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Wednesday, July 29, 2026

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कबिरा खड़ा बाजार में

Young Writer, साहित्य पटल।

कबीर बेधड़क बाजार में आने-जाने वाले आदमी हैं। बीच बाजार में खड़े होने का असम साहस कबीर में है। वे अपने काते-बुने कपड़े भी लेकर बाजार में निकलते रहे हैं। वे अपनी कविता भी लेकर बाजार में निकलते रहे हैं। वे अपनी लुकाठी लेकर भी बाजार में निकलते रहे हैं। कबीर के हाथ में वस्त्र भी था। कविता भी थी। लुकाठी भी थी। बड़ा विस्मय होता है। इस विस्मय जनक विरल आदमी को देख पाने के लिए बराबर मन मचलता रहता है। मन का क्या, मन तो जाने किस-किसके लिये, किन-किन चीजों के लिये मचलता रहता है। मगर कुछ भी कहाँ हो पाता है। लगता है, हमारे समय में हमारा और हमारे जैसों का मन सिर्फ मचलने के लिये ही रह गया है। खैर!
कबीर की कविता जीवन के अन्तर और बाह्य दोनों छोरों के सच को छूती कविता है। कबीर के वस्त्र उनके न होने के बाद भले सुलभ न रह गये हों मगर उनकी कविता आज भी हमारे लिये ओढ़ने-पहनने के काम की बनी हुई है। कविता का ओढ़ने पहने के काम का बने रहना कविता के लिये कैसा है, इसका निर्णय बड़ा मुश्किल है।
अभी थोड़े दिनों पहले मैंने एक प्रख्यात लेखिका का कबीर के बारे में एक लेख पढ़ा। उस लेख में उन्होंने कबीर के हिन्दू होने के पक्ष में अपनी कल्पनाशक्ति से कबीर की कविता से अनेकों उद्धरण देकर उनको हिन्दू सिद्ध करके ही दम लिया। उनका तर्क है कि कबीर की कविता में हिन्दू धर्म के प्रतीकों, पद्धतियों और आचार-व्यवहार की जितनी गहरी पकड़ मिलती है, उससे उनका हिन्दू होना सिद्ध होता है। मजेदार बात है कि कबीर की जाति के बारे में इतिहास में बहस करने का अवकाश है। तर्क रखने की गुंजाइश है। मैं सोच में पड़ गया हूँ कि कबीर की जाति तय कर लेने से उनकी कविता के अर्थ में, उसकी व्यंजना में, उसकी व्याप्ति में कुछ फर्क पड़ने की संभावना दिखाई देती है, क्या? अगर ऐसा है, तो ठीक। चलो पहले जाति ही तय कर लें। कविता जो जाति-धर्म की सरहदों को पार करके पैदा होती है, उसको समझने के लिये जाति-निर्धारण की आवश्यकता कितनी बेधक है।
जहाँ तक हिन्दू प्रतीकों, विश्वासों और व्यवहारों की जानकारी और कविता में प्रयोग की बात है तो इसी तर्क के आधार पर जायसी और रहीम को भी हिन्दू होना ही पड़ेगा। मेरा मन उन लेखिका से बार-बार यह पूछ लेना चाहता है कि कबीर के हिन्दू ठहरा दिये जाने से हिन्दुओं को कोई अतिरिक्त लाभ मिल सकेगा क्या? कबीर के हिन्दू न होने की दशा में हिन्दुओं को उनकी वजह से कुछ नुकसान उठाना पड़ता है क्या?
इस लेख के पढ़ने के आस-पास ही एक प्रतिष्ठित पत्रिका में एक प्रतिष्ठित मुसलमान लेखक का कबीर के बारे में एक और लेख पढ़ा। इस लेख में उन्होंने बड़े परिश्रम से यह प्रमाणित किया है कि कबीर को मुस्लिम धर्म-व्यवहार की सही जानकारी नहीं थी। उनकी कविता में इस्लाम की रीति-नीति का त्रुटिपूर्ण वर्णन अनेक जगहों पर मिलता है। उनके विचार से कबीर मुसलमान जाति के नहीं मालूम पड़ते हैं।
कितना विलक्षण विपर्यय है। कबीर को लेकर यह विपर्यय कितना बेधक है। एक हिन्दूवादी लेखिका कबीर को हिन्दू साबित करने पर तुली हैं। एक धर्मनिरपेक्ष कहा जानेवाला मुसलमान लेखक कबीर को मुसलमान न मानने पर आमादा हैं। दोनों की निष्पत्तियाँ एक ही हैं। कितना आश्चर्यजनक है, विचार के दो ध्रुवों पर स्थित विचारकों का कबीर को लेकर एक जैसा निर्णय। साहित्य के लिये दोनों की सोच कितनी निरर्थक है। पता नहीं क्यों, पता नहीं कैसे हमारे समय में कबीर से अधिक महत्व की चीज उनकी जाति हो गयी है। क्या अब कविता के बारे में भी राजनीतिक दलों की गर्हित चिन्तन धारा के समान्तर जातीय आधार पर सोशल इंजीनियरिंग के नुस्खे आजमाने का समय शुरू होने वाला है? अगर ऐसा होने वाला है तो कितने शर्म की बात है! कितनी ग्लानि की बात है!
अभी-अभी एक मुलाकात में दलित विमर्श के एक क्रान्तिकारी कवि ने बताया कि उनका पक्का विश्वास है कि कबीर की स्वाभावित मृत्यु नहीं हुई थी, बल्कि कट्टरपंथियों ने उनकी हत्या कर दी थी। उन्होंने बताया कि उनके विश्वास का आधार यह है कि कबीर की क्रान्ति चेतना को कट्टरपंथी कभी बर्दाश्त कर ही नहीं सकते। कबीर जैसी कविता लिखने वाले की हत्या अवश्यंभावी है। इस दारुण सच पर इतिहासकारों ने जान-बूझकर पर्दा डालने के लिये चामत्कारिक घटनाओं की परिकल्पना रचकर उनकी मृत्यु से संबन्धित अविश्वसनीय और चामत्कारिक किंवदन्तियों को प्रचारित कर दिया है।
यह सब पढ़कर और सुनकर मैं तबसे तहप्रभ हूँ। स्तंभित हूँ। मेरा मन कबीर के समय में अपने को और अपने समय में कबीर को देखने को विकल है।
मैं देख रहा हूँ, हमारे समय में कबीर बीच बाजार में खड़े हैं। उनके हाथ में लुकाठी है। जलती हुई लुकाठी। उनकी लुकाठी में उनकी कविता की आग जल रही है। यह आग उनके आत्मबोध के तेल से प्रज्ज्वलित है। बिना आत्मबोध के पाखण्ड को जलाने वाली कोई आग जल ही नहीं सकती। मगर हमने तो कबीर की कविता में व्याप्त उनके आत्मबोध को न जाने कबसे ठुकरा रखा है। केवल पाखण्ड विडम्बन को पकड़ रखा है। अब उनके पाखण्ड बिडम्बन को भी हम भुनाने की जुगत में लगे हैं। हिन्दू सोच रहे हैं, हिन्दुओं के पाखण्ड पर प्रहार करने वाला हिन्दू ही हो तो बेहतर है। इसलिये वे कबीर को हिन्दू सिद्ध करने पर तुले हैं। मुसलमानों को इस्लाम में व्याप्त पाखण्ड को उजागर करने वाला मुसलमान किसी हाल में कबूल नहीं है। इसलिए वे कबीर को मुसलमान न मानने के पक्ष में हैं।
इधर कबीर हैं कि हमारे लोकतंत्र के सट्टा बाजार में अपनी कविता की लुकाठी लिये खड़े हैं। कबीर उस बाजार में खड़े हैं, जहां आदमी आदमी नहीं महज एक वोट है। वोट खरीदने और बेंचने की दुकानें सजी हैं। जाति के मूल्य पर, धर्म के मूल्य पर, धर्म निरपेक्षता के मूल्य पर, पिछड़े और दलित के मूल्य पर, विकास के वायदे के मूल्य पर, वोट खरीद-फरोख्त का धन्धा बाजार में अपने रंग में है। हर दुकानदार कबीर को अपनी दुकान में घसीट लाना चाहता है। सारे दुकानदारों ने कबीर की लुकाठी पर पानी फेंक कर बुझा दिया है। सबने मिलकर उनकी लुकाठी उनसे छीनकर सड़क पर फेंक दी है। बीच सड़क पर कबीर की बुझी हुई लुकाठी पड़ी है। कबीर को अपनी दुकान में अपने उत्पाद के विज्ञापन के लिये खींच लाने को दुकानदारों में धक्का-मुक्की मची हुई है।
सभी अपनी-अपनी दुकान की तरफ खींच रहे हैं कबीर को। मगर कबीर हैं कि टस से मस नहीं हो रहे हैं। कबीर बीच बाजार में, बीच सड़क में खड़े हैं, सभी दुकानों से समान दूरी पर। कबीर अकेले रहेंगे मगर किसी दुकानदार के साथ नहीं जायेंगे। वे न हिन्दू दुकानदार के साथ होंगे न मुस्लिम दुकानदार के साथ, न किसी अन्य जाति के दुकानदार के साथ। कबीर की कविता दुकानों से बाहर रहकर दुकानदारों को धिक्कारती रहेगी। कबीर हिन्दू साबित हों, न हों कोई फर्क नहीं पड़ता। वे हिन्दू धर्म के निन्दक नहीं है। वे सिर्फ हिन्दू अन्धता के समर्थक नहीं हैं। कबीर को मुसलमान मानें न मानें वे इस्लाम के विरोधी नहीं है। वे सिर्फ इस्लामिक कठमुल्लेपन के उपासक नहीं है। जहाँ भी पाखण्ड है, अन्धापन है, छल है, दिखावा है, कबीर की कविता उसका उपहास करती रहेगी।
किसी भी समय में बाजार चाहे जितना कुत्सित रूप धारण कर ले, चाहे जितना हत्यारा रूप अख्तियार कर ले मगर उसकी स्वार्थी कट्टरता कभी भी कबीर की कविता की हत्या करने की कूबत नहीं पा सकती। कबीर की कविता हमेशा-हमेशा दुकानदारों को बीच बाजार धिक्कारती रहेगी।

