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Wednesday, July 22, 2026

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वह बात नहीं कहनी है

Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

हम, जो हैं भलीभाँति जानते हैं। अपने बारे में सच्ची बात सबसे अधिक हम ही जानते हैं। मगर हम अपने बारे में हमेशा यही चाहते हैं कि हम जो हैं, हमारी जो सच्चाई है, जिस सचाई को हम जानते हैं, दूसरे न जान पायें। मुझे लगता है, जीवन के आन्तरिक धरातल पर यह दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है, जो हमें बिल्कुल ही आश्चर्य जैसा नहीं लगता। ऐसा क्यों है?
मुझे लगता है मनुष्य जाति वास्तविकता में बहुत कम जीती है, सपने में अधिक जीती है। हम जो हैं, उसे स्वीकार नहीं करते। हम जो होना चाहते हैं, वहीं अधिक जीते हैं। यह अस्वाभिक नहीं है मगर विस्मयजनक जरूर है। जो है, वह सचाई है। जो चाहिये, वह सपना है। जीवन सिर्फ सचाई नहीं है। जीवन सिर्फ सपना नहीं है। जीवन में सचाई और सपने के संगम रोज-रोज, क्षण-प्रतिक्षण होते रहते हैं।
जीवन गतिशील है। गति लक्ष्य के प्रति होती है। जो है उसमें गति की कोई संभावना नहीं है। आकर्षण, जो चाहिए, उसके प्रति है। वही गति पैदा करता है। जीवन केवल यथार्थ भी नहीं है। जीवन केवल आदर्श भी नहीं है। जीवन यथार्थ और आदर्श का अन्तः संघर्ष है। जो मौजूद है, सिर्फ वही सच नहीं है। सच की शाखायें जो नहीं है, उसमें भी फैली हुई हैं। जीवन में रस हमेशा ही मनुष्य को संभावनाओं में अधिक लुभाता रहता है।
हम अगर ध्यान से देखें तो पायेंगे कि हमारे जन-जीवन का अधिकांश जो है, उसे नकारने में, उसे अस्वीकारने में और उसे छिपाने में लगा हुआ है। यह बड़ी बेधक विडम्बना है। गरीब से गरीब आदमी अपने को गरीब मानना नहीं चाहता। भिखमंगा भी अपने को भिखमंगा देखना नहीं चाहता। बेईमान से बेईमान आदमी अपनी पहान बेईमान के तौर पर नहीं चाहता। आदमी को चोरी करने से कोई परहेज नहीं है, डर नहीं है। डर है तो सिर्फ इस बात से कि वह चोर के रूप में पहचाना न जाय।
हमारी सारी शुचिता और नैतिकता का हमारे एकान्त में कोई मूल्य नहीं है। उसका मूल्य है, भीड़ के सामने। उसकी कीमत है, प्रदर्शन में। हमारी सारी शुचिता और नैतिकता के मूल्यों का बाजारू बन जाना हमारे लिये कितना ग्लानि का विषय है, हम नहीं जानते। हम नहीं जानते कि हमारे जीवन में सारे के सारे ग्लानि के विषय गर्व के विषय के रूप में क्यों बदलते जा रहे हैं?
हमारे समय में व्यापक जनवर्ग के सामने भीषण चुनौतियाँ मुँह फारे खड़ी है। हमारे सामने जीवन-यापन के ढंग और ढर्रे इतने मुश्किल होते जा रहे हैं कि हमारा जीना ही दुश्वार बनता जा रहा है। अब तो धीरे-धीरे सामान्य आदमी के लिये अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला पाना भी उसके बूते के बाहर होता जा रहा है। शिक्षा की सुलभता की सरकार की घोषणाएँ जनता के जले जी पर नमक छिड़कने जैसी पीड़ा पैदा करने के अलावा किसी काम की नहीं है। एक जनतांत्रिक देश में जनता के लिये कहे जाने वाली शासन व्यवस्था में शिक्षा का आदमी की पहुँच से बाहर हो जाना कैसा पीड़ादायक है, कह पाना मुश्किल है। शिक्षा इतनी महँगी क्यों होती जा रही है? आदमी अपनी बीमारी का इलाज कराने में असमर्थ क्यों होता जा रहा है? विकास के वंचक नारों के शोर के बीच इन सवालों को सुनने वाला कोई नहीं है। हमारे समय में जीवन से जुड़े सवाल राष्ट्र विरोधी सवाल बन गये हैं। राष्ट्रविरोधी बनने के कलंक के डर से हमारे समय का हलक सूख रहा है।
पढ़ाई हमारे हाथ से बाहर हो जाय कोई बात नहीं, हमें चुप रहना है। दवाई हमारे हाथ से बाहर हो जाय कोई बात नहीं, हमें चुप रहना है। घर बनाना, शादी-ब्याह रचाना हमारे हाथ से बाहर हो जाये कोई बात नहीं, हमें चुप रहना है। हमें चुप रहकर, चुप्पी मारकर बस जिन्दा रहना है। हमें जिन्दा रहना है, सिर्फ इसलिये कि हमें पोलिंग बूथ जाकर वोट डालना है। जबान बन्द रखकर वोट करते जाना राष्ट्रभक्ति है। जीवन की दुश्वारियों के बारे में कुछ भी कहना राष्ट्रद्रोह है। हमारे देश में इतने तरह के विद्यालय क्यों हैं? तरह-तरह के विद्यालय क्यों हैं? इतने तरह के अस्पताल क्यों हैं? हमारी पहुँच से बाहर के अस्पताल क्यों हैं? नहीं ये सब गैर मुनासिब सवाल हैं। ये सब शान्ति भंग के सवाल हैं। इनके पूछने पर हमारे कानून में सजा के प्राविधान सुनिश्चित हैं।
हम जिस जगह पर हैं और जिस महफिल में जमे रहने की जद्दोजहद में लथपथ हैं, वहाँ हमारा बने रहना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। स्थितियाँ विपरीत होती जा रही हैं। हम पढ़ाई के लिये, दवाई के लिए, शादी के लिये कर्ज लेने को, जमीन-मकान बेचने को मजबूर होते जा रहे हैं। हम रोज-रोज अपनी विरासत की गाँठ गँवाते जा रहे हैं।
मैंने बचपन में एक कहानी सुनी थी। तब वह कहानी केवल हँसने के काम की चीज थी। अब वह कहानी मुझे बार-बार याद आती है, मगर हँसी नहीं आती। लगता है, वह कहानी हमारी ही कहानी है, हम सबकी कहानी है। उस कहानी में अपना ही व्यापक विषाद है। अपने पर ही फूटने वाली बेधक करुणा है।
कहानी है कि एक बाबू साहब की बारात में एक लाला जी बाराती बनकर गये थे। जनवास के दिन दोपहर में तवायफ के नाच के लिये महफिल सज रही थी। उसी बीच लाला जी को पेट में गुड़गुड़ी महसूस हुई। उन्होंने सोचा, चलो महफिल शुरू होने से पहले ही निपट लेते हैं। बाद में बेवजह बाधा होगी। लाला जी ने पंडाल के बाहर मिट्टी की मेटी में पानी भरा और खेत की तरफ निकल गये। कुछ दूर जाकर माटी के ढूहे की आड़ में हाजत के लिये बैठ गये। जैसे ही लाला जी का पेट साफ हुआ, मिट्टी का मटका बिहला गया। शायद मटका ठीक से पका नहीं था। सारा पानी बह गया। लाला जी हैरान, परेशान। अब क्या करें? चारों तरफ आँख फैलाकर देखा। कोई दिखा नहीं। लाला जी आश्वस्त हुये। चलो कोई देख नहीं रहा है। यही क्या कम है। उन्हें सुकून हुआ। कोई दूसरा उपाय संभव न देखकर उन्होंने मिट्टी के ढ़ेले से विलायती ढंग से शौचमुक्ति का काम सम्पन्न किया। फिर आये। आकर बड़े शान के साथ महफिल में अपना आसन जमा लिया।
जब लाला जी महफिल में जमे तवायफ की नाच शुरू हो चुकी थी। वह मंडलाकार, घूमकर नाच रही थी। गाना सम पर आया और नर्तकी ने लाला जी के ठीक सामने झुककर बड़ी अदा से गाने के बोल अर्ज किये,- ‘लाला तेरी बतिया मैं कह दूँगी।’’
लाला जी का कलेजा काँप उठा। उन्हें बड़ी हैरानी हुई। आखिर यह ससुरी कैसे जान गई। जो भी हो, जान गई तो जान गई। मगर कह देगी तो? बड़ी भद्द होगी। आबरू उतर जायेगी। नहीं, नहीं कहने नहीं देना होगा।
लाला जी ने निश्चय किया। नहीं, कहने नहीं देना है। उन्होंने अपनी धोती का फेंटा खोला चटपट। दो रुपये का कड़क नोट निकाला और मुस्कराते हुय बड़ी उत्फुल्लता से ईनाम पेश किया। नर्तकी खुश हुई। उसका चेहरा चमक उठा। पाँव थिरक उठे। उसने समझा लाला जी को गाने के बोल की उसकी अदायगी बेहद पसन्द है।
नर्तकी घूम-घूमकर लाला जी के सामने आती है। बोल दुहराती रही। लाला जी बख्शीश देते रहे। लाला जी चुप कराते रहे। वह गाती रही। गाना लम्बा खिंचता रहा। लाला जी की गाँठ खाली हो गई। वे धीरे से उठे आँख बचाकर महफिल से और तम्बू से बाहर हो गये। गाने के बोल फिर भी उनके कानों में बजते रहे,- लाला तेरी बतिया मैं कह दूँगी।’’
मैं देख रहा हूँ, हमारे समय में हर कोई लाला जी की तरह हैरान है, परेशान है। हम अपनी आन्तरिक शुचिता का मूल्य अपने एकान्त में भूल चुके हैं। हम हर क्षण आशंकित हैं, हमारी आन्तरिक सचाई कोई जान तो नहीं गया है।
इधर बाजार है कि हमारे वजूद की रत्ती-रत्ती सचाई समझ रहा है। वह हमारी सामर्थ्य भी भली-भाँति जान रहा है और हमारी लाचारी भी अच्छी तरह समझ रहा है। वह हमारी लाचारी से अपना लाभ भुनाने में लगा है। बाजार हमें दुह रहा है। हमारा दोहन करने में जी-जान से लगा है। वह विज्ञापन की भाषा में नये-नये गाने गढ़ रहा है। आकर्षक स्त्री स्वर में गा रहा है। रिझा रहा है। हम अपनी विरासत की गाँठ लुटा रहे हैं। लुटाते जा रहे हैं। फिर भी……।
फिर भी…..। फिर भी सवाल है कि क्या, हम जहाँ है, हम जिस दिखावे की नकली महफिल में जमे रहना चाह रहे हैं, वहाँ जमे रह पायेंगे। शायद नहीं। कर्ज लेकर, जमीन बेंचकर, मकान गिरवी रखकर वहाँ जमे रहना लम्बे समय तक मुमकिन नहीं है। हमारी गाँठ, खाली होनी ही है। हमें महफिल से बाहर होना ही है। हम बाहर होंगे मगर अपने गाँठ की सारी पूँजी गँवाकर।
जब-जब यह कहानी मुझे याद आती है, मेरा मन उदास हो जाता है। मुस्कराने की कोशिश करते अनगिन चेहरों के नीचे उफनता अवसाद गरजता हुआ सुनाई पड़ने लगता है। मैं अपने ही भीतर कहीं अस्फुट स्वर में अज्ञेय के खोये स्वर ढूंढने लगता हूँ-
‘‘अच्छी कुंठा रहित इकाई, साँचे ढले समाज से।
अच्छा अपना ठाट फकीरी, मँगनी के सुख् साज से।।’’
मैं देख रहा हूँ, हमारे समय में मँगनी के सामानों की महफिल से फकीरी ठाट मुँह लटकाये भ्रमवश जीवन संचित मधुकरियों की भीख लुटकर बाहर निकलता जा रहा है।

