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Thursday, October 22, 2026

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बसपा की सरकार बनी तो महिलाओं की सुरक्षा का होगा बंदोबस्त

अहिकौरा में आमजन को संबोधित करती सीमा समृद्धि कुशवाहा।

अहिकौरा में आयोजित बसपा के जनसभा में सीमा समृद्धि कुशवाहा को आवाम ने सुना

Young Writer, कमालपुर। निर्भया कांड व हाथरस कांड में पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए दृढ़ता के साथ संघर्षरत बसपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता सीमा समृद्धि कुशवाहा शुक्रवार को जनपद दौरे पर थी। इस दौरान उन्होंने सैयदराजा विधानसभा क्षेत्र के अहिकौरा में बसपा की ओर से आयोजित जनसभा को संबोधित किया। साथ ही बसपा उम्मीदवार अमित यादव लाला को अपना मत देकर उनके वादों व इरादों को सशक्त बनाने का आह्वान किया। उन्होंने भाजपा को झूठ बोलने वाली पार्टी करार दिया। वहीं सपा पर परिवारवादी व जातिवादी बताया।

उन्होंने कहा कि बसपा की पांच वर्ष की सरकार में हर वर्ग के गरीबों का जीवन स्तर ऊपर उठा तथा प्रदेश में कानून व्यवस्था का राज कायम किया गया। उन्होंने कहा कि बसपा अपने महापुरुषों के आदर्श पर समाज के हर वर्ग के लोगों का कल्याण करने का काम करती है। बहन मायावती के 5 वर्षों के शासनकाल में जितना विकास हुआ उतना किसी भी सरकार में नहीं हुआ। कहा कि भाजपा समाज को बांट कर हिंदू-मुस्लिम का नारा देकर राजनीति करती है। जबकि समाजवादी पार्टी सरकार बनने पर अपने परिवार तथा अपनी जाति का विकास करती है। जबकि बहुजन समाज पार्टी हर वर्ग के गरीबों का जीवन स्तर ऊंचा उठाने तथा प्रदेश में कानून व्यवस्था का राज कायम हुआ था। उन्होंने कहा कि बसपा सरकार बनने पर हर गांव का विकास होगा। चिलचिलाती धूप में भी लोगों के समर्थन ने हौसला बढ़ा दिया। उन्होंने जनसभा में उपस्थित भीड़ खासकर महिलाओं व युवतियों को राजनीति में बढ़कर भागीदारी करने का संकल्प दिलाते हुए उनका आभार जताया। इस दौरान अमित यादव लाला ने भी महिला सुरक्षा व सशक्तिकरण को लेकर अपने विचारों के साथ ही बातों को मजबूत से रखा। कहा कि बसपा सत्ता में लौटी तो महिला सुरक्षा का पुख्ता प्रबंध होगा। साथ ही महिला सशक्तिकरण की योजनाओं को आगे बढ़ाकर महिलाओं को स्वावलंबी, आत्मनिर्भर बनाकर उनका खोया हुआ सम्मान लौटाने का काम होगा।

सपा की सरकार में चलता था पोस्टिंग और ट्रांसफर का खेल


सदलपुरा में राजनाथ सिंह व शिवराज सिंह चौहान ने सभा को संबोधित किया

Young Writer, सकलडीहा। माटी के लाल व रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शुक्रवार को सदलपुरा में भाजपा की जनसभा को सम्बोधित किया। कहा कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के नेतृत्व में देश सशक्त हुआ है। आज गुंडे बदमाशों के हौसले पस्त हो गये है। कानून का राज चल रहा है। इस मौके पर सरकार की योजनाओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए गवई भाषा में भी लोगो से समर्थन मांगा।
उन्होंने कहा कि जिस तरह से प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश ताकतवर हुआ है। आज भारत बोलता है तो हर देश बातों को गंभीरता से सुनता है। आज हम यूक्रेन में फसे लोगों को सुरक्षित निकालने का पहल कर रहे है। कोरोना काल में हमने कोरोना का टीका बनाया भी और अन्य देश को दिया। हम आपको विश्वास देते है कि भारत माता का मस्तक कभी झूकने नही देंगे। कांग्रेस के लोगों ने देश की जनता की आंखों में धूल झोंकर राजनीत किया। संसद में कांग्रेस के लोगों को बोलने तक नही आता है। आज भारत इतना मजबूत हुआ है कि भारत को कोई आंख दिखाने का जुर्रत तक नही करता है। हम बाउंड्री के इस पार भी मार सकते है और उस पार भी घूसकर मार सकने की क्षमता रखते है। अंत में सकलडीहा से भाजपा उम्मीदवार सूर्यमुनी तिवारी को जीताने का अपील किया। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि आज मोदी ने अपने देश में वैक्सीन लगाकर पूरे देश की सुरक्ष किया है। यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध चल रहा है। केंद्र सरकार आपरेशन गंगा के तहत सभी भारतीयों के निकालने की चिंता करते है। अंत में केन्द्र और प्रदेश सरकार की योजनाओं पर विस्तार से बात रखते हुए लौट गये

उत्साहित भीड़ की भेंट चढ़ गयी सैकड़ों कुर्सियां

बेकाबू भीड़ ने अखिलेश यादव की सभा में बेरिकेड्स तोड़ा

Young Writer, चंदौली। सपा प्रमुख व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की जनसभा में भीड़ के बेकाबू व अनुशासनहीन नजर आयी। इसके पीछे अखिलेश यादव के प्रति दीवानगी के साथ ही उनकी एक झलक पाने की ललक इस कदर थी कि सभा खत्म होते-होते भीड़ के भारी दबाव के कारण बैरिकेडिंग टूट गया और भीड़ डी-घेरे में घुस गए। इस दरम्यान बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। भीड़ को मंच व डी-एरिया से दूर रखने में सुरक्षा बलों के पसीने छूट गए। वहीं सैकड़ों कुर्सियां भीड़ के उत्साह की भेंट चढ़ गयी।

