Young Writer, चंदौली। नगर के श्रीराम जानकी शिव मठ मंदिर प्रांगण में साईं बाबा का वार्षिक श्रृगांर उत्सव धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान आयोजित भंडारे में सैकड़ों लोगों ने कोविड प्रोटोकाल का पालन करते हुए प्रसाद ग्रहण किया।
विदित हो श्रीराम जानकी शिव मठ मंदिर प्रागंण में प्रत्येक वर्ष साई बाबा के स्थापना दिवस पर श्रृंगार उत्सव व विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है। सोमवार को श्रीराम जानकी शिव मठ मंदिर से साई बाबा की भव्य पालकी शोभायात्रा गाजे बाजे के साथ निकाली गई। उक्त शोभायात्रा नगर के विभिन्न वार्डो का भ्रमण करते हुए पुनः मंदिर प्रागंण मंे पहंुचकर समाप्त हुई। इस दौरान शोभा यात्रा में शामिल लोगों के जयकारे से पूरा नगर भक्तिमय बना रहा। वहीं मंदिर में विधि विधान से हवन पूजन कर भंडारे की शुरूआत की गई। इस दौरान सैकड़ों लोगों ने बाबा का प्रसाद ग्रहण किया। इस मौके पर चेयरमैन रवीन्द्रनाथ, समाजसेवी बृजेश सिंह पप्पू, श्यामजी सिंह, प्रद्युम्न अग्रवाल, राजीव अग्रहरि, पुरोहित दीनानाथ तिवारी, भरत लाल गुप्ता, सुनील अग्रहरि, सिजई, संदीप अग्रहरि उर्फ चिंकू, गणेश प्रसाद गुप्ता, अनिल मौर्या, विकास जायसवाल, आनन्द, प्रशांत चौरसिया, नारायन दास जायसवाल, स्काउट गाइड डीओसी सैयद अली अंसारी, अंजू कुमारी, अचंला, पवन यादव, शिवानाी, गुड़िया, कृष्णा मोदनवाल, विनोद कुमार निगम, संतोष जायसवाल सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
चंदौली में धूमधाम से मना साईं बाबा का श्रृंगार उत्सव
चन्दौली,69 व्यक्तियों की कोविड-19 रिपोर्ट पाजिटिव
चंदौली। कोरोना जांच रिपोर्ट से प्राप्त परिणाम में 69 व्यक्तियों का रिपोर्ट पॉजटीव प्राप्त हुआ है। इनमें से 22 महिला, 40 पुरूष व 3 बालक एवं 4 बालिका है। ये सभी लोकल ट्रैवलिंग या अपने कार्यस्थल से संक्रमित हुए है। जनपद चन्दौली में 2 बरहनी ब्लाक के ग्रामीण क्षेत्र, पांच चहनियां, 4 चकिया ब्लाक के ग्रामीण क्षेत्र व 3 नगरीय क्षेत्र, 11 चन्दौली ब्लाक के ग्रामीण क्षेत्र व 3 नगरीय क्षेत्र के, 2 धानापुऱ के, 5 नियामताबाद, 23 डी0डी0यू0 नगर, 3 सकलडीहा, 3 शहाबगंज के रहने वाले है। इनमें से 1 व्यक्ति लखनऊ, 1 व्यक्ति बिजनौर, 1 व्यक्ति कानपुर, 1 व्यक्ति बलिया व 1 जौनपुर से सम्बंधित है। इनके सम्पर्क में आये अन्य व्यक्तियों की कान्टैक्ट ट्रेसिंग कर अग्रेतर कार्यवाही की जा रहीं है। आज 41 व्यक्तियों के स्वस्थ्य होने की सूचना प्राप्त हुई है। जनपद में कोविड जॉच हेतु आज कुल 2144 नमूने संग्रहित किए गए। इस प्रकार जनपद चन्दौली में कोविड के कुल 16820 केस व इनमें एक्टिव केस की संख्या 527 है। अब तक 15935 स्वस्थ्य हो चुके है।
ठंड से आम-जनजीवन का हाल बेहाल
ठंड से बचाव के लिए चंदौली मुख्यालय पर अलाव तापते लोग।
चंदौली। जनपद में कोरोना के बढ़ते संक्रमण के बीच कड़ाके की ठंड ने जनजीवन बेहाल कर रखा है। मौसम में गलन और शीत लहर चरम पर है। सोमवार को दोपहर बाद धूप निकली, लेकिन लोगो के लिए बेअसर रही। इन दिनों सर्दी का सितम जारी है। हफ्ते भर पहले हुई बारिश के बाद से ही लगातार बादलों ने डेरा जमाया हुआ है। दोपहर बाद धूप निकली, लेकिन लोग बेहाल रहे। ठंड व शीतलहर को देखते हुए लोग घरों के बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।
देवखत मार्ग क्षतिग्रस्त होने आवागमन में हो रही परेशानी
Young Writer, नौगढ़। क्षेत्र के देवखत गांव स्थित पंचदेव मंदिर (देवघाट) मार्ग व पुलिया एक वर्ष से भी अधिक समय से क्षतिग्रस्त है‚ जिससे उक्त मार्ग से आवागमन करने वाले देवखत गांव सहित आसपास के इलाके के लोगों को तमाम तरह की कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि मार्ग क्षतिग्रस्त होने से देवखत मार्ग पर आए दिन वहां छोटी बड़ी दुर्घटना होती रहती है। बावजूद इसके शासन-प्रशासन की ओर से सड़क के मरम्मत व निर्माण के प्रति शिथिलता बरती जा रही है। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर आदर्श आचार संहित लागू होने के कारण अब आगामी दो माह तक मार्ग मरम्मत की कोई उम्मीद नहीं है। इसको लेकर स्थानीय लोगो में रोष व्याप्त है।
विदित हो कि पंचदेव मंदिर परिसर मे महर्षि वाल्मीकि की प्रतिमा अनावरण करने के लिए विगत वर्ष प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आगमन के दौरान आनन फानन में सड़क का सुंदरीकरण कराया गया था। इसके एक वर्ष पूर्व ही सांसद निधि का धन ब्यय करके देवखत गांव से महर्षि वाल्मीकि सेवा संस्थान मार्ग व पुलिया का जीर्णाेद्धार तथा इण्टरलांकिग इत्यादि कार्य हुआ था।जो कि एक वर्ष तक भी सुचारू रूप से नहीं चल पाया। उक्त मार्ग पर लोगो का आवागमन प्रतिदिन रहता है। पैदल आवागमन करने वाले तो किसी तरह से आते जाते हैं। लेकिन वाहनों का आवागमन बाधित हो गया है। सड़क व पुलिया मरम्मत कराए जाने के लिए कई बार जनप्रतिनिधियों व विभाग से लोगो ने मांग की‚ लेकिन दो टूक जवाब मिल रहा है। किसी भी योजना से सड़क पुलिया इत्यादि पर सरकारी धन व्यय होने के 3 वर्ष बाद ही दोबारा कार्य हो सकता है।
सपा की जीत को सभी मिलकर बनाएं ऐतिहासिकः जितेंद्र कुमार
Young Writer, चकिया। नगर के समाजवादी पार्टी केंद्रीय कार्यालय पर रविवार को समाजवादी बाबा साहब वाहिनी के प्रदेश कमेटी के लिए बार एसोसिएशन चकिया के पूर्व अध्यक्ष रामकृत व संगीतकार नीलम बियार को प्रदेश सचिव नामित किये जाने पर l सपा नेताओं व कार्यकर्ताओं ने स्वागत एवं सम्मान किया। साथ ही सभी ने मिलकर सपा को विधानसभा चुनाव–2022 में पार्टी को जीत दिलाने का संकल्प लिया और उसे पूरा करने के लिए उन्होंने सपा कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों को एकजुट होने का आह्वान किया।
