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Thursday, July 23, 2026

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आनन्द के स्रोत की तलाश

प्रेमचन्द्र

साहित्य का आधार जीवन है। इसी नींव पर साहित्य की दीवार खड़ी होती है। उसकी अटारियाँ, मीनार और गुम्बद बनते है, लेकिन बुनियाद मिट्टी के नीचे दबी पड़ी है। उसे देखने को भी जी नहीं चाहेगा। जीवन परमात्मा की सृष्टि है, इसलिए अनंत है, अगम्य है। सहित्य मनुष्य की सृष्टि है, इसलिए सुबोध है, सुगम है और मर्यादाओं से परिमित है। जीवन परमात्मा को अपने कामों का जवाबदेह है या नहीं, हमें मालूम नहीं, लेकिन साहित्य तो मनुष्य के सामने जवाबदेह है। इसके लिए कानून है, जिनसे वह इधर-उधर नहीं हो सकता। जीवन का उद्देश्य ही आनंद है। मनुष्य जीवनपर्यंत आनंद ही की खोज में लगा रहता है। किसी को वह रत्न द्रव्य में मिलता है, किसी को भरे-पूरे परिवार में, किसी को लम्बे-चौडे़ भवन में, किसी को ऐश्वर्य में, लेकिन साहित्य का आनंद इस आनंद से ऊँचा है, इससे पवित्र है, उसका आधार सुंदर और सत्य है। वास्तव में सच्चा आनंद सुंदर और सत्य से मिलता है, उसी आनंद को दर्शाना, वही आनंद उत्पन्न करना साहित्य का उद्देश्य हैं ऐश्वर्य या भोग के आनंद में ग्लानि छिपी होती है। उससे अरूचि भी हो सकती हैं, पश्चात्ताप भी हो सकता है, पर सुंदर से जो आनंद प्राप्त होता है, वह अखंड है, अमर है।
साहित्य के नौ रस कहे गए है। प्रश्न होगा, वीभत्स में भी कोई आनंद है ? अगर ऐसा न होता, तो वह रसों में गिना ही क्यों जाता ? हाँ, है। वीभत्स से सुंदर और सत्य मौजूद है। भारतेन्दु ने श्मशान का जो वर्णन किया है, वह कितना वीभत्स है! प्रेतों और पिशाचों का अधजले मांस के लोथड़े नोचना, हड्डियों को चटर-चटर चबाना, वीभत्स की पराकाष्ठा है, लेकिन वह वीभत्स होते हुए भी संुदर है, क्योंकि उसकी सृष्टि पीछे आने वालें स्वर्गीय दृश्य के आनंद को तीव्र करने के लिए ही हुई है। साहित्य तो हर एक रस मंे सुंदर खोजता है-राजा के महल मंे, रंक की झोपड़ी के शिखर पर, गंदे नालों के अंदर, ऊषा की लाली में, सावन-भादों की अँधेरी रात में। और यह आश्चर्य की बात है कि रंक की झोपड़ी में जितनी आसानी से संुदर मूर्तिमान दिखाई देता है, महलों मंे नहीं। महलों में तो वह खोजने से मुश्किलों से मिलता है।
जहाँ मनुष्य अपने मौलिक, यथार्थ, अकृत्रिम रूप में है, वहीं आनंद है। आनंद कृत्रिमता और आडम्बर से कोसांे भागता है। सत्य का कृत्रिम से क्या सम्बन्ध ? अतएव हमारा विचार है कि साहित्य में केवल एक रस है और वह शंृगार है। कोई कोई रस साहित्यिक दृष्टि से रस नहीं रहता और न उन रचना की गणना साहित्य में की जा सकती है, जो शंृगारविहीन और अ-सुंदर हो, को जागाना हो, जो केवल बाह्म जगत् से सम्बन्ध रखे, वह साहित्य नहीं है। जासूसी उपन्यास अद्भुत होता है। लेकिन हम उसे साहित्य उसी वक्त कहेंगे, जब उसमें संुदर का समावेश हो। खूनी का पता लगाने के लिए सतत उद्योग, नाना प्रकार के कष्टों का झेलना, न्याय -मर्यादा की रक्षा करना, ये भाव हैं, जो इस अद्भुत रस की रचनाा को संुदर बना देते है।
सत्य से आत्मा का सम्बन्ध तीन प्रकार का है। एक जिज्ञासा का सम्बन्ध है, दूसरा प्रयोजन का सम्बन्ध है और तीसरा आनंद का। जिज्ञासा का सम्बन्ध दर्शन का विषय है, प्रयोजन का सम्बन्ध विज्ञान का विषय है और साहित्य का विषय केवल आनंद का सम्बन्ध है। सत्य जहाँ आनंद का स्रोत बन जाता है, वहीं वह साहित्य हो जाता है। जिज्ञासा का सम्बन्ध विचार से है, प्रयोजन का सम्बन्ध स्वार्थ-बुद्धि से। आनंद का सम्बन्ध मनोभावों से है। साहित्य का विकास मनोभावों द्वारा ही होता है। एक ही दृश्य या घटना या कांड को हम तीनों ही भिन्न-भिन्न नजरों से देख सकते है। हिम से ढँके हुए पर्वत पर ऊषा का दृश्य दार्शनिक के गहरे विचार की वस्तु है, वैज्ञानिक के लिए अनुसंधान की और साहित्यिक के लिए विह्नलता की ! विह्नलता एक प्रकार का आत्म-समर्पण है। यहाँ हम पृथकता का अनुभव नहीं करते । यहाँ ऊँच-नीच भले-बुरे का भेद नहीं रह जाता। श्रीरामचन्द्र शबरी के जूठे बेर क्यों प्रेम से खाते हैं, कृष्ण भगवान् विदुर के शाक को क्यों नाना व्यंजनों से रूचिकर समझते है, इसलिए कि उन्होंने इस पार्थक्य को मिटा दिया है। उनकी आत्मा विशाल है। उसमें समस्त जगत् के लिए स्थान है। आत्मा-आत्मा से मिल गई है। जिसकी आत्मा जितनी ही विशाल है, वह उतना ही महापुरूष है। यहाँ तक कि ऐसे महान् पुरूष भी हो गए है, जो जड़ जगत् से भी अपनी आत्मा का मेल कर सके है।
आइए देखें, जीवन क्या है ? जीवन केवल जीना, खाना, सोना और मर जाना नहीं है। यह तो पशुओं का जीवन है। मानव जीवन में भी यह सब प्रवृत्तियाँ होती हैं, क्योंकि वह भी तो पशु है। पर इनके उपरांत कुछ और भी होता है। उसमें कुछ ऐसी मनोवृत्तियाँ होती है, जो प्रकृति के साथ हमारे मेल में बाधक होती हैं, कुछ ऐसी होती हैं, जो इस मेल में सहायक बन जाती हैं। जिन प्रवृत्तियों में प्रकृति के साथ हमारा सामंजस्य बढ़ता है, वह वांछनीय होती हैं, जिनसे सामंजस्य में बाधा उत्पन्न होती है, वे दूषित हैं। अहंकार, क्रोध या द्वेष हमारे मन की बाधक प्रवृत्तियाँ है। यदि हम इनको बेरोकटोक चलने दें, तो निस्संदेह वह हमें नाश और पतन की ओर ले जायेगी। इसलिए हमंे उनकी लगाम रोकनी पड़ती है, उन पर संयम रखना पड़ता है, जिसमें वे अपनी सीमा से बाहर न जा सकें। हम उन पर जितना कठोर संयम रख पाते हैं, उतना ही मंगलमय हमारा जीवन हो जाता है।