इस दौरान बेकाबू भीड़ के बीच दो महिला अनुदेशक फंस गयी, जिन्हें पत्रकारों के सहयोग से पुलिस कर्मियों ने भीड़ से पृथक करके उनकी जान बचाई। अखिलेश का हेलीकाप्टर शाम 04ः54 बजे उतरते ही सपा कार्यकर्ता उत्साहित उठे। कार्यकर्ताओं के उत्साह का आलम रहा कि बैरिकेटिंग तोड़कर डी एरिया की तरफ बढ़ गए। काफी कार्यकर्ता डी एरिया में भी पहुंच गए। इस दौरान जहां पार्टी का अनुशासन तार-तार नजर आया। वहीं सुरक्षा व्यवस्था को भी संभालने में सुरक्षा बलों के पसीने छूट गए। अखिलेश यादव के जाने के बाद यातायात व्यवस्था इस कदर चरमरा गई कि लोगों को सभास्थल से बाहर निकलने में घंटों लग गए।

दुस्साहसः 400 केवी का ट्रांसफार्मर ही चुरा ले गए चोर

Young Writer, पड़ाव। चोरों ने मुगलसराय कोतवाली पुलिस के इकबाल का खुली चुनौती दी है। पुलिस चौकी के चन्द कदमो की दूरी से मोबाइल 400 केवी का मोबाइल ट्रांसफार्मर हौसला बुलंद चोर चुरा ले गए। बिजली विभाग के कर्मचारियों ने सम्बंधित पुलिस चौकी में ट्रांसफार्मर चोरी की तहरीर दे दिया है। चोरी की इस वारदात से जहां आमजन हतप्रभ है, वहीं लोग पुलिस की सक्रियता व सतर्कता पर सवाल खड़े नजर आए।
विदित हो कि सुजाबाद पुलिस चौकी के पास बिजली विभाग का ग्राहकों के लिए भुगतान कार्यालय है जिसके पास उक्त विभाग द्वारा 400 केवी का मोबाइल ट्रांसफॉर्मर इमरजेंसी के लिए रखा गया था लेकिन गुरुवार की रात मध्य रात्रि में हौसला बुलंद चोरों ने पिकअप के सहारे ट्राली सहित लगभग ट्रांसफार्मर चुरा ले गए, जिसकी अनुमानित 10 लाख रुपये बताई जा रही है। इतना ही नहीं एक मैजिक चालक ने वहां मौजूद केबल तार आदि लादकर वाराणसी की तरफ चला गया और लगभग एक घंटे बाद पिकअप वाला आकर मोबाइल ट्रांसफार्मर के ट्राली को पिकअप में लगाकर स्थानीय चौराहे से होते हुए रामनगर की तरफ चला गया जो सीसी कैमरे में सब रिकॉर्ड है। मजे की बात यह है कि उक्त विभाग का कार्यालय रामनगर थाना अंतर्गत सुजाबाद पुलिस चौकी के पास है लेकिन राजस्व क्षेत्र चंदौली जनपद के मुगलसराय थाना अंतर्गत पुलिस चौकी जलीलपुर में आता है। चोरों ने चोरी करके पुलिस को सीधी चुनौती दे दी थे। वहीं इस संबंध में अवर अभियंता संतोष कुमार ने बताया कि पुलिस चौकी जलीलपुर में तहरीर दे दिया गया है।

किल्लत व जिल्लत भरा रहा भाजपा का शासनकालः अखिलेश

चंदौली पालीटेक्निक कालेज में आयोजित सभा को संबोधित करते पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव।

पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने जनसभा में भाजपा सरकार पर साधा निशाना

