29.5 C
Chandauli
Tuesday, July 7, 2026

Buy now

Home Blog Page 331

चंदौली पुलिस ने पकड़ी दो करोड़ 18 लाख की शराब, फर्जी बिल्टी पेपर व नंबर प्लेट बनाकर पुलिस को धोखा दे रहा था तस्कर

चंदौली। सर्विलांस व थाना बबुरी पुलिस को सोमवार को बड़ी सफलता हाथ लगी पुलिस ने चेकिंग के दौरान मुखबिर की सूचना पर पांडेयपुर के समीप से एक कंटेनर से दो करोड़ से अधिक का शराब पकड़ा उक्त मामले का खुलासा पुलिस अधीक्षक अंकुर अग्रवाल ने पुलिस लाइन में किया। एसपी ने पुलिस को टीम को 50 हजार रुपये का ईनाम देने की संस्तुति की
इस दौरान उन्होंने ने बताया कि सर्विलांस स्वाट टीम व थाना बबुरी पुलिस की संयुक्त कार्यवाही के दौरान मुखबिर की सूचना पर पाण्डेयपुर यात्री सेड के पास ट्रक टेलर वाहन संख्या RJ24GA1817 को रोककर चेक किया गया। तो ट्रक में 1210 पेटी अवैध अंग्रेजी शराब अनुमानित कीमत दो करोड 18 लाख बरामद हुआ। गिरफ्तार अभियुक्त द्वारा बताया गया कि फर्जी बिल्टी पेपर बनाकर पुलिस को धोखा देने के लिए गाड़ी पर फर्जी नम्बर प्लेट लगाकर हरियाणा पंजाब एवं अन्य प्रान्तों से बिहार में बिक्री के अवैध शराब की तस्करी होता है। जिससे अच्छी खासी पैसे का आमदनी होता है।गिरफ्तार शराब तस्कर मोहन राम निवासी ढढनियाँ थाना बालेशर जिला जोधपुर, राजस्थान का रहने वाला है। गिरफ्तारी एवं बरामदगी करने वाली टीम में प्रभारी सर्विलांस सेल श्याम जी यादव, प्रभारी स्वाट टीम शैलेन्द्र प्रताप सिंह, थानाध्यक्ष अमित कुमार, प्रेम प्रकाश यादव, राजेश यादव, अवधेश नारायण, देवेन्द्र सरो, आनन्द सिंह, मधुसूदन राय, नीरज मिश्रा, राणा प्रताप, चन्द्रशेखर यादव,अजीत सिंह, विजेन्द्र कुमार, अनुज वर्मा, मनीष कुमार, प्रितम कुमार, राहुल खरवार, गणेश तिवारी, अमित सिंह, कृष्ण कुमार यादव, मनोज यादव, सन्दीप कुमार, सत्येन्द्र यादव मौजूद रहे।

व्यंग्य: धनिया , पुदीना और कच्चा बादाम

रामजी प्रसाद भैरव
रामजी प्रसाद भैरव

Young Writer, साहित्य पटल। रामजी प्रसाद “भैरव” की रचना

एक दिन पीयूष तिवारी जी आये , कुछ अनमने थे , वैसे व्यंगकार अनमना नहीं होता , पर उनको चिढ़ सिनेमा वालों से था , आते ही विफर पड़े , मैंने कहा ” पहले चाय पानी कर लीजिए , फिर बातें होंगी ।
पर वे गुस्से से नथुने फुलाते हुए बोले – भाई साहब , कसम से ई सिनेमा वाले सारे विषयों का सत्यानाश कर रहे हैं ।”
मैंने उनकी इच्छा के विपरीत जल पीने को दिया , साथ में कुछ काजू कतली के टुकड़े भी प्लेट में , जो पत्नी ससुराल से झटक लायी थी ।
खैर इस समय पीयूष जी बार बार आपे से बाहर हो रहे थे , जब मैंने कई बार आग्रह किया तो काजू कतली उठा कर मुँह में डाला ,और उसके साथ शत्रु जैसा व्यवहार करने लगे , मतलब उसे दाँत से ऐसे पीसने की कोशिश कर रहे थे , जैसे कोई सिनेमाई उनके मसूढ़े के नीचे आ गया हो । उन्होंने ने ही एक बार मुझे बताया था , एक हादसे जैसी घटना के बाद वे वेदांती हो गए हैं । काजू कतली खाने के बाद पानी पी पी कर फिर गरियाने लगे । मुझे तसल्ली थी , चलिए अब बात हो सकती है ।मैंने पूछा -” भाई साहब , आखिर ये गुस्सा क्यों है ।”
उन्होंने लच्छेदार गालियों की ऐसी झड़ी लगाई कि अगर वहाँ सचमुच का कोई सिनेमाई होता तो , जूतम पैजार का शिकार हो ही जाता । बड़ा कुरेदने पर पीयूष जी ने बताया कि ” सिनेमा वाले हमारे विषय को चुरा कर गाना बना देते हैं , पहले धनिया फिर पुदीना और अब कच्चा बादाम । सालों ने नाक में दम कर दिया हैं , हम व्यंगकार क्या झख मारेंगे । फुलौरी बिना चटनी वाला गाना तो आप लोग पहले ही सुन चुके हैं । और तो और पान खाये सैया हमार , उसमें भी बनारस का जर्दा भी लिख दिया । इश्क , प्यार , मोहब्बत , जैसे विषय आदमी को अधूरा बनाते हैं , सो इस पर कलम चलाना तौहीन समझता हूँ । सुंदरी , अप्सरा , चाँद , तारे , हवा , पानी जैसी चीजों पर पूर्वजों ने इतना लिख मारा है कि हम लिख कर क्या उखाड़ लेगें , इनको भी मैं अपने विषय सूची से बाहर ही रखता हूँ । अब तो उम्र ही इस संधि वेला पर आकर ऐसी अटक गई है कि न भक्ति भाव वाले विचार आते हैं और न प्यार व्यार वाली फिलिंग । भारतीय दर्शन में हाथ डालते डर लगता है कहीं दाँत की तरह , बाल भी न खो दूँ । गांजा , भांग , शराब जैसे विषयों पर पहले से विश्वास नहीं है । सोचा शाकाहारी आदमी हूँ , शाकाहारी विषय पर ही लिखूंगा । पर साले मटियामेट करने पर उतारूँ हैं । अब आप ही बताइए । गुस्सा न करूं तो क्या करूँ ।”
मैं थोड़ा चिंतित हुआ , फिर बोला -” अच्छा तिवारी जी , आप चिंता न करें , कल कुछ विषय बताता हूँ ।”
वे सहृदय आदमी ठहरे , मुझ पर विश्वास कर मान गए , नमस्कार बन्दगी के बाद , जब वे बाहर निकले , मुझे लगा उनके होंठ कुछ बुदबुदा रहे थे ।शायद कच्चा बादाम वाले को गरिया रहे थे।

जीवन परिचय-
 रामजी प्रसाद " भैरव "
 जन्म -02 जुलाई 1976 
 ग्राम- खण्डवारी, पोस्ट - चहनियाँ
 जिला - चन्दौली (उत्तर प्रदेश )
मोबाइल नंबर- 9415979773
प्रथम उपन्यास "रक्तबीज के वंशज" को उ.प्र. हिंदी  संस्थान लखनऊ से प्रेमचन्द पुरस्कार । 
अन्य प्रकाशित उपन्यासों में "शबरी, शिखण्डी की आत्मकथा, सुनो आनन्द, पुरन्दर" है । 
 कविता संग्रह - चुप हो जाओ कबीर
 व्यंग्य संग्रह - रुद्धान्त
सम्पादन- नवरंग (वार्षिक पत्रिका)
             गिरगिट की आँखें (व्यंग्य संग्रह)
देश की  विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन      
ईमेल- ramjibhairav.fciit@gmail.com