अभिनय की प्रतिष्ठा

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

हमारे समय में जीवन और व्यवस्था से जुड़े तमाम मुद्दों पर लोगों के बीच भारी मतभेद है। मगर अभिनय की श्रेष्ठता हर आदमी को एकमत से स्वीकार है। निर्विवाद रूप में हर क्षेत्र में अगर कोई उल्लेखनीय उपलब्धि है, तो वह अभिनय की प्रतिष्ठा है।
अभिनय निश्चित तौर पर प्रशंसनीय कला है। अभिनय की कला से हम इतने प्रभावित हुये हैं कि हमने उसे अपना समूचा जीवन ही समर्पित कर दिया है। अभिनय हमारे दिल-दिमाग में प्रवेश कर गया है। घुसकर उसने अपनी जगह बना ली है। जगह क्या बना ली है, समझिये कि पूरी जगह ही हथिया ली है। हमारे समय में अभिनय हमारा आचरण बन गया है।
अभिनय का आचरण बन जाना कैसा है, हमें नहीं मालूम। जैसा भी हो क्या फर्क पड़ता है। है तो, है। अभिनय आदमी का स्वभाव नहीं है। स्वभाव की अनुकृति है। अपने स्वभाव से बाहर निकल कर दूसरे के स्वभाव का अनुसरण, अभिनय होता है। जो अपना नहीं है, दूसरे का है, उसे अपना बना लेना अभिनय है। जो असली नहीं है, उसे असली की तरह, दिखा देना अभिनय है। नकली में असली का विश्वास पैदा कर देना अभिनय है। हमारे समय में अभिनय हमारा धर्म बन गया है। हमारा राष्ट्रधर्म बन गया है। क्या हमारे समय में हर आदमी अपने स्वभाव के निषेध में तल्लीन है। हर आदमी किसी दूसरे की नकल में तत्पर है। हर आदमी नकली को असली बनाने में, बनाकर हर किसी को दिखाने में निरत है। हर आदमी जो अपना नहीं है, उसे अपना बनाने के उद्योग में लगा है। कितना अद्भुत है।
अभिनय का आचरण में बदल जाना कितना अद्भुत है। शायद इसका हमें पता नहीं है। जो है, उसका हमें पता नही ंहोना कितना अद्भुत है। अपने निरन्तर नकली होते जाने की प्रक्रिया का हमें पता नहीं होना कितना अद्भुत है। अभिनय का सिनेमा के पर्दे से निकल कर जन-जन में व्याप्त हो जाना कितने विस्मय की बात है। मगर बात कुछ जन की नहीं हैं। एक-दो जन की बात होती तो कुछ बूझने की बुझाने की गुंजाइश भी रहती। यहाँ तो कूपहिं में भाँग पड़ी है। नहीं, कुँए में ही नहीं, कुँए कुएँ में हर कुएँ में भाँग पड़ी है। फाग कही नहीं है। भाँग, हर कहीं हैं। आनन्द कहीं नहीं है। उल्लास कहीं नहीं है। नशा हर कहीं है।
हमारे समय में हर नेता अभिनेता बनने को प्राण-पण से जूझ रहा है। इस कला की साधना में उसने अपना सारा समय और समूचा स्वत्व समर्पित कर दिया है। सत्ता पर कब्जा पाने के लिये कोई भी अभिनय से उसे इंकार नहीं है। किसी को अपना चेहरा याद नहीं है। किसी का अपना चेहरा नहीं है। मुखौटे हर किसी को याद हैं। हर किसी की स्मृति का भंडार मुखौटों से भरा पड़ा है। अभिनेताओं के पाँव तो राजनीति में अंगद के पाँव बन ही गये हैं। अभिनेताओं के नेता बनने की प्रक्रिया हमारे समकालीन जीवन में अभिनय की अपूर्व प्रतिष्ठा का पक्का सबूत है।
हम खुश नहीं हैं, रत्तीभर भी मगर चेहरे पर खुशी का पाउडर पोत कर घूम रहे हैं। हजार तरह के भय भरे हुये हैं भीतर। मगर निडरता का क्रीम चेहरे पर मलकर चमकाये चल रहे हैं। लोभ भरा हुआ है लबालब अंदर छलक-छलक पड़ रहा है आँखों से मगर त्याग का भाषण झाड़े जा रहे हैं। हम अन्दर बिल्कुल खाली हैं, मगर बाहर, बाहर भरा-भरा दिखने में, दिखाने में व्यस्त हैं। जो है, उसे हम पूरी ताकत लगाकर ढाँक-तोप रहे हैं। जो नहीं है, उसे सब तरह से सबको दिखा देने को बेकल हैं। हमें पता नहीं है कि हम क्या कर रहे हैं। हमारे समय की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि हम जो कुछ कर रहे हैं, उससे हम वाकिफ नहीं हैं। हम यह जानने को उत्सुक ही नहीं हो पा रहे हैं कि हमारे लिये घरों में भी ‘मेकअप’ में रहने की हमारी लाचारी हमारे लिये कितनी दुर्भाग्यपूर्ण है। हमारे घरेलू खर्च में ‘मेकअप’ का बढ़ता हुआ दबाव हमें भीतर से और बाहर से कितना कमजोर करता जा रहा है, हमें मालूम नहीं पड़ रहा है।
पहले हम नाटक देखने के लिये घर से बाहर जाया करते थे। अब हम घर में खुद ही नाटक करने लगे हैं। हम ही नाटक खेल भी रहे हैं, देख भी रहे हैं। पहले हम ‘मेकअप’ का तमाशा देखने ‘थियेटरों’ और सिनेमाघरों में जाया करते थे। अब ‘मेकअप’ का तमाशा हमारे घरों में घुस आया है। इतने तक भी गनीमत थी। इतने तक भी हमारे जीवनबोध को उतना खतरा नहीं था। हमारी परम्परा में गृहस्थ घर में रहता था। बाहर आता था, जाता था मगर रहता था घर में। वह घर में स्थित होता था। घर में स्थित होकर हर कहीं उपस्थित होता था। आज कोई भी घर में नहीं है। किसी के पास अपना घर नहीं है।
हमारे घर से, हमारा घर लापता हो गया है और हमें पता नहीं है। हमारे ही भीतर से हमारा विश्वास लापता हो गया है और हमें पता नहीं है। हमारे लाभ में से हमारा शुभ गायब हो गया है और हमें पता नहीं है। हमारे समय में जो हमारा लाभ है, वह शुभ नहीं है, न अपने लिये, न अपनों के लिये, दूसरों के लिय तो बात ही छोड़िये। ऐसा क्यों है?
उत्तर आसान नहीं है। यह भी सच है कि इस जीवन स्थिति के पीछे कोई एक-दो कारण नहीं है। अनेकों हैं। मगर हमें लगता है कि जो प्रमुख कारण है, वह हमारा अभिनय का आचरण है। हमारा समूचा आचरण ही अभिनय बन गया है। बनता जा रहा है। अब तो स्थिति यहाँ तक आ गई है कि आदमी खुद के समक्ष भी अभिनय कर रहा है। किसान खेती कर नहीं रहे हैं, खेती करने का अभिनय कर रहे हैं। मजदूर, मजदूरी नहीं कर रहे हैं, मजदूरी करने का अभिनय कर रहे हैं। अध्यापक पढ़ाने का अभिनय कर रहे हैं। छात्र पढ़ने का अभिनय कर रहे हैं। अधिकारी, अधिकारी होने का अभिनय कर रहे हैं। बुद्धिजीवी, अपने बुद्धिजीवी होने का अभिनय कर रहे हैं। अभिनय साहित्यकार भी कर रहे हैं। खण्डित और क्षुद्र कालखण्डों के जीवन स्थितियों की बोध विहीन उत्तेजनाओं के सहारे कुछ भी लिखकर साहित्यकार होने की दुर्ललित वासना साहित्य के समग्र बोध को खण्डित करने का अभिनय सीख रही है। हम कर कुछ और रहे हैं मगर करते हुय कुछ और दीख रहे हैं। हम करना कुछ और चाहते हैं मगर कर कुछ और रहे हैं। हम जो कुछ भी कर रहे हैं, बिना मन के कर रहे हैं। हम जो कुछ भी कर रहे हैं, बिना रस के कर रहे हैं। हम अपने काम में अपने को जोड़ नहीं पा रहे हैं। सचमुच हमारे समय की यह कैसी विचित्र विडम्बना है।
हमारे जीवन की जड़ सूख रही है। हम निश्चिन्त नहीं हैं। हम चिन्तित हैं जरूर। हम उद्विग्न हैं। उद्विग्नता में हम पत्ता-पत्ता सींच रहे हैं। हम पत्ता-पत्ता सींच रहे हैं। जड़ प्यासी-प्यासी है। हम सींचते जा रहे हैं। सींचने में अफनाते जा रहे हैं। हरियाली सूखती जा रही है। हमारे वृक्ष छायाहीन होते जा रहे हैं। फलहीन होते जा रहे हैं। हम अपना घर ढूंढने बाजार में हलकान हैं। हम भूल गये हैं, घर बाजार में नहीं मिल सकता। हम भूल गये हैं अभिनय, आचरण नहीं है। हमारे समय में अभिनय की प्रतिष्ठा, आचरण की अप्रतिष्ठा से अलग नहीं है।

हिन्दू होने के अर्थ की तलाश में

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, चंदौली।

मैं हिन्दू हूँ। मेरा हिन्दू होना मेरी अस्मिता से बिल्कुल अभिन्न् है। मेरे होने में ही मेरा हिन्दू होना समाहित है। यह मेरा विकल्पों के बीच ऐच्छिक चुनाव नहीं है। यह मेरे जन्म के साथ ही मेरे अस्तित्व के उपादानों में उपस्थित है। मैं बराबर सोंचता रहता हूँ मेरे हिन्दू होने का क्या मतलब है? कुछ विशेष अर्थ, कुछ विशेष ध्वनि कुछ विशेष प्रयोजन, कुछ विशेष संकल्प, कुछ विशेष निर्देश….. आदि आदि के बारे में जब भी विचार करता हूँ, मुझे मेरा, हिन्दू विशेष जैसा कभी भी नहीं मिलता। जब भी मिला है, सिर्फ संज्ञा जैसा मिला है।
विशेषणों के विशेषीकृत गुण अर्जित किये जाते हैं, यत्न से किसी प्रयोजन की पूर्ति के लिये विशेषणों को प्रदर्शित किया जाता है। मगर संज्ञा कोई उपार्जित चीज नहीं है, वह सहज है। वह स्वयं है। संज्ञा का प्रदर्शन संभव नहीं है। संज्ञाओं की कोई नुमाइश् नहीं लगाई जा सकती। नुमाइश तो केवल कुछ खोजी गई, गढ़ी गई, उत्पादित और पुनरुत्पादित चीजों की लगाई जाती है। सम्भ्यता के लिये प्रदर्शन और प्रदर्शनी का कुछ मूल्य और महत्व हो तो हो संस्कृति के संसार में इसका कुछ भी अर्थ नहीं है।
सहज के बारे में ग्लानि या गर्व का वास्तविक अर्थ में कोई और चित्य नहीं दिखता है। स्वयं के बारे में स्वयं के लिये ग्लानि या गर्व का कोई अर्थ नहीं होता। स्वयं के लिये ग्लानि या गर्व का विषय अपने कृत्यों का दूसरों के जीवन पर होने वाले प्रभाव का परिणाम ही निर्धारक हो सकता है। हमारे अस्तित्व की अभिव्यक्ति से हमारे समय की सामाजिक अस्मिता को कितना सुख, समृद्धि और संतोष मिलता है यही हमारे लिये गर्व का कारण हो सकता है। इसके विपरीत ग्लानि का। यह हमारे हिन्दू होने के सन्दर्भ में भी हमें अर्थ प्रदान करता है। हमारा होना हमारे पड़ोस के लिये क्या अर्थ रखता है, हमारे गाँव के लिये क्या अर्थ रखता है, हमारे देश के लिये क्या अर्थ रखता है, दुनियाँ के लिये क्या अर्थ रखता है, इसकी खोज हमारे में पैदा होनी चाहिए। हमारे हिन्दू होने से हमारे समय के सामूहिक जनजीवन में क्या अन्तर्क्रिया घटित होती है और उन क्रियाओं का परिणाम हमारे समय के विकास को कितना प्रभावित करता है, यह जानना हमारे लिये बेहद जरूरी है।
कभी-कभी ऐसी भी स्थितियां आती हैं, जब मुझे सोचना पड़ता है कि मैं हिन्दू हूँ या कि मुझे हिन्दू बनना है। जब भी मैं सोचता हूँ मुझे पीड़ाजनक हँसी आती है। बनना तो हमेशा ही झूठा और नकली होता है। हम बन वही सकते हैं जो हम नहीं हैं। जो हम हैं ही उसके बनने का सवाल कहाँ उठता है। हर बार मुझे लगता है मैं हिन्दू हूँ ही, बनना क्या है। बार-बार ठहर कर यह भी देखता हूँ कि मेरा हिन्दू होना कैसा है? क्या मेरा हिन्दू होना मुस्लिम होने का विलोम तो नहीं है? मैं पाता हूँ बिल्कुल नहीं है। मैं देखता हूँ मेरा हिन्दू होना किसी मुसलमान के सम्मुख कुछ दूसरा, हिन्दुओं की भीड़ में कुछ दूसरा और अपने एकान्त में कुछ दूसरा तो नहीं है? अगर है तो गड़बड़ है। नहीं है तो ठीक है। मैंने जब जब भी देखा है अपना हिन्दू होना अलग-अलग नहीं लगा है।
कभी-कभी ऐसा भी सोचना पड़ता है कि अपने हिन्दू होने को छिपा लेना या उपेक्षित कर देना अपने बौद्धिक होने, लोकतांत्रित होने, धर्म निरपेक्ष होने और साहित्यकार होने के लिये जरूरी है क्या? मैं जब भी सोचता हूँ मुझे ऐसा सोचना पाखण्डपूर्ण लगता है। मैं जो हूँ, उसे छिपाना पाखण्ड है। उसे दिखाना भी पाखण्ड है। क्या छिपाने और दिखाने से अलग कोई स्थिति नहीं है? जरूर है। मुझे लगता है, वह स्थिति इन स्थितियों से अधिक सम्मानजनक समझी जाने योग्य है। हम जो है, ईमानदारी से वह होकर ही दूसरों के लिये उपयोगी और सहिष्णु हो सकते हैं।
किसी भी व्यक्ति के लिये एक साथ एक से अधिक या सभी धर्मों के प्रति समान भाव रखने की परिकल्पना मानवीय स्वभाव और क्षमता के हिसाब से केवल भाषिक प्रवंचना के अलावा और महत्व नहीं रखती। किसी भी व्यक्ति का सभी धर्मों की प्रार्थनाओं और प्रार्थना पद्धतियों का व्यवहार, एक प्रशंसनीय किन्तु अवास्तविक छलना से अधिक नहीं प्रतीत होता। विभिन्न धर्मों के बीच विद्वेष विहीन सहिष्णुता के अलावा मेल-मिलाप के अन्य उदार-प्रत्ययों का वैचारिक प्रदर्शन वस्तुतः मुझे अवास्तविक और पाखण्डपूर्ण ही लगता है। प्रायः धर्मों के आपसी संघर्ष वास्तव में धर्म के नहीं सत्ता के संघर्ष होते हैं। सत्ता के संघर्ष को धर्म के संघर्ष के रूप में प्रचारित और प्रतिष्ठित करना मनुष्य जाति के लिये ऐतिहासिक अपराध से भिन्न नहीं है। धर्म को लेकर राजनीतिक प्रयोजन से संघर्ष की उदारतावादी और संकीर्णतावादी दोनों तरह की अवधारणाएँ वैचारिक अपराधीकरण की प्रवृत्ति की ही प्रवर्तक हैं। मैं हमेशा अनुभव करता हूँ कि अपने धर्म के प्रति अडिग आत्मिक आस्था के साथ दूसरे के धर्म के प्रति विद्वैष विहीन भाव स्थिति की उपलब्धि ही सामाजिक समरसता के लिये युग धर्म का सर्वोत्तम और स्वाभाविक मानक बन सकता है।
मैं जब-जब परीक्षण करता हूँ मेरा हिन्दू होना किसी के लिये भी चाहे वह हिन्दू हो, मुसलमान हो, सिक्ख-ईसाई हो, असुविधाजनक साबित नहीं होता। हिन्दू होने की वजह से आज तक मुझे किसी का मुसलमान होना या अन्य कुछ भी होना असुविधाजनक नहीं लगा है। मैं हमेशा ही अनुभव करता हूँ कि जिसका होना और किसी के लिये कठिनाई और दुख पैदा करने वाला नहीं है, अभिनन्दनीय है। हिन्दू होने से हिन्दू बना बिल्कुल भिन्न है। मुसलमान होने से मुसलमान बनना बिल्कुल अलग है। किसी को पीड़ा पहुँचाने के लिये कुछ भी बनना निन्दनीय है। यह सच है कि हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे के समानार्थक नहीं है। मगर एक-दूसरे के विलोम भी नहीं है। फिर भी पता नहीं कैसे हमारे देश में हिन्दू और मुसलमान को एक-दूसरे के विलोम की तरह समझे जाने की समझ अब भी बनी हुई है। हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है।
मुझे लगता है, इस स्थिति के लिये उदारतावादी और संकीर्णतावादी दोनों ही तरह के विचार समान रूप से अपराधी की भूमिका में खड़े हैं। भिन्नताओं से आँख मूँदकर संस्कार की प्राकृतिक शक्ति की अनदेखी करके एक में मिलाने की उदार सोच भी सच्ची और ईमानदार नहीं है। बनावटी है। असंभावित है। भिन्नताओं को जड़ीभूत और परिहार्य मानकर विद्वेशपूर्ण अलगाव की अनिवार्यता को अंगीकार करने की संकीर्ण सोच भी अयथार्थ और अनर्थकारी हैं यह मनुष्य उदात्तता का तिरस्कार करती है। उसे क्षुद्र बनाने षड़यंत्र रचती है।
मैं अनुभव करता हूँ कि हिन्दू होकर भी हिन्दू न होने से हम मुसलमान के निकट नहीं हो सकते। हम जो हैं, वह होकर ही, उसके होने की सच्चाई को स्वीकार करके ही एक-दूसरे के प्रति हार्दिक, सहिष्णु और मैत्रीपूर्ण हो सकते हैं। मुझे लगता है, भारतीय हिन्दू और भारतीय मुसलमान होने से पारस्परिक द्वेष दूर हो सकता है। द्वेष मिटने से मैत्री का विकास सहज संभव है। मैं अपने हिन्दू होने के अर्थ की तलाश में भिन्नताओं के साथ सुखद साहचर्य की संभावनाओं की उत्सुक प्रतीक्षा में डूब जाता हूँ।
संभावनाओं की प्रतीक्षा में डूबकर देखता हूँ बहुत से सवाल सिर उठाये डूबते-उतराते दिखाई देते हैं। अपनी आत्मचेतना में कई-कई सवाल और संदेह टकराने लगते हैं। मेरा मन मुझसे पूछने लगता है, क्या मेरा हिन्दू होना मेरे पर ही निर्भर होगा या अपने हिन्दू होने को ढाँचागत अवधारणाओं से प्रमाणित कराना होना? मेरे सामने तमाम तरह के हिन्दू अपनी विविधता और बहुलता की पहचानों के साथ खड़े हो जाते हैं। एक हिन्दू वह भी है, जो आचार-व्यवहार की कर्मकाण्डी प्रथाओं का पोषक हिन्दू है। एक हिन्दू वह भी है, जो बाह्य आचार-व्यवहारों में विश्वास न रखने के बावजूद अपनी आस्था में हिन्दू है। एक हिन्दू वह भी है, जो आत्मचेतना के उत्कर्ष की असीम संभावनाओं के मार्ग का अन्वेषी है। एक वह भी है, जिसे लिये नियामक सिद्धान्त अपर्याप्त हैं। एक वह भी है, जिसके लिये नियामक सूत्रों की अनिवार्यता बेहद अर्थपूर्ण है। आत्मिक धरातल के भिन्न-भिनन स्तरों पर अधिष्ठित और व्यवहार के अनेकानेक धरातलों पर स्थित विचार बदुल समूहों में समन्वित हिन्दू जाति की विविध वर्णी व्यापकता मेरे हिन्दू होने के बोध को उल्लसित करती है। विचारों की भिन्नता के बावजूद जीवन बोध के अनुभवों के लिये उन्मुक्त अवकाश की उपलब्धता हिन्दू जाति का अक्षुण्ण गौरव है। हिन्दू होना मनुष्य जाति के अभ्युदय के लिये सीमाओं के अतिक्रमण का वह अदम्य अभियान है, जो कभी रुकने वाला नहीं है। इस अभियान का आमंत्रण मुझे हमेशा उत्प्रेरित करता है।
आत्मिक धरातल पर उपासना के भिन्न-भिन्न मार्गों से होकर एक ही जगह पहुँचने के रामकृष्ण परमहंस के प्रयोग मेरे हिन्दू होने के अर्थ को विस्तार देते हैं। विवेकानन्द की आत्मदर्प से उन्मुक्त उद्घोषणाएँ स्वाभिमान को जागृत करती हैं। उनकी दरिद्रनारायण की व्यापक करुणा धर्म को नयी प्रासंगिकता प्रदान करती है। फिर भी आत्मगत उपलब्धियों की सामाजिक अभिव्यक्ति कैसे हो, यह चुनौती हमेशा ही नयी बनकर नये-नये रूप में ललकारती रहती है।
मेरे लिये हिन्दू होने का अर्थ केवल उदात्त मूल्यों के उत्कृष्ट रूपों का यशगान नहीं है, बल्कि सिद्धान्तों की श्रेष्ठा के व्यावहारिक जीवन में रूपान्तरण की प्रक्रिया का संधान भी है। अपने अनुभव और विश्वास की पूँजी को व्यापक सामूहिक उत्कर्ष के लिये सार्वजनिक बना सकने की विधियों का अनुसंधान मुझे अपने हिन्दू होने के अर्थ की तलाश में प्रवृत्त करता है। व्यापक और वृहत्तर पारिवारिकता की पृष्टभूमि की प्रतिष्ठा मेरी खोज की उत्प्रेरणा है।

