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Thursday, July 23, 2026

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कबिरा खड़ा बाजार में

Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

कबीर बेधड़क बाजार में आने-जाने वाले आदमी हैं। बीच बाजार में खड़े होने का असम साहस कबीर में है। वे अपने काते-बुने कपड़े भी लेकर बाजार में निकलते रहे हैं। वे अपनी कविता भी लेकर बाजार में निकलते रहे हैं। वे अपनी लुकाठी लेकर भी बाजार में निकलते रहे हैं। कबीर के हाथ में वस्त्र भी था। कविता भी थी। लुकाठी भी थी। बड़ा विस्मय होता है। इस विस्मय जनक विरल आदमी को देख पाने के लिए बराबर मन मचलता रहता है। मन का क्या, मन तो जाने किस-किसके लिये, किन-किन चीजों के लिये मचलता रहता है। मगर कुछ भी कहाँ हो पाता है। लगता है, हमारे समय में हमारा और हमारे जैसों का मन सिर्फ मचलने के लिये ही रह गया है। खैर!
कबीर की कविता जीवन के अन्तर और बाह्य दोनों छोरों के सच को छूती कविता है। कबीर के वस्त्र उनके न होने के बाद भले सुलभ न रह गये हों मगर उनकी कविता आज भी हमारे लिये ओढ़ने-पहनने के काम की बनी हुई है। कविता का ओढ़ने पहने के काम का बने रहना कविता के लिये कैसा है, इसका निर्णय बड़ा मुश्किल है।
अभी थोड़े दिनों पहले मैंने एक प्रख्यात लेखिका का कबीर के बारे में एक लेख पढ़ा। उस लेख में उन्होंने कबीर के हिन्दू होने के पक्ष में अपनी कल्पनाशक्ति से कबीर की कविता से अनेकों उद्धरण देकर उनको हिन्दू सिद्ध करके ही दम लिया। उनका तर्क है कि कबीर की कविता में हिन्दू धर्म के प्रतीकों, पद्धतियों और आचार-व्यवहार की जितनी गहरी पकड़ मिलती है, उससे उनका हिन्दू होना सिद्ध होता है। मजेदार बात है कि कबीर की जाति के बारे में इतिहास में बहस करने का अवकाश है। तर्क रखने की गुंजाइश है। मैं सोच में पड़ गया हूँ कि कबीर की जाति तय कर लेने से उनकी कविता के अर्थ में, उसकी व्यंजना में, उसकी व्याप्ति में कुछ फर्क पड़ने की संभावना दिखाई देती है, क्या? अगर ऐसा है, तो ठीक। चलो पहले जाति ही तय कर लें। कविता जो जाति-धर्म की सरहदों को पार करके पैदा होती है, उसको समझने के लिये जाति-निर्धारण की आवश्यकता कितनी बेधक है।
जहाँ तक हिन्दू प्रतीकों, विश्वासों और व्यवहारों की जानकारी और कविता में प्रयोग की बात है तो इसी तर्क के आधार पर जायसी और रहीम को भी हिन्दू होना ही पड़ेगा। मेरा मन उन लेखिका से बार-बार यह पूछ लेना चाहता है कि कबीर के हिन्दू ठहरा दिये जाने से हिन्दुओं को कोई अतिरिक्त लाभ मिल सकेगा क्या? कबीर के हिन्दू न होने की दशा में हिन्दुओं को उनकी वजह से कुछ नुकसान उठाना पड़ता है क्या?
इस लेख के पढ़ने के आस-पास ही एक प्रतिष्ठित पत्रिका में एक प्रतिष्ठित मुसलमान लेखक का कबीर के बारे में एक और लेख पढ़ा। इस लेख में उन्होंने बड़े परिश्रम से यह प्रमाणित किया है कि कबीर को मुस्लिम धर्म-व्यवहार की सही जानकारी नहीं थी। उनकी कविता में इस्लाम की रीति-नीति का त्रुटिपूर्ण वर्णन अनेक जगहों पर मिलता है। उनके विचार से कबीर मुसलमान जाति के नहीं मालूम पड़ते हैं।
कितना विलक्षण विपर्यय है। कबीर को लेकर यह विपर्यय कितना बेधक है। एक हिन्दूवादी लेखिका कबीर को हिन्दू साबित करने पर तुली हैं। एक धर्मनिरपेक्ष कहा जानेवाला मुसलमान लेखक कबीर को मुसलमान न मानने पर आमादा हैं। दोनों की निष्पत्तियाँ एक ही हैं। कितना आश्चर्यजनक है, विचार के दो ध्रुवों पर स्थित विचारकों का कबीर को लेकर एक जैसा निर्णय। साहित्य के लिये दोनों की सोच कितनी निरर्थक है। पता नहीं क्यों, पता नहीं कैसे हमारे समय में कबीर से अधिक महत्व की चीज उनकी जाति हो गयी है। क्या अब कविता के बारे में भी राजनीतिक दलों की गर्हित चिन्तन धारा के समान्तर जातीय आधार पर सोशल इंजीनियरिंग के नुस्खे आजमाने का समय शुरू होने वाला है? अगर ऐसा होने वाला है तो कितने शर्म की बात है! कितनी ग्लानि की बात है!
अभी-अभी एक मुलाकात में दलित विमर्श के एक क्रान्तिकारी कवि ने बताया कि उनका पक्का विश्वास है कि कबीर की स्वाभावित मृत्यु नहीं हुई थी, बल्कि कट्टरपंथियों ने उनकी हत्या कर दी थी। उन्होंने बताया कि उनके विश्वास का आधार यह है कि कबीर की क्रान्ति चेतना को कट्टरपंथी कभी बर्दाश्त कर ही नहीं सकते। कबीर जैसी कविता लिखने वाले की हत्या अवश्यंभावी है। इस दारुण सच पर इतिहासकारों ने जान-बूझकर पर्दा डालने के लिये चामत्कारिक घटनाओं की परिकल्पना रचकर उनकी मृत्यु से संबन्धित अविश्वसनीय और चामत्कारिक किंवदन्तियों को प्रचारित कर दिया है।
यह सब पढ़कर और सुनकर मैं तबसे तहप्रभ हूँ। स्तंभित हूँ। मेरा मन कबीर के समय में अपने को और अपने समय में कबीर को देखने को विकल है।
मैं देख रहा हूँ, हमारे समय में कबीर बीच बाजार में खड़े हैं। उनके हाथ में लुकाठी है। जलती हुई लुकाठी। उनकी लुकाठी में उनकी कविता की आग जल रही है। यह आग उनके आत्मबोध के तेल से प्रज्ज्वलित है। बिना आत्मबोध के पाखण्ड को जलाने वाली कोई आग जल ही नहीं सकती। मगर हमने तो कबीर की कविता में व्याप्त उनके आत्मबोध को न जाने कबसे ठुकरा रखा है। केवल पाखण्ड विडम्बन को पकड़ रखा है। अब उनके पाखण्ड बिडम्बन को भी हम भुनाने की जुगत में लगे हैं। हिन्दू सोच रहे हैं, हिन्दुओं के पाखण्ड पर प्रहार करने वाला हिन्दू ही हो तो बेहतर है। इसलिये वे कबीर को हिन्दू सिद्ध करने पर तुले हैं। मुसलमानों को इस्लाम में व्याप्त पाखण्ड को उजागर करने वाला मुसलमान किसी हाल में कबूल नहीं है। इसलिए वे कबीर को मुसलमान न मानने के पक्ष में हैं।
इधर कबीर हैं कि हमारे लोकतंत्र के सट्टा बाजार में अपनी कविता की लुकाठी लिये खड़े हैं। कबीर उस बाजार में खड़े हैं, जहां आदमी आदमी नहीं महज एक वोट है। वोट खरीदने और बेंचने की दुकानें सजी हैं। जाति के मूल्य पर, धर्म के मूल्य पर, धर्म निरपेक्षता के मूल्य पर, पिछड़े और दलित के मूल्य पर, विकास के वायदे के मूल्य पर, वोट खरीद-फरोख्त का धन्धा बाजार में अपने रंग में है। हर दुकानदार कबीर को अपनी दुकान में घसीट लाना चाहता है। सारे दुकानदारों ने कबीर की लुकाठी पर पानी फेंक कर बुझा दिया है। सबने मिलकर उनकी लुकाठी उनसे छीनकर सड़क पर फेंक दी है। बीच सड़क पर कबीर की बुझी हुई लुकाठी पड़ी है। कबीर को अपनी दुकान में अपने उत्पाद के विज्ञापन के लिये खींच लाने को दुकानदारों में धक्का-मुक्की मची हुई है।
सभी अपनी-अपनी दुकान की तरफ खींच रहे हैं कबीर को। मगर कबीर हैं कि टस से मस नहीं हो रहे हैं। कबीर बीच बाजार में, बीच सड़क में खड़े हैं, सभी दुकानों से समान दूरी पर। कबीर अकेले रहेंगे मगर किसी दुकानदार के साथ नहीं जायेंगे। वे न हिन्दू दुकानदार के साथ होंगे न मुस्लिम दुकानदार के साथ, न किसी अन्य जाति के दुकानदार के साथ। कबीर की कविता दुकानों से बाहर रहकर दुकानदारों को धिक्कारती रहेगी। कबीर हिन्दू साबित हों, न हों कोई फर्क नहीं पड़ता। वे हिन्दू धर्म के निन्दक नहीं है। वे सिर्फ हिन्दू अन्धता के समर्थक नहीं हैं। कबीर को मुसलमान मानें न मानें वे इस्लाम के विरोधी नहीं है। वे सिर्फ इस्लामिक कठमुल्लेपन के उपासक नहीं है। जहाँ भी पाखण्ड है, अन्धापन है, छल है, दिखावा है, कबीर की कविता उसका उपहास करती रहेगी।
किसी भी समय में बाजार चाहे जितना कुत्सित रूप धारण कर ले, चाहे जितना हत्यारा रूप अख्तियार कर ले मगर उसकी स्वार्थी कट्टरता कभी भी कबीर की कविता की हत्या करने की कूबत नहीं पा सकती। कबीर की कविता हमेशा-हमेशा दुकानदारों को बीच बाजार धिक्कारती रहेगी।

