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Tuesday, July 7, 2026

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हस्तिनापुर एक्सटेंशन : रसो वै सः

हस्तिनापुर एक्सटेंशन
हस्तिनापुर एक्सटेंशन

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह
HASTINAPUR EXTENTION

कभी-कभी लगता है, हम बहुत कुछ जानते हैं। ठीक भी है। बरसों-बरस पढ़ने में बिता देने के बाद भी भला ऐसा क्यों न लगे? लगना ही चाहिए। मगर…..
मगर क्या?
मगर यह कि कभी लगता है कि हम कुछ भी नहीं जानते। हम जो जानते हैं, उसे जानने जैसा कहना बड़ा मुश्किल हो उठता है। दूसरों के लिये तो कहा जा सकता है। दूसरों को तो हम जनाते ही हैं कि हम बहुत कुछ जानते हैं। आपसे कम नहीं जानते हैं। ज्यादा ही जानते हैं। आप मानें, न मानें आपकी मर्जी। फिर भी कोई मानता कहाँ है। कोई नहीं मानता। मजबूरी में मानना पड़े भी तो कोई मानना तो नहीं ही चाहता। मगर खुद से कहना कि हम बहुत कुछ जानते हैं, नहीं हो पाता।

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बड़ी मुश्किल परेशानी है। बड़ा टेढ़ा है। बड़ी टेढ़ी खीर है। कुछ न जानने की हीनता को कैसे स्वीकार करें? नहीं, यह भी स्वाभाविक नहीं है। संभव नहीं है। कुछ जानने की महत्ता को कैसे सँभालें? नहीं, यह भी संभव नहीं है। सँभालने की शक्ति ही नहीं है। सामर्थ्य ही नहीं है। फिर….? फिर क्या रास्ता है?
हमें लगता है, कुछ जानने की उत्कण्ठा ही मनुष्य के जीवन में रस का संचार करने में समर्थ है। सक्षम है। यही हीनता की कुण्ठा से मुक्त करने में कामयाब है। यही महत्ता के दर्प से छुटकारा दिला कर मनुष्य को सहज रखने में सफल है।
कुछ जानने की उत्कण्ठा ही मनुष्य को जीवन में रस की तरफ ले जाती है। रस में ले जाती है। रस के स्रोत की ओर उन्मुख होने को उत्प्रेरित करती है।
रस क्या है? भला कौन नहीं जानता। अदना से अदना आदमी भी जानता है। जाहिल से जाहिल आदमी भी जानता है। हर कोई जानता है कि हर पदार्थ में रस है। सबका अपना स्वाद है। सबका अपना आस्वाद है। हर व्यक्ति में रस है। किसिम-किसिम का रस है।
बात में रस है,बतरस का सर। रूप में रस है, सम्मोहन का रस। दृश्य में रस है, आकर्षण का रस। ध्वनि में रस है, आमंत्रण का रस। गन्ध में रस है, मादन का रस। व्यंजन में रस है, आस्वाद का रस। साहित्य में रस है, तोष का रस। अध्यात्म से रस है, आनन्द रस। सृष्टि में सब तरफ रस ही रस है। हर जगह रस ही रस है।
सचमुच?
नहीं। शायद रस कहीं नहीं है। शायद रस किसी में नहीं है। रस अनुभव में नहीं है। रस की लालसा हर कहीं है। रस, कहीं नहीं है।
हर कोई रस के लिये लालायित है। हर किसी में रसपान की ललक है। मगर रस का कहीं पता नहीं है।
साहित्य का तो बच्चा-बच्चा रस के बारे में जानता है। रस की परिभाषा जानता है। लक्षण जानता है। कविता में उदाहरण जानता है। भेद जानता है। प्रकार जानता है। संख्या जानता है। सबकुछ जानता है, रस के बारे में। रस नहीं जानता है।
रस को जाने बगैर जीवन कितना नीरस है। मनुष्य कितना तुच्छ है। पदार्थ कितने अपदार्थ हैं। पद कितना सुन्न है। वस्तुएँ कितनी अवास्तविक हैं। सब कुछ कितना व्यर्थ है।
हमें लगता है, रस शायद जानने की चीज नहीं है। रस के सन्दर्भ में जानना बड़ा उथला मालूम पड़ता है। जो पाने लायक है, पीने लायक है, जीने लायक है, उसके लिये जानना बड़ा अपर्याप्त है।
रस क्या है? कह पाना बड़ा कठिन है। कुछ चीजें कहने में नहीं आतीं। गूँगा बना देती हैं। फिर भी…….। फिर भी कहने का सिलसिला कब थमा है। नहीं, गूँगे कण्ठ में भी बहुत देर तक वाणी विरम नहीं सकती। वाणी के प्रवाह को कण्ठ का स्तंभन कभी बाँध नहीं सका है। मूकता का अवरोध जब टूटता है, मूक वाचाल बन जाता है। मौन बहुत तरह से बोलना जानता है। सच कहें तो मौन ही वक्तृता का उत्स है। जो बिना मौन हुये बोलते रहते हैं, उनका बोलना बकवास बन जाता है। साहित्य तो मौन की ही अभिव्यंजना है। कविता गूँगे का गान है।
कविता करने वालों ने रस के बारे में कहा है। बार-बार कहा है। खूब-खूब कहा है। कहा है,- ‘‘रसो वै सः’’। रस ही वह है। जो रस है, वही वह है।
‘वह’, कौन? यह रस के बीच में वह कहाँ से आ गया? रस में वह कहाँ से आ गया?
नहीं, ऐसा नहीं है। वह कहीं से नहीं आया। वह रस में से भी नहीं आया है। वह, रस ही है। रस ही है। रस ही वह है। अभिन्न हैं दोनों। बस नाम ही दो है। अस्तित्व एक ही है।
फिर….? वही बात। वह क्या है? रस क्या है?
वह अस्तित्व का बोध है। रस अस्तित्व का बोध है। अस्तित्व असीम है। अनन्त है। अनादि है। सतत है। अव्याहत है। अव्यय है।
रस व्यक्ति नहीं है। व्यक्ति में नहीं है। वस्तु नहीं है। वस्तु में नहीं है। भाषा में नहीं है। वह सबमें है। सर्वत्र है। सर्वकाल में है। इसीलिये वह जनमता नहीं है। उसका जन्म नहीं होता। वह प्रगट होता है। वह निष्पन्न होता है।
वह है पहले से ही। निष्पन्न होता है, भाव में। भाव, चेतना का स्वभाव है। जब हम भाव में नहीं होते हैं, अभाव में होते हैं। भाव में न होना ही सीमा में होना होता है। खण्ड में होना होता है। मिटने के लिये होना होता है। बँटने के लिए होना होता है। लघुतम इयत्ता में होना होता है। मरने के लिये होना होता है। अभाव संसार का विस्तार है। झूठ का विस्तार है। दुःख का विस्तार है। भय का विस्तार है। भाव अस्तित्व का स्वभाव है। रस हमें अस्तित्व का बोध कराता है। रस अमृत है। रस मुक्ति है। वह हमें मुक्त करता है।ै लघुता से मुक्त करता है। सीमा से मुक्त करता है। खण्ड से मुक्त करता है। मृत्यु सीमा की ही होती है। असीम में मृत्यु है ही नहीं। रस हमें असीम में स्थिति देता है। रस असीम है। वह असीम है।
रस में असीम की व्याप्ति है। असीम में रस व्याप्त है। विराट का बोध हीरस का बोध है। लघु सत्ता का विराट अस्तित्व में विलय ही रस की निष्पत्ति है। अनुभोक्ता रस का आश्रय नहीं है। रस ही अनुभोक्ता का आश्रय है। रस अनुभोक्ता में विलीन नहीं होता। अनुभोक्ता ही रस में विलीन होता है। जब अनुभोक्ता नहीं रह जाता, रस रह जाता है। जब अनुभोक्ता होता है, रस नहीं होता। जहाँ अनुभोक्ता होता है, वहाँ रस नहीं होता।
रस वैयक्तिक नहीं है। वह वैयक्तिक सत्ता नहीं है। वह निर्वैयक्ति सत्ता है, जिसमें व्यक्तियों के अपार समूह समाहित हैं। व्यक्ति सत्ता का सामूहिक सत्ता में विलय ही रस का निष्पादन है। रस, वह लीला भूमि है, जहाँ सीमाओं का असीम से अभिसार होता है। रस, मिटने के मंगल उत्सव का आह्लाद है। साहित्य हमें इस आह्लाद को उपलब्ध कराने का सबसे सहज माध्यम है।
वैयक्तिक सत्ता के अतिक्रमण की उत्प्ररेणा ही साहित्य की अस्मिता है। साहित्य हमें भावदशा में स्थित करके रस का बोध देता है।ै व्यक्ति के सुख या दुःख का आख्यान साहित्य नहीं है। जो है, उसका निरूपण साहित्य नहीं है। जो नहीं है, उसका निदर्शन साहित्य नहीं है। साहित्य व्यक्ति के समूह में विलयन की व्यंजना है। साहित्य ‘जो नहीं है’, उसके ‘जो है’ उसमें समाहन का आह्वान हैै। साहित्य अस्ति में नास्ति और नास्ति में अस्ति के विलोपन और प्रगटन की संध्या का अपूर्व अस्तित्व है। साहित्य, वह संध्या का सौन्दर्य है, जिसमें दिन विलीन हो जाता है, रात प्रगट हो जाती है। जिसमें रात समाहित हो जाती है और दिन उग आता है। जहाँ व्यक्ति तिरोहित हो जाता है, समूह उद्भासित हो उठता है। समूह व्यक्ति में और व्यक्ति समूह में समाहित होते रहते हैं। साहित्य अद्भुत है। अद्भुत इस अर्थ में कि इसमें व्यक्ति समूह में समाहित होकर भी समूह के वाचक व्यक्ति के रूप में बना रह जाता है। सागर में सीपी का होना तो होता ही है, सीपी में सागर का होना भी साहित्य में है। सीपी में सागर का होना ही साहित्य का होना है। भाव का होना है। रस का होना है। सीमा में असीम का अनुप्रवेश ही साहित्य में रस का मर्म है।