परदेश को उठे पाँव

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल।

संकट है। चहुँओर संकट है।
चिड़िया के लिये चारा नहीं है। पंछी के लिये पानी नहीं है। पंथी के लिये छाँह नहीं है। आस्था के लिये कहीं कोई आश्वासन नहीं है।
जवानों के लिये रोजगार नहीं है। वृद्धों के लिये कोई सहारे क संबल नहीं है। दुध-मुँहों के लिये दुलार नहीं है। कहीं कोई हास-हुलास नहीं है।
खेतों के गिरे हुये, बचे हुये अन्न आग के हवाले कर दिये गये हैं। तालाबों, पोखरों के मुँह न जाने कबके सूखे हैं। छाँहों के सारे ठाँव राजाज्ञा की निगरानी में नजरबन्द हैं। आस्था के वृक्ष जंगलराज के ठेकेदारों के हाथ में जा चुके हैं।
चिड़िया कहाँ रहें? कैसे रहें? न रहें तो कहाँ जायँ? जायँ तो कैसे जाय? बड़ा संकट है। संकट है कि- ‘‘का खाईं, का पीहीं, का ले परदेश जाईं?’’
देश में रहना न हो सकेगा तो परदेश जाना ही पड़ेगा। हमारे समय में पूरे के पूरे गाँव ही परदेश जाने को पाँव उठाये खड़े हैं।
हमारे गाँव बड़े-बड़े शहरों के परदेश रोज-रोज जाने का मंसूबा बाँधते हैं। जाते हैं, जाकर अपनी पहचान खो देते हैं। गाँव शहर में जाकर खो जाते हैं। खप जाते हैं।

हमारे गाँव के जवान बड़े-बड़े शहरों की छोटी-छोटी फैक्टरियों के मजदूर बनकर अपना मुँह छिपाने को बेबस हैं। वृद्ध ए0टी0एम0 के मुँह जोहने को विवश हैं। जो अभी नहीं जा पाये हैं, वे भी जाने को पाँव उठाये खड़े हैं। न जायें तो क्या खायें? क्या पीयें? जायें तो, क्या लेकर परदेश जायें?
खेत गिरवी हैं। गहने ब्याज के बन्दीगृह में कैद हैं। काम पाने के लिये एजेण्टों की चिरौरी-मिनती चालू है। एजेण्ट पत्थर दिल है।
चिड़ियाँ परदेश जाना चाहती है। जवानी परदेश जाना चाहती है। कुल मिलाकर पास में एक चना है। चना दाल दलने के लिये चाकी में डाल दिया गया है। चाकी में एक चने की बिसात ही क्या। दाल चाकी के किल्ले में फंस गई है। अटक गई है।
चिड़िया बढ़ई के यहाँ गुहार लगाती है। बढ़ई किल्ला फाड़ दे तो दाल निकल आये। मगर नहीं, बिगड़ैल बढ़ई नहीं सुनता।
हमारे समय में फरियाद डालने के लिये भी जुगाड़ की जरूरत है। सिफारिश का जोर चाहिये। फिर फरियाद सुनने के लिये घूस चाहिये। काम पाने के लिय, काम की पगार पाने के लिये पगड़ी चढाने का बूता चाहिए। पगड़ी चढ़ाने के लिये सिर्फ एक चना है। चना चक्की के किल्ले में फँसा है। क्या लेकर परदेश जाय।
परदेश जाना लाजिमी है। मगर क्या लेकर? लेकर जाने को कुछ नहीं है। जो है, चक्की में है। जो है, चक्की के किल्ले में फंसा है।
परदेश में कौन, किसका सगा-सम्बन्ध्ी है, कोई नहीं। जिसके बाप में कोई कूबत नहीं है, उसे हर किसी को बाप बनाना है। कोई बाप बने न बने, दीगर बात है। मगर बनाना है। हमारे समय की जवानी लावारिस जवानी है। हमारे समय के बाप बिना कूबत के बाप हैं। अपने बापों की विवशता से कुपोषित जवानी पत्थरों के आगे बाप-बाप चिल्ला रही है। पत्थर सुन नहीं रहे हैं। फिर? बुरा हाल है।
जहाँ भूख है, भोजन नहीं है। जहाँ प्यास है, पानी नहीं है। जहाँ भोजन है, भूख नहीं है। जहाँ पानी है, प्यास नहीं है। जहाँ हाथ है, काम नहीं है। जहाँ काम है, हाथ नहीं है। जहाँ आँख है, सपने नहीं है। जहाँ सपने हैं, आँख नहीं है। बड़ा विपर्यय है। मगर है। हमारे समय में बहुत कुछ नहीं है मगर विपर्यय हर कहीं है।
विपर्यय में ही जीना है। रोज-रोज उधर जाती सीवन को रोज-रोज सीना है। फिर भी विकास की घुट्टी हमें पीना है। हम विकास के पथ पर अग्रसर है। हमारे गाँवों में उजाड़ का निरन्तर विकास हो रहा है। गलियों और चौपालों में सन्नाटे का बराबर विकास बढ़ रहा है। आपस में अपरिचय का, असंवाद का विकास बढ़ रहा है। चौड़ी-चौड़ी सड़कों के विस्तार में दुर्घटनाओं में बेशुमार विकास हो रहा है। दुर्घटनाओं में घायलों और मृतकों के लिए ट्रामा सेण्टरों का विकास बढ़ रहा है। किसिम-किसिम के स्कूलों में हर साल बढ़ती फीसों का विकास बढ़ रहा है। अलगाव और असुरक्षा का विकास तो बाढ़ की तरह उफन रहा है। भला कौन कह सकता है कि विकास नहीं बढ़ रहा है।
नहीं बढ़ रहा है, तो पारस्परिक विश्वास नहीं बढ़ रहा है। कर्तव्यबोध नहीं बढ़ रहा है। देश प्रेम नहीं बढ़ रहा है। जीवन की सुरक्षा नहीं बढ़ रही है। आश्वस्ति के आश्रय नहीं बढ़ रहे हैं। मगर इनके बढ़ने, न बढ़ने से हमारा विकास प्रभावित होने वाला नहीं है। लूट का, दलन का, दमन का विकास तो जंगल-जंगल गूँज रहा है। नदी-नदी, पहाड़-पहाड़ गरज रहा है।
बहुत लोग हैं, जिनका कहने-सुनने से विश्वास उठता जा रहा है। कहने को बहुत कुछ है, मगर किससे? जिनसे कहना है, उन्हें सुनने में कोई रूचि नहीं है। जिन्हें सुनना है, वे कान में तेल डाले बोलने के व्यापार में लगे हैं। जो कुछ सुन सकते हैं, उनसे कुछ भी कहना व्यर्थ है। फिर? फिर क्या, जो है सो है।
चिड़िया चाहे, जितनी चिल्लाये कोई सुनने वाला नहीं है। वह जितनी चिरौरी करे कोई पसीजने वाला नहीं है। सुनने वाला कोई नहीं है। चिड़िया की फरियाद कोई नहीं सुनेगा, न बढ़ई, न लाठी, न भाड़, न समुद्दर, न हाथी, न साँप, न रानी। हमारे पुरानी लोककथा की चिड़िया हमारे समय की चिड़िया नहीं है। हमारे समय की चिड़िया, कहानी की चिड़िया से अधिक अभागी है। कहानी के समय से हमारे समय में अभाग का विकास बहुत आगे बढ़ चुका है।
परदेश जाना चाहो जाओ। कैसे जाना है, तुम जानो। जाना चाहो खाली हाथ चले जाओ। रहना चाहो, खाली पेट रहो। जैसे भी रहना हो, रहो मगर चुप रहो। बस बोलो मत। बोलने से कानून व्यवस्था प्रभावित होती है। कानून-व्यवस्था में बाधा डालना अपराध है। अपराध के लिये सजा है। बोलोगे, तो सजा मिलेगी। और कुछ मिले, न मिले सजा जरूर मिलेगी। हमारे समय में सजा सुलभ है। न्याय दुर्लभ है। जो दुर्लभ है, उसे छोड़ो। जो सुलभ है उसे लो।
वोट दे दो। आश्वासन ले लो। आश्वासन को खाओ। आश्वासन को पीओ। आश्वासन को ले परदेश जाओ। परदेश में खो जाओ। परदेश में खप जाओ।
पता नहीं कैसा समय है। अपने ही देश में जाने कितने-कितने परदेश उगे आ रहे हैं। पनपते जा रहे हैं।
अपना देश, परदेश क्यों बनता जा रहा है। सारे जाने-पहचाने अपने, पराये जैसे क्यों बनते जा रहे हैं। अपना गाँव अपने गाँव जैसा क्यों नहीं है? अपने बाप, बाप जैसे क्यों नहीं हैं? अपनी सरकार अपनी सरकार जैसी क्यों नहीं है?
बहुत से सवाल हैं, गाँव-गाँव, गली-गली बौड़िया रहे हैं। सवाल बवण्डर की तरह उठ रहे हैं। धूल-गर्द फैला रहे हैं। आँखों में भरे आ रहे हैं। आँखें किरकिरा रही हैं। कुछ सूझ नहीं रहा है। सब पहचाने, अनपहचाने से बनते जा रहे हैं।
केवल चिड़िया नहीं, केवल जवान नहीं, केवल जवानी नहीं केवल बुढ़ापा नहीं, पूरा का पूरा गाँव, पूरे के पूरे गाँव परदेश जाने को पाँव उठाये हुये हैं।
हर कोई, हर किसी से पूछ रहा है- ‘का खाईं, का पीहीं, का ले परदेश जाईं?’’
कोई जवाब नहीं है। कहीं कोई जवाब नहीं है। कहीं से कोई जवाब नहीं उठ रहा है।
सवाल उठ रहे हैं। एक नहीं, दो नहीं। हजार-हजार, लाख-लाख, करोड़-करोड़ सवाल उठ रहे हैं। हमारे समय में आदमी सवाल में बदलता जा रहा है।
हमारे समय में भोजन, सवाल में बदलता जा रहा है। वस्त्र, सवाल में बदलता जा रहा है। दवा, सवाल में बदलती जा रही है। शिक्षा, सवाल में बदलती जा रही है।
हमारे समय में हर आदमी अपने ही घर में प्रवासी बनता जा रहा है। घर-घर में एक परदेश घुसने के लिये पाँव उठाये खड़ा है। हर घर, परदेश जाने को पाँव उठाये है।

