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Tuesday, July 7, 2026

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हस्तिनापुर एक्सटेंशन : कस्मै देवाय हविषा विधेम

हस्तिनापुर एक्सटेंशन
हस्तिनापुर एक्सटेंशन


Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह, HASTINAPUR EXTENTION

हस्तिनापुर एक्सटेंशन : मनुष्य की जिज्ञासा हमेशा से, हमेशा के लिये पूर्णता की जिज्ञासा है। जिज्ञासा ही खोज में प्र्रवृत्त करती है। मनुष्य की खोज पूर्णता को पाने की खोज है। मनुष्य की अभीप्सा परिपूर्ण होने की अभीप्सा है। वह भर जाना चाहता है। वह तृप्त हो लेना चाहता है। वह आनन्द चाहता है। सारी इच्छाओं का मूल पूर्णता है। मगर मूल दिखाई नहीं देता। जड़ कहाँ दिखाई देती है? वह तो धँसी है। बिल्कुल अन्दर। अस्तित्व की आन्तरिक सतह में जड़ धँसी है। बाहर विस्तार है। विस्तार दिखाई देता है। मूल नहीं दिखाई देता। विस्तार मूल को ढँक देता है। बड़ा विचित्र है। मगर सच है। जीवन बड़ा विचित्र है।

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Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

जीवन का मूल क्या है? कुछ नहीं। जीवन का मूल जीवन ही है। जीवन से हटकर जब हम जीवन के मूल को तलाशने लगते हैं, तो उससे विमुख हो उठते हैं। चाहे हमारी तलाश ईश्वर के लिये हो, चाहे धर्म के लिये हो, चाहे तत्व के लिये हो। ईश्वर जीवन में ही है। धर्म जीवन में ही है। तत्व जीवन में ही है। हम भूल जाते हैं कि विस्तार भी मूल का ही है। बिना मूल के कोई विस्तार संभव नहीं है। बिना जड़ के कोई पेड़ हो ही नहीं सकता।
मूल सच है। मगर विस्तार झूठ नहीं है। जड़ सच है, मगर पेड़ भी सच है। तना, शाखा, टहनी, पत्ते, फूल, फल, बीज सब सच हैं। सच से झूठ का जनमता विश्वसनीय नहीं है। हम सच को खोजने चलते हैं और झूठ में उलझ कर रह जाते हैं।
कौन उलझाता है, हमें झूठ में? झूठ है नहीं और उसमें उलझे हैं हम। हमें उलझाती हैं, शास्त्रों की गलत समझ। बिना कुछ समझे, समझाने का लोलुप व्यापार। व्यापार का प्रसार। व्यापार का प्रचार। प्रचार का विज्ञापन। आदमी को अपना अनुगत बनाने की, अनुचर बनाने की दुर्ललित लालसा। हमें उमझाता है, विस्तार को मूल से भिन्न और झूठ बताने का झूठ। समूचे वृक्ष में जड़ से उत्प्रेरित ऊर्जा संचरित है। पत्ता-पत्ता जड़ से पोषित है।

हमारे शास्त्र, जिसे हमारे मनीषियों ने रचा है, उसमें जिज्ञासा है, खोज है, उपलब्धियाँ हैं। जिज्ञासा के बड़े गहरे स्रोत हैं। खोज की उत्कट उत्प्रेरणा है। उपलब्धियों का अपूर्व तोष है।
जिज्ञासा है, – कस्मै देवाय…? कस्मै देवाय हविषा विधेम।’’ किस देवता के लिए? हम यजन किस देवता के लिए करें? देवता कौन है? देने वाला कौन है? क्या देने वाला है? यज्ञ किसलिये करना है?
क्या देने वाला है? यज्ञ किसलिये करना है?
खोज है,- ‘‘आत्मने मोक्षार्थ जगत हिताय च’’। हमारी खोज स्वयं के मुक्त होने की खोज है। जगत के कल्याण की, जगत केक हित साधन की खोज है।
मुक्ति की खोज असीमता के बोध की खोज है। अस्तित्व असीम है। जगत असीम है। बिना मुक्त हुए जगत का हित साधन संभव नहीं।

उपलब्धि है, -‘रसो वै सः’ वह ही रस है। रस ही वह है। रस ही जीवन है। रस ही जगत है। रस ही पूर्ण है। रस ही सब कहीं परिपूर्ण है। रस को ही अवशोषित करके मूल पत्ता-पत्ता में पहुँचा रहा है। डाल-डाल, पात-पात सब रस से आप्लुत है।
बड़ा आश्चर्यजनक है कि धर्म जिस रूप में हमारे जनजीवन में प्रचारित है, वह धर्म नहीं है। धर्म का धोखा है। हमारे समाज में धर्म का जो स्वरूप व्यवहार में है, वह भय को पैदा करने वाला है। अभय को प्रदान करने वाला धर्म भय को पैदा करने वाला कैसे है? कैसे हो गया है? किसने भय को बढ़ाने वाले व्यवहार को धर्म की शक्ल में खड़ा किया है। पुण्य के लोभ का प्रवर्तन वाला धर्म किसने बनाया है? मृत्यु में, शादी-विवाह में, जन्म-कर्म में तमाम मौकों पर ऐसा-ऐसा, ऐसे-ऐसे नहीं करोगे तो धर्म से च्युत हो जाओगे? दान दोगे तो पुण्य कमाओगे। पुण्य से ऐश्वर्य को प्राप्त करोगे। क्या समृद्धि को, ऐश्यवर्य को, वैभव को पाने का साधन ही धर्म नहीं है। धन क्या समृद्धि को, ऐश्वर्य को, वैभव को पाने का साधन ही धर्म नहीं है। धन-वैभव को प्राप्त करने के साधन और भी हैं। यह कौन-सा धर्म है? कैसा धर्म है? किसका धर्म है?

नहीं, ऐसा वेदों में नहीं है। उपनिषदों में नहीं है। रामायण में नहीं है। महाभारत में नहीं है। महाकाव्यों में नहीं है। बुद्धवाणी में नहीं है। महावीर चरित में नहीं है। फिर भी है। गाँव-गाँव में है। घर-घर में है। जन-जन में है।ै आदमी को कमजोर बनाने वाला धर्म, लालची बनाने वाला धर्म, कायर बनाने वाला धर्म, डरपोक बनाने वाला धर्म, स्वार्थी बनाने वाला धर्म, अन्धा बनाने वाला धर्म हर कहीं है।
धर्म के नाम पर हम इतने डरे हुए हैं कि कुछ कहने लायक नहीं। हमें डर है कि हम बलवान हो जायेंगे तो धर्म से वंचित हो जायेंगे। हमें डर है कि हम धनवान हो जायेंगे तो धर्म से विमुख हो जायेंगे। हमें डर है कि हम सुंदर दिखेंगे तो धर्म से पतित हो जायेंगे। हमें डर है कि हम बुद्धिमान हो जायेंगे तो धर्म से भ्रष्ट हो जायेंगे। राम, राम। यह भी कोई धर्म है। धर्म न हुआ, डर की दुकान हो गया। हर किसिम का डर यहाँ उपलब्ध है। मन्दिर जाओ तो डरे हुए जाओ। कोई अशुद्धता न हो जाय। कोई त्रुटि न हो जाय। कुफल न मिल जाय। मंदिर जाओ तो माँगने के लिए जाओ। बिना उचित कीमत चुकाये सब कुछ पाने के लिए देवता से कृपा की भीख माँगने जाओ। भक्ति को भिखमंगई का धन्ध बनाने का जवाबदेह कौन है?
जबाबदेह चाहे जो हो, धन्धा हम सभी कर रहे हैं। इस काले धन्धे में हम सब लिप्त हैं। इतने लिप्त हैं कि इसके बारे में सोचने का हमें अवकाश ही नहीं है।