रस बड़ा मार्मिक है। वह स्थूल नहीं है। वह सूक्ष्म भी नहीं है। वह व्यक्ति नहीं है। वस्तु भी नहीं है। वह दृश्य नहीं है। वह दृष्टि भी नहीं है। वह स्थूल में भी है। सूक्ष्म में भी है। व्यक्ति में भी है। वस्तु में भी है। दृश्य में भी है। दृष्टि में भी है। जहाँ भी, जब भी खण्ड, अखण्ड में समंजित होने को पाँव उठाता है, रस आविर्भूत हो उठता है। भाव अखण्ड है। असीम है। अविनाशी है। भावसत्ता हजारों साल पहले भी थी। आज भी है। हजारों साल बाद भी रहेगी। भाव, मनुष्य पर आश्रित नहीं है। वह सिर्फ मनुष्य में व्यक्त होता है। भाव के व्यक्त होने से ही मनुष्य, मनुष्यत्व को उपलब्ध होता है। सार्थक होता है। भाव कभी मनुष्य में विलीन नहीं होता। वह मनुष्य में व्यक्त होकर फिर अपनी असीम और अविनाशी सत्ता में स्थित रह जाता है। मनुष्य जब भाव में होता है, रस बोध को उपलब्ध हो जाता है।

व्यक्ति जब भी भाव में होता है, भावदशा में होते ही वह व्यक्ति इकाई नहीं रह जाता। वह अपनी क्षुद्र इकाई की सीमा को अतिक्रांत कर जाता है। लाँघ जाता है। उलाँघ जाता है। भावदशा में व्यक्ति अपने में स्थित नहीं रहता। स्थिर नहीं रहता। वह अपने से इतर से सम्पन्न होते है। अपने से इतर से सम्पन्न होना ही व्याप्ति से सम्पन्न होना होता है। जब भी आदमी प्रेम में होता है, क्रोध में होता है, भय में होता है, जुगुप्सा में होता है, सिर्फ अपने में नहीं होता। रस, अपने में व्याप्ति के प्रसार का दुर्लभ बोध है। साहित्य दुर्लभ की सुलभता का आयोजन है।

रस, सीमा और असीम की सन्धि में है, क्या? हाँ, है। जहाँ सीमा, असीम में समाहित होती है, मृत्यु, अमरता में, विलीन होती है, अभाव, भाव में मग्न होता है, अहं, अस्तित्व में सम्मिलित होता है, वहीं रस स्थित है। जहाँ अनेकताएँ अपनी एकता का अभिज्ञान पा लेती है, अवबोध पा लेती है, रस फलित हो जाता है।
साहित्य मनुष्यजाति के लिये मूल्यवान थाती है, तो इसीलिए कि वह व्यक्ति में उसके आन्तरिक व्योम को उसकी व्याप्ति में व्याप्त होने को उत्प्रेरित करता है। सीपी के भीतर जो सागर समाहित है, उसे सागर का अनुभव देने में सहायता देता है। सार्वभौम अस्तित्व में वैयक्तिक अस्तित्व को समाहित होने का आमंत्रण, साहित्य का आमंत्रण है। साहित्य मनुष्य जीवन में व्याप्त रस का आस्वादन कराकर मनुष्य को रस के स्रोत की ओर उन्मुख करने का महत उद्योग है।

साहित्य, वैयक्तिक उद्योग कत्तई नहीं है। वह व्यक्ति की उपलब्धि कदापि नहीं है। साहित्य चेतना के सार्वभौम और सार्वजनिक स्वरूप की अस्मिता के बोध को आत्मसात करने का अभिक्रम है। स्थितियों के बदल जाने से, परिस्थितियों के परिवर्तित हो जाने से, जो अपनी अर्थवत्ता से विच्युत हो जाता है, वह साहित्य नहीं, साहित्य का प्रतिमास है। मनुष्य के बदल जाने से मनुष्य की चित्तवृत्तियाँ नहीं बदल जातीं। चित्तवृत्तियाँ सनातन हैं। चित्तवृत्तियाँ सार्वजनिक हैं। सबमें होने के कारण ही चित्तवृत्ति रसबोध में सक्षम है। चित्तभूमि का रसबोध के माध्यम से प्रसार ही साहित्य का ध्येय है। साहित्य सर्वजन की सम्पत्ति है। सम्पूर्ण मनुष्यजाति की विरासत है। साहित्य का सम्मान सामूहिक अस्मिता के गौरव का सम्मान है। साहित्य, मनुष्यजाति की विराट चेतना को उपलब्ध हो लेने की उत्कट अभीप्सा का संरक्षक है। पोषक है। पालक है।