Young Writer, चंदौली। सपा प्रमुख व सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने शुक्रवार को पालीटेक्निक कालेज के ग्राउंड पर आयोजित चुनावी जनसभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि यूपी का चुनाव जनता लड़ रही है। पहले चरण में चुनाव में ही जनता ने सरकार को अपनी वोट के ताकत का ऐहसास करा दिया था। यूपी में ऐतिहासिक बहुमत के साथ सपा सत्ता में लौटने जा रही है। आरोप लगाया कि भाजपा के राष्ट्र व राष्ट्र के लोगों से कोई वास्ता सरोकार नहीं है। भाजपा नेताओं के भाषण में उनकी हताशा साफ झलक रही है। ये लोग झूठ बोलकर जनता को गुमराह कर रहे हैं। उन्होंने चंदौली में साइकिल की लहर को ललकार के साथ सरकार में तब्दील करने में सहयोग देने की बात की।
इस दौरान पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने पालीटेक्निक कालेज के ग्राउंड पर जमा जनता से सीधा संवाद किया। अपनी चुनावी योजनाओं को मजबूती के साथ रखा। साथ ही जनता की मांग को अपने अभिवादन में स्वीकार किया। कहा कि सपा सरकार बनी तो महंगाई से निजात के साथ ही रोजगार के दरवाजे खुलेंगे। युवाओं की हताशा को रोजगार से जोड़कर उसे समृद्ध व सशक्त बनाना जाएगा। आरोप लगाया कि भाजपा की केंद्रीय सरकार एक-एक कर सभी उपक्रमों को बेचने का काम कर रही है। यही वजह है कि देश में तेजी से रोजगार के अवसर सृजित है। कहा कि जनता अब ऐसे लोगों से सत्ता छिनने का काम कर रही है जो देश व देश की सम्पत्ति को संभाल नहीं सकते और पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली बन बैठे हैं। आरोप लगाया कि भाजपा केवल बड़े-बड़े विज्ञापनों में बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीन पर भाजपा की कोई योजना नजर नहीं आ रही है। नौकरी मांगने वालों को सरकार लाठियों से पिटवा रही है और मंच व माइक से गर्मी निकालने की बात कहकर जनता को गुमराह करने का षड्यंत्र सूबे के मुख्यमंत्री व भाजपा के दिग्गज नेता कर रहे हैं। कहा कि भाजपा सरकार ने आम आदमी का सम्मान खत्म कर दिया। भाजपा शासनकाल में जनता ने किल्लत व जिल्लत की जिंदगी जी है, लेकिन अब वह परिवर्तन चाहती है। यही लहर यूपी में पहले चरण से चली और यूपी में बीएड-टेट पास युवाओं की उपेक्षा की जा रही है। भरोसा दिया कि बीएड-टेट के साथ-साथ शिक्षामित्रों को सम्मान दिया जाएगा। इस मौके पर पूर्व सांसद रामकिशुन, कैलाशनाथ यादव, प्रभुनारायण सिंह यादव, मनोज सिंह डब्लू, चंद्रशेखर यादव, जितेंद्र कुमार, मनोज काका, अरविंद यादव, परवेज अहमद जोखू, जिलाध्यक्ष सत्यनरायन यादव, सुनील यादव गुड्डू, मयंक सिंह, अशोक त्रिपाठी छोटू, रुकमणि निषाद, मुसाफिर चौहान आदि उपस्थित रहे। संचालन नफीस अहमद ने किया।