Chandauli News: मुगलसराय में दुकानों को ना तोड़ने के लिए अधिकारियों से वार्ता हुई

Young Writer: केंद्रीय मंत्री डा. महेंद्रनाथ पांडेय।
केंद्रीय मंत्री डा. महेंद्रनाथ पांडेय।

प्रस्ताव दिया गया है कि अर्जुन योजना के उपर से ओवरब्रिज बना दिया जाय

Young Writer, डीडीयू नगर। केंद्रीय मंत्री व सांसद डॉ महेन्द्रनाथ पांडेय ने रविवार को स्थानीय व्यापारियों की समस्याएं सुनी। इस दौरान जीटी रोड की दुकानों को तोड़ने के मुद्दे पर चर्चा हुई। इस पर डॉ. पांडेय ने आश्वासन दिया कि इस मसले पर अधिकारियों से वार्ता हुई है। दुकानों को न तोड़ने और समस्या के समाधान के लिए प्रस्ताव दिया गया है।
नगर के गल्ला मंडी मैनाताली स्थित एक आवास पर पहुंचे केंद्रीय मंत्री और चंदौली सांसद डॉ. महेन्द्रनाथ पांडेय का व्यापारियों ने भव्य स्वागत किया।

इस मौके पर हुई चर्चा में केंद्रीय मंत्री डॉ. महेन्द्रनाथ पांडेय ने कहा कि जीटी रोड की समस्या के बारे में अधिकारियों से वार्ता हुई है। प्रस्ताव दिया गया है कि अर्जुन योजना के तहत नीचे से सड़क के अलावा उपर से ओवरब्रिज बना दिया जाय। ताकि लोगों को जाम से छुटकारा मिले और दुकानें भी न टूटे। भाजपा शासन की उपलब्धियां गिनाते हुए उन्होंने कहा कि डीएफसीसी कार्य योजना के तहत किसानों की कम जमीन जाने और उन्हे मुआवजा दिलाने का काम किया गया। इसी तरह चंदौली मे रेलवे क्रासिंग पर ब्रिज ,सैयदराजा में ब्रिज दे कर आम लोगों को सुविधा प्रदान की गई है। कहा कि जिले में मेडिकल कॉलेज और ट्रामा सेंटर का निर्माण जल्द ही पूरा हो जाएगा। इसके पूर्व डॉ. महेन्द्रनाथ पांडेय नगर के कैलाशपुरी स्थित पोद्दार भवन में आयोजित संघ के गुरु दक्षिणा कार्यक्रम में शामिल हुए। यहां गुरुदक्षिणा करने के बाद संघ के काशी प्रांत प्रचारक रमेश जी के विचारों को सुना।

इसके बाद ईस्टर्न बाजार में भुपेंद्र चौरसिया के तेरहवीं कार्यक्रम में शामिल हुए। यहां से डॉ. महेन्द्रनाथ पांडेय इसी मुहल्ले के मृत दिमेश जायसवाल के घर पहुंचकर अंतिम दर्शन किए।डीडीयू नगर के बाद चंदौली में पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस में कार्यकर्ताओं की समस्याएं सुनी। इस अवसर पर भाजपा जिलाध्यक्ष अभिमन्यु सिंह, राजकिशोर सिंह, लोकसभा मीडिया प्रभारी हरिवंश उपाध्याय, अखिल पोद्दार, शिवशंकर पटेल, सुर्यमुनी तिवारी, ओमप्रकाश सिंह,रीना तिवारी, गीता रानी गुप्ता, किरन शर्मा, आशीष कुमार गुप्ता, रंजन यादव, अमित केशरी, मनीष गुप्ता, नंदू गुप्ता, उत्तम कुमार जायसवाल, अमित कुमार, विवेक, राहुल जायसवाल, भागवत चौरसिया, आलोक सिंह, जैनेन्द्र कुमार, अनिल तिवारी, राकेश मिश्रा, उमाशंकर सिंह, सुजीत जायसवाल, आलोक बरून, आशीष गुप्ता, सुधीर घोष, संजय अग्रवाल, महेंद्र पटेल, भानू तिवारी,सुनील श्रीवास्तव, सियाराम पाठक आदि लोग शामिल रहे।

हस्तिनापुर एक्सटेंशन : भाषा में अस्मिता का विस्तार

हस्तिनापुर एक्सटेंशन
हस्तिनापुर एक्सटेंशन

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह, HASTINAPUR EXTENTION

हस्तिनापुर एक्सटेंशन :– सृष्टि की मूल उत्प्रेरणा विस्तार की उत्प्रेरणा है। अस्तित्व का मूल स्वभाव विस्तार का स्वभाव है। संसार में मनुष्य सबसे अधिक विलक्षण है। जितना मनुष्य विलक्षण है, उतनी ही भाषा भी विलक्षण है। धर्म के माध्यम से, अर्थ के माध्यम से, काम के माध्यम से और मोक्ष के माध्यम से मनुष्य जाति की विस्तार की यात्रा अविरल जारी है। इस यात्रा का आख्यान भाषा जाने कबसे संवहन करती आ रही है।

पुस्तक को Amazon पर आनलाइन खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें

हमें लगता है भाषा का स्वरूप हमारी अस्मिता से भिन्न नहीं है। वह भिन्न भी है। मगर अभिन्न भी है। भाषा जब हमसे अभिन्न होती है तब भी उसकी अस्मिता वैसी ही होती है, जैसे भिन्न होने पर होती है। मनुष्य जाति के पास जो थोड़ी-सी बहुत बहुमूल्य चीजें हैं, उनमें भाषा सबसे अधिक मूल्यवान चीज है। भारतेन्दु ने ऐसे ही नहीं कह दिया है, – निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।’’ उनके कहने के गहरे अर्थ हैं।

भाषा हमारे अस्तित्व की अस्मिता भी है और अभिव्यंजना भी है। बिना अभिव्यंजना के अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं है। हमारे होने का कोई मतलब नहीं है, अगर हम अभिव्यक्त नहीं हो रहे हैं। ऐसा यहाँ कुछ भी नहीं है, जिसमें अभिव्यक्ति की आकुलता नहीं है। नदी में है, पहाड़ में है, पेड़ में है, फूल-फल में है, पत्ती-पत्ती में है। सबसे अधिक मनुष्य में है। मनुष्य की भाषा में मनुष्य जाति की स्मृति की समस्त अमूूल्य संपदा संरक्षित है। सच में बड़ी अद्भुत है, भाषा। तुलसीदास ने भाषा को अद्भुत कहा है। बहुत ठीक कहा है।

भाषा पूरी-पूरी लौकिक है। मगर पूरी-पूरी लौकिक ही नहीं है। वह अलौकिक भी है। भाषा पूरी-पूरी मूर्त है। मगर वह पूरी-पूरी अमूर्त भी है। भाषा पूरी-पूरी भौतिक है। मगर वह सिर्फ भौतिक ही नहीं है। वह अभौतिक भी है। भाषा पूरी-पूरी आन्तरिक है। हृदय की अतल गहरी से निकलती हुई। अपनी जरूरतों को पूरा करने की आकुलता से भरी हुई। आकांक्षा के ताप से दहकती हुई। प्यास के प्रवाह में उफनती हुई। परितोष की पुलक से पंख फैला कर उड़ती हुई। सुगन्धि के बवण्डर उड़ाती हुई। किसी दर्द से फनफना कर फुँफकारती हुई। न जाने क्या-क्या करती हुई भाषा समूची आन्तरिकता में उमड़कर बाहर आ जाती है। बाहर हो जाती है। पूरी तरह बाहर हो जाती है। दूर चली जाती है। सुदूर चली जाती है। मनुष्य की समूची आन्तरिकता को बाहर ले आने में सिर्फ और सिर्फ भाषा समर्थ है।