साहित्य में जो रस है, वह जीवन में व्याप्त रस से अभिन्न है। जो रस है, वही वह है। वह, यानी विराट अस्तित्व। वह विराट अस्तित्व, जिसमें सब समाहित हैं। जिसमें, सारी वैयक्तिक इकाइयाँ सन्निहित है। विराट अस्तित्व ही व्यक्ति इकाई में विभक्त है। विभक्त की अविभक्त की ओर यात्रा ही साहित्य की यात्रा है। साहित्य की यात्रा पूर्णता में पर्यवसित होने की यात्रा है। रस, पूर्णता के बोध का उद्बोधन करता है।
रस, जीवन को जानने का, अस्तित्व को जानने का, उसकी विराटता को, उसकी असीमता को जानने का आधार है। रस को उपलब्ध हुये बिना कुछ भी जानना संभव नहीं।
जीवन सारी स्थितियों को अपने में समवा लेता है। सारी विकटताएँ और उत्कटताएँ जीवन में समा जाती हैं। सारी विरसताएँ रस में समाहित हो जाती हैं। रस कितना विराट है।
जो रस है, वही जीवन है। वही अस्तित्व है। वही विराट है। वही असीम है। वही सबकुछ है। रसो वै सः।

आह्वानः गौशाला के मवेशियों के लिए चारा व नकदी दान कर बने पुण्य के भागी

चंदौली‚ कंदवा। गौशाला में पल रहे पशुओं को आमजन चारा दान कर पुण्य का भागी बन सकता है। इसमें बढ़-चढ़कर सहयोग करने वाले नागरिकों को पुरस्कृत भी किया जाएगा। यह जानकारी देते हुए खंड विकास अधिकारी बरहनी विकास सिंह ने बताया कि विकास खंड बरहनी के कुशहां मे गौशाला है शासन की पहल पर छुट्टा निराश्रित पशुओं के लिए बने। इस गौशाला में पल रहे पशुओं के लिए शासन स्तर से तो चारा का प्रबंध किया जाता ही है साथ ही साथ इच्छुक ग्रामीण, समाजसेवी यदि इन पशुओं को चारा दान करना चाहें तो निःसंकोच कर सकते हैं। बताया कि चारा ही नहीं नकद राशि भी दान कर दानदाता की सूची में सम्मिलित होकर ब्लाक मुख्यालय से रसीद प्राप्त कर पुरस्कृत हो सकते हैं। बताया कि गौ सेवा से बढ़कर कोई सेवा नहीं है ऐसे मे आमजन को सहयोग कर पुण्य का भागी बनना चाहिए।खंड विकास अधिकारी ने बताया कि ब्लाक में सुनील गुप्ता को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि ऐसे दानदाताओं का नाम रजिस्टर मे बकायदे अंकित करते हुए चारा या नकद राशि उपलब्ध कराने वाले दानदाता को प्राप्ति रसीद भी उपलब्ध कराएं। बताया कि दानदाताओं के दान से जहां पशुओं को संजीवनी प्रदान होगी वहीं दानदाता पुण्य के भागी भी बनेगें।

-Young Writer

चहनिया से मुग़लसराय पैदल यात्रा में उमड़े हजारो लोग‚ पीडब्ल्यूडी पहुंचे मनोज, पूछा क्यों नहीं बन पा रही सड़क?

Young Writer, चंदौली। समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक मनोज सिंह डब्लू गुरुवार को अपने वादे के मुताबिक सुबह छह बजे चहनियां मंदिर में दर्शन कर पदयात्रा का आगाज किया। दर्जनों गांव से होते हुए जर्जर व गड्ढे में तब्दील हो चुकी चहनियां-मुगलसराय मार्ग पर चले। इस दौरान जगह-जगह ग्रामीण ने पदयात्रा में जुड़कर वृहद आकार प्रदान किया। वहीं ग्रामीण पदयात्रा में शामिल लोगों की सेवा व खिदमत करते दिखे। वहीं किसी ने जल-पान कराया तो किसी ने माल्यार्पण कर जनहित के मुद्दे पर आवाज बुलंद करने वालों का स्वागत व हौसला बढ़ाया। धीरे-धीरे यह कारवां मुगलसराय की तरफ बढ़ा और करीब 11 बजे पदयात्रा नगर क्षेत्र में दाखिल हुआ।


इस दौरान पहले से शरहद पर भारी तादात में स्थानीय लोगों के साथ ही समाजवादी पार्टी के नेता व कार्यकर्ता पदयात्रा के इंतजार में खड़े नजर आए और पदयात्रा के साथ नगर में नारेबाजी करते हुए पीडब्ल्यूडी आफिस पहुंचे। वहां मनोज सिंह डब्लू ने एक्सईएन पीडब्ल्यूडी से मुगलसराय-चहनियां मार्ग के निर्माण संबंधित फाइलों को तलब किया। इस दरम्यान किसी बात को लेकर मुगलसराय कोतवाल व सपा नेता मनोज सिंह डब्लू में तनातनी भी हुई। एक्सईएन से सड़क न बनने की वजह जाननी चाही। साथ ही भाजपा के नेताओं पर जमकर हमला बोला। कहा कि चहनियां-मुगलसराय बहुत खराब हो चुकी है और यह सड़क चुनावी सड़क बनकर रह गयी है। यह कोई हवाहवाई बातें नहीं, बल्कि पीडब्ल्यूडी विभाग के दफ्तर की फाइल इसे पुष्ट कर रही है। क्योंकि जिस सड़क का स्टीमेट 2018 में 28 करोड़ का बना और उसे अपनी उपलब्धि बताते और गिनाए हुए भाजपा के नेताओं ने 2019 का चुनाव लड़ा और जीते भी। इसके बाद यही सड़क फिर से चुनावी मुद्दा बनी 2021 में स्टीमेट को बढ़ाकर 35 करोड़ कर दिया गया और इसके निर्माण के नाम पर एक बार फिर भाजपा नेताओं ने 2022 का चुनाव लड़े। इसके बाद अब 2023 में एक फिर से सड़क का स्टीमेट नए सिरे से तैयार करते हुए बजट को 78 करोड़ कर दिया है, क्योंकि एक बार फिर इसी सड़क के मुद्दे पर भाजपा 2024 का चुनाव लड़ने की तैयारी में है। हालांकि सड़क नहीं बनने के सवाल का पीडब्ल्यूडी के पास कोई जवाब नहीं है। लेकिन अब यह सड़क नहीं बनी तो पीडब्ल्यूडी को अबकी बार बड़ा आंदोलन होगा और महकमे के साथ ही भाजपा को भी जनता के सवालों का जवाब देना होगा।


28 करोड़ की सड़क के निर्माण पर खर्च होंगे 78 करोड़
चंदौली। पीडब्ल्यूडी विभाग के मुताबिक 15 किलोमीटर लम्बी मुगलसराय-चहनियां का पहला स्टीमेड 2018 में विभाग ने तैयार किया था। उस वक्त उक्त सड़क बनती तो सरकारी खजाने पर 28 करोड़ का बोझ पड़ता, लेकिन चुनावी साल होने के कारण सड़क नहीं बनी और मामला ठंडे बस्ते में चला। एक बार फिर उक्त सड़क के निर्माण का याद 2021 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आया। पीडब्ल्यूडी विभाग ने एक बार फिर सड़क निर्माण का स्टीमेट तैयार किया, जो 35 करोड़ था। फिर भी उक्त सड़क नहीं बन सकी। ऐसे में 2023 में एक बार फिर विभाग की ओर से नया स्टीमेट तैयार किया गया है जो 78 करोड़ का है फिलहाल सड़क अभी भी जर्जर व क्षतिग्रस्त हाल में है उसका निर्माण होना है। यदि मुगलसराय-चहनियां सड़क का निर्माण 2018 में होता तो उस पर 28 करोड़ ही खर्च होते, लेकिन अब उस पर 50 करोड़ रुपये अधिक यानी 78 करोड़ होने है। फिलहाल सड़क कब बनेगी यह तो पीडब्ल्यूडी विभाग भी नहीं बता पा रहा है।