किन्तु नटखट लड़कों से डाँटकर कहना-तुम बड़े बदमाश हो, हम तुम्हारें कान पकड़कर उखाड़-लेंगे-अक्सर व्यर्थ ही होता है, बल्कि उस प्रकृति को और हठ की ओर ले जाकर पुष्ट कर देता है। जरूरत यह होती है, कि बालक में जो सद्वृत्तियाँ है, उन्हें उत्तेजित किया जाय कि दूषित वृत्तियाँ स्वाभाविक रूप से शांत हो जाय। इसी प्रकार मनुष्य को भी आत्मविकास के लिए संयम की आवश्यकता होती है। साहित्य ही मनोविकारों के रहस्य खोल कर सद्वृत्तियों को जगाता है। सत्य को रसों द्वारा हम जितनी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं, ज्ञान और विवके द्वारा नहीं कर सकते, उसी भाँति जैसे दुलार-चुमकारकर बच्चों को जितनी सफलता से वश में किया जा सकता है, डाँट-फटकार से सम्भव नहीं। कौन नहीं जानता कि प्रेम से कठोर से कठोर प्रकृति को नरम किया जा सकता है। साहित्य मस्तिष्क की वस्तु नहीं, हृदय की वस्तु है। जहाँ ज्ञान और उपदेश असफल होता है, वहाँ साहित्य बाजी ले जाता है। यही कारण है कि हम उपनिषदों और अन्य धर्म-ग्रंथों को साहित्य की सहायता लेते देखते है ! हमारे धर्माचार्यों ने देखा कि मनुष्य पर सबसे अधिक प्रभाव मानव-जीवन के दुख-सुख के वर्णन से ही हो सकता है और उन्होंने मानव-जीवन की वे कथाएँ रचीं, जो आज भी हमारे आनंद की वस्तु हैं। बौद्धों की जातक-कथाएँ, तोरेह, कुरान, इंजील ये सभी मानवी कथाओं के संग्रह-मात्र हैं। उन्हीं कथाओं पर हमारे बड़े-बड़े धर्म स्थिर हैं। वही कथाएँ धर्मों की आत्मा हैं। उन कथाओं को निकाल दीजिए, तो उस धर्म का अस्तित्व मिट जायगा। क्या उन धर्म-प्रवर्त्तकों ने अकारण ही मानवी जीवन की कथाओं का आश्रय लिया ? नहीं, उन्होंने देखा कि हृदय द्वारा ही जनता की आत्मा तक अपना संदेश पहुँचाया जा सकता है। वे स्वयं विशाल हृदय के मनुष्य थे। उन्होंने मानव जीवन से अपनी आत्मा का मेल कर लिया था। समस्त मानव-जाति से उनके जीवन का सामंजस्य था, फिर वे मानव-चरित्र की उपेक्षा कैसे करते ?
आदिकाल से मनुष्य के लिए सबसे समीप मनुष्य हैं। हम जिसके सुख-दुःख, हँसने-रोने का मर्म समझ सकते है, उसी से हमारी आत्मा का अधिक मेल होता है। विद्यार्थी को विद्यार्थी जीवन से, कृषक को कृषक जीवन में जितनी रूचि है, उतनी अन्य जातियों से नहीं, लेकिन साहित्य जगत् में प्रवेश पाते ही यह भेद, यह पार्थक्य मिट जाता है। हमारी मानवता जैसे विशाल और विराट् होकर समस्त मानव जाति पर अधिकार पा जाती है। मानव जाति ही नहीं, चर और अचर जड़ अैर चेतन सभी उसके अधिकार में आ जाते हैं। उसे मानो विश्व की आत्मा पर साम्राज्य प्राप्त हो जाता है। श्री रामचन्द्र राजा थे, पर आज रंक भी उनके दुःख से उतना ही प्रभावित होता है, जितना कोई राजा हो सकता है।
साहित्य वह जादू की लकड़ी हैं जो पशुओं में, ईंट-पत्थरों में, पेड़-पौधों में भी विश्व की आत्मा का दर्शन करा देती है। मानव हृदय का जगत प्रत्यक्ष जगत् जैसा नहीं है। हम मनुष्य होने के कारण मानव जगत् के प्राणियों मंे अपने को अधिक पाते हैं, उसके सुख-दुःख, हर्ष और विषाद से ज्यादा विचलित होते हैं। हम अपने निकटतम बंधु-बांधवों से अपने को इतना निकट नहीं पाते, इसलिए कि हम उसके एक-एक विचार, एक-एक उद्गार को जानते हैं। उसका मन हमारी नजरों के सामने आईने की तरह खुला हुआ है। जीवन में ऐसे प्राणी हमें कहाँ मिलते हैं, जिनके अंतःकरण में हम इतनी स्वाधीनता से विचर सकें ? सच्चे साहित्यकार का यही लक्षण है कि उसके भावों में व्यापकता हो, उसने विश्व की आत्मा से ऐसी ‘हारमनी’ प्राप्त कर ली हो कि उसके भाव प्रत्येक प्राणी को अपने ही भाव मालूम हों।
साहित्यकार बहुधा अपने देश-काल से प्रभावित होता है। जब कोई लहर देश में उठती है, तो साहित्यकार के लिए उससे अविचलित रहना असंभव हो जाता है। उसकी विशाल आत्मा अपने देश-बंधुओं के कष्टों से विकल हो उठती है और इस तीव्र विकलता में वह रो उठता है, पर उसके रूदन में भी व्यापकता होती है। वह स्वदेश का होकर भी सार्वभौमिक रहता है। ‘टाम काका की कुटिया, गुलामी की प्रथा के व्यथित हृदय की रचना है, पर आज उस प्रथा के उठ जाने पर भी उसमें वह व्यापकता है कि हम लोग उसे पढ़कर मुग्ध हो जाते हैं। दर्शन और विज्ञान समय की गति के अनुसार बदलते रहते हैंपर साहित्य तो हृदय की वस्तु है, और मानव हृदय में तबदीलियाँ नहीं होती। हर्ष और विस्मय, क्रोध और द्वेष, आशा और भय आज भी हमारे मन पर उसी तरह अधिकृत हैं, जैसे आदिकवि वाल्मीकि के समय में थे और कदाचित् अनंत तक रहंेगे। रामायण के समय का समय अब नहीं है, महाभारत का समय भी अतीत हो गया, पर ये ग्रंथ अभी तक नए हैं। साहित्य ही सच्चा इतिहास है, क्योंकि उसमें अपने देश और काल का जैसा चित्र होता है, वैसा कोरे इतिहास में नहीं हो सकता। घटनाओं की तालिका इतिहास जीवन के विभिन्न अंगों की प्रगति का नाम है, और जीवन पर साहित्य से अधिक प्रकाश और कौन वस्तु डाल सकती है, क्योंकि साहित्य अपने देशकाल का प्रतिबिम्ब होता है। जीवन में साहित्य की उपयोगिता के विषय में कभी-कभी संदेह किया जाता है। कहा जाता है, जो स्वभाव से अच्छे हैं, वह अच्छे ही रहेंगे, चाहे कुछ भी पढ़ंे। जो स्वभाव से बुरे हैं, वह बुरे ही रहेेंगे, चाहे कुछ भी पढ़ें। इस कथन में सत्य की मात्रा बहुत कम है। इसे सत्य मान लेना मानव-चरित्र को बदल देना होगा। जो संुदर है, उसकी ओर मनुष्य का स्वाभाविक आकर्षण होता है। हम कितने ही पतित हो जाय, पर असंुदर की ओर हमारा आकर्षण नहीं हो सकता। हम कर्म चाहे कितने ही बुरे करें, पर यह असम्भ्व है कि करूणा और दया और प्रेम और भक्ति का हमारे दिलांे पर असर न हो। नादिरशाह से ज्यादा निर्दयी मनुष्य और कौन हो सकता है-हमारा आशय दिल्ली में कतलाम कराने वाले नादिरशाह के निर्दय होने में कोई संदेह नहीं रहता। उस समय आपको मालूम है किस बात से प्रभावित होकर उसने कतलात बंद करने का हुक्म दिया था ? दिल्ली के बादशाह का वजीर एक रसिक मनुष्य था। जब उसने देखा कि नादिरशाह का क्रोध किसी तरह नहीं शांत होता और दिल्ली वालों के खून की नदी बहती चली जाती है, यहाँ तक कि खुद नादिरशाह के मुँहलगे अफसर भी उसके सामने आने का साहस नहीं करते, तो वह हथेलियों पर जान रख कर नादिरशाह के पास पहुँचा और यह शेर पढ़ा-
‘कसे न माँद कि दीगर ब तेगे नाज कुशी।
मगर कि जिंदा कुनी खल्क राव बाज कुशी।’