भाषा प्रयोग की परम्परा बड़ी असीम परम्परा है। अथाह परम्परा है। भाषा का प्रयोग नितान्त व्यक्तिगत भी है और पूरा-पूरा सामाजिक भी है। भाषा के व्यवहार का आधार ही समाजवाद की धारणाका जनक है। भाषा के रूप में व्यक्ति की उपोषित संपत्ति का सार्वजनिक संपदा मे बदल जाना बड़ा अद्भुत है।
भाषा हमारे जितनी ही निकट है, उतनी की पकड़ से दूर है। भाषा पर किसी का अधिकार नहीं है। भाषा का प्रवाह अधिकार के अतिक्रमण की प्रक्रिया का वाचक है। भाषा, आपका कहा मान लेगी। आपका मान रख लेगी। मगर आपके कहने में नहीं रहेगी। वह पूरी-पूरी आपकी होकर भी आपसे पूरी-पूरी स्वतंत्र है। वह जितनी आपकी है, उतनी ही दूसरे की भी है। जो भाषा पर आधिपत्य की बात सोचते है, उनका आधिपत्य ही मिट जाता है। भाषा आधिपत्य की वस्तु नहीं है। अधिकार की वस्तु नहीं है। भाषा उपासना के लिये है। आराधना के लिये है, जीवन की तरह। भाषा अर्जित करने की चीज नहीं, उपलब्ध करने के योग्य है।

संसार की सारी वस्तुएँ भाषा में समाहित हैं। पता नहीं कैसे। किसी को मालूम नहीं। भाषा कितनी सूक्ष्म है कि उसमें सारा स्थूल समाहित है। भाषा में सबकुछ है। आग है। पानी है। नदी-पहाड़ है। पृथ्वी-आकाश है। भाषा में सब बँधा है। मगर भाषा किसी में नहीं बँधी है। भाषा में सब है। प्रेम है। घृणा है। स्तुति है। अभिनन्दन है। धिक्कार है। ऐसा कुछ नहीं है, जो भाषा में नहीं है। युद्ध भी है, शान्ति भी है। फिर भी भाषा में कुछ भी नहीं है। सबकुछ होकर भी कुछ भी न होने जैसा। कैसा विचित्र है। भाषा पूरी-पूरी भरी है। फिर भी पूरी-पूरी खाली है। पूरा खाली होकर ही पूरा भरना हो पाता है, क्या? सारे रूपों को अपने में समवा कर भी भाषा अरूप है। कितनी अपरूप है, भाषा!

भाषा का व्यवहार हम अपनी जरूरतों के लिये करते हैं। हमारी जरूरतें अनगिनत हैं। अनन्त हैं। अनन्त का भार अनन्त ही उठा सकता है। भाषा में अमित ऊर्जा है। आप चाहे जितना भी खर्च कर लें, फिर भी खर्च करने के लिये वह पूरी बची रहती है। भाषा में ऐसी ताजगी है कि वह दुहराव में कभी बासी नहीं होती। बासन का घिसने से भले मुलम्मा छूट जाय मगर भाषा की चमक घिसने से बढ़ती ही जाती है। भाषा की आत्मशक्ति कभी क्षरित नहीं होती।

बोल-चाल की भाषा, साहित्य की भाषा, विज्ञान की भाषा, व्यापार की भाषा, चिकित्सा की भाषा अलग-अलग भाषा नहीं है। ये सब भाषा के भोड़े भेद हैं। भाषा के अलग-अलग रूप हैं। जितने आदमी है, उतने रूप हैं। आदमी में जितने मनोभाव हैं, उतने रूप हैं। जितने मनोवेग हैं, उतने रूप हैं। भाषा एकदम निजी भी है और एकदम सार्वजनिक भी। भाषा जैसी सार्वजनिक निजता अन्यत्र दुर्लभ है। भाषा के साथ हमारे सम्बन्ध गोपन सम्बन्ध भी हैं और प्रकट सम्बन्ध भी हैं।
भाषा का स्रोत मनुष्य का जीवन ही है। भाषा की शक्ति, सामर्थ्य और समूची कुशलता भाषा के व्यवहार में ही निहित है। किसी भी शब्द में तयशुदा अर्थ पहले से भरा हुआ नहीं है। अर्थ हमेशा प्रयोक्ता ही भरता है, जितना भर सकता है।

जितना अर्थ उसके पास है। भाषाशास्त्र में हम जो भाषा के बारे में अध्ययन करते हैं, वह हमारी भाषा सम्बन्धी समझ को बढ़ाने के लिए है। उससे भाषा की अभिव्यंजना शक्ति में कोई फर्क नहीं आता। भाषा की अभिव्यंजना में जो कुछ भी इजाफा होता है, बोल-चाल के आवेग की पकड़ से होता है। साहित्य की भाषा में जो परिष्कार की प्रविधि है, वह इसी आवेग को आत्मसात करने की प्राविधि है, वह इसी आवेग को आत्मसात करने की प्रक्रिया में निहित है। किसी भी साहित्यकार का प्रशिक्षण भाषा का प्रशिक्षण नहीं है, वह जीवन-व्यवहार का अनुशीलन है। जीवन व्यवहार के रहस्यों के विदित होने से भाषा के प्रवाह और प्रभाव की बारीकियाँ स्वतः प्रगट हो उठती हैं।

नदी के प्रवाह को व्यंजित करने के लिये लोकभाषा में एक शब्द है-तरखा। यह शब्द ती्रवता का बोधक नहीं है, तीक्ष्णता का बोधक नहीं है, तिर्यकता का बोधक नहीं है। केवल वेग का बोधक नहीं है। जल की सघनता का बोधक नहीं है। इन सबका सम्मिलित बोधक वह है, मगर इनके अलावा वह कुछ और का भी बोधक है। इन सबके अतिरिक्त वह ठहराव के विपरीत शक्ति के उद्दाम आवेग का बोधक सबसे अधिक है। यही तरखा भाषा का प्राण है। यही उसकी प्राणशक्ति है। भाषा की प्राणशक्ति उसके प्रयोक्ता की प्राणशक्ति में सन्निहित है। भाषा अक्षत यौवना है। वह चिर कुमारिका है। वह द्रौपदी की तरह एक विवाह की सुहागरात के बाद फिर से दूसरे विवाह के लिये कुमारी हो उठती है। भाषा सचमुच पुनर्नवा है। क्षण-क्षण, प्रतिक्षण नया होने का, नया हो उठने का स्वभाव भाषा का स्वभाव है।

किसी को भाषा पर अधिकार होने का भ्रम हो सकता है। आलोचना उसके भ्रम को पुष्ट कर सकती है। मगर, नहीं। भाषा पर किसी का अधिकार संभव नहीं है। भाषा का अस्तित्व सारे अधिकारों को, अधिकारों की अवधारणा को निरस्त करती हुई अस्मिता है।
भाषा आदमी को पवित्र करती है। इस अर्थ में पवित्र करती है कि भीतर के भावों के उत्ताप को, उल्लास को उनकी अर्थवत्ता में व्यक्त कर देती है। भाषा आदमी को भर देती है। अपनी अंजलि से उलीच उलीच कर भर देती है। भाषा के समान मनुष्य को भरने वाला दूसरा कोई नहीं है।