इतिहास के घर में

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

इतिहास अपने समय में मनुष्य जाति की सामूहिक चेतना का घर है। हमारी चेतना बहुत हद तक ज्ञात और बहुत हद तक अज्ञात रूप में इतिहास में निवास करती है। इतिहास प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में हमारे चिन्तन और विचार को प्रभावित करता है। यह सच है कि इतिहास मनुष्य जाति की निर्मिति है। मगर यह भी सच है कि मनुष्य जाति के निर्माण में भी इतिहास की महत्वपूर्ण भूमिका है। मनुष्य, इतिहास को बनाता है और इतिहास मनुष्य को बनाता है। इतिहास और आदमी का पारस्परिक अन्तर्सम्बन्ध अत्यन्त संवेदनशील और नाजुक है।
ठीक घर की तरह ही इतिहास हमें सुरक्षा, सुविधा और जीवन के विकास के लिये ऊर्जा प्रदान करता है। उसके प्रति हमारा रागात्मक लगाव स्वाभाविक है। मगर इसके मायने यह कत्तई नहीं है कि घर की संरक्षा के कारण उसके प्रति हमारा राग जड़ और स्थिर होकर हमारे में जड़ता का संचार करने लगे। हम घर बनाते हैं, अपने पुरखों के घर को परिवर्धित और संबर्धित करते हैं। हमारे घर में रहने की सार्थकता, हमें प्राणवान और ऊर्जावान बनाकर हमें गतिशील करने में है।
इतिहास के साथ मानवीय चेतना का रिश्ता स्थिर रिश्ता नहीं है। वह द्वन्द्वात्मक और गतिशील रिश्ता है। इतिहास से मनुष्य जाति की सामूहिक चेतना की निर्मिति और मनुष्य जाति की सामूहिक चेतना से इतिहास की निर्मिति की प्रक्रिया हमेशा चलने वाली निरन्तर गतिशील प्रक्रिया है। जो लोग यह समझते हैं कि इतिहास केवल कुछ बीती हुई घटनाओं का लिखित या अलिखित समुच्चय भर है, वे इतिहास चेतना के मर्म को बूझने से वंचित रह जाते हैं। जो वंचित रह जाते हैं, वे ही अपने भ्रमों के दुराग्रह से इतिहास की सजीवता को नष्ट करने का अपराधी उद्योग करते हैं। इतिहास वह नहीं है, जो आज नहीं है। इतिहास वह है, जो आज भी अपने परिणामों के प्रभाव से हमारे जीवन को आन्दोलित करता है। इतिहास अपने परिणामों के प्रभाव के रूप में हमारे में मौजूद है। उस प्रभाव को अपने समय के सन्दर्भ में ग्रहण करने के विवेक को ही इतिहास चेतना कहा जाता है। इतिहास चेतना के विकास के अभाव में इतिहास की जानकारियों का कोई मतलब नहीं होता। इतिहास चेतना का विकास किये बिना इतिहास की शिक्षा का विस्तार जीवन दृष्टि को समृद्ध करने में कभी अर्थवान नहीं हो सकता।
मनुष्य जाति चाहे जितनी शक्तिशाली और तकनीक में समुन्नत हो जाय, मगर वह इतिहास के तथ्यों को बदलने में कभी समर्थ नहीं हो सकती। इतिहास की गलतियों को ठीक करने का दम्भपूर्ण उद्योग मनुष्य जाति को प्रतिगामिता की ओर ले जाने का केवल एक छलपूर्ण उद्वेलन है। इसके मूल में किसी प्रछन्न स्वार्थ के अलावा किन्हीं दूसरे सार्थक तथ्यों की तलाश सरासर धोखा है। इतिहास के अपराधों के अभियोग वर्तमान की अदालत में सुनवाई के लिये लगाने की उत्प्रेरणा एक उत्तेजक मानसिक वंचना के अलावा और अर्थ नहीं रखती। इतिहास से प्रतिशोध का प्रयत्न जीवन से विमुख होने के प्रयत्न से भिन्न नहीं है।
इतिहास हमें आगाह करता है कि कोई भी अवसर केवल एक बार ही आता है। अवसर दुबारा नहीं आते। दुहराये नहीं जाते। बीते हुये अवसरों के अनुभव आगे आने वाले अवसरोें के लिये हमें सतर्क और सनद्ध कर सकें, हमारे विवेक को जाग्रत और हमारी शक्ति को उर्जस्वित कर सकें तो इतिहास की सार्थकता प्रमाणित होती है। इतिहास में उपस्थित अवसरों के घटित परिणाम हमारे पक्ष में भी होते हैं और विपक्ष में भी। हमारी अभीप्याओं का अक्षत भी बनाये रखते हैं और प्रतिरूप भी होते हैं। हमारी आकांक्षाओं के अनुरूप भी होते हैं और क्षत-विक्षत भी बनाते हैं। इतिहास के बहुत से स्थल हमारे लिये गर्व के भी विषय हैं और बहुत से ग्लानि के भी। इतिहास के प्रति हमारा क्या व्यवहार हो, इसे तय करना हमारा सबसे अधिक उत्तरदायित्व का काम है।
जहाँ तक मैं समझता हूँ इतिहास के साथ हमें अपने रिश्ते को बेहद संयम, धैर्य, सहिष्णुता और विवेक के साथ बरतने का व्यवहार विकसित करना चाहिए। वर्तमान की तरह ही इतिहास की विद्रूपताएँ भी हमें पीड़ा पहुँचाती है, यह बिल्कुल सच है। उस पीड़ा को सहने की शक्ति अपने में हमें विकसित करने के अलावा दूसरे रास्ते और अधिक भयावह परिणाम की ओर ले जाने वाले होंगे।