इसका अर्थ यह हुआ कि तेरे प्रेम की तलवार ने अब किसी को जिंदा न छोड़ा। अब तो तेरे लिए इसके सिवा ओर काई उपाय नहीं है कि तू मुर्दों को फिर जिला दे और फिर उन्हें मारना शुरू करे। यह फारसी के एक प्रसिद्ध कवि का शृंगार-विषयक शेर है, पर इसे सुनकर कातिल के दिल में मनुष्य जाग उठा। इस शेर ने उसके हृदय के कोमल भाग को स्पर्श कर दिया और कतलाम तुरंत बंद कर दिया गया।
नेपोलियन के जीवन की वह घटना भी प्रसिद्ध है, जब उसने एक अँगरेज मल्लाह को झाऊँ की नाव पर कैले का समुन्द पार करते देखा। जब फ्रंासीसी अपराधी मल्लाह को पकड़
कर नेपोलियन के सामने लाये और उसने पूछा-तू इस भंगुर नौका पर क्यों समुद्र पार कर रहा था, तो अपराधी ने कहा-इसलिए कि मेरी वृद्धा माता घर पर अकेली है,मैं उसे एक बार देखना चाहता था। नेपोलियन की आँखों में आँसू छलछला आये। मनुष्य का कोमल भाग स्पंदित हो उठा। उसने उस सैनिक को फ्रांसीसी नौका पर इंगलैण्ड भेज दिया।
मनुष्य स्वभाव से देवतुल्य है। जमाने के छल-प्रपंच या और परिस्थितियों के वशीभूत होकर वह अपना देवत्व खो बैठता है। साहित्य इसी देवत्व को अपने स्थान पर प्रतिष्ठित करने की चेष्टा करता है- उपदेशों से नहीं, नसीहतों से नहीं, भावों को स्पंदित करके, मन के कोमल तारांें पर चोट लगाकर प्रकृति से सामंजस्य उत्पन्न करके। हमारी सभ्यता साहित्य पर ही आधारित है। हम जो कुछ हैं, साहित्य के ही बनाए हैं। विश्व की आत्मा के अंतर्गत भी राष्ट्र या देश की एक आत्मा होती है। इसी आत्मा की प्रतिध्वनि है- साहित्य।
योरप का साहित्य उठा लीजिए। आप वहाँ संघर्ष पाएँगे। कहीं खूनी कांडो का प्रदर्शन है, कहीं जासूसी कमाल का। जैसे सारी संस्कृति उन्मत्त होकर मरु में जल खोज रही है। उस साहित्य का परिणाम यही है कि वैयक्ति स्वार्थपरायणता दिन-दिन बढ़ती जाती हैं, अर्थ-लोलुपता की कहीं सीमा नहीं, नित्य दंगे, नित्य लड़ाईयाँ। प्रत्येक वस्तु स्वार्थ के काँटे पर तौली जा रही है। यहाँ तक कि अब किसी यूरोपियन महात्मा का उपदेश सुनकर भी संदेह होता है कि इसके परदे में स्थार्थ न हो।
साहित्य सामाजिक आदर्शो का स्रष्टा है। जब आदर्श ही भ्रष्ट हो गया, तो समाज के पतन में बहुत दिन नहीं लगते। नई सभ्यता का जीवन 150 साल के अधिक नहीं, पर अभी से संसार उससे तंग का गया है, पर इसके बदले में उसे कोई ऐसी वस्तु नहीं मिल रही है, जिसे वहाँ स्थापित कर सके। उसकी दशा उस मनुष्य की-सी है, जो यह तो समझ रहा है कि वह इतनी दूर जा चुका है कि अब लौटने की उसमें सामर्थ्य नहीं है। वह आगे ही जायगा-चाहे उधर कोई समुद्र ही क्यों न लहरें मार रहा हो। उसमें नैराश्य का हिंसक बल है, आशा की उदार शक्ति नहीं।
भारतीय साहित्य का आदर्श उसका त्याग और उत्सर्ग है। योरप का कोई व्यक्ति लखपती होकर, जायदाद खरीदकर, कम्पनियों में हिस्से लेकर और ऊँची सोसाइटी में मिलकर अपने को कृतकार्य समझता है। भारत अपने को उस समय कृतकार्य समझताा है, जब वह इस माया-बंधन से मुक्त हो जाता है, जब उसमें भोग और अधिकार का मोह नहीं रहता। किसी राष्ट्र की सबसे मूल्यवान् सम्पत्ति उसके साहित्यिक आदर्श होते हैं। व्यास और वाल्मीकि ने जिन आदशों की सृष्टि की, वह आज भी भारत का सिर ऊँचा किए हुए हैं। राम अगर वाल्मीकि के साँचे में न ढ़लते, तो राम न रहते। सीता भी उसी साँचेे मंे ढलकर सीता हुई। यह सत्य है कि हम सब ऐसे चरित्रों का निर्माण नहंी कर सकते, पर धन्वंतरि के एक होने पर भी संसार में वैद्यों की आवश्कता है और रहेगी।
ऐसा महान् दायित्व जिस पर है, उसके निर्माताओं का पद कुछ कम जिम्मेदारी का नहीं है। कलम हाथ में लेते ही हमारे सिर पर बड़ी भारी जिम्मेदारी आ जाती है। साधारणतः युवावस्था में हमारी निगाह पहले विध्वंस करने की ओर उठ जाती है। हम सुधार करने की धुन में अंधाधंुध शर चलाना शुरू करते हैं। खुदाई फौजदार बन जाते हैं। तुरंत आँखे काले धब्बों की ओर पहुँचा जाती हैं यथार्थवाद के प्रवाह मंे बहने लगते हैं। बुराइयों के नग्न चित्र खींचने को कला की कृतकार्यता समझते हैे। यह सत्य है कि कोई मकान गिराकर ही उसकी जगह नया मकान बनाया जाता है। पुराने ढकोसलों और बंधनों को तोड़ने की जरूरत है, पर इसे साहित्य नहीं कह सकते। साहित्य तो वही है, जो साहित्य की मर्यादाओं का पालने करे। हम अक्सर साहित्य का मर्म समझे बिना ही लिखना शुरू कर देते हैं। शायद हम समझते हैं कि मजेदार, चटपटी और ओजपूर्णा भाषा में लिखना ही साहित्य है। भाषा भी साहित्य का अंग है, पर स्थायी साहित्य विध्वंस नहीं करता, निर्माण करता है। वह मानव-चरित्र की कालिमाएँ नहीं दिखाता, उसकी उज्ज्वलताएँ दिखाता है। मकान गिराने-वाला इंजीनियर नहीं कहलाता। इंजीनियर तो निर्माण ही करता है। हममें जो युवक साहित्य को अपने जीवन का ध्येय बनाना चाहते हैं, उन्हें बहुत आत्मसंयम की आवश्यकता है, क्योंकि वह अपने को एक महान् पद के लिए तैयार कर रहे है, जो अदालतों में बहस करने या कुरसी पर बैठकर मुकदमे का फैसला करने से कहीं ऊँचा है। उसके लिए केवल डिग्रियाँ और ऊँची शिक्षा काफी नहीं। चित्त की साधना, संयम, सौंदर्य-तत्व का ज्ञान, इसकी कहीं ज्यादा जरूरत है।
साहित्यकार को आदर्शवादी होना चाहिए। भावों का परिमार्जन भी उतना ही वांछनीय है जब तक हमारे साहित्य-सेवी इस आदर्श तक न पहुँचेंगे, तब तक हमारे साहित्य से मंगल की आशा नहीं की जा सकती। अमर साहित्य के निर्माता विलासी प्रवृत्ति के मनुष्य नहीं थे। वाल्मीकि और व्यास दोनों तपस्वी थे। सूर और तुलसी भी विलासिता के उपासक न थे। कबीर भी तपस्वी ही थे।
हमारा साहित्य अगर आज उन्नति नहीं करता, तो इसका कारण यही है कि हमने साहित्य-रचना के लिए कोई तैयारी नहीं की। दो-चार नुस्खे याद करके हकीम बन बैठे। साहित्य का उत्थान राष्ट्र का उत्थान है और हमारी ईश्वर से यही याचना है कि हममें सच्चे साहित्य-सेवी उत्पन्न हों, सच्चे तपस्वी, सच्चे आत्मज्ञानी।

