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Saturday, July 25, 2026

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जब आलोचक हार गया

वरिष्ठ साहित्यकार डा. उमेश प्रसाद सिंह।
वरिष्ठ साहित्यकार डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

यह सच है कि अब वे नहीं हैं। मगर स्मृति में उनका होना इतना सघन और सजीव है कि उनके अब न होने की बात सरासर झूठी लगती है। कभी-कभी जो है उसका न होने जैसा अनुभव और जो नहीं है उसका होने जैसा अनुभव बड़ा विचित्र लगता है। अवधारणाओं के निर्जीव चित्र जगत में एक अनुभव चाहे वह जितना भी विचित्र मालूम पड़े- चाहे जितना भी बेढंगा मालूम पड़े, पूरी दुनिया को, मगर वह हमेशा जिन्दगी के सूखे कण्ठ को पानी से गीला कर पुलक से भर जाता है। उनका होना जीवन में पुलक के उस अनुभव की तरह होना था, जो स्मृति के पट पर अंकित होकर साहित्य के रूप में सजीव हो उठता है। उनका होना अपने समय में अविश्वास के लम्बे वीरान रेगिस्तान में विश्वास के घने शीतल बाग की तरह होना था। उनका होना भीड़ भरे निर्गन्ध वातावरण में मनुष्य के होने की सुगन्धि की तरह था। निरन्तर मूल्यहीन होते जा रहे मनुष्यों के समाज में उनका होना अजायबघर में एक दुर्लभ प्रजाति के मनुष्य की तरह होना था। वे अपने समय में इतिहास की धरोधर की तरह थे।
उनके होने से उनके जीवन में हमारे पारंपरिक महाकाव्यों के उदात्त चरित्रों की झलक हमें दिखती थी, जो आज के समय में अविश्वसनीय से लगने वाले चरित्रों की विश्वसनीयता के लिए प्रमाण थी। वे भारतीय जीवन-आदर्श के अनुकूल कहने में नहीं, होने में विश्वास रखने वाले विलक्षण पुरूष थे। उन्होंने जितना कुछ मूल्यवान अपनी लेखनी और अपने वक्तव्यों में हिन्दी जगत के सम्मुख उपस्थित किया उससे बहुत अधिक मूल्यवान उनके जीवन में अनकहा मौजूद था। अपनी बेलौस आलोचना में उन्होंने काव्यसत्यों का जिस संजीदगी के साथ विश्लेषण किया है, उससे अधिक तन्मयता से उन्होंने काव्यमूल्यों को अपने जीवन में आत्मसात किया था। तमाम देशी-विदेशी परम्परा में समादृत कवियों की काव्यभूमियां उनमें उनकी हृदय भूमि की तरह मौजूद थी। उनका जीवन मुझे हमेशा एक क्लासिकल महाकाव्य की तरह पढ़ने को आमंत्रित करता रहा है, जिसमें निष्ठा के, विश्वास के, ईमान के, कर्तव्य के, प्रेम के, सौहार्द के, संघर्ष के, त्याग के और समर्पण के न जाने कितने अलिखित सर्ग अपनी सुगन्धि के सम्मोहन से बरबस चित्त को खींच लेते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल महाकाव्य की मूल्यवत्ता में जो विरूद्धों के सामंजस्य का सूत्र स्थापित करते हैं, वह प्रो0 चन्द्रबली सिंह के जीवन के महाकाव्य में अपने शोभन रूप में विद्यमान मिलता है।
यह सच है कि उन्होंने अपना जीवन मनुष्य के भौतिक जीवन को शोषणमुक्त और अभ्युन्नत बनाने की मंगलाकांक्षा से संवलित मार्क्सवादी विचारधारा को समर्पित कर दिया था। उस विचारधारा में उनकी आस्था अडिग थी। उनकी निष्ठा अगाध थी। मगर बावजूद इसके उन्होंने जीवन की सचाइयों से आंख नहीं मूदी थी। उनके लिए विचारधारा निर्जीव सिद्धांतों का समुच्चय नहीं थी। उनके अंगीकृत विचार उनके व्यवहार में जीवित थे। वे विचारदर्शन से अनुप्रेरित शासन प्रणाली और विचार, दर्शन के जीवन-व्यवहार के बीच के सूक्ष्म अन्तराल के सिद्ध पारखी थे। वे मनुष्य जीवन की आन्तरिक अवस्थाओं और व्यवस्था के बीच होने वाले द्वंद की मार्मिक स्थितियों के ईमानदार व्याख्याता थे। यही कारण है कि अपने समकालीन आलोचकों में उनकी प्रतिष्ठा और उनका समादर बिल्कुल अलग और विशिष्ट तथा विलक्षण किस्म का है। वे जनवादी लेखक संघ के संस्थापकों में थे। जनवादी लेखक संघ की स्थापना के समय से लेकर अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक वे उस लेखक संगठन के महासचिव और अध्यक्ष रहे। मगर संगठन के लिए अपना सबकुछ समर्पित कर देने के बावजूद साहित्य में उन्होंने कभी भी संगठन के बाहर के लेखकों के प्रति अवमूल्यन और उपेक्षा का भाव अपने हृदय में नहीं आने दिया। वे साहित्य के मूल्यांकन में साहित्य की अन्तर्वस्तु को सर्वोपरि स्था देने वाले अपने समय के अन्यतम आलोचक थे। विचार उनके लिए सौन्दर्य को बढ़ाने वाले अलंकार की तरह की चीज नहीं थी। विचार उनके लिये जीवन की ऊर्जा की तरह था जो अपने ही रक्त की ऊष्मा में उपज कर समूचे अस्तित्व को गति और शक्ति प्रदान करता है। वे साहित्य में अजातशत्रु समालोचक थे, जो अपने समय में अकेले थे। उनकी निष्ठा महाभारत के पितामह भीष्म की निष्ठा की तरह पूज्य और समादरणीय थी, जो हस्तिनापुर की सुरक्षा और समृद्धि के लिए प्रतिबद्ध होने के बावजूद अन्धी नहीं थी। वे विचारधारात्मक धरातल पर सबसे अधिक और उग्रविवादों के पुरस्कर्ता होने के बावजूद भावना के धरातल पर निर्विवाद पुरूष थे। विचार और व्यवहार दोनों के प्रति जैसी निर्विकार, ईमानदारी चन्द्रबली सिंह जी ने अपने जीवन में साथ रखी थी वह अन्यत्र दुर्लभ है। उनके समादर में उनकी एकान्त अनुपस्थिति में श्रद्धेय गुरुवर शिव प्रसाद सिंह के शब्द मुझे हमेशा याद आते हैैं। वे अक्सर कहा करते थे- ’’इस देश में मार्क्सवादी विचारकों में अपनी ईमानदारी के कारण पूजा के योग्य केवल एक ही व्यक्ति है, एकदम अकेला और वह व्यक्ति है प्रो0 चन्द्रबली सिंह।’’ मुझे शिवप्रसाद सिंह जी का कथन संश्लिष्ट साहित्यिक सन्दर्भ में न केवल ऐतिहासिक बल्कि अविस्मरणीय भी लगता है।