हमारे इतिहास में हल्दीघाटी की लड़ाई हमारी विरासत की हारी हुई लड़ाई है। मगर तमाम जीती हुई लड़ाइयों से यह हमारे लिये अधिक कीमती, गौरवपूर्ण और गर्व की लड़ाई है। ऐसा क्यों है? एक हारा हुआ नायक हमारे जातीय गौरव का महानायक क्यों है? हमें सोचना चाहिए। राणा प्रताप हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक चरित्र क्यों है? एक शासक के रूप में अकबर की महानताओं के सम्मुख उसकी क्षुद्रताओं को उजागर करने में राणा प्रताप कैसे समर्थ हैं? ये सब सवाल हमारी इतिहास चेतना के निर्माण के लिये बेहद जरूरी सवाल हैं।
कोई भी लड़ाई बड़ी या छोटी नहीं होती। हमेशा लड़ाई का मकसद लड़ाई की महत्ता का निर्धारण करता है। किसी भी लड़ाई में हार या जीत बड़ी चीज नहीं होती। बड़ा केवल संकल्प होता है। जो मनुष्य की गरिमा की रक्षा के लिये लड़ते हैं, इतिहास उनका को जाता है। उनका इतिहास भविष्यत की मनुष्य जाति की इतिहास चेतना के निर्माण का उत्प्रेरक बन जाता है। महाराणा की लड़ाई, शिवाजी की लड़ाई, टीपू सुल्तान की लड़ाई, लक्ष्मीबाई की लड़ाई राजनीतिक लड़ाई नहीं है। वह मनुष्य की जन्मगत स्वतंत्रता, सहज स्वाभिमान और अपनी ऐतिहासिक विरासत की सुरक्षा की लड़ाई है। मनुष्य की महत्ता को बचाये रखने के लिये लड़ी गई कोई छोटी-सी, छोटी लड़ाई भी सहज ही महत्तम बन जाती है।
इन लड़ाइयों की स्मृति का अटल प्रतिरोध हमें उच्चतर मानवीय मूल्यों की विरासत के प्रति हमारे में सम्मान का भाव जगाकर सार्थक इतिहास चेतना का विकास करता है।
कौन-सी लड़ाई, कौन-सा प्रतिरोध, कौन-अभियान आदमी को बड़ा बनाता है, यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। जिससे उसके पास्परिक सम्बन्धों का दायरा बढ़ता है, सहिष्णुता और सहकारिता विकसित होती है, आन्तरिक सम्मान समृद्ध होता है, स्वाभिमान उन्नत होता है, मनुष्य जीवन के लिये वह सब मूल्यवान है, महत्वपूर्ण है। वही हमारी ऐतिहासिक सम्पदा है। मनुष्य जाति का जो भी आचरण और व्यवहार एक दूसरे के प्रति क्रूर, अहिष्णु और प्रतिशोधी बनाता है, मनुष्य की कीमत घटाने वाला है, आदमी को छोटा बनाने वाला है। वह सब न हमारे अपने काम का हैं, न अपनों के काम का है। न इतिहास के काम का है, न वर्तमान के काम का, न भविष्य के काम का।
जो इतिहास हमें उन्नत बनाने में सहायक नहीं है, वह इतिहास नहीं, इतिहास का उच्छृष्ट है। इतिहास में इतिहास का उच्छृष्ट भी, इतिहास के स्वरूप में समाहित पड़ा है। इतिहास के सत्व से इतिहास के उच्छृष्ट को अलगाने के लिये, इतिहास चेतना का विकास मनुष्य जाति के विकास के लिए सबसे अधिक मूल्यवान चीज है।
घर में रहते हुये घर के प्रभाव को अपने अनुकूल बनाने का उद्योग हमेशा से, हमेशा के लिये मनुष्य जाति के जीवित और जागृत होने का सहज प्रमाण है। इतिहास मनुष्य की सामूहिक चेतना का आवास है। अपने पुराने घर में हमें कहाँ नई खिड़की खोलने की जरूरत है और कौन-सी पुरानी खिड़की बन्द कर देना हमारी जरूरत के अनुकूल है, इसका विवेक हमें अपने में विकसित करना है।
मनुष्य जाति की जीवन यात्रा के लिये इतिहास उसकी स्मृति में संचित पूँजी है। इतिहास पंथ नहीं है, पाथेय है। पाथेय और पूँजी उपयोग के लिये है। इस उपयोग की प्रविधि का संधान ही इतिहास चेतना का मूल कर्तव्य है।
जो जातियाँ अपने इतिहास का उपयोग अपनी अभ्युन्नति और अपनी समृद्धि के लिये करने की शक्ति और विवेक हासिल कर लेती हैं, वे जीवित जाति कहलाती हैं। वे हमेशा जीवित और जागृत रही है। शक्तिशाली और समृद्धिशील होती है। इसके विपरीत जो जातियाँ इतिहास के उपयोग के काम आ जाती हैं, किसी तरह के अधैर्य, उत्तेजना और अविवेक के कारण इतिहास के उपयोग में खप जाती हैं, वे मिट जाती हैं।
मिटने का रास्ता इतिहास के काम का भी रास्ता नहीं है। अन्ततः मिटने के रास्ते पर जाना इतिहास में सम्मिलित होने से वंचित रह जाना होता है।
इतिहास के घर में रहकर इतिहास को समृद्ध बनाने के विवेक से वंचित रह जाना मनुष्य जाति क सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