हमारी भाषा चिरपुरातन होकर भी चिरनवीन है। हम शब्दों को बनाते नहीं हैं। भावदशा के अनुरूप शब्द हमारे सम्मुख प्रकाशित हो उठते हैं। हम उन्हें देख लेते हैं। उनको देख पाने की साधना ही साहित्य-साधना है। हमारी पारंपरिक भाषा में जो ‘द्रष्टा’ शब्द है, वह शब्दों के लिये भी उतना ही अर्थवान है। जब भाव और शब्द दोनों देखने में आ जाते हैं, जब दोनों भासित हो उठते हैं, भाषा चरितार्थ हो उठती है। भाषा की चरितार्थता की प्रक्रिया बड़ी लम्बी है। बड़ी कठिन है। वह दो दिन की नहीं है। दो पैसे की तो कत्तई नहीं है। उसके लिये अपने भीतर हमें उत्कण्ठा, आकुल अनुरोध, कठिन धैर्य और सबसे अधिक अथक प्रतीक्षा के सम्मुख बिना विचलित हुए खड़ा रहना होता है। हमारे पूर्वजों ने यह कठिन तप किया है। कठिन तप करके भाषा को उपलब्ध किया है। हमने भाषा को समृद्ध नहीं किया है। भाषा ने अपनी समृद्धि से हमें गौरव दिया है।
हमारी चिन्तन परम्परा में जो भाषा है, जो वाक है, वह मूल अस्तित्व से भिन्न नहीं है। अभिन्न है। वह उपार्जित नहीं है। उपलब्ध है। उपलब्ध और उपार्जित में जो अन्तराल है, वही भारतीय चिन्तन परंपरा और पाश्चात्य चिन्तन परंपरा का अन्तराल है।

भाषा के क्षेत्र में हमारी जो परंपरा है, वहीं हमारे भाषा प्रयोग को नियमित औरनर्देशित करने के लिये शुभ है। मंगलकारी है। समूची मनुष्य जाति के लिये कल्याणकारी है। हमारे लिये भाषा मनुष्य जाति के अस्तित्व को अभिव्यंजित करने का आधार है।

-Young Writer

बहुद्देशीय प्रेक्षागृह का 30 लाख बिल बकाया, कटेगा बिजली कनेक्शन

डीडीयू नगर प्रेक्षागृह
डीडीयू नगर प्रेक्षागृह

केंद्रीय विद्यालय पीडीडीयूनगर को बिजली विभाग ने जारी किया नोटिस‚ कभी काट सकते हैं कनेक्शन

Young Writer, डीडीयू नगर। केंद्रीय मंत्री व स्थानीय सांसद डॉ महेंन्द्रनाथ पांडेय के प्रयास से केंद्रीय विद्यालय परिसर में बहुद्देशीय प्रेक्षागृह पर तीस लाख रुपये का बिजली का बिल बकाया है। बकाए में बिजली विभाग कभी भी प्रेक्षागृह की बिजली काट सकता है। केंद्रीय विद्यालय परिसर में बने प्रेक्षागृह के संचालन की जिम्मेदारी केंद्रीय विद्यालय के पास है। करोड़़ों की लागत से बने प्रेक्षागृह का बिजली बिल अब तक नहीं दिया गया, यह एक प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
नगर सहित जनपद में प्रेक्षागृह और स्टेडियम की मांग लंबे समय से की जा रही थी। इसको देखते हुए केंद्रीय विद्यालय परिसर में 14 करोड़ की लागत से बहुद्देशीय प्रेक्षागृह का निर्माण किया गया। वर्ष 2018 में तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडे़कर ने इसका शिलान्यास किया था। देश भर में 12 हजार 500 केंद्रीय विद्यालयों में डीडीयू नगर का यह प्रेक्षागृह दूसरा सबसे बड़ा है। निर्माण के बाद 12 दिसंबर 2021 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, सांसद डॉ. महेन्द्रनाथ पांडेय ने संयुक्त रूप से इसका लोकार्पण किया था। इस दौरान वादा किया था कि बहुद्देशीय प्रेक्षागृह न सिर्फ धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए ठीक होगा, बल्कि इंडोर खेल में भी सहायक होगा। 820 लोगों की बैठने की क्षमता वाला आडिटोरियम पूरी तरह अत्याधुनिक है। पूरी तरह वातानुकूलित प्रेक्षागृह में अत्याधुनिक हाईक्वालिटी साउंड सिस्टम लगे हैं। वहीं यह पूरी तरह साउंड प्रूफ भी है। इसे सीपीडब्लू ने तैयार किया है। उद्घाटन के आठ माह बाद जुलाई 2022 में प्रेक्षागृह को केंद्रीय विद्यालय के हवाले किया गया। उद्धाटन के बाद अब तक यहां इक्का दुक्का छोड़ कर कोई कार्यक्रम नहीं हुआ है। इसमें भी अधिकतर स्कूल के कार्यक्रम हुए हैं। इस बीच लगभग दो वर्ष का बिजली बिल तीस लाख रुपये हो गया। इसका भुगतान नहीं किया गया है। ऐसे में बिजली विभाग ने बिजली काटने की नोटिस जारी कर दिया। बिजली बिल बकाए को लेकर नगर में चर्चाओं का बाजार गर्म है।