राष्ट्रगान से बाहर होता राष्ट्र

Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

आजादी के आन्दोलन के दौरान स्वतंत्रता की अभीप्सा से उत्क्रान्त भारतीय चेतना की बिल्कुल नयी, मौलिक और ठोस उपलब्धि राष्ट्र की परिकल्पना है। राष्ट्र के स्वरूप से प्रेम और राष्ट्र की अस्मिता के प्रति पूजा का यह भाव भारतीय इतिहास की महत्तम उपलब्धि है।
बहुसंख्यक देवताओं के इस देश में राष्ट्र देवता की उपस्थिति बहुत-बहुत अर्थों में बेहद मूल्यवान है। यह देवता चेतना के सूक्ष्म धरातल पर अवलम्बित न होकर हमारे प्रत्यक्ष बोध पर आधारित है। वह इतना ठोस और प्रत्यक्ष है कि हम अपने हर व्यवहार में उससे अनायास जुड़े हैं। इतना ही नहीं, वह हमारे बीच पहली बार एक ऐसे देवता के रूप में है जिसके अस्तित्व में हमारा अस्तित्व ही घटक के रूप में मौजूद है। हर देशवासी देश की अस्मिता के तत्व में मौजूद है। हमारे देवता का स्वरूप हमारे ही स्वरूप के सामूहिक संयोजन का स्वरूप है। ‘राष्ट्र देवता’ की अस्मिता में राष्ट्र के हर नागरिक की,- प्रथम नागरिक से लेकर अन्तिम नागरिक तक की अस्मिता समाहित है। अपने ही अस्तित्व के पूंजीभूत विग्रह से मिला हुआ यह देवता अन्यतम है।
हमारी परंपरा में कुल देवता और ग्राम देवता पहले से मौजूद थे। राष्ट्र देवता के रूप में उनका उन्नयन भारतीय जाति के चिन्तन के विस्तार और उत्कर्ष का साक्ष्य बन जाता है। राष्ट्र देवता की परिकल्पना में हमें अनायास ही कृष्ण की गोवर्धनपूजा के मन्तव्य का आधुनिक विकास भी सुलभ हो जाता है। ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रदेव की धारणा हमारी गौरवपूर्ण उपलब्धि बन जाती है। राष्ट्र पूजा और राष्ट्र प्रेम की आस्था के पीछे और कुछ नहीं भारतीय जाति की सामूहिक उन्नति, सामूहिक उत्कर्ष, सामूहिक समृद्धि और सामूहिक मजबूती की अदम्य अभिलाषा ही जाग्रतहोकर सजीव हो उठी थी। राष्ट्र की देवता के रूप में अधिष्ठापना भारतीय जनमानस की सामूहिक अस्मिता की पहचान की उद्घोषणा से अलग नहीं है। इसी उद्घोषणा का सम्पूर्ण उद्घोष भारतीय अस्मिता को वैश्विक धरातल पर प्रतिष्ठित करने वाले कवि गुरु रवीन्द्र नाथ ठाकुर के राष्ट्रगान में व्यक्त है।
रवीन्द्र नाथ ठाकुर के राष्ट्रगान में हमारी आस्था और हमारे प्यार का केन्द्र राष्ट्र अपने सारे अवयवों और उपादानों के साथ अपनी समूची आन्तरिक समृद्धि में उपस्थित है। इसमें बंकिम चन्द के ‘वन्दे मारतम्’ की समूची गरिमा भी गुंजित है। इसमें जयशंकर प्रसाद के ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ की असीमता का गौरव बोध भी समाहित है। हमारे राष्ट्रगान में राष्ट्रबोध और राष्ट्रभक्ति का अपूर्व सामासिक संयोजन चामत्कारिक रूप से घटित हो सका है। हम कह सकते हैं कि स्वाधीनता आन्दोलन के समूचे सर्वथा मौलिक मूल्याबोध को राष्ट्रगान अकेले पूरी तरह से व्यक्त करने में सफल सिद्ध हो सका है।
भारत को जन-गण का नहीं अपितु जन-गण-मन का अधिनायक कहकर कवि ने सबसे कम शब्दों में अपूर्व रीति से बहुत बड़ी बात कहने में सफलता सिद्ध की है। अभी तक अधिनायक जन समूहों पर शासन करने वाले होते रहे हैं। मगर अभी-अभी जो भारत नाम का देवता हमारे बीच अधिष्ठित हुआ है, वह समस्त देशवासियों के हृदय पर प्यार पूर्ण शासन करने वाला है। उसका शासन प्यार का अनुशासन है। उसे सबने अपना हृदय दे रखा है। हृदय का सारा प्यार दे रखा है।
वस्तुतः राष्ट्रगान में ‘भारत भाग्य विधाता’ सम्बोधन पद नहीं है। संबोधन पद सिर्फ भारत है। यहाँ भारत का कोई भाग्य विधाता नहीं है। भारत ही सबका भाग्य विधाता है। समस्त भारतवासियों का अलग-अलग भाग्य नहीं है। बल्कि समस्त देशवासियों के भाग्य का निर्माण करने वाला, उनके भविष्य को बनाने वाला स्वयं भारत है। राष्ट्र से ही समस्त राष्ट्रवासियों का भाग्य जुड़ा हुआ है। बड़ी ही सादी किन्तु आलंकारिक शैली में कवि ने भारत राष्ट्र को संबोधित किया है। साभासिक भाषा में इतने विपुल अर्थ विस्तार का संयोजन कविता के क्षेत्र में यहाँ एक दुर्लभ घटना की तरह शोभित है। विराम और समास चिह्नों के साथ यदि कविता का आलेखन हो तो प्रारंभिक राष्ट्रगान की पंक्तियों का पाठ कुछ इस तरह का होगा –
’’जन (के) गण (के) मन (का) अधिनायक,
जय हे, भारत! भाग्य विधाता’’
यह पता नहीं हमारा दुर्भाग्य है या दुर्विपाक! जो भी कहें, मगर हमेशा ही हमारे बीच कुछ अपने को महत्तम समझने वाले लोगों की बुद्धि में अपनी राष्ट्रीय उपलबिधयों की हेयता को प्रमाणित करने की सूझ कौंध ही जाती है। राष्ट्रगान में भी कौंधी। उन्होंने राष्ट्रगान में ‘भारत भाग्य विधाता‘ पद को संबोधन समझ कर उसकी खोज शुरू कर दी। इस तलाश की मुकम्मल अभिव्यक्ति हिन्दी के विशिष्ट कवि रघुवीर सहायक की कविता की पंक्तियों में व्यक्त है –
राष्ट्रगान में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता
पहन सुथन्ना जिसके हरिचन्ना गुन गाता।।
राष्ट्रगान में भारत के भाग्य विधाता की खोज छिद्रान्वेषी दम्भी बुद्धिजीविता ने शुरू की और उपाधिधर्मी साहित्यिक अनुसंधानों की तरह जार्ज पंचम को खोज भी लिया। तब से अब तक एक वर्ग का दुष्प्रचार राष्ट्रगान के साथ चस्पा कर दिया गया कि यह कविता जार्ज पंचम के स्वागत के लिये जार्ज पंचम को संबोधित स्वागत गान है। राष्ट्रगान को स्वागतगान में बदलने वाली सूझ पर हमें गर्व करना चाहिये या ग्लानि में लज्जित होना चाहिए, यह तो भारतीय गणतंत्र के भावी उत्तराधिकारियों के गौरव पर निर्भर है। मगर हमें यह कत्तई नहीं भूलना चाहिये कि लोकतंत्र की अवधारणा का जन्म ही व्यक्ति सत्ता के निषेध और सामूहिक सत्ता की गरिमा की अभ्यर्थना से हुआ है। सामूहिक अस्तित्व की अभ्यर्थना ही राष्ट्र की अभ्यर्थना है, लोकतंत्र की अभ्यर्थना है। हम यह गर्व के साथ कहना चाहते हैं कि रवीन्द्र नाथ ठाकुर राष्ट्र और लोकतंत्र की गरिमा की अर्चना के आधुनिक भक्त कवि हैं।
हमारे राष्ट्रगान में हमारे राष्ट्र का ठोस और चाक्षुष स्वरूप भी मूर्तिमान है और उसका तरल आत्मिक स्वरूप भी उसमें बिम्बित है। ‘पंजाब-सिन्ध-गुजरात-मराठा’ में उसकी ठोस संरचना व्यक्त है और ‘विन्ध्य-हिमाचल-यमुना-गंगा’ में उसकी सांस्कृतिक आत्मचेतना बिम्बित है। इस विशाल देश की असीम जनभावना की भक्ति को-देश भक्ति- को कवि ने ‘तव शुभ नामे जागे’ कह कर जो मार्मिक उद्घाटन किया है, वह अन्यतम है। हृदयहारी है। देश के समस्त देशवासियों का जागरण देश के नाम के साथ होने का बोध देशभक्ति के अपूर्व भाव की अनूठी अभिव्यक्ति है। देश के नाम से जागकर अपनी सारी दिनचर्या को देशसेवा के लिये अर्पित करके फिर देश देवता से ही अपनी अभ्युन्नति के लिये आशीष मांगने का समुज्ज्वल भावबोध भगवद्भक्ति और देशभक्ति में अभेद की प्रतिष्ठा करता है।
भगवद्भक्ति की भिन्न प्रणालियों और भिन्न बोधों के बीच देश भक्ति की सर्वथा नयी प्रणाली और नये बोध को जोड़ने के कारण भक्ति के इतिहास में यह एक नये अध्याय का आविर्भाव है। इस अध्याय का हमारा राष्ट्रगान मंगलाचरण है। इस अध्याय का पाठ हमारे राष्ट्र और हमारे लोकतंत्र के वर्तमान और भावी गौरव का आधार है।
खेद की बात है कि हम औपचारिकता के निर्वाह में राष्ट्रगान तो गा लेते है मगर अपने सारे अवयवों और उपादानों के साथ राष्ट्रबोध से वंचित रह जाते हैं। हमारे राष्ट्रगान में राष्ट्र अनुपस्थित होता जा रहा है। राष्ट्रबोध के माध्यम से राष्ट्रभक्ति का सही पाठ हमारे राष्ट्रगान में संरक्षित है। भारतीय जन-मन में जय हे भारत! की गूँज ही भारत की अक्षुण्ण अभ्युन्नति की एकमात्र मंत्रशक्ति है। व्यक्ति की जयगाथा नहीं, दल की जयगाथा नहीं, देश की जय गाथा, देश के अन्तिम व्यक्ति की जयगाथा का अनुष्ठान ही देशभक्ति है।

सुन्दर की प्रतिष्ठा ही साहित्य का प्राण है

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

जीवन-जगत में सुन्दर और असुन्दर दोनों निर्विवाद रूप में हर काल में स्थित है। ऐसा नहीं है कि अतीत के काल खण्डों में सबकुछ सुन्दर ही सुन्दर रहा हो। ऐसा भी नहीं है कि भविष्य में सबकुछ सुन्दर ही होगा। यह भी सच नहीं है कि वर्तमान समय में असुन्दर अपेक्षाकृत अधिक है। यह सच है कि वर्तमान में हमें असुन्दर अधिक दिखाई देता है। इसका कारण केवल यह है कि हम वर्तमान काल को अधिक नजदीक से देख पाते हैं और बाकी काल की अपेक्षा। उसके साथ हमारे गहरे सरोकार हैं और हमारी सजीव अनुभूतियाँ जुड़ी हैं। फिर भी मनुष्य जाति की स्मृति हमेशा सुन्दर को ही अपने में सँजोने का स्वभाव रखती है। सुन्दर के साथ होने की मनुष्य की आकांक्षा उसकी सहजात है।
साहित्य मनुष्य के स्वभाव का ही सृजन है। मनुष्य और मनुष्य के बीच के पारस्परिक सम्बन्धों में व्याप्त सौन्दर्य की आन्तरिक धरातल पर प्रतिष्ठा ही साहित्य का प्राण है। बाह्य धरातल पर यही काम शासन-व्यवस्था करती है। शासन-व्यवस्था और साहित्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। स्वभावतः तो दोनों एक-दूसरे के सहयोगी ही हैं। मगर जब-जब शासन, कुशासन का रूप ग्रहण कर लेता है, साहित्य उसका विरोधी दिखाई पड़ने लगता है। शासन में प्रायः ही वर्चस्व और स्वार्थ की लालसा समाहित रहती है, इसलिये साहित्य का स्वर सत्ता के विरोधी स्वर के रूप में अधिकतर पहचान रखता है।
सुन्दर की प्रतिष्ठा का सीधा अर्थ असुन्दर की अप्रतिष्ठा से है। जब साहित्य सुन्दर की प्रतिष्ठा करता है तो अपने आप असुन्दर अप्रतिष्ठित और निरस्त होता है। हमारे जीवन में सुंदर और असुंदर दोनों मौजूद है। साहित्य जीवन की पूर्णता में दोनों को देखता है। वह असुन्दर को इस तरह से देखता है, इस तरह से दिखाता है कि वह हमारे जीवन में अप्रतिष्ठित हो सके। असुन्दर के अप्रतिष्ठा की उत्कष्ट प्रेरणा ही आधुनिक चिंतन के यथार्थवाद की जननी है। हमारी साहित्य परम्परा में सौन्दर्यबोध का आधार और नीति निर्माण की भूमि वैयक्तिक स्वतंत्रता की सुरक्षा और पारस्परिक सौहार्द के बीच संतुलन के खोज में ही निर्मित होती रही है। खेद का विषय है कि समकालीन साहित्य जीवन में व्याप्त असुन्दर की अप्रतिष्ठा में अपनी भूमिका नहीं निभा पा रहा है। आज हमारे जीवन में निरन्तर साहित्य की जगह कम होती जा रही है।
जीवन में साहित्य की जगह का कम होते जाना मनुष्य जाति की अस्मिता के लिये सबसे भयानक संकट है। यह हमारे समय की सबसे त्रासद चिन्ता है, जिसकी तरफ हमारा ध्यान नहीं है। अपने समय के जीवन से साहित्य के बाहर होते जाने के विषय में जब भी बात होती है, उसकी सारी जिम्मेदारी हम दूसरों के मत्थे मढ़कर अपनी जवाबदेही से मुक्त हो लेते हैं। कुछ लोग प्रकाशकों को जिम्मेदार ठहराकर चिंतामुक्त हो लेते हैं। कुछ लोग पुस्तकों की खरीद की नीति को दोषपूर्ण और भ्रष्ट बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं। मगर शायद यह समूची वास्तविकता नहीं है। मुझे लगता है कि इस स्थिति के पीछे सबसे अधिक जिम्मेदार हमारे लेखक ही हैं। हमारी रचना जनजीवन में प्रतिष्ठित क्यों नहीं हो पा रही है? नहीं हो पा रही है तो इसकी सबसे अधिक जिम्मेदारी हम रचनाकारों की ही है। हम सिर्फ दूसरों को दोषी ठहराकर अपने दायित्व से छुट्टी नहीं ले सकते। हमें अपने रचनाकर्म की आन्तरिक उत्प्रेरणा और उसकी फलश्रुति की सारी अन्तर्क्रियाओं की प्रक्रिया की पूरी पड़ताल में अपने को ईमानदारी से लगाना होगा।
‘‘क्या हमारे समय का साहित्य अपने समय में जीवन में व्याप्त असुन्दर को अप्रतिष्ठित करने में कारगर हो पा रहा है?’’ हम थोड़ा भी आत्मसम्मोहन और आत्ममुग्धता से अलग होकर जवाब तलाशेंगे तो उत्तर नहीं में होगा। सारी साहित्यिक प्रतिबद्धताओं के तुमुल शोर में भी हमारे जीवन में धनबल, बाहुबल और अनीतिबल की प्रतिष्ठा दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। हर आदमी पर किसी न किसी रूप में इन सबका आतंक छाया हुआ है। जातीय संकीर्णता, नये तरह का छुआछूत, धार्मिक असहिष्णुता, पद प्रतिष्ठा का दंभ और वैयक्तिक उत्थान का ज्वर सामूहिक हित को कंपकपा रहा है। इन सबके विरूद्ध साहित्य रचना के सारे संकटों के बावजूद बाजार में साहित्य की भरमार है। हम जिसकी अप्रतिष्ठा के लिये लिख-लिखकर किताबों का ढ़ेर खड़ा किये जा रहे हैं, वह अप्रतिष्ठित क्यों नहीं हो रहा है। जरूर कहीं न कहीं कोई बात है, जिसका सामना हम नहीं करना चाहते हैं।
हमारा दावा है कि हम जन-जीवन के दुख के बारे में, उनके कष्टों और उनकी मुसीबतों के बारे में लिखते हैं। हम उनके पक्षधर हैं। हम उनके प्रवक्ता हैं। हमारी चिंताएँ हमारे समय के शोषित, पीड़ित, वंचित और दलित जीवन के दुःख की चिन्ताएँ हैं। हम जनता के उस दुःख के बारे में, कविता, कहानी, उपन्यास लिखते हैं जिसे वह भोगती है। जनता भोगती है, हम लिखते हैं। हम जो कुछ लिखते हैं जनता उसे नहीं जानती। हम जो लिखते हैं, जिसके लिये लिखते है, वह सब उसके समझ के बाहर की चीज है। साहित्य के हलके में जनपक्ष का साहित्य आम जन की समझ और उसकी भाषा की पकड़ के बाहर की चीज है। वह कुछ थोड़े से बुद्धिजीवियों के बीच बहस की चीज है। जनता का दुःख, जनता साहित्यकारों से अधिक गहराई के साथ जानती है। जनता को अपने दुःख से परिचय और उसकी पहचान की उतनी जरूरत नहीं है, जितनी उस दुख को सहने की शक्ति की जरूरत है। हमारा साहित्य दुख को सहने और दुख से लड़ने की शक्ति जनता को दे सकने में कहाँ सक्षम हो पा रहा है? फिर साहित्य में जनता दुख का प्रदर्शन लेकर क्या करेगी? बच्चन जी के शब्दों में – ‘‘मैं क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी’’
शायद हम वह लिख रहे हैं, जहाँ हम नहीं हैं। जहाँ हम नहीं हैं जिसमें हम शामिल नहीं हैं, वहाँ के बारे में हमारा लिखा हुआ विश्वसनीय कैसे हो सकता है? साहित्य में जीवन और जीवन में साहित्य के न हो सकने का संकट हमारे समय का सबसे बड़ा संकट है।
हमारे समकालीन साहित्य में सबसे चिन्ताजनक बात यह भी है कि हमारे जीवन में जो कुछ भी असुन्दर है, हम आधुनिक के व्यामोह में अपने यथार्थवादी होने के दर्प में, अपनी निर्भीकता को प्रदर्शित करने के गुमान में जाने-अनजाने उसके औचित्य को प्रतिष्ठित करने में अपने को धन्य मानने लगे हैं। सामूहिक जीवन के सौहार्द को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूल्य पर बलि चढ़ा देने में हम तनिक भी नहीं हिचकते। हमारे बहुत से प्रतिष्ठित कहानीकारों की कहानियाँ असुन्दर को जिस तरीके से जस्टीफाई करती है, भाषा और भंगिमा दोनों स्तरों पर उससे हमारा जीवन बोध आहत ही होता है। आन्तरिक और बाह्य जीवन-संघर्षों में जन-जीवन की साहित्य से शक्ति प्राप्त करने की हमेशा से आकांक्षा रही है। जनता के जीवन में साहित्य की भागीदारी तभी सुनिश्चित हो सकती है, जब साहित्य उसकी प्रवृत्तियों, उसके विश्वासों और उसके नैतिक बोध में उसका सहभागी होगा। साहित्य से जब जनता को अपने संघर्षों के लिये शक्ति प्राप्त होगी, तभी उसका उसके जीवन में स्थान होगा। केवल साहित्य की भाषिक पक्षधरता में जनता का उसी तरह विश्वास नहीं है जैसा कि राजनीति की स्वार्थी और छद्म पक्षधरता में नहीं है। कहीं हमारा साहित्य विचार और व्यवहार के विषम अंतराल के कारण राजनीतिक अविश्वसनीयता के करीब तो नहीं जा रहा है?
संकटग्रस्त जनजीवन को शक्ति, सम्बल और विश्वास की जरूरत है। हमारे जनतंत्र में इस वक्त जनता उसे कहा जाता है, जो सबके काम की है मगर जिसके लिये कोई का का नहीं है। न राजनीति, न साहित्य, न शिक्षा, न चिकित्सा, न न्याय। वह इन सबके होने के लिये है। इन सबके काम के लिये है। जनता का वजूद अपने लिये नहीं रह गया है। दूसरों के वजूद को बनाये और बचाये रखने के लिए बस उसका वजूद कायम रखा गया है। इस असहाय और लाचार स्थिति में जनता को नपुंसक पक्षधरता की नहीं भागीदार भूमिका की जरूरत है। हमें उस साहित्य की जरूरत है, जो हमारे जीवन में आन्तरिक शक्ति का, उल्लास का, उत्साह का, प्रेम का, विवेक का और सह अस्तित्व के औदार्य का सृजन कर सके। हम जिन प्रवृत्तियों के उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं, उनकी अप्रतिष्ठा की हमारे समय को साहित्य से उम्मीद है। सुन्दर की प्रतिष्ठा से ही साहित्य की प्राणशक्ति पलुहित हो सकेगी।