अभिनय की प्रतिष्ठा

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

हमारे समय में जीवन और व्यवस्था से जुड़े तमाम मुद्दों पर लोगों के बीच भारी मतभेद है। मगर अभिनय की श्रेष्ठता हर आदमी को एकमत से स्वीकार है। निर्विवाद रूप में हर क्षेत्र में अगर कोई उल्लेखनीय उपलब्धि है, तो वह अभिनय की प्रतिष्ठा है।
अभिनय निश्चित तौर पर प्रशंसनीय कला है। अभिनय की कला से हम इतने प्रभावित हुये हैं कि हमने उसे अपना समूचा जीवन ही समर्पित कर दिया है। अभिनय हमारे दिल-दिमाग में प्रवेश कर गया है। घुसकर उसने अपनी जगह बना ली है। जगह क्या बना ली है, समझिये कि पूरी जगह ही हथिया ली है। हमारे समय में अभिनय हमारा आचरण बन गया है।
अभिनय का आचरण बन जाना कैसा है, हमें नहीं मालूम। जैसा भी हो क्या फर्क पड़ता है। है तो, है। अभिनय आदमी का स्वभाव नहीं है। स्वभाव की अनुकृति है। अपने स्वभाव से बाहर निकल कर दूसरे के स्वभाव का अनुसरण, अभिनय होता है। जो अपना नहीं है, दूसरे का है, उसे अपना बना लेना अभिनय है। जो असली नहीं है, उसे असली की तरह, दिखा देना अभिनय है। नकली में असली का विश्वास पैदा कर देना अभिनय है। हमारे समय में अभिनय हमारा धर्म बन गया है। हमारा राष्ट्रधर्म बन गया है। क्या हमारे समय में हर आदमी अपने स्वभाव के निषेध में तल्लीन है। हर आदमी किसी दूसरे की नकल में तत्पर है। हर आदमी नकली को असली बनाने में, बनाकर हर किसी को दिखाने में निरत है। हर आदमी जो अपना नहीं है, उसे अपना बनाने के उद्योग में लगा है। कितना अद्भुत है।
अभिनय का आचरण में बदल जाना कितना अद्भुत है। शायद इसका हमें पता नहीं है। जो है, उसका हमें पता नही ंहोना कितना अद्भुत है। अपने निरन्तर नकली होते जाने की प्रक्रिया का हमें पता नहीं होना कितना अद्भुत है। अभिनय का सिनेमा के पर्दे से निकल कर जन-जन में व्याप्त हो जाना कितने विस्मय की बात है। मगर बात कुछ जन की नहीं हैं। एक-दो जन की बात होती तो कुछ बूझने की बुझाने की गुंजाइश भी रहती। यहाँ तो कूपहिं में भाँग पड़ी है। नहीं, कुँए में ही नहीं, कुँए कुएँ में हर कुएँ में भाँग पड़ी है। फाग कही नहीं है। भाँग, हर कहीं हैं। आनन्द कहीं नहीं है। उल्लास कहीं नहीं है। नशा हर कहीं है।
हमारे समय में हर नेता अभिनेता बनने को प्राण-पण से जूझ रहा है। इस कला की साधना में उसने अपना सारा समय और समूचा स्वत्व समर्पित कर दिया है। सत्ता पर कब्जा पाने के लिये कोई भी अभिनय से उसे इंकार नहीं है। किसी को अपना चेहरा याद नहीं है। किसी का अपना चेहरा नहीं है। मुखौटे हर किसी को याद हैं। हर किसी की स्मृति का भंडार मुखौटों से भरा पड़ा है। अभिनेताओं के पाँव तो राजनीति में अंगद के पाँव बन ही गये हैं। अभिनेताओं के नेता बनने की प्रक्रिया हमारे समकालीन जीवन में अभिनय की अपूर्व प्रतिष्ठा का पक्का सबूत है।
हम खुश नहीं हैं, रत्तीभर भी मगर चेहरे पर खुशी का पाउडर पोत कर घूम रहे हैं। हजार तरह के भय भरे हुये हैं भीतर। मगर निडरता का क्रीम चेहरे पर मलकर चमकाये चल रहे हैं। लोभ भरा हुआ है लबालब अंदर छलक-छलक पड़ रहा है आँखों से मगर त्याग का भाषण झाड़े जा रहे हैं। हम अन्दर बिल्कुल खाली हैं, मगर बाहर, बाहर भरा-भरा दिखने में, दिखाने में व्यस्त हैं। जो है, उसे हम पूरी ताकत लगाकर ढाँक-तोप रहे हैं। जो नहीं है, उसे सब तरह से सबको दिखा देने को बेकल हैं। हमें पता नहीं है कि हम क्या कर रहे हैं। हमारे समय की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि हम जो कुछ कर रहे हैं, उससे हम वाकिफ नहीं हैं। हम यह जानने को उत्सुक ही नहीं हो पा रहे हैं कि हमारे लिये घरों में भी ‘मेकअप’ में रहने की हमारी लाचारी हमारे लिये कितनी दुर्भाग्यपूर्ण है। हमारे घरेलू खर्च में ‘मेकअप’ का बढ़ता हुआ दबाव हमें भीतर से और बाहर से कितना कमजोर करता जा रहा है, हमें मालूम नहीं पड़ रहा है।
पहले हम नाटक देखने के लिये घर से बाहर जाया करते थे। अब हम घर में खुद ही नाटक करने लगे हैं। हम ही नाटक खेल भी रहे हैं, देख भी रहे हैं। पहले हम ‘मेकअप’ का तमाशा देखने ‘थियेटरों’ और सिनेमाघरों में जाया करते थे। अब ‘मेकअप’ का तमाशा हमारे घरों में घुस आया है। इतने तक भी गनीमत थी। इतने तक भी हमारे जीवनबोध को उतना खतरा नहीं था। हमारी परम्परा में गृहस्थ घर में रहता था। बाहर आता था, जाता था मगर रहता था घर में। वह घर में स्थित होता था। घर में स्थित होकर हर कहीं उपस्थित होता था। आज कोई भी घर में नहीं है। किसी के पास अपना घर नहीं है।
हमारे घर से, हमारा घर लापता हो गया है और हमें पता नहीं है। हमारे ही भीतर से हमारा विश्वास लापता हो गया है और हमें पता नहीं है। हमारे लाभ में से हमारा शुभ गायब हो गया है और हमें पता नहीं है। हमारे समय में जो हमारा लाभ है, वह शुभ नहीं है, न अपने लिये, न अपनों के लिये, दूसरों के लिय तो बात ही छोड़िये। ऐसा क्यों है?
उत्तर आसान नहीं है। यह भी सच है कि इस जीवन स्थिति के पीछे कोई एक-दो कारण नहीं है। अनेकों हैं। मगर हमें लगता है कि जो प्रमुख कारण है, वह हमारा अभिनय का आचरण है। हमारा समूचा आचरण ही अभिनय बन गया है। बनता जा रहा है। अब तो स्थिति यहाँ तक आ गई है कि आदमी खुद के समक्ष भी अभिनय कर रहा है। किसान खेती कर नहीं रहे हैं, खेती करने का अभिनय कर रहे हैं। मजदूर, मजदूरी नहीं कर रहे हैं, मजदूरी करने का अभिनय कर रहे हैं। अध्यापक पढ़ाने का अभिनय कर रहे हैं। छात्र पढ़ने का अभिनय कर रहे हैं। अधिकारी, अधिकारी होने का अभिनय कर रहे हैं। बुद्धिजीवी, अपने बुद्धिजीवी होने का अभिनय कर रहे हैं। अभिनय साहित्यकार भी कर रहे हैं। खण्डित और क्षुद्र कालखण्डों के जीवन स्थितियों की बोध विहीन उत्तेजनाओं के सहारे कुछ भी लिखकर साहित्यकार होने की दुर्ललित वासना साहित्य के समग्र बोध को खण्डित करने का अभिनय सीख रही है। हम कर कुछ और रहे हैं मगर करते हुय कुछ और दीख रहे हैं। हम करना कुछ और चाहते हैं मगर कर कुछ और रहे हैं। हम जो कुछ भी कर रहे हैं, बिना मन के कर रहे हैं। हम जो कुछ भी कर रहे हैं, बिना रस के कर रहे हैं। हम अपने काम में अपने को जोड़ नहीं पा रहे हैं। सचमुच हमारे समय की यह कैसी विचित्र विडम्बना है।
हमारे जीवन की जड़ सूख रही है। हम निश्चिन्त नहीं हैं। हम चिन्तित हैं जरूर। हम उद्विग्न हैं। उद्विग्नता में हम पत्ता-पत्ता सींच रहे हैं। हम पत्ता-पत्ता सींच रहे हैं। जड़ प्यासी-प्यासी है। हम सींचते जा रहे हैं। सींचने में अफनाते जा रहे हैं। हरियाली सूखती जा रही है। हमारे वृक्ष छायाहीन होते जा रहे हैं। फलहीन होते जा रहे हैं। हम अपना घर ढूंढने बाजार में हलकान हैं। हम भूल गये हैं, घर बाजार में नहीं मिल सकता। हम भूल गये हैं अभिनय, आचरण नहीं है। हमारे समय में अभिनय की प्रतिष्ठा, आचरण की अप्रतिष्ठा से अलग नहीं है।

इतिहास की गवाही के बिना

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

हिन्दी साहित्य के इतिहास में बहुत से कवि ऐसे हैं, जिन्हें जानने के लिये आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का इतिहास पढ़ना जरूरी है। मगर बहुत कवि ऐसे भी हैं, जिन्हें लोग शुक्ल जी का इतिहास बिना पढ़े भी जानते हैं।
इतिहास का गवाह होना बुरा नहीं है। मगर इतिहास का अस्तित्व का प्रमाणकर्ता हो जाना जरूर अखरने की बात है। शुक्ल जी तक तो गनीमत है। मगर उसके बाद का इतिहास नियामक की भूमिका में फोटो को प्रमाणित करने वाले राजपत्रित अधिकारियों के हस्ताक्षरों का कार्यालयी दस्तावेज बनने की प्रक्रिया में अग्रसर दिखाई देता है। अपने पक्ष और अपनी पसंद को इतिहास के अध्याय बनाने के खड़यन्त्र इतिहास की विश्वसनीयता को ही संदिग्ध बनाने वाले बनते जा रहे हैं। इतिहास व्यक्तिगत पसन्द का अभिलेख नहीं है। व्यापक जनजीवन की भावनाओं के साथ जुड़ाव की परवाह किये बगैर श्रेष्ठता की स्थापनाएँ इतिहास की जवाबदेही के छद्म व्यवहार की पक्की निशानदेही हैं। मगर यहाँ बात इतिहास के बारे में नहीं करनी है।
जो कवि बिना इतिहास पढ़े स्मृति में आ जाते हैं, कभी भूलते नहीं। परीक्षा में उनके बारे में प्रश्न न भी पूछे जायँ, कोई फर्क नहीं पड़ता। परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण कवियों के जीवन परिचय और कविता जो बड़े श्रम से याद की जाती है, परीक्षा बीतने के बाद ही भूल जाती है। जो याद नहीं किया जाता, जिसे याद नहीं करना पड़ता, याद रह जाता है। नरोत्तम दास से मेरा परिचय सहज ही बहुत बचपन में प्रारंभिक कक्षाओं में पढ़ते समय हो गया था। उनकी सरल-सी सीधी-साधी भाषा में कुछ सवैये, कुछ कवित्त जो स्मृति में आये फिर गये नहीं। वे एक बार आकर ठहर गये। बस गये। क्या स्मृति में आकर ठहर जाना कविता का बड़ा गुण है? अवश्य है। मैं कहना चाहता हूँ कि नरोत्तमदास बड़े कवि हैं। उनकी कविता बड़ी कविता है। उनकी कविता मूल्यवान कविता है।
कविता के मूल्यवान होने के केवल एक-दो या कुछ गिने हुये ही कारण नहीं होते। जितने कारण साहित्यशास्त्र के ग्रंथों में गिनाये गये हैं, उतने ही नहीं होते। उनके अलावा भी बहुत से कारण अनगिने भी बचे रह जाते हैं, जिनकी वजह से कविता मूल्यवान होती है। नरोत्तमदास की कविता गिने-गिनाये कारणों से बचे रह गये कारणों के कारण मूल्यवान कविता है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने इतिहास में नरोत्तमदास का उल्लेख सम्मानपूर्वक किया है। उन्हें सीतापुर जिले के बाड़ी कसबे का रहने वाला बताया है। शुक्ल जी ने उनकी भावुकता और भाषा की प्रशंसा की है। उन्हें नरोत्तमदास की कविता में घर की गरीबी का वर्णन सुन्दर लगता है। घर की गरीबी का सुन्दर वर्णन नरोत्तमदास जानते हैं। आचार्य शुक्ल उसे पहचानते हैं। गरीबी का सुन्दर वर्णन गरीब होने मात्र से संभव नहीं है। गरीब होकर भी गरीब न होने से संभव है। नरोत्तमदास गरीब होकर भी गरीब न होने वाले कवि हैं। जिन लोगों को गरीबी गरीब बनाने में हार जाती है, वे ही कवि बन पाते हैं। नरोत्तमदास की कविता गरीबी को हरा देने वाली कविता है। गरीबी में गर्व का होना ही कविता का होना होता है, क्या? लगता तो है।
स्मृति में ठहर जाना बड़ा सरल है मगर बड़ा विरल है। स्मृति में तो बहुत-सी चीजें आती हैं, मगर ठहर नहीं पातीं। कुछ-कुछ चीजें ही ठहर पाती हैं। ठहरने की शक्ति बड़ी विलक्षण शक्ति है। नरोत्तमदास की कविता विलक्षण कविता है। वे जीवन के विचक्षण कवि हैं। उनकी कविता में जीवन की गहराई की थाह है। जिन्दगी की अथाह गहराई को भाषा में रस की तरह भरने की अद्भुत सामर्थ्य है। उनकी कविता समर्थ कविता है।
नरोत्तमदास की कविता गरीबी की लघुता की कविता नहीं है। दीनता के दाँत निपोरने की कविता नहीं है। उसमें दैन्य की कातरता नहीं है। याचना नहीं है। उनकी कविता गरीबी में सौन्दर्य का सृजन करने वाली कविता है। उनकी कविता गरीबी में दीप्ति पैदा करने वाली कविता है। दमक पैदा करने वाली कविता है। उनकी कविता मैत्री के गरिमामय महाख्यान की कविता है। यह महाख्यान बहुत छोटा है। मगर कितना बड़ा है। नरोत्तमदास की कविता इसलिये अविस्मरणीय कविता है कि उसने समूची हिन्दी जाति को मित्रता की महनीयता का महामंत्र उपलब्ध कराया है। ‘सुदामा चरित’ सिर्फ कहने के लिये सुदामा चरित है। वास्तव में वह मित्र चरित है। सुदामा चरित में सुदामा का होना सुदामा के लिये नहीं है, कृष्ण के लिये है। कृष्ण के सन्दर्भ में ही सुदामा के होने का अर्थ है।
जिसके ‘सीस पगा न झगा तन में‘ है। जिसकी कोई पहचान का सूत्र नहीं, – ‘प्रभु जाने को आहि बसैं केहि ग्रामा। जो परिचय विहीन है। जिसकी ‘धोती फटी-सी लटी दुपटी’ है। जो नंगे पैर है। जो महल को देखकर चकित है। जो कृष्ण का ठौर पूछ रहा है। कितना तुच्छ है, सुदामा। वही सुदामा पल भर में मित्रता की पारसमणि से छूकर कितना महनीय हो जाता है। कितना स्पृहणीय हो उठता है। उसकी गरीबी कितनी गर्वीली हो उठती है, जब कृष्ण राजकाज त्याग कर दौड़ पड़ते हैं। दौड़कर सुदामा को अँकवार में भर लेते हैं। गरीबी कितनी इठलाने के योग्य सौभाग्य में बदल जाती है। नरोत्तम की कविता गरीबी के सौभाग्य में बदलने के रसायन के अनुसंधान की कविता है। उनकी कविता भारतीय जाति की अनाहत अभीप्सा की कविता है। उनकी कविता पारस्परिकता के जयगान की कविता है। उनकी कविता संबन्धों की पवित्रता के पाँव परात के पानी को हाथ से छुये बिना नैनन के जल से धोने के अनुष्ठान की कविता है। कितनी गौरवपूर्ण कविता है।
सुदामा की गरीबी में दंश नहीं है। लोभ नहीं है। अमर्ष नहीं है। केवल जीवन के प्रति अकुंठ आस्था है। कोदो-साँवा का भात भी भरपेट मिल जाय तो दूध-दही और मिष्ठान्न की लिप्सा नहीं है। उनकी गरीबी लोलुप नहीं है। उनके घर में जो गरीबी है, उसके प्रति उनके मन में, दुत्कार नहीं है। जुगुप्सा नहीं है। सहिष्णुता का अभाव नहीं है। शायद, इसी वजह से कविता में गरीबी के चित्र सुंदर बन पड़े हैं। गरीबी का सुन्दर चित्र अस्वाभाविक तौर पर एक विलक्षण उपलब्धि है, जो चित्त को चमत्कृत करता है।
नरोत्तम की कविता राजा के मित्र होने की कविता है। भारतीय जाति के मन में स्थित राजा के मित्र होने की अदम्य आकांक्षा की कविता है। क्या हमारे मन की आकांक्षा कविता की उत्प्रेरणा नहीं है? यह सच है, यह आकांक्षा एक अघटनीय असंभावना है। मगर असंभावना में भी संभावना के द्वार कविता में खुलते रहे हैं। यहाँ तो बात कुछ और ही है। यहाँ तो असंभावित सच आँखों के आगे नाच रहा है। नरोत्तम की कविता अपने समय के सबसे विपन्न आदमी और सबसे सम्पन्न आदमी की मैत्रीपूर्ण पारस्परिकता के सच की कविता है। दुर्लभ कविता है।
नरोत्तम की कविता अपने समय के सबसे छोटे आदमी और सबसे बड़े आदमी के बीच की पारस्परिकता के सच के साक्ष्य की कविता है। यह मनुष्य जाति के जीवन में निराशा और अविश्वास के अछोर विस्तार के बीच आश्वासन की गवाही की कविता है। इतिहास के लिये यह बड़ी मूल्यवान कविता है। स्मृति में इस कविता का बचे रहना, बने रहना मनुष्य जाति के जीवन में पारस्परिकता की महत्ता के बचे रहने की निशानी है।
पांचाल नरेश द्रुपद अपने मित्र द्रोण को उनकी याचना के बावजूद एक गाय नहीं दे सके। यह भी सच है। मित्रता के धिक्कार का यह राजधर्म भी सच है। वहीं द्वारिकाधीश कृष्ण सुदामा की दीनदशा देखकर रोने लगते हैं। कृष्ण अपने वैभव के बराबर वैभव सुदामा को बिना मांगें दे देते हैं। कृष्ण का देना देखकर रूक्मिणी घबरा जाती है। यह दान नहीं है। यह मित्रता का मान है। यह राजा और प्रजा की पारस्परिकता में मैत्री का अपूर्व गौरव है। नरोत्तम की कविता इसी गौरव का गान है। यह कविता हमारी स्मृति में संचित विरासत की कविता है।
नरोत्तमदास की कविता इतिहास में दर्ज भक्ति-काव्य के फुटकर खाते से निकलकर मेरी स्मृति में बराबर कौंध जाती है। हमारे समय में हमारे लोकतंत्र का गौरव है। लोकतंत्र की गरिमा का वितान हमारे सिर के ऊपर तना है। सहिष्णुता के विज्ञापन हमारी आँखों के आगे चमक रहे हैं। पारस्परिकता के प्रचार के नारे हमारे कानों में गूँज रहे हैं। बन्धुत्व के विरद हमारे समय के संचार माध्यम गा रहे हैं।
अपने बन्धुत्व से वंचित समय में नरोत्तमदास के मैत्री के महाख्यान की कविता का अर्थ मैं बार-बार सोचता हूँ। उनकी कविता की उपस्थिति बेचैन करने वाली उपस्थिति से भिन्न नहीं है।