रावण का इंटरव्यू

रामजी प्रसाद भैरव
रामजी प्रसाद भैरव

Young Writer, साहित्य पटल। रामजी प्रसाद “भैरव” की रचना

रावण मर रहा था । अभी वह पूरी तरह से मरा नहीं था । उसे मरने में अभी समय था । वह जल्दी मर भी नहीं सकता । उसका मरना आसान नहीं था । उसे तिल तिल मरना था , घुट घुट मरना था । उसे अभी अपने पापों का हिसाब देना था । राम ने बाण मार कर घायल कर दिया था । उसकी नाभि का अमृत कुंड सूख गया । वह बेबस और लाचार मृत्यु की घड़ियां गिन रहा था । राम की सेना खुशियां मनाते हुए वापस लौट गयीं । रावण की बची खुची सेना, रावण के रणभूमि में गिरते ही भाग गई । झुटपुटे का समय था, झेंगुरों ने बोलना शुरू कर दिया था । रावण के कानों में लंकेश की जय का शोर गूँज रहा है । उसकी ऑंखें बन्द थी, पर होठों पर मुस्कान तैर रही थी । उसके कानों में पुनः लंकेश की जय सुनाई दी, पर वह बोला नहीं । उसी तरह मुस्कुराता रहा । ध्वनि फिर टकराई लंकेश की जय हो ।रावण ने आंखे खोली , सामने किसी अपरिचित को देखकर क्रोध से बोला -” कौन हो तुम ।”
” मैं हूँ , बंशीलाल पत्रकार, आप का इंटरव्यू लेने आया हूँ ।
रावण ने मुँह फेर कर आँखें बंद कर ली । बंशी लाल कुछ देर प्रतीक्षा किया फिर बोला -” महाराज, आप कुछ तो सन्देश दीजिये , आने वाले समय में लोग रावण को केवल लम्पट न समझ लें, इसलिए आप का बोलना जरूरी है ।”
रावण ने आँखें खोली -” क्या बोलूं , मनुष्य के लिए अहंकार ठीक नहीं है, अपना सर्वस्व नाश करा लेता है, जहाँ तक हो सके उसे बचना चाहिए । मैंने अहंकार को अपना बना लिया था , मेरी दशा देख रहे हो ।”
” महाराज ,मैं आप से क्या पूछूं , आप तो खुद ही महा पण्डित हैं । लेकिन एक बात समझ में नहीं आयी कि आप इतने बड़े ज्ञानी होकर सीता हरण जैसा जघन्य अपराध क्यों किया । “
” राम से प्रतिशोध लेने के लिए , वह असुरों का अहित कर रहा था ।”
” महाराज , आप सर्व शक्तिमान भी थे , जिसके चलने मात्र से धरती काँपती थी , किसी देवता में भी रावण से टक्कर लेने की क्षमता नहीं थी । फिर भी आप राम के डर से , चोरी से उनकी पत्नी को हर लाये , क्या यह उचित कदम था ।”
” राम के डर से नहीं , उसकी रूपवती स्त्री के आकर्षण में में मैं बंधा चला गया । उसे देखते ही उसके सौंदर्य पर मुग्ध हो उठा , फिर मौका देखकर हरण कर लिया । सोचा , पत्नी वियोग में राम सिर पटक कर मर जायेगा और या रोते बिलखते अयोध्या चला जायेगा । इस प्रकार मेरे प्रिय राक्षसों को मारने का दण्ड भी पा जाएगा ।”
” लेकिन आप ने एक स्त्री का हरण कर किस परम्परा की शुरुआत कर दी , लोग अपने प्रतिशोध के लिए स्त्रियों का अपहरण करेंगे और आप का उदाहरण देंगे “
रावण गम्भीर जो गया , कुछ देर चुप रहा फिर बोला -” मैंने प्रतिशोध में अंधे होकर सीता का हरण किया था , मुझे अब लगता है , यह मेरा अनुचित कदम था । जिसकी कीमत मैंने लंका को युद्ध के अनावश्यक आग में झोंककर , कुल का नाश करा कर चुकाई है । शायद लोगों को इससे सीख मिले । “
“आप पर व्यभिचार का भी आरोप लगता है , रम्भा और वेदवती इसके उदाहरण हैं । “
बंशीलाल के सवाल पर रावण कुछ देर फिर चुप रहा , फिर बोला -” जब मनुष्य के पास शक्ति आती है , वह भले बुरे कर्मों में भेद करना भूल जाता है । इसी अहंकार में मैंने रम्भा के साथ बलात सम्भोग किया । युगों युगों से मनुष्य अपनी इस कमजोरी पर नियंत्रण नहीं पा सका । उस समय मैं इतना मदान्ध था कि स्त्री को केवल भोग्या ही समझता था । मुझे लगता था सृष्टि की यह सुंदर कृतियाँ केवल भोग के लिए बनाई गई हैं । इसलिए मैं रमणियों के साथ भोग करता रहा “
” सीता को आप ने अशोक वाटिका में ही क्यों रखा । आप के पास महल थे , सुविधाएं थी ।”
” रम्भा के प्रेमी नल कुबेर ने मुझे , उस घटना के बाद श्राप दिया था ” यदि मैंने किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध , बल पूर्वक भोगने की चेष्टा की तो , उसी छण मेरे मस्तिष्क के टुकड़े हो जाएंगे ।इस डर से मैं सीता को महल से दूर वाटिका में रखा । सोचा धीरे धीरे वह अपने पति को भूल जाएगी , और मुझे स्वीकार कर लेगी ।”
” आप के भाई विभीषण ने भी आप को समझाने की बहुत कोशिश की , उसने राम से बैर न करने की सलाह दी । सीता को सकुशल वापस लौटने को कहा , परंतु आप ने एक न सुनी , उसे लात मार कर खदेड़ दिया । “
” उस समय मैं राजा था , ऐश्वर्य मेरे चरणों में लोट रहा था । समस्त संसार में मेरे जैसा शक्तिशाली कोई नहीं था । विभीषण बार बार राम के आगे घुटने टेकने को कहता तो मेरा खून जल जाता । जिस राम के पैरों में पादुका तक नहीं थी । ऐसे राम के आगे मैं रावण कैसे घूटने टेक देता । जिस रावण का नाम सुनते ही बड़े बड़े राजा , सामने पड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे । उस रावण को वह बार बार झुकने की सलाह दे रहा था । इसलिए मैंने गुस्से में लात मार कर निकाल दिया ।यहाँ भी मेरा अहंकार ही प्रभावी था । जो मैं राम की शक्ति को नहीं भांप सका , और अपना अहित करा बैठा , इस बात से मुझे ये सीख मिली , शत्रु को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए । “
” युद्ध तो किसी देश के हित में नहीं होता महाराज , लेकिन आप तो जैसे युद्ध की कामना ही की । जब अंगद मैत्री प्रस्ताव लेकर गया , उसे भी आप ने अपमानित करके लौटा दिया ।”
” तुम सही कह रहे हो , युद्ध किसी भी देश के लिए हितकर नहीं होता । युद्ध में यदि कोई बड़ी हानि होती है तो वह है जनहानि , कोई इसकी पूर्ति नहीं कर सकता । मैं अपनी ताकत के अहंकार में इतना मत्त था कि राम जैसे वनवासी को चुटकियों में मसलने की कल्पना करता था । इसलिए युद्ध को बहुत गम्भीरता नहीं लिया। सोचा युद्ध समाप्ति के लिए मेरे छोटे मोटे वीर योद्धा ही काफी है । लेकिन परिणाम तुम स्वयं देख रहे हो , मेरे जैसा विश्व विजेता अंतिम साँसे गिन रहा है । “
” हनुमान जी द्वारा लंका दहन के बाद भी आप की चेतना नहीं लौटी , आप राम से समझौता कर निष्कंटक राज्य कर सकते थे ।”
” तुम सही कह रहे हो , मैं ऐसा कर सकता था । लेकिन एक योद्धा को बिना युद्ध किये हथियार डाल देना क्या उचित होता , जब मेरे पास प्रशिक्षित योद्धा थे , मै स्वयं शक्तिशाली था , इतनी सहजता से कैसे हार मान लेता , आज रावण भले पराजित हो गया , लेकिन संसार रावण को प्रतिभट के रूप में जरूर याद करेगा ।”
” सुना है अभी अभी लक्ष्मण जी आये थे आप से शिक्षा ग्रहण करने , आप ने उनको जो कुछ बताया , मुझे भी बताने का कष्ट करें , ताकि संसार उन बातों को जान सके ।” बंशी लाल ने कहा ।
” मैं समर्थ राजा था , जो चाहता था , पा लेता था । परंतु सामान्य लोगों की तरह मेरे अंदर भी आलस्य भरा था । जो कार्य तत्काल करना चाहिए था , उसे कल पर टालता रहा । इस कारण मेरे जीवन की तीन इच्छाएं पूरी न हो सकी , जो अब मेरे मरने के साथ खत्म हो जाएगी । समय बड़ा मूल्यवान होता है । हर क्षण की कीमत होती है । हर क्षण में ग्रह नक्षत्रों का अलग अलग योग होता है । मनुष्य जो काम कल पर टाल देता है , उसका संयोग भी टल जाता है । हर मनुष्य इसके फलाफल को नहीं जानता । इसलिए वह आलस्य करता है । मैं जानता था , फिर भी आलस्य किया । जिसका परिणाम है कि मैं वो न कर सका जो , जो मेरे लिए सहज था । मनुष्य को सकारात्मक सोच वाले काम शीघ्र कर लेना चाहिए ,और नकारात्मक सोच वाले काम को कल पर टाल देना चाहिए । “
” आखिर आप करना क्या चाहते थे । ” बंशी लाल ने पूछा
रावण ने बंशी लाल की ओर देखा , वह लिखने को उद्दत था । रावण बोला -” पहला मैं सोने में सुगन्ध पैदा करना चाहता था , दूसरा स्वर्ग तक सीढ़ी लगाना चाहता था और तीसरा समुद्र के खारे पानी को मीठा करना चाहता था । यह सब करने में मैं सक्षम था , फिर भी अपने आलस्य के कारण नहीं कर पाया । मैंने लक्ष्मण को यही शिक्षा दी , मनुष्य के लिए आलस्य अच्छी चीज नहीं है । इसका त्याग कर देना ही उचित होता है ।”
अचानक रावण चौंका -” अरे , यह शोर कैसा , लगता है कुछ लोग मुझसे मिलने आ रहे हैं , अब तुम जाओ । ” रावण ने इतना कहकर पुनः आँखें बंद कर ली । बंशीलाल चुपचाप लौट गया ।