सकलडीहा व मुगलसराय में नहीं दिखे दिग्गज
चंदौली।
समाजवादी पार्टी के दिग्गज व फायर ब्रांड नेता मनोज सिंह डब्लू जनहित के मुद्दे पर अपनी सक्रियता व मुखरता के लिए हमेशा सुर्खियों में रहते हैं। हाल-फिलहाल वह भाजपा के नौ साल चंदौली बदहाल अभियान को लेकर चर्चा में रहे। अभियान खत्म होते ही एक बार फिर से नए सिरे से जनहित के मुद्दों को उठाने में लगे पड़े है। चहनियां से उन्होंने पदयात्रा का आगाज किया। इस दौरान लोग तो जमा हुए, लेकिन सकलडीहा इलाके के समाजवादी पार्टी का कोई बड़ा नेता उनके साथ चलता नजर नहीं आया। पैदल चलकर वह लोगों का स्नेह व आशीष प्राप्त करते हुए वह मुगलसराय पहुंचे। वहां भी कोई भी दिग्गज नेता जनहित के मुद्दे पर निकली पदयात्रा में नहीं दिखा। जबकि सर्वविदित है कि सकलडीहा में विधायक प्रभुनारायण सिंह यादव व मुगलसराय में पूर्व सांसद रामकिशुन यादव वरिष्ठ समाजवादी नेता हैं, लेकिन न तो ये खुद नजर आए और ना ही उनके परिवार या उनके समर्थक ही पदयात्रा में दिखे। जिसे लेकर आमजन के साथ ही राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं रहीं।

Chandauli:घर में घुसकर चोरी की घटना को अंजाम देने वाले चोरों को पुलिस ने किया गिरफ्तार,लाखो के गहने व नगदी बरामद

चंदौली। धानापुर पुलिस ने चेकिंग के दौरान बुधवार को मुखबिर की सूचना पर चोरी की घटना को अंजाम देने वाले चार चोरो को धर दबोचा और उनको गिरफ्तार कर कोतवाली ले आयी वही न्यायालय के समक्ष पेश कर विभिन्न धाराओं में जेल भेज दिया।
दरसल धानापुर थाना प्रभारी प्रशांत सिंह अपने हमराहियों के साथ चेकिंग अभियान चला रहे थे। तभी मुखबिर से सूचना मिली कि धराव गांव में चोरी करने वाले चोर गहने व रूपयों का बटवारा कर के सीतापोखरी से बिरना जाने वाले रास्ते से भागने के फिराक में हैं। उक्त सूचना पर पुलिस टीम सीता पोखरी से बिरना जाने रास्ते पर घेरे बंदी कर चोरो को धर दबोचा पुलिस ने जब चोरो से पूछताछ किया तो उन्होंने अपना नाम रितेश राम सुजीत राम दोईज कुमार विरेन्द्र गांव धरांव बताया। पुलिस ने जब चोरो की तलासी लिया तो उनके पास से चोरी के पीली धातु का एक हार व एक जोड़ी हार के सेट कान का झाला तथा सफेद धातु का एक सेट हाथ पहनने वाली मेंहदीं पीली धातु की चार चूड़ी व सफेद धातु का एक चाभी का छल्ला सफेद धातु की एक जोड़ी पैजनी पीली धातु का एक मंगलसूत्र एक पीली धातु का मारवाड़ी नथिया सफेद धातु का एक जोड़ी पैजनी एक जोड़ी छागल एक जोड़ी पायल पीली धातु का एक मांग टीका पीली धातु की एक लेडीज व एक जेन्ट्स अंगूठी व सफेद धातु की कर्धनी व चार जोड़ी सफेद धातु की मीना तथा 200 रूपये करेंसी नोट 60000 रूपये व 100 रूपये की करेंसी नोट 29400 रूपये व 10 रूपये की करेंसी नोट 370 रूपये कुल 89770 रूपये बरामद हुआ। चोरो ने बताया कि कि मेरे गांव के पंकज कुमार के घर में कई दिन से ताला लगा था तो हम लोग रात्रि में चहारदिवारी कूद कर अन्दर घुस गए और हथौड़ी रम्मा से कुन्डी का ताला तोड़कर घर रखे बक्से व आलमारी से रूपये व गहने को चुरा लिये। घटना के कुछ दिन बीत जाने व माहौल शान्त हो जाने पर हम लोग बटवारा करके जा रहे थे की पुलिस ने पकड़ लिया गया। पुलिस ने तत्काल चोरो को गिरफ्तार कर कोतवाली ले आयी और न्यायालय के समक्ष पेश कर जेल भेज दिया।

Chandauli:आकाशीय बिजली का कहर एक की मौत आधा दर्जन गंभीर


चकिया। कोतवाली क्षेत्र के भीषमपुर गांव में बुधवार को आकाशीय बिजली की चपेट में आने से खेत में शौच करने गई 75 वर्षीय वृद्धा भागीरथी कि मौत हो गई। सूचना पर मौके पर पहुंची कोतवाली पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पंचनामा कर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया। वही आकाशीय बिजली के झटके से अलग-अलग गांव में कुल 5 लोग आंशिक रूप से झुलस गए जिनका इलाज जिला संयुक्त चिकित्सालय में किया जा रहा है।
भीषमपुर गांव निवासी स्वर्गीय धनराज की पत्नी भागीरथी बुधवार की दोपहर खेत में शौच करने गई थी। उसी दौरान तेज बारिश आगयी जब तक वह अपने घर पहुंच पाती थी बीच तेज गड़गड़ाहट के साथ गिरी आकाशीय बिजली की चपेट में आ गई जिससे उसकी घटनास्थल पर ही मौत हो गई। सूचना मिलते ही कोतवाली पुलिस तत्काल मौके पर पहुंच गए जहां से सबको कब्जे में ले लिया। भागीरथी की मौत से उसके पुत्र कपिल देव और महादेव का रो रो कर बुरा हाल था। वहीं आकाशीय बिजली की चपेट में आने से भीषमपुर गांव निवासी माला देवी 45 वर्ष, और मुजफ्फरपुर गांव निवासी सरोज मौर्य 45 वर्ष आंशिक रूप से झुलस गए जिनका इलाज जिला संयुक्त चिकित्सालय में किया जा रहा है। इसके अलावा राजदरी पर्यटक स्थल पर घूमने जा रहे अलीनगर थाना क्षेत्र के गोधना गांव निवासी पप्पू 50 वर्ष और अनवर 26 वर्ष मुरारपुर तिराहे के पास सड़क किनारे बनी मडई में बारिश से बचने के लिए खड़े थे। वही उसी मडई के नीचे शिकारगंज क्षेत्र के मुड़हुआ दक्षिणी गांव निवासी आकांक्षा 16 वर्ष भी मौजूद थी। जो आंशिक रूप से झुलस गई तेज जिन्हें जिला संयुक्त चिकित्सालय में भर्ती कराया गया जहां उनका इलाज चल रहा है घटना की सूचना मिलते ही मौके पर पहुंचे पूर्व जिला पंचायत सदस्य डॉ प्रदीप मौर्या थाना प्रभारी मिथिलेश तिवारी ने उनका हालचाल जाना