लला फिरि आइयो खेलन होरी

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

पद्माकर बड़े विदग्ध कवि हैं। विदग्धता उनकी वाणी में बगरी हुई, विथुरी हुई है। प्रायः घरों में कीमती और बेशकीमती चीजों के होने के स्थान होते हैं। नियत जगह पर, जो कुल जगह में बहुत कम होती है, मूल्यवान को पाया जा सकता है। मगर पद्माकर की कविता का घर ऐसा है, जहाँ हर जगह मूल्यवान ही बिखरा पड़ा है। जहां जी चाहे देख लो। जहाँ मन आये पा लो।
जब वाणी विदग्ध हो जाती है, शब्द, शब्द नहीं रह जाते। शब्द भावसत्ता के विग्रह बन जाते हैं। शब्द भावराशि के रत्नाकर बन जाते हैं। बूँद में समुद्र समाहित हो जाता है। शब्दों से अर्थ निकालने की चीज नहीं रह जाता। अर्थ बहने लगता है। शब्दों से फूटकर अर्थ अनेक धाराओं में बह उठता है। शब्दों में जीवन व्यापार के दृश्य बोलने लगते हैं। कविता में शब्द का शब्द न रह जाना ही कविता का होना होता है, क्या? जहाँ शब्द अपनी लघु सत्ता को उलाँघ कर विराट सत्ता में विलीन होने लगते हैं, उस जगह का ही नाम मनीषियों ने कविता रख रखा है। कविता वाणी की विदग्धता में व्याप्त शक्ति है।
यह विदग्धता क्या चीज है? मैं नहीं जानता। मगर बड़ी अद्भुत है, यह जानता हूँ। समूची अस्मिता को आच्छादित कर लेती है, यह जानता हूँ। विदग्धता प्राणों को आप्यायित कर देती है, यह जानता हूँ। रसतोष से अस्तित्व को परिप्लुत कर देती है, यह जानता हूँ। मगर यह सब तो उसका प्रभाव है। प्रभाव जानता हूँ मगर पहचान नहीं जानता। उसकी परिभाषा नहीं जानता। जान भी कैसे सकता हूँ? मैंने तो वैयाकरणों के कुल की गरिमा का द्वार भी नहीं देखा है।
कभी-कभी मन में आता है कि जो कुछ भी जल जाने के योग्य है, उस सबके जलकर मिट जाने के बाद, जो बचा रह जाने योग्य है, वही विदग्धता है, क्या? कभी नष्ट न होने वाली, हमेशा बची रहने योग्य जो है, वही विदग्धता है, क्या? कभी नष्ट न होने वाली, हमेशा बची रहने वाली भाषा की विरासत को ही विदग्धता कहा जाता है, क्या? जो भी हो! छोड़िये। यह सब अपने वश का नहीं है। अपने बूते का नहीं है। फिर बात का छोर तो पद्माकर से जुड़ा है। पद्माकर की एक कविता है –
‘‘फागु की भीर, अभीरिन में गहि गोविन्दै लै गई भीतर गोरी।
भाई करी मन की पद्माकर, ऊपर नाई अबीर की झोरी।
छीनि पितम्बर कम्बर तें सु विदा दई मीड़ि कपोलन रोरी।
नैन नचाय कहीं मुसुकाइ, लला फिरि आइयों खेलन होरी।।’’
इस कविता में वसन्त के ब्याज से, होली के बहाने गूढ़ प्रेम व्यापार की प्रगल्भ व्यंजना की अनुगूँज व्याप्त है। व्यापार तो बस कहने भर को है, गूँज ही गूँज रही है।
द्वैत में अद्वैत के बोध की लीलाभूमि, ब्रजभूमि में फाग की धूम मची है। ब्रज भूमि, ब्रजन की भूमि है। विचरण की भूमि है। लीलोत्सव की भूमि है। लीला का उत्सव क्या है? ठहरी हुई चेतना के स्थिर केन्द्र पर काया के क्रियाशील वृत्त का ऐश्वर्य। ब्रज में राग के ऐश्वर्य का उत्सव हो रहा है। फाग की भीर मची है। भीड़-भाड़ में धक्का-धुक्की मची है। छीना-छोरी मची है। ठेलम-ठेल मची है। सब बेखबर है। किसी को अपनी खबर नहीं है। खबर है, तो राधा को है। उन्हें अपनी खबर है। अपने प्रिय की खबर है। अपने प्रेम की खबर है। वे प्रेम की पुजारिन हैं। उनकी साधना आनन्द के लिये नहीं ही प्रेम के लिए है। उनका प्रेम आनन्द के लिये नहीं है। उनका प्रेम, प्रेम के लिये है। उनका प्रेम प्रिय के लिये है। राधा को कुछ नहीं चाहिए। चाहिए तो केवल कृष्ण चाहिये।
फाग की भीर में राधा कृष्ण को पा लेती हैं। पा लेती हैं तो गह लेती हैं। गहना, पकड़ना नहीं है। पकड़ने से बहुत अधिक गहराई है, गहने में। इसमें आन्तरिकता की संम्पृक्ति की ध्वनि अधिक प्रभावी है, बाह्य पकड़ की बहुत कम। राधा, कृष्ण को गहकर भीर के बीच से उन्हें अभीर में- एकान्त में, ले जाती हैं। प्रिय को लेकर भीड़ में हो पाना संभव ही नहीं। प्रेम हमेशा आदमी को एकान्त में ले जाता है। एकान्त में स्थित करता है। राधा, रसराज, रसिकराज गोविन्द को भीड़ से, कोलाहल से अलग एकान्त में पाती हैं तो मन को भाने वाला सब कुछ करती हैं। जो मन आया सो किया। जो-जो मन भाया सो-सो किया। फाग का प्रयोजन पूरा हो गया।
फाग का प्रयोजन क्या है? शायद सबको पता है। सबको पता हो, न हो, मगर राधिका को पूरा पता है। पूरा-पूरा पता है। उन्हें पता है कि अपनी आन्तरिकता के रंग में अपने प्रियजन को रंग देना और अपने प्रिय की आन्तरिकता के रंग में रंग जाना ही फाग है। आन्तरिकता के समस्त भावों का तरल होकर उमड़ पड़ना ही रंग है। आन्तरिकता के विविध रंग ही रंगों की बहुवर्णी विविधता हैं। आन्तरिकता की विविधता में, स्निग्धता में, तरलता में, शीतलता में, मधुमयता में डूब जाना ही फाग है। राधा डूब गई। फाग हो गया। फाग हो गया तो फिर फाग के उपादानों को संभाले रखने का क्या औचित्य? कुछ नहीं। अब क्या होगा अबीर? इसीलिये पद्माकर कहते हैं पूरी-पूरी अबीर की झोरी कृष्ण के ऊपर उलट दी राधा ने। पूरी झोली का उलट देना कितनी मार्मिक व्यंजना से कविता को कितना समृद्ध बना देता है। यहाँ अर्थ शब्दों में नहीं, शब्दों को अतिक्रान्त करके कितने व्यापक सुदूर में गूँज रहा है। अपनी समूची आन्तरिकता के साथ किसी की आन्तरिकता में डूब जाना हर समय नहीं होता। कभी होता है। कभी नहीं, केवल वसन्त में होता है। फाग वसन्त में ही होता है। वसन्त में, जब जीवन में भी वसन्त उतर आये, उग आये तो कोई बात बने। पद्माकर की कविता वसन्त के साथ जीवन वसन्त में उमग पड़े फाग की कविता है।
इतना ही नहीं है। पद्माकर की कविता की राधा में जितनी गूढ़ता है, उतनी ही प्रगल्भता भी है। प्रगल्भता और गूढ़ता का संबंध बड़ा विरल होता है। प्रगल्भ गूढ़ता की छाप स्मृति में इतनी गहरी हो जाती है कि जल्दी धूमिल नहीं पड़ती। वह अबीर की झोली नट नागर के ऊपर तो डाल ही देती है। इसके बाद कमर में बँधे उनके पीताम्बर का फेटा भी खोलकर छीन लेती है। फागोत्सव का कृष्ण का बाना भी उतार लेती है। वह कृष्ण की अस्मिता की पहचान को अपने पास रख लेती है। राधा, कृष्ण को पूरा-पूरा पा लेती है। फिर कृष्ण को विदा देती है। कैसे विदा देती है? ‘मीड़ि कपोलन रोरी।’ उनको कपोलों पर रोरी मलकर विदा देती है। विजय का कैसा अपूर्व उल्लास बरस रहा है, राधा की भंगिमा में। पद्माकर की वाणी में चित्र नहीं, चित्रावलियाँ नृत्य कर उठती है। मोहक नृत्य। अपने प्रिय को अपने में पा लेने का कैसा अपूर्व आह्लाद उमड़ रहा है। पद्माकर की विदग्ध वाणी में राधा की विदग्धता कितनी मोहक बन पड़ी है।
फिर…..? पूछिये मत। पद्माकर की कविता का समाहार तो देखिये। यहाँ समाहार सिर्फ समाहार नहीं है। समाहार में बहुत कुछ समाया हुआ है। बहुत कुछ ही नहीं, समाहार में ही कविता की सारी समन्विति समाहित है – ‘‘नैन नचाय कही मुसुकाइ, लला फिरि आइयो खेलन होरी।’’
फिर वह कहती है। कुछ कहने में और नैन नचाकर कुछ कहने में बड़ा फर्क है। जमीन आसमान का फर्क है। सिर्फ वाणी का बोलना भी मार्मिक होता है। प्रभावकारी होता है। मगर वाणी के साथ जब काया भी बोलने लगे तो बात और हो जाती है। यह सच है कि नाटक में कविता के आ जाने से नाटक का प्रभाव बढ़ जाता है। लेकिन कविता में नाट्य का समाहित हो जाना तो सोना में सुहागा है। सोने में सुगन्धि का होना किसी चमत्कार से कम नहीं होता। पद्माकर की वाणी में सुगन्धित सोने का सच अपने दुर्निवार आकर्षण में हाथ-हिलाकर बुलाता खड़ दिखाई देता है।
आँखों को नचाकर और मुसुकाकर कहना साधारण कहना नहीं है। केवल मुसुकाकर कहने में ही कथन में बहुत मारकता आ जाती है। आँखों के दबाकर कहने में ही कथन में बहुत बेधकता भर जाती है। आँखों को नचाकर कहने का तो कहना ही क्या! फिर दो-दो विलक्षण अनुभावों का वाणी के साथ मिलकर कुछ कहना तो भावों की भीड़ खड़ी कर देना है। भाव नहीं, भावों की भारी भीर एक के बाद एक, एक-दूसरे को धकेलती, धकियाती पद्माकर की कविता में भरभराकर निकल आती है। निकलती ही जाती है। शब्द तिरोहित हो जाते हैं। डूब जाते हैं। विलीन हो जाते हैं।
प्रायः महत्वपूर्ण और मूल्यवान कविता में शब्द भावों के संवाहक बनकर आते हैं। वाहक बनकर आते हैं। भावों को वहन करके शब्द अपनी सार्थकता सिद्ध करते हैं। कभी-कभी, कहीं-कहीं कविता में शब्द भावसत्ता में अपने अस्तित्व के साथ डूबकर उसके श्रृंगार बन जाते हैं। जब-जब ऐसा होता है, हो पाता है, कविता विलक्षण बन जाती है। पद्माकर की कविता विलक्षण कविता बन पड़ी है।
इस कविता में क्या कह रही है, राधा? जो कह रही है, उसमें विजय का गर्व है, क्या? मगर विजय कैसी? प्रेम कोई युद्ध थोड़े ही है, जिसमें जीत, हार है। नहीं, प्रेम खेल भी नहीं है, जिसमें जीतना, हारना लगा होता है। प्रेम में तो जीत-जीतकर भी हार जाना होता है। हार-हार कर भी जीत हासिल हो जाती है। जहाँ जीत-हार नहीं है वही प्रेम है। प्रेम, जीवन का वह धरातल है, जहाँ गणित के सारे सूत्र फेल हो जाते हैं। प्रेम के तल पर गुणा-भाग, जोड़-घटाव सब बेमतलब हो जाता है। व्यर्थ हो जाता है। वहाँ एक धन एक दो नहीं होता। वहाँ एक धन एक बराबर एक होता है। वहाँ एक हमेशा एक में समाहित होकर एक हो जाने को आकुल रहता है।
अपने प्रेमी को ‘लला‘ संबोधित करने की सूझ कवि की विलक्षण उद्भावना है। श्रृंगार में वात्सल्य का स्पर्श कितना अद्भुत है। वात्सलय के श्रृंगार से संयुक्त हो जाने से श्रृंगार की गरिमा कितनी ऊँची उठ जाती है। वात्सल्य अपने आश्रय की अबोधता का बोधक है। अपने प्रेमी में अबोधता का बोध प्रेम को कितना गौरवपूर्ण और संरक्षणप्रद बना देता है। भारतीय नारी की गरिमा का यह कैसा निदर्शन है। अपने प्रेमी की नादानता को व्यंजित करने में वाणी कितने-कितने संकेतों को उजागर करती है, कह पाना बहुत कठिन है। कहने में न आने वाले कथ्य को शब्द से संकेतित कर देना कविता की चरम सार्थकता है। अपने को पूरा-पूरा देकर अपने प्रिय की नादानी को सयाना बनाने का आग्रह पद्माकर की कविता का आग्रह है। यही लालित्य है। यही लालित्यपूर्ण जीवन है। कविता लालित्यपूर्ण जीवन के सृजन के लिये है। वात्सल्यपूर्ण प्रेम, प्रेम का सुमेरू शिखर है, जिसे भारतीय मनीषा ने अन्वेषित किया है। उपलब्ध किया है। जिसे भारतीय कविता ने जीवन में प्रतिष्ठित किया है।
होली खेलने फिर आना। फिर फिर आना। फाग फिर-फिर खेलने का ही उत्सव है। यह अचूक उत्सव है। बीत जाने के बाद भी रह जाने वाला उत्सव है। अपने चले जाने के बाद भी अपनी निशानी छोड़ जाने वाला है। अपनी गहगह निशानी। अपनी महमह निशानी। अपनी निशानी में अपने को पूरा सहेजे हुये। होली का उत्सव जड़ों का उत्सव है। और उत्सव तो डाल-डाल के उत्सव है। डाल-पात के उत्सव हैं। फूल-पात के उत्सव हैं। मगर होली नहीं। होली में जीवन डाल से, पात से सिमटकर जड़ों में समाहित हो जाता है। जब डाल-डाल में पात-पात में फैला हुआ जीवन रस सिमट कर जड़ों में समाहित हो जाता है। समाहित होकर समुल्लसित हो उठता है, तब होली होती है।
जड़ों का स्वभाव रस के स्रोत में धँसने का स्वभाव है। स्रोत से रस सोखने का स्वभाव है। रस को सोखकर अपने में रखने का स्वभाव जड़ों का स्वभाव नहीं है। जड़ें रस को बाँट देती हैं। जिसके पास रसग्रहण की जितनी क्षमता है, उसे उतना दे देती है। जड़े रस संचित नहीं करतीं। वे रस वितरित करती हैं। रस के स्रोत में धंसकर रस का वितरण करने की योग्यता को पा लेना ही जीवन की सार्थकता है। होली, जीवन में, जीवन की सार्थकता को पा लेने की उत्प्रेरणा का उत्सव है।
रस के स्रोत से रस खींचकर तनों, डालों का, शाखों का, पातों का विस्तार करना, पोषण करना, श्रृंगार करना सृसृक्षा का सम्मान है। सबको पोषण प्रदान करके सृजन चेतना का अपनी जड़ में लौट आना स्रष्टा के अनुदेश का अनुवर्तन है। यह अनुवर्तन ही जीवन की सार्थकता का मूलमंत्र है। होली जीवन के मूलमंत्र के गान का महोत्सव है।
यह महोत्सव हमारे ऋतुचक्र में सहज है। परिधि के समूचे विस्तार में घूमकर केन्द्र में लौट आने का आमंत्रण होली का आमंत्रण है। हमारे जीवन का विस्तार सभ्यता में है, मगर केन्द्र सहज में है। सभ्यता की समृद्धि में सहज का अटक जाना, जीवन का भटक जाना है। पथभ्रष्ट हो जाना है। वसन्त मनुष्य जाति की पथभ्रष्ट होती चेतना का पथप्रदर्शक है। इसीलिये वसन्तु ऋतु नहीं है, ऋतुराज है। जो हमें सहज में स्थित करने की सामर्थ्य रखता है, वही हमारा राजा है। होली हमारे जीवन को सहज की ओर उन्मुख करने का उत्सव है। सहज में प्रतिष्ठित करने का उत्सव है। होली में सारी कृत्रिमताएँ सहज ही छूट जाती है। सारे भय, सारे संकोच, सारी आशंकाये स्वयं भहराकर गिर जाती हैं। अवधारण से उपार्जित अच्छा और बुरा का भेद मिट जाता है। अस्तित्व उजागर हो उठता है। अस्तित्व की अभ्यर्थना का उत्सव होली का उत्सव है।
जहाँ कुछ सीखना नहीं होता, वहीं जीवन होता है। जहाँ कुछ छिपाना नहीं है, दुराना नहीं है, वहीं फाग होता है। फाग जीवन का उत्सव है। जब कण्ठ के सारे अवरोध मिट जाते हैं, कविता का जनम होता है। पद्माकर की कविता फाग की अचूक कविता है उनकी कविता में मनुष्य जाति के लिये फिर-फिर होली खेलने का अम्लान आमंत्रण है, –
‘‘लला फिरि आइयो खेलन होरी।’’
पद्माकर पुकार पुकार कर कह रहे है,- आना होली खेलने फिर आना। होली ख्ेालने फिर-फिर आना। होली ख्ेालने फिरि-फिरि आना। लौट-लौट आना। चाहे जहाँ भी चले जाना। चाहे जितनी भी दूर चले जाना मगर होली खेलने फिर आना। कहीं भी जाना मगर अपने में लौट आना। अपनों में लौट आना। अपने से लौट आना। अपने से अपनों को रंग देना। अपनों से अपने को रँग लेना। यह होता रहे। फिर-फिर होता रहे। बार-बार होता रहे। बराबर होता रहे। यह क्रीड़ा बराबर चलती रहे। कभी रुके नहीं। कभी चुके नहीं। यह कविता में भारतीय जाति की सनातन अभीप्सा की अभिव्यक्ति है।