चन्द्रबली सिंह जी को प्रोफेसर की उपाधि विश्वविद्यालय ने नहीं प्रदान की थी। कहना न होगा कि विश्वविद्यालयों की प्रदत्त उपाधियां देखते ही देखते बहुत थोड़े समय में धूमिल हो जाती हैं। मगर संस्थानों के समानान्तर जो उपाधियां साहित्य के अकारण प्रेमियों द्वारा प्रदान की जाती हैं, वे कभी श्रीहीन नहीं होती। भारतेन्दु की उपाधि की तरह प्रोफेसर की उपाधि चन्द्रबली सिंह के लिए विशेषण न रहकर संज्ञा बन गई थी। किसी भी विशेषण का किसी के लिए संज्ञा बन जाना हमेशा नहीं, कभी-कभी होता है।
उनकी अध्यापकीय गरिमा का प्रात्याख्यान सुनकर शायद ही कोई सहृदय व्यक्ति हो, जिसका हृदय विस्मय-विमुग्ध हुए बिना रह जाय। मैंने सुना है कि जब वे उदय प्रताप कालेज की कक्षाओं में कविवर शेली, कीद्स और वर्डस्वर्थ की कविताओं की गहन तन्मतया में व्याख्या कर रहे होते थे तो उनकी कक्षा में उनके समकालीन और संभवतः उनसे वरिष्ठ प्राध्यापक श्रद्धेय भीष्म पितामह सिंह अभिभूत होकर विहल हो उठते थे। अपने समकक्षों के बीच प्रतिस्पर्धा की अनगिनत दुर्घटनात्मक कहानियों के बीच धन्यताबोध की यह अकेली जनश्रुति चन्द्रबली सिंह जी की प्रातिभ विलक्षणता की अनोखी मिशाल है। यह एक अकेली कहानी उनके होने से शिक्षा जगत में प्राचीन गुरुकुल के निर्वैर वातावरण की विश्वसनीयता की प्रमाण बन जाती है।
उनके अध्यापन के गौरव का एक अद्भुत दृश्य मैंने स्वयं अपनी आंखों अपने गाँव में अपने दरवाजे पर देखा है। वह अवसर था 17, फरवरी 1997 में ठाकुर प्रसाद उपान्त महाविद्यालय के शिलान्यास का। शिलान्यास समारोह में मैंने एक विचार गोष्ठी का सत्र रखा था, जिसका विषय था- ’वर्तमान परिवेश में पारम्परिक भारतीय शिक्षा के मूल्य’।
इस गोष्ठी की अध्यक्षता मूर्धन्य साहित्य मनीषी डा. शिवप्रसाद सिंह कर रहे थे और मुख्य अतिथि थे प्रो0 चन्द्रबली सिंह। गोष्ठी का संचालन मुझे ही करना पड़ा था। आयोजन में बनारस के प्रायः अधिकांश साहित्यकार उपस्थित थे। भाई अशोक पाठक, राजेन्द्र राजन, केशव शरण, डा. रामसुधार सिंह, डा. रामकली सर्राफ तो आयोजन में सहभागी ही थे। श्रोता समुदाय में लगभग बीस किलोमीटर वर्ग क्षेत्र के अधिकांश विद्यालयों और महाविद्यालयों के प्राचार्य और प्राध्यापक उपस्थित थे।
दोपहर में भोजन के समय मैंने जो दृश्य अपने दरवाजे पर देखा उसको देखकर अवाक रह गया। मैंने देखा कि प्रोफेसर चन्द्रबली सिंह जी एक कुर्सी पर बैठे हुये हैं और उनके चारों तरफ खाली कुर्सियों को पीछे ठेलकर पचासों प्राध्यापक और प्राचार्य बड़े विनत भाव से कृतज्ञता से अभिभूत उन्हें घेरकर खड़े हैं। कुतूहल और शिष्टाचारवश मैंने पूछा कि आप लोग इतने समय से खड़े क्यों हैं? मेरे पिता जी ने जो उसी वर्ष एक विद्यालय के प्रधानाचार्य पद से अवकाश ग्रहण किये थे बताया कि मेरे साथ यहां जितने लोग खड़े हैं ये सभी लोग उदय प्रताप कालेज में इनके विद्यार्थी रह चुके हैं। आज इतने दिनों बाद भी इन्हें देखकर हम सब महसूस कर रहे हैं कि हम अभी भी इनकी कक्षा में बैठे इनका व्याख्यान सुन रहे हैं। इनके समक्ष कुर्सी पर बैठ पाने की धृष्टता हमारे वश की बात नहीं है। उस दिन चन्द्रबली सिंह जी के प्रति वैसा समवेत समादर देखकर मैं बहुत भीतर तक श्रद्धा के पवित्र स्रोत में भींगकर धन्यता अनुभव करता रहा। उस दिन प्राचीन भारतीय आचार्य पद की पवित्र गरिमा का जो बोध मेरे अंतरमानस में चन्द्रबली सिंह जी के माध्यम से अनुभव हुआ वह मेरे जीवन में एक अविस्मरणीय आह्लाद का स्रोत बनकर आज भी मुझे रोमांचित करता है। वे विलुप्त होते विश्वासों के प्राण पुरूष थे। वे अपने विचारों में जितने अधिक आधुनिक थे अपनी गरिमा में उससे अधिक प्राचीन थे। उनके न होने से सबसे अधिक क्षति हमारे सनातन जीवन-विश्वासों और आदर्शों को पहुंची है।