इस दौरान चकिया के पूर्व विधायक जितेंद्र कुमार ने कहा कि विधानसभा चुनाव–2022 के आगाज के साथ ही समाजवादी कुनबा तेजी से बढ़ा है। हम सभी को संख्याबल से समृद्ध हो चुके समाजवादी परिवार को मिलकर आपसी समन्वय से सशक्त बनाने की दिखा में पूरी शिद्दत के साथ काम करना होगा‚ तभी 10 मार्च में सूबे के सभी समाजवादियों के लिए उत्सव मनाने का अवसर मिलेगा। चुनाव के नतीजे केवल जीत तक सीमित नहीं होने चाहिए‚ जिसे ऐतिहासिक बनाना है। कहा कि जिन लोगों ने पिछले पांच सालों तक सूबे में अराजकता‚ अपराध को बढ़ावा देने का काम किया। बहन–बेटियों की इज्जत आबरू से खिलवाड़ करने वालों का संरक्षण किया‚ उन्हें सत्ता से हटाने का काम हम सभी को मिलकर करना है। कहा कि दोनों नेताओं के प्रदेश कमेटी में सम्मिलित होने से विधानसभा में समाज के लोगों को बल मिलेगा। स्वागत करने वालों के लोहिया वाहिनी के प्रदेश सचिव मुश्ताक अहमद खान, अल्पसंख्यक सभा के जिलाध्यक्ष जमील अहमद, प्रदीप बनवासी, विधानसभा अध्यक्ष प्रभु नारायण यादव, समसेर यादव, सुनील वियार, इलियास हवारी, विकास चौहान, नौसाद मंसुरी सहित तमाम कार्यकर्ता उपस्थित रहे। सपा नेता व विधायक अब्दुल्लाह आजम खान की रिहाई पर रविवार को चकिया स्थित कैम्प कार्यालय में सपाईयों ने एक-दूसरे का मुंह मीठा कराकर खुशी का इजहार किया इस दौरान समाजवादी अल्पसंख्यक सभा के जिला अध्यक्ष जमील अहमद ने कहा अब्दुल्लाह आजम कि रिहाई से समाजवादीयों में हर्ष है। न्यायालय ने उनको रिहा कर दिया है। हमे न्यायलय पर पुरा भरोसा है। जल्द ही आजम खान भी रिहा होगें। इस अवसर पर प्रभु नारायण यादव, शमशेर अली, राजू हाजी नियाज अली, इलियास हवारी आदि मौजूद रहे।
सहकारी समितियों से यूरिया नदारद‚ किसान परेशान
Young Writer, सकलडीहा। क्षेत्र में बीते दिनों हुई बरसात ने गेंहू की फसल को संजीवनी प्रदान किया है। यही कारण रहा कि गुरुवार व शुक्रवार को प्राइवेट दुकानों सहित साधन सहकारी समितियों पर किसानों का जमावड़ा लग रहा। देखते ही देखते इन जगहों से उर्वरक खत्म हो गया। बहुत किसानों को तो बगैर यूरिया खाद के ही वापस जाना पड़ा। स्थिति यह है कि किसान उर्वरक के लिए पूरे दिन सहकारी समितियों पर कतारबद्ध नजर आ रहे हैं। बावजूद इसके उन्हें मांग के अनुरूप खाद की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं हो पा रही है। कुछ किसान ने खाद के लिए कई दिनों से सहकारी समितियों के चक्कर लगा रहे हैं‚ लेकिन अभी तक उन्हें उर्वरक नहीं मिल पाया है। रविवार को भी सकलडीहा क्षेत्र के आधार दर्जन से अधिक सहकारी समितियों परकुछ ऐसा ही नजारा दिखा‚ जहां यूरिया के लिए किसान जद्दोजहद करते नजर आए।
सकलडीहा कस्बा, चुतुर्भुजपुर, नईबाजार, डेढ़ावल सहित भोजापुर साधन सहकारी समिति व दुकानों पर अचानक हुई बरसात से ग्राहकों का हुजूम उमड़ पड़ा,लोग किसी तरह यूरिया खरीदना चाहते थे। भोजापुर साधन सहकारी सीमित पर तो आसपास के गाँवो के सैकड़ो किसान पहुँचे, जिससे सीमित पर अफरातफरी का माहौल हो गया। महज दो घण्टे में पूरी यूरिया समाप्त हो गयी। जिससे काफी किसानों को खाली हाथ ही वापस होना पड़ा।वही कुछ किसानों ने प्राइवेट दुकानदारो पर निर्धारित मूल्य से अधिक पैसा लेने का आरोप लगाया है। कहा कि अचानक हुई बरसात से सभी किसानों को एक साथ ही खाद की आवश्यकता पड़ी। जिसका फायदा उठाकर प्राइवेट दुकानदारो ने निर्धारित मूल्य से अधिक पैसे वसूल किये है। इसके बाद भी खाद की बिक्र व उपलब्धता सुनिश्चित कराने के वाले कृषि विभाग के जिम्मेदार अफसर मौन साधे हुए हैं‚ जिससे खुले बाजार में खाद को अधिक रेट पर बेचा जा रहा है‚ जिससे किसानों की जेब पर बोझ बढ़ रहा है। किसानों का कहना है कि समितियों पर खाद की उपलब्धता सुनिश्चित हो जाय ताकि किसानों को बाजार से उर्वरक खरीदने के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा।
चुनाव में खलल डाला तो लगेगा गुण्डा एक्टः अनिरूद्ध सिंह
Young Writer, सकलडीहा। विधानसभा चुनाव-2022 के मद्देनजर आदर्श आचार संहिता का कड़ाई से पालन कराने को लेकर क्षेत्राधिकारी सकलडीहा अनिरुद्ध सिंह ने सर्किल क्षेत्र के पुलिस अफसरों व थाना प्रभारियों संग बैठक की। इस दौरान उन्होंने थाना व पुलिस चौकी प्रभारियों द्वारा चुनाव के मद्देनजर अब तक की गयी तैयारियों का जायजा लिया। कहा कि आदर्श आचार संहिता का अनुपालन सुनिश्चित करते हुए क्षेत्र में कानून एवं शांति व्यवस्था बनाए रखें। इस कार्य में स्थानीय प्रबुद्धजनों व आमजनों से सहयोग लें। पुलिस की उम्दा छवि को जनता के बीच प्रस्तुत करें‚ ताकि लोगों का भरोसा पुलिस व पुलिसिंग को लेकर बढ़े। साथ ही अपराधियों व अराजक तत्वों के खिलाफ सख्ती के साथ पेश आने के निर्देश दिए।
इस दौरान सीओ अनिरुद्ध सिंह ने पुलिस अफसरों को हिस्ट्रीशीटर और आवंछनीय तत्वों को चिन्हित कर कार्रवाई का निर्देश दिया। शांतिपूर्ण और पारदर्शी ढ़ग से चुनाव कराने को लेकर आयोग सख्त है। इसको लेकर अर्ध्य सैनिक बल की पर्याप्त सुरक्षा बल दो माह पूर्व डेरा जमा लिया है। सकलडीहा विधानसभा क्षेत्र के दर्जनों बर्नेवल बूथ चिहिन्त किया गया है। जहां शांति पूर्ण मतदान कराना पुलिस के लिये चुनौती है। इसे लेकर सीओ अनिरूद्ध सिंह ने सकलडीहा सर्किल के धानापुर, चहनियां, कंदवा, धीना, बलुआ और सकलडीहा थाना प्रभारी और चौकी प्रभारियेां के साथ संयुक्त बैठक किया। इस दौरान चुनाव में खलल डालने वाले को चिन्हित कर गुंडा एक्ट में पाबंद करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही गांवों छोटी छोटी बातों को लेकर हो रहे विवाद को गंभीरता से लेने का निर्देश दिया। हर हाल में क्राइम कंट्रोल बनाये रखने का निर्देश दिया। थाना प्रभारियों को चेताया कि क्षेत्र में भ्रमण कर रूट मार्च तैयार कर ले। थाने में बैठकर खानापूर्ति करने पर सख्त कार्रवाई की जायेगी। अंत में अपराध और अपराधियों और वारंटियों की गिरफ्तारी के बारे में समीक्षा किया। इस मौके पर कोतवाल विनोद मिश्रा, बलुआ एसओ मिथिलेश तिवारी,धानापुर सतेन्द्र विक्रम सिंह, धीना एसओ अजीत सिंह, कंदवा हरिश्चन्द्र चौकी प्रभारी भूपेश चन्द्र कुशवाहा, भैरोनाथ यादव, शिवमणि त्रिपाठी, जयप्रकाश यादव, अवध बिहारी, राजेश, मनोज पांडेय आदि मौजूद रहे।