परदेश को उठे पाँव

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

संकट है। चहुँओर संकट है।
चिड़िया के लिये चारा नहीं है। पंछी के लिये पानी नहीं है। पंथी के लिये छाँह नहीं है। आस्था के लिये कहीं कोई आश्वासन नहीं है।
जवानों के लिये रोजगार नहीं है। वृद्धों के लिये कोई सहारे क संबल नहीं है। दुध-मुँहों के लिये दुलार नहीं है। कहीं कोई हास-हुलास नहीं है।
खेतों के गिरे हुये, बचे हुये अन्न आग के हवाले कर दिये गये हैं। तालाबों, पोखरों के मुँह न जाने कबके सूखे हैं। छाँहों के सारे ठाँव राजाज्ञा की निगरानी में नजरबन्द हैं। आस्था के वृक्ष जंगलराज के ठेकेदारों के हाथ में जा चुके हैं।
चिड़िया कहाँ रहें? कैसे रहें? न रहें तो कहाँ जायँ? जायँ तो कैसे जाय? बड़ा संकट है। संकट है कि- ‘‘का खाईं, का पीहीं, का ले परदेश जाईं?’’
देश में रहना न हो सकेगा तो परदेश जाना ही पड़ेगा। हमारे समय में पूरे के पूरे गाँव ही परदेश जाने को पाँव उठाये खड़े हैं।
हमारे गाँव बड़े-बड़े शहरों के परदेश रोज-रोज जाने का मंसूबा बाँधते हैं। जाते हैं, जाकर अपनी पहचान खो देते हैं। गाँव शहर में जाकर खो जाते हैं। खप जाते हैं।
हमारे गाँव के जवान बड़े-बड़े शहरों की छोटी-छोटी फैक्टरियों के मजदूर बनकर अपना मुँह छिपाने को बेबस हैं। वृद्ध ए0टी0एम0 के मुँह जोहने को विवश हैं। जो अभी नहीं जा पाये हैं, वे भी जाने को पाँव उठाये खड़े हैं। न जायें तो क्या खायें? क्या पीयें? जायें तो, क्या लेकर परदेश जायें?
खेत गिरवी हैं। गहने ब्याज के बन्दीगृह में कैद हैं। काम पाने के लिये एजेण्टों की चिरौरी-मिनती चालू है। एजेण्ट पत्थर दिल है।
चिड़ियाँ परदेश जाना चाहती है। जवानी परदेश जाना चाहती है। कुल मिलाकर पास में एक चना है। चना दाल दलने के लिये चाकी में डाल दिया गया है। चाकी में एक चने की बिसात ही क्या। दाल चाकी के किल्ले में फंस गई है। अटक गई है।
चिड़िया बढ़ई के यहाँ गुहार लगाती है। बढ़ई किल्ला फाड़ दे तो दाल निकल आये। मगर नहीं, बिगड़ैल बढ़ई नहीं सुनता।
हमारे समय में फरियाद डालने के लिये भी जुगाड़ की जरूरत है। सिफारिश का जोर चाहिये। फिर फरियाद सुनने के लिये घूस चाहिये। काम पाने के लिय, काम की पगार पाने के लिये पगड़ी चढाने का बूता चाहिए। पगड़ी चढ़ाने के लिये सिर्फ एक चना है। चना चक्की के किल्ले में फँसा है। क्या लेकर परदेश जाय।
परदेश जाना लाजिमी है। मगर क्या लेकर? लेकर जाने को कुछ नहीं है। जो है, चक्की में है। जो है, चक्की के किल्ले में फंसा है।
परदेश में कौन, किसका सगा-सम्बन्ध्ी है, कोई नहीं। जिसके बाप में कोई कूबत नहीं है, उसे हर किसी को बाप बनाना है। कोई बाप बने न बने, दीगर बात है। मगर बनाना है। हमारे समय की जवानी लावारिस जवानी है। हमारे समय के बाप बिना कूबत के बाप हैं। अपने बापों की विवशता से कुपोषित जवानी पत्थरों के आगे बाप-बाप चिल्ला रही है। पत्थर सुन नहीं रहे हैं। फिर? बुरा हाल है।
जहाँ भूख है, भोजन नहीं है। जहाँ प्यास है, पानी नहीं है। जहाँ भोजन है, भूख नहीं है। जहाँ पानी है, प्यास नहीं है। जहाँ हाथ है, काम नहीं है। जहाँ काम है, हाथ नहीं है। जहाँ आँख है, सपने नहीं है। जहाँ सपने हैं, आँख नहीं है। बड़ा विपर्यय है। मगर है। हमारे समय में बहुत कुछ नहीं है मगर विपर्यय हर कहीं है।
विपर्यय में ही जीना है। रोज-रोज उधर जाती सीवन को रोज-रोज सीना है। फिर भी विकास की घुट्टी हमें पीना है। हम विकास के पथ पर अग्रसर है। हमारे गाँवों में उजाड़ का निरन्तर विकास हो रहा है। गलियों और चौपालों में सन्नाटे का बराबर विकास बढ़ रहा है। आपस में अपरिचय का, असंवाद का विकास बढ़ रहा है। चौड़ी-चौड़ी सड़कों के विस्तार में दुर्घटनाओं में बेशुमार विकास हो रहा है। दुर्घटनाओं में घायलों और मृतकों के लिए ट्रामा सेण्टरों का विकास बढ़ रहा है। किसिम-किसिम के स्कूलों में हर साल बढ़ती फीसों का विकास बढ़ रहा है। अलगाव और असुरक्षा का विकास तो बाढ़ की तरह उफन रहा है। भला कौन कह सकता है कि विकास नहीं बढ़ रहा है।