चन्द्रबली सिंह जी अत्यन्त असाधारण की बिल्कुल साधारण अभिव्यक्ति थे। वे साहित्य की व्यापक जनजीवन में सहज जुड़ाव की संभावनाओं और सीमाओं का विश्लेषण करने वाले प्रखर आलोचक थे। वे ओजस्वी वक्ता थे। वे गहन व्याख्याता थे। वे निर्मम विश्लेषक थे। वे सुधी अध्येता थे। वे परस्पर विरोधियों के बीच भी समादर के सेतु थे। वे परम हार्दिक थे। मानस के पट पर पच्चीसों वर्ष के साहचर्य में उनकी न जाने कितनी छवियों के अमिट चित्र अंकित हैं। स्मृतियोें के पन्ने पलट कर देखता हूँ तो हर चित्र अपने पास रूक जाने का हठ करने लगता है। मैं मौन हो जाता हूँ। लाचार हो जाता हूँ। विवश हो जाता हूँ। उंगलियां पन्ने पलटने में अक्षम हो जाती हैं। मैं उनके एक ऐसे ही चित्र के सामने न जाने कबसे खड़ा हूँ। चित्र अपने को छोड़कर आगे बढ़ने की अनुमति नहीं देता। मैं अवज्ञा में एक कदम भी आगे बढ़ने में असमर्थ हूँ। न जाने कबसे यहीं रूका हूँ। न तो यह चित्र मुझे छोड़ना चाहता है न मैं उसे छोड़ना चाहता हूँ। लाचारी है जहाँ मैं रूका हूँ, वहीं आपको भी रोकना ही पड़ेगा।
प्रोफेसर साहब की धर्मपत्नी के देहावसान के बाद के कुछ दिन बीत चुके थे। उनकी लौकिक क्रिया के बीत जाने के बाद आगन्तुक लौट चुके थे। घर खाली हो चुका था। वे एकाकी विषण्ण एकान्त में अतीत के संगीत को तन्मयता से सुनने में लीन रहा करते थे। उनकी अतीत की स्मृति यात्रा का रहस्य अनुभव बिल्कुल गोपन था। उनकी स्थिर मुद्रा अनुमान के सारे प्रयत्नों को विफल कर देने के लिए पर्याप्त थी। इस बीच हम लोग सुबह-शाम अक्सर उनके पास बैठकर समय गुजारने में अपने को हल्का महसूस करते थे। ऐसे ही दिनों में एक दिन मैं सुबह के समय मिलने बैठने के निमित्त उनके यहाँ पहुँचा। जाड़े की धूप आकाश से उतरकर धरती की छाती पर दूधमुंहे बच्चे की तरह किलक रही थी। लगभग नौ बज रहे होंगे। जब मैं उनके गेट के सामने पहुंचा तो देखा वे अपना हाथ पीछे की तरफ बांधे तल्लीन भावमुद्रा में बरामदे में खड़े थे। उनकी उस गहन तन्मयता में व्यवधान डालना उचित न समझकर मैं चुपचाप गेट के बगल में खंभे की आड़ में खड़ा हो गया। मैं उनकी उस भावावेशित अवस्था का अनुशीलन करने में तल्लीन हो गया। उनका सारा शरीर रोमांचित हो रहा था। आंखों में हृदय की तरलता उमड़कर भर आई थी। भरकर बिल्कुल छलक रही थी। आगे बढ़ने के लिए वे अपना एक पैर उठाते थे। मगर न जाने क्यों पैर आगे न आकर पुनः वहीं ठहर जाया करता था। उस समय मुझे वे एक प्रवण भावमुद्रा में चित्रित सजीव चित्र की तरह जान पड़े थे। मेरे जेहन में अनायास ही कुमार संभव में कालिदास का पद बज उठा-
तं वीक्ष्य वेपथुमती सरसांगयष्टि
निक्षेपणाय पदमुद्घृमुवहन्ति
मार्गाचल व्यतिकरा कुलितेव सिन्धो:
शैलाधिराज तनया न ययौ न तस्थौः।।
मुझे उनकी उस भावस्थिति में व्याघात पहुँचाना वांछित न था। मैं बहुत देर तक खम्भे और खजूर की छाया को ओट बनाकर खड़ा रहा।
बहुत देर बाद उन्होंने जब बाहर की तरफ आँख उठायी मुझे देख लिया। किंचित संकुचित होते हुए उन्होंने मुझे भीतर आ जाने को कहाँ मुझे बहुत देर तक बाहर खड़े रहने पर उन्होंने खेद प्रगट किया। मैंने देखा उनके हाथों में एक जोड़ी पुरानी चप्पल है।
मुझे लेकर ये भीतर कमरे में चले गये और चुपचाप सोफेे पर बैठ गये। मैं भी मौन सोफे पर बैठ रहा।
प्रगट में हमारे बीच मौन छाया था। मगर मैं महसू कर रहा था वहाँ मौन कत्तई नहीं था। स्मृतियों का संगीत उनकी आंखों में करुण आलाप में बज रहा था। मैं तन्मयता से उसे सुन रहा था।
कुछ देर बाद उन्होंने कहना शुरू किया। आज बहुत दिनों के बाद कमरे की सफाई करते हुए पलंग के नीचे पत्नी का चप्पल मिला। जीवन के आखिरी समय में वे इसी चप्पल का उपयोग करती थीं। मैंने सोचा अब ये बेकार हैं। इन्हें कूड़े में फेंक आऊँ। मगर इन्हें फेंकने के लिए जब बाहर बरामदे में पहुंचा मेरे पैर आगे बढ़ने से इनकार कर गये। मुझे महसूस होने लगा ये चप्पल बेकार नहीं हैं। ये केवल चप्पल भर नहीं हैं। इनमें मुझे पत्नी के पैरों के स्पर्श का अनुभव मालूम पड़ा। लगा जैसे ये उनकी शेष स्मृति के चिह्न हैं। अपनी पत्नी के स्मृति चिह्न को कूड़े में फेंक आने का निश्य मुझसे न हो सका। उन्होेंने चप्पल तिपाई पर ले जाकर रख दिया।
उनके निर्णय का यह स्थगन और बदलाव उनका विचलन नहीं था। यह उनकी प्रकाण्ड प्रज्ञा का हृदय के आन्तरिक स्रोत में डूब-नहाकर निखर आये सौंदर्य का निदर्शन था, जो हम उनकी आलोचना में भी बराबर देख सकते हैं। उनका विवेक हमेशा हृदय की आन्तरिक गहराई में अवगाहन करता रहा है। उनके विश्लेषण के सारे अन्तः सूत्र उनकी अडिग आस्था के केन्द्र से अटूट डोर में बंधे रहे हैं। लाभ-हानि, उचित-अनुचित, सार्थक-निरर्थक, उपयोगी-अनुपयोगी आदि सामयिक सामाजिक मानदण्डों के द्वंद में चाहे कितनी भी दूर जाकर अपने हृदय की पुकार पर अपने हृदय देश में लौट आने की कला मनुष्य के मनुष्यता के अलिखित इतिहास में हमेशा महान रही है, हमेशा महान रहेगी। चन्द्रबली सिंह इस महान परम्परा के अपने समय में ध्वजवाहक उत्तराधिकारी थे। उनका उत्तराधिकार मनुष्यता के संरक्षण-संवर्धन में आस्था रखने वाले लोगों को हमेशा अपनी ओर आमंत्रित करता रहेगा।