आमजन को महंगाई से निजात दिलाएगी सपा सरकारः मनोज सिंह डब्लू
Young Writer, सैयदराजा। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव मनोज कुमार सिंह डब्लू रविवार को लगातार दूसरे दिन क्षेत्र भ्रमण पर रहे। इस दौरान उन्होंने सैयदराजा नगर से सटे छत्रपुरा में डोर-टू-डोर कैम्पेनिंग की। इस दौरान ग्रामीणों से संवाद स्थापित कर समाजवादी पार्टी की नीतियों को पटल पर रखा। साथ ही समाजवादी पार्टी के घोषणा पत्र में उल्लिखित एक-एक घोषणाओं के बारे में ग्रामीणों को बताया। कहा कि सपा की सरकार बनी तो हर परिवार को 300 यूनिट बिजली सरकार मुफ्त देगी। साथ ही किसानों को सिंचाई के लिए मुफ्त पानी का बंदोबस्त सरकार की ओर से किया जाएगा। इस वादों व इरादों से आमजन को प्रभावित करते हुए उन्होंने जगह-जगह समाजवादी पार्टी का ध्वज फहराया और झंडे को ऐसे ही बुलंदी पर लहराने की जिम्मेदारी आमजन के साथ साझा।

उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी से आमजन को महंगाई से निजात दिलाने का प्लान आफ एक्शन पहले ही बना रहा है। सपा का घोषणा-पत्र यूपी की जनता को राहत देने वाला है। जिसमें आम आदमी से लगायत किसान, नौजवान निराश्रित महिलाओं का जिक्र और उनका फिक्र है। कहा कि समाजवादी पेंशन से असहाय व निराश्रितों को बड़ा आर्थिक संबल प्रदान होगा। साथ ही विद्यार्थियों के लिए लैटपाल सहित कई महत्वपूर्ण योजनाएं होगी। सपा सरकार आते ही छात्रवृत्ति की गारंटी सरकार लेगी। इसके साथ ही गरीबों को पक्की घर मुहैया कराने के लिए लोहिया आवास योजना का संचालन किया जाएगा। वहीं गांव की गलियां व बस्तियों की नालियां दुरूस्त होंगी। छोटे विकास कार्यों के साथ ही बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को समाजवादी पार्टी की सरकार मुकम्मल करेगी। कहा कि जिस तरह सपा के पिछले पांच साल बेमिसाल थे। अब आगामी पांच साल भी बेमिसाल हो, इसके लिए हम सभी को मिलकर प्रयास करना होगा। समाजवादी पार्टी के साथ जुड़कर पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलानी में सहभागी की भूमिका अदा करनी होगी, तभी यूपी से अपराध, अराजकता, अत्याचार को खत्म किया जा सकेगा। दावा किया कि सरकार बनते ही सर्वप्रथम 108 व 102 एंबुलेंस सेवाओं को दुरूस्त किया जाएगा। इसके साथ ही यूपी-100 डायल की व्यवस्था को भी पटरी पर लाने का काम सपा सरकार करेगी। इस अवसर पर उन्होंने पूर्व प्रधान मनोज तिवारी व मनोज पांडेय के आवास पर उनकी सहमती व पार्टी में सहभागिता के भरोसे पर सपा का ध्वज लगाया और उसे बुलंद रखने का भरोसा भी लिया।

इस अभियान को आगे बढ़ाते हुए सपा नेता मनोज सिंह डब्लू ने कुसुमही और धानापुर कस्बे के भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने सपा की नीतियों को लोगों के बीच रखा और पार्टी से जुड़ने का आह्वान किया। साथ ही जगह-जगह पार्टी का ध्वज फहराया और लोगों को सपा का झंडा भेंट किया। इस दौरान बृजेश गोड़, प्यारे लाल गोड़, पूर्व प्रधान सब्बन पासवान, राम तपेस उपस्थित रहे।

जीवत में कर आसा
Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से
मनुष्य जीवन की गरिमा का जो श्रृंगार कबीर की कविता में दिखाई पड़ता है, बड़ा आकर्षक है। बड़ा आह्लादक है। बड़ा प्रिय है। मनुष्य के जीवन की महत्ता को और मनुष्य के महत्व को कबीर की कविता बड़ी ही विदग्ध रीति से गौरव प्रदान करती है। कविता के केन्द्र में मनुष्य की मूल्यवत्ता को स्थापित करने के लिये कबीर का उपक्रम हमेशा अविस्मीरणीय बना रहेगा।
कबीर जीवन-प्रवाह की सनातनता के सर्जक कवि हैं। वे परंपरा के मर्म के उद्गाता है। कबीर किसी कालखण्ड के खण्ड-खण्ड रूप के आराधक नहीं है। उनकी आराधना अखण्डकाल के प्रवाह के प्रति है। हमारे जीवन की परम्परा है। प्रवाह है। हमारा जीवन एक अविच्छिन्न परंपरा की अभिव्यक्ति है। एक अजस्र प्रवाह का घटक है।
परंपरा वह नहीं, जो कल थी। आज नहीं है। परंपरा अतीत नहीं है। अतीत में नहीं है। परंपरा हमेशा वर्तमान होती है। वह वर्तमान में होती है। परंपरा में, अतीत वर्तमान में समाहित है और भविष्य वर्तमान में बदल जाने को उत्सुक। हर वर्तमान अनिवार्य रूप से अतीत हो जाने वाला है। हर भविष्य एक दिन वर्तमान होने की तरफ निरंतर खिसकता आ रहा है। हमारे वर्तमान में हमारा अतीत भी मौजूद है और हमारा भविष्य भी सम्मिलित है। इसीलिये कबीर की कविता में वर्तमान, काल की अखण्ड सत्ता के समग्र अस्तित्व का वाचक है। बोधक है। तभी तो कबीर कहते हैं कि अवधू, जो कुछ भी होना है, उसके जीवन में,- जीवन के वर्तमान में ही घटित होने की आशा रखो। उम्मीद रखो। जो अभी है, वही है। जो अभी है, वही आगे भी है। जो अभी है, वही ‘अस्ति’ है। जो है, उसकी आराधना, उसमें आस्था, उसके प्रति अटूट विश्वास ही अस्तिकता है। जो नहीं है, उसमें अनुरक्ति नास्तिकता है। अस्तिकता स्वीकार है। नास्तिकता नकार है।
आस्तिकता अस्तित्व का सम्मान है। नास्तिकता अस्तित्व का तिरस्कार है। अस्तिकता प्रेम है। पूजा है। प्रमोद है। नास्तिकता सन्देह है। प्यास है। धन्धा है। जो कुछ है, उससे भर जाने का भाव धर्म है। जो कुछ नहीं है, उसके अभाव की विकलता अधर्म है। अवधू, ध्यान रखना गौर से देखना जरा, हमारे धर्म में अधर्म कैसे चतुराई से घुस आया है। घुसा पड़ा है। घुसकर धर्म को, सत्य को, आनन्द को, दबोच रखा है।
कितनी निसंगता है कबीर की कविता में। कितना विश्वास है। कितना प्रेम है। कितना प्रमोद है। मन उमग आता है। बार-बार पूछने की उत्कण्ठा होती है- कहाँ पाया आपने? कैसे पाया?