कितना अजीब है, वैतरणी में रहने वाले लोग वैतरणी में गिरने के डर से धर्म का पालन करते है। नरक के दुखों को भोगने वाले लोग नरक में जाने के डर से धर्म का पालन करते हैं। गाय की पूँछ पकड़कर स्वर्ग में पहुँचने की लालच में धर्म का पालन करते हैं। यह पता नहीं कैसा धर्म है। धर्म की शक्ल में पता नहीं क्या है? हमारे तो पूर्वजों की पूजा की पीठिका ही बिल्कुल भिन्न है-

ऊँ पूर्णमदः पूर्ण मिदमं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्ण मेवाव शिष्यते।।

यहाँ सच और झूठ का। सत्य और मिथ्या का। मूल और विस्तार का विभेद नहीं है। खण्डों की आराधना नहीं है। अखण्ड का, असीम का स्तवन का। असीमता की, पूर्णता की स्तुति है। वह भी पूर्ण है। यह भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण उत्पन्न हुआ है। सत्य में से सत्य अविभूर्त हुआ है। पूरे में से पूरा निकाल लेने के बाद भी पूरा बचा रह जाता है।
हमारी परंपरा में हमारी प्रार्थना सब कुछ को पाने की प्रार्थना है। हमारी प्रार्थना खण्ड को नहीं, खण्डित को नहीं, पूर्ण को पाने की प्रार्थना है। सब कुछ मिलकर पूर्ण होता है। पूर्ण में सबकुछ होता है। सबकुछ में सब है, तेज है, बल है बुद्धि है, वीर्य है, ओज है, धन है। जीवन में यह सब है। इस सबमें जीवन है, इसलिये प्रार्थना है, कि-

तेजोऽसि तेजो मयि धेहि। बलमसि बलं मयि धेहि। वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि……।

जीवन में तेज हो, प्रकाश हो, प्रभा हो, दीप्ति हो। बल हो। वीर्य हो। बुद्धि हो। धन हो। ऐश्वर्य हो। सब हो। सब होगा तो जीवन पूर्ण होगा। जीवन में सब हो- धर्मार्थ काम मोक्षाणाम्।
जीवन में धर्म की प्रतिष्ठा हो, अर्थ की प्रतिष्ठा हो, काम की प्रतिष्ठा हो, मोक्ष की प्रतिष्ठा हो, तो जीवन पूर्ण होगा। केवल धर्म जीवन को पूर्ण बनाने के लिये पर्याप्त नहीं है। धर्म निरीह बनाने के लिये नहीं है। सबल बनाने के लिये है। समर्थ बनाने के लिये है। अर्थ, धर्म का विरोधी नहीं है। सहायक है। सहचर है। काम, धर्म का नाशक नहीं है। काम, धर्म का विलोम नहीं है। प्रकृति की मूलशक्ति का निदर्शन है। काम जीवन के विस्तार का वाच्यार्थ है। और मोक्ष? मोक्ष में ही जीवन है। जीवन की पूर्णता का बोध है। सीमा पूर्ण नहीं है। असीमता पूर्ण है। पूर्णता का बोाध ही मुक्ति है। असीमता ही अविनाशी है। अस्तित्व के अविनाश का बोध ही मोक्ष है।

जीवन, मुक्त है। बँधा नहीं है। जो चीज हमें मुक्त होने की तरफ ले जाती है, जीवन की तरफ ले जाती है। जीवन कीतरफ ले जाने वालाा रास्ता ही हमारे लिये वरेण्य है। इसलिये प्रश्न है,- कस्मै देवाय? किस देवता के लिए?
कौन है, जो हमारे जीवन को पूर्ण बनाने में, परिपूर्ण बनाने में सहायक है। जीवन की पूर्णता की आराधना ही, हमारी आराधना है।
जीवन केवल धर्म में पूर्ण नहीं है। केवल अर्थ में पूर्ण नहीं है। केवल काम में पूर्ण नहीं है। केवल मोक्ष में पूर्ण नहीं है। वह सबमें है। सबमें होकर पूर्ण है।
पता नहीं किसने, धर्म की श्रेष्ठता सुनिश्चित करने के लिये धन से उदासीन होने का विचार प्रसारित कर दिया। पता नहीं किसने मोक्ष की महिमा बताने के लिये काम से दूर रहने का उपदेश प्रचारित कर दिया। यह मनीषियों का नहीं, पाखण्डियों का पाण्डित्य है। खण्ड की आराधना पाखण्ड है।

हमारे मनीषियों ने शास्त्रों में ऐसा नहीं कहा है। धन की निन्दा धर्म नहीं है। धनिकों का निरस्कार धर्म नहीं है। धन निन्दनीय नहीं है। धर्म विहीन धन निन्दनीय है। काम तिरस्करणीय नहीं है, धर्म और धन से रहित काम, विमुख काम रिस्करणीय है। खण्ड की उपासना, खण्डित जीवन की उपासना मनुष्य के लिय मंगल विधायक नहीं है। पूर्ण की उपासना, जीवन में, जीवन के लिये मंगलकारी है।
हमें उस देवता के लिये यजन करना है, जिसके प्रसन्न होने से पर्जन्य पानी बरसते हैं। पानी बरसने से शस्य की वृद्धि होती है। शस्य से अन्न उपजता है। अनन्न से प्राणियों का, प्राणों का पोषण होता है। जो हमारी वनस्पतियों की रक्षा करता है। वृक्षें की रक्षा करता है। हमारे पशुओं की रक्षा करता है। जो हमारे वाक् को, श्रोत को, स्पर्श को, जाग्रत रखता है। प्राणों को पुष्ट करता है। जो हमें, पूर्ण के बोध की ओर उन्मुख करता है, उत्प्रेरित करता है, हमें उसकी उपासना करनी है। वही हमारा उपास्य है। हमें उसकी उपासना करनी है, जिसमें समूचा अस्तित्व समाहित है। हमारी उपासना अस्तित्व में समाहित होने की उपासना है। समूचे जीवन जगत की एकता की, एकरूपता की उपासना हमारी आराधना का, हमारी प्रार्थना का मूल है। यही हमारी प्राप्ति का आधार है।

मगर कहीं, न कहीं बड़ी भारी गड़बड़ है। गड़बड़ यह है कि धर्म की शक्ल में जिस धोखे को खड़ा किया गया है, हम सारी शक्ति लगाकर भी उसे इंकार नहीं कर पा रहे हैं। विचार के धरातल पर उसे झूठ समझकर भी व्यवहार में उसके आगे आत्मसमर्पण को विवश हो जाते हैं। यही विवशता मनुष्य जाति की दारुण नियति है। झूठ के प्रभाव में, झूठ के आतंक में, झूठ के समर्थन में बहुमत का होना हमारे जीवन की सबसे जटिल समस्या है। व्यापक जनजीवन में प्रचारित धर्म, धर्म जैसा क्यों नहीं है? हमारा धर्म, हमें डरपोक बनाता है। दयनीय बनाता है। निरीह बनाता है। निर्धन बनाता है। निष्काम बनाता है। कर्महीन बनाता है। लोभी बनाता है। स्वार्थी बनाता है। दँतनिपोर बनाता है। याचक बनाता है। यह सब भला धर्म का काम है? नहीं, नहीं, कत्तई है।