कविता संग्रह

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

(1)
देखते-देखते

देखते-देखते
मौसम बदल जाता है
खुशी गम में
गम खुशी में
बदल जाता है
बदल ही जाता है देखते-देखते
पल में धूप है
पल में छाया है
पल में आया है
फलों से लदा
फूलों से सजा
हरे-हरे पत्तों से गझिनाया एक समय
और
गुजर गया है देखते-देखते
पेड़ से पत्ता-पत्ता झर गया है देखते-देखते।

(2)
पेड़ों का वसन्तोत्सव

हजार-हजार बाहें
आकाश में उठाये
नाच रहे हैं पेड़
बरस रही है चाँदनी
जंगल में
और पेड़
वसन्तोत्सव मना रहे हैं

पेड़
शायद नहीं जानते
चाँदनी की कहावत

इस तरह
अपनी खुशी में
इधर भूले हैं पेड़
और उधर
ठेकेदार के हाथ
जा चुका है जंगल

बरस रही है चाँदनी
जंगल में
और पेड़
वसन्तोत्सव मना रहे हैं।

(3)
हरियाली

खेतों से गुजरता
मिट्टी की नालियों में
आईने की तरह चमकता पानी
जिसमें एड़ी हिला रही है जाड़े की धूप
और बगल में मेड़ पर बैठी चिड़िया
गा रही है चहक-चहककर
चल रही है हवा बहक-बहककर
और दूर-दूर तक लहरा रही है फसल की हरियाली
यह है गाँव देहात की
मासूम सी खुशहाली

और इस खुशहाली में
लगता है सच में
भुला दिया है गाँव ने
दो साल पहले का सूखा
इस साल की बाढ़
पिछले महीने का डाका
खून-खराबा

(4)
बहता पानी

बहता पानी ही
मीठा होता है
साफ होता है
चिकना होता है
बहता पानी ही

बहता पानी ही
ठंडा होता है
बहते पानी में ही
नदी बहती है
बहते पानी में ही
जिंदगी बहती है
बहते पानी में ही
सृष्ठि बहती है
चाँदनी बहती है
बहते पानी में ही

बहता पानी
गंदा नहीं होता
कीचड़ का
फन्दा नहीं होता

बहता पानी
बहते पानी से
हवा में ताजगी है
पाकीजगी है
तीर्थों में
बहते पानी से
क्या चीज
अच्छी है

बहता पानी ही
मंगल होता है
बहता पानी ही
गंगा जल होता है

(5)
प्यार

प्यार
कभी मरता नहीं है
आग
जीवित रहती है
बुझी राख के नीचे दफन
कोई चिंगारी कोई धड़कन
कोई आँसू कोई सपना
पूरी तौर
मरता नहीं है प्यार
आस-पास की हवा जानती है।
किसी दिन
भड़केगी चिंगारी
उड़ेगी राख हवा के संग
जल उठेंगे जिस्म
अँधेरों की तरह

(6)
पेड़ से जीवन है

पेड़ कटेगा तो
पर्वत भी खिसकेगा
मौसम एकतरफा रहेगा
बाढ़ आयेगी इधर
सूखा पड़ेगा उधर

पेड़ कटेगा तो
रेगिस्तान आयेगा आगे
हिन्दुस्तान जायेगा पीछे

पेड़ कटेगा तो
धरती का आंचल फटेगा
उसकी सुन्दरता जायेगी
उसकी आबरू का संकट बढ़ेगा

पेड़ कटेगा तो
चिड़ियों का परिवार बिखरेगा
वातावरण ऐसा बनेगा
आकाश काला पड़ जायेगा
बड़े शहरों के आकाश सा
पेड़ कटेगा तो
चांद दिखेगा उदास सा
पेड़ रहेगा तो
सबसे कोमल स्पर्शों से भरी ठंडी हवा देगा

फल देगा
छाया देगा
हमारे लिए
खुद आबोहवा का जहर पीयेगा

पेड़ रहेगा तो
जीवन रहेगा

(7)
अमावस के दौर का दीपक

मैं अमावस के दौर का दीपक हूँ
और
तेज हवा के झोकों से
आजमाइस है मेरी

किसी पल
उठती है मेरी रोशनी
आकाश चूमते पेड़ों के बराबर
और किसी पल
अंधेरे के बीहड़ में
हो जाती है गुम

हवा समझती है
बुझ गया दीपक
तभी प्रकट होती है मेरी रोशनी
अंधेरे के बीहड में
उठती हुई
आकाश चूमते पेड़ों के बराबर
एक बार फिर

(8)
मेरी कहना है

उसकी शिकायत है
आज का मौसम ठीक नहीं है
और मेरा कहना है
कितनी अच्छी बरसात हुई है

अभी तो
हमारी बहस की
शुरुआत हुई है
और मेरा कहना है
गंगा का पानी
गंदला गया है
उसमें मिलों से निकलने वाला
जहर समा गया है
इस पर भी इस ओर न सोचना विचित्र है
उसका कहना है
गंगा पवित्र है

मेरा कहना है
इस शहर में कितनी अंधेर गर्दी है
वह कहता है
यह कहाँ नहीं है
मेरा कहना है
आदमी का सबसे बड़ा अभिशाप

गरीबी है
उसका कहना है
गरीबों की ही
सबसे बढ़िया जिन्दगी है

मेरा कहना है
आदमी को समय सापेक्ष्य होना चाहिए
उसका कहना है
जहाँ कोई मजबूरी है

हम रोज के दोस्त हैं
लेकिन हमारे विचारों में
कितनी बड़ी दूरी है।

वेदना के लिये शब्द और शब्दों के लिये बेचैन वेदना का कवि

वरिष्ठ साहित्यकार डा. उमेश प्रसाद सिंह।
वरिष्ठ साहित्यकार डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