दरद न जाने कोय

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल।

एक ऐसे दर्द को हमेशा साथ लेकर रहना, जिसे कोई नहीं जानता कैसा होता है? यदि कभी पूछने का मन हो तो मीरा से जरूर पूछिए।
इसी दर्द का इतिहास कविता का इतिहास है। इसी दर्द का जीवन मीरा का जीवन है। जो लोग कविता को कागज पर लिखने की चीज मानते हैं, कविता उन्हें नहीं जानती। मगर कविता मीरा को जानती है। इसलिए कि कविता में मीरा उस दर्द को कह सकी हैं। जो कहने में नहीं आता मगर फिर भी कहा जाता है, शायद उसे ही हम कविता के नाम से जानते हैं। कविता भरी हुई गागर से छलक कर बाहर आ जाने की सहज विवशता के रस के छींटे की तरह है। छींटे ही संघनित होकर धार बन जाते हैं। धार-धार से प्रवाह बन जाता है। कविता का अजस्र प्रवाह जाने कबसे प्रवाहित है। जाने कब तक प्रवाहित होता रहेगा। इस प्रवाह में सब तरह का रस है। वेदना का रस है, उत्ताप का रस है, आक्रोश का रस है, अनुक्रोश का रस है। संताप का रस है, संघर्ष का रस है। राग का है, अनुराग का है। उल्लास का है, उत्साह का है, संतोष और तोष का भी है। प्यास का भी है और परिप्लुति का भी है। बड़ा मुश्किल है गिन पाना है। मनुष्य का पूरा जीवन ही कविता का जीवन है। मीरा की कविता मनुष्य के विदग्ध जीवन की कविता है। विदग्धता सूक्ष्मतम अनुभूतियों को आत्मसात करने की योग्यता है। गीत कविता सूक्ष्मतम अनुभूतियों की संवाहक कविता है। मीरा की कविता का घनत्व बहुत ज्यादा है।
घनत्व ज्यादा होने से मीरा की कविता वजनी कविता है। मीरा की कविता वजनदार कविता है। उनकी कविता तीव्रतम छटपटाहट की कविता है। अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए विकल्प विहीन स्थितियों में रास्ते की तलाश का आवेग उनकी कविता में है। मीरा की कविता में आन्तरिक और बाह्य स्थितियों का अद्भुत समायोजन है। चेतना के आन्तरिक धरातल की बेचैनी के साथ जीवन के बाह्य स्थितियों की परेशानी को मीरा एक साथ व्यंजित कर सकने वाली काव्यभाषा की अद्भुत आविष्कारक रचनाकार हैं। बिना किसी बक्रोक्ति के, बिना किसी व्याजोक्ति के मीरा ने जीवन के दर्द को जिस तरह व्यक्त करने की सामर्थ्य हासिल की है, कविता में वह अलम्य है। मीरा की कविता की भाषा में जो बेधकता है वह उनके जीवन के ताप को अपने में पूरी तरह धारण कर सकने की योग्यता के कारण है। इसी कारण मीरा के शब्द हृदय को बेध सकने में समर्थ हैं जैसे शिरीष हीरा को बेधने में।
मीरा की कविता में जो दुख है, उसके केन्द्र में न समझे जाने का दुख है। जो स्वयं को समझने की प्रक्रिया में तल्लीन है मगर कुछ भी समझने के प्रयास से विरत लोगों की भीड़ में घिरा है। जो नितांत समझे जाने योग्य है, मगर वह अपने को समझदार कहने वालों की समझ में समझने के दायरे से बाहर की चीज है। अपने सुख से व्याकुल, अपनी मर्यादा के भार से मूर्छित दुनिया, जिन्दगी को अपने समझ के वृत्त से बाहर रखकर विमोहित है। उसकी समझ की परिधि में जीवन नहीं है, महल है, सिंहासन है, राज्य है, राज्य की सीमा है, शस्त्र हैं, शस्त्रागार हैं। यह सब जीवन नहीं है, जीवन का खेल है। मीरा के लिए जीवन खेल नहीं है, मेल की उपासना का माध्यम है। फिर भी मीरा की कविता में कहीं विरोध नहीं है। विरोध में नकार है। नकारात्मकता है। मीरा की कविता स्वीकार की कविता है। अपार स्वीकार के विधायक प्रवाह में सारे नकार अपने आप बह जाते है। बिला जाते हैं। मीरा की कविता में जीवन की जड़ता के प्रति, नकारात्मकता के प्रति क्रोध नहीं है, क्षोभ है, करुणा है। नासमझी के प्रति करुणा, विरोध और विद्रोह से बड़ी चीज है। बहुमूल्य चीज है। मीरा की कविता बहुमूल्य कविता है।
मीरा की कविता इसलिये बहुमूल्य कविता है कि वह इन्कार की नहीं, उपलब्धि की कविता है। उनकी कविता बहुत कुछ को नकारने के मकसद की कविता नहीं है। बात यह है कि उनकी आन्तरिक बेचैनी उन्हें ऐसे सत्य की आन्तरिक उपलब्धि से समृद्ध बना देती है कि उसके सापेक्ष्य बहुत-सी मूल्यवान समझे जाने वाले मूल्य अपने आप निरस्त और व्यर्थ हो जाते हैं। मीरा की कविता अपनी आन्तरिक जरूरतों से उपजी कविता है। जब किसी रचनाकार की आन्तरिक जरूरत अपने समय के व्यापक जीवन की आन्तरिक जरूरत से अभिन्न तौर पर संपृक्त हो जाती है, रचना की मूल्यवत्ता बहुत बढ़ जाती है। जीवन के ऊपरी स्तर पर जितनी ही समाज में भिन्नता दिखाई पड़ती है गहन और सूक्ष्म स्तर पर उतनी की एकता स्थित होती है। मीरा की कविता जीवन के गहन और सूक्ष्म स्तर की कविता है। इसीलिये मीरा का बोध, व्यापक काल का बोध बन जाता है। मीरा की कविता जितनी अधिक मध्यकालीन है उतनी ही अधिक वह आधुनिक भी है। आधुनिक का एक अर्थ बराबर बने रहने वाला भी होता है। अपने बोध में बराबर बने रहने वाले बोध को व्यंजित करने वाली कविता मूल्यवान और महत्वपूर्ण कविता होती है। मीरा की कविता का बोध बराबर बने रहने वाला बोध है।
मध्यकालीन काव्य बोध और आध्ुानिक काव्य बोध में सबसे बड़ी भिन्नता चेतना के धरातल की भिन्नता है। मध्यकाल के रचनाकार का काव्यबोध उनका जीवन बोध भी है। मीरा ने मेवाड़ के राजवंश की मर्यादा को खण्डित करने के लिये कुछ भी नहीं किया। मीरा अपनी आन्तरिक चेतना में प्रेम के रस ऐश्वर्य से इस कदर भर गयी थीं कि चेतना की ऊपरी सतह पर सजने वाली सारी खोखली मर्यादाएँ रसहीन और व्यर्थ हो गई थी। उनके लिये मीरा के जीवन में कोई जगह नहीं बची थी। उनके जीवन में उनका कोई वजूद ही नहीं था। कोई मूल्य ही नहीं था। कोई महत्व ही नहीं था। मीरा उनसे बहुत आगे, बहुत दूर निकल गईं और वे बहुत पीछे छूट गईं। वे मूल्य, वे मर्यादाएं मीरा द्वारा परित्यक्त हैं। वे केवल मीरा के परित्याग के कारण ही तिरस्कृत हैं। उनके तिरस्कार का कोई उद्योग मीरा की कविता में नहीं है।
मीरा की कविता प्रेम निवेदन की कविता है। अपनी अभीप्सा के प्रति अपार अनुरोध की कविता है। प्रतिवेदन की कविता है। अपने प्रेम के सम्मुख अगाध आत्मसर्मण की कविता है। उन्हें अपनी आँखों से, वह सबकुछ देखने में कोई रूचि नहीं है, जिसे दुनियां देखने के लिए ललचती रहती है। उन्हें अपनी आँखों में दुनियाँ के दुलारे सौन्दर्य को बसा लेने की रूचि ही नहीं है। उनकी उत्कण्ठा है केवल अपरूप सौन्दर्य को अपने में पा लेने की। वह सौन्दर्य जो कभी पुराना नहीं पड़ता। जो कभी बासी नहीं होता। जो हमेशा ताजा बना रहता है। क्षण-क्षण नया होता रहता है। मीरा उस सौन्दर्य की उपासक हैं, जिसका पान कर लेने से प्यास नहीं बढ़ती है। परितोष बढ़ता है। वे उस सौन्दर्य के अधिष्ठता से अनुनय करती हैं- ‘‘बसो मेरे नैनन में नन्दलाल।’’
अपरूप सौन्दर्य के अधिष्ठाता नन्दलाल की झलक जैसे ही झलकती है, मीरा की आँखों में, उन्हें विह्वल कर देती है। विह्वलता उनमें उन्मत्त हो उठती है। आह्लाद के घुँघुरू उमंग की डोरी में कस जाते हैं। शब्दों के पाँव थिरक उठते हैं। ध्वनियों की झंकार बज उठती है। संगीत बह पड़ता है। शब्द सन्नाटा तोड़ने के लिए नहीं जनमते। वे तो जनमते हैं, हृदय का द्वार खुल जाने से। हृदय का द्वार खुल जाता है तो उसमें प्रेम के पियूषवर्षी मेघ भर जाते हैं। वे बरसने लग जाते हैं। वे बरसने लग जाते हैं और शब्द जनमने लग जाते हैं। शब्दों के जनमने से सन्नाटा अपने आप टूटने लग जाता है।
प्रेम की उपलब्धि मृत्यु के उपरान्त ही होती है। मृत्यु का भय मिटने का भय है। मिटने के भय को मिटाकर ही प्रेम के साम्राज्य में प्रवेश मिलता है। प्रेमी के लिये विष का कोई मतलब नहीं होता। विष का कोई प्रभाव नहीं होता। दुनियां का कोई भी जहर उसके लिये कुछ भी महत्व नहीं रखता। उसे मार नहीं सकता। जिसने अपने को स्वयं मार दिया है, उसे कोई क्या मारेगा? कैसे मारेगा? उसे मारने का कोई उपाय नहीं है। मरना बार-बार होता है क्या? नहीं मरना सिर्फ एक ही बार होता है। मिटना एक ही बार होता है। विलय केवल एक ही बार होता है। प्रेम विराट है, अविनश्वर है। विराट में विलय के बाद नश्वर अस्तित्व का कोई वजूद नहीं रह जाता। नश्वर अस्तित्व को नष्ट करने वाले सारे विष उसके लिये व्यर्थ हैं। तभी मीरा विष पीकर भी मगन हो सकीं। मीरा की कविता विष पीकर भी मगन हो उठने वाली कविता है- ’’राणा विष को प्यालो भेंजो
पीय मगन सो होई।’’
विष पीकर मरते तो सुना गया है, दुनिया में। मगर विष पीकर नाचन अनसुना है। मीरा की कविता अनसुने सत्य की कविता है। मीरा की कविता रूप के श्रृंगार की कविता नहीं है। वह अस्तित्व के श्रृंगार की कविता है। मीरा के पांवों में आनन्द के घुघरूँ बंधे है। मीरा और किसी से नहीं बंधी है। वे आनन्द से बंधी है। दुनिया आनन्द के आलोड़न में नृत्यमग्न मीरा को बावली समझती है। मगर मीरा अकेले ऐसी बाबली है, जिसे पता है कि वह बावली नहीं है। अपनी सास के लिए मीरा ‘कुलनासी’ हैं। मीरा के साथ उनकी सास का रिश्ता वही रिश्ता है, जो आनन्द के साथ उद्वेग का होता है। आनन्दिता के उपजते ही उद्विग्नता के कुल का नाश हो ही जाता है, अनप्रयास ही। उद्विग्नता में दुनिया के सारे दर्द समाये हुये हैं। जो अपनी ही आशंकाओं और अपने ही संशयो के विष से विमोहित दर्द से तड़प रहा है, वह दूसरे के दर्द को कैसे सुन सकता है। कैसे समझ सकता है? कैसे जान सकता है।
जो दर्द कोई नहीं जानता, वह कुछ पाने का दर्द नहीं है। कुछ खोने का दर्द नहीं है। वह कुछ होने का दर्द है। कुछ होने का दुख कविता का दुख है। कुछ बोने का सुख कविता का सुख है। मीरा की कविता कुछ होने की प्रक्रिया में निर्मित होने वाले दर्द की कविता है। जो इस प्रक्रिया में शामिल नहीं है, वे इस दर्द को नहीं जानते। नहीं जान सकते। प्रेम में होने की प्रक्रिया, मीरा के जीवन की प्रक्रिया है। प्रेम के धरातल पर अधिष्ठित होने का अभिक्रम मीरा के जीवन का अभिक्रम है। बड़ा कठिन अभिक्रम है। इसी कठिन अभिक्रम के बारे में कबीर ने कहा है – ‘‘सूरा होना सरल है, घरी पहर का काम। साधू होना कठिन है, आठ पहर संग्राम।।’’
साधू होना प्रेम में होना है। अपनी अस्मिता को मिटाकर व्यापक जीवन-जगत की अखण्ड अस्मिता में विलीन होना है। शूली के ऊपर सेज सजाने प्रेम का अभिक्रम का अभिक्रम है। शूली के ऊपर सुहाग की सेज का मर्म जो जानता है, वही प्रेम के राज्य में पांव धरने का जोखिम उठा सकता है। शूली पर चढ़ने के दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने का साहस सिर्फ प्रेम में है और किसी में नहीं। इसी साहस की खोज मीरा की कविता की खोज है। मीरा की खोज उस प्रविधि की खोज है, जिससे शूली सुहाग की, सौभाग्य की सेज बन जाती है।
प्रेम के बाजार में मीरा ने गोविन्द को खरीद लिया है। उन्होंने वाजिब कीमत चुकाकर खरीदा है। मीरा का प्रेम मुकम्मल कीमत चुकाकर हासिल हुआ प्रेम है। न सस्ते में किसी चालबाजी के सहारे लिया गया है, न दांत निपोर कर महंगी कीमत चुकाकर। मीरा ने बड़े गर्व का सौदा किया है, गोविंद के साथ, बड़े गौरव का सौदा किया है। न कोई दीनता, न कोई गिड़गिड़ाहट न व्यर्थ की विनय न कोई निहोरा। बराबर का दिया और उसी बराबर का लिया। न रत्ती भर कम न माशा भर ज्यादा। मीरा ने अपने को पूरा-पूरा दे दिया और पूरा-पूरा देकर गोविंद को पूरा ले लिया। मीरा जैसा प्रेम कहां है कहीं। नहीं है, न सूर के पास, न तुलसी के पास। न कबीर के पास न रैदास के पास। मीरा का प्रेम पूरे भक्ति काव्य के प्रेम से विलग है। विलक्षण है। मीरा का प्रेम, प्रेम को नया आयाम देता हुआ प्रेम है। नई दिशा, नई ऊँचाई, नया मूल्य, नई गहराई और नया गौरव। मीरा का प्रेम अपने युग को फलॉगकर आने वाले समय को आमंत्रित करता प्रेम है। मीरा की कविता काल के कोप में प्रेम को पलुहित करने वाली कविता है। मीरा के प्रेम में आत्मदर्प की अद्भुत दमक है।
मीरा की कविता भिन्नता के प्रतिभास में अभिन्नता के बोध की कविता है। अभिन्नता का बोध ही प्रेम की कोख है। अभिन्नता की जमीन में ही प्रेम अंकुरित होता है। पलुहित होता है। पुष्पित होता है। फलित होता है। स्त्री-पुरूष का भेद, राजा-प्रजा का भेद, धनी-गरीब का भेद, सबल-निर्बल का भेद यानी भेद की, भिन्नता की समूची सत्ता ही तिरोहित हो जाती अभेद की, अभिन्नता की अखण्ड अस्मिता में। मीरा की कविता में अभिन्नता का बोध चेतना की गहराई में आत्मगत है। वह समाज सुधार की बौद्धिक अवधारणा की तरह धारण किया विचारगत प्रभाव नहीं है। विचारगत प्रभाव की उत्प्रेरणा जीवन व्यवहार में स्थिर नहीं हो पाती। शायद इसी कारण से प्रायः सामाजिक आन्दोलन कम समय में ही प्रभावहीन हो जाते हैं। कविता की जीवन ऊर्जा के स्रोत प्राणियों के प्राणों की गहराई से जुड़े होते हैं, इसीलिये कविता कभी प्रभावहीन नहीं होती। मीरा की कविता प्राणों में स्पन्दन का संचार करने वाली कविता है। मीरा की कविता जीवन की जड़ों की अभ्यर्थना की कविता है। मीरा की कविता, कविता के लिये महलों के बन्ध्या होने के प्रवाद को झुठलाती कविता है। राजमहल के प्रपंच में मीरा की कविता का होना अप्रत्याशित तौर पर सच के अपवाद की अमिट गवाही की तरह से है। युगों से कविता को आतंकित करने के गुमान में अचेत राजमहलों के अभिमान को मीरा की कविता ने हिलाकर रख दिया। कविता की विजय का ध्वज सबसे पहले मीरा ने मेवाड़ के राजमहल पर ही लहराकर अपनी यात्रा की शुरुआत की। राजावंशों के सारे अभियानों का अन्तिम बिन्दु राजमहल होता है। मगर मीरा जिस महनीय जीवन यात्रा की यात्री हैं, उसका प्रस्थान बिन्दु ही राजमहल है। मीरा की कविता की मंजिल के वैभव का अनुमान कुछ-कुछ इसी तथ्य से लगाया जा सकता है।
मीरा की यात्रा अपने अस्तित्व के स्रोत की यात्रा है। अपने अस्तित्व की गहराई में उतरते-उतरते उसके उद्गम के उत्स तक पहुँच पड़ने की यात्रा है। जैसे-जैसे दूरी कम होती जाती है, भिन्नता का भान कम होता जाता है। जैसे-जैसे स्रोत के निकट पहुंचना सधता जाता है, अभिन्नता का बोध बढ़ता जाता है। अभिन्नता के केन्द्र से ही अनगिनत भिन्नता के स्वरूप जीवन की परिधि पर प्रतिभासित होते हैं। जैसे गन्ध के असीम विस्तार के केन्द्र में मलय है, जैसे चांदनी के अछोर विस्तार के केन्द्र में चन्द्रमा है, वैसे ही जीवन की विविध विभिन्नता के केन्द्र में अभिन्नता है। चाँदनी चाँद से भिन्न प्रतिभासित होती है, भिन्न है नहीं। यह भिन्नता का प्रतिभास ही मीरा का दर्द है। मीरा के दर्द का कारण है। जीवन के प्रतिभास को जीवन समझ लेने की वृत्ति मीरा की वेदना का कारण है।
मीरा का दर्द न समझे जाने का दर्द है। जो नितांत समझे जाने के योग्य है, मगर समझने के दायरे से बाहर रखा हुआ है। जिसके सम्मुख होना है, उसके विमुख होना और जिसके विमुख होना है, उसके सम्मुख होना, मीरा का दर्द है। प्रतिभास को जीवन समझ लेना और जीव को प्रतिभास मान लेना मीरा के दर्द की वजह है। जीवन के केन्द्र को छोड़कर परिधि पर जीवन खोजना मीरा की पीड़ा का कारण है। मीरा के लिए दर्द और दवा और वैद्य अलग-अलग नहीं है। भिन्न-भिन्न नहीं है। मीरा के लिये जीवन का आधार ही उनका प्रियतम है। जीवन के आधार से विलग होकर जीने की स्थिति ही मीरा का दर्द है। जीवन के स्रोत से वंचित रहकर भिन्नता के प्रतिभास में जीने की विडम्बना ही मीरा का दर्द है। मीरा के दर्द की दवा दुनिया में नहीं है। दुनिया में सिर्फ दर्द है। दुनिया में प्रेम नहीं है। इस दर्द को जान लेना ही दर्द को दवा बना देता है। दवा को वैद्य बना देता है। दर्द और दवा और वैद्य की अभिन्नता का बोध ही मीरा की कविता का बोध है। वेदना और प्रेम और प्रियतम की अभिन्नता का बोध ही मीरा की कविता का बोध है।
मीरा की कविता अभिन्नता के बोध में व्याप्त गहरे महामौन में गूँजते महानाद की कविता है। भिन्न-भिन्न नादों के निनाद का महानाद में समावेशन ही मीरा की कविता की पीड़ा का उल्लास है। वही उनकी कविता की पुलक है, प्राप्ति है। यही मीरा की कविता का चरितार्थ है।