सामूहिक अस्तित्व का मंगलघोष

वरिष्ठ साहित्यकार डा. उमेश प्रसाद सिंह।
वरिष्ठ साहित्यकार डा. उमेश प्रसाद सिंह।

oung Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

अमरकोश में लोक के सन्दर्भ में ‘लोकस्तु भुवने जने’ लिखा है। जन-जन से भुवन बना है। जन-जन में भुवन है। भुवन में जन व्याप्त है। जन में भुवन व्याप्त है। लोक सृष्टि की समूची अस्मिता का वाचक है। समूचा संसार जिसमें प्रकृति और प्राणि समुदाय समाहित हैं, लोक में व्याप्त है। जड़-चेतन की अभिन्नता का बोध लोक की व्याप्ति में सन्निहित है। अन्तर्सम्बन्धों की अर्थवत्ता और सहिष्णुता की मूल्यवत्ता में ही लोक प्रतिष्ठित होता है। यही लोक का प्राणतत्व है। इस प्राणतत्व को पलुहित करने वाली चेतना, लोक चेतना है।
प्रकृति के समस्त उपादानों- पृथ्वी, पहाड़, पठार, कछार, नदी, झरना, झील, पेड़ के साथ पशु-पक्षी की प्रजातियों और समस्त मनुष्य समुदाय का सजीव समुच्चय लोक कहा जाता है। लोक की धारणा सामूहिक अस्तित्व की उपासना की महनीय और उज्ज्वल धारणा के उत्कर्ष का प्रतिमान है। यह मानवीय चिन्तन की पवित्रता, महनीयता और मांगलिकता का एकत्र अभिधान है।
यह भिन्न-भिन्न सत्ताओं की अभिन्नता का आधार है। जन-जन के भिन्न होने के बावजूद भिन्न न होने का बोध ही लोक शब्द की व्यंजना है। इस व्यंजना की संवाहक चेतना को लोक चेतना कहा जाता है। लोक दार्शनिक अद्वैत की सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रवाचक है। दो की सत्ता का निषेध, नकार ही लोक के स्वरूप का निदर्शन करता हे। अपने में सबको और सबमें अपने को अनुभव करने का बोध लोक में व्यक्त होता है। समूह में व्यक्ति का विलयन और व्यक्ति में समूह की उपस्थिति लोक के अर्थ का प्रतिपादक है। यह मनुष्य जाति के चिंतन की महिमा का स्वर्ण शिखर है।
लोक चेतना मनुष्य जाति के सामूहिक मंगल की अन्वेषी चेतना है। इसमें व्यक्ति की महिमा सामूहिक मंगल विधान के उत्कर्ष पर आधारित है।
बड़ा आश्चर्यजनक है कि राजसत्ता को सारे अधिकार सौंपकर भी मनुष्य जाति के इतिहास निर्माण का समूचा उत्तरदायित्व लोकसत्ता अपने पास सुरक्षित रखती है। मनुष्य जाति की दशा और दिशा का निर्धारण लोकसत्ता के हाथ में होता है। मनुष्य जाति के नायक का निर्माण हमेशा लोक सत्ता ही करती है। मनुष्य जाति के मंगल विधान की चेतना, लोक चेतना है। आज तक एक भी लोकनायक किसी राजसत्ता ने पैदा किया हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता।
सामूहिकता और पारस्परिकता लोक चेतना में प्रतिष्ठित सारे मूल्यों का आधार है। यह मनुष्य के स्वभाव और उसकी सभ्यता दोनों में समान रूप से मूल्यवान है। लोकचेतना हमेशा राजसत्ता की निरंकुशता की संभावनाओं को अंकुश से नियंत्रित रखती है। लोकचेतना समूचे संसार में सामाजिक संरचना में सबसे शक्तिशाली कारक है। यह हमेशा व्यक्ति चेतना में अलक्षित सामूहिक चेतना की उपस्थिति के रूप में व्यक्त होती है। लोक चेतना में एक वचन को बहुवचन में व्यक्त करने की अद्भुत शक्ति और सामर्थ्य है। लोक चेतना असमाप्त संघर्ष की असीम ऊर्जा का अचूक स्रोत है। यह हमेशा निरंतर आहत होकर भी कभी हारती नहीं है। दिनकर के शब्दों में कहँू तो लोकचेतना मर्त्य मानव की विजय का तूर्य है। लोक चेतना का स्वरूप और उसकी शक्ति साहित्य में संचित और संरक्षित है।
लोकचेतना लोक जीवन में ही बसती है। उसका निवास लोक-जीवन के व्यवहार में लक्षित होता है मगर वह कहाँ बसती है, कहाँ-कहाँ, किसमें-किसमें वह वास करती है, कह पाना बड़ा मुश्किल है। स्थूल लोक जीवन में हमेशा लोकचेतना की पहचान आसान नहीं होती। प्रायः लोक जीवन में भी बहुत से व्यवहार लोक चेतना के विरूद्ध दिखते हैं, लेकिन शीघ्र ही वे लोक चेतना की धारा में लहर की भाँति विलीन हो जाते हैं। कभी-कभी लोकचेतना की व्यापक अभिव्यक्ति व्यक्ति चेतना में भी प्रगट होती है और व्यक्ति का विस्तार लोक में व्याप्त हो जाता है। व्यक्ति लोक का संरक्षक बन जाता है। व्यक्ति लोकनायक बन जाता है। व्यक्ति लोकमंगल का यशगायक बन जाता है। लोक चेतना में व्यक्ति और समूह का विस्मयजनक विलयन है। इसमें व्यक्ति कभी सामूहिक सत्ता का पर्याय बन जाता है। कभी समूह व्यक्ति की असीम संभावनाओं का विलक्षण उद्घाटक।
साहित्य लोक चेतना की भाषिक अस्मिता है। लोक चेतना साहित्य में व्यक्त है। अभिव्यक्त है। साहित्य लोक चेतना की ही वाणी है। साहित्य में लोक चेतना को देखा जा सकता है। सुना जा सकता है। समझा जा सकता है। छुआ जा सकता है। जिया जा सकता है। लोक चेतना के जीवन का स्पन्दन साहित्य में विद्यमान है।
वस्तुतः लोकजीवन लोक चेतना का पर्याय नहीं है। प्रायः लोक जीवन को लोकचेतना का वाहक मान लेने से हमारी बौद्धिकता बहुत-सी भ्रांतियों का शिकार बन जाती है। शायद इसी वजह से लोक साहित्य, लोक संगीत, लोक कला इत्यादि के अलग वर्ग हम सृजित करने लग जाते हैं। साहित्य और कला के आन्तरिक मर्म के धरातल पर इस तरह के वर्गों का कोई मतलब नहीं होता। लोक जीवन सामयिक होता है, मगर लोक चेतना केवल सामयिक नहीं है। वह सामयिक भी है मगर सामयिकता की सीमा को अतिक्रांत करने का स्वभाव लोकचेतना का स्वभाव है। सामयिकता को अतिक्रमित किए बगैर कोई भी चीज सार्वकालिक नहीं हो सकती। लोक चेतना एक सार्वकालिक सत्ता है। वह कल भी थी। आज भी है। कल भी होगी। अस्तित्व का प्रवाह अविच्छिन्न है। लोकचेतना, एक अविच्छिन्न सत्ता है। मनुष्य जाति के जीवन में, उसके जीवनबोध में उसका प्रवाह अविच्छिन्न है।
लोक किसी समूह का वाचक नहीं है। लोक बहुसंख्यक समुदाय नहीं है। लोक अल्पसंख्यक समुदाय का विलोम नहीं है। लोक शास्त्र का विरोधी नहीं है। विकल्प नहीं है। लोक, सत्ता का प्रतिपक्ष नहीं है। लोक प्रवंचित नहीं है। पिछड़ो का समूह नहीं है। लोक गॅवार नहीं है। लोक बनवासी नहीं है। गिरिजन नहीं है। कंगाल नहीं है। असहाय नहीं है। लोक कोई खण्ड, उपखण्ड नहीं है। वह खण्डित चेतना का वाहक कत्तई नहीं है। लोक समग्र का वाचक है। लोक समग्र सत्ता के समेकित रूप का संवाहक शब्द है। लोक विशेषणों की विशेषताओं को निरस्त करने वाली संज्ञा की गरिमा का विस्तार है। राजा, रंक, विद्वान, मूर्ख, बलवान, कमजोर, सुन्दर, कुरूप सबको मिलाकर एक साथ जो सत्ता है अस्तित्व की, लोक है। भिन्नता के असीम विस्तार में जो अभिन्न है, वह लोक चेतना है।
भिन्नता में अभिन्नता का बोध ही सहिष्णुता का जनक है। सहिष्णुता से पारस्परिकता का जन्म होता है। लोक चेतना सहिष्णुता और पारस्परिकता की संपोषक चेतना है। लोक चेतना समग्र को समग्र से जोड़ने वाली चेतना है। सम्पूर्ण के हर अवयव को हर अवयव से जो जोड़ने का काम है, वह चेतना करती है। कोई भी विशिष्ट लोक से बाहर नहीं है। विशिष्ट का अपशिष्ट भी लोक नहीं है। विशिष्ट से बचा हुआ लोक है, यह भ्रम है। यह लोक की धारणा का आयातित व्यतिरेक है। यह आधुनिकता बोध के छदम की भ्रांति है। यह भ्रांति स्वार्थपूर्ण भ्रान्ति है। यह भ्रान्ति विशेषाधिकार पर अधिकार जमाये रखने के लिए सुनियोजित भ्रान्ति है। यह जानबूझ कर प्रचारित और प्रसारित की गई है। यही भ्रान्ति हमारे लोकतंत्र को कलंकित करती है। कमजोर करती है। निर्बल बनाती है। निरीह बनाती है। इसी भ्रान्त अवधारणा में लोक हेय है। हीन है। वंचित है। शोषित है। विपन्न है। दया का पात्र है। अभावग्रस्त है। बुद्धिहीन है। ग्राम्य है। गिरिजन है। वनवासी है। आदिम है। तुच्छ है। भद्र से इतर भदेस है। दरअसल यह लोक नहीं है, यह सब ‘फोक’ है। ‘फोक’ संरक्षण के योग्य है। मगर लोक संरक्षक है। लोक सम्पूर्ण के मंगल विधान का स्रष्टा है।
लोक सत्ता का विरोधी नहीं है। शास्त्र का विरोधी नहीं है। लोक सत्ता का और शास्त्र का सर्जक है। वह सत्ता और शास्त्र का नियंत्रक है। सत्ता और शास्त्र को लोक सापेक्ष्य बनाये रखने का दायित्व लोक चेतना का आत्मधर्म है। लोक चेतना किसी भी तरह के विशिष्टताबोध को निरसत करने वाली चेतना है। जो सत्ता और शास्त्र का नियामक है, वह भी लोक है। उस लोक में जब भी अपने लोक धर्म के प्रति उपेक्षा का जन्म होता है, लोकचेतना उसे विशेषाधिकार से वंचित कर देती है। विशेष को लोक चेतना आत्मसात नहीं करती। विशेष बाहरी तत्व है, जब भी उसका प्रवेश लोक जीवन में होता है, लोकचेतना की आन्तरिक उर्जा सक्रिय हो उठती हैं सक्रिय होकर उसे बार-बार, बारम्बार बहिष्कृत करती रहती है। समाूहिकता के विरूद्ध हर विक्षेप को, सामूहिक जीवन से और व्यवस्था से बाहर करते रहने का स्वभाव, लोकचेतना का स्वभाव है।
लोक कोई स्थिर इकाई नहीं है। वह संरक्षण का मुखापेक्षी नहीं है। वह सहारे का याचक नहीं है। वह कृपाकांक्षी नहीं है। यह सब तो लोक के साथ हमारे लोकतंत्र का मजाक है। उपहास है।