धर्म तो सत्य का अवबोध कराता है। सचाई के सामने आँख मिलाकर खड़ा होने का साहस देता है। पूर्णता के प्रत्यय को आत्मसात करने का उन्मुख करता है। सबमें अपने को, और अपने में सबको,- सबकुछ को अनुभव करने की सामर्थ्य देता है। धर्म अर्थ का सम्मान है। काम का समादर है। मोक्ष की प्रशस्ति है। धर्म सुख का विस्तार है। धर्म विस्तार का अभिनन्दन है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सभी विस्तार की अभ्यर्थना के माध्यम हैं। हमें विस्तार में ले जाकर असीमता के मर्म का उद्घाटन करते हैं। सौन्दर्य की उपासना का और प्रेम की पूजा का हमें मंत्र देते हैं। विस्तार में ही, विस्तृत हो लेने में ही सुख की स्थिरता है। आनन्द की स्थिति है।

‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वेसन्तु निरामयाा
‘‘सर्वे भद्राािण पश्यन्तु मा कश्चिद दुख भाग भवेत्।।’’

यह महानता के विचार का मंत्र नहीं है। यह सचाई के अनुभव का शंखघोष है। यह अस्तित्व के अवबोध की उद्घोषणा है। धर्म व्यक्ति पर अवलम्बित होने के लिये नहीं है। व्यक्ति धर्म में समाहित होने के लिये है। धर्म, जीवन में समाहित होने के लिये है। धर्म, व्यक्ति अस्मिता के सामूहिक अस्मिता में विलयन की अभिक्रिया का नाम है। वैयक्ति इयत्ताएँ जहाँ सामूहिक इयत्ता में विसर्जित होती हैं, वहीं धर्म की स्थिति है। वहीं धर्म की ध्वनि है। वहीं धर्म का प्रकाश है। धर्म का प्रकाश ही धन का गौरव है। काम की कीर्ति है। मुक्ति की महिमा है। सभी सुखी हों, यह मुक्ति की महिमा का ही उद्घोष है।
कौन है? कौन है वह, जो हमें धर्म से संयुक्त करेगा। धन से अभिबृद्ध करेगा। काम से परितुष्ट करेगा। मुक्ति के महत बोध से पूर्ण करेगा। वह कौन देवता है?

‘‘मातृ देवो भव…’’ जो तुम्हारे अस्तित्व की प्रसूता माता है; देवता है।
‘‘पितृ देवो भव….’’ पिता, जो तुम्हारी अस्मिता का स्थापक है, देवता है।
‘‘आचार्य देवो भव….’’ तुम्हारी अस्मिता का प्रकाशक, आचार्य देतवा है।

तुम्हारे अलावा जो कुछ है, उदसमें भी तुम्ही हो, इस प्रकाश का प्रबोध करने वाला आचार्य, देवता है।
‘‘अतिथि देवो भव…’’ जो स्वयं चलकर तुम्हारे पास आता है, तुम्हारे साथ रहता है, वह अनुभव, देवता है।
साथ रहता है, वह अनुभव, देवता है।
जो अस्तित्व का संस्थापक है, पिता है, देवता है। जो अस्तित्व की उद्घाटक है, माता है, देवता है। जो अस्तित्व का प्रकाशक है, आचार्य है। जो अपने को ही भेदकर अपने में आता है, अतिथि है, अनुभव के स्वरूप में, देवता है।
देवता की पूजा करो। देवता का यजन करो। हमारा यजन अस्तित्व का अस्तित्व में यजन है। अपनी समस्त वैयक्तिकता का सार्वजनिकता में, सार्वभौमिकता में यजन यज्ञ है। अपने अस्तित्व में अपने धर्म की आहुति, अपने धन की आहुति, अपने काम ही आहुति, मुक्ति में फलित होती है।

मुक्ति के फलित होते ही सबकुछ फलित हो उठता है। जीवन फलित हो जाता है। पूर्णता फलित हो जाती है। असीमता फलित हो जाती है। रस फलित हो जाता है। अमरत्व फलित हो जाता है। सब अपनाहो जाता है। अपनत्व का असीम विस्तार घटित हो उठता है,- वसुधैव कुटुम्बकम्। सारी पृथ्वी में सब अपना ही है। अपना ही विस्तार है। अपना ही परिवार है।
पूर्णता का बोध ही, जीवन है। जीवन का मकसद है। जीवन का अर्थ है। जीवन की व्यंजना है।
यही हमारी पूजा है। यही हमारी प्रार्थना है। यही हमारा यज्ञ है। यही हमारा यजन है।

किस देवता के लिये?
किस देवता के लिये हम हवि डालें?
जीवन देतवा के लिये।
पूर्णता के देवता के लिये। पूर्ण देवता के लिये।

हमारी जिज्ञासा पूर्णता की जिज्ञासा है। हमारी खोज पूर्णता की खोज है। हमारी प्राप्ति, पूर्णता की प्राप्ति है। हमारी उपलब्धि, पूर्णता की उपलब्धि है। हम खण्ड के उपासक हभी नहीं रहे है। हम टुकड़खोर जाति के उत्तराधिकारी नहीं है। हमारी विरासत पूर्ण की विरासत है। परिपूर्ण की विरासत है। हमारी विरासत पूर्ण की प्रतिपादक विरासत है।

-Young Writer

Chandauli: नहर में डूबने से बालक की मौत, परिजनों में मचा कोहराम


दोस्तो के साथ जसुरी नहर में नहाने गया था अरमान तेज़ बहाव के कारण डूबने से मौत
चंदौली सदर कोतवाली क्षेत्र के नेगुरा गांव के समीप बुधवार को नहर में 13 वर्षीय बालक को पानी में बहता देख ग्रामीणों ने हड़कंप मच गया। मौके पर जुटे आस पास के ग्रामीणों ने तत्काल नहर में कूदकर बालक को बाहर निकाला और इलाज़ के लिए जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया जहा चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। वही मौत की खबर सुनते ही परिजनों में कोहराम मच गया। परिजन रोते बिलखते पोस्टमार्टम हाउस पहुच गए।
बताते हैं कि बबुरी रोड वार्ड नंबर 9 लोहिया नगर निवासी गुलाम मुहम्मद (उर्फ गामा) का पुत्र अरमान अली 13 वर्ष अपने दोस्तों के साथ जसुरी नहर में नहाने गया था। इसी दौरान नहर में पानी का बहाव तेज़ होने के कारण वो बहने लगा। और नेगुरा गांव के समीप पहुच गया। ग्रामीणों की नजर जब बालक पर पड़ी तो ग्रामीणों में हड़कंप मच गया। लोगो ने किसी तरह नहर में कूद कर बालक को बाहर निकाला और तत्काल जिला अस्पताल में भर्ती कराया जहा चिकित्सकों ने उसे इलाज के दौरान मृत घोषित कर दिया। इस बाबत सदर कोतवाल राजीव कुमार सिंह ने बताया कि अरमान दो दोस्तों के साथ जसुरी गांव ने नहाने गया था उसी दौरान गहरे पानी मे डूब गया। और उसकी मौत हो गयी। शव को कब्जे में कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। आगे की कार्यवाही की जा रही है।
इनसेट…….
दो भाइयों में सबसे बड़ा था अरमान
चंदौली। अरमान की मौत से उसकी माँ का रो-रो कर बुरा हाल है। भीगी पलको से बस एक टक अपने बेटे अरमान के घर आने का इंतज़ार कर रही है। और बेसुध बेहोश हो जा रही थी। साथ ही दोनों भाई अयान व आदिल का भी रो कर बुरा हाल है। पिता गुलाम मुहम्मद बेटे की सदमे से उभर नही पा रहे हैं। अरमान की मौत से पूरे घर मे मातम छा गया है।