मगर मैं हजार-हजार बार चाहकर भी नहीं पूछ पाता। पूछने का कोई प्रयोजन भी नहीं है। कबीर का प्रश्नों के उत्तर देने में विश्वास नहीं है। कबीर की कविता तो उत्तरों के उत्स तक पहुँचाने की पक्षधर है। कबीर की कविता अस्तित्व के उत्स की ओर उन्मुख कविता है।
कबीर की कविता में अवधू, साधो, सन्तों ये सब सहानुभूति के सम्बोधन हैं। सम्मान के सम्बोधन हैं। आत्मीयता के-, आत्मीय लगाव के सम्बोधन हैं। जीवन को जान लेने की जिसमें थोड़ी भी ललक है, उन सबके प्रति कबीर को अपार प्यार है। उससे कबीर अपने मन की, अपने अनुभव की, अपनी उपलब्धि की बात सहज भाव से कहते हैं। कहते हैं कि वह भी उनकी संवेदना का साझीदार बन सके। संवेदना का सझीदार होना ही साथी होना होता है। कबीर की कविता साथी होने की कविता है।
कबीर जीवन के कवि हैं। वे मृत्यु के कवि नहीं हैं। जो मृत्यु के बाद की बात करता है, वह धन्धा करता है। धोखा करता है। वह अपना स्वार्थ साधता है। लाभ कमाता है। चाहे वह गुरु ही क्यों न हो। धन्धा तो धन्धा है। धोखा तो धोखा है। क्या फर्क पड़ता है, चाहे वह गुरु का हो, चाहे वेश्या का। देने का अभिनय और लेने की मंशा। देना कुछ नहीं और लेना सब कुछ। सब कुछ देने का दिखावा और कुछ भी न देने की असलियत। कुछ भी न लेने का नाटक और सब कुछ ले लेने की लिप्सा। धन्धा यही है। व्यापार यही है। चाहे व्यापार देह का हो, चाहे धर्म का, चाहे ज्ञान का। धोखा है। झूठ है। पाखण्ड है। ठगी है।
ठगी तो ठगी है। चाहे राम का नाम लेकर ठगी हो चाहे काम का। चाहे लाभ का, चाहे लोभ का। चाहे विकास का नाम लेकर हो, चाहे सुख का, चाहे स्वर्ग का। कबीर कहते हैं, अवधू, सावधान रहना। जो गुरु कहता है कि मरने के बाद स्वर्ग मिलेगा, मेरी सेवा करो। वह झूठ बोलता है। वह स्वार्थी है। वह साधना की आड़ में स्वार्थ-साधना का धन्धा करता है। लोभ जगाकर, अन्धा बनाकर अपना उल्लू सीधा करता है। आदमी को अन्धा बनाने का, उल्लू बनाने का उद्योग धर्म नहीं, धर्म का व्यापार नहीं, अपराध है। पूरा-पूरा अपराध। यह कैसी व्यवस्था है? कैसा विधान है? कैसा संविधान है? जिसमें अपराध के लिये सम्मान की व्यवस्था है। कितना विस्मय जनक है।
कबीर अपनी कविता में कहते हैं कि मृत्यु और कुछ भी नहीं है केवल जीवन का निषेध है। जीवन का निषेध,-जीवन का नकार ही बस मृत्यु है। जहाँ जीवन नहीं है, मृत्यु है। जब भी, जिस भी अवस्था में जीवन नहीं है, मृत्यु है। जीवन से अपरिचय, जीवन की विस्मृति, जीवन के बोध का अभाव ही मृत्यु है।
जहाँ जीवन है, जीवन से परिचय है, जीवन का बोध है, मृत्यु नहीं है। मृत्यु बोध नहीं है, वह अवधारणा है। झूठ है। मृत्यु के उपरान्त का स्वर्ग अवधारणा की अवधारणा है। झूठ का झूठ है।
जीते जी का स्वर्ग सच है। जीवन का स्वर्ग सच है। जीवन में, जीवन का अनुभव स्वर्ग हैं, आनन्द, बोध है। जीवन असीम है। अजस्र है। अमर है। अविनाशी है। लघुता के बोध का मिट जाना और विराटता के बोध का भर आना ही अमरता है। सीमाओं का असीम में विलीन हो जाना ही, अविनाशी हो जाना है। जीवन अविनाशी है, अमर है। जीवन को जान लेना, पा लेना ही मनुष्य जीवन की महत्तम उपलब्धि है। कबीर की कविता मनुष्य जीवन की महत्तम उपलब्धि का यशगान करने वाली कविता है।
कबीर की कविता अवास्तविक के भ्रम को और भय को निरस्त करने वाली कविता है। मृत्य अवास्तविक है। मृत्यु मात्र भय है। मृत्यु के बाद मिलने वाला स्वर्ग भ्रम है। जो गुरु मृत्यु की बात करता है। मृत्यु के बाद स्वर्ग मिलने की दिलासा देता है, वह झूठ का व्यापार करता है। वह गुरु, गुरु नहीं झूठ्ठा हैै। वह दलाल है। स्वर्ग के लोभ से ऊँची कीमत वसूलने की जुगत में लगा हुआ, दलाल। वास्तव में जीवन को जानने की प्रक्रिया में दलाल की, बिचौलिये की कोई भूमिका ही नहीं है।
कबीर का जीवन से परिचय है। वे जीवन को जानते हैं। पहचानते हैं। जीवन उनका बोध है। जीवन को जान लेना ही मृत्य का अतिक्रमण है। मृत्यु के पार होना हैं। जो जीवन में स्थित होता है वह मरता नहीं है। जो जीवन को, बगैर जाने जीता है, वह मर जाता है। जहाँ जीवन है, वहाँ मृत्यु नहीं है। जहाँ मृत्यु है वहाँ जीवन नहीं है। दोनों का साथ-साथ होना संभव नहीं है। बिल्कुल प्रकाश और अन्धकार की तरह। जहाँ प्रकाश है, अँधकार हो ही नहीं सकता। अन्धकार है। अन्धकार होगा, मगर वहाँ होगा जहाँ प्रकाश नहीं है। जीवन प्रकाश है। मृत्यु अन्धकार है। जिसके जीवन में प्रकाश है, जिसने जीवन में प्रकाश पा लिया है, वह नहीं मरेगा। उसे मरना नहीं है। मृत्यु उसके लिये नहीं है। कबीर ने जीवन को पा लिया था। प्रकाश को पा लिया था।
जब तक कबीर पीछे-पीछे चल रहे थे, प्रकाश नहीं था। लोक और वेद के पीछे चलना प्रकाश रहित रास्ते पर चलना है। अँधेरे में चलना है। कबीर भी अँधेरे में चल रहे थे। चल रहे थे दुनियाँ के साथ-साथ। इसीलिये वे दुनियाँ को भी जानते हैं, अँधेरे को भी जानते हैं और मृत्यु को भी जानते हैं। मगर कबीर को आगे से आता हुआ सद्गुरु मिल गया। सद्गुर का रास्ता दुनियां का रास्ता नहीं है। जिस रास्ते दुनियां चलती है, उस रास्ते सद्गुरु कभी नहीं मिलता। सद्गुरु का मार्ग विपरीत दिशा का मार्ग है। दुनियां मृत्यु की तरफ जा रही होती है। सद्गुरु जीवन की तरफ आ रहा होता है। इसीलिये कबीर कहते हैं कि सद्गुरु उन्हें सामने से आता हुआ मिला। एक ही दिशा में चलने वाले यात्री तो आगे-पीछे हो सकते हैं। आमने-सामने नहीं हो सकते। आमने-सामने विपरीत दिशा में जाने वाले पथिक ही हो सकते हैं। कबीर कहते हैं ‘‘आगे तें सतगुरु मिला दीपक दी हाथ।’’ जब कबीर के हाथ में दीपक मिल गया तो उस दीपक के प्रकाश में उन्होंने राह देख ली। राह पहचान ली। उन्होंने जान लिया संसार मृत्यु की तरफ जा रहा है। अंधकार की तरफ जा रहा है। झूठ की तरफ जा रहा है। उन्होंने जीवन को देख लिया प्रकाश में। जान लिया। पहचान लिया। पा लिया। उन्होंने जीवन का अर्थ पा लिया। उन्होंने अस्तित्व का मर्म जान लिया। उन्होंने अमरता का रस पा लिया। रस पी लिया। कबीर की वाणी अमिय रस से सराबोर हो गई। उनके हृइय की गगन गुफा में अजर यानी कि कभी जीर्ण न होने वाला रस झरने लगा। झरकर हमेशा ताजा रहने वाला, कभी बासी न पड़ने वाला रस भरने लगा। उनकी वाणी उसी रस में नहाकर, निखरकर निकलने वाली वाणी है। अमृत वाणी। अमृत पुरूष की अमृत वाणी।
अमृतत्व को उपलब्ध कर लेने वाला प्राण ही मृत्यु का मखौल उड़ा सकता है। बड़े साहस का काम है। कितना विचित्र है कि बड़े साहस का काम भी कबीर के लिये सहज है। हमारी परंपरा में जीवन को जानने वाले न जाने कितने लोग हैं। अमृतत्व को उपलब्ध भी अगणित महाप्राण न जाने कितने हैं। मगर कबीर अकेले हैं, जो कहते हैं – ‘‘हम न मरौं, मरिहैं संसारा।’’
कबीर कहते हैं कि हम नहीं मरेंगे। हम नहीं मरेंगे। हमें मरना नहीं है। इसलिये कि हमको हमेशा जीवित रहने वाला मिल गया है। हम हमेशा जीवित रहने वाले में मिल गये हैं। जीवन हमेशा जीवित रहने वाला है। जीवन में समाहित हो जाना ही न मरना है। व्यक्ति सत्ता का सार्वभौम सत्ता में विलीन हो जाना ही न मरना है। चेतना सार्वभौम है। सबमें है। सब कुछ में है। सर्वकाल में है। जो सबमें था, सबमें है, सबमें होगा, वही जीवन है। जीवन हमश्ेाा से है। हमेशा रहेगा। जीवन में होना हमेशा होना है। जीवन अमृत है। जीवन कभी नहीं मरता।
संसार मर जाता है। कबीर कहते हैं हम नहीं मरेंगे। संसार मर जायेगा। बड़ी अद्भुत बात है। आदमी मर जायेगा तो संसार नहीं मरेगा। संसार जिन्दा रहेगा, जीवित रहेगा। जागृत रहेगा। आदमी नहीं मरेगा तो संसार मर जायेगा। आदमी का न मरना संसार का मर जाना है, क्या?