बादल सिर्फ पानी नहीं बरसते

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

बादल केवल पानी ही नहीं बरसते हैं। पानी तो वे बरसते ही हैं, पानी के साथ और भी बहुत कुछ बरसते हैं। मगर हमारा दुर्भाग्य है कि हम उस बहुत कुछ के प्रति अभिमुख ही नहीं है। हमारी मिथ्या आधुनिकता और घमण्डी बौद्धिकता हमें उससे विमुख करती है। आधुनिकता के प्रति हमारा व्यामोह इतना गहरा है, उसका आतंक इतना डरावना है कि हम उसके लिये बहुत कुछ से विमुख होने को सहज ही तैयार हो जाते हैं। हम देख रहे हैं कि बादलों से सिर्फ पानी की अपेक्षा रखने वाली मनुष्यजाति बुरी तरह से बेपानी होती जा रही है। हमारी व्यवस्था पानी के लिये पानी-पानी होती जा रही है। हम पानीदार दिखने के चक्कर में पानी की नजर से उतरते जा रहे हैं। हमारी आँखों का पानी मरता जा रहा है।
बादल जब भी उतरते हैं छा जाते हैं। हमारी आँख अपने आप आकाश की ओर उठ जाती है। बादल हमें आकाश की ओर उन्मुख करने के आलम्बन हैं। मनुष्य का आकाश की ओर उन्मुख होने का अर्थ विस्तार की ओर उन्मुख होना है। आकाश की ओर उन्मुख होते ही हम पाते हैं कि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का जोर ढीला पड़ रहा है। हम पृथ्वी के ऊपर देखते ही पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य नक्षत्र मण्डलों से संयुक्त हो जाते हैं। हम यह भी पाते हैं कि पृथ्वी का अर्थ सूरज, चाँद, तारों, आसमान और बादलों के साथ-साथ है। इन सबमें एक आन्तरिक सम्बन्ध है, जो एक-दूसरे के अस्तित्व को अर्थ प्रदान करता है। हम जब तक अपने को केवल धरती का प्राणी समझते हैं, हमारा घनत्व बहुत बोझिल होता है। हमारा आयतन यानी हमारे अस्तित्व का आयतन बहुत कम होता है।
जब हमारा आयतन बहुत कम और घनत्व बहुत्व अधिक होता है, हम नितान्त केवल अपनी ठोस अस्मिता में केन्द्रित होते हैं। हम स्वकेन्द्रित होते हैं। हम स्वार्थी और क्रूर होते हैं। हम केवल अपने घर के बारे में सोचते हैं और हमारा पड़ोस हमसे विच्छिन्न हो जाता है। हमारे पड़ोसी हमारे लिये पराये हो जाते हैं। बेगाने हो जाते हैं। हमारे शत्रु बन जाते हैं। हर पड़ोसी में हमें शत्रु दिखाई पड़ने लगता है। उसके प्रति आशंका, अविश्वास का जन्म होने लगता है। फिर द्वेष का विष भर जाता है। पड़ोसी चाहे जो हो, हिन्दू हो, मुस्लिम हो, सिक्ख हो, इसाई हो कोई फर्क नहीं। यह तो केवल संयोग की बात है। सहधर्मी हो या विधर्मी हो, यह महत्वपूर्ण नहीं रह जाता। महत्वपूर्ण केवल यह है कि अपने पड़ोसी के प्रति हमारा लगाव नहीं होता। लगाव न होने से अलगाव की विषवेल पनपती है, जो हमें एक-दूसरे से विच्छिन्न, विक्षुब्ध और विद्वेषपूर्ण बना देती है।
वास्तव में हमारा आपसी वैमनस्य हमारे आत्मकेन्द्रित अस्तित्व की देन है। यही हमें सत्ता संघर्ष में नियोजित करता है। धर्म हमारे आपसी सौहार्द को नष्ट करने का मूल कारण नहीं है। धर्म को तो सत्ता संघर्ष के घटक मूल कारण के रूप में प्रचारित करते हैं। इतिहास साक्षी है, जब मुसलमान हमारे देश में नहीं आये थे, तब भी समूचा देश आपस में मित्र नहीं था। आज भी समूचा देश मुसलमानों को छोड़कर भी आपस में मित्र भाव का संवाहक नहीं है। हम हैं कि किसी और रोग के लिये किसी और रोग की दवा खाकर निरोग होने की आस लगाये हैं।
बादल हमें आकाश की ओर उन्मुख करके हमारे अस्तित्व के आयतन को विस्तार देते हैं, हमारे पड़ोस की धारणा को अर्थयुक्त करते हैं।, हमें पड़ोसी के प्रति प्रेमधर्म का अर्थ बताते हैं। उनके इस अवदान के प्रति मनुष्यजाति को बादलों के प्रति आभारी होना चाहिए।
बादल पानी बरसने से पहले उल्लास बरसते हैं। उमंग बरसते हैं। रोशनी बरसते हैं। रंग बरसते हैं। एक बादल ही हैं अकेले इस समूची सृष्टि में जो नींद से बाहर खुली आँख में सपने बरसते हैं, जीवन के इन्द्रधनुषी सपने। एक मात्र बादल ही वर्तमान में भविष्य के फसल की हरियाली बरसते हैं। वर्तमान में भविष्य को अंकुरित करने वाले बादल काल की अप्रतिहत सत्ता में अनोखे हैं।
बादल सबसे पहले आग उगलती हवाओं में अपने आगमन से शीतलता का अद्भुत जादू बरसते हैं। बादलों के आ जाने से अपनी आग से उत्तप्त हवा उनके संस्पर्श मात्र से शीतल हो उठती है। जिस हवा की दाहकता से बचने के लिये आदमी खिड़की-दरवाजे बन्द रखते हैं, उसी की रोमांचक छुवन को पाने के लिये सारे गवाक्ष खोल कर बाहर आने को आतुर हो उठते हैं। बादल हमारे लिये वैयक्तिक खोल को तोड़कर सामूहिक अस्तित्व में अपने को समंजित करने का आकर्षक आमंत्रण बरसते हैं।
बादल प्रीति की पुलक के गीत बरसते हैं। पुलक प्रीति से पैदा होती है और गीत पुलक से। प्रेम की पुकार कभी अनसुनी नहीं हो सकती। बादल को धरती से और धरती को बादल से सनातन प्रेम है। प्रेम में अपने को पूरा-पूरा विसर्जित कर देने का बोध मनुष्य के लिये बादल बरसते हैं। इसी बोध से धरती का कण्ठ कजली से गूँज उठता है। बादल पानी के साथ जिन्दगी के लिये उत्सव की अकंुठ उत्प्रेरणा भी बरसते हैं।
बादल पहाड़ की छाती को भी नरम बनाने का बूता बरसते हैं। पत्थर पर हरियाली उगाने का शौर्य बादलों से बरसता है। नदियों में हुलास, झरनों में हास, सरोवरों में सुभाष, झीलों में झंकार, सागरों में शंखनाद, पशु-पक्षियों में उद्गामिता यह सब भी बादल से बरसता हैं। बादलों से पानी के साथ समस्त जड़-चेतन जगत के लिये अपूर्व तोष की भी बरसात होती है।
हमारा परम दुर्भाग्य है कि बादल से जो कुछ बरसता है, उस सबसे हम विमुख हैं। हम कुछ भी ग्रहण करने को, आत्मसात करने को कत्तई तैयार नहीं है। हम इतने भूखे, भिखमंगे, कंगाल और स्वार्थी हो गये हैं कि हमारी चाहत बन गई है- बादल रुपये बरसें, सोने के सिक्के बरसें, प्रतिष्ठा बरसें, पद बरसें और निकम्मी उच्चता के नुस्खे बरसें। यह भला कैसे हो सकता है? ऐसा कैसे हो सकता है। यह सब तो बादल का स्वभाव ही नहीं है। इस सबमें बादलों की कोई रूचि ही नहीं है।
विडम्बना यह है कि बादल जो कुछ बरस रहे हैं, उसकी तरफ तो हमने आँखें बन्द कर ली है। जो नहीं बरस सकते हैं उसके लिये आँखे बिछाये हैं। बादल आदमी के टुच्चे स्वार्थ को संपोषित करने वाले सेवक नहीं हैं। वे प्रेम यज्ञ के अनुष्ठाता है। वे तो प्रीति की रीति में भिगोने हर साल आते हैं। आदमी नहीं भिंगता तो उनका क्या दोष? वे आते हैं बरसकर लौट जाते हैं। हम सूखे के सूखे रह जाते हैं।
हम तो बादल से बरसे पानी को भी जुगाकर रख सकने के अयोग्य हो गये हैं। नदियों के प्रवाह हमने बाधित कर डाले हैं। जंगल काट डाले हैं। ताल-पोखर पाट डाले हैं। हमारा विश्वास सहज रूप से प्राप्त होने वाली चीजों से उठ गया है। हम तो सारी संरक्षित और संचित सम्पदा के दोहन के विश्वासी बन गये हैं। अब हम भूगर्म जल के दोहन की राक्षसी वृत्ति के वारिस हैं। पता नहीं कब तक?
बादल जो कुछ बरसते हैं, उससे विमुख होकर मनुष्य जाति बेपानी होने को अभिशप्त है। मनुष्य जाति के हित चिंतक कवि रहीम कबसे चिल्ला रहे हैं- रहिमन पानी राखिये। मगर हम पानी की पत पहचान नहीं सके।
बादल थोड़ा-सा पानी बरसते है, हमारे शहर चुल्लू भर पानी में नाक दरेरने लगते हैं। बाँध दरकने लगते हैं। सड़कें धंसने लगती हैं। हमने जो कुछ बनाया है, बिगड़ने लगता है। हमने बनाया क्या है? शायद हमने सिर्फ कमीशन बनाया है। कमीशन बनाने में शायद कुछ बन गया है। बादल हमें सबकुछ देंगे। कमीशन नहीं देंगे। कमीशन खाकर बादल कभी नहीं बरसेंगे।