Chandauli:पुलिस ने तीन अंतर्राज्यीय गांजा तस्कर को दबोचा, 46 किलो गांजा बरामद

चंदौली। सैयदराजा पुलिस को चेकिंग के दौरान  बड़ी सफलता हाथ लगी पुलिस ने बुधवार को मुखबिर की सूचना पर नौबतपुर पुलिस बूथ के पास कार से गांजा तस्करी करने जा रहे तीन अंतर्राज्यीय गांजा तस्कर को धर दबोचा जिनके पास से 46.250 किलो गांजा बरामद किया गया। उक्त मामले का खुलासा अपर पुलिस अधीक्षक सुखराम भारती व सीओ रामवीर सिंह ने पुलिस लाइन में किया।

 इस दौरान उन्होंने बताया कि विगत काफी दिनों से उड़ीसा प्रान्त से अन्तर्राज्यीय गिरोह द्वारा उत्तर प्रदेश राज्य मे गांजा तस्करी सूचना मिल रही थी। इसी क्रम में प्रभारी निरीक्षक संतोष कुमार सिंह नौबतपुर पुलिस बूथ के पास के पास चेकिंग अभियान चला रहे थे। तभी मुखबिर से सूचना मिली कि उड़ीसा प्रान्त से कुछ गांजा तस्कर कार से गांजा लेकर प्रयागराज जा रहे हैं। सूचना पर प्रभारी निरीक्षक संतोष कुमार सिंह ने चेकिंग अभियान चला रहे थे। कि बिहार की तरफ से आ रही टाटा टिगोर कार को रोका गया। कार सवार व्यक्ति पुलिस टीम को देख भागने लगे। पुलिस ने तत्काल घेरे बंदी कर कार सहित उसमें बैठे सवारों को धर दबोचा और कार को खुलवाकर चेक किया गया तो उसमें कुल 46.250 कि0ग्रा0 गांजा बरामद किया गया। जिसकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार मे अनुमानित कीमत करीब सात लाख रूपये  है । 

पुलिस ने गिरोह के तीन तस्करों को गिरफ्तार कर थाने ले आयी पूछताछ में गांजा तस्कर अमन सिंह ने बताया गया कि आकाश सिंह पुत्र अमर सिंह निवासी ढकवा जनपद प्रतापगढ और विक्की शर्मा आकाश सिंह व  विक्की सिंह दोनो मिलकर गांजा तस्करी का काम करते हैं। यह माल भी उन्ही का है। हम लोगो के साथ आकाश सिंह भी सम्भलपुर उड़ीसा गया था। हम लोगो को बस स्टाप के सामने बसन्ती लाज मे रूकवाकर अपने गाड़ी लेकर गया। और तीन चार घंटे बाद गांजा गाड़ी मे लोडकर ले आया। और गाड़ी हम लोगो को दे दिया और वह वहीं रूक गया। हम लोग यहां गाड़ी लेकर आये और पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया। नाजायज गाजा की बरामदगी व गिरोह के तीन तस्करों की गिरफ्तारी के आधार पर उनके विरुद्ध थाना सैयदराजा में एनडीपीएस एक्ट मुकदमा पंजीकृत कर जेल भेज दिया गया। पुलिस टीम में 

निरीक्षक अशोक कुमार मिश्रा, जमीलुद्दीन खान,गुंजन तिवारी, आलोक कुमार,मुकेष निषाद, अभिषेक राय, थाना, सन्दीप कुमार, अजय सिंह, मौजूद रहे।

आकाशीय बिजली का आघात‚ गंजबसनी में 85 भेड़ों की मौत

आकाशीय बिजली का आघातः घटना के बाद गंजबसनी में भेड़ों की मौत की घटना की जानकारी लेते एसडीएम।
घटना के बाद गंजबसनी में भेड़ों की मौत की घटना की जानकारी लेते एसडीएम।


आकाशीय बिजली के आघात से दो पशुपालकों को लाखों का हुआ नुकसान

Young Writer, नियामताबाद। अलीनगर थाना क्षेत्र के गंजबसनी गांव में आकाशीय बिजली गिरने से 85 भेड़ों की मौके पर ही मौत हो गई। मंगलवार की रात्रि को रामअवध और रामजनम पेड़ के नीचे भेड़ों के पास बैठे थे। अचानक मौसम ने करवट बदली और आसमान में काले बादल छा गए। थोड़ी देर में गरजने की आवाज हुई उसी समय आकाशीय बिजली भेड़ों के ऊपर गिर पड़ी। बिजली गिरने से मौके पर ही 85 भेड़ो की मृत्यु हो गई। उपजिलाधिकारी पीडीडीयू नगर अविनाश कुमार मौके पर पहुंच कर घटनास्थल का जायजा लिया। ग्रामीणों से घटना के बारे में विस्तृत रूप से जानकारी ली और सरकार द्वारा हर संभव सहायता देने की बात कही।

आकाशीय बिजली के आघात से गंजबसनी में मृत पड़ी भेंड़।
आकाशीय बिजली की चपेट में आने से गंजबसनी में मृत पड़ी भेंड़।

पशु अधिकारी डा.राजकुमार यादव ने बताया कि रामअवध पाल की 56 भेड़ और रामजनम की 29 भेड़ों की मृत्यु हो गई और 10 भेड़ घायल हो गये। रामजनम और रामअवध पाल बाल बाल बच गये। हादसे की जानकारी देते हुए ग्रामीणों ने बताया कि 250 भेड़ों के साथ राम अवध और रामजनम रात्रि में पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे उसी बीच आकाशीय बिजली गिरने से मौके पर ही 85 भेड़ों की मौत हो गई और 10 घायल हो गए। सूचना पर पहुंची पुलिस ने घटनास्थल का जायजा लिया। लौंदा चौकी प्रभारी जितेंद्र उपाध्याय मौके पर उपस्थित होकर घटनास्थल की जानकारी ली। इस अवसर पर नायब तहसीलदार नीरज चतुर्वेदी, लौंदा चौकी प्रभारी जितेंद्र उपाध्याय, पशु अधिकारी डा.राजकुमार यादव सहित ग्राम वासी उपस्थित रहे।

Hand Wash : स्वच्छता को अपनाएं और बीमारियों को दूर भगाएंः कुंवर बीपी सिंह

Hathiyani हथियानी स्कूल में बच्चों को हैंडवास के बारे में जानकारी देते प्रधान व प्रधानाध्यापक।
हथियानी स्कूल में बच्चों को हैंडवास के बारे में जानकारी देते प्रधान व प्रधानाध्यापक।

चंदौली ब्लाक के हथियानी विद्यालय में हैंडवास विशेष कक्ष का प्रधान ने किया उद्घाटन

Young Writer, चंदौली। सदर ब्लाक के क्षेत्र के हथियानी कंपोजिट विद्यालय में हैंडवास को लेकर विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस दौरान ग्राम प्रधान राजेश यादव द्वारा हैंडवास के लिए बनाए गए विशेष कक्ष का फीता काटकर उद्घाटन किया। वहां ग्राम प्रधान व प्रधानाध्यापक कुंवर वीरेंद्र प्रताप सिंह ने छात्र-छात्राओं को हैंडवास के तरीके बनाए गए। साथ ही इसके फायदे को भी गिनाया व बताया गया।