हाँ, ऐसा ही है। संसार मनुष्यों के, प्राणियों के समुच्चय का नाम नहीं है। संसार प्राणियों के पारस्परिक सम्बन्ध का, पारस्परिक व्यवहार का वाचक है। संसार एक अवधारणा है। उधार की आँख है। वह भी अन्धी। बिना कोई मूल्य चुकाये मुफ्त में मिल गया प्रत्यय है। दूसरे के मूँड़ की उतारी गई गठरी है, जिसे दूसरे को ढोना है। भेद का बर्ताव है। अपने-पराये के भेद का, शत्रु-मित्र के भेद का, अच्छे-बुरे के भेद का, ऊँच-नीच के भेद का, स्त्री-पुरूष के भेद का, लाभ-हानि के भेद का, जय-पराजय के भेद का, कुलीन-अकुलीन के भेद का, ज्ञानी-अज्ञानी के भेद का बर्ताव संसार है। द्वैत का दृष्टिकोण ही संसार है। संसार सिर्फ एक दृष्टिकोण है।
अस्तित्व अभेद है। चेतना अभेद है। जीवन अभेद है। अस्तित्व की, चेतना की, जीवन की उपलब्धि होते ही भेद मिट जाता है। संसार मर जाता है। अभेद में स्थित होते ही भेद मर जाता है। भेद का मर जाना ही संसार का मर जाना है। संसार मर जाता है। जीवन रह जाता है। जीवन में स्थिति रह जाती है।
कबीर जीवन की बात करते हैं। जीवन-स्थिति की बात करते हैं, जो जीवन को जानने की अभीप्सा रखता है उस अवधू से बात करते हैं। वह अवधू से अपने अवबोध की बात करते हैं।
कबीर कहते हैं कि जैसे ही दीपक जल उठा, दीपक के प्रकाश में मैंने प्रेम को पा लिया। जीवन में ही जीवन धन बैठा हुआ था। जीवनधन को पाते हीे सौभाग्य जाग उठा। सुहाग जाग उठा। सुहाग की सिन्दूरी रेखा का अरुणिम आलोक जगमगा उठा। जगममा उठा तो सारा का सारा अँधेरा मिट गया। संसार मिट गया। संसार खो गया। संसार हेरा गया। संसार कुछ नहीं था, सिर्फ अँधेरा था। अँधेरे का प्रतिभास था।
मैं प्रेमी था। प्रिय को ढूँढ रहा था। बेचैन था। अपार विरह था। अथाह पीड़ा थी। दारूण दाह था। आठों पहर का दाझणा सहा नहीं जाता था। अपना होना असहनीय हो उठा। प्रिय के बिना प्रेमी का होना, होना नहीं होता। मैं मृत्यु मांगने लगा।
मैं मृत्यु मांगने लगा, मुझे जीवन मिल गया। प्रिय मिल गया। प्रिय मिल गया तो प्रेमी गायब हो गया, प्रेमी विलीन हो गया प्रिय में। बिना प्रेमी के प्रिय कैसे होगा। प्रेमी नहीं रहा तो प्रिय भी नहीं रहा। प्रेमी और प्रिय दोनों चले गये जाने कहाँ, बस प्रेम रह गया। द्वैत समाहित हो गया अद्वैत में। द्रष्टा समाहित हो गया। देखने वाला दिखने वाले में समाहित हो गया। अब बस दृश्य है।
अब कुछ नहीं है। बस जो कुछ भी है मेरे लाल की लाली हैं। उसी की आभा है। उसी का प्रकाश है। उसी की ध्वनि है। उसी का अर्थ है। सब कुछ में वही है। सबमें वही है।
मैं अपने लाल की, अपने महत्तम की लाली देखने को, महत्ता देखने को उत्सुक था। आकुल था। मैं लाली में समाहित होकर लाल हो गया। महत्तम की महत्ता में समाहित होकर महत्ता बन गया। महत्ता में मृत्यु नहीं है, केवल जीवन है। जीवन में मृत्यु नहीं है, महत्ता है।
लघुता में मृत्यु है। संसार लघुता में है। संसार और कुछ नहीं, सिर्फ लघुता है। लघुता का अर्थ है। लघुता मिट जाने के लिये ही है। संसार मर जाने के लिये ही है। मुमुर्षु की उपासना व्यर्थ है। मुमुर्षु की आराधना अकारथ है।
हमारी आशा का केन्द्र जीवन है। हमारी अभ्यर्थना का आश्रय जीवन है। हमारे प्रकाश का श्रोत जीवन है। हमारे सुहाग की लाली जीवन है। जीवन ही सबकुछ है। अमृत है। पूर्ण है। जीवन में जीवन की आराधना के लिये कबीर जीवन में अभीप्सा रखने वाले अवधू से कहते हैं- अवधू, जीवत में कर आसा।
गड़बड़ रामायण
Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से
प्रसिद्धि भी गजब की चीज है। बड़ा अनूठा आकर्षण है। यह आकर्षण प्राणियों के मन-प्राण को बरबस खींच लेता है। शायद ही ऐसा कोई आदमी हो जिसे प्रसिद्धि की चाह न हो। पूरा संसार ही इस चाह के पीछे पागल है। दुनियाँ का चाहे जितना भी दुर्बल आदमी हो, जितना भी नासमझ आदमी हो, जितना भी अकर्मण्य आदमी हो, फिर भी वह चाहता है कि लोग उसे जानें। लोग जानें और लोग उसका सम्मान करें। बड़ा स्वाभाविक है। मानवीय दुर्बलतायें कितनी स्वाभाविक हैं। सबमें हैं।
तुलसीदास जी कहते हैं कि- सुत बित लोक एसना तीनी- हर प्राणी में पुत्र प्राप्त करने की, धन प्राप्त करने की और लोक यानी समाज में सम्मान प्राप्त करने की इच्छा, उसके स्वभाव में शामिल है। मनुष्य-जीवन में इच्छाओं की धकमपेल भीड़ में तीन इच्छायें सबसे प्रमुख और सबसे प्रबल है।
पुत्र और धन की कामना तो मनुष्य की अस्मिता से ऐसे सम्पृक्त है कि ये इच्छा न होकर स्वभाव की ही वाचक बन गई है। रह गई तीसरी लोक में प्रतिष्ठा की एषणा। यह मनुष्य जीवन की सबसे प्रमुख और प्रबलतम इच्छा है। इच्छा पूरी हो, न हो, यह दीगर बात है। मगर सारी मनुष्य जाति इच्छा के पीछे अंधी होकर दौड़ रही है। सत्ता के संघर्ष से लेकर सामान्य जन-जीवन के संघर्षों के केन्द्र में यही प्रभुत्व और प्रतिष्ठा प्राप्त करने की दुर्ललित लालसा है। देखिये न जरा, अपनी श्रेष्ठता कायम करने के लिए आदमी की जाति कितनी लालायित है।
प्रसिद्धि की प्यास जिसके गले में पैठ जाती है, उसकी प्यास कुँए के जल से नहीं बुझती। उसके जी की जलन सरोवरों और नदियों के पानी से भी शान्त नहीं होती। वह मीठे जल के सागर का अन्वेषी और आकांक्षी हो जाता है। चूंकि मीठे जल के सागरों का अस्तित्व है ही नहीं, इसलिए ऐसे लोगों को प्यासे-प्यासे और जलते-जलते ही जीना पड़ता है।
जो लोग प्रसिद्धि के पीछे अन्धे होकर दौड़ पड़ते हैं उन्हें वह कभी नहीं मिलती। इसलिए कि प्रसिद्धि कोई कर्म नहीं, कर्मफल है। अपने को अधिक समझदार समझने वाले नासमझ लोग प्रसिद्धि को ही कर्म मान बैठते हैं और अपने कर्म से विरत होकर नाना तरह की तिकड़में भिड़ाने में व्यस्त हो जाते हैं। कर्म से वंचित होकर कर्मफल को पा लेने की लालसा हमेशा ही निष्फल होती है। वैसे कभी-कभी तिकड़मो ंसे भी किसी-किसी को प्रसिद्धि कुछ समय के लिए हासिल हो जाती है। मगर कभी कदाचित ही- अंधे के हाथ बटेर लग जाने की तरह। अक्सर तो प्रसिद्धी के पीछे दौड़ने वाले सदा ही हास और उपहास के आधार बनते हैं, जैसे बटेर हाथ लग जाने की लालसा लिये हाथ मारते अंधों की भीड़।