नहीं बढ़ रहा है, तो पारस्परिक विश्वास नहीं बढ़ रहा है। कर्तव्यबोध नहीं बढ़ रहा है। देश प्रेम नहीं बढ़ रहा है। जीवन की सुरक्षा नहीं बढ़ रही है। आश्वस्ति के आश्रय नहीं बढ़ रहे हैं। मगर इनके बढ़ने, न बढ़ने से हमारा विकास प्रभावित होने वाला नहीं है। लूट का, दलन का, दमन का विकास तो जंगल-जंगल गूँज रहा है। नदी-नदी, पहाड़-पहाड़ गरज रहा है।
बहुत लोग हैं, जिनका कहने-सुनने से विश्वास उठता जा रहा है। कहने को बहुत कुछ है, मगर किससे? जिनसे कहना है, उन्हें सुनने में कोई रूचि नहीं है। जिन्हें सुनना है, वे कान में तेल डाले बोलने के व्यापार में लगे हैं। जो कुछ सुन सकते हैं, उनसे कुछ भी कहना व्यर्थ है। फिर? फिर क्या, जो है सो है।
चिड़िया चाहे, जितनी चिल्लाये कोई सुनने वाला नहीं है। वह जितनी चिरौरी करे कोई पसीजने वाला नहीं है। सुनने वाला कोई नहीं है। चिड़िया की फरियाद कोई नहीं सुनेगा, न बढ़ई, न लाठी, न भाड़, न समुद्दर, न हाथी, न साँप, न रानी। हमारे पुरानी लोककथा की चिड़िया हमारे समय की चिड़िया नहीं है। हमारे समय की चिड़िया, कहानी की चिड़िया से अधिक अभागी है। कहानी के समय से हमारे समय में अभाग का विकास बहुत आगे बढ़ चुका है।
परदेश जाना चाहो जाओ। कैसे जाना है, तुम जानो। जाना चाहो खाली हाथ चले जाओ। रहना चाहो, खाली पेट रहो। जैसे भी रहना हो, रहो मगर चुप रहो। बस बोलो मत। बोलने से कानून व्यवस्था प्रभावित होती है। कानून-व्यवस्था में बाधा डालना अपराध है। अपराध के लिये सजा है। बोलोगे, तो सजा मिलेगी। और कुछ मिले, न मिले सजा जरूर मिलेगी। हमारे समय में सजा सुलभ है। न्याय दुर्लभ है। जो दुर्लभ है, उसे छोड़ो। जो सुलभ है उसे लो।
वोट दे दो। आश्वासन ले लो। आश्वासन को खाओ। आश्वासन को पीओ। आश्वासन को ले परदेश जाओ। परदेश में खो जाओ। परदेश में खप जाओ।
पता नहीं कैसा समय है। अपने ही देश में जाने कितने-कितने परदेश उगे आ रहे हैं। पनपते जा रहे हैं।
अपना देश, परदेश क्यों बनता जा रहा है। सारे जाने-पहचाने अपने, पराये जैसे क्यों बनते जा रहे हैं। अपना गाँव अपने गाँव जैसा क्यों नहीं है? अपने बाप, बाप जैसे क्यों नहीं हैं? अपनी सरकार अपनी सरकार जैसी क्यों नहीं है?
बहुत से सवाल हैं, गाँव-गाँव, गली-गली बौड़िया रहे हैं। सवाल बवण्डर की तरह उठ रहे हैं। धूल-गर्द फैला रहे हैं। आँखों में भरे आ रहे हैं। आँखें किरकिरा रही हैं। कुछ सूझ नहीं रहा है। सब पहचाने, अनपहचाने से बनते जा रहे हैं।
केवल चिड़िया नहीं, केवल जवान नहीं, केवल जवानी नहीं केवल बुढ़ापा नहीं, पूरा का पूरा गाँव, पूरे के पूरे गाँव परदेश जाने को पाँव उठाये हुये हैं।
हर कोई, हर किसी से पूछ रहा है- ‘का खाईं, का पीहीं, का ले परदेश जाईं?’’
कोई जवाब नहीं है। कहीं कोई जवाब नहीं है। कहीं से कोई जवाब नहीं उठ रहा है।
सवाल उठ रहे हैं। एक नहीं, दो नहीं। हजार-हजार, लाख-लाख, करोड़-करोड़ सवाल उठ रहे हैं। हमारे समय में आदमी सवाल में बदलता जा रहा है।
हमारे समय में भोजन, सवाल में बदलता जा रहा है। वस्त्र, सवाल में बदलता जा रहा है। दवा, सवाल में बदलती जा रही है। शिक्षा, सवाल में बदलती जा रही है।
हमारे समय में हर आदमी अपने ही घर में प्रवासी बनता जा रहा है। घर-घर में एक परदेश घुसने के लिये पाँव उठाये खड़ा है। हर घर, परदेश जाने को पाँव उठाये है।