 हथियानी स्कूल में बच्चों को हैंडवास के बारे में जानकारी देते प्रधान व प्रधानाध्यापक।

इसके बाद ग्राम प्रधान राजेश यादव, प्रधानाध्यापक कुंवर वीरेंद्र प्रताप सिंह के साथ ही शिक्षकों ने संचारी रोग कार्यक्रम के तहत गांव का भ्रमण किया। इस दौरान ग्रामीणों से संवाद स्थापित कर जनपद में चलाए जा रहे संचारी रोग कार्यक्रम की जानकारी दी गई। कुंवर वीरेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि हैंडपम्प व अन्य पेयजल स्रोतों के पास गंदे पानी का जमाव ना होने दें। इसके अलावा बारिश के मौसम में छतों के ऊपर व आसपा गड्ढों में किसी तरह का पानी जमा न होने दें। इससे कई तरह की संक्रामक बीमारियां फैलने का खतरा बना रहता है।

Hand Wash : स्वच्छता को अपनाएं और बीमारियों को दूर भगाएंः कुंवर बीपी सिंह

मच्छरों का प्रकोप बढ़ने के साथ ही मलेरिया व डेंगू जैसी खतरनाक बीमारियां फैलने की आशंकाएं बनी रहती है। बारिश के मौसम में स्वच्छता पर विशेष ध्यान रखकर इन बीमारियों से बचा जा सकता है। स्कूली बच्चों को बताया कि खाना खाने से पहले व शौच करने के बाद हाथ को साबुन या हैण्डवास से अच्छी तरह साफ कर लें। स्वच्छता को अपनाकर ही अपने आप को स्वस्थ व बीमारियों से सुरक्षित रखा जा सकता है। स्वास्थ्य को अपनाएं और दूसरों को स्वच्छता को अपनाने के लिए प्रेरित करें। इस अवसर पर रामाज्ञा तिवारी, आरसी मिश्रा, अजीत, विजय, स्वाती, नीलम, निधि, सरिता आदि उपस्थित रहीं।

Chandauli:भरी बरसात को लेकर डीएम ने समस्त राजकीय चिकित्सालयों को किया हाई अलर्ट,लोग को सावधानी बरतने की दी नसीहत


चंदौली। जिले में बरसात के दृष्टिगत जिला प्रशासन ने एडवाइजरी जारी किया है। इसके तहत भरी वर्षा के दौरान सभी लोग को सावधानी बरतने की नसीहत दी गई है। वहीं समस्त राजकीय चिकित्सालयों को हाई अलर्ट पर रखने का निर्देश दिया है। साथ ही सर्पदंश, वज्रपात एवं जल जनित रोगों के उपचार की व्यवस्था चिकित्सालयों पर सुनिश्चित करने की हिदायत दी है।
जिलाधिकारी निखिल टी फुंडे ने कहा कि आकस्मिक सेवाओं में तैनात अधिकारी व कर्मचारी ड्यूटी पर उपस्थित रहें। दवाओं एवं रोगी वाहन की व्यवस्था भी सुनिश्चित कर ली जाए। वहीं आकाशीय विद्युत से होने वाली घटनाओं से बचाव एवं चेतावनी के लिए दामिनी व सचेत एप का प्रयोग करें। उन्होंने लोगों से भारी बारिश के दौरान पुराने व जर्जर भवनों से निकलकर सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की है। कहा कि आवश्यक कार्य होने पर ही घर से बाहर निकलना चाहिए। भीड़ भाड़ वाले व ट्रैफिक जाम वाले क्षेत्रों में जाने व खुले सीवर व बिजली के तारों से बच कर रहें। किसी भी सीवर समस्या जलभराव वृक्ष पातन आदि के लिए नगर पालिका में कंट्रोल रूम में हेल्पलाइन नंबर 05412-256296 पर सम्पर्क करें। विद्युत ब्रेक डाउन आदि के लिए हेल्पलाइन नम्बर पर जानकारी दें। पीने के पानी को उबाल कर पीएं। नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र से ब्लीचिंग पाउडर व क्लोरीन टैबलेट प्राप्त कर लें। किसी भी आपात स्थिति में मुख्य चिकित्साधिकारी के कन्ट्रोल रूम नंबर 05412-260084 पर सम्पर्क करें। वहीं किसी भी समस्या में अन्टीग्रेटेड कन्ट्रोल रूम नंबर 05412-200100 पर जानकारी दी जा सकती है। पशुओं को सुरक्षित स्थानों पर रखे उचित चारे एवं पानी की व्यवस्था करें। कहा कि मौसम की जानकरी के लिए टीवी, रेडियो आदि प्रसारण माध्यमों की जानकारी लेते रहें। नदी, तालाब, पोखरा, झील व गहरे गड्ढे आदि में जाने से बचें। आपात स्थिति में जिला प्रशासन की ओर से स्थापित कन्ट्रोल रूम नंबर 05412-260476, 260477, 262100 एवं 1121070 पर सम्पर्क किया जा सकता है।

हस्तिनापुर एक्सटेंशन : कितने बजे हैं, मालूम नहीं

हस्तिनापुर एक्सटेंशन
हस्तिनापुर एक्सटेंशन


Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह, HASTINAPUR EXTENTION

हस्तिनापुर एक्सटेंशन : रामदरश मिश्र जी की एक किताब है, – कितने बजे हैं। किताब में उनके ललित निबन्ध हैं। निबन्धों में सहज जीवन का सौन्दर्य है। उल्लास की उष्मा है। संघर्ष का ताप है। हास-हुलास के रंग है। पीड़ाओं की पुकार है। परेशानियों के बेधक दंश हैं। बहुत कुछ है। अपने समय की मुकम्मल जिन्दगी की धड़कन कानों में बजने लगती है। मरते हुए गाँवों की बची हुई जिन्दगी चहकती दिखाई देती है। चहकते हुए महानगरों की मरती हुई जिन्दगी कीकराह सुनाई देती है। जिन्दगी के विविध तरह के रंग इसमें खूब टहक हैं। पढ़ते-पढ़ते खूब मजा आ जाता है। प्रकृति के साथ-साथ मनुष्य की प्रकृति का निदर्शन चित्त को खूब उत्प्रेरित करता है। मिश्र जी के निबन्ध अपने समय में मूलधारा मान लिये गये निबन्धों से भिन्न धारा की उपस्थिति का बोध भी कराते हैं और उनकी शक्ति का भी प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। इस संग्रह के निबन्ध कई दृष्टि से महत्वपूर्ण और मूल्यवान हैं। मगर यह सब बाद में। पहले तो कितने बजे हैं।