लोक लघु नहीं है। विराट है। लघुता लोक की पहचान नहीं है। उदारता लोक का अभिज्ञान है। लोक का चरित्र उदार चरित्र है। लोक का कुटुम्ब बसुधाव्यापी कुटुम्ब है। लोक में अपना-पराया नहीं है। सब अपना है। ‘सब अपना है’ का बोध ही लोक चेतना का अपना बोध है। आत्म विस्तार की असीम परिणति ही लोक चेतना का आत्मतत्व है।
आत्मचेतना के असीम विस्तार की योग्यता ही लोकचेतना में विलीन होने की योग्यता है। जो आत्मविस्तार की योग्यता से परिपूर्ण है, वही लोक चेतना का संवाहक है। वह ही लोक चेतना में घटक की तरह मौजूद है। जिसमें यह योग्यता नहीं है, वह चेतना का व्यतिरेकी है। लोक चेतना उसे अपने से बहिष्कृत कर देती है। बहिष्कृत करती रहती है। साधारणता नहीं, सधारणता में व्याप्त असाधारणता लोक चेतना की पहचान है।
लोक चेतना ही समूची सृष्टि में नियामक चेतना है। यही अभ्यर्थनीय चेतना है। यही मंगलकारी चेतना है। विराट प्रकृति के साथ समस्त प्राणि समुदाय में सहिष्णुता और पास्परिकता के मैत्रीभाव की स्थापना लोक चेतना की स्थापना है। इस स्थापना के लिये ही जगत में लोक चेतना का साम्राज्य है।
सिंहासन पर कोई बैठे। ताज किसी के भी सिर पर बँधा हो। मगर मनुष्य जाति के हृदय पर शासन हमेशा लोकचेतना का रहता है। हमेशा रहेगा। सच्चे अर्थ में मनुष्य जाति में सम्राट हमेशा-हमेशा लोक चेतना ही है।
लोकचेतना को आत्मसात किये बिना लोकतंत्र व्यर्थ है। लोकचेतना की अभ्यर्थना के अभाव में लोकतंत्र एक फालतू का शब्द है, जिसका न तो भाषा में कोई अर्थ है, न जीवन में कोई मतलब। लोक चेतना की अनुपस्थिति में लोकतंत्र एक भयानक विध्वंस का विस्फोट है, जिसे सामूहिकता और पास्परिकता को विनष्ट करने के लिये प्रयोग किया जाता है। लोकतंत्र तब तक केवल कुछ लोगों के स्वार्थ को पूरा करने का साधन मात्र है जब तक लोक चेतना जन-जन में प्रतिष्ठित नहीं है। जब तक भुवन में प्रतिष्ठित नहीं है।
लोकचेतना आहत होती है, हत नहीं। वह क्षत होकर भी, विक्षत होकर भी अक्षत बनी रहती है। बहुत कुछ के अप्रतिष्ठित होने की आशंका की जा सकती है मगर सामूहिक अस्तित्व के मंगल घोष की अप्रतिष्ठा की आशंका कभी नहीं की जा सकती। लोकचेतना जन-जन को पुकारती आ रही है। पुकारती जा रही है-
‘‘बनो संसृति के मूल रहस्य, तुम्हीं से फैलेगी वह बेल।
विश्व भर सौरभ से भर जाय, सुमन से खेलो सुन्दर खेल।।’’

आँखिन रंग बचाय के डार्यो

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

एक अदना-सा निवेदन है। निवेदन रागाकुल रमणी का है। निवेदन फागाकुल रमणी का है। मगर है, बड़ा मार्मिक। इतना मार्मिक है कि मन को मथ डालता है।
बड़ा अद्भुत आग्रह है। आग्रह में आमंत्रण भी है। वर्जना भी है। आमंत्रण प्रधान है या वर्जना प्रधान है, निर्णय कर पाना कठिन है। शायद यही कविता की मार्मिकता है। अर्थबोध की अधिकाधिक संभावनाओं को खुला छोड़ देना कविता को अधिक अर्थवान बनाता है, क्या? बार-बार ऐसा ही लगता है।
रीतिकालीन कविता के साथ आधुनिक समझ का व्यवहार सहिष्णुता का व्यवहार नहीं है। विचारों के प्रति सहिष्णुता का विज्ञापन करने वाली आधुनिकता की असहिष्णुता विस्मय में डालती है। ईमानदारी से देखा जाय तो आधुनिकता की ढोल में रीतिकालीनता के बोल रीतिकाल से कम नहीं है। फिर भी रीतिकालीन कविता की भर्त्सना करना शायद हमें अपने आधुनिक होने की अनिवार्य शर्त लगता है। प्रायः हम कविता की मूल्यवत्ता कविता के विषय पर जाँचने के आग्रही हैं। अक्सर हम भूल जाते हैं कि कविता विषय पर आधारित नहीं होती। विषय पर तो कविता का खिलवाड़ आश्रित होता है। कविता तो अपने में ही विषय को विनिर्मित करती है। खैर!
रीतिकाल की कविता में भले और बहुत कुछ हो न हो, अलग की बात है। मगर एक बड़ी मूल्यवान बात रीतिकाल की कविता में है, जो उतनी अधिक और कहीं नहीं है। घरेलू जीवन का, घर के भीतर के जीवन व्यवहार का जितना, सहज और व्यंजक वर्णन रीतिकालीन कविता में उच्छल रूप में विद्यमान है, अन्यत्र दुर्लभ है। घर का जीवन कविता के लिये अर्थवान है या नहीं, इस पर तो बहसों में रूचि रखने वाले लोग ही निर्णय कर सकते हैं।
इस कविता मे रमणी कहती है कि रंग डालना चाहते हो, डाल लो। तनिक भी मनाही नहीं है। सरेआम डाल लो, कोई हर्ज नहीं है। डालना ही है, तो खुल्लम-खुल्ला डाल लो, कौन रोकता है। जहाँ, जी चाहे डाल लो रंग। जहाँ-जहाँ जी चाहे रंग दो। मगर जरा आँखों को बचाकर। यह आँखों को बचाकर रंग डालने का आग्रह कितना लुभावना है। कितना विदग्ध आग्रह है। कितना व्यंजक आग्रह है। कितनी सर्जक वर्जना है। आँखों से बचाकर आँखों में रंग न डालने का आग्रह राग को कैसा अपूर्व उत्कर्ष देता है। कैसा मन को मुग्ध कर देता है।
नहला दो रंग में पूरा-पूरा कोई बात नहीं। सारे के सारे वसन भींग जायें कोई बात नहीं। पूरी देह पर रंग चढ़ जाय कोई चिन्ता नहीं। गालों पर रंग थिरक उठे कोई फिक्र नहीं। किस बात की फिक्र? रंग तो तुम्हारा ही है! रंग में तो तुम्ही हो। तुम्हीं में तो रँगना ही है मुझे। तुममें ही तो डूबना ही है मुझे। फिर क्या? फिर देर क्या? प्रतीक्षा क्या? हिचक क्या?
मगर एक बात याद रखने की है। याद रखनी है, वह यह कि आँखों को बचाना है। किसलिये? इसलिये कि आँखों से देखना है। आँखों से तुम्हारा रंग देखना। तुम्हारे रंग का निखार देखना है। तुम्हारे रंग की निकाई देखनी है। तुम्हे देखना है।
अगर आँख में रंग पड़ गया तो कैसे दिखेगा? फिर तुम्हारा ऐसा रंग कैसे दिखेगा? तुम कैसे दिखोगे? नहीं, नहीं यह ठीक नहीं होगा। ऐसा मत करना। आँखों को बचाकर रंग डालना।
आँखों का काम देखने का काम है। प्रेम देखने की चीज है। प्रेम का रंग देखने की चीज है। देखने से जी जुड़ा जाता है। जीवन पलुहित हो जाता है। जीवन फलित हो जाता है। सार्थक हो जाता है। प्रेम का रंग देख लेने से कुछ देखन को बाकी नहीं रह जाता।
आँखों में रंग पड़ जाने से यह सुख छिन जाने का अंदेशा है। जीवन की सार्थकता के खो जाने की आशंका है। जीवन खोने की नहीं, पाने की चीज है। जीवन का भाना ही जीवन है, प्यारे! जो भा जाय उसे गाना ही तो जिन्दगी का अर्थ है।
रंग से तनिक भी परहेज न रखते हुए आँखों को रंग से बचाने का यह प्रेमपूर्ण आग्रह मुझे इस मुरझाये हुये समय में भी हुलसा देता है। कविता से मन उमंगित हो उठता है। मगर अपनी तरफ सोचते ही उदास हो जाता है।
यह नायिका हमारे समय की नहीं है। चाहे जितनी भी कोशिश करके हम उसे अपने समय में नहीं ला सकते। हम लाख चाहें तो भी वह हमारे समय में नहीं आ सकती। हमारे समय में तो, जो है सो है।
हमारे समय में बहुत कुछ है। विकसित तकनीक के संचार माध्यम है। सूचनाओं के विश्व बाजार हैं। स्मार्टफोन हैं। एस.एम.एस. की उपलब्धि है। सिनेमा के प्रेमगीत हैं। अनन्त चालबाजियाँ हैं। लिव-इन-रिलेशन के नुस्खे हैं। स्वतंत्रता के नाम पर सम्बन्ध विच्छेद की सुविधाएं हैं।
हमारे समय में बूढ़ा वसन्त है। प्रदूषित नदियां हैं। सूखे तालाब हैं। पाट दिये गये पोखरे हैं। फूलने से पहले पाला खाये सरसों का समुद्र है। विषैले धुँए में जलती आम की मंजरियाँ हैं। रेलों में, बसों में, बाजारों में, गलियों में, बस्तियों में, हर कहीं बेलगाम भौंरे हैं। अपनी लाज को बचाये रखने में भय से सिकुड़ी-सिकुड़ी कलियाँ हैं।
हमारी होली में किसिम-किसिम के रंग हैं। चेहरे को बदरंग बना देने वाले रंग। वस्त्रों को बेकार बना देने वाले रंग। नजर को बदल देने वाले रंग। राग को, अनुराग को मसल डालने वाले रंग। भूख को भड़का देने वाले रंग। स्वार्थ को चमका देने वाले रंग। क्रूरता को उकसा देने वाले रंग। सहिष्णुता को कुचल डालने वाले रंग। लाभ को लहका देने वाले रंग। लोभ में बहका देने वाले रंग। सबका रंग बिगाड़कर अपना रंग चोखा कर लेने वाले रंग। न जाने कैसे-कैसे रंग, हर कहीं अपना रंग जमाये हैं। अपने में रँगने वाले रंग कहीं नहीं हैं। दूसरों पर फबने वाले रंग कहीं नहीं हैं। रंगों की भीड़ में, खुलने वाले, खिलने वाले रंगों का अभाव है। अभाव ही नहीं है, अकाल है।
जो भी रंग हैं, हमारे समय में आँख में पड़ जाने को आकुल हैं। आतुर हैं। जिनके हाथ में भी रंग है, आँख में डालने के लिये है। कपड़ा न भींगे कोई बात नहीं। देह न भींगे, कोई बात नहीं। मन न भींगे कोई बात नहीं। बस आँख न बचने पाये।
किसी भी कीमत पर आँख न बचने पाये। पूरा-पूरा रंगों का हमला आँख पर है। रंग भाषा का रूप पकड़कर आँख में घुस रहे हैं। रंग लिपि का रूप धरकर आँख में घुस रहे हैं। रंग दृश्य का बाना बाँधकर आँख में घुस रहे हैं। रंग उत्थान का रूप लेकर आँख में घुस रहे हैं। हमारे समय में हर दिन होली है। हमारे अपने, हमारे आत्मीय, हमारे रक्षक, हमारे संरक्षक सब होली खेल रहे हैं।
नहीं, आँखों को किसी भी तरह बचा सकना संभव नहीं है। जब रोज-रोज आँखों में धूल झोंकी जा रही है। रोज-रोज आँखों में उँगली घुसेड़ी जा रही है, तो होली में आँखों को बचाकर रंग डालने का आग्रह क्या अर्थ रखता है। व्यर्थ है। आँख आपकी। मर्जी आपकी। जो चाहें।
हम अपने समय में लाख प्रयास करके भी कैसे कहें, – ‘‘आँखिन रंग बचाय के डार्यो।’’