प्राचार्य
मां गायत्री महिला महाविद्यालय
हिंगुतरगढ़, जिला-चन्दौली
पिनकोड- 232105
मो0- 9450551160

ट्रैक्टर की चपेट में आने से महिला की मौत

Young Writer, चहनियां। बलुआ थाना क्षेत्र के सुरतापुर गांव में ट्रैक्टर के चपेट में आने से 35 वर्षीय महिला पूजा देवी बुरी तरह से घायल हो गयी। ग्रामीणों की सूचना पर पहुचे बलुआ थानाध्यक्ष ने पुलिस की जीप से चहनियां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भेजवाया, जहां हालत गम्भीर डाक्टरों ने जिला अस्पताल भेजवाया। जिला अस्पताल में डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। परिजनों में हाहाकार मच गया।
बताते हैं कि सुरतापुर गांव के रहने वाली पूजा देवी शनिवार को अपने पति मनीष मिश्रा के साथ मकर सक्रांति के पर्व पर बलुआ स्थित पश्चिम वाहिनीं गंगा तट पर स्नान करने के लिए बाइक से जा रही थी। गांव से निकलते वक्त चहनियां-धानापुर मुख्य मार्ग पर चहनियां की तरफ से आ रही ट्रैक्टर की चपेट में आ गयी। घटना के बाद ट्रैक्टर ड्राइवर वाहन छोड़कर फरार हो गया। लहूलुहान हालत में देख ग्रामीणों ने पुलिस को फोन कर सूचना दिया। मौके पर पहुचे बलुआ बलुआ थानाध्यक्ष मिथिलेश तिवारी ने ट्रैक्टर को कब्जे में लेकर पुलिस की सेकेंड जीप से महिला को चहनियां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भेजवाया, जहां महिला की हालत गम्भीर देख डॉक्टरों ने जिला अस्पताल रेफर कर दिया। जिला अस्पताल पहुंचते महिला की मौत हो गयी। महिला के मृत की सूचना पाते ही परिजनों में हाहाकार मच गया। मृतका की माली हालत ठीक नहीं थी। इनके एक भी संतान नहीं थे। पति मनीष मिश्रा, ससुर प्रमोद मिश्रा, देवर आशीष मिश्रा का रोकर बुरा हाल है।
इनसेट—-
मार्ग को लेकर ग्रामीणों ने किया प्रदर्शन