खुलासा,चोरी गए आभूषण व नकदी संग चोर गिरफ्तार,


सकलडीहा। पिछले दिनों धरांव गांव में पंकज के घर से लाखों रूपये की जेवर सहित नगदी चोरी होगयी थी। घटना को लेकर एसपी के निर्देश पर सीओ के नेतृत्व में टीम गठित किया गया था। मुखबीर की सूचना पर धानापुर पुलिस टीम सीतापोखरी बिरना मार्ग से चार चोरों को गिरफ्तार किया है। पकड़े गये चोरों के पास से 89 हजार नगदी सहित तीन लाख के जेवर और अन्य सामान बरामद किया गया है। बुधवार को सीओ कार्यालय में चोरी की घटना का सीओ राजेश कुमार राय ने खुलासा करते हुए चोरों को जेल भेज दिया।
धरांव गांव निवासी पंकज कुमार सिंगरौली में कोल्ड फिल्ड में काम करते थे। 28 मई को परिवार के साथ शादी में चले गये थे। 16 जून की रात में चोरों ने मौका का फायदा उठाते हुए चहदिवारी फांदकर घर में घुसकर लाखों के जेवर सहित नगदी चुराकर संपत होगये थे। शादी से लौटने पर घर की हालत देख हैरान होगये। थाने में चोरी का मुकदमा दर्ज कराया। एसपी के निर्देश पर सीओ के निर्देशन में चोरी की घटना का खुलासा के लिये टीम गठित किया गया था। मुखबीर की सूचना पर चोरी का आभूषण और रूपये का बटवारा करने के लिये चोर सीतापोखरी बिरना नहर मार्ग से जा रहे थे। इसी बीच पुलिस ने चार चोरों को पुलिस ने दबोच लिया। तलाशी के दौरान चोरों के पास से दो सौ और सौ की करेंसी नोट करीब 89 हजार 770 रूपया बरामद किया। इसके साथ ही सोने की हार मंगलसूत्र सहित अन्य चांदी के कुल कीमत तीन रूपये का बरामद किया गया। पकड़े गये चोर रितेश, सुजीत, दोईज, और बिरेन्द्र सभी धरॉव गांव निवासी को सीओ आफिस से जेल भेज दिया गया। इस बाबत सीओ राजेश कुमार राय ने बताया पिछले दिनों धरॉव गांव में चोरी हुई थी। जिसका आज खुलासा किया गया। गिरफ्तारी टीम में एसओ धानापुर प्रशांत सिंह,एसआई सत्यनारायण शुक्ला,दीनानाथ सिंह, ओमप्रकाश प्रचेता व अभिषेक दूबे रहे।

ललित निबन्धः जीवन में कर आसा

Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह

मनुष्य जीवन की गरिमा का जो श्रृंगार कबीर की कविता में दिखाई पड़ता है, बड़ा आकर्षक है। बड़ा आह्लादक है। बड़ा प्रिय है। मनुष्य के जीवन की महत्ता को और मनुष्य के महत्व को कबीर की कविता बड़ी ही विदग्ध रीति से गौरव प्रदान करती है। कविता के केन्द्र में मनुष्य की मूल्यवत्ता को स्थापित करने के लिये कबीर का उपक्रम हमेशा अविस्मीरणीय बना रहेगा।

कबीर जीवन-प्रवाह की सनातनता के सर्जक कवि हैं। वे परंपरा के मर्म के उद्गाता है। कबीर किसी कालखण्ड के खण्ड-खण्ड रूप के आराधक नहीं है। उनकी आराधना अखण्डकाल के प्रवाह के प्रति है। हमारे जीवन की परम्परा है। प्रवाह है। हमारा जीवन एक अविच्छिन्न परंपरा की अभिव्यक्ति है। एक अजस्र प्रवाह का घटक है।

परंपरा वह नहीं, जो कल थी। आज नहीं है। परंपरा अतीत नहीं है। अतीत में नहीं है। परंपरा हमेशा वर्तमान होती है। वह वर्तमान में होती है। परंपरा में, अतीत वर्तमान में समाहित है और भविष्य वर्तमान में बदल जाने को उत्सुक। हर वर्तमान अनिवार्य रूप से अतीत हो जाने वाला है। हर भविष्य एक दिन वर्तमान होने की तरफ निरंतर खिसकता आ रहा है। हमारे वर्तमान में हमारा अतीत भी मौजूद है और हमारा भविष्य भी सम्मिलित है। इसीलिये कबीर की कविता में वर्तमान, काल की अखण्ड सत्ता के समग्र अस्तित्व का वाचक है। बोधक है। तभी तो कबीर कहते हैं कि अवधू, जो कुछ भी होना है, उसके जीवन में,- जीवन के वर्तमान में ही घटित होने की आशा रखो। उम्मीद रखो। जो अभी है, वही है। जो अभी है, वही आगे भी है। जो अभी है, वही ‘अस्ति’ है। जो है, उसकी आराधना, उसमें आस्था, उसके प्रति अटूट विश्वास ही अस्तिकता है। जो नहीं है, उसमें अनुरक्ति नास्तिकता है। अस्तिकता स्वीकार है। नास्तिकता नकार है।

आस्तिकता अस्तित्व का सम्मान है। नास्तिकता अस्तित्व का तिरस्कार है। अस्तिकता प्रेम है। पूजा है। प्रमोद है। नास्तिकता सन्देह है। प्यास है। धन्धा है। जो कुछ है, उससे भर जाने का भाव धर्म है। जो कुछ नहीं है, उसके अभाव की विकलता अधर्म है। अवधू, ध्यान रखना गौर से देखना जरा, हमारे धर्म में अधर्म कैसे चतुराई से घुस आया है। घुसा पड़ा है। घुसकर धर्म को, सत्य को, आनन्द को, दबोच रखा है।

कितनी निसंगता है कबीर की कविता में। कितना विश्वास है। कितना प्रेम है। कितना प्रमोद है। मन उमग आता है। बार-बार पूछने की उत्कण्ठा होती है- कहाँ पाया आपने? कैसे पाया?
मगर मैं हजार-हजार बार चाहकर भी नहीं पूछ पाता। पूछने का कोई प्रयोजन भी नहीं है। कबीर का प्रश्नों के उत्तर देने में विश्वास नहीं है। कबीर की कविता तो उत्तरों के उत्स तक पहुँचाने की पक्षधर है। कबीर की कविता अस्तित्व के उत्स की ओर उन्मुख कविता है।

कबीर की कविता में अवधू, साधो, सन्तों ये सब सहानुभूति के सम्बोधन हैं। सम्मान के सम्बोधन हैं। आत्मीयता के-, आत्मीय लगाव के सम्बोधन हैं। जीवन को जान लेने की जिसमें थोड़ी भी ललक है, उन सबके प्रति कबीर को अपार प्यार है। उससे कबीर अपने मन की, अपने अनुभव की, अपनी उपलब्धि की बात सहज भाव से कहते हैं। कहते हैं कि वह भी उनकी संवेदना का साझीदार बन सके। संवेदना का सझीदार होना ही साथी होना होता है। कबीर की कविता साथी होने की कविता है।