केशव शरण को मैं तब से जानता हूँ, जब कुछ जानने की उत्कण्ठा हमारे भीतर जनम रही थी। हमारे भीतर कुछ जनम रहा था और हम एक अनछुये रोमांच में तैरना सीख रहे बच्चे की तरह छिपकोरियाँ खेलने में मगन थे। उस समय हमारे लिये हर दिन त्योहार का दिन था। वे हमारे कुछ खोजने के दिन थे। हम जीवन का अज्ञात खजाना खोज रहे थे। रहस्यों से भरे रास्ते हमारे रास्ते थेे।। रास्तों की लम्बाई हमें मालूम नहीं थी मगर हम अथक उत्साह से भरे थे। सौन्दर्य का सम्मोहन और विरूपता की वितृष्णा इतने अनिवार आकर्षण से हमारे पाँव अपनी ओर खींच रही थी कि कहीं भी विलम पाना हमारे लिये संभव नहीं था। हम अपने रास्ते चल पड़े थे। चल रहे थे। हम सब आस-पास थे। बिल्कुल पास-पास थे। साथ-साथ थे। हमारा साथ होना एक उत्सव की तरह था। हमारा सम्मिलन हमें शक्ति देता था। उत्साह और उमंग भरता था हममें। हम एक-दूसरे की ऊर्जा से स्फूर्त होते थे।
हमारे साथ हमारी पीढ़ी थी। मतलब कि उत्साह और उल्लास की एक पूरी जमात थी। हमारी पीढ़ी साहित्य की दुनियाँ में अपनी उपस्थिति अंकित करने के लिये अपने पाँव घर रही थी। हमारी जमात में दानिश थे, रामप्रकाश कुशवाहा थे, शिवकुमार ‘पराग’ थे, दिनेश कुशवाह थे, राजेन्द्र राजन थे, संजय गौतम थे, पुष्पा अवस्थी थीं, उमाशंकर चतुर्वेदी ‘कंचन’ थे, बद्री ‘विशाल’ थे, हिमांशु उपाध्याय थे, अशोक पाठक थे, अशोक कुमार सिंह थे, अजीत श्रीवास्तव थे और भी बहुत से लोग थे। बी.एच.यू. से लेकर अस्सी और लहुराबीर चौराहे तक शाम से देर रात का साहित्य चर्चा के किसिम-किसिम के विषय छिड़े रहते थे। इसमें अक्सर सुरेन्द्र वाजपेयी भी शामिल रहते। लहुराबीर पर कुमार विजय का होना एकदम सुनिश्चित था। काशी विद्यापीठ के आस-पास इन्दीवर होते ही थे। केशव शरण उस समय कहीं भी अनुपस्थित नहीं होते थे। आज भी उन दिनों की स्मृति हमें रोमांचित करती रहती है। प्रसाद जी की पंक्ति अक्सर याद आती है- वे कुछ दिन कितने सुन्दर थे।
केशव शरण की कविताएँ तब भी मुझे प्रिय थी और आज भी प्रिय हैं। उनकी कविताएँ मुझ अच्छी लगती हैं। उनके लिए मेरी स्मृति में जगह सुनिश्चित है। वे मेरे आत्मीय कवि हैं।
कविताएं क्यों अच्छी लगती है? यह जायज सवाल है। यह पूछ लेना बिल्कुल ही उचित है। मगर यह सवाल मुझे कत्तई पसन्द नहीं है। यह सच है कि हमारे अच्छा लगने के कारण हुआ करते हैं। मगर यह भी सच है कि तमाम कारणों की जाँच-पड़ताल के बाद हमें कुछ अच्छा लगे यह जरूरी नहीं। पहले कोई चीज बिना हमसे पूछे ही हमें अच्छी लग जाती है। पसन्द आ जाती है। फिर बाद में हम उसके कारण भी ढूँढ लेते है। केशव शरण की कविता भी मुझसे बिना पूछे ही अच्छी लग गई थी। अब लग गई तो लग गई। फिर क्या? फिर कुछ नहीं….. फिर बहुत कुछ……।

केशव शरण का सौन्दर्यबोध मुझे आकर्षित करता है। उनका सौन्दर्यबोध बड़ा गहरा भी है और व्यापक भी। उनके सौन्दर्य बोध की जड़ें भाव जगत के गहरे तल से रस खींचकर वस्तु जगत में अपनी छाया का विस्तार करती हैं। उनकी कविता में जो सुन्दर है, वह मनुष्य जीवन के लिये असंदिग्ध रूप में महत्तम है। मूल्यवान है। पेड़, पहाड़-बादल, वर्षा, हरियाली, नदी, झरना, कछार, बाग और मानवीय चेतना में उतरता वसन्त केशव शरण के सौन्दर्य बोध का केन्द्र है। उनका सौन्दर्य बोध इस दृष्टि से मुझे और अधिक अर्थवान लगता है कि वह हमारे सामयिक जीवन में अपनी अनुपस्थिति के दंश को बहुत बेधक बनाकर हमारी चेतना को बेचैन कर देता है। अपने सौन्दर्य बोध के माध्यम से जो नहीं है, उसके लिये बेचैनी उत्पन्न करने की कला केशव की कविता की विलक्षणता प्रमाणित करती हैं।
‘आईने की तरह चमकते पानी में एड़ी हिला रही जाड़े की धूप’ का बिम्ब जब केशव जी अपनी कविता में रचते हैं तो उनका सृजन सामर्थ्य हमें एक साथ कई धरातल पर चमत्कृत कर देता है। संवेदना के धरातल पर यहाँ हमें कवि भावजगत में बहुत गहरे ले जाता है। भावना के सौन्दर्य और रस की मिठास हमें आह्लादित करती है। इसके अतिरिक्त वह हमारे सम्मुख एक ऐसे चाक्षुष चित्र को खड़ा करता है, जो अपनी सजीवता और सरसता में विमोहित कर देता है। यह कविता में मानवीकरण नहीं, मानवीकरण की काव्य विरासत का नया विकास है। भाव को सजीव वस्तु में रूपान्तरित कर देने की कला ही विम्ब विधान की सार्थकता है। केशव शरण की कविता में सार्थक बिम्बों का विनियोग उनकी कविता की महत्ता को स्थापित करता है।
केशव शरण अपनी कायिक बनावट और बुनावट में भी मुकम्मल कवि दिखाई पड़ते हैं। उनकी चितवन और चेष्टाओं में उनके कवि होने की संभावना अपरिचितों को भी आसानी से दिख जाती है। प्रायः वे भाव जगत में इस तरह डूब जाते हैं कि अक्सर वस्तु जगत से उनके सम्बन्ध विच्छिन्न से दिख जाते हैं। वस्तु जगत में उनकी अनुपस्थिति उससे सरोकार हीनता की वाचक नहीं बल्कि भाव जगत से उनकी अनन्य संलग्नता की बोधक बन जाती है। उनकी कविता में भावजगत के सौन्दर्य और राग का वस्तु जगत में अभाव गहरी वेदना का सृजन करता है। इस वेदना को व्यक्त करने के लिये वे बेचैन रहते हैं। केशव शरण वेदना के लिये शब्द और शब्दों के लिए बेचैन वेदना के कवि हैं।

हमारे जीवन में, जीवन के लिये जो महत्तम है, वह क्यों नहीं है? उसके न होने के प्रति हमारी चिन्ता क्यों नहीं है? उसके न होने को लेकर हममें बेचैनी क्यों नहीं है? यह कैसी दारुण विडम्बना है। विडम्बना बोध का यह दारुण दंश केशव शरण की कविता का केन्द्रीय तत्व है। इसी केन्द्रीय तत्व के चारों तरफ सौन्दर्य और प्रेम के माध्यम से वे अपनी कविताओं में एक संवेदनात्मक सृजन का वृत्त बुनते हैं। इस वृत्त में हजार-हजार बांहे आकाश में उठाये पेड़ नाच रहे होते हैं। जंगल में चाँदनी बरस रही होती है। पेड़ वसन्तोत्सव मना रहे होते हैं। इस वृत्त में वसन्तोत्सव मनाते हुये पेड़ों का पूरा जंगल कटने के लिये ठेकेदार के हाथों में जा चुका होता है। कविता के इस वृत्त में केवल पेड़ों का जंगल ही नहीं है, बल्कि अपनी छोटी-छोटी खुशियों की उम्मीद में नाचते बेसुध जनों का वह जंगल भी है, जिसे जनतंत्र कहा जाता है। अपनी समृद्धि और अपने प्रभुत्व को बढ़ाने के लिये राजनीति के ठेकेदार के हाथ में जा चुका कटने के लिये जनतंत्र के जंगल की मूक वेदना भी केशव की कविता में कुछ अलग तरह की ध्वनियों में सुनाई देती है। प्राकृतिक प्रतीकों के माध्यम से सामाजिक जीवन सत्यों को ध्वनित करने का कौशल केशव शरण की कविता की अलग विशिष्टता है।
केशव शरण की काव्य संवेदना का मूलस्रोत प्रेम है। वे प्रेम की संवेदना के कवि हैं। उनके जीवन बोध में मनुष्य और प्रकृति विभाजित इकाई के रूप में नहीं हैं। मनुष्य और प्रकृति के बीच सहज, आत्मीय, और रागपूर्ण सम्बन्ध उनकी कविताओं की अन्तर्वस्तु के रूप में अपनी सुगन्धि फैलाते हैं। अपने काव्यबोध में केशव शरण आदिम आवेगों की आराधना के कवि हैं। सहज, जो अपने आप ही स्वच्छन्द है, उसकी उपासना में कवि की अस्मिता रमती है। बेरोक-टोक जीवन की गरिमा को जीवन में उपलब्ध हो लेना कवि की अभीप्सा है। एक अल्हड़ भोलापन केशव शरण की कविताओं में अलग रंग में दिखाई पड़ता है। जयशंकर प्रसाद का भोला सुहाग इनकी कविताओं में इठलाता हुआ हमारे चित्त को आकर्षित करता है।
केशव शरण की कविताएँ उल्लास और उदासी के ताने-बाने में बनी कविताएँ हैं। उल्लास काम्य है और उदासी प्राप्य है। उल्लास भाव जगत की उपलब्धि है और उदासी वस्तु जगत की स्थिति। भाव जगत और वस्तु जगत के अन्तर्सम्बन्धों की जटिल अभिक्रिया का तनाव संश्लिष्ट रूप में इनकी कविताओं में व्यक्त होने के लिये आकुल मिलता है।
केशव शरण की कविताएँ बहुस्तरीय अर्थ व्यंजना की कविताएँ नहीं हैं। बेहद विरोधी जीवन-स्थितियों की यातना का विक्षोभ उनकी कविताओं में गरजता नहीं है। उनकी कविताओं का शिल्प दूसरी तरह का है। उनकी कविताओं में आक्रोश नहीं है, विषाद है। मानवीय संवेदनाओं के क्षरण के प्रति उनमें गुस्सा नहीं है, ग्लानि है। अपने समय के अपराधी चरित्र के प्रति युयुत्सा नहीं है, क्षोभ हैै। अपने समय की तमाम विरोधी स्थितियों के बेधक आघात को वे अपनी आहत संवेदना के विक्षत स्वरूप के माध्यम से रचते है। व्यापक पीड़ा का करुण संगीत केशव शरण की काव्य ध्वनि में व्याप्त है। बिना किसी घोषित लड़ाई के, बिना किसी लड़ाई में शामिल हुये, अपने गाँव-घर में, अपनी राह में, अपने काम-काज में निरन्तर घायल होने और होते रहने की पीड़ा केशव की कविता में अपने सामयिक छद्म और उसके घातक इरादों के हिंसक कृत्यों को व्यंजित करती है। अपनी संवेदनात्मक अभीप्सा और अपने परिवेश की प्रवृत्तियों के संघातक संघर्ष को वे बड़े काव्यात्मक कौशल से अर्थ-विस्तार देते हैंः-
‘‘ मैं अमावस के दौर का दीपक हूँ
और
तेज हवा के झोंकों से
आजमाइश है मेरी।’’