चहनियां। क्षेत्र के सुरतापुर गांव में जहां महिला की ट्रैक्टर की चपेट में आने से मौत हुई है। बताते हैं कि गांव में जाने वाला मार्ग काफी नीचे है, जब भी लोग गांव से मुख्य मार्ग चहनियां वाया धानापुर पर अपने गंतव्य को जाने के आते है ऊपर चढ़ने पर मार्ग पर कुछ दिखाई नहीं देता है, जिससे आए दिन दुर्घटना होती है। ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार अधिकारियों को गांव के मार्ग को मुख्य मार्ग के लेविल में मिलाने की गुहार लगायी गयी, किन्तु कोई सुनवाई नहीं हुई, जिससे अक्सर उस स्थान पर दुर्घटना होती है। यदि मार्ग को लेबिल कर दुरुस्त नहीं कराया गया तो ग्रामीण चक्का जाम को बाध्य होंगे। प्रदर्शन करने वालो में अशोक सिंह, नीरज सिंह, सुभाष मिश्रा, विकास गुप्ता, रामसजन राम, सन्तोष मिश्रा, मुनवर अली, नौरंग राम, गिरधारी चौहान, आकाश कुमार, पंकज सिंह आदि उपस्थित थे ।

मनोज डब्लू ने बसपा नेता को पार्टी से जोड़ा, फहरया ध्वज

बभनियांव रायपुर में बसपा नेता के आवास पर सपा का ध्वज लगाते मनोज सिंह डब्लू।

Young Writer, चंदौली। लखनऊ पार्टी कार्यालय से लौटने के बाद सपा के राष्ट्रीय सचिव मनोज कुमार सिंह डब्लू समाजवादी कुनबे के विस्तार में पूरी शिद्दत से जुट गए हैं। इस दौरान उन्होंने डोर-टू-डोर कैम्पेन के तहत बभनियांव रायपुर गांव पहुुंचे, वहां पूर्व जिला पंचायत व बसपा नेता रहे महंगू राम के आवास पर पार्टी का परचम लहराया। साथ ही बसपा नेता त्रिलोकी राम को समाजवादी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता दिलाई। उन्होंने विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पूरी मुस्तैदी के साथ के अपने बूथ पर पार्टी की किलेबंदी को बनाए और बचाए रखें। क्योंकि बूथ पर मिली जीत ही सपा की ऐतिहासिक जीत का गवाह बनेगी।

उन्होंने कहा कि आज समाजवादी पार्टी से हर वह राजनीतिक शख्स मिलना व जुड़ना चाहता है, जो समाज में समानता, समरसता को बनाए रखना चाहते है। ऐसे तमाम दिग्गजों का लखनऊ में जमावड़ा लगा है, लेकिन अब इस जमावडे़े को जनपद, विधानसभा क्षेत्र स्तर के साथ गांव व पंचायत स्तर पर कायम करना होगा। इसके लिए बेहिसाब मेहनत व बेजोड़ इच्छाशक्ति की जरूरत है, जो आज चंदौली के एक-एक सपाई में दिख रही है। यही उत्साह व उमंग सूबे की सत्ता में सपा की वापसी कराने जा रहा है। कहा कि पिछली सपा सरकार के ऐतिहासिक कामकाज का मजबूत आधार ही सत्ता परिवर्तन की बुनियाद बनेगा। आह्वान किया कि सपा सरकार की योजनाओं, घोषणा-पत्र में आमजन की सहूलियत के लिए कही गयी बातों व वादों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का काम करें। इस दौरान डोर-टू-डोर कैम्पेनिंग करें और पांच की संख्या में अलग-अलग टुकड़िया बनाकर फैल जाए। इस अवसर पर हनुमान यादव, रामकेवल यादव, अखिलेश सिंह, महमूद अली, गणेश गुप्ता, सुबाष यादव आदि उपस्थित रहे।

प्रेमप्रकाश मीणा ने जलजमाव की समस्या का किया समाधान

Young Writer, चकिया। क्षेत्र के ग्राम सभा भागूपुर में कई बरसों के कायम विवाद शनिवार को एसडीएम चकिया प्रेमप्रकाश मीणा की पहल व कुशल प्रशासनिक कार्य प्रणाली से हल हो गया। प्रेमप्रकाश मीणा ने कई सालों से भारी जल भराव की समस्या को निस्तारित कराया, जिस कारण गांव के 100 से ज्यादा घरों व काश्तकारों को आवागमन में दिक्कत के साथ ही उनकी खेती बाड़ी प्रभावित हो रही थी। जलजमाव की उक्त समस्या के समाधान के लिए पिछले कई सालों में कई बार प्रयास हुए बावजूद इसके सफलता नहीं मिली। इसी बीच शनिवार को भागूपुर ग्रामसभा पहुंचे एसडीएम प्रेमप्रकाश मीणा ने गांव स्थित गाटा संख्या-84 की सरकारी भूमि पर नाली निर्माण कार्य प्रारंभ करवाया गया, जिससे बड़ी जनसंख्या को लम्बे समय से कायम जलजमाव की समस्या से निजात मिलने की उम्मीद जगी है। नाली निर्माण कार्य मुकम्मल हो जाने से ग्रामीणों न सिर्फ आवागमन में सहूलियत होगी। साथ ही उनकी खेती-बाड़ी करने में सहूलियत होगी।

एसडीएम सदर ने कोविड टीकाकरण का लिया जायजा

Young Writer, कंदवा। उपजिलाधिकारी सदर अविनाश कुमार शनिवार को क्षेत्र के विद्यालयों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बरहनी में टीकाकरण का जायजा लेने पहुंचे। इस दौरान कोरोना मे वितरण होने वाली दवाइयों से संबधित जानकारी ली गई। स्वास्थ्य कर्मियों को आवश्यक दिशा-निर्देश देते हुए विद्यालयों मे टीकाकरण बढाने पर जोर दिया गया।
एक बार पुनः कोरोना संक्रमण के बढते शिकायतों से प्रशासन सक्रिय हो उठा है शत-प्रतिशत कोविड 19 टीकाकरण को लेकर प्रयासरत है इसी क्रम मे शनिवार को एस डी एम सदर टीका करण का हाल जानने निकले हुए थे। मां मंशा देवी स्नातकोत्तर विद्यालय सहित अन्य विद्यालयों मे पहुंचकर छात्र छात्राओं के टीकाकरण का हाल जाना गया। महाविद्यालय प्रबंधक, प्रधानाचार्यों को आवश्यक दिशा निर्देश दिया गया। तत्पश्चात प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बरहनी पहुंचे वहां हो रहे टीकाकरण का जायजा लेने के बाद कोरोना से संबधित वितरित की जाने वाली दवाइयों के बारे मे जानकारी ली गई। वहीं विद्यालयों मे टीकाकरण की प्रगति के बारे में उपस्थित स्वास्थ्य कर्मियों से पूछताछ की गई। जिन विद्यालयों में टीकाकरण का प्रतिशत कम है जानकारी मांगी गई, ताकि जल्द से जल्द टीकाकरण के लक्ष्य को पूर्ण किया जा सके। इस दौरान मनीषा गौड, संजय, डा.सूर्य प्रकाश, सुदामा, तेज प्रताप भारती सहित अन्य मौजूद रहे।