किवाड़ों पर कान लगाए

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

‘‘अब वे नहीं है।’’ सूचना प्रसारित हो रही है।
 कौन कह रहा है?
 सब कह रहे हैं। टी.वी. कह रही है। रेडियो, अखबार और जो भी कहने वाले हैं, कह रहे हैं।
 ‘ये सब सच कह रहे हैं?
 ‘‘नहीं, ये सच कहने वाले नहीं हैं।
 ‘‘झूठ कह रहे हैं?’’

 कैसे, कहें कि झूठ कह रहे हैं। ऐसा कहना उन सबकी शान के खिलाफ होगा। नहीं, यह तो संविधान के भी खिलाफ होगा।
 ‘‘वे सच भी नहीं कहते। झूठ भी नहीं कहते।
 ‘‘सच भी कहते हैं। झूठ भी कहते हैं।

 ‘‘जो कहते हैं, कई-कई तरह से सच भी होता है। कई-कई तरह से झूठ भी। हमारा समय कैसा अजीब समय है। हमारे समय में जो भी कहने वाले हैं, उनके कहने में सच भी है। झूठ भी है। सच, झूठ में और झूठ, सच में इस कदर मिला-जुला है कि उसे अलग कर पाना मुमकिन नहीं है। खैर।
 जब से मैंने सुना है, पढ़ा है,- हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह, अब नहीं हैं। जब-जब यह सुनी हुई, पढ़ी हुई ध्वनि मेरे भीतर प्रतिध्वनित हो रही है, उनकी कविता की कुछ पंक्तियाँ इस समाचार को झुठलाती मेरी आँखों के आगे उग आ रही है-
       जाऊँगा कहाँ
       रहूँगा यहीं
       किसी किवाड़ पर
       हाथ के निशान की तरह
       पड़ा रहूँगा।
       किसी पुराने ताखे
       या सन्दूक की गन्ध में
       छिपा रहूँगा मैं।
 यह कविता सच है, तो समाचार जरूर झूठे होने चाहिए। मगर अफसोस है कि समाचार झूठ नहीं है। मैं सच और झूठ के इस विशाल तिलिस्म में असहाय उजबक की तरह कभी इधर कभी उधर और कभी कहीं नहीं देखता हुआ बस बैठा पड़ा हूँ।

 चेतना के कबसे बन्द पड़े कपाट पर जाने कबसे बिना थके, बिना घराये, बिना उकताये थाप देते रहने का बूता किसमें हैं? सामर्थ्य किसमें हैं? पौरूष किसमें है? उनके खुलने की सबर से बेखबर केवल थपथपाने की क्रिया में तल्लीनता किसमें है? मनुष्य जाति की सरोकार हीनता के विजड़ित बुलन्द दरवाजे पर एक पैर पर खड़े रहकर उसे खटखटाने का,- खटखटाते रहने का धैर्य किसमें है? कविता में, केवल कविता में। कविता परिणाम की आकांक्षी नहीं है। कविता केवल प्रयत्न में आस्था रखती है। राजनीति परिणाम पाना चाहती है। इसीलिये हमेशा ही राजनीति के लिये आदमी साधन है। साहित्य के लिए आदमी साधन नहीं है, साध्य है। कविता आदमी के जीवन में सघने के लिये है।

 कविता में जो अर्थ की ध्वनि है, वह कोशकारों के प्रकाण्ड प्रयत्न से जीवित और जीवन्त नहीं है। वह इसलिये जीवित और जीवन्त है कि उसमें लाखों-लाख रचनाकारों के प्राणों का स्पन्दन समाहित है। अनगिनत लोगों ने हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में अपने को दलित द्राक्षा की तरह निचोड़ कर अपने समूचे जीवन रस को शब्दों में उलीच रखा है। कविता कवि में अधिकांश, अधिकतर, प्रायः समाहित होती है। मगर कविता में कवि का समाहित हो पाना हमेशा नहीं, कभी-कभी हो पाता है। हिन्दी की आधुनिक काव्यधारा में केदारनाथ सिंह ऐसे कवि हैं, जो अपनी कविता में समाहित हो सके हैं। अपनी कविता में समाहित हो सकने की योग्यता ही उनकी विलक्षणता है। वे विलक्षण ढंग से अपनी कविताओं में मौजूद हैं। उनकी मौजूदगी हमें कुरेदती है, झकझोरती है, झिंझोड़ती है, चिकोटती है, खरोंचती हैं, सहलाती है, बहलाती है, गुदगुदाती है और हममें गुनगुनाती है। वह हममें पेड़ों के, नदी के, चिड़ियों के, पानी के, बादल के, बाजरे के, भुट्टे के, धान के, तरकारी के हास-हुलास और उनकी पीड़ा और उनकी उदासी और उनकी चिन्ता को सुनने की, समझने की केवल भाषा ही नहीं सिखलाती, बल्कि भाषा को धारण करने वाली संवेदना को भी हमारे में जनती है।
 मैं किवाड़ों पर कान लगाये हूँ। किवाड़ों पर थाप में समाई हुई उनकी मौजूदगी बहुत कुछ कहती हुई सुनाई दे रही है। बहुत कुछ, फिर कभी। अभी मैं उनकी कविता ‘पांडुलिपियां’ में बजते ध्वनि संकेतों से प्राप्त इंगितों से अनुबिद्ध हूँ और उसके सन्दर्भ में ही आपसे कुछ अनुरोध करना चाहता हूँ।
 अब अनुरोध की बात आ गई तो केदारनाथ जी की कविता ‘एक छोटा-सा अनुरोध, की याद हो आई। मुझे तो उनकी सारी कविताएँ ही अनुरोध जैसी लगती हैं। सचमुच कविता एक अनुरोध ही है, क्या? शायद। हर आदमी, हर समय चल रहा होता है। उसे चलने का पता हो तो भी, न हो तो भी। हमारे जीवन में चलना सिर्फ एक क्रिया भर नहीं है।’ चलना एक क्रिया के अलावा भी बहुत कुछ है। वैसे हमारी परम्परा में यात्रा में चलने वाले राही को टोकना अच्छा नहीं माना जाता। मगर एक कवि अपनी यात्रा में अपने सहयात्रियों को अपने अनुरोध के माध्यम से तनिक देर के लिये रुकने का आग्रह जरूर करता है। वह कहना चाहता है,- आँख मूँदकर चलना, चलना नहीं होता। चलना केवल कहीं पहँुचने के लिये ही नहीं होता। मंजिल निःसन्देह मूल्यवान है, मगर मार्ग भी कम मूल्यवान नहीं है। मार्ग के किनारे खड़े वृक्षों की हरियाली, उनकी छाया, छाया से फूटती सुगन्धि, सुगन्धि से उठते गान, बावलियों के जलतरंग का आमंत्रण, कूपों के पानी की मिठास और श्रम परिहार के ठिकानों की मधुरिम आश्वस्ति उपेक्षणीय नहीं है। ये सब मिलकर ही मंजिल को कोई अर्थ देते हैं। खैर। देखिए न! मैं तो बहक ही गया। बात तो ‘पांडुलिपियाँ’ के बारे में करनी है न!
‘पांडुलिपियाँ’ कविता मुझे बहुत प्रिय है। यह कविता पढ़ते हुए भीतर से बहुत उद्वेलित कर देती है। कविता का पाठ अपने प्रति बेहद उत्कर्ण बनाये रखता है। आश्चर्यजनक ढंग से यह कविता अपने में पाठकीय अस्मिता को शामिल कर लेती है। इस कविता का शीर्षक जरूर ‘’पांडुलिपियाँ’ है और बहुत ठीक है। मगर पता नहीं क्यों मुुझे बार-बार ऐसा लगता है कि यह कविता कवि के बारे में है। कविता के बारे में है। कवि-चेतना के बारे में है। काव्य-परम्परा के बारे में है। परम्परा की भव्य यातना, गानमय उदासी और उसके अकुंठ उल्लास और उसकी अचूक आस्था के बारे में है। उसके उज्ज्वल अवदान और उसकी गरिमापूर्ण विरासत के बारे में है। पता नहीं क्यों मुझे पांडुलिपियाँ एक कवि से भिन्न नहीं लगतीं। एक कवि एक पांडुलिपि से भिन्न नहीं लगता। अपने समय का बहुपठित से बहुपठित कवि मुझे फिर भी पढ़े जाने के लिये आमंत्रण और अनुरोध से भरा हुआ एक पांडुलिपि जैसा बराबर लगता है।