संस्कृत सुभाषितों के गर्भ में

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

संस्कृत साहित्य में सुभाषितों की गरिमामय परम्परा है। मानव जीवन की अभ्युन्नति और उसके उत्कर्ष के लिये उपयोगी और मूल्यवान अनुभव-कथ्यों को जगह-जगह से चुनकर संकलित करने की परिपाटी संस्कृत में प्रचलित है। सुभाषित का मुख्य सम्प्रेष्य अर्थ जीवन के लिये कल्याणकारी होता है।
सच है कि संस्कृत काव्य में मनुष्य जीवन के लिये बहुत कुछ महत्तम उपलब्ध है। मगर यह भी सच है कि संस्कृत साहित्य के महान रचनाकारों में अनुभव की जो व्यापकता, दृष्टि की जो गहराई और अभिव्यंजना का जो कौशल है, वह उस परम्परा के परवर्ती संकलनकर्ताओं और व्याख्याताओं की पकड़ से अछूता ही रह गया है। टीका की समृद्ध परम्परा के बावजूद ‘मेघदूत- एक पुरानी कहानी’ में हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कालिदास की संवेदना का जैसा पुनर्सृजन किया है, वह टीकाकारों की पकड़ से बाहर की चीज है। रचनात्मक भाषा की विलक्षणता में जो संवेदना की व्यंजना है, वह केवल भाषा के विच्छेदन से प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है।
सुभाषितों के गर्भ में सुभाषित के अलावा भी बहुत कुछ है, जो सुभाषित के आवरण को तोड़कर बाहर आने के लिये न जाने कितनी छटपटाहट से भरा है, मगर हम उधर देखने को उन्मुख ही नहीं हो पाते। जीवन-सत्य कितने-कितने रूपों में कविता की आन्तरिक संरचना में ध्वनित होने को मचलता रहता है, मगर हम उसके किसी एक रूप में ही इतने अनुरक्त पड़े रहते है कि बाकी रूप अनदेखे ही रह जाते हैं।
शिक्षा के शुरुआती दौर में किसी कक्षा के पाठ्यक्रम में संकलित सुभाषित संग्रह में मैंने एक पद पढ़ा था –
यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः स पण्डितः स श्रुतिवान् गुणज्ञः।
स एव वक्ता स च दर्शनीयः सर्वे गुणा कांचनमाश्रयन्ति।।
पता नहीं क्यों तब भी यह श्लोक मुझे सुभाषित नहीं लगा था। आज भी नहीं लगता। तब से आज तक तमाम कोशिशों के बावजूद इस उक्ति को मैं सुभाषित की श्रेणी में स्वीकार नहीं कर सका। इस छन्द में मुझे बराबर बजती हुई कोई और ध्वनि सुनाई देती है, जो कविता के मूल कथ्य को कविता से बाहर ले जाती है। इस कविता की अर्थव्यंजना शब्दों में ही आबद्ध नहीं है। वह शब्दों से फूटकर शब्दों का अतिक्रमण कर जाती है और अर्थ शब्दों के बाहर निकल कर जीवन के विस्तार में झंकृत हो उठता है। शायद हर महत्वपूर्ण कविता शब्दों को भेदकर सुदूर संवेदना के विस्तार में अर्थवती होती है, जैसे बीज को तोड़कर वृक्ष फलित होता है।
भाषा के विच्छेदन से कविता का अर्थ पाने की प्रणाली वाणी का व्यायाम भर है। महत्वपूर्ण कविता हर समय में भाषा की खोल को तोड़कर ही प्रतिष्ठित होती है। खैर!
यह कविता भर्तृहरि की कविता है। इसमें एक प्रेमी कवि के जीवन का अनुभव है। इसमें एक राजा कवि का अनुभव है। इसमें एक विरक्त वैरागी कवि के जीवन का बोध है। भर्तृहरि कोई अदना से आदमी नहीं थे। कोई मामूली-सी बात कहने के लिये उन्होंने कविता का आश्रय नहीं लिया था। जीवन के विविध पक्षों की सूक्ष्मता और गहराई का उन्हें सम्यक बोध था। उनकी कविता उस गहन बोध की सहज अभिव्यक्ति की मिशाल है।
कविता में अर्थ-निष्पादन की कोई एक ही चिराचरित प्रणाली नहीं है। अर्थ-व्यंजना की अनगिनत प्रणालियाँ है जिनका प्रयोग कवि अपनी सूझ के अनुसार करते हैं। ऐसे में हम यदि किसी एक ही प्रधान प्रणाली को पकड़कर कविता में अर्थग्रहण का आग्रह करते हैं, तो यह कविता के प्रति अन्याय ही नहीं अत्याचार बन जाता है।
भर्तृहरि की इस कविता में अर्थ की गरिमा का आख्यान नहीं है। अर्थ के आतंक का उपहास है। इस कविता में कवि के अपने विश्वास की प्रतिष्ठा नहीं है। लोक विश्वास की अन्धता का उद्घाटन है। अतिरेक का उन्मोचन है। उसकी अतार्किकता से निर्मित असंगति के प्रति क्षोभ है। कविता की व्यंजना अर्थ की प्रशस्ति की नहीं बल्कि अर्थ के प्रति सामूहिक सोच की विपन्नता और विद्रूपता के प्रति खेद की है।
कवि लोकमान्यता के बिडम्बना मूलक सच का उद्घाटन करते हुये कहता है कि जिसके पास प्रचुर धन है, वह कुलीन है। ऊँचे कुल में जन्म लेने के कारण समाज में जो सम्मान कुलीन व्यक्ति को प्राप्त होता है, वह सम्मान धनवान व्यक्ति को धन की उपलब्धि के कारण उसी के साथ बिना प्रयास मिल जाता है। धनवान व्यक्ति को लोग पण्डित यानी विविध विषयों का जानकार भी मान लेते हैं। उसे लोग श्रुतिवान यानी सुनने योग्य बातों को सुने हुये भी मान लेते हैं। उसमें लोगों को गुणों का भंडार भी दिखाई पड़ता है। धनवान व्यक्ति की बातों को दुनिया बड़े महत्व के साथ सुनती है, इसलिये वह कुशल वक्ता मान लिया जाता है। धन की प्रतिष्ठा के कारण धनवान व्यक्ति के चर्चे सुदूर तक फैल जाते हैं। उसमें लोगों को आकर्षण पैदा हो जाता है। लोग उसे देखने को उत्सुक बने रहते हैं, इसलिये वह दर्शनीय हो जाता है। लोक में सारे गुण अर्थात् सारे सद्गुण, कांचन यानी धन का ही आश्रय ग्रहण करते हैं।
यह लोक जीवन का सच है। दुनियाँ में ऐसा दिखाई देता है। दुनिया में ऐसा ही होता है। ऐसा ही है। किसी एक समय में ही नहीं बल्कि हर समय का यह सच है। मगर यह सच, सच न होते हुये भी सच जैसा क्यों है? कविता के शब्दों में यह क्यों नहीं है मगर कविता की अर्थ-व्यंजना में सारे शब्दों में सन्निहित अर्थ का अतिक्रमण करके यह क्यों ही ध्वनित हो उठता है, प्रधान रूप में। कविता के शब्द-कथ्य में कविता के अर्थ की सिर्फ प्रस्तावना है। कविता की पूरी अर्थ ध्वनि कविता के शब्दों से बाहर है। और यह अर्थध्वनि लोक मान्यता के प्रति खेद की अर्थध्वनि है।
धनवान आदमी समाज में धनवान के रूप में सम्मानित और पूजित हो तो कोई दिक्कत की बात नहीं है। कोई विसंगति की बात नहीं है। जीवन-सत्य के सन्दर्भ में कोई व्याघात नहीं है। मगर धनवान व्यक्ति, विद्वान की तरह, वक्ता की तरह, गुणवान की तरह और दर्शनीय की तरह आदृत और पूजित हो, यह बड़ी बेधक विसंगति है। यह सामूहिक जीवन धारा के सहज प्रवाह में व्यवधान की वृत्ति है, व्याघात की स्थिति है। यह स्थिति, यह धारणा जीवन के उत्कर्ष के अनुकूल नहीं है।
धन अपनी अर्थवत्ता में जीवन में उद्भासित हो, अच्छा है। बहुत अच्छा है। शुभ है। स्वागत योग्य है। मगर धन बाकी सबको तिरस्कृत करता हुआ अभिनन्दित हो यह शुभ नहीं है। धन जीवन के लिये बहुत मूल्यवान है। धन की महिमा अपनी जगह शोभित हो, यह शुभ है। मगर धन का और सबको विस्थापित करके सबकी जगह कब्जा जमाकर पूजित होना शुभ नहीं है। धन का कुलीनता को विस्थापित कर देना, विद्वत्ता को विस्थापित कर देना, वक्तृत्ता को विस्थापित कर देना, सौन्दर्य को विस्थापित कर देना, विचार को विस्थापित कर देना आतंक के अधिनायक शासन जैसा विद्रूप है। इस विद्रुप स्थिति का अंकन करके कवि यहाँ इस स्थिति के प्रति अपनी कविता में खेद का भाव जगा रहा है। यह खेद का भाव कविता में व्यंग्य की बेधक व्यंजना का सृजन करता है।
यह सिर्फ संस्कृत सुभाषितों का एक उदाहरण भर है। ऐसे सुभाषितों की संख्या काफी है, जिनके गर्भ में सुभाषित के अलावा और बहुत कुछ मौजूद है। मैं तो संस्कृत के वाग्वैभव से बिल्कुल अनभिज्ञ और अनधिकारी हूँ। संस्कृत के मनीषी विद्वान यदि इधर ध्यान दें तो सुभाषितों के गर्भ में जो व्यंग्य के बीज मौजूद हैं, उनकी हरियाली का वैभव हमें प्रफल्लता प्रदान कर सकता है। तब हमारे हिन्दी व्यंग्य की पृष्टभूमि के लिये एक समृद्ध रिक्थ हमें सहज सुलभ हो जायेगा।
किसी एक का बाकी सबकी जगह हथिया कर सब पर कब्जा कर लेना किसी भी समाज के लिये बेहद विद्रूप है। इस विद्रूप का उद्घाटन व्यंग्य का सबसे प्रधान विषय है।

कविता की चिंता में

वरिष्ठ साहित्यकार डा. उमेश प्रसाद सिंह।
वरिष्ठ साहित्यकार डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

कविता विलक्षण है। सारे लक्षणों को गिनाने के बावजूद कुछ और भी गिनने के लिये कविता में, कविता के लक्षण बचे रह जाते हैं। बारम्बार गढ़ी जाती हुई परिभाषाओं के बाद भी कविता फिर परिभाषा गढ़ने के लिये बची रह जाती है।
कविता केवल भाषा में नहीं है। वह भाषा में होने से पहले भी है और भाषा में होने के बाद भी है। मगर हमारी दिक्कत यह है कि हम कविता के केवल उस रूप को ही पकड़ कर बैठ जाते हैं, जो भाषा में है। यहीं हम धोखा खा जाते हैं।
हम हमेशा कविता को भाषा में पकड़ने का असफल प्रयत्न करते हैं। कविता हमेशा भाषा से बाहर निकल कर हमें मुंह चिढ़ाती निरखती रहती है।
आज कविता को लेकर कविता से किसी भी तरह का रिश्ता रखने वाले सारे लोग परेशान हैं। शिकायत है कि कविता के प्रकाशक नहीं हैं। कविता के पाठक नहीं हैं। कविता के खरीददार नहीं हैं। मगर हम इस बात से कत्तई परेशान नहीं है कि कविता हमारे में नहीं है।
कविता का हमारे में न होना हमारे जीवन में, जीवन-व्यवहार में, हमारे बर्ताव में न होना परेशानी की बात है। उसका न होना हमारे लिए परेशानी और चिन्ता का विषय होना चाहिए। मगर इस विषय पर हम कभी बात नहीं करते। कभी विचार नहीं करते। हम जब भी बात करते हैं, केवल भाषा में कविता के बारे में बात करते हैं। हम जब भी बात करते हैं, कविता की किताब के बारे में बात करते हैं। कविता की बिक्री के बारे में बात करते हैं। हम बात करते हैं और बिना किसी नतीजे पर पहुँचे फिर बात करने के अवसर का इंतजार करते हैं। हम दुखी होते हैं कि कविता यहाँ नहीं है, वहाँ नहीं है, मगर हम इस बात से तनिक भी दुखी नहीं होते कि कविता हमारे में क्यों नहीं है?
हम चाहते हैं कि कविता हमारे में हो, न हो मगर बाकी सब जगह हो। प्रकाशन, संस्थानों में हो, पुस्तकालयों में हो, पुरस्कार प्रतिष्ठानों में, सम्मान समारोहों में, अनुवाद केन्द्रों में हो, यानी कि पूरे बाजार में हो। हमारी कविता की चिन्ता पता नहीं कैसे कविता के बाजार की चिन्ता बन गई है। कविता के उसी बाजार की चिन्ता जिसे कबीर ने लुकाठी लेकर फूँक दिया था। हम कबीर के वारिस हैं जरूर, मगर पता नहीं कैसे वारिस हैं? जिस बाजार को कबीर ने आग लगा दिया था, हम उसी बाजार के मुखापेक्षी होकर, उसी के गुलाम होकर कबीर की विरासत को संभालने का दम्भ पाले हैं।
बगैर किसी आन्तरिक उद्वेलन के लिखी हुई कविता चाहे और कुछ भी कर ले मगर प्राणों में उद्वेलन पैदा नहीं कर सकती। जो कविता प्राणों में उद्वेलन नहीं पैदा कर सकती, उसका बाकी जगहों पर होना भी न होने से अलग नहीं है।
कविता मनुष्य की आन्तरिक दशा को प्रभावित करने के लिये है। कविता को न तो केवल ढाल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है न ही केवल तलवार की तरह। कविता हथियार नहीं है। किसी भी तरह के हथियार केवल हमारे जीवन की बाह्य स्थितियों को ही प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। हथियार का प्रवेश मनुष्य की चेतना की आन्तरिक सतह में संभव नहीं होता। कविता का अनुप्रवेश जीवन की आन्तरिक चेतना में होता है। वह हमारी चेतना से संयुक्त होती है। चेतना से संयुक्त होने की योग्यता के कारण ही कविता किसी भी तरह के हथियार से बहुत अधिक शक्तिशाली है।
कविता केवल कुछ जीवन स्थितियों के विरूद्ध असहमति की आवाज नहीं है। कविता केवल सत्ता के विरोध का नाम नहीं है। यह काम तो विपक्षी दल करता है। कविता केवल व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह का आन्दोलन नहीं है। कविता व्यक्ति और समाज के अन्तर्सम्बन्धों के बीच अन्तर्क्रियाओं के अर्थ की तलाश है। वह समय की ऐतिहासिक विरासत के साथ होने वाली मानवीय चेतना की अभिक्रिया की अनुभव जन्य अभिव्यक्ति है।
गरीबी, अन्याय, अत्याचार इत्यादि अमानवीय वृत्तियों के प्रति मनुष्य की आन्तरिक चेतना में जुगुप्सा और भर्त्सना के भावों को जगाना कविता का काम है। कविता का काम मनुष्य की आन्तरिक चेतना में अस्तित्ववान होना है। अन्तर में विद्यमान होकर बाह्य स्थितियों को प्रेरित और प्रभावित करने का काम कविता का काम है। बगैर आन्तरिक दशाओं को प्रभावित किये केवल भाषा में, बाजार में उपस्थित हो लेना कविता नहीं कविता का व्यापार है। व्यापार की चिन्ता जीवन की चिन्ता नहीं है, बाजार की चिन्ता है। कविता बाजार की वस्तु नहीं है, वह जीवन की जरूरत है। कविता का सम्बन्ध मनुष्य और मनुष्य जाति के जीवन से है।
कविता हम क्यांे लिखते हैं? इस सवाल के सामने हमें अपने को जरूरत ईमानदारी के साथ खड़ा करना होगा। हमें बिल्कुल एकान्त में अपनी अन्तर्चेतना से जवाब सुनना होगा।
क्या हम कविता अपने को समाज में कवि के रूप में स्थापित करने के लिये रचते हैं?
क्या हम कविता अपने को सामान्य से अलग विशिष्ट रूप में प्रचारित करने के लिये लिखते हैं?
क्या हम कविता अपनी श्रेष्ठता और महत्ता को प्रमाणित करने के लिए लिखते हैं?
क्या कविता हमारे लिये सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिये साधन है?
क्या कविता लिखने के पीछे सम्मान और पुरस्कार अर्जित करने की लालसा हमारे भीतर कहीं छिपी बैठी है?
यदि ‘हाँ’ तो कविता हम मनुष्य जाति की हितचिन्ता की उत्प्रेरणा से नहीं, बाजार के लिये लिख रहे हैं। हमारी कविता बाजार की कविता है। बाजारू कविता है। इसका मूल्य और मान भी बाजार के नियमों के तहत निर्धारित होगा। जो निर्धारित होगा उसे हमें स्वीकार करना ही होगा।
यह कविता प्रतिषेध और प्रतिरोध की कविता नहीं हो सकती। यह कविता मनुष्य के जीवन में नहीं हो सकती। यह कविता मनुष्य जाति के जीवन के लिये नहीं हो सकती। वह मनुष्य जीवन को और अधिक सुन्दर और अधिक समुन्नत, और अधिक समृद्ध बनाने में सहायक नहीं हो सकती। जहाँ हम हैं, वहां कविता नहीं है। जहाँ कविता है, वहाँ हम नहीं है। फिर भीहम कविता को पकड़ने के लिये विकल हैं। बेचैन हैं।
अपने लिये सुविधा, सुख और समृद्धि की लालसा को दुलारते रखकर दुःखों के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन कविता नहीं है। दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझने का बोध कविता की योग्यता है। कविता बोध से ही उपजती है और बोध को ही बोती है। कविता की उत्प्रेरणा और कविता की फलश्रुति दोनों ही बोध में ही है। दूसरों के सुख-दुख को अबाध रूप में अपने में आने देना और अपने को अबाध रूप में दूसरों में जाने देना ही कविता कर्म है। कविता कर्म शब्द कर्म नहीं, संवेदना कर्म है। यह विरल, विलक्षण और संशिलष्ट कर्म है। कवि कर्म ‘स्व’ और ‘पर’ के संश्लेषण की प्रक्रिया में निहित है। इस प्रक्रिया में अपने अस्तित्व को बगैर किसी परवाह के छोड़ देने के अलावा कविता रचने का दूसरा रास्ता नहीं है।
अपने समय में हमें सोचना है कि हमारी चिन्ता कविता के प्रति है या कविता के बाजार के प्रति? बाजार की चिन्ता कविता की चिन्ता नहीं हो सकती।