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औचक आप किसी से पूछ दें- कितने बजे हैं? आदमी अचकचा जायेगा। अगर उसके हाथ में घड़ी नहीं है, तो फिर उत्तर दे पाना कठिन है। हमारी सभ्यता ने आदमी को उपकरणों पर अवलम्बित करके उसे अपाहिज बना डाला है। हमारे पास समय को जाँचने-परखने के, जानने-बूझने के तमाम साधन थे। तमाम तरीके थे। हम आसमान की तरफ देखकर समय का अन्दाज लगा लेते थे। हमारे आँगन की छाया हमें समय की जानकारी दे देती थी। पेड़ दे देते थे। गाय-घोड़े दे देते थे। रात में तारे हमें समय बता देते थे। चिड़ियाँ हमें समय बता देती थीं। मगर हमने सबकी तरफ से आँख मूँँद ली और घड़ी के भरोसे हो गये। अब एक घड़ी के भरोसे आदमी कितना दयनीय है। घड़ी ने धोखा दे दिया तो चारों खाने चित्त। मेरी घड़ी तो कई दिनों से रूकी पड़ी है। वह केवल बैटरी खत्म होने से ही नहीं रुक जाती है। वह बैटरी रहते भी बहुत बार रुक जाती है। पता नहीं क्यों? रुकने का उसका मन हो आता होगा। घड़ी रुकी पड़ी हो तो भी बार-बार आँख घड़ी पर जाती ही रहती है।

मेरी घड़ी बन्द है। मेरे हाथ में किताब है। दिमाग में सवाल कुलबुला रहा है,- कितने बजे हैं?
समय के सवाल को थोड़ी देर सुलाकर मैं किताब खोल लेता हूँँ। किताब खोल लेता हूँँ तो सवाल अपने आप किताब में डूब जाता है। मैं अनुभव करता हूँ कि मैं भी किताब में डूबता जा रहा हूँ।
‘‘मैं जहाँ खड़ा हूँँ’’ निबन्ध पढ़ते-पढ़ते मैंने अनुभव किया कि यहाँँ रामदरश मिश्र जी भी डूबे हुये हैं। इसमें बचपन का स्मृति-चित्र बड़ा जीवन्त है। अपने निबन्ध में लेखक खुद डूबा हुआ मौजूद मिल गया, इससे बड़ीबात, इससे सुखद बात और क्या हो सकती है। इतने से ही तो निबन्ध, ललित निबन्ध हो उठता है। इतने से ही तो सम्बन्ध सजीव हो उठते हैं। साक्षात मिल-मिलकर भी, गले लिपट-लिपट कर भी मिल न सकने के दारुण दौर में किसी रचना में लेखक से मिल लेने कीपुलक कैसी हो सकती है, आप अनुमान कर सकते हैं। इस निबंध में बाढ़ग्रस्त गाँँव मेें आदमी की दुर्दशाग्रस्त जिन्दगी का बड़ा ही मार्मिक उद्घाटन है। मगर मैं तो रामदरश मिश्र जी से ऐसा टकराया कि उनकी स्मृतियों में ही बह गया।
स्मृतियाँ मुझे बहा ले गईं। मैंने विरोध नहीं किया। मैं बहता गया। रोमांच की पुलक सहता गया। बहता गया। अनेकों बार उनके काशी में होने पर उनके साथ होने का अनुभव अपने आलिंगन में कसता गया। रामदरश मिश्र जी के व्यक्तित्व में दो चीजें मुझे बेहद प्रभावित करती हैं। पहला तो उनके श्वेत केश। उनके सफेद बाल उनके मुखमण्डल को अधिक दीप्तिपूर्ण बना देते हैं। दूसरी चीज उनकी निर्व्याज हँँसी। हँसी-ठहाके तो औरों के पास भी हैं, मगर रामदरश मिश्र जी की हँसी में इतनी हार्दिकता और धवलता एक साथ है कि वह सामने वाले को नहवा देती है। नहवा कर स्निग्ध कर देती है। ठाकुर प्रसाद सिंह जी के ईश्वरगंगी निवास पर कई सुबहों का उजास और डा. चन्द्रकला त्रिपाठी के बी.एच.यू परिसर वाले फ्लैट की कई शामों का गुंजन बहुत कुछ कहता रहा। पहली बार उनकी बहुत प्रसिद्ध कविता-

‘‘बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे,
खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे’’
पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी
उठाता गया सर यूँ ही धीरे-धीरे’’

मैंने वहीं चन्द्रकला त्रिपाठी जी के घर पर सुनी थी। तबसे वह पूरी गजल वैसे ही याद है। मुझे पता नहीं क्यों लगता है, वह मेरी ही कविता है। न जाने क्यों बेहद प्रिय चीजें अपनी लगने लगती हैं। खैर, उस गोष्ठी में ठाकुर प्रसाद जी भी थे। जब रामदरश मिश्र जी ने आगे का शेर पढ़ा – ‘‘जहाँ तुम हो पहुँचे छलाँगे लगाकर, वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे-धीरे।’’ तो ठाकुर जी ने उन्हें रोककर मजाक किया- ‘‘यह नामवर के लिये है।’’ फिर…. फिर…… खूब निष्कलुष हँसी गूँँजती-गुदगुदाती रही। मिश्र जी संयोग से मेरी पी.एच.डी. की मौखिकी के परीक्षक भी रहे। मुझे तनिक भी लगा ही नहीं कि मैं परीक्षा दे रहा हूँ।

रामदरश मिश्र जी की एक और विलक्षणता मुझे बेहद प्रभावित करती है। मैं उनके घर पर भी उनसे मिला हूँ। जितनी देर मैं उनके घर में रहा, मुझे महसूस नहीं हुआ कि मैं घर से बाहर का आदमी हूँँ। एक अल्प परिचित आदमी का यह अनुभव आतिथेय की विलक्षण सहजता ओर उच्छल रागात्मकता के बिना घटित हो ही नहीं सकता। मैंने बहुत बार बड़े-बड़े साहित्यकारों को बड़े-बड़े मंच पर देखा है। मंच पर उनकी भव्यता को देखा है। उनकी गरिमा को देखा है। उनके प्रभामण्डल की दमक देखा है। मन में सवाल उठा है कि क्या साहित्य की जगह मंच ही है? घर में साहित्य के रहने की कोई जगह नहीं हैं? मगर रामदरश जी उन विरले साहित्यकारों में हैं, जो जैसे मंच पर हैं, समारोह में हैं, सार्वजनिक जगहों पर हैं, वैसे ही घर में भी हैं। बल्कि घर में और अधिक उत्फुल्ल। और अधिक उत्सुक। और अधिक मिल लेने को आकुल। मैं कहना चाहता हूँ कि अपने घर में वे मुझे पूरा-पूरा मिले हैं। मैं उनसे हिल-मिल सका हूँ। मिलकर खिल सका हूँ। मगर देखिये न किताब की बात छोड़कर मैं कहाँ बहक गया। क्षमा करियेगा।

जो लोग गाँव से जाकर गाँव की कृतार्थता से कृतघ्न होने से बचे रह गये हैं, उनमें रामदरश जी महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। ग्रामीण जीवनमूल्यों के प्रति उनका अगाध अनुराग कहीं भी कुम्हलाया हुआ नहीं दिखता है। ग्रामीण जीवन संस्कृति में ही मनुष्य के बीच मनुष्य के होने का उनका विश्वास अडिग विश्वास है। युवाओं के प्रति उनकी वेदना और विक्षोभ का स्वर उनके गाँव के प्रति प्रेम को उजागर करता है। ‘गाँव के बीच एक चेहरे की खोज’ में स्वार्थ की बाढ़ में अपनत्व के विलोप की पीड़ा बड़े प्रभावी रूप में अंकित है। ‘बबूल और कैक्टस’ में जिजीविषा विहीन जीवन की व्यर्थता का विषाद चित्रित है। धार्मिक पाखण्ड और आडम्बर की भर्त्सना बड़े स्पष्ट रूप में ‘शोर मत करो आदमी सो रहे हैं’ में सुनाई देती है। ‘नगर जहाँ सपने टूटते हैं’ निबन्ध में आधुनिक सभ्यता के पाखण्ड का उद्घाटन है। जड़ता के विशाल जबड़े जिन्दगी को किस कदर लील रहे हैं, सोचकर कलेजा काँप उठता है।