अवैध कब्जाधारियों से आवास खाली कराएगा नगर पंचायत

चेयरमैन ने कहा कि सामान जब्त करने के साथ होगा एफआईआर

Young Writer, चंदौली। नगर पंचायत अंतर्गत मान्यवर कांशीराम शहरी आवास योजना के तहत बसाए गए पाकेट संख्या-1 से पांच के कुल 41 आवासों का आवंटन जांच के बाद निरस्त कर दिया गया था। इसके बाद भी कांशीराम शहरी आवास में बिना आवंटन के लोग अवैध कब्जा करके निवास कर रहे हैं, जिससे आवास परिसर में मारपीट, अराजकता आदि की घटनाएं हो रही है। इसकी शिकायतों को नगर पंचायत ने संज्ञान में लिया है और जल्द ही आवासों की जांच अभियान चलाकर की जाएगी।
यह जानकारी देते हुए नगर पंचायत अध्यक्ष रवींद्रनाथ ने बताया कि कांशीराम शहरी आवास योजना के तहत कुल 672 आवास निर्मित कर उन्हें गरीबों में आवंटित किया गया है। बीच में शिकायतों की जांच के बाद एडीएम द्वारा 41 आवासों का आवंटन निरस्त कर दिया गया है, जिसका आवंटन पुनः नहीं किया गया। बावजूद इसके कांशीराम आवास में बिना आंवटन के आवंछनीय तत्व अवैध तरीके से आवास पर कब्जा करके निवासरत थे। इस कारण आवंटियों को कठिनाई हो रही है। आए दिन मारपीट की घटनाएं होती है जिसकी लगातार शिकायत प्राप्त हो रही है। इन शिकायतों को संज्ञान में लेते हुए आवास में अवैध रूप से बिना आवंटन के रह रहे व्यक्तियों की जांच शीघ्र की जाएगी। यदि आवंटन संबंधित अभिलेख नहीं उपलब्ध होगा तो आवास में रखने वालों को तत्काल आवास खाली कराया जाएगा तथा उनके सामान को जब्त करने हुए उनके विरूद्ध चंदौली कोतवाली में एफआईआर दर्ज कराने की कार्यवाही की जाएगी।

मुख्य गंगा नहर ने चंदौली जिला अस्पताल को डुबोया

जिला अस्पताल परिसर स्थित आकस्मिक चिकित्सा वार्ड गेट पर जमा नहर का पानी व खड़ी एंबुलेंस।

माइनर के पानी ने अस्पताल परिसर को अपनी गिरफ्त में लिया

Young Writer, चंदौली। यदि यह कहा जाए कि जनपद चंदौली में विकास बेकाबू हो गया है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसकी बानकी शनिवार को जिला अस्पताल परिसर में देखने को मिली। विकास के बड़े-बड़े दावे की पोल एक छोटी माइनर ने खोलकर रख दी। किसानों की मांग पर गेहूं सिंचाई के लिए मुख्य गंगा नहर से सम्बद्ध माइनर को छोड़ा गया तो पूरा का पूरा जिला अस्पताल परिसर डूब गया। शनिवार को दूरदराज ग्रामीण इलाकों से दवा-ईलाज के लिए लोग चलकर जिला अस्पताल पहुंचे तो वहां का दृश्य देखकर अवाक रह गए।

जिला अस्पताल परिसर स्थित मातृ एवं शिशु विंग अस्पताल के सामने जमा नहर का पानी।

इस समस्या से जहां जिला अस्पताल में कार्यरत स्वास्थ्य कर्मियों, चिकित्सकों व कार्यालयीय कर्मचारियों के साथ-साथ अस्पताल में आने वाले मरीजों व तीमारदारों को उठानी पड़ी। स्थिति यह थी कि जिला अस्पताल तक जाने वाले सभी रास्ते माइनर के पानी से डूब चुके थे। वहीं परिसर स्थित कई भवन भी उसकी चपेट में नजर आए। यह समस्या काफी पुरानी है, लेकिन न तो स्वास्थ्य विभाग ने इसे गंभीरता से लिया और ना ही जनप्रतिनिधियों की ओर से ही अस्पताल को सुविधाओं से लैस करने की दिशा में सार्थक पहल हुए। आम लोगों का आरोप था कि जनप्रतिनिधि व नेता विकास के नाम पर केवल कमिश्नर से अपनी जेब गर्म कर रहे हैं। ठेकेदारों की सुविधा व सहूलियत को ध्यान में रखकर परियोजनाओं व विकास का झुठा दावा किया जाता है। आमजन की मांग को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है, जिस कारण आज पूरा का पूरा जिला अस्पताल परिसर डूबा हुआ है। यह चंदौली के विकास की वास्तविक सच्चाई है।