हँसब ठठाइ फुलाइब गालू

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

ठठ्ठा मारकर हँसना भी और गाल भी फुलाये रखना। यह साथ-साथ संभव नहीं है। यह एक साथ संभव नहीं है। यह एक असंभावना है। तुलसी की कविता अपने समय में इस एक असंभावना को पूरी शक्ति के साथ संभव बनाने की जद्दोजहद में लथपथ है।
हमारा समय असंभावना को साधने की निष्फल क्रियाओं का समय है, क्या?
शायद हाँ। ‘हाँ’ कहते हुये बड़ी पीड़ा होती है। व्यथा उमड़ती है। वेदना टीसती है। अपार अवसाद घेर लेता है। फिर भी मैं कहता हूँ- ‘हाँ’।
हमारा समय बड़ा अजीब समय है। हम जो कहना चाहते हैं, कह नहीं पाते। कुछ और बोलने के लिये खड़े होते हैं मगर कुछ और ही बोलकर बैठ जाते हैं। हमारे सामने हमें सुनने के लिये जो खड़े होते हैं, हम उनके लिये नहीं बोल पाते। हम उनके लिये बोलने लग जाते हैं, जो हमें सुन नहीं रहे होते हैं। हम हर बार धिक्कार लिखने के लिये कलम उठाते हैं और हर बार धन्यवाद लिखकर रख देेते हैं। पता नहीं ऐसा क्यों है? मगर ऐसा है।
हमारे समय की सबसे बड़ी समस्य यह है कि हम समस्या के सामने खड़े नहीं हैं। हमने समस्या की जगह समस्या की प्रतिमाएं गढ़ ली हैं। समस्याओं की प्रतिमाओं के पीछे हम अपने को छुपाने के लिए खड़े हैं। समस्या के सामने खड़े न होकर अगल से, बगल से, पीछे से, बहुत दूर से समस्या के बारे में सोचना-हमारी सबसे बड़ी समस्या है। समस्या को हटाने की बजाय उसे मिटाने की बजाय उसके बारे में बात करने का शौक हमारी सबसे बड़ी समस्या है। हम समस्याओं के समाधान की जगह उनके विस्तार के आयोजक बन जाते हैं।
ऐसा इसलिये है कि हमारे उपक्रम में ही गड़बड़ी है। कीड़े जड़ में घुसे हैं। दवा हम पत्तों पर छिड़क रहे हैं।
हम सारी बातों पर बहस करते हैं मगर हम अपनी अभीप्सा के बारे में कभी कोई बात नहीं करते। हम अपनी चाह के बारे में, अपनी चाहतों के बारे में कभी कोई बात नहीं करते। बात करना ही नहीं चाहते। हमें इस बारे में बात करते डर लगता है। अपने नंगे हो जाने का डर लगता है। अपने पाखण्ड के प्रगट हो जाने का डर लगता है। अपने नंगे हो जाने की स्थिति से बचने के लिये हम दूसरी बातें करने लग जाते हैं।
अपने देश की आजादी के बाद हमने कभी अपनी अभीप्सा के बारे में गंभीरता से सोचा ही नहीं। हमने कभी भी व्यक्तिगत अभीप्सा, सामाजिक अभीप्सा, नागरिक अभीप्सा और राष्ट्रीय अभीप्सा पर कत्तई ध्यान ही नहीं दिया।
आज हम देख रहे हैं कि हम जाने-अनजाने दोगली अभीप्सा के वारिस बन चुके हैं। आज हमारी समूची अभीप्सा सिर्फ छल की अभीप्सा बन कर रह गई है।
आज हम जहाँ हैं, दरअसल वहाँ नहीं है। जो कर रहे हैं, वह असल में नहीं कर रहे हैं। जो कह रहे हैं, वास्तव में वह नहीं कर रहे हैं। हमारा समूचा राष्ट्रीय चरित्र छद्म का चरित्र बनकर, छल का चरित्र बनकर रह गया है।
बड़ा विचित्र है। हम जो कुछ कर रहे हैं, परिणाम उसका उल्टा मिल रहा है। जबसे हमारी शिक्षा में नैतिक शिक्षा का पाठ्यक्रम सम्मिलित किया गया है, समूची शिक्षा व्यवस्था ही अनैतिक बन गई है। हमारे विद्यालयों में नैतिक शिक्षा की परीक्षा सबसे अधिक अनैतिक ढंग से हो रही है। जबसे हमारे पाठ्यक्रम में राष्ट्रगौरव का पर्चा शामिल किया गया है, तबसे हमारा राष्ट्रगौरव और अधिक धूल चाट रहा है। हमारे समय में अधिसंख्य विद्यार्थी बिना कुछ भी पढ़े अधिक से अधिक अंक पाने के आकांक्षी बने हुये हैं। मनरेगा के मजदूर बिना काम किये पैसा पा लेने को आकुल हैं। हमारी लालसा की बस्ती-बस्ती बदचलन हो गई है। हमारा संकल्प आवारा होकर बदनाम गलियों के चक्कर काट रहा है।
हमारे समय का हर आदमी अमीर और धनी हो लेने की दौड़ में आँख पर पट्टी बाँधकर दौड़ रहा है।ै हमारे समाज में धनबल और बाहुबल का सम्मान सबसे ऊँचे आसन पर विराजमान है। हमारे समय की बुद्धिजीविता गरीबों के पक्ष में बोलकर-लिखकर धनी बनने के रास्ते की तलाश में लगी है। हमें चोरी से, भ्रष्टाचार से नाराजगी नहीं रह गई है। हमारी नाराजगी है तो सिर्फ इस बात से है कि चोरी और भ्रष्टाचार का अवसर हमें क्यों नहीं मिला है। हमारी समूची राजनीति केवल सत्ता पर कब्जा जमाने की राजनीति है। हमारे समय में आदमी, आदमी नहीं महज एक वोट है।
हमारे समय में हमारी अभीप्सा ईमानदार दिखते हुये बेइमानी की हर तरकीब से अपने को बेहद समृद्ध और शक्तिशाली बना लेने की अभीप्सा है। हम कोई भी निर्माण, निर्माण के लिये नहीं, अपने वर्चस्व के लिये करने के आकांक्षी हैं। हम अपनी राष्ट्रभक्ति को इस रूप में पेश करने को उत्सुक हैं कि दूसरों को राष्ट्रद्रोही ठहराया जा सके।
हम दलन के विरूद्ध चिन्तन के पक्ष में नहीं हो पाते। हम दलित-हित के बारे में अपने चिन्तन को प्रचारित करने के पक्षधर हैं। हम दलित-हित की बात दलित समूह का समर्थन पाने की लालसा से करते हैं। हम उनकी सहानुभूति और उनके सहयोग से अपनी अभ्युन्नति के लिये उनके पक्ष में बोलते हैं। हम स्त्री उत्पीड़न के विरूद्ध इसलिए आवाज उठाते हैं कि हम निरापद ढंग से स्त्री भोग के अवसर पा सकें। हमारा सारा आचरण छल का आचरण बन गया है। हमें जो बोलना है, नहीं बोल रहे हैं। जो नहीं बोलना है, बोल रहे हैं।
हमारा साहित्य, जो लिखना है नहीं लिख पा रहा है। जो नहीं लिखना है, लिख रहा है। पता नहीं क्यों? पता नहीं कैसे? हमारी भर्त्सना और हमारा अभिनन्दन एक जैसा बन गया है।
हमारे सामाजिक मूल्य सामूहिक स्वीकृति के प्रमाण होते हैं। आज हमारे समाज में बड़प्पन और सम्मान के जो मानदण्ड है, वे संविधान के विरोधी हैं। हमारे समय में हमारे समाज में राष्ट्र को कमजोर करने वाले कृत्यों का मूल्य बढ़ता जा रहा है। महत्व बढ़ता जा रहा है।
आज प्रायः अधिकांश अपने पते पर लापता लोग हमारे बीच हैं। अपनी जगह पर कोई नहीं है। जो शिक्षा के क्षेत्र में हैं, सेवा के क्षेत्र में हैं, वे ठेकेदारी कर रहे हैं। जो व्यापार में हैं, वे राजनीति कर रहे हैं। जो राजनीति में हैं, वे व्यापार कर रहे हैं।
हम प्रतिपक्ष में दिखते हुये सत्ता के सुख भोग के आकांक्षी है। हम अपने विरोध के लिये पुरस्कार पाने की लालसा के अनुचर हैं। हम गाल फुलाकर ठठ्ठा मार हँसने की असंभावना के अभ्यासी हैं। हम एक असंभव के लिये अभ्यास में लीन हैं।
नहीं, यह कभी नहीं सधेगा। यह तुलसी की कविता का सच है। तुलसी की कविता के सच को स्वीकार करके ही हमारा समय अपने से सृजित समस्या से पार जा सकता है। हमें खुद से पूछना होगा- हम हँसेगे या गाल फुलाये बैठे रहेंगे?