मैं धीरे-धीरे पूरी किताब पढ़ लेता हूँ। ‘फागुन’ भी पढ़ लेता हूँ। फागुन पढ़ते-पढ़ते मन उमग उठता है। जीवन में उछाह को जगाकर प्रकृति धन्य हो जाती है। सौन्दर्य सज उठता है। उछाह केवल उत्साह नहीं है। केवल उल्लास नहीं है। केवल उमंग नहीं है। यह सब उसमें है। मगर इसके अलावा कुछ और भी है। उछाह में बहुत कुछ है। वह एक मनोभाव नहीं है। कई-कई मनोभावों का संवाहक समुच्चय है। आज हमारे पास बहुत कुछ है। उछाह नहीं है। बड़ा कचोटता है, मन फागुन पढ़कर। हम कितने विपन्न होते जा रहे हैं। ‘महानगर की छाया में’ विकृतियों के बीच की उद्विग्नता उन्मथित करती है। ‘गलत नाम में’ अस्तित्व रक्षण और पहचान की समस्या से सामना होता है। शिलाँग की रम्य यात्रा का भावपूर्ण वर्णन पढ़कर मन उल्लसित हो उठता है।

‘सर्जना ही बड़ा सत्य है’ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उदात्त व्यक्तित्व का भावपूर्ण रेखांकन प्रस्तुत करता है। आचार्य द्विवेदी एक व्यक्ति नहीं हैं, उनमें पूरी परम्परा प्रगट है। किसी भी बहाने द्विवेदी जी का साक्षात्कार व्यक्ति को विस्तार देने का निमित्त बन जाता है। द्विवेदी जी की स्मृति धन्यता बोध को जागृत करने का हमेशा ही आधार बन जाती है। ‘बड़ौदे की शाम’ निबन्ध में रचनाकार के सर्जनात्मक चिन्तन का व्यापक धरातल उन्मोचित है। इसमें स्मृतियों के माध्यम से रचनायात्रा के नेपथ्य का निदर्शन है। निबन्धों की भाषा में व्यवहार की भाषा की विदम्धता विमुग्ध करती है। किताब पढ़कर मन में बड़ा तोष होता है। मगर….
मगर मैं सोचता हूँ, कितने बजे हैं? उत्तर तलाशना है। तभी एक विचार मन में कौंधता है। समय की शिनाख्त केवल घड़ी की सुइयों से नहीं चिपकी है। समय की तासीर मनुष्यों के चेहरे पर भी अंकित रहती है। मैं इस संग्रह के निबन्धों में मौजूद चरित्रों के चेहरों को एक बार गौर से देखता हूँ। अपने आस-पास मौजूद लोगों के चेहरों के सामने से फिर से गुजरता हूँ। मुझे लगता है, कुछेक को छोड़कर सारे चेहरों पर बारह बज रहा है। हमारे जनतंत्र के गरिमामय मुखमण्डल पर भी बारह बज रहा है। मेरी आँखों के आगे तमाम-तमाम हलकान चेहरे, परेशान चेहरे, लस्त चेहरे, पस्त चेहरे भीड़ और भगदड़ की शक्ल में तैरने लगते हैं।

ओफ्फ, क्या करूँ? बड़ा जटिल है, चेहरा पढ़ने का काम। बड़ा जोखिम का काम है। बड़ा घाटे का काम है। बेगार का काम है। फिर भी अपनातो यही काम है।
किसी को इत्तिफाक हो, न हो, मैं देख रहा हूँ, हमारे चारों तरफ बारह बज रहा है। हालाँकि कुछ लोग कह रहे हैं, यह सूर्योदय का समय है। कुछ लोगों के लिये भाग्योदय का समय है। कुछ के लिये यह समय सोने की थाली में जेवनार के सम्मुख होने का समय है। किसी-किसी के लिये आश्वास्ति का समय भी हो सकता है। किसी के लिये यह समय राज्यारोहण के स्वस्तिवाचन का समय भी हो सकता है। मगर अधिकांश के लिये यह समय मरघट की मुर्दनगी के आतंक से भरा समय है। हमारे जनतंत्र में हमारे विश्वास रोज-रोज मर रहे हैं। हम उन्हें रोज-रोज मरघट पहँुचा रहे हैं। फिर भी हम जी रहे हैं। फिर भी हम खा-पी रहे हैं। तानते-तानते फट-फट जा रही चादर को सी रहे हैं। हमारे चेहरे पर हमारे सपनों के चिताओं की राख लिपटी है। हवाइयाँ उड़ रही हैं। हमारा कुछ भी सुरक्षित नहीं है। मैं अपना चेहरा भी शीशे में देखता हूँ। साफ-साफ लग रहा है, – बारह बज रहे हैं।

बारह बजने के बोध के निबन्ध ललित निबन्ध नहीं हो सकते हैं, क्या?
मगर, नहीं। मुझे कोई प्रश्न नहीं पूछना है। हमारे समय के लोकतंत्र में प्रश्न पूछना गुस्ताखी है। अनुशासनहीनता है। निष्ठा का तिरस्कार है। देशभक्ति के खिलाफ है। विकास के विरूद्ध है। कानून व्यवस्था का मजाक है। इसलिये नहीं, नहीं। मुझे कोई प्रश्न नहीं पूछना है।

रामदरश मिश्र जी का कहना है कि हो सकते हैं। केवल संस्कृति विमर्श ही ललित निबन्ध का विषय नहीं है। जीवन की ऊबड़-खाबड़ सच्चाइयाँ भी ललित निबन्ध की पहचान हैं। जीवन की छोटी-छोटी सच्चाइयों में दबी-छिपी जिजीविषा की शक्ति और उसका सौन्दर्य मनुष्य के लिये हमेशा ही अभ्यर्थना के योग्य है। कोई भी चीज सामान्य होने के कारण तुच्छ नहीं हो जाती। मनुष्य जाति की जीवन यात्रा सामान्य जीवन बोध के बीच ही असामान्य और महनीय अनुभूति को उपलब्ध करने की विकास यात्रा है।