Kabir कबीर जीवन के कवि हैं। वे मृत्यु के कवि नहीं हैं। जो मृत्यु के बाद की बात करता है, वह धन्धा करता है। धोखा करता है। वह अपना स्वार्थ साधता है। लाभ कमाता है। चाहे वह गुरु ही क्यों न हो। धन्धा तो धन्धा है। धोखा तो धोखा है। क्या फर्क पड़ता है, चाहे वह गुरु का हो, चाहे वेश्या का। देने का अभिनय और लेने की मंशा। देना कुछ नहीं और लेना सबकुछ। सबकुछ देने का दिखावा और कुछ भी न देने की असलियत। कुछ भी न लेने का नाटक और सबकुछ ले लेने की लिप्सा। धन्धा यही है। व्यापार यही है। चाहे व्यापार देह का हो, चाहे धर्म का, चाहे ज्ञान का। धोखा है। झूठ है। पाखण्ड है। ठगी है।

ठगी तो ठगी है। चाहे राम का नाम लेकर ठगी हो चाहे काम का। चाहे लाभ का, चाहे लोभ का। चाहे विकास का नाम लेकर हो, चाहे सुख का, चाहे स्वर्ग का। कबीर कहते हैं, अवधू, सावधान रहना। जो गुरु कहता है कि मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा, मेरी सेवा करो। वह झूठ बोलता है। वह स्वार्थी है। वह साधना की आड़ में स्वार्थ-साधना का धन्धा करता है। लोभ जगाकर, अन्धा बनाकर अपना उल्लू सीधा करता है। आदमी को अन्धा बनाने का, उल्लू बनाने का उद्योग धर्म नहीं, धर्म का व्यापार नहीं, अपराध है। पूरा-पूरा अपराध। यह कैसी व्यवस्था है? कैसा विधान है? कैसा संविधान है? जिसमें अपराध के लिये सम्मान की व्यवस्था है। कितना विस्मय जनक है।
कबीर अपनी कविता में कहते हैं कि मृत्यु और कुछ भी नहीं है केवल जीवन का निषेध है। जीवन का निषेध,-जीवन का नकार ही बस मृत्यु है। जहाँ जीवन नहीं है, मृत्यु है। जब भी, जिस भी अवस्था में जीवन नहीं है, मृत्यु है। जीवन से अपरिचय, जीवन की विस्मृति, जीवन के बोध का अभाव ही मृत्यु है।
जहाँ जीवन है, जीवन से परिचय है, जीवन का बोध है, मृत्यु नहीं है। मृत्यु बोध नहीं है, वह अवधारणा है। झूठ है। मृत्यु के उपरान्त का स्वर्ग अवधारणा की अवधारणा है। झूठ का झूठ है।

जीते जी का स्वर्ग सच है। जीवन का स्वर्ग सच है। जीवन में, जीवन का अनुभव स्वर्ग हैं, आनन्द, बोध है। जीवन असीम है। अजस्र है। अमर है। अविनाशी है। लघुता के बोध का मिट जाना और विराटता के बोध का भर आना ही अमरता है। सीमाओं का असीम में विलीन हो जाना ही, अविनाशी हो जाना है। जीवन अविनाशी है, अमर है। जीवन को जान लेना, पा लेना ही मनुष्य जीवन की महत्तम उपलब्धि है। कबीर की कविता मनुष्य जीवन की महत्तम उपलब्धि का यशगान करने वाली कविता है।
कबीर की कविता अवास्तविक के भ्रम को और भय को निरस्त करने वाली कविता है। मृत्य अवास्तविक है। मृत्यु मात्र भय है। मृत्यु के बाद मिलने वाला स्वर्ग भ्रम है। जो गुरु मृत्यु की बात करता है। मृत्यु के बाद स्वर्ग मिलने की दिलासा देता है, वह झूठ का व्यापार करता है। वह गुरु, गुरु नहीं झूठ्ठा हैै। वह दलाल है। स्वर्ग के लोभ से ऊँची कीमत वसूलने की जुगत में लगा हुआ, दलाल। वास्तव में जीवन को जानने की प्रक्रिया में दलाल की, बिचौलिये की कोई भूमिका ही नहीं है।
कबीर का जीवन से परिचय है। वे जीवन को जानते हैं। पहचानते हैं। जीवन उनका बोध है। जीवन को जान लेना ही मृत्य का अतिक्रमण है। मृत्यु के पार होना हैं। जो जीवन में स्थित होता है वह मरता नहीं है। जो जीवन को, बगैर जाने जीता है, वह मर जाता है। जहाँ जीवन है, वहाँ मृत्यु नहीं है। जहाँ मृत्यु है वहाँ जीवन नहीं है। दोनों का साथ-साथ होना संभव नहीं है। बिल्कुल प्रकाश और अन्धकार की तरह। जहाँ प्रकाश है, अँधकार हो ही नहीं सकता। अन्धकार है। अन्धकार होगा, मगर वहाँ होगा जहाँ प्रकाश नहीं है। जीवन प्रकाश है। मृत्यु अन्धकार है। जिसके जीवन में प्रकाश है, जिसने जीवन में प्रकाश पा लिया है, वह नहीं मरेगा। उसे मरना नहीं है। मृत्यु उसके लिये नहीं है। कबीर ने जीवन को पा लिया था। प्रकाश को पा लिया था।

जब तक कबीर पीछे-पीछे चल रहे थे, प्रकाश नहीं था। लोक और वेद के पीछे चलना प्रकाश रहित रास्ते पर चलना है। अँधेरे में चलना है। कबीर भी अँधेरे में चल रहे थे। चल रहे थे दुनियाँ के साथ-साथ। इसीलिये वे दुनियाँ को भी जानते हैं, अँधेरे को भी जानते हैं और मृत्यु को भी जानते हैं। मगर कबीर को आगे से आता हुआ सद्गुरु मिल गया। सद्गुर का रास्ता दुनियां का रास्ता नहीं है। जिस रास्ते दुनियां चलती है, उस रास्ते सद्गुरु कभी नहीं मिलता। सद्गुरु का मार्ग विपरीत दिशा का मार्ग है। दुनियां मृत्यु की तरफ जा रही होती है। सद्गुरु जीवन की तरफ आ रहा होता है। इसीलिये कबीर कहते हैं कि सद्गुरु उन्हें सामने से आता हुआ मिला। एक ही दिशा में चलने वाले यात्री तो आगे-पीछे हो सकते हैं। आमने-सामने नहीं हो सकते। आमने-सामने विपरीत दिशा में जाने वाले पथिक ही हो सकते हैं। कबीर कहते हैं ‘‘आगे तें सतगुरु मिला दीपक दी हाथ।’’ जब कबीर के हाथ में दीपक मिल गया तो उस दीपक के प्रकाश में उन्होंने राह देख ली। राह पहचान ली। उन्होंने जान लिया संसार मृत्यु की तरफ जा रहा है। अंधकार की तरफ जा रहा है। झूठ की तरफ जा रहा है। उन्होंने जीवन को देख लिया प्रकाश में। जान लिया। पहचान लिया। पा लिया। उन्होंने जीवन का अर्थ पा लिया। उन्होंने अस्तित्व का मर्म जान लिया। उन्होंने अमरता का रस पा लिया। रस पी लिया। कबीर की वाणी अमिय रस से सराबोर हो गई। उनके हृइय की गगन गुफा में अजर यानी कि कभी जीर्ण न होने वाला रस झरने लगा। झरकर हमेशा ताजा रहने वाला, कभी बासी न पड़ने वाला रस भरने लगा। उनकी वाणी उसी रस में नहाकर, निखरकर निकलने वाली वाणी है। अमृत वाणी। अमृत पुरूष की अमृत वाणी।