केशव शरण की संघर्ष चेतना अपने दौर की कविता की संघर्ष चेतना से भिन्न ढंग की है। उनकी संघर्ष चेतना शोर-शराबे, ललकार, धिक्कार से दूर, कुछ अधिक सूक्ष्म धरातल पर, पूरी काव्यात्मक गरिमा में व्यक्त होने के कारण अधिक अर्थवान है।
केशव शरण के लिये कविता वाणी की विदग्धता नहीं है। कथन भंगिम की वक्रता के भी वे कवि नहीं है। वे बेहद सीधी और सादी उक्तियों के कवि हैं। प्रायः इतनी सादी उक्तियों के कवि कि सामान्यतः जहाँ कविता के होने में पाठक को सन्देह खड़ा हो जाय। बिल्कुल ही सामान्य जीवन स्थितियों और प्रसंगों को वे कविता बनाने में खतरनाक ढंग से प्रवृत्त दिखाई पड़ते हैं। कविता को पाने की ललक में वे अपने काव्य कर्म को किसी भी खतरे में डालने में जरा भी नहीं हिचकते। शायद यही कारण है कि केशव शरण जिस-जिस धरातल पर, जिस-जिस रूप में कविता को खड़ा करते हैं, वहाँ बहुत-से लोगों को कविता दिखाई नहीं पड़ती।
केशव शरण का प्रकृति से बड़ा गहरा प्रेम है। वे प्रकृति के अनन्य प्रेमी हैैं। वे वस्तु जगह और जीवन-जगत दोनों की प्रकृति में जहाँ-जहाँ, जिस-जिस रूप में कविता देख पाते हैं, दूसरों के लिये देख पाना संभव नहीं हो पाता। वे जो देखते है, उसका दूसरों का न देख पाना भी उनके लिये वेदना और यातना का कारण बन जाता है। उनकी यह वेदना उनकी कविताओं में मुखर है।
केशव शरण की कविता का शिल्प किसी भी तरह के उलझाव से सर्वथामुक्त है। उनकी कविता हमें यह सोचने में प्रवृत्त करती है कि क्या सहज जीवन-स्थितियों और वृत्तियों में अनिवार्य रूप से कविता व्यक्त है? उत्तर ‘हाँ’ में भी हो सकता है और नहीं में भी। मगर केशव शरण अपनी कविता में ‘हाँ’ के साथ खड़े दिखाई पड़ते हैं। केशव शरण का विलक्षण प्रकृति-राग और मनुष्येतर प्राणि जगत में उनकी संवेदना की व्याप्ति हमारी सामयिक सभ्यता की प्रवृत्ति को प्रश्नांकित करने की भूमिका में अधिक महत्वपूर्ण हो उठती है। उनकी कविताओं का महत्व नागरिक बोध के विकास की चिन्ता को भी कविता के विषय में सम्मिलित करने के कारण अलग दिखाई पड़ता है।
केशव शरण की कविता में व्याप्त और विन्यस्त प्रकृति राग आस्था के भयानक अकाल में भी हमारे मन में प्रकृति के अनुराग के बीज अंकुरित करता है। मानव और प्रकृति के बीच बेहद वितुलित सम्बन्धों के संकट काल में ये कविताएँ हमें आपसी सम्बन्धों के बारे में फिर से सोचने के लिये उत्प्रेरित और उद्बोधित करती हैं। केशव शरण की कविता में हमारे समय की बड़ी चिन्ता समाहित है।
केशव शरण मानवीय सभ्यता के विकास में बाधक बड़ी चिन्ता के कवि हैं। बड़ी चिन्ताओं के साथ होने से रास्ते अपने आप बड़े हो जाते हैं। केशव शरण कविता के बड़े रास्ते के कवि हैं।
अभी तक केशव शरण के चार कविता संग्रह,- ‘तालाब के पानी में लड़की’, ‘जिधर खुला व्योम होता है’, ‘एक उत्तर’, ’आधुनिक ऋचा’ और ‘दूरी मिट गई’ प्रकाश में आ चुके हैं। ‘गजल’ और ‘हाइकू’ में भी उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति हिन्दी जगत के सम्मुख उपस्थित की है। इसके अलावा भी केशव जी की प्रभूत कविताएं व्यापक स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। इस संकलन में केशव शरण के चार कविता संग्रह से कविताएँ चुनी गई हैं। यह सच है कि इन कविताओं के चुनाव के पीछे मेरी वैयक्तिक काव्य रूचि जरूर प्रभावी होगी। मगर मैं विनम्र निवेदन करना चाहूंगा कि कविताओं के चुनाव के पीछे दृष्टि को नितान्त वैयक्तिक होने से बचाने की पूरी कोशिश की है। कविता के प्रेमी और पाठक के रूप में मैंने कविताओं का चुनाव करने की पूरी चेष्टा की है। कविता का समूचा मूल्य और महत्व उसके पाठकों के आस्वाद पर ही अवलम्बित होता है। कविता अपने पाठकों के हृदय में उत्पन्न होने वाले तोष में ही हमेशा अस्तित्ववान रहती है। मेरा विश्वास है कि केशव शरण की कविताएँ अपने पाठकों के हृदय में अपना अस्तित्व कायम कर सकने में कृतकार्य होंगी।