संविधान पर संकट

Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

संकट में भला कौन नहीं है? प्रायः सब ही हैं। केवल कुछ बहुत-से थोड़े समरथ लोगों को छोड़कर। समरथ लोग हमेशा भाग्यशाली होते हैं। इसलिए कि उन्हें दोष नहीं लगता। उन पर दोष प्रमाणित नहीं होता। कभी-कभार हो भी जाय तो क्या? उसे वे ठेंगे पर रख लेते हैं- समरथ के नहिं दोष गुसाईं। रवि पावक सुरसरि की नाईं।
संविधान के बारे में कुछ भी कहने में बड़ा डर लगता है। इसलिये डर लगता है कि वह ठहरा एकदम असाधारण और मैं निपट साधारण। असाधारण के बारे में साधारण का कुछ भी कहना निरापद नहीं हो सकता।
सबसे बड़ी दिक्कत तो यह है कि संविधान की जगह हमेशा ही उसके रक्षक बोलते हैं। वह संप्रभुता संपन्न है मगर उसके संरक्षक हैं। संविधान की सारी शक्ति उसके संरक्षक मंडल के हाथ का खिलौना है। संविधान सूत्र में है और उसके सारे निहितार्थ उसके व्याख्याताओं पर आश्रित हैं।
संविधान एक है मगर व्याख्यायें अनन्त हैं। एक ही अनुच्छेद की अलग-अलग वकील बिल्कुल अलग व्याख्या करने के अधिकारी हैं। पक्ष में भी विपक्ष में भी। कभी-कभी तो एक ही वकील एक ही वाद में पक्ष में भी और विपक्ष में भी पैरवी करते पाये जाते हैं। वकील के लिये व्याख्या का आधार फीस है। बस फीस। वकील बहस में व्याख्या करते हैं। जज अपने फैसले में। संविधान अपनी जगह स्थिर रहता है।
संसद में संविधान का अर्थ सत्तारूढ़ दल के लिये कुछ और है। विरोधी दल के लिये कुछ और। क्षेत्रीय दलों के लिये कुछ और। निर्दलों के लिए कुछ और। संविधान एक है। कानून एक है। मगर उसके अर्थ और उसकी व्याख्यायें अलग-अलग लोगों के लिऐ अलग-अलग है। इतना ही नहीं देश का अर्थ भी अलग-अलग लोगों के लिये अलग-अलग है। देश प्रेम को तो जाने ही दीजिये, वह तो निहायत ही अलग किस्म का है। सचमुच कितना विचित्र है।
एक ही सत्य को भिन्न-भिन्न तरह से कहने की हमारी श्रुतियों की प्रणाली- एको हि सद् विप्रा बहुधा वदन्ति- की परम्परा तमाम मृत प्राय परम्पराओं के बीच में कितनी सजीव है। आजादी के बाद हमारे बीच संविधान की व्याख्या की मूल उत्प्रेरणा सत्ता को, शक्ति को, प्रभुत्व को और लाभ को अपने हक में करने की एक मात्र उत्प्रेरणा बनी हुई है। हमारी व्यवस्था में आज कानून अपने लाभ की भैंस को अपने घर हॉक ले जाने के लिये डंडा की तरह है। यह डंडा उन लोगों के लिए सबक सिखाने का भी डंडा है, जो भैंस की ओर देखने की जुर्रत करते हैं।
संविधान के मान को उसकी मर्यादा को सबसे अधिक संकट उनकी ओर से है जो उसके संरक्षक हैं। संविधान की मंशा के अनुपालन में जो नियुक्त हैं, उनकी आस्था संविधान के प्रति तनिक भी नहीं दिखती है।
आज भी हमारे देश का अधिकांश आमजन संविधान के बारे में कुछ भी नहीं जानता। कुछ जानना भी नहीं चाहता। वह जानने की जरूरत ही नहीं महसूस करता है। हमारा शासन तंत्र भी संविधान के बारे में नागरिकों के बीच जानकारी प्रसारित करने के प्रति पूरा उदासीन है। हमारी प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा की समूची शाखाओं में संविधान के सम्बन्ध में प्रायः किसी भी प्रकार की जानकारी का पूरा अभाव व्याप्त है। परिणाम यह है कि हमारी जनता संविधान की जगह सिर्फ झांसा के संविधान का व्यावहारिक परिचय रखती है।
कितना अजीब है कि संविधान के शासन में हम हर दिन हर काम में असंवैधानिक आचरण के लिये अभिशप्त हैं। आज भी हमारे देश में पुलिस थाना दहशत का केन्द्र बना हुआ है। किसी भी तरह की शिकायत लेकर थाना जाने में किसी भी संभ्रांत के पाँव थरथराते हैं। उत्पीड़न की शिकायत लेकर जाने वाला आदमी ही सबसे पहले थाने में उत्पीड़न का शिकार होता है। अपराध की सूचना देने जाने वाला व्यक्ति थाने में स्वयं अपराधी जैसा, कैसे बन जाता है? कोई नहीं पूछता।
हमारे समय का हर आदमी आदमी न होकर प्रश्नों की कब्रगाह क्यों बन गया है? कोई नहीं पूछता। हमारी जबान पता हीं क्यों पथरा गई है। पता नहीं क्यों पत्थर की बन गई है। किसी को पता नहीं। हजार-हजार सवाल हमारी छाती में खौलते रहते हैं मगर हमारी जबान पर एक भी नहीं आते।
हम विद्यालयों में पढ़ने के लिये जाते हैं और वहाँ नकल कराने की फीस भरकर बिना पढ़े लौट आते हैं। हमारे सारे निजी चिकित्सालय मुर्दों का इलाज करने में तत्पर हैं। आदमी मर जाता है फिर भी चिकित्सक इलाज चालू रखते हैं। परिजनों से चिकित्सा की फीस वसूलते रहते हैं।
किसी भी संवैधानिक सहूलियत को पाने के लिये किसी भी जमीन से उठा हुआ हमारा पहला कदम नितांत असंवैधानिक होने को शापित क्यों है?
जब संविधान की रचना हो रही थी, हमारे लक्ष्य स्पष्ट थे। हमारे सामने एक सुसंगठित, भयमुक्त, शोषण विहीन और समतामूलक राष्ट्र निर्माण का स्वप्न स्पष्ट था। हमारी आस्था अनाविल थी। नागरिक सम्मान और वैयक्तिक स्वतंत्रता के भावों के प्रति हमारे हृदय में सम्मान की अभीप्सा भरी थी। हमारे संविधान की मूल भावना उच्चतर मानवीय समाज निर्माण के प्रति प्रतिबद्ध थी। हमारे हृदय में संविधान की गरिमा के प्रति पवित्र श्रद्धा की भावना भरी थी।
आज समय के बदलते संदर्भ अलग हैं। आज हमारी राजनीति का मूल संकल्प सत्ता को हथियाने का संकल्प बन गया है। आज संविधान का उपयोग हम अपने-अपने व्यक्तिगत स्वार्थों और उद्देश्यों की पूर्तिके लिए तलवार और ढाल की तरह करने के विश्वासी बन गये हैं। बनते जा रहे हैं। हमारा रवैया उसकी गरिमा के प्रति श्रद्धा का नहीं, बल्कि खिलवाड़ी बनता जा रहा है। हम कानून को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने के अभ्यासी बन गये हैं। लोकतंत्र की गरिमा के प्रति हमारे हृदय में आस्था के भाव विलुप्त होते जा रहे हैं। हमारी सामूहिक उत्थान और मंगलेच्छा के संकल्प धूल में मिलते जा रहे हैं।
स्वतंत्रता, समता और बन्धुत्व की भावना के प्रति हमारे भीतर आस्था की जड़ें उकठ रही हैं। उखाड़-पछाड़ की आँधी में हमें छाँह देने वाले पेड़ों की जड़ें उलस रही हैं।
हम अपनी जड़ों से बेखबर हैं। हमारा ध्यान अपनी जड़ों को सींचने के प्रति नहीं है। हम पत्ता-पत्ता सींच रहे हैं। हम डाली-डाली सींच रहे हैं। जड़ सूखती जा रही है। पत्ते मलिन होते जा रहे हैं। डालिययां कमजोर होती जा रही हैं।
जिसकी सुरक्षा में हम तैनात हैं उसके प्रति हमारा कोई ममत्व नहीं है। हमारा समय न जाने कैसे जाने-अनजाने अपने उत्तरदायित्वों से विमुख होता समय होता रहा है।
अपने दायित्वों से विमुख होने का संकट हमारे संविधान का सबसे बड़ा संकट है।
संविधान के संकट को हम अपना संकट कब समझ सकेंगे? जब तक समझने को तैयार नहीं हो पाते हैं। संविधान पर संकट बना रहेगा।

किसने तोड़ा

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

‘‘किसने तोड़ा……?’’ इस प्रश्न के फूटते ही समूची कक्षा में सन्नाटा छा गया।
बच्चे तो थर-थर काँप ही रहे थे। मेज के नीचे हेड मास्टर साहब की टाँगे भी थरथरा रही थीं। वे पसीने में डूबे जा रहे थे। हलक सूखा जा रहा था।
‘‘मैं पूछता हूँ, शिव का धनुष किसने तोड़ा?’’ अब तो विद्यालय की दीवारें भी हिल उठीं। अब वहाँ केवल भय था। भय के अलावा कहीं और कुछ भी नहीं था।
‘‘जी, नहीं पता….।‘‘ ‘‘जी मैंने नहीं तोड़ा।‘‘ ‘‘जी, मैंने नहीं देखा।‘‘ आशंका, क्षोभ, ग्लानि, डर और अपराध बोध की पीड़ा से रुँधे, हकलाते कंठों से सारे विद्यार्थियों का यही जवाब था।
बचपन से ही जनश्रुतियों में सुरक्षित यह कहानी मैंने कितनी बार सुनी है। पहले मन विश्वास करने को राजी नहीं होता था। यह कहानी थोड़ी व्यंग्य और अधिक विनोद की कहानी मालूम पड़ती थी। पता नहीं क्यों, हमारी अधिकांश व्यंग्य कथायें उपहास कथाएं बन जाती हैं। बिना उपहास के हास नहीं रचा जा सकता क्या? बार-बार मन पूछ बैठता है। अब इस कहानी पर मन में विश्वास बढ़ने लगा है।
कहानी में कहा गया है कि किसी विद्यालय में डिप्टी साहब का औचक दौरा हुआ था। वे सीधे प्राइमरी विद्यालय की पाँचवीं कक्षा में घुस गये थे। कक्षा में विद्यार्थी परशुराम प्रसंग की कविता जोर-जोर से पढ़ रहे थे। हेड मास्टर साहब कुर्सी पर उनींदे थे। कक्षा में पहुँचते ही डिप्टी साहब ने बच्चों से प्रश्न पूछ दिया था, ‘‘शिव का धनुष किसने तोड़ा….?
शिव का धनुष टूट चुका था। मगर किसी को पता नहीं था कि धनुष किसने तोड़ा। बच्चों के उत्तर से खिन्न होकर डिप्टी साहब ने हेडमास्टर साहब की तरफ देखा।
हेडमास्टर साहब की हालत दयनीय हो उठी थी। उन्हें डिप्टी साहब, डिप्टी की तरह नहीं, जनक की सभा में रौद्र रस की प्रतिमूर्ति परशुराम की तरह दिखाई पड़ रहे थे। हेड मास्टर साहब की गत तर्जनी देखकर सूख गई कुम्हड़े की बतिया जैसी बन गई थी।
खैर! उन्होंने अपनी अटल व्यवहार बुद्धि की कुशलता से मामला सँभाला। डिप्टी साहब से जलपान के लिये आग्रह किया। हेडमास्टर साहब ने बड़े विनीत भाव से डिप्टी साहब को आश्वस्त किया, ‘‘साहब, लड़के तो दुष्ट होते ही हैं। यह तो तय है कि इनमें से ही किसी ने तोड़ा होगा। देख तो मैं भी नहीं पाया। मगर हुजूर, विश्वास कीजिये, मैं पता जरूर लगा लूँगा। एक-एक की कचूमर निकाल लूँगा। मार-मारकर भुर्ता बना दूँगा। आज नहीं तो कल मैं आपको जरूर ठीक-ठाक बता दूँगा कि किस हरामी के बच्चे ने धनुष तोड़ा।’’
आज हमारे देश की जनचेतना चिल्ला-चिल्ला कर पूछ रही है, किसने तोड़ा…..? हमारे आजाद देश में बन्धुत्व की भावना को किसने तोड़ा? राष्ट्रप्रेम को किसने तोड़ा? हमारे देश भक्ति के भाव को किसने खण्डित किया? हमारे सामूहिक उत्कर्ष के संकल्प को किसने मटियामेट कर डाला?
हम सब तो इस सबके साथ ही आजाद हुये थे। इस सबके लिये ही आजाद हुये थे। हम तो अपने सर्वोत्तम व्यक्तिगत को सार्वजनिक करके राष्ट्र निर्माण की सुरभित आस्था के साथ आजाद हुये थे। फिर आज ऐसा क्यों है कि हम समूचे सार्वजनिक को अपना व्यक्तिगत बना लेने की अमिट बुभुक्षा के शिकार बन बैठे हैं। हमारी भूख ऐसी विकराल कैसे बन गई है कि हम राष्ट्र की समृद्धि के संसाधनों को ही खा-पचा जाने की हर कोशिश में हलकान हैं। हमारा समय बुभुक्षित समय क्यों बनता जा रहा है? कौन बना रहा है। हमारा भिखमंगा बनते जाना हमारे लिये लज्जाजनक क्यों नहीं बन पा रहा है?
हमारे समय की जनचेतना पूछ रही है। हमारे देश की आत्मचेतना पूछ रही है। स्वतंत्रता के बलिदानियों की तमन्ना पूछ रही है। आजादी के पुजारियों का विश्वास पूछ रहा है। सभी तो पूछ रहे हैं, ‘‘आखिर किसने तोड़ा? आजादी का अर्थ किसने तोड़ा? स्वतंत्रता की मर्यादा किसने तोड़ी? भ्रातृत्व की गरिमा किसने तोड़ी? सपनों का सच किसने तोड़ा?’’ सब चुप हैं। बुद्धिजीवी चुप हैं। नेता चुप हैं। वकील चुप हैं। प्राध्यापक चुप हैं। न्यायाधीश चुप हैं। पंचायतें चुप हैं। विधानसभायें चुप हैं। संसद चुप है।
सब चुप हैं। सब भयभीत हैं। सभी भय के कारण चुप हैं। अपने नंगा हो जाने के भय के कारण। बोलना सब जानते हैं। खूब बोलते हैं। सभी बातूनी हैं। मगर इस सवाल पर एकदम चुप हैं।
हमारा समय जाने कैसा समय है। हमारे समय में सिर्फ प्रश्न बोल रहे हैं। उत्तर चुप हैं।
जिन्हें उत्तर देना है, वे या तो चुप हैं, या फिर ‘हम नहीं’, हम नहीं, हम नहीं बोल रहे हैं। उनका बोलना चुप्पी से भिन्न नहीं है।
वे सिर्फ सफाई दे रहे हैं। वे केवल अपनी निदोर्षिता की सफाई दे रहे हैं – हमने नहीं तोड़ा।
मैं देख रहा हूँ, हमारे समय में हमारा समूचा देश एक प्राइमरी पाठशाला में तब्दील हो गया है।
हमारे समय की पाठशाला कहने भर को पाठशाला रह गई है। वास्तव अब वह यतीमशाला बन गई है। बच्चों के भीतर केवल भूख है। पेट की भूख। हाथ में खाली कटोरे हैं। कहीं भोजन पकने की गन्ध भी है। किताबें, कलम सब बस्ते में बन्द है। हेड मास्टर साहब ‘मिड डे मिल’ की व्यवस्था में लथपथ हैं।
प्रश्न गूँज रहा है – किसने तोड़ा? शिव का धनुष किसने तोड़ा?
प्रश्न गूँज रहा है – हमारे देश के बन्धुत्व को, सौहार्द को, समरसता को, सहिष्णुता को, समरसता को, सामूहिक उत्कर्ष के संकल्प को किसने तोड़ा?
‘‘जी हमने नहीं।‘‘ ’’जी हमने नहीं।’’ ‘‘जी हमने नहीं’’
हमारे समय का हेडमास्टर भी कह रहा है, ‘‘ जी हमने नहीं।’’ हमने तो देखा ही नहीं। हमने तो देखा ही नहीं। हमें तो लेखा-जोखा देखने से फुर्सत ही नहीं। क्या मैं कोई सपना देख रहा हूँ? शायद नहीं। मैं सपना नहीं देख रहा हूँ।
हमारे समय में कोई राजनीति नहीं है। राजनीति है ही नहीं। न केन्द्र में, न परिधि में। है, सिर्फ सत्ता हथियाने का गोलबन्द अभियान।