प्रसिद्धि हमेशा उसे ही मिलती है, जो अपने कर्तव्य कर्म में तल्लीन हो जाता है। इतना तल्लीन हो जाता है कि उसमें उसका अस्तित्व विलीन हो जाता है। कर्ता कर्म में विलीन हो जाता है। कर्ता मिट जाता है और कर्म अस्तित्ववान हो जाता है। जो अपने कर्म में डूब जाते हैं, उन्हें प्रसिद्धि की चाह नहीं होती। फिर प्रसिद्धि स्वयं उनका वरण कर लेती है। निश्चय ही ऐसे लोग अपने समय में चेतना के विराट स्वरूप की अभिव्यक्ति के वाचक बन जाते हैं।
प्रसिद्धि अवश्य ही मनुष्य के चित्त को लुभाने वाली एक महत् आकर्षक चीज है। मगर उससे भी मूल्यवान एक चीज है- लोकप्रियता। लोकप्रियता प्रसिद्धि से बड़ी चीज है, कीमती चीज है। सारे प्रसिद्ध लोग लोकप्रिय नहीं होते। हर प्रसिद्ध आदमी लोकप्रिय भी हो, यह जरूरी नहीं। प्रसिद्धि में लोकप्रियता अन्तर्निहित नहीं है। मगर लोकप्रियता में प्रसिद्धि अनिवार्य रूप से अन्तर्हित है। जो लोकप्रिय है, वह निश्चित तौर पर प्रसिद्ध भी है। प्रसिद्धि केवल कुछ विशेषताओं, कुशलताओं, निपुणताओं और दक्षताओं पर आधारित होती है मगर लोकप्रियता, हमेशा लोकोपकारिता पर अवलम्बित होती है। लोक प्रियता हृदय की विशालता और सबको सुख पहुंचाने की सद्भावना से प्राप्त होती है। सबके दुख को अपना अनुभव करने की योग्यता और अपने सुख को सबका सुख बना देने की आकुलता ही लोकप्रियता का आधार है। सबके विषाद को, सबके विक्षोभ को अपने में खींच लेने की सामर्थ्य और अपने उल्लास को अपनी आस्था की शीतलता को सबमें प्रवाहित प्रसारित कर देने का कौशल जिससे सध जाता है, लोकप्रियता को प्राप्त हो जाता है।
हिन्दी जगत में तुलसीदास लोकप्रियता की अप्रतिम मिशाल हैं। नहीं, समस्त मानव जगत में तुलसी की लोकप्रियता बेमिशाल है। अद्भुत है तुलसी की लोकप्रियता। कविता के माध्यम से तुलसीदास ने लोकरंजन की, लोकहित की और लोकमंगल की उपलब्धि के जो मानक रचे हैं वह अन्य सारे माध्यमों से काम करने वाले तमाम लोगों से बहुत ऊपर और आगे हैं। तुलसी की कविता न जाने कबसे असंख्य लोगों के जीवन में, उल्लास की, उत्साह की, शीतलता की, जीवन के प्रति अथाह आस्था की और जीवन विरोधी असत् के प्रति अचल संघर्ष की अजस्र धारा बहाती आ रही है। न जाने कब तक बहाती रहेगी। तुलसी की लोकप्रियता एक और तरह से भी बड़ी अद्भुत है, वह किसी के हृदय में ईर्ष्या नहीं जगाती। वह हरेक के हृदय में भक्ति को ही उद्भूत करती है।
तुलसी की कविता केवल बुधजन को ही आकर्षित और उद्वेलित नहीं करती है। वह अबुधजन को भी उत्प्रेरित और उन्मथित करती है। तुलसी की कविता की अनूठी लोकप्रियता ने अद्भुत ढंग से अबुध जनों में सृजनात्मक आन्दोलन पैदा किया है। यह सृजनात्मक उत्प्रेरणा इतने भयानक रूप से घटित हुई है कि कुछ कहते नहीं बनता। यह लोकप्रियता का अप्रतिम पुरस्कार है या अपूर्व दण्ड कह पाना मुश्किल है। तुलसी की कविता में अनेकानेक लोगों का तरह-तरह से हस्तक्षेप चमत्कृत कर देता है।
बहुत से लोगों ने तुलसी की कविता पर अपना सहज स्वामित्व समझकर उसमें संशोधन का अधिकार भी स्वयं अधिकृत कर लिया है। निःसंकोच भाव से अनेक तुलसी की कविता के अनन्य प्रेमियों ने अगाध आत्मीयता से विगलित होकर अपनी समझ से उनकी भूलों का सुधार करके तमाम संशोधन अंकित कर डाले हैं। रामायण के अनेकानेक संस्करणों में पाठ भेद की भरमार और किसी की करनी नहीं तुलसी के अनन्य काव्य प्रेमियों की अपार करूणा का ही उपहार है। इतना ही नहीं उनके बहुत से काव्य प्रेमियों ने तो तमाम जगह उनकी कविता के कथन की अपर्याप्तता को दूर करने के लिये अपनी तरह से कविता रचकर जोड़ दिया है। ऐसा तुलसी के प्रेमियों ने उनकी कविता की कमियों को दूर करने के लिए किया है, ऐसा उनका दावा है। रामचरित मानस के विभिन्न संस्करणों में क्षेपक अंश आज भी इसके गवाह हैं। बचपन में मैं अपने घर में गीताप्रेस के संस्करण के पहले के व्यंकटेश प्रेस या खड्गविलास प्रेम से छपे रामायणों में क्षेपक अंश को देखकर बराबर विस्मित होता रहता था। तब मैं क्षेपक का मतलब नहीं जानता था। आज क्षेपक का अर्थ जान लेेने के बाद मेरा विस्मय और बढ़ जाता है।
धन्य हैं, वे लोग जो तुलसी की कविता के साथ अपनी कविता जोड़कर अपने को कृतार्थ अनुभव करते हैं। कितना असम साहस है। कितना दुस्साहस है। साहित्यिक मूल्यबोध और मर्यादा की दृष्टि से निश्चय ही यह नितान्त निन्दनीय है। मगर तुलसी और तुलसी की कविता के प्रति अपार अबुध प्रेम से विरहित तो नहीं है।
इतना ही नहीं, तुलसी की लोकप्रियता के प्रभाव का ऐसा जादू चला कि तमाम लोगों ने अपने को तुलसी से अभिन्न ही बना लिया। बहुत से लोग कविता में अपना नाम छोड़कर तुलसी ही बन गए। ऐसे बन गए कि असली तुलसीदास से तुलसी बने इन तुलसियों को अलगाना शोध का एक मुकम्मल विषय बन गया। इस दुरूह कार्य को डा. किशोरीलाल गुप्त जी ने प्रकाण्ड प्रयत्न करके ’तुलसी और, और तुलसी’ में उजागर करने का उद्योग किया है। फिर भी लोक जीवन में यह विश्वास पैदा करना कि ’हनुमान चालीसा’ रामचरित मानस वाले तुलसीदास की रचना नहीं है, आज भी संभव नहीं हो सका है।
मैं अक्सर सोचता हूँ, आखिर ऐसा क्यों हुआ। यह मुझे हमेशा बहुत व्यथित करता है, विक्षुब्ध करता है। तुलसी की कविता में, उनके शब्दों, पादों और काव्य पदों को बदल डालने के पीछे लोगों की क्या मंशा हो सकती है। उनके काव्य कथनों को अपर्याप्त समझकर क्षेपकों की सृष्टि के पीछे लोगों का क्या मंतव्य हो सकता है। क्या ये लोग तुलसी से द्रोह रखने वाले लोग हैं?