-Young Writer

चंदौली में पार्किंग की व्यवस्था नही होने से लोगो के लिए नासूर बना जाम

चंदौली में पार्किंग नहीं होने से लग रहा भीषण जाम

चंदौली। जिला मुख्यालय पर पार्किंग की समस्या ने लोगों की समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। नगर में पार्किंग की व्यवस्था नही होने के कारण आए दिन नगरवासी जाम की झाम में फसकर हलकान हो रहे हैं। चंद कदम की दूरी तय करने के लिए लोगों की लंबी परिक्रमा करना पड़ता है। जाम में फसकर सबसे ज्यादा परेशान महिलाएं व बच्चे होते हैं।
नगर के सब्जी मार्केट सहित अन्य बाजार क्षेत्र में व्यवस्थित पार्किंग व्यवस्था के अभाव में लोग फूटपाथ, सड़क या इधर-उधर खाली जगह देखकर वाहन खड़े कर देते हैं। मनमर्जी से खडे किए वाहन से आने जाने-वालों को तो परेशानी होती ही है। साथ ही सामने के दुकानदार भी परेशान रहते हैं। कई बार दुकानों तक पहुंचने के लिए भी रास्ता नहीं बचता। नगर के प्रमुख बाजारों में पार्किंग की व्यवस्था नहीं होने से समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। बाजारों में जगह नहीं होने के कारण लोग मनमर्जी से फूटपाथ और सड़कों के किनारे गाड़ी पार्क कर रहे हैं। जिसके चलते नगर में आए दिन सड़कों पर जाम जैसा दृश्य देखने को मिलता है। गौरतलब है कि नगर के मेन रोड, सब्जी मार्केट और बाजार हमेशा गुलजार रहते हैं। जहा पार्किंग की सुविधाओं पर खास ध्यान नहीं दिया गया। वही पुरानी बाजार में दुकानदार अपनी दुकान के सामने एक गज जगह भी पार्किंग या अन्य गतिविधियों के लिए नहीं छोड़ते। इस स्थिति में दुकान के सामने सड़कों पर ही वाहनों को लोग खड़ी कर खरीदारी करते हैं। जिससे बाजार की सड़कें चौड़ी होने के बावजूद भी चार पहिया वाहनों के प्रवेश से जाम की स्थिति बन जाती है। इस बाबत अधिशासी अधिकारी शिव कुमार ने बताया कि नगर में आम लोगो के लिए पार्किंग की कोई व्यवस्था नही है। डीएम के निर्देश पर कचहरी के बगल में अधिवक्ताओं के लिए पार्किंग की व्यवस्था की गई है।

गौशाला निर्माण में भ्रष्टाचार‚ 3 नंबर की ईंट व 2.5 सूत की सरिया का हो रहा इस्तेमाल

गौशाला निर्माण में भ्रष्टाचार

राकेश रोशन सिंह ने की मुगलचक में गौशाला निर्माण को रोकने की मांग

Young Writer, चंदौली। वर्ल्ड सोसाइटी के राकेश रोशन सिंह बागी ने सोमवार को जिलाधिकारी निखिल टीकाराम फुंडे से मुलाकात की। इस दौरान अलीनगर के मुगलचक में बन रहे कान्हा गौशालय के निर्माण में दोयम दर्जे सामग्री का इस्तेमाल किए जाने की शिकायत की। बताया कि छह जुलाई को निर्माण कार्य रोकने के डीएम चंदौली के आदेश के बावजूद निर्माण कार्य चल रहा है। वहीं जांच के लिए एकत्रित किए गए सैम्पल को लैब में भेजने की बजाए नगर पालिका कार्यालय में ही रखा गया है।
इस दौरान उन्होंने अवगत कराया कि गौशाला के निर्माण में निर्माण मान के विपरीत तीन नंबर की ईंटों व 2.5 सूत की सरिया का इस्तेमाल कालम व पिलर में किया जा रहा है। इसके अलावा भस्सी तथा दोयम दर्जे की सामग्री इस्तेमाल में लायी जा रही है। उक्त कान्हा गौशाला का नजरी नक्शा किसी भी आर्किटेक कम्पनी के इंजीनियर या जिम्मेदार संस्था से नहीं बनवाया गया है। बिना नक्शे के अवैध तरीके से निर्माण कार्य कराया जा रहा है। कहा कि जब नक्शा बना ही नहीं तो वास्तविक मूल्यांकन 1.65 करोड़ रुपये कैसे निर्धारित किया जा सकता है? कहा कि टेंडर में रनिंग पेमेंट करने का कोई शर्त अनुबंधित नहीं है फिर भी नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी व कार्यदायी संस्था के अधिशासी अभियंता आपसी गठजोड करके रनिंग पेमेंट करते आ रहे हैं, जिसे तत्काल रोका जाना चाहिए। कहा कि पूरी टेंडर प्रक्रिया ही कपोल, काल्पनिक व विधि-विरूद्ध है। भ्रष्टाचार से लिप्त है जिसमें किसी भी दशा में किसी भी संबंधित संस्थाओं से अनापत्ति प्रमाण पत्र न लेना व स्वीकृति न लेना इसका प्रमाण है। मांग किया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ड्रीम प्रोजेक्ट कान्हा गौशाला निर्माण को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने से रोकने की कृपा करें, ताकि सरकार की मंशा पूरी हो और भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके। कहा कि एकत्रित किए गए नमूनों की जांच कराकर कार्यदायी संस्था को ब्लैक लिस्टेड करने की कार्यवाही की जाए।

-News Chandauli

सरकारी अस्पताल में आईवीएफ का खर्चा: जानकारी और महत्वपूर्ण तत्व

सरकारी अस्पताल में आईवीएफ का खर्चा

Young Writer, Chandauli: सरकारी अस्पताल में आईवीएफ (IVF) का खर्चा विभिन्न प्रकार के तत्वों पर निर्भर करता है, जिनमें विशेषज्ञ चिकित्सक शामिल होते हैं, दवाओं और उपकरणों की लागत, प्रशासनिक शुल्क, अस्पताल के स्तर पर आधारित आवास की व्यवस्था आदि शामिल होती है।

आमतौर पर, आईवीएफ के लिए खर्चे को दो भागों में बांटा जाता है – दवाओं और उपकरणों की लागत और चिकित्सा खर्च। दवाओं और उपकरणों की लागत विभिन्न अस्पतालों में भिन्न हो सकती है, लेकिन आमतौर पर आईवीएफ का यह खर्च लागभग 1,50,000 रुपये से 3,00,000 रुपये तक हो सकता है।

इसके अलावा, चिकित्सा खर्च अस्पताल के स्तर पर आधारित होता है और यह भी विभिन्न अस्पतालों में भिन्न हो सकता है। सरकारी अस्पतालों में आईवीएफ का खर्च आमतौर पर निजी अस्पतालों के मुकाबले कम होता है। यहां भी आईवीएफ की सफलता दर और तकनीकी मापदंडों के आधार पर खर्चा अलग-अलग हो सकता है।

इसके अलावा, आईवीएफ का खर्चा सरकारी अस्पतालों में आपकी आय के आधार पर भी निर्धारित हो सकता है। कुछ सरकारी अस्पताल निशुल्क आईवीएफ सेवाएं प्रदान कर सकते हैं, जबकि कुछ अन्य अस्पताल आपकी आय के आधार पर आईवीएफ की लागत निर्धारित करते हैं। इसलिए, आपको अपने सरकारी अस्पताल के नियमों और निर्देशों के बारे में जानकारी प्राप्त करने की सलाह दी जाती है।

इस संदर्भ में स्थानीय सरकारी अस्पताल के प्रतिनिधि से संपर्क करके या अस्पताल की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर विस्तृत जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। वे आपको आईवीएफ की लागत, योग्यता मानदंड, आवश्यक दस्तावेज़ आदि के बारे में सही जानकारी देंगे।

आपको इस विषय में सटीक और विशेषज्ञ सलाह प्राप्त करने के लिए अपने विशेषज्ञ चिकित्सक या आईवीएफ के प्रशासनिक विभाग से भी संपर्क करना चाहिए। वे आपको आपकी स्थिति के अनुसार सरकारी अस्पताल में आईवीएफ का खर्चा और इसके लिए उपलब्ध सरकारी योजनाओं के बारे में संपूर्ण जानकारी प्रदान करेंगे।

आईवीएफ का खर्चा विभिन्न स्थानों और सरकारी अस्पतालों में अलग-अलग हो सकता है, और इसकी जानकारी मेरे पास नहीं है। आपको विशेषज्ञ सलाह और संदर्भ लेने की सलाह दी जाती है।

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