मुख्यालय स्थित पंडित कमलापति त्रिपाठी परिसर तालाब में तब्दील हो गया है बगल से गुजरी नहर का पानी घुस जाने के कारण पूरा अस्पताल परिसर में जल ही जल दिखाई दे रहा है इससे आने वाले मरीजों और अधिकारियों कर्मचारियों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है यही नहीं आवासीय परिसर में भी पानी घुसने के कगार पर पहुंच गया है जिसमें जिला जज समेत जिला अस्पताल के उच्च अधिकारी भी शामिल हैं पानी की परिसर में जमा होने के कारण मरीजों और तीमारदारों को भी कठिनाइयों के दौर से गुजरना पड़ रहा है यही नहीं इमरजेंसी वार्ड के ठीक सामने पानी लगने के कारण मरीजों को और एंबुलेंस को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा जिससे बीमारी दूर कर आने आने आने वाले लोग खुद बीमारी के शिकार होने के कगार पर हैं यही नहीं सबसे अधिक परेशानी कोविड-19 को होगी जो जांच कराने आ रहे हैं वह भी जांच केंद्र में पहुंचने के लिए पानी से होकर गुजरना पड़ रहा है

उद्घाटन के बाद जनता की पहुंच से दूर स्नानागृह

जिला अस्पताल चंदौली में उद्घाटन के बाद भी स्नानागृह के गेट पर लटकता ताला।

Young Writer, चंदौली। जनपद समेत पूरे सूबे की जनता निवर्तमान हुई सरकार के कामकाज से खिन्न है। उसका गुस्सा हाल-फिलहाल उद्घाटित और लोकार्पित हुई परियोजनाओं व विकासपरक योजनाओं को लेकर है। जनता के आरोप हैं कि सरकार व जनप्रतिनिधियों ने परियोजनाओं के उद्घाटन व लोकार्पण के नाम पर छलने का काम किया है। इसके कई ज्वलंत उदाहरण भी लोगों ने गिनाॅएं। अब चाहे पर चंदौली स्थित अटल बिहारी वाजपेयी सेतु का लोकार्पण हो या फिर चंदौली जिला अस्पताल में बना स्नानागृह। इसके साथ ही कई छोटी-बड़ी परियोजनाएं जो लोकार्पित होने के बाद भी आमजन के प्रतिबंधित करके रखी गयी हैं। ऐसे में फजीहत तब होती है जब जनता व विपक्ष उसे आमजन को समर्पित करने का दबाव बनाने हैं। जैसा कि पिछले दिनों अटल बिहारी वाजपेयी सेतू पर देखने को मिला। फिलहाल अब बात करेंगे जिला अस्पताल परिसर में बने सार्वजनिक स्नानागृह की।

चंदौली जिला अस्पताल परिसर के पश्चिम द्वार से सटे बना स्नानागृह के गेट पर फिलहाल ताले लटक रहे हैं। विभागीय लोगों की माने तो इसका शुभारंभ तीन माह पूर्व ही विधायक साधना सिंह ने किया, जिसका गवाह बगल में लगा शिलापट्ट है। शिलापट्ट बता रहा है कि उक्त सार्वजनिक शौचालय, मूत्रालय एवं स्नानागृह का निर्माण कार्य विधायक निधि योजना के तहत वर्ष 2019-2020 के अंतर्गत पूरा किया गया है, जिसका शुभारंभ साधना सिंह द्वारा किया जाना भी दर्शित है। वहीं कार्यदायी संस्था के रूप ग्रामीण अभियंत्रण विभाग चंदौली का नाम अंकित है। यानी विधायक निधि के उक्त प्रस्तावित काम को ग्रामीण अभियंत्रण विभाग ने मुकम्मल किया। मुक्कल शब्द इसलिए लिखा जा रहा है क्योंकि कार्य पूरा नहीं होता तो शुभारंभ का शिलापट्ट वहां नहीं लगता। अब सवाल यह है कि उद्घाटन के बाद उक्त सेवा को सर्वसमाज के सुपुर्द क्यों नहीं किया गया। यदि किसी तरह की अड़चन थी तो उसे तीन माह की लम्बी अवधि में दूर क्यों नहीं किया गया। देखा जाए तो इस लापरवाही के लिए विधायक साधना सिंह, कार्यदायी संस्था ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के साथ-साथ स्वास्थ्य विभाग भी जिम्मेदार है, क्योंकि उक्त परियोजना को स्वास्थ्य विभाग के अहाते में मूर्त रूप दिया गया है। ऐसे में यदि वहां प्रतिदिन आने वाले दो हजार लोग यदि शौचालय, मूत्रालय व स्नानागृह के इस्तेमाल से अब तक वंचित है तो इसके लिए सीधे तौर पर ये तीनों इकाईयां बराबर की जिम्मेदार हैं। जिनकी लापरवाही के कारण जनता के पैसे से जनता के लिए बना स्नानागृह, शौचालय व मूत्रालय, जन समर्पित होने के बाद भी जनता की पहुंच से दूर है। ऐसे में विधानसभा चुनाव के दौरान जनप्रतिनिधियों से जनता इन मुद्दों को लेकर सवाल करती नजर आए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