जीवन परिचय-
 रामजी प्रसाद " भैरव "
 जन्म -02 जुलाई 1976 
 ग्राम- खण्डवारी, पोस्ट - चहनियाँ
 जिला - चन्दौली (उत्तर प्रदेश )
मोबाइल नंबर- 9415979773
प्रथम उपन्यास "रक्तबीज के वंशज" को उ.प्र. हिंदी  संस्थान लखनऊ से प्रेमचन्द पुरस्कार । 
अन्य प्रकाशित उपन्यासों में "शबरी, शिखण्डी की आत्मकथा, सुनो आनन्द, पुरन्दर" है । 
 कविता संग्रह - चुप हो जाओ कबीर
 व्यंग्य संग्रह - रुद्धान्त
सम्पादन- नवरंग (वार्षिक पत्रिका)
             गिरगिट की आँखें (व्यंग्य संग्रह)
देश की  विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन      
ईमेल- ramjibhairav.fciit@gmail.com

अजब–गजब: 36 वर्ष में दलित के नाम आवंटित भूमि नहीं ढूंढ सका राजस्व विभाग

चहनियां के गजेंद्रपुर में नापी के दौरान मौजूद ग्रामीण। Young Writer
चहनियां के गजेंद्रपुर में नापी के दौरान मौजूद ग्रामीण।

लेखपाल पर गलत नापी कर गजेंद्रपुर के ग्रामीणों को परेशान करने का लग रहा आरोप
सात बार हुई नापी, हर बार अलग अलग भूमि का सीमांकन होने से लोगों में रोष

Young Writer, चंदौली‚ चहनियां। धानापुर ब्लॉक अंतर्गत गजेंद्रपुर (प्रसादपुर) गांव निवासी दलित जयप्रकाश राम के नाम 36 वर्ष पहले आवंटित हुई भूमि को राजस्व विभाग अभी तक नहीं ढूंढ पाया है। लेखपाल व कानूनगो ने इसके लिए सात बार नापी किया। और हर बार अलग अलग स्थान पर सीमांकन करके चले गए। जिसे लेकर दलित परिवार और दूसरे अन्य किसानों के साथ विवाद उत्पन्न हो गया है। आलम यह है कि यदि समय रहते यहां पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब गांव में वर्ग संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
दरअसल वित्तीय वर्ष 1987 में जयप्रकाश के पिता श्यामा के नाम तत्कालीन ग्राम प्रधान ने जिस जमीन का पट्टा किया था, वह कोई खेत नहीं, बल्कि पोखरी थी। जिसपर कब्जा दिलाने के नाम पर राजस्व विभाग के अधिकारी कर्मचारी उसे सिर्फ और सिर्फ आश्वासन देते रह गए। अब लगभग 36 वर्ष बीत गए हैं। जयप्रकाश क्षेत्रीय लेखपाल और कानूनगो के साथ मिलकर उक्त भूमि को ढूंढ रहे हैं। किंतु उन्हें उक्त भूमि नहीं मिल रही है। जयप्रकाश का आरोप है कि उनके नाम आवंटित भूमि के लिए अब तक 7 बार नापी हो चुकी है। हर बार लेखपाल और कानूनगो अलग अलग किसानों के भूमि में सीमांकन करके चले जाते हैं। इस वजह से पूरे गांव का माहौल खराब हो गया है। गांव निवासी एक व्यक्ति ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि एक जाति विशेष के दबंग लोग 4 डिसमिल जमीन दूसरे का कब्जा करके अपना घर बना लिए हैं और अपनी चोरी छिपाने के लिए वे लोग लेखपाल व कानूनगो को अनुचित लाभ देकर आस पास के सीधे साधे काश्तकारों के खेत में सीमांकन करा दे रहे हैं। इस वजह से गरीब परिवार को उनके नाम आवंटित भूमि तो नहीं मिली। ग्रामीणों का कहना है कि गजेंद्रपुर के हल्का लेखपाल दबंगों के जाल में फंसकर पूरे गांव को परेशान किये हुए हैं। इस बारे में पूछे जाने पर लेखपाल निवास वर्मा से उनके मोबाइल नंबर पर सम्पर्क करने की बहुत कोशिश की गई। किंतु उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।

-Young Writer, Chahaniya

हस्तिनापुर एक्सटेंशन : कब्र से उठती आवाज

हस्तिनापुर एक्सटेंशन
हस्तिनापुर एक्सटेंशन

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह, HASTINAPUR EXTENTION

कभी-कभी जब आस-पास कोई आवाज नहीं होती है, बहुत-सी आवाजें आने लगती है। कानों में गूँजने लगती हैं। मन पर छाने लगती हैं। गाने लगती हैं, तरह-तरह के रुदन के गान। नींद उचट जाती है।
मेरे गाँव में कोई कब्र नहीं है। फिर भी लगता है पूरा गाँव ही कब्रगाह है। घर-घर में कब्र है। बहुत कम लोग हैं, भाग्यशाली, जो शयनयान पर सोते हैं। हमारे देश में शयनागार में सोने वाले बड़े थोड़े-से लोग हैं। बड़े-थोड़े से लोग हैं, जिन पर लोकतंत्र की कृपा है। पता नहीं क्यों हमारे देश में लोकतंत्र बहुत थोड़े-से लोगों पर कृपालु है? ऐसा क्यों हैं? बार-बार सवाल उठता है। मगर किससे पूछें? सवाल जनमता है, फिर तुरत मर जाता है। हम उसे दफन कर देते हैं। हम जहाँ होते है, वहीं दफन कर देते हैं। हम जहाँ रहते हैं, वहीं दफन कर देते है। हम अपनी लाशें बिना कफन के दफन कर देते हैं।
हम जहाँ अपने सवाल दफन करते हैं, देखते हैं कि वहाँ पहले-से भी बहुत-सी लाशें दफन है। अपनी लालसा की तमाम लाशें वहाँ दफन हैं। अपने सपनों के तमाम शव वहाँ दफन हैं। अपने विरोध और विद्रोह के तमाम मुर्दे वहाँ गड़े है। अपनी जरूरतों का क्या कहना, उनके शव को दफनाने के लिए तो रोज-रोज गड्ढे खोदने पड़ते हैं। हम गड्ढे खोदते हैं, पाटते हैं फिर उन्हीं के ऊपर चारपाई डालकर सोने का प्रयत्न करते हैं। नींद आये तो ठीक। न आये तो ठीक। आज हमारे देश का अधिकांश आदमी कब्र के ऊपर चारपाई बिछाकर सोने को अभिशप्त है। क्यों? आजादी तो सबके लिये आयी थी। समूचे देश के लिये आई थी। लोकतंत्र तो सबका है? ‘‘हाँ, हाँ, हाँ…..’’ सब कहते हैं। सब झूठ कहते हैं। सब जो कहते हैं, झूठ कहते हैं। जो भी कुछ कहना जानते हैं, झूठ कहते हैं। बड़ा गजब हैं। जो, कुछ कहना नहीं जानते, वे कुछ भी नहीं जानते हैं। न सच जानते हैं। न झूठ जानते हैं। वे सिर्फ कहने वालों का कहा मानते हैं।