भाजपा सरकार ने अपराध व अपराधियों पर कसी नकेलः योगी आदित्यनाथ

धानापुर में आयोजित सभा को संबोधित करते सीएम योगी आदित्यनाथ।

Young Writer, धानापुर। सैयदराजा की राजनीतिक में सूबे के सीएम योगी आदित्यनाथ भाजपा का रंग चटख करते दिखे। इस दौरान उन्होंने शहीदी धरती पर आयोजित चुनावी जनसभा में एक बार फिर सरकारी बुल्डोजर कर जिक्र किया और अपराध व अपराधियों पर नियंत्रण की अपनी उपलब्धि को गिनाकर जनता को भाजपा के प्रति समर्पित होने की बात कही। इस दौरान बार-बार सभा में भीड़ भी बुलडोजर का नाम आते ही सीएम की जय-जयकार करती नजर आयी। मुख्यमंत्री ने अपने अभिभाषण में पिछली सरकारों पर निशाना साधा और उन्हें यूपी के विकास का बाधक बताया। इस दौरान उन्होंने भाजपा का चेहरा बने सैयदराजा विधायक सुशील सिंह के जनता के प्रति जुड़ाव व लगाव को भी मंच के माध्यम से जनता के बीच रखा।

इस दौरान योगी ने कहा कि सपा को अपनी हार का एहसास हो चुका है। कई बड़े नेता 10 मार्च के बाद विदेश जाने का टिकट करा चुके हैं। सभा के दौरान विधायक सुशील सिंह ने धानापुर को तहसील बनाने और चोचकपुर पर पक्के पुल का निर्माण की मांग रखी। मुख्यमंत्री ने आने संबोधन में कहा भाजपा सरकार ने जो वादे किए थे उसको पूरा किया। हर जिले में मेडिकल कालेज की मांग को पूरा करते हुए बिजली, पानी सहित तमाम योजनाओं को जन-जन तक बिना भेदभाव पहुंचाने का काम किया है। जनपद के चारों विधानसभा सीट के लिए सीएम ने आमजन से राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधने वाली भाजपा का साथ व सहयोग देने की बात कही। ताकि नयी सरकार के गठन के बाद भाजपा विकास के कामकाज को आगे बढ़ाए। इस दौरान सैयदराजा में प्रत्याशी सुशील सिंह, मुगलसराय में रमेश जायसवाल के नामों का जिक्र किया और इन्हें जनता का फिक्र करने वाला बताया। इस अवसर पर जिलाध्यक्ष अभिमन्यु सिंह, आदि उपस्थित रहे। संचालन भाजपा के जिला महामंत्री सुजीत जायसवाल ने किया।

धानापुर में सीएम योगी आदित्यनाथ को भगवान श्रीराम की प्रतिमा भेंट करते सुशील सिंह।

चंदौली नहर में उतराया मिला युवक का शव, क्षेत्र में फैली सनसनी जांच में जुटी पुलिस


चहनियां । बलुआ थाना क्षेत्र के खोनपुर गांव के समीप नहर के किनारे एक युवक का शव मिलने से क्षेत्र में सनसनी फैल गई मौके पर छुट्टी आसपास के लोगों ने तत्काल इसकी सूचना पुलिस को दी मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को कब्जे में कर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल ले आई और आगे की कार्रवाई में जुट गई
बताते हैं कि बलुआ थाना क्षेत्र के मथेला शहीद गांव मार्ग पर नहर के किनारे एक 37 वर्षीय युवक का शव पानी में उतरता देख क्षेत्र के लोगो मे हड़कंप मच गया। मृतक युवक को लेकर गांव सहित आसपास के क्षेत्रों में तरह-तरह की चर्चाएं होने लगी मौके पर जुटे ग्रामीणों ने तत्काल इसकी सूचना पुलिस को दी मौके पर पहुंची पुलिस ने युवक के शव को शिनाख्त करने का प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिल पाया इस दौरान पुलिस ने युवक के शव को कब्जे में कर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया बलुआ थानाध्यक्ष मिथिलेश तिवारी ने बताया कि खोनपुर गांव के पास नहर में युवक का शव मिला जिसकी शिनाख्त नही हो पायी है । पुलिस युवक के शव को कब्जे में कर पोस्टमार्टम की भेज दिया है। जल्द ही युवक की शिनाख्त कर परिजनों को सूचित किया जाएगा

100 बार काटेंगे टिकट, फिर भी रहूंगा सपा का वफादार :रामकिशुन

शिवपुर में अखिलेश के सामने रामकिशुन ने जताई नाराजगी, दिखाया आक्रोश

चंदौली। चंदौली के समाजवादी पुरौधा व पूर्व सांसद रामकिशुन यादव का आक्रोश गुरुवार को मुगलसराय विधानसभा से टिकट कटने के बाद पहली बार पटल पर दिखा। वाराणसी के शिवपुर में आयोजित चुनावी जनसभा में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के सामने रामकिशुन यादव का गुस्सा फूटा तो उन्होंने पार्टी के प्रति अपने समर्पण भाव को प्रदर्शित करते हुए अपने खिलाफ होने वाली साजिश के जिलए जिम्मेदार गठबंधन के नेताओं पर निशाना साधा। उन्होंने सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव व महासचिव डा.रामगोपाल यादव के समक्ष स्पष्ट कहा कि यदि आप 100 बार भी मेरा टिकट काटेंगे, तभी भी मैं समाजवादी पार्टी का वफादार रहूंगा। सपा को ऐसे लोगों से सतर्क रहने की जरूरत है जो साजिश करके जीत को हार में तब्दील करने का काम करते हैं। इस दौरान बातों ही बातों व इशारों में अखिलेश के समक्ष ही कुछ नेताओं को साजिशकर्ता करार दिया। शिवपुर विधानसभा में आयोजित सभा के बाद अखिलेश यादव से बातचीत के दौरान रामकिशुन यादव की आंखों में पार्टी के लिए वफादारी व उनके खिलाफ हुई गद्दारी का आक्रोश व गुस्सा साफ झलक रहा था। हालांकि इस बीच अखिलेश यादव जहां उनका हाथ थामे हुए थे, वहीं प्रोफेसर रामगोपाल यादव उन्हें समझाने की भूमिका अदा करते नजर आ रहे थे। सपा प्रमुख अखिलेश यादव व पूर्व सांसद रामकिशुन यादव के बीच इस संक्षिप्त बातचीत का वीडियो फेसबुक व अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म खूब वायरल हुआ। विदित हो कि रामकिशुन यादव ने समाजवादी पार्टी की स्थापना के बाद अपने संघर्ष व खून-पसीने से पार्टी को सींचा और पूरा का पूरा संगठनात्मक ढांचा खड़ा किया और वे गांव-गांव पगडंडियों पर सपा का ध्वज लेकर चले और लोगों में सपा के प्रति रुझान व ललकार को जन्म दिया। आज समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ चंदौली में स्थापित हुआ है तो कहीं न कहीं रामकिशुन यादव के व्यक्तित्व व उनके राजनीतिक संघर्ष का बड़ा योगदान है, जिसे कभी भी किसी भी दशा में नकारा नहीं जा सकता। फिलहाल उनकी नाराजगी से जहां पार्टी प्रमुख भी नरम नजर आए, वहीं चंदौली के भी संगठन से जुड़े नेताओं में कोलाहल की स्थिति कायम रही। हालांकि इस घटनाक्रम के बाद कोई कुछ भी कहने की स्थिति में नजर नहीं आया।

धर्म-जाति के नाम पर गुलाम बना रही है भाजपाः प्रियंका गांधी

सकलडीहा में आयोजित जनसभा में स्थानीय नेताओं संग प्रियंका गांधी।

सकलडीहा में कांग्रेस की उपलब्धियों को मंच से गिनाया

Young Writer, सकलडीहा। भाजपा ने देश में धर्म और जाति के नाम पर गरीब और युवाओं को गुलाम बना रही है। इन्हें रोजगार देने के बजाय इन्हें उसका कर सत्ता में बनी रहना चाहती है। गुरूवार को कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी सकलडीहा इंटर कॉलेज में कांग्रेस उम्मीदवार देवेन्द्र प्रताप सिंह मुन्ना के पक्ष में जनसभा को सम्बोधित करते हुए कही। इस दौरान कांग्रेस सरकार बनने पर 20 लाख रोजगार देने का घोषणा सहित अन्य वादा किया। प्रियंका गांधी को देखने व सुनने के लिये काफी संख्या में महिला और ग्रामीण व युवाओं की भीड़ उमड़ पड़ा था।