भरोसे का भार

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

कहते हैं सौ बार धोखा खाने के बाद भी एक फिर अवसर आने पर जो विश्वास कर लेता है, सहज भाव से, वह सन्त है। संत वह है, जिसका विश्वास करने का स्वभाव है। विश्वास करना जिसने सीखा नहीं है, साधा नहीं है। विश्वास जिसका स्वभाव है, विश्वास जिसके स्वभाव है, विश्वास जिसके स्वभाव में है, संत है। विश्वास जिसकी वृत्ति है, वह साधु है। वह सज्जन है। भारत देश की आत्मा, सन्त आत्मा है।
इस देश की पहचान जिन लोगों के होने से होती है, आज भी उनमें विश्वास करने की उत्कष्ट वृत्ति है। विश्वास के प्रति भारतीय जन मानस में अगाध आस्था है। अडिग निष्ठा है। महत् संकल्प है। अपने भारतीय जाति में यह तितिक्षा का जो अपार बल है, वही उसे महान सिद्ध करता है। हजार तरह के दुःखों को सहते रहने के बावजूद किसी अच्छाई की संभावना के लिए एक और दुख को गले लगा लेने का धैर्य और उत्साह इस देश के साधारण जन की अभ्यर्थना के लिये हमेशा उत्प्रेरित करता रहता है।
स्वतंत्रता के बाद अपने शासन में भारतीय जनता बार-बार धोखा खाती रही है। वह बराबर विश्वास करती रही है। विश्वास टूटता रहा है, हर बार। फिर भी विश्वास की बान तनिक भी कमजोर नहीं हुई है। हमारे प्रधानमंत्री जी के नोटबंदी के फैसले का भारतीय जनता ने जैसा समर्थन दिखाया है, वह उसके विश्वास का अनूठा उदाहरण है। माननीय मोदी जी ने देश की जनता को बताया है कि सरकार के इस फैसले से कालाधन इकट्ठा करने वाले बईमान लोगों के धन्धे पर करारी चोट पड़ेगी। आतंकवाद की कमर टूट जायेगी। नकली नोटों की कालाबाजारी रुक जायेगी। आम जनता को जो ईमानदारी का जीवन जीती है, फायदा होगा।
आम जनता को फायदा हो, न हो इसकी उसे कोई चिन्ता नहीं। आम जनता आज भी यह मानती है कि उसका सबसे बड़ा फायदा भ्रष्टाचार के उन्मूलन में है। आज भी आमजन को बेईमानी बेहद नापसन्द है। वह अपनी पूरी आत्मिक ताकत के साथ बेईमानी के खिलाफ है। वह पूरे मन से बेईमानों के खिलाफ है। बेईमानों के खिलाफ तो नतमस्तक होने के लिए उसे राजनीतिक दल ही विवश करते हैं। भ्रष्ट, बेईमान, अपराधी और अत्याचारी लोगों को टिकट देकर राजनीतिक दल ही जनता को उन्हें अपना प्रतिनिधि चुनने को मजबूर करते हैं। घूसखोर और अन्यायप्रिय अधिकारियों को और अधिक अधिकार देकर सरकार ही जनता को उनका अनुशासन मानने को विवश करती रहती है। जनता तो इन सबके विरोध में अब भी अपनी जगह पर अडिग खड़ी ही है। ईमानदारी के प्रति अपनी पक्षधरता को इस देश की जनता ने नोटबंदी के प्रकरण में अभी सिद्ध करके दिखा दिया है।
अचानक नोटबंदी का फरमान सुनकर जनता सकते में जरूर आ गई। साधारण लोगों ने जो काट-कपट कर थोड़े-बहुत पैसे धर में दबा-छिपाकर गाढ़े वक्त के लिये रखे थे वे प्रायः बड़ी नोटों में ही थे। गृहणियों के गृहकोष में जो कुछ गुप्त धन था, वह भी उसी शक्ल का था, जो अब पाबन्द थी। यह आदेश घर-घर की आर्थिक गोपनीयता का भण्डाफोड़ करने वाला निकला। कालेधन पर कुठाराघात हो न हो यह तो बाद की बात है मगर महिलाओं के ‘प्रीवी कर्स’ पर तो वज्रपात हो ही गया। फिर भी उन्होंने हँसते-मुस्कुराते, झेंपते-लजाते यह आघात सिर-माथे लिया। किसलिये? इसलिये कि यह देश की भलाई के लिये है।
पूरा देश एक सुबह अचानक खालीहाथ होकर भौंचक एक-दूसरे को देखता रह गया। परेशानियों का पहाड़ सामने और पंगु हौसले पस्त। बहरे बाजार और चिल्लाती जरूरतें। दर-दर गिड़गिड़ाती बिमारी की रिरियाहट और आश्वासनों के बन्द दरवाजे। शादी-ब्याह की आपाधापी और खाली जेबों का कुहराम। अजीब हालत। काम की जगहों पर सन्नाटा और बैंकों के आगे अनियंत्रित भीड़। घरों में रुआंसी रसोइयां और सकताये चूल्हे। फिर भी कहीं कोई विरोध नहीं। किसिम-किसिम की आवाजों में विरोध का कोई भी स्वर पूरी तरह से अनुपस्थित। विपक्षी दलों के बयानों और संसद के हंगामे से जनता विचलित न हुई। उकसावे की तमाम कोशिशें निरर्थक सिद्ध हुई। एक अच्छाई के लिये जनता हजार दुख सहने को तैयार है।
धन्य है, इस देश की जनता। इस देश की जनता देश को परीक्षा के हर दौर में देवभूमि साबित कर देती है।
कोई भी ईमानदारी की बात कर दे, जनता उसके पीछे हो लेती है आँख मूदकर। कोई अच्छाई की बात कर दे, जनता खड़ी हो जाती है, उसके साथ, अपना काम छोड़कर। कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का ऐलान कर दे, जनता उसे उठा लेती है, सिर आंखों पर। कोई देश का सम्मान दुनिया में बढ़ाने का उद्घोष कर दे, जनता उसकी जयनाद से आसमान गूँजा देती है। जनता की आज भी कितनी आस्था है, ईमानदारी के प्रति। बुद्धिजीवी भले यह घोषणा कर दें कि हमारे समय में भ्रष्टाचार सहज स्वीकृत होकर आचार बन गया है, मगर जनता उनके निष्कर्ष को नकार देती है। जनता के मन में देश के प्रति कितन प्रेम है, देश के आत्म सम्मान की कितनी उसे चिन्ता है, वह समय आने पर छाती फाड़कर दिखला देती है।
प्रधानमंत्री के रूप में माननीय मोदी के तात्कालिक तकलीफदेह फैसले का जनता का अपार समर्थन विस्मय में डाल देता है। यह समर्थन हमें कई तथ्यों की तरफ देखने को उन्मुख करता है, शायद हम जिन्हें महत्वपूर्ण नहीं मानते।
जनता के समर्थन का विश्वास, सरकार के जनपक्षीय चरित्र की उसकी प्रतीक्षित अभीप्सा का उद्घोष है। हमारे द्वारा चुनी हुई सरकार हमारे लिये हो, यह जनमानस की छाती में दबी हुई कितनी गहरी चाह है; इसे महसूसा जा सकता है। लोकतंत्र के मूल आदर्श के प्रति भारतीय जनता की कितनी उत्कष्ट निष्ठा है, उसे देखा जा सकता है।
यह प्रकरण इस बात की तरफ भी ध्यान ले जाता है कि काफी लम्बे अरसे से किसी प्रधानमंत्री ने कोई फैसला ही नहीं लिया। कोई ऐसा फैसला नहीं लिया, सरकारी मशनरी से बाहर जाकर जिससे जनता को लगे कि आमजन से उसका कोई सम्बन्ध है। प्रधानमंत्री के रूप में मोदी जी के फैसले से जनता के मन में अच्छाई की उम्मीद जगी है।
भारत की जनता ने अपना भरोसा अपने प्रधानमंत्री को दिया है। दे दिया है। भरोसे का भार अब उनके ऊपर है। भरोसे भार संभालना अब उनका काम है। इस बारे में सोचना अब उनका दायित्व है। अच्छा घटित हो यह उनकी जिम्मेदारी है।
जनता ‘ब्लैक मनी’ की पाबन्दी पर अपना पक्ष आशातीत ढंग से व्यक्त चुकी है। जनता ‘ब्लैक मैन’ को व्यवस्था से बाहर करने में अपने योगदान का आश्वासन दे रही है। उसका आश्वासन पक्का है। वह अच्छाई के लिये उठाये गये किसी भी असुविधाजनक कदम के साथ सारी कठिनाइयों को हँसते हुये सहते खड़ी है।
‘ब्लैक मैन’ कहाँ है? सबको पता है। उनका सुरक्षित ठिकाना व्यवस्था से बाहर नहीं, व्यवस्था के भीतर ही है। वे व्यवस्था बनाने में ही उसके अंग होकर बने पड़े हैं। वे व्यवस्था को जन विरोधी व्यवस्था बनाने में भिड़े है। जिनका दिल काला है, काला धन जुटाने में लगे हैं। देश के चेहरे पर कालिख पोतने में लगे हैं। समूचे तंत्र को कालातंत्र बनाने में लगे हैं। उनके बाहर होने से ही व्यवस्था साफ-सफेद हो सकती है।
यह बहुत आसान नहीं है। मगर बहुत कठिन भी नहीं है। इस देश की जनता बहुत कुछ नहीं मांग रही है। सदियों से कष्ट सहने की ताकत उसने पूरी-पूरी बना रखी है। अपने देश के किसान ‘कम्पनी प्रोडक्ट’ के मेगामार्ट से पहले देशी उत्पादों के खरीद के ‘मेगा सेन्टर’ मांग रहे हैं। मजदूर प्रतिदिन के काम मांग रहे हैं। बेरोजगार जीने-खाने भर के कमाने के अवसर मांग रहे हैं यह बस कुछ, कुछ अच्छा घटित होने की उम्मीद पर निर्भर है।
इस महान देश की जनता का भरोसा बचा लेना आपके हाथ है। यह बच जाय तो देश बचा रह जायेगा। यह भरोसा बढ़ जाय तो देश जरूर आगे बढ़ जायेगा।