पुस्तक को अमेजन पर आनलाइन खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें

हमारी व्यवस्था का दावा है कि आजादी के बाद हमारे देश में शिशुओं की मृत्यु दर में बहुत कमी आई है। यह सच है। मगर इससे ज्यादा यह सच है कि हमारे देश में सपनों की मृत्यु दर में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इस विशाल स्वप्नदर्शी देश की अधिकांश आबादी सपनों के शिशुओं से वंचित आबादी बन गई है। इस महान देश के समूचे गाँव सपनों के पूतों से निपूते गाँव बन गये हैं। वे सपनों के गर्भधारण के अयोग्य बनते जा रहे हैं। बंध्यापन की बीमारी आँख-आँख को अपनी गिरफ्त में लपेटती, लीलती जा रही है। गर्भपात की दुर्घटना अब आम बनती जा रही है। सपना कहीं किसी की आँख में कोटि जतन से पैदा हो भी गया तो पैदा होते ही उसका मरना भी तय है। उसे जमुआ दबा देता है। सपना पैदा होता है, पैदा होते ही मर जाता है। माटी जगाने की नौबत ही नहीं आती। यह रोज-रोज की मृत्यु का अवसाद अब तो मातम मनाना भी भूल गया है।

सपना देखने का अधिकार हर किसी का अधिकार हुआ करता था। मगर नहीं। अब ऐसा नहीं है। अब समूचे देश में यह अधिकार एक समय में केवल एक अदमी को होता है। वह समूचे देश और सारे देशवासियों के लिये सपना देखने का अकेला हकदार होता है। उसका ही सपना, सबका सपना होना चाहिए। सबके सपने, उसके सपने भले न हो सकें मगर उसका सपना सबका सपना हो सके, इसका वह पक्का संजाल रचता है। चूँकि एक समय में एक आदमी के ऊपर काम का बड़ा भारी बोझ रहता है, इसलिये वह और सब जरूरी कामों को संभालने के लिये सपने देखने के अपने अधिकार को अपने विश्वस्त शुभेच्छुओं को सुपुर्द कर देता है। वह अपने निकट के थोड़े-से चुनिन्दा लोगों को सपने देखने की खुली आजादी सौंप देता है। जो सपने देखने के हकदार चुने जाते है, उनकी आँखें बड़ी होती हैं। उनकी आँखे बड़ी-बड़ी आँखे होती हैं। उनकी बुद्धि विचक्षण होती है। उनके इरादे पक्के होते हैं, फौलादी। उनकी भूख बड़ी विकराल होती है। उनका हाजमा दुर्दान्त होता है। फिरे वे इतमिमान से सपने देखते हैं। दिन-रात देखते हैं। वे सपने ही खाते-पीते है। सपने ही बोलते-बतियाते हैं। सपने में डूबते-उतराते हैं। अपने सपने पर इतराते हैं। उनका सपना समूचे देश को अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में कैद कर लेता है। समूचा देश उनमें खो जाता है। बड़ी-बड़ी आँखों के बड़े-बड़े सपनों में समूचे देश के असंख्य छोटे-छोटे लोगों के छोटे-छोटे सपने विलीन होकर बिला जाते हैं।

उनका कहना होता है कि छोटे-छोटे सपने देश को छोटा बना देते हैं। तुच्छ बना देते हैं। दुनिया में देश की गरिमा को बौना बना देते हैं। यह ठीक नहीं है। दुनियाँ के बीच देश की नाक का सवाल है। देश का हाथ कट जाय, तो कट जाय। पाँव कट जाय चलेगा। कलेजा फट जाय, कोई बात नहीं। मगर नाक, साबूत रहनी चाहिए।
इधर हमारे गाँव हैं, जिन्हें देश की आत्मा कहा जाता है, उनकी आत्मा न जाने कहाँ अलोप हो गई है। उनके प्राण उनके शरीर से प्रयाण कर चुके हैं। फिर भी वे जी रहे हैं। जीवित बचे हुये हैं। काहे लिये? क्या प्रयोजन है, उनके जीवित बचे रहने का? बिल्कुल बेशरम हैं क्या? बिल्कुल बेहया हैं क्या? कौन कहे भला! नहीं, वे जी रहे हैं, अपने सपनों के शिशु शवों की कब्रगाह बनाने के लिये। वे कब्र खोदने के काम को करने के लिये जी रहे हैं। इसके लिये उनका जिन्दा रहना जरूरी है, इसलिये जी रहे हैं। जिन्दा रहना उनकी मजबूरी है, इसलिए जी रहे हैं।

अब हमार गाँव में अधिकांश के लिये घर बनाने का सपना अपने जनम के साथ ही मरा हुआ सपना है। अपनी संततियों के पोषण का सपना मरा हुआ सपना है। अपने बच्चों के लिये शिक्षा का सपना मरने के लिये बीमार सपना है, जिसके लिये कोई अस्पताल नहीं है। कोई डाक्टर नहीं है। कोई दवा नहीं है। अपनी बेटियों के ब्याह का सपना इतना डरावना सपना है कि उसके खौफ में नींद फटकती ही नहीं। भर पेट खाने का सपना, मन मुताबिक खाने का सपना, जवान मौत का शिकार सपना है। कुछ खरीदने का सपना, कुछ जोड़ने का सपना? पूछिये मत। ऐसे सपने अव्वल तो गर्भ में ही नहीं आते। गलती से आ भी जाते हैं तो दुर्दान्त नियति की गर्जना से गर्भपात को प्राप्त हो जाते हैं। हाँ, कुछ घटने के, कुछ हटाने के सपने जरूर बहुत-सी आँखों में उतराते हैं, जैसे विषैले पानी में मरी हुई मछली उतराई रहती है।

इन तमाम सपनों को रोज-रोज समाधि देनी होती है। कहाँ? यहाँ कोई मुर्दहिया नहीं है। कब्रगाह नहीं है। कुल मिलाकर एक गुजर करने भर की छोटी-सी जगह है। उसी जगह में कब्र खोदनी है। सपने दफनाने हैं। उसी कब्र पर नहाना है। खाना है। चारपाई डँसाकर सोना है। फिर चारपाई उठाकर, उड़ासकर फिर कब्र खोदना है। आस-पास कहीं कोई आवाज नहीं है। न हँसी-दिल्लगी की। न विरोध की। न विद्रोह की। न प्रतिरोध की। न आक्रोश की। ऐसे में चारपाई के नीचे से कब्र से आवाज आती है। नींद से जगाती है। फिर नींद को भी कब्र में खींच ले जाती है।

हम कब्र में पाँव लटकाये पड़े हैं। हम न सोये हैं, न जागे हैं। हम न सो पा रहे हैं। न जाग पा रहे हैं। हम केवल भाग पा रहे है। हम भाग रहे है। अपने से भाग रहे हैं। अपनों से भाग रहे हैं। सपनों से भाग रहे हैं। भाग-भाग कर भी वहीं हैं। वहीं कब्र पर खड़े। कब्र पर पड़े।
कब्र से आवाज उठ रही है। आवाज उठ रही है। आवाज गूँज रही है,- ‘‘छोटे-छोटे आदमी, आदमी नहीं हैं, क्या? छोटे आदमी देश के नहीं हैं, क्या? छोटी-छोटी आँखें, आँखें नहीं है, क्या? छोटे-छोटे सपने, सपने नहीं हैं, क्या? छोटी मछलियाँ, मछलियाँ नहीं है, क्या?
हमारा लोकतंत्र समूचे तालाब के लिये है, या सिर्फ तालाब की बड़ी मछलियों के लिये।
हमारा लोकतंत्र बहुमत का लोकतंत्र है? बहुजन का लोकतंत्र है? सर्वजन का लोकतंत्र है? या हुकूमत के हुनर का लोकतंत्र है?