अपने उद्योग में काव्यद्रोह की भूमिका रखने के बावजूद मुझे ये लोग तुलसी के प्रति द्रोह रखने वाले लोग नहीं लगते। उनके काव्य-विवेक का चाहे जितना उपहास किया जाय ठीक है, मगर उनकी नीयत पर उंगली उठाना उचित नहीं मालूम पड़ता। मुझे ये लोग तुलसी की कविता के अनन्य प्रेमी लगते हैं। मुझे ये लोग तुलसी की प्रसिद्धि के प्रशंसक और उनके यश के और अधिक विस्तार के आकांक्षी लोग लगते हैं। इस उद्योग में मुझे उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं दिखाई पड़ता। कोई लिप्सा नहीं दिखाई देती। आखिर उन्हें मिला क्या इससे। कुछ भी नहीं। शायद उन्हें कुछ चाहिये भी नहीं था। तो क्या फिर यह सब उन्होंने केवल तुलसी के प्रति अपने अनन्य प्रेम और अपनी अगाध भक्ति की वजह से ही किया? शायद हाँ। शायद नहीं। अपने असीम प्रेम के बावजूद ये लोग तुलसीदास के काव्यबोध से अपने काव्यबोध को श्रेष्ठ समझने के भ्रामक अहं के अपराधी तो ठहरते ही हैं।
तुलसी की कविता के प्रेमियों, प्रशंसकों और उनकी प्रसिद्धि के उपासकों की एक और प्रजाति है। इस प्रजाति की वंशवृद्धि आज भी जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में ही जारी है। यह प्रजाति तुलसी की कविता की अद्भुत व्याख्याताओं की प्रजाति है। यह प्रजाति उनकी कविता में काल्पनिक रहस्यों की सृष्टि करके फिर उस रहस्य के उद्घाटकों की प्रजाति है। यह बड़ी खतरनाक और अहमन्य प्रजाति है। यह प्रजाति तुलसी की प्रसिद्धि का फायदा उठाकर अपने अहं को परिपुष्ट और परितुष्ट करने वाली प्रजाति है। इस प्रजाति के लोग अपने को विद्वान और मर्मज्ञ साबित करने के लिए तुलसी की कविता के साथ चाहे जिस भी स्तर तक अत्याचार करने को उतारू रहते हैं। अपने को विद्वान न माने जाने का दारूण दंश वे तुलसी की कविता को डंस-डंसकर उतारा करते हैं। अक्सर मैं तुलसीदास को अपनी प्रसिद्धि का असहनीय दण्ड भोगते हुए देख-सुनकर अवाक रह जाता हूँ। ऐसे अवसरों पर अक्सर मैं तुलसी से अधिक अपने को ही दण्डित अनुभव करता हूँ। उत्तरों के रहते हुए भी निरूत्तर रह जाने की विवशता और मूर्खताओं को विद्वता की तरह ग्रहण करने की लाचारी से उपजी मर्मवेदना की व्यंजना भाषा में कभी व्यक्त नहीं की जा सकती।
इस प्रजाति के लोगों के अतिचार का- अत्याचार का मैं लाचार भुक्तभोगी हूँ। बचपन से ही मैं इनके बेरहम चंगुल में फँस जाया करता हूँ। फँस जाता हूँ और फँसकर निहायत निरीह की भांति छटपटाते हुए मुस्कुराता रहता हूँ। एक मुस्काहट के सिवा छाती को छेदते हुए उनके वाणी के बाणों से त्राण के लिए कोई दूसरी ढाल-कोई दूसरा कवच मुझे दुनियाँ में दिखाई ही नहीं पड़ता। सच, शालीनता भी आदमी को कितना निरीह और नपुंसक बना देती है।
किसी को अपमानित करके उसकी आत्मशक्ति को उतना कुंठित कभी नहीं किया जा सकता जितना कि सम्मानित करके। सम्मान आदमी की तेजस्विता को ढँक लेने के लिए एक बेशकीमती आवरण की तरह काम करता है। कोई इतना निर्मम हो नहीं सकता कि अपने प्रति प्रदर्शित होने वाले सम्मान को झटक दे। आज व्यवस्था इतनी स्वार्थी और चालबाज हो गई है कि इसमें लोग सम्मान का भी इस्तेमाल हथियार ही तरह अपने निहित स्वार्थ के हक में करने लगे हैं। असहमति की धार को अवरूद्ध करके जबान को जड़ देने का काम जितनी चतुराई से सम्मान से सध जाता है, उतना और किसी भी तरकीब से संभव नहीं। सम्मान में भी छल का समाहित हो जाना मनुष्य जाति के लिये कितना शर्मनाक है, कह पाना मुश्किल है।
इधर मैं एक महाविद्यालय में प्राचार्य का दायित्व निभा रहा हूँ। विद्यालय ठेठ ग्रामीण परिवेश में है। मेरे वहाँ पहुँचने से पहले मेरे साहित्यिक होने का परिचय पता नहीं कैसे पहुँच चुका है। अपने साहित्यिक होने की सजा मुझे खूब भुगतनी पड़ती है। अपने को साहित्यिक प्रमाणित करने को आकुल लोगों से अक्सर ही मैं घिर जाता हूँ। उनसे घिरकर अक्सर मैं अपने को कीचड़ में धँसी हुई गाय की तरह निरीह महसूस करता हूँ। वे लोग अपने क्षेत्र के ख्यातिप्राप्त साहित्यकारों की महत्ता को इतने आत्मविश्वास से दृढ़ता के साथ अर्थहीन साबित करते हैं कि मैं आश्चर्य में उनका मुँह ताकता रह जाता हूँ। इस दौरान मुझे तुलसीदास का वह दोहा बहुत-बहुत याद आता है, जिसमें उन्होंने अपनी जन्मभूमि में महत्ता की व्यर्थता को प्रतिपादित किया है-
तुलसी तहाँ न जाइये, जहाँ जनम को ठाउँ।
गुन-अवगुन समझैं नहीं, धरै पाछिलो नाउँ।
मुझे पक्का विश्वास होता है कि तुलसीदास जी ने कभी जरूर राजापुर में अपने जनम के परिचित और पुराने संगी साथियों के मुँह से अपनी प्रसिद्धि का मजाक उड़ाते अपने कानों सुना होगा। ये लोग अपनी साहित्यिक सूझों की दुर्लभ मूल्यवत्ता का गुणगान और सर्जना का पाठ मेरे सम्मुख इस धौस और धमक के साथ करते हैं, जैसे इनके साहित्यकार न माने जाने का मुकम्मल गुनहगार मैं ही हूँ। मैं उनके मुँह से उनकी अगाध यशगाथा अचूक धैर्य से सुनता रहता हूँ। मेरे मन में परशुराम के प्रति लक्ष्मण की वक्रोक्ति की ध्वनि गूंजती रहती है,-
अपने मुँह तुम आपन करनी, भाँति अनेक बार बहुबरनी।
नहिं संतोस त पुनि-पुनि कहहू, जनि रिसि रोकि दुसह दुख सहहूँ।
अपनी गुण-गाथा जब अपने मुँह कही जाती है, तो हास्यास्पद दंभ हो जाती है और दूसरों के मुँह से कही जाती है तो स्पृहणीय कीर्ति-कथा। मगर यह बात न जो तब परशुराम समझ सके थे और न ही अब परशुराम के वंचक वंशधर समझ पाते हैं। खैर।
इस कालेज में आने के बाद मैं अनुभव करता हूँ कि यहाँ पढ़ाने का का मेरे लिये प्रायः गौड़ है और पढ़ने का काम प्रधान। जो लोग मुझसे साहित्यिक वार्तालाप के लिये प्रायः सन्नद्ध रहते हैं, उनका उद्देश्य मुझे जानकारी देना ही अधिक रहता है। बातचीत के केन्द्र में प्रायः तुलसीदास की कविता होती है। तुलसी की कविता के संदर्भ में अपने अपूर्व चिन्तन और अपनी अद्भुत मौलिक उद्भावनाओं से वे लोग मुझे स्तंभित कर देते हैं।
सारे लोगों की मूल्यावान मौलिकता के वर्णन विस्तार में न जाकर मैं केवल एक व्यक्ति की कुछ उद्भावनाओं को आपके सम्मुख रखना चाहता हूँ, जिससे आप उनकी प्रतिभा का अनुमान आसानी से लगा सकेंगे।
जब पहली बार वे मुझसे मिले थे, बड़ी मासूमियत से उन्होंने अपनी खूबियों और अपने दायित्वों का वर्णन मुझसे किया था। उन्होंने बताया था कि रजिस्टर्ड रूप में तो वे इस कालेज में कुछ नहीं है मगर व्यावहारिक हकीकत में वे ही सबकुछ हैं। उन्होंने बताया था कि उन्हें किस तरह अकेले मैनेजर, अध्यक्ष, अध्यापक, चपरासी और मेरे आने से पूर्व तक प्रिंसिपल का समूचना भार अपने कमजोर कंधों पर उठाना पड़ता रहा है। मैंने उन्हें उनकी विह्वलता देखकर आश्वस्त किया कि मेरे आने के बाद भी आप सारा बोझ अपने कन्धे पर रखे रखकर उन्हें मजबूत बनाने का अभ्यास करते रहें। मेरी आश्वस्ति से वे आह्लादित हुये। आह्लाद में आकण्ठ डूबकर उन्होंने तुलसीदास के बारे में अपनी विशेषज्ञता का अथक बखान शुरू किया।