जो तमाशा नहीं है

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

गली-गली ढोल-नगाड़े बजा-बजाकर लोगों को जुटाया गया था। लोग इकट्ठे हो गये थे। एक खुली जगह में भारी भीड़ समायी हुई थी। वहाँ आदमी नहीं थे अब, केवल भीड़ थी। उत्सुकता थी। तमाशा शुरू हो चुका था। तमाशा शुरू करने से पहले मदारी ने भीड़ को भलीभाँति समझा दिया था कि तमाशा आपके लिये पेश किया जा रहा है। इस खेल का मकसद आपका स्वास्थ्य है। आपकी सुभीता है। आपकी सुरक्षा है। आपका विकास है।
भीड़ तमाशा देख रही थी। भीड़ तन्मय थी। भीड़ अवाक थी। भीड़ स्तब्ध थी। भीड़ ताली बजा रही थी। भीड़ जय बोल रही थी। तरह-तरह के करतब देखकर, सुनकर भीड़ चकित थी। भीड़ जब भी होती है, सबसे पहले चकित होती है। भीड़ हमेशा चकित होते-होते थकित हो जाती है। मुझे लग रहा था तमाशा भीड़ के लिये नहीं है। भीड़ तमाशा के लिये है।
मैं देख रहा था पेट की आग, आग के घेरे में कूद रही थी। कूदकर घेरा फाँद रही थी। भूख बड़ी गजब की चीज है। वह न जाने कैसे-कैसे करतब सिखला देती है। आदमी कुछ भी करने पर उतारू हो जाता है। कुछ भी कर लेता है। कुछ भी कर दिखाता है। खैर, पेट की भूख तो मामूली भूख होती है। मुट्ठी भर अन्न के दानों से, चुल्लू भर पानी से शान्त हो जाती है।
मगर यह तो मामूली भूख है। दौलत की भूख, शोहरत की भूख, शान की भूख, सत्ता की भूख, आश्चर्यजनक भूख है। वह सात समुन्दर का सारा पानी पीकर भी नहीं बुझती। वह बुझती नहीं कभी भी, केवल जलती है। वह तरह-तरह के तमाशे रचती है। बड़े-बड़े तमाशे। ऊँचे-ऊँचे तमाशे। लम्बे-लम्बे तमाशे। गहरे-गहरे तमाशे। वह तमाशे के लिये भीड़ जुटाती रहती है। तमाशा होता रहता है, भीड़ देखती रहती है। भीड़ तालियां बजाती है, चिल्लाती है। भीड़ जिन्दाबाद बोलती है। मुर्दाबाद बोलती है। भीड़ हंसती है। भीड़ रोती है। मगर भीड़ तमाशा देखती है।
मेरे मन में कुछ सवाल उठते हैं। तमाशा देखना भीड़ की नियति है, क्या?
तमाशा देखना भीड़ की नियति क्यों है? क्या केवल किसी तमाशा के लिये ही भीड़ होती है? बिना तमाशा के भीड़ होना संभव नहीं क्या? हमारे लोकतंत्र में जनता भीड़ क्यों बन गई है? जनता भीड़ कैसे बन गई है? मैं नहीं जानता ये सवाल वाजिब हैं या गैरवाजिब। मगर मैं क्या करूं। ये सवाल तो खड़े हो गये हैं। ये तमाशा के आगे खड़े हो गये हैं। तमाशा का मजा बिगाड़ने पर ये एकदम आमादा हैं। पूरी तरह उतारू हैं। मैं सवालों को पूरी ताकत से बैठाने की कोशिश करता हूँ।
मैं तमाशा देख रहा हूँ। मेरी आँखों के आगे मेरा देश खड़ा हो जाता है। मैं देख रहा हूँ, हमारे पूरे देश में तमाशा हो रहा है। जगह-जगह, हर जगह तमाशा हो रहा है। तमाशा दिखाने की संविधान सम्मत कंपनियां हैं। कंपनियां अपने तरह से अपनी पसंद के तमाशे दिखा रही हैं। दिल्ली में किसी कंपनी का तमाशा चल रहा है। लखनऊ में किसी दूसरी कम्पनी का। पटना में किसी दूसरी का। मगर चल रहा है हर कहीं।
राजा का सेवक बन जाना कभी-कभी मध्यकालीन या पुराकालीन आदर्श कथाओं में सुनने में आ जाया करता था। मगर सेवक का राजा बन जाना मौजूदा लोकतंत्र का ऐसा वैचारिक ‘लीजेण्ड’ है, जिसका केवल अचरज से मुँह ताकते रहा जा सकता है। समूचा हिन्दुस्तान अपनी पीड़ा में तड़फड़ा रहा है और हिन्दुस्तान की सेवा के लिये सेवकों में धक्का-मुक्की मची है। अधिनायक के अधिकार से भरे हुये सेवकों का हुजूम, राजसी वैभव से लदा-फँदा सेवकों का समूह; अपने रोब-दाब से दिलों को दहलाता सेवकों का जत्था, अपनी मनमानी पर उतारू सेवकों का दल, नहीं, दल ही नहीं दल का दल हिन्दुस्तान को अपनी सेवा समर्पित करने के लिये रौद रहा है। यह सेवा का तमाशा सबसे दिलचस्प तमाशा है।
यह सेवा का मिथक, मिथकों के इतिहास का सबसे नया, सबसे जटिल और सबसे दुर्बोध मिथक है, जिसका हमें सबसे अधिक बोध है।
कोई कम्पनी हिन्दुस्तान का चेहरा बदलने का तमाशा खेल रही है। उसका कहना है कि विश्व बाजार में हिन्दुस्तान का चेहरा ठीक नहीं है। वह ग्राहकों को लुभाने लायक नहीं है। उसका कहना है हिन्दुस्तान का चेहरा खिला होना चाहिए। हम खिलाकर दिखायेंगे दुनियाँ को। मगर कैसे? हिन्दुस्तान पूछना चाहता है। हमारे चेहरे पर तो बदहाली की हवाइयाँ उड़ रही हैं, बेरोजगारी के थप्पड़ों के लाल निशान हैं, असुरक्षा का आतंक है, अशिक्षा का कीचड़ है।
‘‘तो क्या हुआ। कीचड़ में ही तो कमल खिलता है।
‘‘कैसे खिलेगा?’’
‘‘यह ‘पे-टियम’ है न, यह खिला देगा। यह सबके चेहरे को खिला देगा। यह समूचे हिन्दुस्तान के चेहरे को खिला देगा। ताजे फूल की तरह प्रफुल्ल बना देगा।’’
‘‘अपने हाथों से हल छोड़िये, कुदाल छोड़िये, खुरपी छोड़िये, कलम छोड़िये, करघा छोड़िये। सबकुछ छोड़कर ‘पे-टियम’ गहिये।
‘‘पे-टियम’ आपको सबकुछ देगा। चावल देगा, आंटा देगा, आलू देगा। सबकुछ तो देगा ही पेट भरने के बाद की डकार भी देगा। फिर नींद में सपने भी।

किसानों का अनाज खलिहान में पड़ा रहे, कोई बात नहीं। किसानों को खाद पर सब्सिडी न मिले कोई बात नहीं। आपदा-राहत का चेक बीच रास्ते से गायब हो जाय कोई चिन्ता नहीं। हम गाँव-गाँव में ‘मेगा मार्ट’ बनायेंगे। ‘फास्ट फूड के प्रोडक्ट हैं न! कोई फिक्र नहीं।’
कोई कम्पनी कहती है कि हम हिन्दुस्तान का कलेजा हाथी जैसा बनायेंगे। कलेजा मजबूत रहेगा तो देश सब कुछ सह लेगा। भ्रष्टाचार का ओला पड़ता रहे, सह लेगा। बेईमानी की आंधी चलती रहे कोई बात नहीं। मजदूरों के हाथों को काम न मिले कोई बात नहीं। जब देश हाथी जैसा होगा तो चलता रहेगा अपने रास्ते। कुत्ते भौंकते रहें तो भौंकते रहें, उनकी कोई परवाह नहीं।
एक तमाशा कम्पनी मंच पर पारिवारिक कलह के उत्तेजक खेल पूरे कौशल से दिखाकर बता रही है कि हमारे परिवार में कोई विवाद नहीं है। हम सब एक हैं। अब परिवार में कोई दिक्कत नहीं है यानी अब देश में कोई दिक्कत नहीं है। उनके लिये अपना परिवार ही अपना देश है। यह समूचा देश उनके परिवार का है। पूरे देश को अपने परिवार का बनाने खातिर कुछ भी करने में उनको कोई हिचक न होगी।
यह देश हमारा कैसे हो जाय इसके लिये सारी कंपनियां खून-पसीना बहाकर दिन-रात एक किये हैं। किसिम-किसिम के करतब इजाद कर रही है। लगातार अभ्यास में लीन है। प्रदर्शन में मशगूल है।
सारा देश तमाशा देख रहा है। नये-नये तमाशे। शेर की तरह गरजने वाले तमाशे। घड़ियाल के आंसू रोने वाले तमाशे। गीदड़ की तरह माँद में घुस जाने वाले तमाशे। साँप और नेवले की लड़ाई वाले तमाशे। जीती-जागती शहादत वाले तमाशे। झूठ के अनगिनत तमाशे। रोज-रोज। हर रोज। हर कहीं।
अब तमाशे की मुनादी के लिये ढोल-नगाड़े का इस्तेमाल नहीं है। उसका युग बीत गया। उसका उपयोग भारत में होता था। अब हम इंडिया में हैं। हम तकनीकी क्रांति के युग में चरण जमा चुके हैं।
हम उत्थान की सीढ़ियां चढ़कर ‘डिजिटल’ के सोपान पर खड़े हैं। अब तमाशे की मुनादी के लिये हमारे पास इंटरनेट है, स्मार्टफोन है, टी.वी. में समाचार के स्वतंत्र चैनल हैं, बकायदा। अब तमाशा देखने के लिये बड़ा सुभीता है। अब घर बैठे सारे तमाशे का सजीव प्रसारण पूरे दृश्यबोध के साथ आपके लिये सुलभ है। अब आदमी के लिये आँख कान की जरूरत नहीं है। अब हमारे आँख-कान समाचार चैनल हैं। जो दिखा दे, सुना दें, उनकी मर्जी। हमें वहीे देखना है, जो वे दिखाना चाहें। वही सुनना है, जो वे सुनाना चाहें। हम सब भीड़ हैं। हम सब देख रहे है। हम वह सब कुछ देख रहे हैं जो तमाशा नहीं है।

प्राणों के दीप जलाकर

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

दीवाली आ रही है। वह बाजार के बहुत नजदीक है। घरों से अभी दूर है।
दीवाली पहले बाजारों में क्यों आ जाती है? दीवाली की उजास से बाजार लम्बे समय तक क्यों जगमग बने रहते हैं? बाजार की रोशनी से चमकती आँखों की ओर आँख उठाकर ताकतें हमारे घरों का मुँह भकुआ क्यों जाता है? हर बार दीवाली आने से पहले ये सवाल आकर मुझे घेर लेते हैं। मैं उजबक की तरह उनका मुंह ताकता रह जाता हूँ।
मगर प्रश्न, प्रश्न हैं और त्योहार, त्योहार। हमारे त्योहारों में हमारे पारंपरिक विश्वास इतना बल है कि वह प्रश्नों की पूरी फौज को पराजित करके अपनी विजय का ध्वज समय की छाती पर, गाड़ देते हैं। हमारे पर्व हमारी अदम्य जिजीविषा के अचूक स्रोत के मार्गदर्शक आकाश दीप हैं, आँधियों में भी अकम्प जलने वाले आकाश दीप।

दीवाली से पहले हमारे बाजार मोम के दीयों से पट गये हैं। दुकानें सज गई हैं। रंग-बिरंगे मोम के दीपक हमारा चित्त लुभा रहे हैं। हमारे समय के बाजार में जो दीये दिख रहे हैं, उपलब्ध हैं सब बुझे हुये दीये हैं। जलते हुये दीपों की, जलते रहने वाले दीपों की कोई दुकान हमारे समय के बाजार में नहीं है। क्यों नहीं है? हमें पता नहीं है। हमें पता है कि मोम के दीये बाती जलते ही गलने लगते हैं। जरा-सी रोशनी की आँच में पिघल जाते हैं। रोशनी बाँटने का दम भरने वाले खुद रोशनी में आते ही गलने लगने लग जाते हैं। गलते-गलते कुछ ही समय में पूरा गल जाते हैं। उगते-उगते ही ढल जाते हैं। अँधरे में समा जाते हैं। वे सिर्फ अपने होने की जगह पर छोड़ जाते हैं, कालिख का एक भद्दा निशान। निशान, जो हमारी जमीन को धब्बेदार बना देता है। फिर भी, हमें दीवाली मनानी है- मनानी ही होगी इन्हीं दीयों के सहारे।

मिट्टी के दीये खोजने पर बड़ी मेहनत से मिलते हैं। मिल जाते हैं, कहीं-कहीं। मगर मशक्कत के साथ। हमारे समय में अपनी माटी की चीजें मिट्टी में मिला दी गई हैं। मिट्टी बन गई हैं। मिट्टी हो गई हैं। हमारे गाँवों में दीये गढ़ने के लिये कुम्हारों के पास जमीन नहीं है, माटी निकालने के लिए। उनके घरों में अब चाक नहीं है, जो चाक गीली मिट्टी को जाने कितने-कितने रूप और रंग देता था, अब उनके पास नहीं है। उनके पास सिर्फ उनके हाथ में एक प्रमाण पत्र है। जाति का प्रमाण पत्र। हमारे अंचल के सारे कुम्हार अनुसूचित जनजाति के खरवार हो गये हैं। हमारी सरकार ने उनके हाथों में यह प्रमाण पत्र थमा दिया है। वे अपने खाली हाथों में प्रमाण पत्र थामे, विकास और सुनहरे दिनों के वायदों का मुंह ताक रहे हैं।
हमारे गाँवों में अब माटी के दीये नहीं हैं। हमारे कपास के खेत अपनी सूनी आँखों से रूई की बाती के लिए कोलतारी सड़कों के सहारे सौदा-सुलुफ की भाषा सीखने के लिये कहीं दूर ताक रहे हैं। अब हमारे गाँवों के घरों में घी नहीं है। दूध ही नहीं बचा तो घी कहाँ से होगा। हमारे गाँवों में सिर्फ चाय भर दूध मुश्किल से बच पा रहा है। बाकी सबका सब डेयरियां हजम कर जा रही हैं। अपने मुनाफे के पेट में।

हम मार्टी के दीयों में घी की बत्तियाँ जलाकर अपनी ड्योढ़ी में रोशनी रखते रहे हैं। ड्योढ़ी में रखे घी के दिये घर के अंदर भी रोशनी करते रहे हैं और घर के बाहर भी। हमारे घर भी प्रकाशित होते रहे हैं, हमारा पड़ोस भी प्रकाशित होता रहा है। हमारी पारस्परिकता भी प्रकाशित होती रही है। हमारी पारस्परिकता में हमारे देश का प्रकाश दुनिया में फैलता रहा है। अब हमारी दीवाली में बारूदी पटाखों का भयावह विस्फोट है, विषैला धुँआ है, हमारी पारस्परिकता का ठहाका नहीं है। पारस्परिकता के अट्टहास के बिना हमारे पर्वों के कण्ठ गूँगे हो गये हैं। हमारी परम्परा में माटी के दीये जलाकर दीवाली मनाने वाले गाँव-गाँव में घर-घर में होते रहे हैं। आज हमारे समय में दीवाली मोम की दीवाली बनकर रह गई है। हमारा समय मोम के पिघलते स्तंभों का समय बनकर रह गया है।