लेखन जीवन की पुनर्रचना की प्रक्रिया

मुक्तिबोध     

साहित्यिक कलाकार, अपनी विधायक कल्पना द्वारा, जीवन की पुनर्रचना करता है। जीवन की यह पुनर्रचना कलाकृति बनती है। कला में जीवन की जो पुनर्रचना होती है, वह सारतः उस जीवन का प्रतिनिधित्व करती है, कि जो जीवन इस जगत में वस्तुतः जिया या भोगा जाता है-लेखक द्वारा तथा अन्यों द्वारा। जिया या भोगा जानेवाला यह जो व्यापक जीवन है, वह जितना आन्तरिक है, उतना ही बाह्म । बाह्म और आन्तरिक के बीच स्पष्ट रेखा खींचना मुश्किल है, यद्यपि हमंे बौद्धिक आकलन कि सुविधा कि दृष्टि से भेद तो करना ही पड़ता है। किंतु आंतरिक और बाह्म का यह भेद प्रकार-भेद नहीं। उससे तो केवल यह सूचित होता है कि प्रकाश क्षेपक यन्त्र किस स्थान पर और किस कोण़ में रखा हुआ है।एक कोण से देखने पर जो आन्तरिक है, वह दूसरे कोण से देखने पर बाह्य प्रतीत होगा।
यह जीवन जब कल्पना द्वारा पुनर्रचित होता है, तब उस पुनर्रचित जीवन में तथा जगत क्षेत्र में जिये और भोगे जाने वाले जीवन में गुणात्मक अन्तर उत्पन्न हो जाता है। पुर्नचित जीवन जिये और भोगे जानेवाले जीवन से सारतः एक होते हुए भी स्वरूपतः भिन्न होता है। यदि पुनर्रचित जीवन वास्तविक जीवन से निःसारतः एक हो, तो वह पुनर्रचित जीवन निष्फल है। पुनर्रचित जीवन और वास्वतिक जीवन के बीच जो अलगाव होता है, जो पृथक स्थिति होती है, उस अलगाव और पृथक स्थिति के कारण ही कला में एक अमूर्तीकरण और सामान्यी करण उत्पन्न होता है। यह कैसे ? मैं अपने ख्याल को और साफ करना चाहता हूँ।
यह अमूर्तीकरण इसलिए उत्पन्न होता है कि जीवन की पुनर्रचना जिये और भोगे जानेवाले जीवन से सारत:एक होते हुए भी उससे कुछ अधिक होती है। यह बात महत्व की है कि जीवन की यह पुनर्रचना जिस वास्तविक जीवन में सारतः एक है, और जिसका वह प्रतिनिधित्व करती है, वह पुनर्रचना सचमुच जिये और भोगे जाने वाले या जिये या भोगे गये जीवन की वास्तविकताओं के साथ ही, तत्समान सारी वास्तविकताओं, तत्सदृश सब संभावनाओं का भी प्रतिनिधित्व करती है। जिया और भोगा जाने वाला जीवन विशिष्ट वस्तु है। इस विशिष्ट से (जीवन की पुनर्रचना में) सामान्य की ओर जाया जाता है। इसका फल यह होता है कि कला का प्रभाव सार्वकालिक, सार्वजनिक हो जाता है, कि न केवल एक देश की कलाकृति दूसरे देश में लोकप्रिय हो जाती है, वरन यह भी कि दूसरे देश के अतीत काल की कलाकृति एक देश के वर्तमान काल में भी लोकप्रिय हो जाती है। इस प्रकार देशकालातीत स्थिति प्राप्त कर कलाकृति शाश्वत साहित्य का अंग बन जाती है।
आइये, जीवन की पुनर्रचना की प्रक्रिया को फिर से दुहरायें (1) वास्तविक जिये और भोगे जानेवाले जीवन से जीवन की पुनर्रचना का सारतः एक होकर भी उससे अलग होना और अलग होकर भी सारतः एक होना, (2) कलाकृति जिस जीवन का बिम्बात्मक या भावात्मक प्रतिनिधित्व कर रही है, उस जीवन के सामान सारी वास्तविकताओं और तत्सदृश सब सम्भावनाओं का भी प्रतिनिधित्व करना, दूसरे शब्दों में, सामान्यीकरण होना।
विलगीकृत होकर सार-रूप हने की स्थिति ऐब्स्ट्रैक्शन है विशिष्ट से सामान्य रूप धारण करने की स्थिति जेनेरेलाइजेशन है। इस ऐब्स्टैªक्शन और जेनेरेलाइजेशन की स्थिति के फलस्वरूप कला की अपनी स्वतन्त्र सत्ता, स्वतन्त्र इयत्ता, स्वतन्त्र गति-नियम स्थापित हो जाते है। स्वभाव तथा स्वगति के नियमों में बँधे यथार्थ-बिम्ब यथार्थवादी शिल्प के अनुसार होते है। यथार्थवादी शिल्पवाली जीवन की पुनर्रचना फैटेसी द्वारा की गयी जीवन पुनर्रचना से भिन्न होती हैं। स्टीफन त्स्वाइग के उपन्यास, एक विशेष देश-काल परिस्थिति में प्राप्त वास्तविक जीवन का पुनर्रचित रूप है, किन्तु वह पुनर्रचित रूप प्रातिनिधिक हो उठा है तत्समान सारी वास्तविकताओं और सत्सदृश सारी संभावनाओं का। इसलिए, यह कहा जायेगा कि स्टीफन त्स्वाइग के उपन्यास तत्समान सारी वास्तविकताओं और तत्सदृश सारी सम्भावनाओं का सामान्यीकरण है-यानी कि स्टीफन त्स्वाइग की कल्पना द्वारा पुनर्रचित जीवन, अपने मूल वास्तविक जीवन का प्रतिनिधित्व तो करता ही है, साथ ही वह तत्समान सारी सम्भावनाओं और तत्सदृश सारी वास्तविकताओं का भी प्रतिनिधित्व करता है-भले ही वास्तविकताओं और सम्भावनाओं की हमें अपने मन में कल्पना ही क्यों न करनी पड़े।
जिया और भोगा जाने वाला जीवन एक विशिष्ट वस्तु है। जीवन की पुनरचना की प्रतिक्रिया के दौरान इस विशिष्ट को सामान्य में रूपन्तरित किया जाता है। किन्तु, यह सामान्य उपस्थित कैसे होता ? जिये और भोगे जानेवाले जीवन से पुनर्रचित जीवन की जो सारभूत एकात्मकता है, उस सारभूत एकात्मकता के आधार पर ही, और उसके कारण ही और उसके द्वारा ही, विशिष्ट में सामान्य का तेज प्रोद्भासित होता है, अन्यथा नहीं। पुर्नचित जीवन से वास्तविक जीवन का जो अलगाव है, उस अलगाव द्वारा सामान्य स्थापित नहीं होता, नहीं ही हो सकता। जो सारभूत एकात्मकता है, उससे सामान्य प्रस्तुत होता है।
विलगीकरण की क्रिया, वस्तुतः कला के आत्म-रूप स्थापन की क्रिया है। सारभूत एकात्मकता, स्थापित होने स्थापित होते रहने के बीच आप ही-आप पैदा होती रहती है। सारभूत एकात्मकता विलगीकरण की क्रिया के बिना असम्भव है। किन्तु सारभूत एकात्मकता स्थापित की जाती है, जीवन-पुनर्रचना की विधायक शक्त्पिा कल्पना-वृत्ति के सूत्र संचालन करने वाले संवेदनात्मक उद्देश्य द्वारा, कि जो उद्देश्य कलाकृति से प्रसार में शुरू से आखीर तक समाया रहता है। विलगीकरण तो कला आत्म-रूप स्थापन से उत्पन्न होता है।
वास्तविक जीवन-जगत में, जिसकी कि कलाकृति बिम्ब-रूप है, डूबते रहने से ही उस अनुभवात्मक ज्ञान दृष्टि का विकास होता रहता है कि जो अनुभवात्मक ज्ञान-दृष्टि संवेदनात्मक उद्देश्य की अंगभूत होकर उन संवेदनात्मक उद्येश्यों द्वारा होने वाले कल्पना परिचालन में सहायता करती है। ज्ञानदृष्टि तथा अनु भवात्मक जीवनज्ञान के वास्तविक चबूतरे पर खड़े होकर ही संवेदनात्मक उद्देेश्य अपनी-अपनी विविध प्रतिक्रियाएँ अथवा प्रक्रियाएँ प्रस्तुत करते है। ज्ञान की भूमि का जो प्रसार है, उस प्रसार का क्षेत्र ही संवेदनात्मक उद्देश्यों का कार्यक्षेत्र है। उस ज्ञान-क्षेत्र के प्रसार के परे और उससे अतीत संवेदनात्मक उद्देश्य है ही नहीं। संवेदनात्मक उद्देश्य अन्तःस्थित इच्छा-शक्ति की तृप्ति के और बाह्म से सामंजस्य-स्थापना की प्रवृत्ति के विविध कार्यों के एकीभूत और उदात्तीकृत रूप से युक्त रहते है। ये संवेदनात्मक उद्देश्य या तो बाह्म में काँट-छाँट उपस्थित करके अपनी तृप्ति करते हैं, अथवा उससे अपनी अनुकूलता स्थापित करते हैं। ये संवेदनात्मक उद्देश्य मानव-व्यवहार में, वाक्सरणि में तथा कला कृतियों में, तरह-तरह से स्पष्टतः अथवा प्रतीकात्मक रूप से, प्रकट होते रहते हैं।
दूसरे शब्दों मंे, संवेदनात्क उद्देश्य आभ्यंतर तथा बाह्म की काट-छाँट करते हैं,या आभ्यन्तर की, अथवा दोनों की साथ-साथ। इच्छा-तृप्ति तथा बाह्म से सामंजस्य-विधान की परस्पर-विरोधी द्विविध क्रियाओं की उदात्तीकृत एकात्मकता को धारण करने वाले ये संवेदनात्मक उद्देश्य, अपनी पूर्ति की दिशा में सक्रिय रहते हुए, मनुष्य के बाल्यकाल में ही उस जीवन-ज्ञान का विकास करते हैं, कि जिस जीवन-ज्ञान के बिना उन संवेदनात्मक उद्देश्यों की पूर्ति ही नहीं हो सकती। ये संवेदनात्मक उद्देश्य इच्छा-तृप्ति के विकास के, तथा बाह्म से सामंजस्य-स्थापन के कार्य की परस्पर-भिन्न तथा बहुधा परस्पर-विरोधी प्रक्रिया को एकात्मक उदात्तीकृत बनाते हुए, इच्छा-पूर्ति और सामंजस्य-विधान के द्विविध कार्यो का जो कौशल प्राप्त करते हैं, उस कौशल का दूसरा नाम बुद्धि है। यह बुद्धि की प्रारम्भिक अवस्था है।
जिस प्रकार समाज में कार्य-विभाजन होता है, उसी तरह बुद्धि का अपना कार्य अलग होते हुए भी वह जीवन रक्षा के उस सर्व सामान्य उद्देश्य में अपना योग देती है, कि जिस सामान्य उद्देश्य की पूर्ति में कल्पना तथा भावना का भी योग होता है। अतएव, उस जीवन रक्षा के सर्व सामान्य उद्देश्य की भूमि पर ये सभी वृत्तियाँ परस्परक-सन्निविष्ट, परस्पर-सहायक तथा परस्पर-शिक्षक और परस्परक-संस्कारक होते हुए, उस जीवन-ज्ञान का विकास करती हैं, कि जिस ज्ञान-राशि की सहायता से मनुष्य, अपने संवेदनात्मक उद्देश्यों से परिचालित होते हुए, अपने व्यक्तित्व-चरित्र को, बाह्म परिस्थिति को, तथा जीवन-रक्षा के उपादान जिस वर्ग में प्राप्त होते है उस वर्ग के हितों की ओर अग्रसर करने वाले मूल्यों को विशेष रूपाकार प्रदान करता है, या प्रदान करना चाहता है, प्रदान करने का प्रयत्न करता रहता है।
संक्षेप में, संवेदनात्मक उद्देश्यों द्वारा (अत्यन्त व्यापक अर्थ में, जीवन-रक्षा के लिए, जीवन विकास के लिए) बुद्धि का जन्म होता है। संवेदनात्मक उद्देश्य वास्तविक जगत में, जो कि व्यक्ति के लिए मुख्यतः अपना वर्ग-जगत होता है, अपनी पूर्ति के पथ का निर्माण करने के लिए जीवन-कौशल का विकास करते है।
इस जीवन-कौशल का दूसरा नाम है बुद्धि। संक्षेप में, बुद्धि का पितृत्व यदि संवेदनात्मक उद्देश्यों के पास है, तो उसका मातृत्व कार्यानुभवों के पास है। विलगीकरण (ऐब्स्ट्रैक्शन), समान्यीकरण और संश्लेषण, अर्थात सामान्यीकरणों के सामान्यीकरण, द्वारा बुद्धि अपना कार्य करती है। और बुद्धि के इस कार्य में, बुद्धि द्वारा सहायता-प्राप्त कल्पना और भावना, उसी बुद्धि से सहयोग करती हैं। इस प्रकार बुद्धि का पृथक सत्ता और पृथक पथ का विकास होते हुए भी, उसके पथ के विकास में सम्पूर्ण अन्तःवृत्तिया (भावना, कल्पना) योग देती हैं। ध्यान में रखने की बात है कि बुद्धि के कुछ विशुद्ध क्षेत्रों -जैसे, गणितशास्त्र, भौतिक-शास्त्र, ज्योर्तिविद्या आदि में भी बुद्धि की छलाँग कल्पना के सहयोग से होती है। किन्तु यह कल्पना बुद्धि द्वारा सुसंस्कृत और सुशिक्षित होकर ही वैसा कर सकती है। हाँ, शास्त्रीय क्षेत्रों में भावना की वृत्ति प्रच्छन्न होती है। संक्षेप में, जीवन-ज्ञान की उपलब्धि में तीनों वृत्तियों का सहयोग होता है, औ ये तीनों वृत्तियाँ एक-दूसरे से प्रभावित, परिष्कृत और शिक्षित होती हैं। संवेदनात्मक उद्देश्यों तथा कार्यानुभवों द्वारा उत्पन्न यह जो बुद्धि है, वह क्षेत्र-भेदानुसार अलग-अलग रूप ले लेती है।
हम इस बात को और स्पष्ट करना चाहते हैं। अपराध-व्यवसाय से जीने वाला व्यक्ति, अपने संवेदनात्मक उद्देश्यों तथा कार्यानुभवों द्वारा, बुद्धि का एक विशेष ढ़ंग से विकास करता है। ऐसे व्यक्ति भी मानव-मनोविज्ञान का अध्ययन करते हैं, मानव-व्यवहार का अध्ययन करते हैं। मानव की विश्वास वृत्ति का लाभ उठाते हुए, तथा उसकी दूसरी कमजोरियों से फायदा उठाते हुए, वे अपने कार्य मंे अग्रसर होते हैं। उनके अपने संवेदनात्मक उद्देश्यों तथा कार्यानुभवों के अनुसार, उनके पास भी जीवन-ज्ञान की एक विकसित और उन्नत व्यवस्था कायम हो जाती है। इस जीवन-ज्ञान का वे समुचित उपयोग करते हैं-यहाँ तक कि वे दंड से भी बच जाते हैं। संक्षेप में, उनके अपने संवेदनात्मक उद्देश्यों और कार्यानुभवों द्वारा, उनके पास भी जीवन-ज्ञान की एक उन्नत व्यवस्था है। यदि यह व्यवस्था अधूरी या कमजोर हुई, अथवा उसका अनुशासन ठीक-ठीक न हुआ, तो उन्हें धोखा खाना पड़ता है। दो अपराध-व्यवसाय-कर्ताओं के जीवन ज्ञान की अपनी-अपनी व्यवस्थाओं में, अपने-अपने कार्यानुभवों तथा संवेदनात्मक उद्देश्यों के अनुसार, भेद हो जाता है, यद्यपि उन दो जीवन-ज्ञान-व्यवस्थाओं में बहुत-कुछ समानता भी रहती है।