उन्होंने मुझे बताया कि कुछ पारिवारिक विवशताओं और कुछ कम शैक्षिक योग्यता के चलते उन्हेें गाँव के इंटर कालेज में पढ़ाने को मजबूर होना पड़ा। अगर ऐसी मजबूरी में न फंसना पड़ा होता तो उनका दावा है कि वे आज तुलसीदास के साहित्य की मर्मज्ञता के क्षेत्र में जरूर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की पहचान रखते। मगर दुर्भाग्य को भला कौन टाल सकता है।
एक दिन वे मुझसे बताने लगे कि तुलसीदास की कविता पढ़ने से नहीं गुनने से समझ में आती है। इसीलिये मेरा पढ़ने में बहुत कम विश्वास है। मैं तो पूरा-पूरा गुनने में ही यकीन रखता हूँ। गुनने से कविता परत दर परत खुलती जाती है। देखिये न कविता को गुनने के कारण ही आज रिटायर हो जाने के दस साल बाद भी बच्चे मुझे रिटायर नहीं होने देते। हर साल फाइनल वाले बच्चे अपने पीछे वाले बच्चों से मेरी व्याख्या की बारीकियों को बता देते हैं। हर साल बच्चे समूह बाँधकर आते हैं और एक साल और पढ़ा देने की जिद करके मुझे ले जाते हैं। फिर अगले साल वही बात। इस तरह मैं रिटायर होने के बावजूद अभी तक पढ़ाता आ रहा हूँ।
वे बता रहे थे कि एक बार एक बड़ा भारी जलसा हो रहा था। उसमें बहुत और बहुत बड़े-बड़े विद्वान और बड़े-बड़े ओहदेे वाले अप्सर आये हुये थे। उस सभा में मैंने तुलसीदास की कुछ चौपाइयों की ऐसी व्याख्या की कि सारे लोग चमकृत होकर चकित रह गए थे। पुलिस कप्तान तो गदगद होकर मुझे गले लगा लिए थे। जलसा कहाँ हुआ था, यह उन्होंने नहीं बताया। मुझे लगता है, धरती पर तो नहीं ही हुआ होगा। हुआ होगा तो उनके खयालों में ही हुआ होगा।
वे कहने लगे कि व्याख्या के लिये धनुषयज्ञ प्रसंग की एक चौपाई उठायी थी- ’’रंगभूमि जब सिय पगु धारी।’’
मूर्ख लोग कहते हैं, जिनको तुलसीदास के पूर्वापर कथनों में संगति की सूझ नहीं है, वे नासमझ लोग कहते है कि रंगभूमि में सीता ने जब पैर रखा। अरे यह कौन-सी बात हुई, कैसी बेहूदी तरह की बात हुई। इसमें क्या निगूढ़ता है। तुलसीदास जैसे कवि भला एक चौपाई भी ऐसी कैसे लिख सकते हैं, जिसमें कोई निगूढ़ रहस्य न भरा हो। फिर आगे कहा गया है कि उस रूप को देखकर नर-नारी सभी मोहित हो गए। अब बताइये भला सीता ही अगर रंगभूमि में आयी होतीं तो यह कैसे संभव होता। सीता को देखकर नर तो मोहित हो सकते हैं। मगर नारी का मोहित होना कैसे संभव है। नहीं, नहीं यह असंभव है। तुलसीदास ने खुद ही लिखा है- मोह न नारि नारि के रूपा। नारी के रूप को देखकर कभी भी नारी मोहित नहीं होती। अगर सीता को देखकर नर-नारी दोनों मोहित हो जाते हैं तो फिर तुलसी की स्थापना अपने आप ही खण्डित हो जाती है। भला तुलसीदास इतने मूर्ख हैं क्या कि अपनी ही स्थापना को अपने ही खण्डित करते चलें। ऐसे तो पूरी कविता ही चौपट हो जायेगी। मगर ऐसा नहीं है। यह तो लोगों की नासमझी है, तुलसी की कमी नहीं।
वे कह रहे थे कि असल में सब गड़बड़ी भाषा की, काव्य भाषा की ठीक समझ न होने के कारण पैदा हुई है। दरअसल जो लोग तुलसी की भाषा का मर्म जानते हैं वे जानते हैं कि पगु शुद्ध शब्द नहीं है। शुद्ध है पग। और जो यहाँ पगु लिखा गया है वह उत्तर के ’उ’ को जोड़ देने के कारण लिखा गया है। और जो लोग अवधी भाषा का व्याकरण और स्वभाव जानते हैं, वे जानते हैं कि ’घ’ और ’ध’ में यहाँ अभेद होता है। इस प्रकार ’पगु धारी’ का सही पाठ ’पग उधारी’ होता है। और ’पग उधारी’ का अर्थ होता है, रामचन्द्र। सीता के पैर को उधार करने वाले अर्थात रामचन्द्र जी। यह समास का कैसा अद्भुत कमाल है बहुब्रिही समास का। अब देखिये चौपाई का अर्थ कितना साफ और सुसंगत है, जब सीता और सीता के पैर को उघारने वाले रामचन्द्र रंगभूमि में आये तो उनके रूप को देखकर नर-नारी सभी मोहित हो गये। सीता को देखकर नर और रामचंद्र को देखकर नारी। कहीं कोई असंगति नहीं।
अपनी बात पूरी करके उन्होंने विजयी भाव से ऐसा अट्टहास किया कि मेरा कलेजा दहल उठा। मैं अचेत सा होकर टुकुर-टुकुर उनका मुँह ताकता रहा।
जब वे चले गये मुझे अपने बचपन की एक याद ताजी हो आयी। पहले हमारे घर पर रिश्ते के एक नाना आया करते थे। नाना पहलवानी करते थे और खूब गाँजा पीते थे। अक्सर शाम को गाँजा पीने के बाद वे हमारे चरवाहों और मजदूरों की महफिल लगाते। उस महफिल में वे तुलसी की कविता के गूढ़ रहस्यों के बारे में अपने गुप्त ज्ञान का जमकर प्रकाशन करते। वे बताते कि यह सब अनोखी बातें उन्होंने अपने गुरू से गड़बड़ रामायण का अध्ययन कर प्राप्त की हैं। वे यह भी बताते कि गड़बड़ रामायण का ज्ञान सबको सुलभ नहीं होता। यह तो कोई बिरला तुलसी का प्रेमी ही अपनी गहन साधना-भक्ति से तुलसी की कृपा से प्राप्त कर पाता है।
अब मैं समझ गया। ये अद्भुत अध्यापक विद्वत्ता के बुखार से बेकल रामायण नहीं गड़बड़ रामायण के उपासक हैं। ये अपनी नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा से तुलसी को पछाड़कर अपने को कृतार्थ करते हैं। कितना अद्भुत है, कितना विस्मयजनक है, कितना वितृष्णा कारक है हमारे देश में, हमारे समय में रामायण के समान्तर गड़बड़ रामायण का अस्तित्व। क्या हमारा समय रामायण को गड़बड़ रामायण में रूपान्तरित करने का समय तो नहीं बन रहा है।
हमारे समय में गड़बड़ रामायण के उपासक जिन शिक्षा-संस्थानों के सर्वेसर्वा हैं, उन संस्थानों में होना ग्लानि का विषय होना चाहिए या गर्व का? इन विद्यालयों में पढ़ने और पढ़ाने वाले लोगों की नियति का निर्धारण कौन करेगा? ऐसे विद्यालय हमारे देश के विकास को किस दिशा में ले जाएँगे? अस्सी प्रतिशत से अधिक का अनुपात रखने वाले अपने समय में ऐसे विद्यालयों की दशा और दिशा से आँख मूँदकर चुप पड़े रहना, क्या उपयुक्त है? क्या यह उपेक्षा आने वाले समय को नपुंसक और निरीह नहीं बना देगी?
बहुत से प्रश्न हैं, जो बिफरे हुए विषधर की तरह रस्तों को अपनी गेंड़ुर में लपेटकर फुँफकार रहे हैं। तक्षक के विषधर वंशज इतिहास की बहुमूल्य विरासत की पुण्यगाथा को डंसने के लिए तरकीबें ढूंढ रहे हैं। कहते हैं, महामुनि शुकदेव की भागवत कथा के आयोजन के बीच तक्षक ने फूल में छिपकर परीक्षित को डंसा था। हम देख रहे हैं, आज हमारी आस्था के, उपासना के उपादान तक्षक के वंशधरों के आश्रय बन गये हैं। हमारे जीवन में जीवन के लिए जो भी बहुमूल्य और रक्षणीय है, उसे विषदग्ध करने के लिए क्षुद्र स्वार्थ ने आस्था के उपादानों को ही अपना आश्रय बना लिया है। कितना दारुण है।
कितनी दारुण जीवन स्थितियों से घिरे होकर भी हम कितने निश्चिन्त बैठे हैं। हम निरुपाय और निरीह होकर जीने को अभिशप्त हो रहे हैं। दोष किसका है, पता नहीं है। किससे पूछे, कौन पूछे, कौन बताये? हर आदमी अपने-अपने स्वार्थ के विष से विमोहित है।
अभी तो हमारी आँखों के आगे सर्पसत्र का आयोन चल रहा है। पता नहीं जनमेजय का नागयज्ञ होगा?
प्राचार्य
मां गायत्री महिला महाविद्यालय
हिंगुतरगढ़, जिला-चन्दौली
पिनकोड- 232105
मो0- 9450551160










![] डा. उमेश प्रसाद सिंह।](https://youngwriter.in/wp-content/uploads/2021/12/unnamed-file.jpg)