सपा के हर शख्स में दिख रहा अखिलेश यादव का अक्स

Young Writer, चंदौली। समाजवादी पार्टी का प्रादेशिक दफ्तर इन दिनों राजनीतिक तीरथ बन गया है, जहां हर कोई मत्था टेकता नजर आ रहा है। भाजपा में मची भागम-भाग से समाजवादी कुनबा विधानसभा चुनाव-2022 के आगाज के साथ ही एकाएक बढ़ गया है। इस इजाफे से उसके वोट बैंक में भी बढ़ोत्तरी होगी, ऐसा राजनीति के जानकार अनुमान लगा रहे हैं। लेकिन इसके इतर समाजवादी पार्टी ने बूथ से लेकर विधानसभा तक अपनी किलेबंदी को मजबूती देने का काम किया है, ताकि उसे अपने मूल मतदाताओं के मतों में सेंधमारी का आघात उन्हें न झेलना हो।
अब चाहे चुनाव प्रचार हो या हो चुकी सपा की रैलियां। बैठकों व वर्चुअल संवाद में सपा ने बहुत कुछ नया किया है और संगठन को नए सिरे से चुनाव के लिए तैयार करने का एकल प्रयास व मुकाम पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने अपनी कड़ी मेहनत से किया है ताकि चुनाव नतीजे आएं तो उनकी तपस्या में कोई कमी न दिखे। इस लाइन को जुमले के रूप में देखा व पढ़ा जा सकता है जो आजकल देश के प्रधानमंत्री व भाजपा के खिलाफ खूब चलन में है।

हाल-फिलहाल समाजवादी पार्टी की स्थिति यह है कि यहां सपा के एक-एक शख्स में अखिलेश यादव का अक्स दिखने लगा है। क्योंकि जो कार्यकर्ता किसी नेता के समर्थन में वोट देने व दिलाने की बात करते थे वो अचानक से अखिलेश यादव के लिए वोट मांगते नजर आ रहे हैं। हाल ही में चंदौली आए सपा के प्रमुख प्रदेश महासचिव राजनारायण बिंद ने स्पष्ट कहा कि अबकी बार प्रत्याशी को नहीं अखिलेश यादव को देखिए। सपा का एक प्रत्याशी स्वयं में अखिलेश है इसलिए दिग्भ्रमिक होने की संभावनाओं को स्वतः खारिज कर सपा को वोट देने व दिलाने के महाभियान में जुट जाएं। उनकी बातों ने चंदौली के समाजवादियों पर बड़ा असर छोड़ा और आज यही बातें सपा के लोगों द्वारा चट्टी-चौराहे पर कही और सुनी जा रही है जिन्होंने न केवल सपा के पक्ष में उम्दा माहौल तैयार किया, बल्कि सपा के लाल की चुनावी रंगत को और चटक बना रही है। हाल-फिलहाल यह अमूलचूल परिवर्तन सपा के हरएक खेमे में नजर आ रहा है, जिसने सबसे बड़ा आघात पार्टी अंदर खाने में अपनी गहरी जड़े जमा चुकी स्थानीय नेताओं की गोलबंदी व खेमेबंदी पर किया है। यानी मतदाता अब किसी भी नेता के बहवाके में आने से पहले एक बार अखिलेश यादव की तस्वीर को जरूर देखेंगे। पिछड़ों, अतिपिछड़ों के सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक भागीदारी को सुनिश्चित करने के प्रयासों को जाने व समझने का प्रयास जरूरत करेंगे। आज अखिलेश यादव के कथनानुसार समाजवादी पार्टी का बूथ स्तर से लेकर विधानसभा इकाई, जिला इकाई स्तर का नेता अपने आज को फिजिकल, वर्चुअल व डिजिटल तीनों प्लेटफार्म के लिए तैयार करता दिख रहा है। इस टीम में युवा नेतृत्वकर्ता के रूप में नजर आ रहे हैं। क्योंकि उन्हें डिजिटली व वर्चुअली प्लेटफार्म की बेहतर जानकारी है, वहीं बड़े-बजुर्गु अपने राजनीतिक तजुर्बे को इन युवाओं की मदद से आनलाइन प्लेटफार्म पर सपा को सशक्त बनाने की दिशा में कार्य करते दिख रहे हैं। यदि यही गठजोड़ व समन्वय पूरे चुनाव भर कायम रहा तो 10 मार्च को परिणाम सपा के सुखद साबित होंगे।

ट्रेन से धक्का लगने से युवक की मौत, हत्या का आरोप

मृतक की फाइल फोटो।

Young Writer, पड़ाव। अलीनगर थाना क्षेत्र के नीबूपुर गांव निवासी दिलीप पाल का 22 वर्षीय पुत्र सतीश पाल की शुक्रवार को ट्रेन की चपेट में आने से हुई मौत हो गयी। सूचना पाकर पहुंचे परिजनों ने शव को घर ले आया और पुलिस को दी सूचना पाकर पहुंची पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर अगली कार्रवाई में जुड़ गई वहीं परिजनों ने गांव के ही कुछ युवकों पर ट्रेन के सामने ढकेल ने की आशंका जताई है।
बताते हैं कि शुक्रवार को नींबूपुर गांव निवासी दिलीप पाल का 22 वर्षीय जोकि ड्राइवर का कार्य करता है। शाम के वक्त अपने साथियों के साथ रेलवे ट्रैक के तरफ गया हुआ था और कुछ देर बाद परिजनों को गांव के ही एक व्यक्ति ने सूचना दी कि आपका बेटा रेलवे ट्रैक पर मृत पड़ा हुआ है। सूचना पाते ही परिजन मौके पर पहुंचे और शव को घर ले आए, वहीं लड़के के चाचा संजय पाल ने आरोप लगाया कि गांव के ही कुछ लड़कों से उसका कुछ दिन पूर्व विवाद हुआ था और आज उसे जबरदस्ती ट्रेन के सामने धक्का दे दिया गया और मौके पर उसकी मौके पर ही मौत हो गई मृतक सतीश पाल अपने दो बहनों व दो भाइयों में दूसरे नंबर पर था। बड़ी बहन प्रीति पाल 24 वर्ष छोटी बहन प्रतिभा 20 वर्ष व छोटा भाई मनीष 16 वर्ष बताया गया है वही मां राजकुमारी देवी व परिजनों का रो रो कर बुरा हाल हो गया। इधर, सूचना पाकर पहुंची जफर पर पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर अग्रिम कार्रवाई में जुट गई है।

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