पांडुलिपि संग्रहालय में पड़ी है। संग्रहालय में पड़े-पड़े जर्जर हो गई है। पांडुलिपि की सही जगह संग्रहालय नहीं है। उसकी सही जगह जनसंकुल जीवन है। कविता जीवन में शामिल होने के लिये है। जीवन में शामिल न हो सकने की नियति उसे जर्जर बना देती है। उदास बना देती है। सदियों से अनसुनी संवेदना की पुकार की पीड़ा केदारनाथ सिंह जानते हैं। इस पीड़ा की परख ही उन्हें पांडुलिपियों के पास ले जाती है। अपने पास ले जाती है। उन्हें कविता में ले जाती है। इससे भी बड़ी बात यह है कि केदारनाथ सिंह शब्द के नीचे दबी हुई किसी स्त्री की चीख को सुन सकने की विलक्षण दक्षता के वारिस हैं। यही दक्षता वह चीज है, जो उन्हें विलक्षण बनाती है। यह विलक्षणता मामूली चीज नहीं है। यह योग्यता शब्द को उसकी समूची गरिमा और उसके समूचे सामर्थ्य में आत्मसात कर लेने की योग्यता है। शब्द कैसे एक वंचना की पीड़ा की चीख को सदियों अपने में समवाकर, सहेज कर सुरक्षित रखते हैं, यह जानना, यह जान सकना ही, कविता होना होता है। नहीं, नहीं, इतना जानना ही पर्याप्त नहीं है, पूरा नहीं है, कविता के लिये। आँखों से छूते ही किस कदर शब्द को हटाकर उसके नीचे दबी हुई चीख अपनी समूची अस्मिता में जीवित और जीवन्त हो उठती है, यह जानना कवि का जानना होता है। यह जानना ही कवि का होना होता है। बड़ा अद्भुत है, बड़ा आश्चर्यजनक है, कविता का पूरा संसार ही शब्द की सत्ता पर आश्रित है, अबलम्बित है, मगर जहाँ कविता फलित होती है शब्द की सत्ता मिट जाती है। वह विलीन हो जाती है। अपने फलितार्थ में। शब्द मिट जाते हैं। अर्थ रह जाता है। शब्द अपने अर्थ में विलीन हो जाते हैं। शब्द के अपने अर्थ में विलीन होने के रहस्य को केदारनाथ सिंह जानते हैं। इस रहस्य को जानना ही केदारनाथ सिंह की कविता की मार्मिकता को जानना है। कविता शब्दों में नहीं है, शब्दों के स्फोट में है। शब्दों के टूटने में है। मिटने में है। शब्दों में समाहित संवेदना के प्रस्फुटन में है। जैसे वृक्ष का प्रकट होना बीज के टूटकर-फूटकर मिटने पर ही संभव है, वैसे ही कविता का भी। कविता तभी प्रगट होती है, जब शब्द गल जाते हैं। बड़ा विचित्र है। कविता का विधान बड़ा विचित्र विधान है। केदारनाथ सिंह इस विचित्र विधान को जानने वाले विचित्र कवि हैं।

 केदारनाथ सिंह पांडुलिपियों की नियति को जानने वाले कवि हैं। वे उनकी निष्ठा को भी जानते हैं। उनकी आकांक्षा को भी जानते हैं। उनकी यातना को भी जानते हैं। यह सब जानना ही उन्हें मुकम्मल कवि बनाता है।

 वे जानते हैं कि कविता कभी अकेले में नहीं रहना चाहती, मगर उसे अकेले में रहना पड़ता है। वह बोलना-बतियाना चाहती है मगर उसे चुप पड़ा रहना पड़ता है। क्यों?

 शायद इसलिये कि कविता भीड़ के साथ चिल्ला नहीं पाती। वह भीड़ के पक्ष में भीड़ के लिये हल्ला नहीं बोल पाती। वह भीड़ के लिये झंडा, डण्डा, टोपी, गमछा नहीं बन पाती। कविता बहुजन की पक्षधर है, मगर बहुजन को इसका पता नहीं हो पाता। पता नहीं हो पाता इस वजह से कविता को चुप रहना पड़ता है। उसे चुप रहना बहुत अखरता है। बोलने-बतियाने की मंशा कविता की हार्दिक मंशा हैै। चिल्लाना उसका स्वभाव नहीं है। अपने स्वभाव के कारण कविता को-पांडुलिपियों को- अकेलेपन की यातना झेलनी पड़ती है। केदारनाथ सिंह कविता का स्वभाव जानते है। उसकी नियति जानते हैं इसलिये अकेलेपन की दारुण यातना झेलती पांडुलिपियाँ उन्हें पहचानती हैं। उनका हालचाल पूछती हैं। दुर्लभ आत्मीयता का वारिस होने के नाते ही वे जानते हैं कि पांडुलियाँ अपनी यातना में भी अपने अस्तित्व के टुकड़े-टुकड़े होकर उधराने के दंश के बावजूद सदियों तक इंतजार में अविचल होती हैं,-किसी राहुल के इंतजार में।
कवि का पांडुलिपियों के अन्तर्देश में चलने का अनुरोध बड़ा ही दुर्लभ बोध का आमंत्रण है। उनका अनुरोध काव्य परम्परा की अविच्छिन्नता के बोध का प्रतिष्ठापक अनुरोध है। केदारनाथ सिंह की संवेदना इस अलक्षित सत्य को प्रतिष्ठापित करती है कि काव्य परम्परा अविच्छिन्न है। अपने इसी व्यापक और मार्मिक बोध के काारण वे देख पाते हैं,- दिखा पाते हैं कि पांडुलिपियों के अन्तर्देश में, ब्रह्मसूत्र मुक्तिबोध की कविता पढ़ रहा है। शांकुतल का हिरन पद्मावत के तोते से कुछ कह रहा है। कबीर के बीजक का कोई पद अपनी जगह से छिटक कर, अपने समय को उलाँघ कर मनु से बहस कर रहा है। हिन्दी साहित्य के इतिहास का सबसे पुराना और पहला महाकाव्य ‘रासो’ किसी समकालीन दौर के सबसे नये और युवा कवि की कोई अप्रकाशित कविता पढ़ रहा है। यहाँ कविता में केदारनाथ सिंह ने काव्य परम्परा के जिस सत्य को उद्घाटित किया है, उससे पांडुलिपियों के बहाने कविता की आत्मा अद्भुत और अपूर्व रूप में उद्भासित हो उठी है। केदारनाथ सिंह कविता की आत्मा को आत्मा की गहराइयों से प्यार करने वाले कवि हैं। उनकी कविता में कविता का आत्मसत्य काल की सत्ता को अतिक्रांत करता हुआ अधिष्ठित है।

 कविता की आपसदारी में कविता की जीवनीशक्ति का अन्वेषण केदारनाथ सिंह की अपनी वह खोज है, जो काव्य जगत की महत्तम उपलब्धि है। उनकी कविता में चीनी महाकवि ली पै का स्तवन, जो कविता को खजूर के पत्ते पर लिखकर नदी को समर्पित कर देते थे, कविता के पहले पाठक पानी के लिये और पहला पाठक फिर उन्हें पहुँचा देता था दूसरे पाठक तक,- कविता की अविनश्वरता और उसकी निरंतरता शाश्वत स्तवन बन जाता है। केदारनाथ सिंह की कविता में कविता का स्तवन जो कि कविता की प्रशस्ति के शिल्प में नहीं है ऐतिहासिक रूप में विस्मय में डालता है। कवि की अद्भुत सूझ और सामर्थ्य से चकित करता है।

 पांडुलिपियों पर लगे हुए धूल की अनुचित कापीराइट के ठप्पे की पहचान और उसके विरूद्ध किसी बेचैन हाथ की हल्की गरमाहट की परख उनके यथार्थ बोध की व्यापकता और उनकी विरल ईमानदारी का दुर्लभ उद्घोष है, जो इतिहास में कविता की गरिमा का अमिट दस्तावेज है। ‘पांडुलिपियाँ’ कविता वाास्तव में कविता में कविता के इतिहास का शिलालेख है, जिसे हर समय, हर कहीं किसी पेड़ की छाल में, किसी नदी के कण्ठ में, किसी जेल की दीवार में और किसी पत्थर की स्मृति में पढ़ा जा सकता है। कविता में केदारनाथ सिंह का और केदारनाथ सिंह में कविता का होना, एक दुर्लभ, स्मरणीय और स्पृहणीय घटना की तरह है, जिसका होना सदियों में कभी-कभी होता है। केदारनाथ सिंह का होना इतिहास के लिये गर्व की थाती है।
 मैं किवाड़ों पर कान लगाये बैठा हूँ। किवाड़ों पर निशानों में पड़े हुए थाप बोल रहे हैं। मैं सुन रहा हूँ। निशान में अनगिनत शब्द समाहित हैं। ध्वनि समाहित है। झंकार समाहित है। बहुत ही धीमी किन्तु बहुत ही साफ ध्वनि कानों में बोल रही है- मैं कविता हूँ। मैं केदारनाथ सिंह हूँ। मैं यहीं हूँ। यही हूँ। यही हूँ।......
 मैं वहीं हूँ।
 जो कि आपके सामने हूँ
 जिससे आप मिलते रहे हैं अक्सर....
 .....मेरे पास एक रोटी है
 और उसी में न्योतकर सारे शहर को
 खिलाना चाहता हूँ.....
 ....मेरे हाथ में है मेरा चाय का चुक्कड़
 और हैफ में पड़ा देखता हूँ मैं
 कि भई वाह!
 इस इत्ती-सी चाय को
 मेरे संग-संग सुड़क रहे हैं
 इत्ते सारे होंठ!

सम्पर्क-
प्राचार्य
माँ गायत्री महिला पी.जी. महाविद्यालय
हिंगुतरगढ़-चन्दौली।
मो0नं0- 945055160

मुझे क्या चाहिए…

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

‘मुझे क्या चाहिए? अव्वल तो यह प्रश्न बनता नहीं। बन भी जाय तो किसी को स्वाभाविक नहीं लगेगा। शायद इसलिये कि इस तरह के प्रश्न हमारे समय में चलन में नहीं है। यह प्रश्न हमारे समय के प्रश्नों के ढाँचे में नहीं है। प्रश्नो का भी ढाँचा होता है, क्या? क्यों नही, बिल्कुल होता है। हमारे समय में कौन-सी ऐसी चीज बची है, जो ढाँचे के बाहर है। नहीं, नहीं सब कुछ ढ़ला हुआ है। सब कुछ ढाला हुआ है। यहाँ तक कि अब तो अन्तर्राष्ट्रीय ब्राण्ड की कम्पनियों ने आदमी के लिये भी ढाँचा ढाल लिया है। विश्व बाजार में आदमी के ढाँचे के बाहर का आदमी, आदमी ही नहीं है। हमारी सभ्यता के तकनीकी बाजारीकरण ने आदमी को अपने स्वभाव से इस कदर विमुख और वंचित कर दिया है कि हमें सारी स्वाभाविक चीजें अस्वाभाविक लगने लगी है। खैर।
प्रायः हम यह सोचते है कि प्रश्न दूसरों से पूछने के लिये होते हैं। हम दूसरों के बारे में जानने को हमेशा उत्सुक और उतावले बने रहते हैं। हमारी सारी दिलचस्पी दूसरों के बारे में है। हमारे सम्मुख हमेशा कोई दूसरा खड़ा है। चाहे पछाड़ने के लिये चाहे पटकने के लिये। चाहे लताड़ने के लिये चाहे हटकने के लिये। हम एकान्त में भी भीड़ से घिरे हैं। शोर से घिरे है। अकेले में होकर भी जाने किससे-किससे भिड़े है। बड़ा अजीब है। हाँ, हाँ एक दम अजीब ही है। पता नहीं क्यो हम, हमारे नहीं है। हमारे सामने हमारी अपनी जिन्दगी नहीं है। हम अपने जीवन के सम्मुख नहीं है। हमारे सामने हमारी अपनी जिन्दगी नहीं है। हम अपने जीवन के सम्मुख नहीं हैं। पता नहीं क्यों?
मगर मैं क्या करूँ? मेरे पीछे तो कई दिनों से यह प्रश्न पड़ा है। हाथ धोकर पड़ा है। पिण्ड नहीं छोड़ता, छुड़ाने की सारी कोशिशो के बाद भी।

एक समय था, जब प्रश्नों की भीड़ में मैं घिरा था, धक्का खा रहा था, मुक्का खा रहा था। दरे जा रहा था, तरेरा जा रहा था, तब इस सवाल को झुठलाता एक दूसरा सवाल था। वह था, मुझे क्या नहीं चाहिए?

