को मिट्टी के दीये जलाने, घरौंदा बनाने और पारंपरिक रीति-रिवाजों से जोड़ें, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी दीपावली को सिर्फ मोबाइल की स्क्रीन पर नहीं, बल्कि आंगन की मिट्टी और अपनों के साथ महसूस कर सकें।
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दीपों की लौ में छिपा था सेहत और शुद्धता का संदेश
चंदौली। दीपावली का पर्व कभी मिट्टी के दीयों की रोशनी और उनकी सौंधी खुशबू से पहचाना जाता था। घरों के आंगन, छतों, चौखटों और तुलसी चौरे पर जलते दीपक न सिर्फ अंधकार मिटाते थे, बल्कि भारतीय परंपरा और प्राकृतिक जीवनशैली का भी प्रतीक हुआ करते थे। मान्यता रही है कि सरसों और तिल के तेल से जलने वाले दीपक वातावरण को शुद्ध रखने में सहायक होते हैं। दीपक की लौ से घरों में सकारात्मकता और पवित्रता का एहसास होता था।
लेकिन बदलते दौर में चाइनीज झालरों और रंग-बिरंगी विद्युत लाइटों ने मिट्टी के दीयों की जगह ले ली है। घरों का कोना-कोना बिजली की रोशनी से जगमगा रहा है, मगर पारंपरिक दीपों की लौ दुर्लभ होती जा रही है। आधुनिक चकाचौंध में दीपावली की असली पहचान और मिट्टी के दीयों से जुड़ी संस्कृति धीरे-धीरे ओझल हो रही है।