संक्षेप में, जीवन ज्ञान की प्राप्ति में तीनों वृत्तियों का सजग सहयोग होता है। संवेदनात्मक उद्देश्यों तथा कार्य-अनुभवों द्वारा हही बुद्धि का विकास होकर, यह बुद्धि कल्पना तथा भावना को शिक्षित करके, सुसंस्कृत तथा परिष्कृत करके, आगे बढ़ती हैं। इसी प्रकार सुशिक्षित कल्पना तथा सुशिक्षित भावना,विकसित तथा परिपुष्ट जीवन-ज्ञान के आधार पर, कार्य करती जाती हैं। तीनों अन्तर्वृत्तियों की क्रियाशीलता के फलस्वरूप जो जीवन-ज्ञान उत्पन्न होता है, वह स्वयं एक क्रियाशी शक्ति बन जाता हैं। यह जीवन-ज्ञान, एक विकसित तथा परिपुष्ट व्यवस्था में परिणत होकर, सारे व्यक्तित्व के कार्य की आधार-शिला बन जाता है। तीनों अन्तःवृत्तियों की सक्रियता से उत्पन्न जीवन-ज्ञान व्यवस्था के आधार पर खड़े होकर, बुद्धि भावना और कल्पना, एक-दूसरे से सहयोग करती हुई अपना-अपना कार्य करती हैं।
कल्पना का कार्य है मूर्त्त-विधान करना। अन्तर्निहित संवेदनात्मक उद्देश्यों द्वारा परिचालित होकर ही कल्पना अपना कार्य करती है। ये संवेदनात्मक उद्देश्य जिस जीवन-ज्ञान व्यवस्था के मूर्त्त स्तर पर खड़े होकर कार्य कर रहे है, उस व्यवस्था के तत्वों का यथायोग्य उपयोग करते हुए कल्पना अपना मूर्त्त विधान उपस्थित करती है। न केवल यह, संवेदनात्मक उद्देश्य स्वयं अपनी पूर्ति के लिए बुद्धि का सहारा लेते हैं, जीवन-ज्ञान-व्यवस्था का भरपूर उपयोग करते हैं, तथा बुद्धि, कल्पना और भावना, तीनों का सहयोग लेते हुए कार्य करते हैं। अतएव इस पूरी प्रक्रिया में कल्पना-शक्ति स्वयं जीवन-ज्ञान-व्यवस्था के प्रतिकूल न जाकर, वरन उसकी सहायता प्राप्त करती हुई, उससे सुसंस्कृत और परिष्कृत होती हुई, साथ ही बुद्धि की सहायता लेती हुई, उससे शिक्षित और प्रशिक्षित होती हुई, इसके अतिरिक्त, भावना के रंग में डूबकर आगे बढ़ती हुई, वह अपना मूर्त्त-विधान करती है।
संक्षेप में, कल्पना के मूर्त्त-विधान के या बिम्ब-माला के दो प्रमुख कार्य होते है (1) व्याख्यात्मक (2) प्रातिनिधिक। मूर्त्त-विधान, एक ओर,जीवन की सारभूत विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है, तो दूसरी ओर, वह उस जीवन की व्याख्या के रूप में प्रस्तुत होता है। व्याख्यात्मक और पा्रतिनिधिकता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों के पीछे संवेेेेेेेेदनात्मक उद्देश्य समाया रहता है। उससे विरहित होकर दोनों के अस्तित्व की सम्भावना मुश्किल है।
जीवन की पुनर्रचना कल्पना द्वारा होती है। कल्पना वह माध्यम हैं जिसके द्वारा संवेदनात्मक उद्देश्य जीवन की पुनर्रचना करते हैं। इसलिए वास्तविक जीवन से पुनर्रचित जीवन की पृथकता तथा स्वरूप-भेद तो हो ही जाता है। संक्षेप में, कल्पना पुनर्रचित जीवन का स्वरूप-स्थापना करती है, और उसे वास्तविक जीवन की कोटि से हटा देती है। किन्तु साथ ही, यह पुर्नचित जीवन वास्तविक जिये और भोगे गये जीवन से सारभूत एकता रखता है। जिये और भोेगे गये वास्तविक जीवन से सारभूत एकता रखते हुए, भी, पुनर्रचित जीवन तत्समान सारी वास्तविकताओं और तत्सदृश सारी भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार, उसमें सामान्य का आविभवि होता है। किन्तु यह सामान्यीकरण है काहे का ? जिये और भोगे गये वास्तविक जीवन के अतिरिक्त, और उसको शामिल करके, तत्समान सारी वास्तविकताओं की सारी सम्भावनाओं का-चाहे वे किसी भी देश-काल की क्यों न हों, अथवा पीछे गये या आने वाले मनुष्यों के हृदय में ही वे क्यों न कल्पित हुई हों। किन्तु सामान्य का यह धरातल तब प्राप्त होता है, जब पुनर्रचित जीवन जिये और भोगे गये जीवन से सारभूत एकता रखे। अर्थात्, कलाकार का कर्त्तव्य है कि वह अपने संवेदनात्मक उद्देश्य के अनुसार, स्वयं के विशिष्ट में डूबे, जिये और भोगे गये जीवन के वास्तविक विशिष्ट से एकात्म हो, कि जिस विशिष्ट को वह अपने संवेदनात्मक उद्देश्यों के अनुसार प्रस्तुत करना चाहता है। कलाकार जीवन की पुनर्रचना द्वारा विशिष्ट ही उपस्थित करना चाहता है। किन्तु कला के अर्न्तनियमों के बँधकर उस विशिष्ट में विशिष्ट का स्वरूप विकसित होकर, परिणत होकर, सामान्य के रूप में प्रोद्भासित होता है। किन्तु यह सामान्य विशिष्ट का ही सीमा-विरहित रूप है। अतएव कलाकार का धर्म है कि अपने विशिष्ट की गहराइयों को पहचाने और उसे प्रस्तुत करे।
जीवन की पुनर्रचना मंे, वास्तविक जिये और भोगे गये जीवन से जो सारभूत एकता स्थापित होती है, उस सारभूत एकता को हम और स्पष्ट करना चाहते हैं। हम ये बता चुके हैं कि बुद्धि, ज्ञान, भावना के परस्पर सहयोग से जीवन-ज्ञान विकसित होता है। संवेदनात्मक उद्देश्यों द्वारा परिचालित होकर ही कल्पना मूर्त्त-विधान करती है। और ये संवेदनात्मक उद्देश्य जीवन-ज्ञान-व्यवस्था की सुदृढ़ पीठिका पर उपस्थित होकर ही कार्य करते हैं। साथ ही, वे जीवन-ज्ञान -व्यवस्था की इस पीठिका द्वारा नियन्त्रित भी होते हैं।
बुद्धि-कल्पना-भावना के परस्पर सहयोग से, तथा सहयोग के कारण, और अपने परस्पर-प्रभाव के फलस्वरूप, उनमें से प्रत्येक में जो परिणति हुई है उससे, और इन तीनों वृत्तियों के कार्य-व्यवहार के तथा जीवन-ज्ञान विकास के मूल उत्स संवेदनात्मक उद्देश्यों और वास्तविक जगत में उनकी पूर्ति के प्रत्यनांें, और उस प्रयत्न के दौरान प्राप्त होने वाले अनुभव और ज्ञान में, समाहित है। दूसरे शब्दों में इच्छा-तृप्ति और बाह्य से सामंजस्य-विधान के द्विविध (कभी-कभी परस्पर-विरोधी) कार्यो की एकता के निर्वाह से जीवन-ज्ञान उत्पन्न होता है, किन्तु उस जीवन-ज्ञान की प्राप्ति संवेदनात्मक उद्देश्यों के अनुसार होती है।
संक्षेप में, जिये और भोेगे गये वास्तविक जीवन के सारभूत सूत्र, उसकी सारभूत विशेषताएँ और सारभूत बिम्ब, इच्छा-तृप्ति और बाह्य से सामंजस्य-विधान के द्विविध (तथा कभी-कभी परपस्पर-विरोधी) कार्यों की एकता के निर्वाह के प्रयत्नों के दौरान संकलित, सम्पादित और संशोधित होते हैं।
हमारे आस-पास बहुत जीवन बिखरा हुआ है, फैला हुआ है। सर्वत्र उसके दृश्य प्रसारित हैं। किन्तु उनमें से हमारे लिए वही महत्वपूर्ण है, कि जो हमारी इच्छा-तृप्ति के कार्य तथा बाह्य से सामंजस्य-विधान के कार्य पर अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव डालते हों, अथवा हमारे उद्देश्यों को अग्रसर या पश्चसर करते हों। दूसरे शब्दों में, हम उसका संकलन करते हैं, हमसे वह संकलन हो जाता है। इस संकलन से ही हमारा जीवन-क्षेत्र बनता है। किन्तु इसे जीवन क्षेत्र में अनेकों मानव सम्बन्ध मानव मूल्य, अनकों कार्य-व्यवहार, अनकों घटनाएँ जिनके सूत्र केवल हमारे जीवन क्षेत्र में ही नहीं उसके बाहर तक फैले रहते है-उनकी क्रिया पर एक हद तक ही हमारा प्रभाव होता है। यह जीवन क्षेत्र वास्तविक जीवन-जगत का अंग है। उस वर्ग-जगत का अंग है कि जो विशेष काल-परिस्थिति में विशेष रूप धारण करता है। अतएव हमें अपने जीवन-क्षेत्र के अनुभवों से, तथा व्यापक जीवन-जगत के ज्ञान से, उस ज्ञान दृष्टि का विकास करना पड़ता है, कि जिससे हमें इच्छा-तृप्ति के और बाह्य से सामंजस्य-विधान के कार्य में सहायता प्राप्त हो। फलतः हमें अपने जीवन-क्षेत्र में बाहर निकलकर जीवन-जगत में फैलना पड़ता है। और व्यापक जीवन-जगत का ज्ञान प्राप्त करके अपने जीवन -क्षेत्र में लौट आना पड़ता है। और फिर पुनः जीवन-ज्ञान की वृद्धि के साथ-साथ अपने जीवन क्षेत्र को अपने सामर्थ्य के अनुसार व्यापक से व्यापकतर करना पड़ता है।
यही नहीं बाह्य से सामंजस्य-विधान की प्रवृत्ति तथा इच्छा-तृप्ति के प्रयत्न, इन दोनों ने मनुष्य को अपने से ऊपर उठने, अपने से परे जाने की वृत्ति को इतना बलवान बना दिया है कि हम अपने तात्कालिक हितों की बलि देकर दूरतर लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, और व्यक्तिगत स्वार्थ से परे उठकर सामान्य मानवीय आदर्शो की प्राप्ति का प्रयत्न करते है। किन्तु, ये सामान्य आदर्श उस जीवन-जगत से उठे होते हैं, कि जो हमारा जीवन-जगत है, जो हमारा परिवेश है, जो हमारा वर्ग है। किन्तु सामान्य मानवीय आदर्शों को उन विशेष मानव सम्बन्धों के हितों की पूर्ति करनी पड़ती हैं कि जिन मानव सम्बन्धों के क्षेत्र में हम पैदा हुए हैं, और जिनमें और जिनके बीच में रहकर हमने अपने जीवन-ज्ञान और दृष्टि का विकास किया है। दूसरे शब्दों में, मानव-सम्बन्धों के हित प्रधान हैं और आदर्श गौण। अतएव, आदर्शों को इस प्रकार ढ़ाला और रचा जाता है कि जिससे मानव-सम्बन्ध, वस्तुतः, एक समाज के भीतर के विभिन्न वर्गों के आपसी सम्बन्ध, तथा वर्ग के भीतर परस्पर मानव-सम्बन्ध, बने रहें और उसकी फिलासिफी बनायी जाती है- अर्थात् यह समष्टि-चित्र और उसके भीतर समायी हुई दृष्टि की व्यापकता-वस्तुतः अपने तथा वर्ग के एकीभूत दृष्टिकोण से देखे जाने की स्थिति से उत्पन्न है। यह बात भूलने की नहीं है।
यह पहले ही बता चुके है कि कला जीवन की पुनर्रचना है, किन्तु कवि के संवेदनात्मक उद्देश्यों के अनुसार यह पुनर्रचना की जाती है। ये संवेदनात्मक उद्देश्य उस दृष्टि से सम्पन्न हैं, कि जो दृष्टि कवि ने अपने अनुभवात्मक ज्ञान द्वारा तथा परम्परा द्वारा प्राप्त की है। उसके संवेदनात्मक उद्देश्यों के पास जो जीवन-ज्ञान है-चाहे वह अनुभवात्मक हो अथवा परम्परायित हो-उस जीवन-ज्ञान के तत्वों का उपयोग करते हुए कल्पना अपने चित्र प्रस्तुत करती है। संवेदनात्मक उद्देश्यों द्वारा संचालित होकर कल्पना जीवन की पुनर्रचना करती है, अतएव, इस पुनर्रचना के कार्य के दौरान वास्तविक जीवन व्याख्या तो आप ही आप हो जाती है। जीवन दृष्टि-सम्पन्न संवेदनात्मक उद्देश्यों के पास यदि दृष्टि-दोष है, तो वह दोष भी कल्पना-विधान में प्रस्तुत होगा। संक्षेप में, जीवन दृष्टि और संवेदनात्मक उद्देश्यों की सारी क्षमताएँ और निर्बलताएँ जीवन-ज्ञान के अधूरे-सधूरेपन, अच्छे-बुरेपन और सही गलतपन के सारे रंग संवेदनात्मक उद्देश्यों में से बहते हुए, कल्पना-विधान में फैल जायेंगे। उसी प्रकार, यह भी ध्यान में रखने की बात है कि कल्पना के महल की ईंटें वास्तविक जीवन में जिये गये तत्व ही हैं। अनुभव, जीवन दृष्टि ज्ञान व्यवस्था आदि-आदि बातों में से कल्पना अपने तत्व ग्रहण करती है, और उनकी जोड़-तोड़ करके अपने आकार बनाती है। संक्षेप में, जीवन की पुनर्रचना कवि के संवेदनात्मक उद्देश्यों के अनुसार उसकी जीवन-दृष्टि और जीवन-ज्ञान के अनुसार बनती है।

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