सब कुछ चाहिए था। जो-जो देखता था, जो-जो दिखाई पड़ जाता था, सबको पा लेने के लिये मन में हूक उठती थी। मचल उठता था मन। तब मैं बच्चा था। मेले में घूमता हुआ बच्चा। विस्मय से विजड़ित। औत्सुक्य से विमोहित। लालसा से लुब्ध। हर सजी हुई दुकान आँखो को अपने में जड़ लेती थी। हर दुकान बुलाती थी चिल्ला-चिल्लाकर इतने जोर से कि कान के पर्दे बेकाम हो जाते थे। मैं क्या करता भला। कोई भी क्या कर सकता है। तब दुकान का एक सामान नहीं, पूरी-पूरी दुकान ही चाहिए थी। नहीं, दुकानो का नहीं, नहीं दुकानो से भरा पूरा मेला ही चाहिए था। मगर क्या हुआ। क्या होे सकता था। जेब में दम ही क्या था। एक फिफिहरी पर संतोष करना पड़ा था। मालूम नहीं था तब कि मेला आँख का नहीं होता जेब का होता है। देखने का काम आँख का नहीं है, दाम का है। मगर मन कहाँ माना। कहाँ मान सकता है। मान जाय तो मन ही क्या। सो मेला देखा। देखता रहा। खाली जेब मेला देखने का मजा भी कम नहीं है। मैंने तो बिना जेब देखे खूब मेला देखा है। कहावत चाहे जो कहे लेकिन मुझे तो खूब मजा मिला है। जो लोग सामान खरीदने के साथ-साथ मौज भी खरीदने का मंसूबा बाँधे रखते हैं, वे हमेशा दुखी रहते हैं।

हमारे दुखी होने की सबसे बड़ी वजह शायद यह है कि हम हमेशा दुख के बारे में सोचते रहते है। दुख नहीं भी है तो दुख के आ जाने की आशंका को हम अपने में बुला लेते हैं। फिर उससे बचने के उपायों का आयोजन करने लगते हैं। दुख को हटाने के बारे में, जो दुख अभी नहीं आया है, उसको भी रोकने के बारे में हम अपनी सारी सोच लगा देते हैं। हमारे चिन्तन के केन्द्र में दुख स्थिर हो जाता है। सुख चूल्हे-भाड़ मंे चला जाता हैं। मुझे लगता है, हमारी चिन्ता वस्तुओं को लेकर उतनी नहीं है। वस्तुएँ तो अपनी अस्मिता में हैं ही। हम भी अपनी अस्मिता में हैं ही। फिर क्या बाधा है? परेशानी दूसरी है। परेशानी यह है कि हम वस्तुओं पर अपना अधिकार चाहते हैं। अपना स्वामित्व चाहते है। वस्तुओं पर ही नहीं हम व्यक्तियों पर भी अपना अधिकार चाहते हैं। अधिकार को ही हम कभी प्रेम का नाम दे देते हैं, कभी-कभी सेवा का, कभी कुछ और का, कभी कुछ और का। फिर उपद्रव शुरू हो जाता है। सारे उपद्रच की जड़ अधिकार की भावना में है। सारी अशान्ति का मूल अधिकार है। अधिकार को लेकर ही सारी राजनीति है। सारी असहमतियाँ है। सारे संघर्ष हैं। दुनिया के बहुत से समझदार लोग-‘संघर्ष ही जीवन है‘ कहकर अपनी समझदारी का निदर्शन भी करते है। समझदार बनने से भला किसी को कौन रोक सकता है।

मेरे तो बचपन से ही समझदारी पीछे पड़ी है। जब बचपन था मेरे पास मैं समझदार होने को लालायित हो रहा था। महत्वपूर्ण मामलों में सयाने लोगों की साझेदारी मुझे सयाना बन जाने के लिये उन्मथित कर देती थी। अपनी उपेक्षा से बचपन खो गया। मैं सयान हो गया। सयान होकर क्या मिला? कुछ पता नहीं। जवान होकर भी कुछ और होने की। कुछ और होकर भी कुछ और होने की हूक जस की तस बनी रही। बनी हुई है अब भी, वैसी की वैसी। हाँ, उसमें एक दंश और जुड़ गया है, जो था उससे वंचित हो जाने का दंश। जवान होने की जो हड़बड़ी थी वह जवान होकर भरी नहीं। उसमें भर गई बचपन के जाने की कचोट। बचपन में मुझे जवानी चाहिए थी। जवानी मिल गई। मगर मिल जाने से कुछ नहीं हुआ। मेरा ख्याल है हर किसी का यही हाल है।

हमारे समय का हर आदमी आधी जिन्दगी, जिन्दगी शुरू करने का इंतजार करता है। हमारा इंतजार जिन्दगी के लिये नहीं है, जिन्दगी गुजारने के साधन के लिये है। फिर जिन्दगी का साधन ही हमारे लिये जीवन बन जाता है। साधन कुछ को मिल जाता है, बहुतों को नहीं मिलता। नहीं, ऐसा नहीं है। जिनको साधन नहीं मिलता उनकी तो बात ही अलग है। वे तो अभाव की गरगराती नदी में मगरमच्छों की बुमुक्षा के शिकार के लिये सहज सुलभ ही हो जाते है। मगर जिनको साधन मिल जाता है, जिन्दगी उनसे भी छूट जाती है। साधन पकड़ में आ जाता है, जिन्दगी छूट जाती है। साधन के जबड़ो के भी दाँत घड़ियाल के दाँतो से कम नुकीले नहीं होते। फिर आदमी साधन की गिरफ्त से छूटने के दिन गिनने लगता है।
मैं बार-बार सोचता हूँ, जीवन क्या है? क्या नौकरी, व्यवसाय, मकान, जमीन, जायदाद, गाड़ी-घोड़ा, पद-प्रतिष्ठा, रोब-दाब और बहुत कुछ यह सब जीवन है। शायद हाँ…..। हाँ इसलिये कि प्रायः हम सब इन सबके लिये ही सारा प्रयत्न करते रहते है। हमने मान लिया है कि इन सब के बिना जीवन का कोई मतलब नहीं है।

शायद नहीं….। नहीं इसलिये कि इन सबको पा लेने के बाद भी लगता है कि यही जीवन नहीं है। यह सब जीवन की चाह है। जब यह नहीं था। तब भी जीवन था। इन सबके होने के बाद भी जीवन है। जीवन शायद और कुछ है। कुछ और ही चीज है। क्या है, जीवन?

बड़ा मुश्किल सवाल है। यह सवाल प्रायः किताबों की ओर खींच ले जाता है। ग्रन्थो की तरफ घसीट ले जाता है। धर्मग्रन्थों की चैखट पर सिर धुनने को विवश करता है। वहाँ जाकर भी बहुत कुछ मिलता है। जीवन नहीं मिलता। बहुत से प्रश्न मिलते हैं, नये। नये-नये। मगर उत्तर नही मिलता। वहाँ सिद्धांत हैं। निष्कर्ष है। दृष्टांत है। उपदेश हैं। ज्ञान है। दृष्टि है। दर्शन है। जीवन नहीं है। फिर….?

जीवन, जीवन से बाहर कहीं नहीं है। हम कहीं भी जाने को तैयार हो लेते है। मगर जीवन में उतरने का तरीका कुछ दूसरा है। जैसे नदी में नहाने के लिये हमें अपने सारे वस्त्र-आभूषण किनारे पर उतार देने होते है, वैसे ही जीवन में उतरने के लिये जीवन की जरूरी चीजें भी रख देनी होती हैं। यह बड़ा मुश्किल है। मुश्किल इसलिये है कि यह हमारे अभ्यास में नहीं है। हमारे लिये तो जीवन, जीवन के लिये तमाम-तमाम चीजों को चाहने को लेकर है।

मैं सोचता रहता हूँ। बराबर सोचता हूँ। मुझे लगता है, लगता है, जिन्दगी में सबसे अधिक लुभाने वाली चीज यश है। प्रतिष्ठा का यश किसे नहीं लुभाता? सबको लुभाता है। मगर सबसे मजेदार बात यह है कि यश की लोलुपता को लोभ के अन्तर्गत नहीं गिना जाता। यह एक ऐसा धोखा है, जो धोखा जैसा नहीं लगता। धोखा खाते रहने पर भी लगता ही नहीं कि धोखा खा रहे है। यह ऐसा व्यापार है जिसमें निरन्तर घाटा खाते रहने के बावजूद व्यापार में मन्दी नहीं आती। यश की लालसा इतनी घातक लालसा है कि वह हमसे हमारे सृजन का सुख भी छीन लेती है। छीन नहीं लेती हड़प लेती है। इस तरह हड़प लेती है कि हमें अपने कमजोर होने का तनिक भी भान तक नहीं हो पाता। अपनी कमजोरी पर गर्व अगर कहीं सबसे अधिक होता है तो वह यश लोलुप आदमी में होता है।

यश क्या है? श्रेष्ठता का प्रमाण। विशिष्टता की प्रशस्ति। असाधारण होने की स्वीकृति ही यश है। श्रेष्ठता, विशिष्टता, असाधारणता किसकी? कौन है श्रेष्ठ? कौन है, विशिष्ट है? कौन है, असाधारण? अहं। अहं ही है न!

अहं ही तो अस्तित्व के बोध की सबसे बड़ी बाधा है। सबसे कठिन व्यतिरेक है। हम यात्रा करने चले थे अस्तित्व के अनुभव की। चंगुल में फँस गए अहं के। हम सृजन करने चले थे सहज को उपलब्ध होने के लिये मगर असाधारण होने की गिरफ्त में जकड़ गए। ख्याति की लालसा ने हमें सृजन के सहज सुलभ सुख से वंचित कर लिया।

हमारे जीवन मंे सबसे अधिक आश्चर्यजनक यह है कि जो भी चीज हमारे पास है, जो हमें उपलब्ध है, उसकी मूल्यवत्ता का हमें तनिक भी बोध ही नहीं है। यह हमारी सबसे बड़ी विडम्बना है। इस विडम्बना हम सभी शिकार है। यह जीवन के प्रति नकारात्मक सोच का परिणाम है। नकारात्मक सोच की प्रबलता के कारण नकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह में हम बहने को बाध्य हो जाते है। जो है, उसके रस के आस्वाद से हम वंचित रह जाते हैं और जो नहीं है, उसको लेकर केन्द्रित हो जाती है। जब हम बचपन में थे, हम जवान होने के लिये चिन्तित थे। हमारा विश्वास था कि जवान हो लेना ही समझदार हो लेना है, शक्तिमान हो लेना है। मगर जवान होने पर पता चला कि हमारा विश्वास भ्रम था। पता नहीं क्यों जैसे-जैसे जीवन की यात्रा आगे बढती जाती है, हमारे विश्वास भ्रम में बदलते जाते है। मुझे यह जीवन का सबसे दुखदाई दुर्भाग्य महसूस होता है। यह दुर्भाग्य अगर मेरा अकेला होता तो कोई खास महत्व की बात कत्तई नहीं होती। मगर मैं देखता हूँ कि यह दुर्भाग्य समूची मनुष्यजाति को अपने नागपाश में कसे हुए हैं।
हम चाहते है कि धन हमारे पास हो, पद हमारे पास हो, प्रतिष्ठा हमारे पास हो मगर यह सब हम चाहते हैं इसका किसी को पता न हो। जीवन में चाहने वाली बहुत-सी चीजों को हेय मान लेने की हमारी अवधारणा हमारे जीवन को कुंठित कर देती है। कुंठा बहुत कुछ को आच्छादित कर देती है। हममें हमारापन ढ़ँक जाता है।

मैं भी सोचता हूँ। खूब सोचता हूँ। बार-बार सोचता हूँ। जब-जब सोचता हूँ, पाता हूँ कि सब कुछ चाहिए मुझे। दूसरों के सामने हम अपने को चाहे जितना निःस्वार्थ, त्यागपूर्ण, उदार और महान खड़ा कर लें मगर उससे क्या? क्या होता है? कुछ नहीं। कुछ भी नहीं। यही तो हमारे लोकतन्त्र की सबसे बड़ी विडम्बना है। यहाँ हर कोई अपने को निःस्वार्थ, त्यागी, परोपकारी, जनसेवक, देशभक्त, प्रदर्शित कर रहा है। प्रदर्शित करने की होड़ मची है।मगर सिर्फ प्रदर्शित करने की ही। दूसरो के सामने हम जैसा अपने को दिखाते हैं, अपनी आँख के सामने हम वैसा कहाँ हो पाते हैं। हम जो चाहते हैं, न मिले तो अंगूठ खट्टे हैं, सोचकर संतोष कर लेते हैं। जो कुछ मिल जाता है, उससे प्यास कम नहीं होती। मुझे लगता है हम पानी के पीछे नहीं, प्यास के पीछे ही जाने कब से दौड़ रहे हैं। समूची मनुष्यजाति ही प्यास के पीछे आँख बन्द कर दौड़ रही है। दौड़ रही है और दौड़ते-दौड़ते हाफ रही है। हमारी दौड़ अगर पानी के पीछे होती, पानी के लिये होती तो जरूर प्यास कुछ कम होती। मगर प्यास के पीछे दौड़ने से प्यास कभी कम हो सकती क्या? नहीं। कभी नहीं।

ऐसे मौके पर जयशंकर प्रसाद जी बहुत याद आते है-
पीता हूँ, हाँ, मैं पीता हूँ,-यह स्पर्श, रूप, रस, गन्ध भरा।
मधु लहरों के टकराने से, ध्वनि मेें है क्या गुंजार भरा।।