हमारा लोकतंत्र छोटे-छोटे लोगों के मौलिक अधिकारों के कब्र खोदने के लिए बड़ी-बड़ी आँखों को बड़े-बड़े सपने अलाट करने वाला लोकतंत्र है। हमारे लोकतंत्र को हमारा राम, राम कहना।

-Young Writer

Nauragh के औरवाटांड़ में जानवर से बदतर स्थिति में जी रहे ग्रामीणः मनोज डब्लू

नौगढ़ के औरवाटांड गांव में ग्रामीणों की समस्याओं से रूबरू होते मनोज सिंह डब्लू।
नौगढ़ के औरवाटांड गांव में ग्रामीणों की समस्याओं से रूबरू होते मनोज सिंह डब्लू। फाइल फोटो।

एक माह बाद बिजली विभाग के एक्सईएन को बांधने की सपा नेता मनोज डब्लू ने दी चेतावनी

गांव में न बिजली, न सड़क और ना ही शिक्षा की है कोई व्यवस्था

Young Writer, Nauragh चंदौली। समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक मनोज सिंह डब्लू शुक्रवार को नौगढ़ क्षेत्र के दौरे पर रहे। इस दौरान वह औरवाटांड़ गांव पहुंचे, जहां अव्यवस्थाओं व दुश्वारियों को देखकर मर्माहत हो उठे और उनका दर्द ग्रामीणों के समक्ष झलक उठा। विकास के खोखले दावों के बीच जानवरों की तरह जी रहे ग्रामीणों के दर्द को महसूस किया और सरकार के स्वच्छ भारत अभियान समेत करोड़ों-अरबों की योजनाओं पर सवाल खड़े किए। साथ ही भाजपा के स्थानीय विधायक व सांसद को भी आड़े हाथ लिया। बिजली विभाग के एक्सईएन को खुली चेतावनी दी कि यदि एक माह के अंदर औरवाटांड में बिजली आपूर्ति व्यवस्था स्थापित नहीं हुई तो वह उन्हें आमजन के सहयोग से बांधने का काम करेंगे।

इस दौरान उन्होंने गांव के शौचालयों की दुर्दशा को देखा। साथ ही पेयजल किल्लत से भी रूबरू हुए। ग्राम प्रधान संतलाल समेत ग्रामीणों ने बताया कि गर्मी में हैंडपम्प जवाब दे जाते हैं। ऐसे में कर्मनाशा नदी का पानी ही उनके जीवन के एकमात्र सहारा बचता है, जिससे वह खाना बनाते हैं और उसी को ही पीकर अपनी प्यास बुझाते हैं। गांव में सोलर लाइटें लगी हैं लेकिन उनकी बैट्री गायब है। मनोज डब्लू ने कहा कि शौचालयों को इस कदर बनाया गया है कि वह उपयोग से बाहर हैं। जो अपने आप में कई सवाल खड़े करती है और सरकार के स्वच्छ भारत मिशन पर करारा तमाचा है। यहां सड़कें नहीं है गांव आने के लिए दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। बच्चों के लिए स्कूल नहीं है। हालात इतने खराब हैं कि छोटे बच्चों को एनजीओ के लोग पढा-लिखा रहे हैं।

Manoj Singh W ने कहा कि जो लोग जनहित के मुद्दे पर कटाक्ष करते हैं वह इस संदेश को देखने के बाद समय निकाले और जनता के बीच आकर उनकी समस्याओं को जानने के साथ ही उनके दर्द को महसूस करें। आजादी के इनते साल बाद भी औरवाटांड गांव में बिजली नहीं है जो आज भी ढिबरी युग में जी रहे है। केरोसिन का वितरण बंद होने से ग्रामीणों के समक्ष दुश्वारियां और बढ़ गयी है। औरवाटांड गांव के हालात इतने बुरे हैं कि ऐसी स्थिति में जानवर भी जिंदा नहीं रह पाए। बावजूद इसके यहां के बाशिंदे हरदिन तमाम दुश्वारियों के बीच किसी तरह अपना गुजर-बसर कर रहे हैं। कहा कि एक महीने बाद वह फिर से औरवाटांड जाएंगे और यहां व्यवस्था बदली नहीं हुई मिली तो अफसरों को बांधने का काम होगा। क्योंकि चंदौली जनपद को अब आगे बदहाल स्थिति में नहीं छोड़ा जाएगा।

-Young Writer Naugarh

Chandauli:कोतवाली पुलिस व स्वाट टीम ने घेरे बंदी कर हीरोइन तस्कर को दबोचा, 12 लाख की हिरोइन बरामद


चंदौली। सदर कोतवाली पुलिस व सर्विलांस टीम ने शुक्रवार को एक हीरोइन तस्कर को धर दबोचा और उसको गिरफ्तार कर कोतवाली ले आयी वही न्यायालय के समक्ष पेश कर विभिन्न धाराओं में जेल भेज दिया।
दरसल सदर कोतवाल राजीव प्रताप सिंह सर्विलास सेल प्रभारी श्याम जी यादव व स्वाट टीम प्रभारी शैलेन्द्र प्रताप सिंह अपने हमराहियों के साथ मुख्यालय स्थित साव जी पोखरे के समीप चेकिंग अभियान चला रहे थे। कि एक व्यक्ति साव जी के पोखरे पर संदिग्ध दिखाई दिया। इसी दौरान वो पुलिस को देखकर भागने लगा पुलिस ने तत्काल घेरे बंदी कर हीरोइन तस्कर को धर दबोचा पूछताछ करने पर उसने अपना नाम हलीम अहमद वार्ड नंबर 9 मोहनिया जनपद भभुआ बिहार बताया पुलिस ने तस्कर का तलासी लिया तो उसके पास से 28 ग्राम नाजायज हिरोइन बरामद हुआ जिसकी अंतरराष्ट्रीय कीमत 12 लाख 50 हजार बतायी जा रही है। पूछताछ में बताया कि बिहार से हिरोईन खरीद कर लाता हूँ जिसे फुटकर के रूप में चंदौली के विभिन्न क्षेत्रों में बेच देता हूं पुलिस ने तस्कर को गिरफ्तार कर कोतवाली ले आयी और न्यायालय के समक्ष पेश कर एनडीपीएस एक्ट में मुकदमा पंजीकृत कर जेल भेज दिया। इस दौरान बंटी सिंह , रामआशीष, गौतम कुमार सरोज सुशील सिंह, नीरज कुमार,अजीत कुमार मौजूद रहे।

Chandauli
overcast clouds
29.5 ° C
29.5 °
29.5 °
72 %
4.5kmh
96 %
Tue
33 °
Wed
36 °
Thu
37 °
Fri
37 °
Sat
29 °

You cannot copy content of this page

Verified by MonsterInsights