अमृतत्व को उपलब्ध कर लेने वाला प्राण ही मृत्यु का मखौल उड़ा सकता है। बड़े साहस का काम है। कितना विचित्र है कि बड़े साहस का काम भी कबीर के लिये सहज है। हमारी परंपरा में जीवन को जानने वाले न जाने कितने लोग हैं। अमृतत्व को उपलब्ध भी अगणित महाप्राण न जाने कितने हैं। मगर कबीर अकेले हैं, जो कहते हैं – ‘‘हम न मरौं, मरिहैं संसारा।’’
कबीर कहते हैं कि हम नहीं मरेंगे। हम नहीं मरेंगे। हमें मरना नहीं है। इसलिये कि हमको हमेशा जीवित रहने वाला मिल गया है। हम हमेशा जीवित रहने वाले में मिल गये हैं। जीवन हमेशा जीवित रहने वाला है। जीवन में समाहित हो जाना ही न मरना है। व्यक्ति सत्ता का सार्वभौम सत्ता में विलीन हो जाना ही न मरना है। चेतना सार्वभौम है। सबमें है। सबकुछ में है। सर्वकाल में है। जो सबमें था, सबमें है, सबमें होगा, वही जीवन है। जीवन हमश्ेाा से है। हमेशा रहेगा। जीवन में होना हमेशा होना है। जीवन अमृत है। जीवन कभी नहीं मरता।
संसार मर जाता है। कबीर कहते हैं हम नहीं मरेंगे। संसार मर जायेगा। बड़ी अद्भुत बात है। आदमी मर जायेगा तो संसार नहीं मरेगा। संसार जिन्दा रहेगा, जीवित रहेगा। जागृत रहेगा। आदमी नहीं मरेगा तो संसार मर जायेगा। आदमी का न मरना संसार का मर जाना है, क्या?

हाँ, ऐसा ही है। संसार मनुष्यों के, प्राणियों के समुच्चय का नाम नहीं है। संसार प्राणियों के पारस्परिक सम्बन्ध का, पारस्परिक व्यवहार का वाचक है। संसार एक अवधारणा है। उधार की आँख है। वह भी अन्धी। बिना कोई मूल्य चुकाये मुफ्त में मिल गया प्रत्यय है। दूसरे के मूँड़ की उतारी गई गठरी है, जिसे दूसरे को ढोना है। भेद का बर्ताव है। अपने-पराये के भेद का, शत्रु-मित्र के भेद का, अच्छे-बुरे के भेद का, ऊँच-नीच के भेद का, स्त्री-पुरूष के भेद का, लाभ-हानि के भेद का, जय-पराजय के भेद का, कुलीन-अकुलीन के भेद का, ज्ञानी-अज्ञानी के भेद का बर्ताव संसार है। द्वैत का दृष्टिकोण ही संसार है। संसार सिर्फ एक दृष्टिकोण है।
अस्तित्व अभेद है। चेतना अभेद है। जीवन अभेद है। अस्तित्व की, चेतना की, जीवन की उपलब्धि होते ही भेद मिट जाता है। संसार मर जाता है। अभेद में स्थित होते ही भेद मर जाता है। भेद का मर जाना ही संसार का मर जाना है।
संसार मर जाता है। जीवन रह जाता है। जीवन में स्थिति रह जाती है।
कबीर जीवन की बात करते हैं। जीवन-स्थिति की बात करते हैं, जो जीवन को जानने की अभीप्सा रखता है उस अवधू से बात करते हैं। वह अवधू से अपने अवबोध की बात करते हैं।
कबीर कहते हैं कि जैसे ही दीपक जल उठा, दीपक के प्रकाश में मैंने प्रेम को पा लिया। जीवन में ही जीवन धन बैठा हुआ था। जीवनधन को पाते हीे सौभाग्य जाग उठा। सुहाग जाग उठा। सुहाग की सिन्दूरी रेखा का अरुणिम आलोक जगमगा उठा। जगममा उठा तो सारा का सारा अँधेरा मिट गया। संसार मिट गया। संसार खो गया। संसार हेरा गया। संसार कुछ नहीं था, सिर्फ अँधेरा था। अँधेरे का प्रतिभास था।

मैं प्रेमी था। प्रिय को ढूँढ रहा था। बेचैन था। अपार विरह था। अथाह पीड़ा थी। दारूण दाह था। आठों पहर का दाझणा सहा नहीं जाता था। अपना होना असहनीय हो उठा। प्रिय के बिना प्रेमी का होना, होना नहीं होता। मैं मृत्यु मांगने लगा।
मैं मृत्यु मांगने लगा, मुझे जीवन मिल गया। प्रिय मिल गया। प्रिय मिल गया तो प्रेमी गायब हो गया, प्रेमी विलीन हो गया प्रिय में। बिना प्रेमी के प्रिय कैसे होगा। प्रेमी नहीं रहा तो प्रिय भी नहीं रहा। प्रेमी और प्रिय दोनों चले गये जाने कहाँ, बस प्रेम रह गया। द्वैत समाहित हो गया अद्वैत में। द्रष्टा समाहित हो गया। देखने वाला दिखने वाले में समाहित हो गया। अब बस दृश्य है।

अब कुछ नहीं है। बस जो कुछ भी है मेरे लाल की लाली हैं। उसी की आभा है। उसी का प्रकाश है। उसी की ध्वनि है। उसी का अर्थ है। सबकुछ में वही है। सबमें वही है।
मैं अपने लाल की, अपने महत्तम की लाली देखने को, महत्ता देखने को उत्सुक था। आकुल था। मैं लाली में समाहित होकर लाल हो गया। महत्तम की महत्ता में समाहित होकर महत्ता बन गया। महत्ता में मृत्यु नहीं है, केवल जीवन है। जीवन में मृत्यु नहीं है, महत्ता है।

लघुता में मृत्यु है। संसार लघुता में है। संसार और कुछ नहीं, सिर्फ लघुता है। लघुता का अर्थ है। लघुता मिट जाने के लिये ही है। संसार मर जाने के लिये ही है। मुमुर्षु की उपासना व्यर्थ है। मुमुर्षु की आराधना अकारथ है।
हमारी आशा का केन्द्र जीवन है। हमारी अभ्यर्थना का आश्रय जीवन है। हमारे प्रकाश का श्रोत जीवन है। हमारे सुहाग की लाली जीवन है। जीवन ही सबकुछ है। अमृत है। पूर्ण है।
जीवन में जीवन की आराधना के लिये कबीर जीवन में अभीप्सा रखने वाले अवधू से कहते हैं- अवधू, जीवत में कर आसा।

जयंतीः रामविलास पासवान ने दलित व गरीबों का किया उत्थान

रामविलास पासवान को श्रद्धांजलि अर्पित करते पासवान समाज के लोग। Young Writer
रामविलास पासवान को श्रद्धांजलि अर्पित करते पासवान समाज के लोग।