प्यासा हूँ, मैं अब भी प्यासा, संतुष्ट ओध से मैं न हुआ।
आया फिर भी वह चला गया, तृष्णा को तनिक न चैन हुआ।।
                    (कामायनी-काम सर्ग)
नहीं, बरसात कम न हुई। हुई। खूब हुई। रात-रात भर हुई।मगर घड़ा नहीं भरा। भरने की सारी कोशिश कामयाब नहीं हुई। अब भी वह वैसे ही है। खाली-खाली। रीता-रीता। बड़ा अजीब है।
भरने का सारा उद्यम। सारा का सारा उद्योग। समूचा उपक्रम व्यर्थ चला जा रहा है। समय सरकता जा रहा है मगर कुछ भर नही पा रहा है। घड़े में ही छेद है क्या। छेद ही छेद है क्या? जो कुछ आ रहा है, चला जा रहा है। अभाव कम नहीं हो रहा है। ऐसा क्यों है? मैं बार-बार सोचता हूँ। दूसरों के देखने में लगता है, घड़ा मेें जल है, मगर घड़ा को लगता है खाली है।

हम कोशिश कुछ और कर रहे हैं। परिणाम कुछ और निकल रहा है। हम पानी पी रहे है। प्यास बढ़ती जा रही है। हलक सूखता जा रहा है। नहीं, शायद हम पानी नहीं पी रहे हैं। शायद हम पानी की शक्ल में प्यास ही पी रहे है। कितना विस्मय जनक है। मगर केवल विस्मय ही तो जीवन नहीं है। विस्मय के अलावा जीवन को कुछ और होना चाहिए।

जीवन में भरने का बोध कैसे भरे। कृतार्थता का अनुभव कैसे मिले? वह संतुष्टि कहाँ है? जिसके लिये यह मन न जाने कहाँ-कहाँ भटकता रहता है। मरीचिका के पीछे दौड़ते मृग की तरह। मरीचिका प्रतिभास है। सत्य की तरह प्रतिभसित होने वाला पहुँच में आते ही असत्य हो जाता है। जीवन का रस कहाँ है? रस का स्त्रोत कहाँ है कर्म में? कर्म फल में?

सवाल बड़ा पेंचीदा है। इतना पेंचीदा है कि यह सवाल दर्शन का सवाल बन जाता है।
दर्शन के सारे सवाल, सारी जिज्ञासाएँ, सारी उत्कण्ठाएँ, सारी प्रपत्तियाँ जीवन को लेकर ही हैं। जीवन से ही सम्बन्धित हैं। जीवन की प्रक्रिया, जीवन के प्रयोजन और जीवन की उपलब्धियों के बारे में हैं। फिर भी पूरा का पूरा दर्शन हमारे जीवन का हिस्सा नहीं है। नहीं बन पाया है अब तक ऐसा क्यों है? यह बडी अजीब-सी बात नहीं है।

यह सोचकर बड़ी हैरानी होती है कि दर्शन, धर्म, अध्यात्म, साहित्य, कला, विज्ञान यह सब जो जीवन के लिये है हमारे तथाकथित उन्नत या उन्नति की आकांक्षी समाज व्यवस्था में बहुत थोड़े से लोगों से सम्बन्ध रखने वाला है। इन सबका व्यापक जीवन में प्रवेश न पाना बड़ा अचम्भा में डालता है। जीवन के लिये सबसे जरूरी चीजों का हमारे समय में जीवन में प्रवेश क्यों नहीं है? जीवन के लिये बहुत जरूरी चीजें बहुत थोड़े से लोगों से ताल्लुक रखने वाली क्यों बनी हुई हैं ?

गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि कर्म के फल की आकांक्षा अशान्ति का कारण है। ठीक है। यह तो बिल्कुल ठीक है-कर्मण्येवाधि कारस्ते मा फलेषु कदाचन‘। कर्मफल की इच्छा मत करो। मगर यह आसान बात नहीं है। बहुत सी ठीक बातें, ठीक-ठीक बातें आसान नहीं होती। यह तो बड़ा कठिन है। कर्म करो मगर फल की आकांक्षा मत करो। ऐसा कैसे होगा। कैसे हो सकेगा भला! हम तो कर्म करने से पहले ही कर्मफल की आकाँक्षा पाल लेते हैं। नहीं, हम तो फल के लिये ही कर्म करने के अभ्यासी है। कर्म करने वाला है तो फल की आकांक्षा भी होगी ही। असल में बात का पेंच तो दूसरी जगह फँसा है। मूल बात तो कर्ता की है। गीता में मूल प्रश्न कर्म का नहीं है। मूल प्रश्न कर्ता का है।

कर्म तो सब करने हैं। सारे कर्म गीता में हैं। युद्ध का प्रतिपादन ही गीता का प्रतिपाद्य है। अमर्ष, ग्लानि, उत्साह, रोष, हर्ष, विषाद, जय, पराजय, रूदन, हास सब गीता में है। गीता कर्म के निषेध का ग्रन्थ नहीं है। कर्मफल के निषेध का भी नहीं है। वह तो कर्ता के निषेध का उपदेश है।
कर्तापन के निषेध का उपदेश केवल आत्मिक जगत का मूल्य नहीं है। केवल आध्यात्मिक जगत का मूल्य नहीं है। वरन वह समस्त मनुष्य जाति के समग्र जीवन का महत्तम मूल्य है। यह वह मूल्य है, जिसकी सामाजिक महत्ता सबसे अधिक मूल्यवान है। आज हमारे भारतीय लोकतंत्र का जो सबसे बडा कलुष है, वह कर्तापन के ढ़ोल-नगाड़े के निरर्थक शोर से पैदा हुआ है। हमारा लेना-देना कर्म से नहीं है। कर्म फल से नहीं है। हमारा सारा लेना-देना कर्तापन से है। हमारे सारे के सारे दल केवल यह बताने में अपनी सारी ऊर्जा उड़ेल दे रहे हैं कि देश के लिये हमने क्या-क्या किया है। कर्म नहीं दिख रहा है। कर्मफल नहीं दिख रहा है। कर्तापन दिख रहा है। केवल कर्तापन बोल रहा है। यह सबसे त्रासद विडम्बना है। कृष्ण का कहना है कि कर्तापन का न होना ही जीवन में, समाज में, राष्ट्र में दुनिया में शान्ति का, समृद्धि का, सुख का मूल है।

बड़ा अद्भुत है। मगर बड़ा कठिन है। मैं भी इस मूल को पाना चाहता हूँ। कैसे मिलेगा? पता नहीं। इसका पता पाने का पता ना मालूम है।
यही ना मालूम पता मुझे चाहिए। कहाँ मिलेगा? बड़ा दुर्लभ है। आज तो जिसके पास भी जाइए प्यास ही प्यास पसरी हुई मिलती है। हमारे समय का आदमी लाभ और लोभ की बाढ़ में ऊभ-चूभ डूबता हुआ आदमी बना हुआ है।
मगर हम देखते हैं कि हमारे पुरखो ने इसे पा रखा था। रहीम को कर्तापन के अभाव का बोध पता था। वह पता उनका यह दोहा बताता है-

        गोधन, गजधन, बाजि धन, और रतन धन खान। 
        जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान।।
संतोष धन और कुछ नहीं, कर्तापन के न होने का बोध ही है। रहीम की कविता में गीता की गूँज सुनाई देती है।
गीता को हृदयंगम करने की बदौलत ही रहीम लिख सके थे-
        पानी बाढ़ै पाव में, घर में बाढ़ै दाम।
        दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम।।

रहीम की कविता हमारे विकास के, उत्कर्ष के, सारे दावों को, खारिज कर देती है। हमारी सज्ञानता के सारे दर्प को इंकार कर देती है। हम दोनो हाथ से ही नहीं, हजारों हजार हाथों से नाव में पानी भरने में लगे हुए हैं। मैं भी लगा हुआ हूँ। लगे-लगे सोच रहा हूँ- ‘‘मुझे क्या चाहिए?‘‘

अतिक्रमण कर बनाए गए मकान पर चला सरकारी बुल्डोजर

Young Writer, चकिया। नगर के वार्ड नंबर 8 दुर्गा नगर में सोमवार की सुबह ज्वाइंट मजिस्ट्रेट प्रेम प्रकाश मीणा ने अवैध तरीके से बने मकान को जमींदोज कराकर जमीन को अतिक्रमण मुक्त किया। इसे एक बार फिर अवैध अतिक्रमणकारियों में हड़कंप की स्थिति रही।

इस बाबत अधिशासी अधिकारी एम.लाल गौतम ने बताया कि वार्ड नंबर 8 दुर्गा नगर में नौगजा सहित से सटे नवनिर्मित पार्किंग स्थल के पास नगर पंचायत की सरकारी भूमि पर संतदेव, फूला देवी समेत 4 लोगों ने गलत तरिके से मकान का निर्माण करा लिया था। बीते 7 दिसंबर नगर पंचायत प्रशासन द्वारा उन्हें 5 दिन के अन्दर अतिक्रमण खाली करने की नोटिस जारी की गयी थी। लेकिन उनके द्वारा मकान खाली नहीं किया गया। सोमवार की सुबह नगर पंचायत, राजस्व विभाग, पुलिस कर्मियों के साथ मौके पर पहुंचे ज्वाइंट मजिस्ट्रेट प्रेम प्रकाश मीणा ने जेसीबी की मदद से स्व बाबू नंदन सिंह का एक मंजिला मकान जमींदोज करा दिया। वहीं सभासद वैभव मिश्रा के निवेदन करने पर तीन लोगों को 24 घंटे के भीतर मकान खाली करने का निर्देश दिया। इस दौरान कोतवाल राजेश यादव, लेखपाल राम अशीष, गुलाब मौर्या, रोहित, मुकेश श्रीवास्तव मौजूद रहे।

छात्र-छात्राओं ने निकाली मतदाता जागरूकता रैली

Young Writer, सकलडीहा। विधानसभा चुनाव-2022 के मद्देनजर निर्वाचन आयोग के निर्देश पर मतदाताओं विभिन्न आयोजनों के जरिए जागरूक किया जा रहा है। इसी कड़ी में सोमवार को चतुर्भुजपुर कस्बा में भारतीय विद्या मंदिर इंटर कालेज के छात्र और छात्राओं ने शिक्षकों के साथ मतदाता जागरूकता रैली निकाला। इस दौरान लोगों को मतदान में प्रतिभाग करने की अपील किया।
लोकतंत्र का पर्व है, मतदान करना धर्म है। सब काम छोड़कर पहले करेंगे मतदान आदि नारे बुलंद करते हुए छात्र-छात्राओं ने मतदाता जागरूकता रैली निकाली। उक्त मतदाता जागरूकता रैली चतुर्भुजपुर कस्बा से होते हुए बरठी सहित अन्य गांव में पहुंचकर लोगों को मतदान करने के प्रति अपील किया। इस मौके पर प्रधानाचार्य देवेन्द्र सिंह, सुरेश प्रसाद, द्विवेश, श्रीप्रकाश मिश्रा, अरूण प्रकाश त्रिपाठी, चन्द्रनारायण विश्वकर्मा, सुभाष भारती सहित अन्य मौजूद रहे।

सुशील सिंह ने ग्रामीणों के बीच गिनाई सरकार की उपलब्धियां

आनंदेश्वर महादेव मंदिर में दर्शन-पूजन करते सैयदराजा विधायक सुशील व प्रमुख अजय सिंह।

Young Writer, धानापुर। क्षेत्र के महरईया गांव स्थित बिंद बस्ती में सैयदराजा विधायक सुशील सिंह ने सदस्यता अभियान चलाया। इस दौरान उन्होंने बस्ती के लोगों का हाल-चाल जाना। साथ ही उनकी सड़क, नाली समेत अन्य मूलभूत समस्याओं को सुना। भरोसा दिया कि विधानसभा चुनाव से पहले बस्ती की समस्याएं दूर कर सुविधाएं बढ़ाने का काम भाजपा सरकार करेगी।

उन्होंने कहा कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व सीएम योगी की अगुवाई में प्रदेश के कोने-कोने में विकास की रौशनी पहुंच रही है। आस्था का केंद्र रहे काशी विश्वनाथ मंदिर को भाजपा सरकार ने भव्यता प्रदान करने का काम किया। आज वाराणसी पर्यटन का केंद्र बिंदू बन गया है। यह सबकुछ भाजपा सरकार के निरंतर प्रयास का परिणाम है। ऐसे ही गांव के विकास के प्रति भी सरकार कटिबद्ध व समर्पित है। सड़क, पुल, बिजली, पानी आदि संसाधनों को बेहतर बनाने का काम किया जा रहा है। प्रमुख अजय सिंह ने कहा कि सरकार ने गांव के गरीबों को आवास व शौचालय जैसी योजनाएं देने का काम किया। वहीं गरीबों, वृद्धजनों, निराश्रितों व दिव्यांगों को पेंशन आदि देने का काम कर रही है। कहा कि अब राशन के साथ ही सरकार नमक, दाल व तेल भी निशुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है। इस अवसर पर मंडल अध्यक्ष वर्तमान मौर्या उपस्थित रहे।

आनंदेश्वर मंदिर में किया हवन-पूजन
धानापुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोमवार को काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का लोकार्पण किए जाने से चंदौली के भाजपाई गदगद नजर आए। इस क्रम में सैयदराजा विधायक सुशील सिंह एवं ब्लाक प्रमुख अजय सिंह ने धानापुर के महराई स्थित आनंदेश्वर महादेव मंदिर में पूजा अर्चना किया। साथ ही मंदिर प्रांगण में उपस्थित स्थानीय लोगों प्रसाद का वितरण कराया। सैयदराजा विधायक ने विश्वनाथ कॉरिडोर को ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। साथ ही श्रमदान कर मंदिर प्रांगण की साफ-सफाई की और लोगों को स्वच्छता अपनाने का आह्वान किया।

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