प्रिंयका गांधी ने कहा कि देश में किसानों का 14 हजार करोड़ रूपया बकाया है। उनको दे नही पा रहे है। लेकिन अपने लिये 16 हजार करोड़ की जहाज खरीद कर पूरे देश में घूम रहे है। देश में गरीब, नौजवानों को विकास और रोजगार देने के बजाय उन्हे जाति और धर्म के नाम पर गुमराह कर रहे है। आज बारह लाख नौकरी पांच साल से खाली पड़ी हुई है। युवाओं को नौकरी देने के बजाय भाजपा सरकार गरीबों पर बुल्डोजर चलवा रहे है। जबकि इनके संरक्षण में माफिया खुलेआम घूम रहे है। जिस मंत्री के बेटे ने किसानों को रौंद दिया है। आज उन्ही को अपने साथ लेकर घूम रहे है। रिहा तक करा दिया है। आज आपके हिम्मत से गरीब को और गरीब बनाने की हिम्मत रख रहे है। अंत में 20 लाख नौकरी, किसान और महिलाओं को विशेष सुविधा दिलाने आदि की बात कही। इस मौके पर वाजी रॉव खाडे़, सरित पटेल, धर्मेन्द्र तिवारी, राहुल राजभर,धंनजय सिंह, अरूण द्विवेदी, कुलदीप वर्मा, प्रदीप मिश्रा, जुनेद खां, बाबा गोड राजकिशोर सिंह, सत्तू सिंह, हलचल सिंह, अखिलानंद सिंह, टिप्पू सिंह, श्रीकांत विश्वकर्मा, राकेश चौहान, विवेक जायसवाल,गंगाराम आदि मौजूद रहे

यूक्रेन में युद्ध की वीभिषिका को वतन वापसी के बाद शाकिफ ने बताया

वतन वापसी के बाद अपने बड़े पिता व भाई के साथ शाकिफ

Young Writer, चंदौली। यूक्रेन में युद्ध जैसे विषम हालात में फंसे शाकिफ कयूम शाह गुरुवार को अपने वतन, अपने घर सकुशल लौट आए। उन्हें अपने बीच पाकर जहां परिवार के लोगों ने राहत की सांस ली, वहीं खुदा का शुक्रिया अदा किया। घर लौटने के बाद शाकिफ कयूम शाह ने यूक्रेन के लविव शहर सहित आसपास के शहरों में चल रहे युद्ध संघर्ष की आंखों देखे दृश्य का वृत्तांत किया।
उन्होंने बताया कि वह पोलैंड से एयरफोर्स के सी-17 विमान से अपने वतन वापस लौटे हैं। तीसरे प्रयास के बाद उसे पोलैंड की सीमा को लांघने का मौका मिला। दो प्रयास में नाकाम रहे तो उन्हें वापस पैदल लौटना पड़ा। इस कड़ी में 30 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ी। कहा कि पोलैंड स्थित भारतीय दूतावास ने अच्छा काम किया, लेकिन थोड़ा विलंब से किया। यदि दूतावास ने पहले ही यह काम कर दिया होता तो यूक्रेन के अलग-अलग हिस्सों में फंसे भारतीय सुरक्षित लौट आते। बताया कि युद्ध की स्थित में यूक्रेन की रातें बेहद खतरनाक हो गयी है। स्थिति यह है कि बम धमाकों से बचने के लिए पूरे शहर की लाइटें बंद कर दी जा रही है, वहीं लोगों की रातें सेफ हाउस में कट रही है। इस दौरान रात में होने वाले बम धमाकों की गूंज से लोग डर जा रहे हैं, सहम जा रहे हैं। बताया कि यूक्रेन पहले ही दो विश्व युद्ध झेल चुका है। लिहाजा वहां का हर हाउस के नीचे एक सेफ हाउस मौजूद है। यही सेफ हाउस आज वहां के लोगों की जान बचाने का सबसे सशक्त माध्यम बना हुआ है। बताया कि युद्ध की स्थिति में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष जारी है, जिसका दृश्य बेहद भयावह व डरावना है।

वीडियो और सेल्फी मेकिंग में स्काउट-गाइड अव्वल

वीडियो और सेल्फी मेकिंग में अव्वल आने के बाद मेडल के साथ स्काउट-गाइड की टीम।

Young Writer, चंदौली। भारत स्काउटस एवं गाइड्स की ओर से नई दिल्ली में चार दिवसीय राष्ट्रीय एकता शिविर में डीडीयू जिला संघ ने लोकनृत्य, पेट्टीयाटिक सांग, फूट प्लाजा वीडियो मेकिंग, सेल्फी मेकिंग में जलवा बिखेरा। वीडियो और सेल्फी मेकिंग में जिला स्काउट एंड गाइड अव्वल रहा।
विदित हो कि राष्ट्रीय युवा परिसर में पलवल नई दिल्ली में 24 से 28 फरवरी तक आयोजित राष्ट्रीय एकता शिविर में ईस्ट सेंट्रल रेलवे भारत स्काउट एंड गाइड राज्य मुख्यालय की ओर से जिला संघ डीडीयू को शामिल होने के लिए नामित किया। इसके बाद पीडीडीयू से 18 सदस्यीय दल ने शिविर में प्रतिभाग किया। प्रतियोगिता में स्काउट गाइड के ग्रुप लीडर कमलेश कुमार यादव के नेतृत्व में टीम ने लोक प्रदर्शनी, कैंप फायर, पारंपरिक खेल प्रतियोगिता में प्रतिभाग किया। जिला संघ के वरिष्ठ रोवर लीडर विंध्याचल भटटाचार्या एवं गाइड सिमरन कौर को राष्ट्रीय मुख्यालय के स्टाफ टीम में कार्य करने का अवसर मिला। टीम ने लोक त्योहार प्रर्दशन एवं फुट प्लाजा प्रतियोगिता में दूसरे और पेट्टीयाटिक सांग में तीसरे स्थान पर रहे। शिविर में संदीप कुमार, सत्यम कुमार, प्रतीक, शिवांगी जैस, आस्था पांडेय शामिल रहे। इसके पूर्व स्थानीय स्तर पर जिला संगठन आयुक्त संयोगिता, स्काउट सेल प्रभारी श्रीकांत, जिला सचिव श्वेता ने प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया।

समिति पर धान बेचकर अंगूठा लगाने को किसान परेशान

Young Writer, क़मालपुर। बिकास खंड धानापुर अंतर्गत स्थापित साधन सहकारी समिति ऐवती, जहां पीसीएफ द्वारा धान क्रय केंद्र खोला गया है। वहां वर्तमान में धान खरीद नहीं हो पा रही है। इससे किसानो के अथक परिश्रम करके उपजाई गई धान की फसल पड़ी हुई है, दूसरी ओर धान की खरीद नहीं होने से परेशान नजर आ रहे हैं।
किसानों का कहना है कि हमने अपने धान का रजिस्ट्रेशन कराकर साहन सहकारी समिति ऐवती पर विक्रय कर दिया है। कुछ बिक्रय धान का अंगूठा लग गया है कुछ अवशेष है जिसका अंगूठा लगना है जो नहीं लग पा रहा है। इस बाबत केंद्र प्रभारी रविंद्र शर्मा कोई संतोष जनक उत्तर नहीं दे पा रहे हैं। उनका कहना है बोरा ही उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है। यह मामला क्या है यह लोगों की समझ के परे है। किसानों में राम आशीष यादव, रामकेश सिंह, दिवाकर राय, राधिका सिंह, संतोष कुमार, सतीश सिंह, राकेश सिंह, राजेंद्र पाण्डेय, जय प्रकाश सिंह, गनेश, ज्ञानेंद्र सिंह, जीवनाथ, लालजी अमित, रामप्रताप सुबह 10 बजे से शाम छह बजे तक इंतजार करके निराश बिना अंगूठा लगाए घर चले गये।

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