जगदीशसराय गांव स्थित पासवान बस्ती में धूमधाम से मनी जयंती

Young Writer, चंदौली। पूर्व केंद्र मंत्री स्वर्गीय रामविलास पासवान की जयंती बुधवार को जगदीशसराय गांव स्थित पासवान बस्ती में श्रद्धापूर्वक मनाई गई। इस दौरान बस्ती के लोगों ने उनके तैलचित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धा सुमन अर्पित किया। साथ ही दलितों के उत्थान में उनके द्वारा दिए गए योगदान व किए गए कार्यों को याद किया गया। इसके अलावा उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प भी लिया।
इस दौरान सपा नेता दिलीप पासवान ने कहा कि स्वर्गीय रामविलास पासवान का जन्म बिहार के खगरिया जिले के साबरमनी गांव में अत्यंत गरीब परिवार में हुआ था। दलित परिवार में पैदा हुए रामविलास पासवान भारतीय राजनीतिक के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वह 9 बार लोकसभा सांसद तथा दो बार राज्यसभा सांसद रहे। स्वर्गीय रामविलास पासवान 32 वर्षों में 11 चुनाव लड़ चुके थे और उनमें से नौ जीते। रामविलास पासवान जी एक ऐसे राजनेता थे जिन्होंने 6 प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने का अनूठा रिकॉर्ड भी अपने नाम किया। उन्होंने देश के प्रधान रहे बीपी सिंह, एचडी देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी बाजपेई, मनमोहन सिंह, नरेंद्र मोदी के साथ केंद्र की सरकार में रहते हुए दलित समाज व देश के गरीब व अशक्त वर्ग के उत्थान के लिए काम किया। उन्होंने खनिज मंत्री, केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री, रेल मंत्री, उपभोक्ता मामले के मंत्री व केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। अंत में सभी ने स्वर्गीय पासवान को पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। कहा कि दलित समाज के लिए उनके द्वारा दिए गए योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। इस अवसरपर वंसराज पासवान, शिवपूजन पासवान, उमेश पासवान, महेंद्र पासवान, लक्ष्मण पासवान, जयप्रकाश पासवान, दिलीप पासवान, अरविंद पासवान, नीरज पासवान, विकास पासवान, अरुण पासवान, राजेश रंजन, शिवा पासवान आदि पासवान मौजूद रहे।

गंगा कटान से छिन रहा किसानों का खेत व मकानः मनोज डब्लू

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गंगा तट पर कटान की समस्या को देखते सपा नेता मनोज सिंह डब्लू।


बोले, गंगा कटान समस्या का समाधान करने में भाजपा के लोग नाकाम
चंदौली। समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता व सैयदराजा के पूर्व विधायक मनोज सिंह डब्लू मंगलवार को गंगा तट पर पहुंचे। इस दौरान झमाझम बारिश के बीच उन्होंने गंगा कटान की भयावता को देखा और स्थानीय किसानों व ग्रामीणों के दर्द को महसूस किया। उन्होंने नौ साल चंदौली बदहाल अभियान को गति देने हुए न केवल भाजपा के सांसद व सैयदराजा विधायक की नाकामियों को गिनाया और नशाना साधा। साथ ही गंगा कटान रोकने के अपने असफल प्रयास पर भी दुख जताया।


इस दौरान उन्होंने कहा कि बारिश का मौसम है और गंगा कटान से तटीय इलाके के किसान परिवार खौफजदा हैं क्योंकि हर बार की तरह इस बार भी कई किसानों के खेत गंगा की धारा में समा जाएंगे, वहीं कुछ का आशियाना भी कटान की भेंट चढ़ जाएगा। जैसा कि विगत कई वर्षों से होता चला आ रहा है। कहा कि जब मैं निर्वाचित होकर विधानसभा पहुंचा तो नया-नया था और मैंने गंगा कटान के मुद्दे को कई बार पुरजोर तरीके से उठाया। लेकिन अनुभव की कमी के कारण समस्या को सही तरीके से रख नहीं सका। मैंने गंगा कटान की बात की, लेकिन कभी भी उसमें जिला, विधानसभा व क्षेत्र का उल्लेख नहीं किया। इस कारण चंदौली में गंगा कटान को रोकने से जुड़ी मांग अधूरी रह गयी। कहा कि वर्तमान में सांसद व सैयदराजा विधायक को जनता के बीच आकर यह बताना चाहिए गंगा कटान को रोकने के लिए क्या प्रयास किए। लेकिन वह ऐसा करने की बजाय जनहित में समस्या को उठाने वालों पर आईटीसेल के जरिए व्यक्तिगत हमला करने का काम कर रहे हैं जो दुखद व दुर्भाग्यपूर्ण है। कहा कि जनहित के मुद्दों पर भाजपा की पोल खोलने से सत्ता पक्ष के कई नेताओं के पेट में दर्द हो रहा है। जनता को जागरूक होता देख उसके पेसानी पर बल पड़ने लगा है। ऐसी में चंदौली जनपद में भाजपा का आईटी सेल सक्रिय हो गया है। यह भी कहा कि गंगा कटान से तटीय इलाके के किसानों व ग्रामीणों को निजात दिला पाना भाजपा के नेताओं की बस की बात नहीं है। भरोसा दिया कि विधायक बनने के बाद गंगा कटान जैसी गंभीर समस्या के निराकरण के लिए प्राथमिकता के साथ काम होगा, ताकि किसी का घर-मकान व खेत-खलिहान कटान की जद में आकर गंगा में समाहित ना हो सके।

Chandauli: जिला उद्यान अधिकारी अल्का श्रीवास्तव को दी विदाई

Young Writer, चंदौली। जिला उद्यान कार्यालय में मंगलवार को विदाई समारोह का आयोजन किया गया। इस दौरान जिला उद्यान अधिकारी अल्का श्रीवास्तव के बलिया स्थानान्तरण पर कार्यालय के कर्मियों व जनपद के अलग-अलग हिस्सों से आए किसानों ने बुके देकर भावभीनी विदाई दी और उन्हें एक अच्छा अधिकारी बताया। कहा कि उन्होंने सरकार की योजनाओं को अधिक से अधिक किसानों तक पहुंचाकर उन्हें लाभान्वित करने का काम किया। साथ ही समय-समय पर योजनाओं की जानकारी देकर किसानों को जागरूक भी किया।

विदित हो कि अल्का श्रीवास्तव ने बतौर जिला उद्यान अधिकारी दो वर्ष का कार्यकाल जनपद में पूरा किया। इस दौरान वे विभागीय योजनाओं को जनपद के किसानों तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहीं। इस दरम्यान कार्यालय के कर्मचारियों के प्रति भी उनका स्वभाव सहयोगात्मक रहा और उन्हें विभाग के मुखिया होने के नाते महकमे का कुशल नेतृत्व भी किया। इसके साथ-साथ किसानों की समस्या का कार्यालय स्तर पर समाधान करने के साथ ही योजनाओं को सीधे किसानों तक पहुंचाकर शासन के मंशा के अनुरूप अपने दायित्वों का निर्वहन किया। ऐसे में शासन स्तर से उनका तबादला बलिया जनपद होने की सूचना के बाद मंगलवार को कार्यालय में विदाई समारोह रखा गया। जिसमें कार्यालय के कर्मचारियों के साथ ही किसानों ने बुके आदि प्रदान कर विदाई दी। साथ ही उनके कार्यकाल को सदैव हम सभी याद रखेंगे। इस अवसर पर अनुराग सिंह, शुभेंद्र सिंह, शिवम सिंह लकी, धर्मेंद्र मिश्रा, अंकित यादव, हरिश्चंद्र पटेल व अन्य विभागीय कर्मचारी मौजूद रहे।

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