हम दीवाली मना रहे हैं, मगर हमारे प्रणों में पैठा अँधेरा घट नहीं रहा है। हम मकान बनाते जा रहे मगर हमारा पड़ोस गुम होता जा रहा है। हम बड़ी-बड़ी कालोनियों बसाते जा रहे हैं, हमारी पारस्परिकता उजड़ती जा रही है। हम अपने घरों में किसिम-किसिम के सामान भरते जा रहे है, हमारा अन्तर खाली होता जा रहा है। हम खुशी के लिये पटाखे फोड़ते जा रहे हैं, हमारे भीतर उदासी भरती जा रही है। हम बहुत कुछ पीते जा रहे हैं, हमारी प्यास बढ़ती जा रही है। हम बहुत कुछ पढ़ रहे हैं मगर कीचड़ से आगे बढ़ नहीं रहे हैं। हम पढ़ते जा रहे हैं फिर भी लड़ते जा रहे हैं।

हमारे समय के प्राणी बुझे हुये प्राणों के प्राणी होते जा रहे है। नहीं, भाई नहीं, बुझे हुये प्राण को लेकर दीवाली कैसे होगी। दीवाली तो जलते हुये प्राणों का पर्व है। जलते हुये प्राणों की पारस्परिकता की श्रृंखला ही राष्ट्र की अस्मिता है। अपनी विरासत का वैभव है। अपनी आस्था का आलोक है।

हम जाने कबसे सूनेपन की मस्ती भूल चुके हैं। जिस सूनेपन में सामूहिक अस्तित्व की एकता का संगीत बजता है, उसे सुनने का हमारे पास अवकाश नहीं है। हमारे प्राणों के स्पन्दन में सम्बन्धों की ऊष्मा सोये हुये चूल्हे की तरह ठंडी पड़ गई है। हमारी सांसों के सपने में घर नहीं है, परिवार नहीं है, राष्ट्र नहीं है। हमारे ठिठुरते हुये गणतंत्र में हमारे प्राण सिकुड़ रहे हैं। दीवाली वैयक्तिक उत्कर्ष के आग्रह का पर्व नहीं है। यह सामूहिक अभ्युन्नति, सामूहिक समृद्धि और सामूहिक उल्लास की आराधना का आलोकपर्व है। हमारी दीवाली, दीप नहीं, दीपमाला के अनुष्ठान का आयोजन रचती है। जलते हुये दीपों की श्रृंखला से प्रकाश की अविरल धारा का प्रवाह पैदा करने का उल्लास और उत्साह ही दीवाली का प्राण है। स्वयं प्रकाशित होने और अपने प्रकाश से दूसरों में प्रकाश के स्रोत को जगा देना, हमारे प्रकाश पर्व की अभीप्सा है। हमारे प्रकाश पर्व की इस अभीप्सा को अपने प्राणों की अभीप्सा बना लेना हमारे समय की पुकार है।
दीवाली के समय महादेवी जी की एक कविता की पंक्तियाँ स्मृति को बहुत उद्वेलित कर रही हैं-
‘‘अपने इस सूनेपन की मैं हूँ रानी मतवाली
प्राणों के दीप जलाकर करती रहती दीवाली।।’’
दीवाली के मौके पर मैं महादेवी की कविता का उद्वेलन अपने समय के सभी साथियों को बांटने का बहुत-बहुत मन रखता हूँ।
हम दीवाली पर अपने प्राणों के दीप जलायें। अपने-अपने प्राणों के दीप जलायंे। जले हुये प्राणों के दीपों से दीपमाला सजायें। अपने उजास से, अपने-अपने उजास से अपने राष्ट्र को अलोकित कर दें। हमारे आलोक की अभीप्सा जन-जन के मँगलेच्छा की अभीप्सा है। हमारी अभीप्सा अंधकार के उच्छेद की अभीप्सा है। अंधकार के अलोप की अभीप्सा है,- ‘‘अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाये।’’ मित्रों! प्राणों के दीप जलाकर चलो मनायें दीवाली।

अनर्थकरी विद्या का व्यवसाय

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

अर्थकारी विद्या ही सुख और समुन्नति का साधन होती है, ऐसा हमारे शास्त्रों में बार-बार कहा गया है। हमारा दुर्भाग्य यह है कि हम अर्थ के मायने धन के अलावा कुछ और भी होता है, बिल्कुल भूल चुके हैं। अर्थ के और भी अर्थ होते हैं, यह हमारी स्मृति में है ही नहीं। जीवन व्यवहार के लिए अविष्कृत भाषा का रूढ़ हो जाना, मनुष्य जाति के लिये जितना पीड़ादायक है उतना और कुछ भी नहीं। भाषा के व्यापक विस्तार का संकुचित हो जाना, हमारे जीवन विस्तार के संकुचन को ही प्रमाणित करता है। बहुस्तरीय अर्थव्यंजना के शब्दों का इकहरे अर्थ में सीमित होते जाना हमारे जीवन-बोध के निरन्तर उथले होते जाने की करुण नियति का साक्ष्य है।
हमारे पारंपरिक चिन्तन में व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण स्वतंत्रता की गरिमा के साथ समाज की इकाई है। राष्ट्र का तत्व है। शिक्षा, व्यक्ति को समाज और राष्ट्र द्वारा सुलभ कराई जाती है। वह समाज का और राष्ट्र का अवदान है, व्यक्ति के लिए। एक शिक्षित व्यक्ति दूसरों की तुलना में अधिक ऋणी है, समाज का और राष्ट्र का। मगर हमारे समय में ऐसा नहीं है।
ऐसा क्यों नहीं है? यह बड़ा ही पीड़ादायक प्रश्न है। इस प्रश्न के सामने हम खड़ा होने का साहस ही नहीं जुटा पाते। स्वतंत्रता के बाद हमने जिस शिक्षा-व्यवस्था का विकास किया है, उसके बड़े ही विस्मयजनक परिणाम हमारे सामने हैं। हमारे समय का हर शिक्षित आदमी सोचता है कि समाज और राष्ट्र उसका ऋणी है। किसी भी हालत में समाज और राष्ट्र से उसे अपना ऋण ब्याज सहित वसूलना है। इसका उसे जन्मजात हक है। हमारी शिक्षा का पहला काम आदमी को उसकी जड़ से काटना है। जहां आदमी जनमा है, हरा हुआ है, जीवनरस पीकर बड़ा हुआ है, उस परिवार से, उस समाज से उसे उखाड़कर आत्मकेन्द्रित बनाने का काम शिक्षा का प्राथमिक काम है। कितना विस्मयजनक है- एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर आत्मकेन्द्रित मनुष्यों की बेशुमार आबादी का बढ़ते जाना। कैसा विपर्यय है व्यवस्था के आदर्शों के विपरीत व्यवस्था का परिणाम। हमारी समूची सामाजिक व्यवस्था अगर अपने आदर्शों के विपरीत परिणाम प्रगट कर रही है तो क्या यह इस बात का स्वयं प्रमाण नहीं है कि हमारी पूरी व्यवस्था ही छद्म व्यवस्था है। हम व्यवस्था में नहीं व्यवस्था के छद्म में जी रहे हैं। आकाश पर्यन्त फैले छद्म के वितान के नीचे जिन्दगी कैसी दारुण यातना है, उसे हमारा समय सबसे अधिक जानता है।
परिवार, समाज और राष्ट्र के साथ व्यक्ति के जो पारस्परिकता के सम्बन्ध सूत्र हैं, हमारी शिक्षा उसे विच्छिन्न करने वाली शिक्षा है। इन्हीं आपसी सम्बन्धों को अर्थ प्रदान करने वाली विद्या को हमारी परम्परा में अर्थकारी विद्या कहा जाता रहा है, धन हड़पने के हथकण्डों को नहीं। विद्या केवल पेट पालने के कौशल और वैयक्तिक सुख-सुविधाओं के विस्तार का साधन नहीं है। शिक्षा व्यक्ति के साथ समाज और राष्ट्र की अभ्युन्नति का विवेक और शक्ति प्रदान करने वाला अपूर्व रसायन है। मगर यह बड़ा अजीब सच है कि हमारी स्वतंत्रता के बाद की समूची शिक्षा व्यवस्था हमारी पारस्परिकता को खण्डित और विच्छिन्न करने वाली साबित हो रही है। ऐसा क्यों है? यह सबसे विचारणीय प्रश्न है, जिस पर विचार करने का हमारा ध्यान ही नहीं जाता।
स्वतंत्रता के बाद जिस तरह के शिक्षित हमारे देश में तैयार हुये हैं, उनके विचार में और व्यवहार में पारस्परिकता, सामाजिकता और राष्ट्रीयता का कोई मूल्य बोध ही नहीं है। हम आज भी यह मानते हैं कि हमारे विकास में अशिक्षा सबसे बड़ी बाधा है। मगर सच यह है कि हमारे विकास में हमारी शिक्षा सबसे बड़ी बाधा है। राष्ट्रीय विकास के संसाधनों को अपने निजी विकास का जरिया बनाने वाली जमात अशिक्षितों की नहीं, शिक्षितों की है। पता नहीं हमारी शिक्षा की कैसी विडम्बना है कि हमें जो पढ़ाया जा रहा है, सिखाया जा रहा है, उसमें हमारी कोई रूचि नहीं है। जो नहीं पढ़ाया जा रहा है जो हमारे पाठ्यक्रमों के बाहर है, उसकी दक्षता में हम पूरे निपुण हैं। मसलन हमें पढ़ाया जाता है, पुल बनाना, सड़क बनाना, भवन बनाना और हम सीख लेते हैं पूरा-पूरा कमीशन बनाना। हमें पढ़ाई जाती है करुणा, हम सीखत लेते हैं क्रूरता। हमें सिखायी जाती है, मानव शरीर की सर्जरी, हम सीख लेते हैं, जेब काटने की कला। हमारी शिक्षा बेहद स्वार्थी क्रूर, हिंसक और लोलुप नागरिक तैयार कर रही है। हमारी शिक्षा, समाज को और राष्ट्र को कमजोर करके अपने को मजबूत बनाने का सपना देखने वाले मनुष्यों का उत्पाद बाजार मे ंउतार रही है। सचमुच यह कितना भयानक है। हमारे समय में देश सबका है, मगर देश का कोई नहीं है।
हमारे लोकतंत्र का मूल आधार बन्धुत्व है। बन्धुत्व के साथ संयुक्त होकर ही स्वतंत्रता अर्थवान होती है। बन्धुत्व के साथ ही समता का कोई अर्थ होता है। पारस्परिकता का विकास ही लोकतंत्र का अर्थ विस्तार है। कितना विस्मयजनक है लोकतंत्र के भीतर पारस्परिकता का क्षरण। क्षरण ही नहीं ध्वंस! हम अपने आदर्शों में लोकतंत्र का ढोल पीट रहे हैं और व्यवहार में पारस्परिकता का भयानक विध्वंस देख रहे हैं। परिवार से होकर राष्ट्र तक भयानक विघटन का विस्तार बराबर बढ़ता जा रहा है। बड़ा अद्भुत विपर्यय है कि जबसे हमने लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू की है अपने देश में, परिवार में विघटन की बाढ़ आ गई है। अब तो संयुक्त परिवार नाम की चीज पुरातात्विक धरोहर जैसी रह गई है। यह क्या है? कुछ समझ में नहीं आता, ऐसा क्यों है? हमने बाग लगाये आम के पेड़ तैयार हुए बबूल के। पारिवारिकता, पारस्परिकता, बन्धुत्व का विकास तो दूर उल्टे इनका समूल नाश ही हो गया।
अब परिवार, परिवार नहीं है। पड़ोस, पड़ोस नहीं है। गाँव, गाँव नहीं है। देश, देश नहीं है। दुनियां, दुनियां नहीं है। अब बस केवल स्वार्थ है। अपने स्वार्थ के साथ आदमी अकेला खड़ा है। बिल्कुल अकेला। सबसे अलग। उद्भ्रान्त-सा। बन्धुत्व को तो गोली मारो, हम किसी भी तरह के सम्बन्ध से हीन होकर रह गये हैं। हमारी समूची शिक्षा सिर्फ स्वार्थ को उत्प्रेरित और पोषित करने वाली शिक्षा होकर रह गई है। स्वतंत्र भारत के विकास में शर्मिन्दगी के जितने भी नायक मंच पर अभिनय कर रहे हैं, सभी शिक्षित हैं। शिक्षित ही नहीं उच्च शिक्षित हैं। हमारी शिक्षा ने जिस नस्ल के आदमियों को निर्मित किया है, उनकी प्राथमिकता में समाज नहीं है, देश नहीं है, परिवार नहीं है। उनकी प्रतिबद्धता पारस्परिक उत्कर्ष के प्रति नहीं, आत्मिक उत्कर्ष के प्रति है।
हमारे मनीषियों ने कभी कहा था,- परिवार के हित के लिये एक व्यक्ति को, गाँव के लिये एक परिवार को, देश के लिये एक गांव को और विश्व समुदाय के कल्याण के लिये एक देश को त्याग देना धर्म है। आज हम अपने हित के लिए, व्यक्तिहित के लिये-गांव, समाज, देश और विश्व मानव के हित को नहीं देख पा रहे हैं। हम अपने सिवाय किसी को नहीं, कुछ को नहीं देख रहे हैं। हम अन्धे हैं। हम अन्धे हो गये हैं। हम पढ़े-लिखे हैं मगर अन्धे हैं। हम अन्धे हैं मगर हमें पता नहीं है कि हम अन्धे हैं। फिर क्या उपाय है? क्या उम्मीद है? हमारी शिक्षा हमें हमारे अन्धेपन की खबर नहीं दे रही है।
यह शिक्षा अनर्थकारी शिक्षा है। हमारे समय में गांव-गांव में, बाजार-बाजार में, शहर-शहर में अनर्थकरी विद्या का व्यवसाय पसरा हुआ है।
हमारी अर्थकारी विद्या की विरासत अनर्थकरी विद्या के व्यवसाय में डूब रही है। शायद हमें, पता नहीं है। शायद हमें, पता है।

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