वह बात नहीं कहनी है

Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

हम, जो हैं भलीभाँति जानते हैं। अपने बारे में सच्ची बात सबसे अधिक हम ही जानते हैं। मगर हम अपने बारे में हमेशा यही चाहते हैं कि हम जो हैं, हमारी जो सच्चाई है, जिस सचाई को हम जानते हैं, दूसरे न जान पायें। मुझे लगता है, जीवन के आन्तरिक धरातल पर यह दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है, जो हमें बिल्कुल ही आश्चर्य जैसा नहीं लगता। ऐसा क्यों है?
मुझे लगता है मनुष्य जाति वास्तविकता में बहुत कम जीती है, सपने में अधिक जीती है। हम जो हैं, उसे स्वीकार नहीं करते। हम जो होना चाहते हैं, वहीं अधिक जीते हैं। यह अस्वाभिक नहीं है मगर विस्मयजनक जरूर है। जो है, वह सचाई है। जो चाहिये, वह सपना है। जीवन सिर्फ सचाई नहीं है। जीवन सिर्फ सपना नहीं है। जीवन में सचाई और सपने के संगम रोज-रोज, क्षण-प्रतिक्षण होते रहते हैं।
जीवन गतिशील है। गति लक्ष्य के प्रति होती है। जो है उसमें गति की कोई संभावना नहीं है। आकर्षण, जो चाहिए, उसके प्रति है। वही गति पैदा करता है। जीवन केवल यथार्थ भी नहीं है। जीवन केवल आदर्श भी नहीं है। जीवन यथार्थ और आदर्श का अन्तः संघर्ष है। जो मौजूद है, सिर्फ वही सच नहीं है। सच की शाखायें जो नहीं है, उसमें भी फैली हुई हैं। जीवन में रस हमेशा ही मनुष्य को संभावनाओं में अधिक लुभाता रहता है।
हम अगर ध्यान से देखें तो पायेंगे कि हमारे जन-जीवन का अधिकांश जो है, उसे नकारने में, उसे अस्वीकारने में और उसे छिपाने में लगा हुआ है। यह बड़ी बेधक विडम्बना है। गरीब से गरीब आदमी अपने को गरीब मानना नहीं चाहता। भिखमंगा भी अपने को भिखमंगा देखना नहीं चाहता। बेईमान से बेईमान आदमी अपनी पहान बेईमान के तौर पर नहीं चाहता। आदमी को चोरी करने से कोई परहेज नहीं है, डर नहीं है। डर है तो सिर्फ इस बात से कि वह चोर के रूप में पहचाना न जाय।
हमारी सारी शुचिता और नैतिकता का हमारे एकान्त में कोई मूल्य नहीं है। उसका मूल्य है, भीड़ के सामने। उसकी कीमत है, प्रदर्शन में। हमारी सारी शुचिता और नैतिकता के मूल्यों का बाजारू बन जाना हमारे लिये कितना ग्लानि का विषय है, हम नहीं जानते। हम नहीं जानते कि हमारे जीवन में सारे के सारे ग्लानि के विषय गर्व के विषय के रूप में क्यों बदलते जा रहे हैं?
हमारे समय में व्यापक जनवर्ग के सामने भीषण चुनौतियाँ मुँह फारे खड़ी है। हमारे सामने जीवन-यापन के ढंग और ढर्रे इतने मुश्किल होते जा रहे हैं कि हमारा जीना ही दुश्वार बनता जा रहा है। अब तो धीरे-धीरे सामान्य आदमी के लिये अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला पाना भी उसके बूते के बाहर होता जा रहा है। शिक्षा की सुलभता की सरकार की घोषणाएँ जनता के जले जी पर नमक छिड़कने जैसी पीड़ा पैदा करने के अलावा किसी काम की नहीं है। एक जनतांत्रिक देश में जनता के लिये कहे जाने वाली शासन व्यवस्था में शिक्षा का आदमी की पहुँच से बाहर हो जाना कैसा पीड़ादायक है, कह पाना मुश्किल है। शिक्षा इतनी महँगी क्यों होती जा रही है? आदमी अपनी बीमारी का इलाज कराने में असमर्थ क्यों होता जा रहा है? विकास के वंचक नारों के शोर के बीच इन सवालों को सुनने वाला कोई नहीं है। हमारे समय में जीवन से जुड़े सवाल राष्ट्र विरोधी सवाल बन गये हैं। राष्ट्रविरोधी बनने के कलंक के डर से हमारे समय का हलक सूख रहा है।
पढ़ाई हमारे हाथ से बाहर हो जाय कोई बात नहीं, हमें चुप रहना है। दवाई हमारे हाथ से बाहर हो जाय कोई बात नहीं, हमें चुप रहना है। घर बनाना, शादी-ब्याह रचाना हमारे हाथ से बाहर हो जाये कोई बात नहीं, हमें चुप रहना है। हमें चुप रहकर, चुप्पी मारकर बस जिन्दा रहना है। हमें जिन्दा रहना है, सिर्फ इसलिये कि हमें पोलिंग बूथ जाकर वोट डालना है। जबान बन्द रखकर वोट करते जाना राष्ट्रभक्ति है। जीवन की दुश्वारियों के बारे में कुछ भी कहना राष्ट्रद्रोह है। हमारे देश में इतने तरह के विद्यालय क्यों हैं? तरह-तरह के विद्यालय क्यों हैं? इतने तरह के अस्पताल क्यों हैं? हमारी पहुँच से बाहर के अस्पताल क्यों हैं? नहीं ये सब गैर मुनासिब सवाल हैं। ये सब शान्ति भंग के सवाल हैं। इनके पूछने पर हमारे कानून में सजा के प्राविधान सुनिश्चित हैं।
हम जिस जगह पर हैं और जिस महफिल में जमे रहने की जद्दोजहद में लथपथ हैं, वहाँ हमारा बने रहना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। स्थितियाँ विपरीत होती जा रही हैं। हम पढ़ाई के लिये, दवाई के लिए, शादी के लिये कर्ज लेने को, जमीन-मकान बेचने को मजबूर होते जा रहे हैं। हम रोज-रोज अपनी विरासत की गाँठ गँवाते जा रहे हैं।
मैंने बचपन में एक कहानी सुनी थी। तब वह कहानी केवल हँसने के काम की चीज थी। अब वह कहानी मुझे बार-बार याद आती है, मगर हँसी नहीं आती। लगता है, वह कहानी हमारी ही कहानी है, हम सबकी कहानी है। उस कहानी में अपना ही व्यापक विषाद है। अपने पर ही फूटने वाली बेधक करुणा है।
कहानी है कि एक बाबू साहब की बारात में एक लाला जी बाराती बनकर गये थे। जनवास के दिन दोपहर में तवायफ के नाच के लिये महफिल सज रही थी। उसी बीच लाला जी को पेट में गुड़गुड़ी महसूस हुई। उन्होंने सोचा, चलो महफिल शुरू होने से पहले ही निपट लेते हैं। बाद में बेवजह बाधा होगी। लाला जी ने पंडाल के बाहर मिट्टी की मेटी में पानी भरा और खेत की तरफ निकल गये। कुछ दूर जाकर माटी के ढूहे की आड़ में हाजत के लिये बैठ गये। जैसे ही लाला जी का पेट साफ हुआ, मिट्टी का मटका बिहला गया। शायद मटका ठीक से पका नहीं था। सारा पानी बह गया। लाला जी हैरान, परेशान। अब क्या करें? चारों तरफ आँख फैलाकर देखा। कोई दिखा नहीं। लाला जी आश्वस्त हुये। चलो कोई देख नहीं रहा है। यही क्या कम है। उन्हें सुकून हुआ। कोई दूसरा उपाय संभव न देखकर उन्होंने मिट्टी के ढ़ेले से विलायती ढंग से शौचमुक्ति का काम सम्पन्न किया। फिर आये। आकर बड़े शान के साथ महफिल में अपना आसन जमा लिया।
जब लाला जी महफिल में जमे तवायफ की नाच शुरू हो चुकी थी। वह मंडलाकार, घूमकर नाच रही थी। गाना सम पर आया और नर्तकी ने लाला जी के ठीक सामने झुककर बड़ी अदा से गाने के बोल अर्ज किये,- ‘लाला तेरी बतिया मैं कह दूँगी।’’
लाला जी का कलेजा काँप उठा। उन्हें बड़ी हैरानी हुई। आखिर यह ससुरी कैसे जान गई। जो भी हो, जान गई तो जान गई। मगर कह देगी तो? बड़ी भद्द होगी। आबरू उतर जायेगी। नहीं, नहीं कहने नहीं देना होगा।
लाला जी ने निश्चय किया। नहीं, कहने नहीं देना है। उन्होंने अपनी धोती का फेंटा खोला चटपट। दो रुपये का कड़क नोट निकाला और मुस्कराते हुय बड़ी उत्फुल्लता से ईनाम पेश किया। नर्तकी खुश हुई। उसका चेहरा चमक उठा। पाँव थिरक उठे। उसने समझा लाला जी को गाने के बोल की उसकी अदायगी बेहद पसन्द है।
नर्तकी घूम-घूमकर लाला जी के सामने आती है। बोल दुहराती रही। लाला जी बख्शीश देते रहे। लाला जी चुप कराते रहे। वह गाती रही। गाना लम्बा खिंचता रहा। लाला जी की गाँठ खाली हो गई। वे धीरे से उठे आँख बचाकर महफिल से और तम्बू से बाहर हो गये। गाने के बोल फिर भी उनके कानों में बजते रहे,- लाला तेरी बतिया मैं कह दूँगी।’’
मैं देख रहा हूँ, हमारे समय में हर कोई लाला जी की तरह हैरान है, परेशान है। हम अपनी आन्तरिक शुचिता का मूल्य अपने एकान्त में भूल चुके हैं। हम हर क्षण आशंकित हैं, हमारी आन्तरिक सचाई कोई जान तो नहीं गया है।
इधर बाजार है कि हमारे वजूद की रत्ती-रत्ती सचाई समझ रहा है। वह हमारी सामर्थ्य भी भली-भाँति जान रहा है और हमारी लाचारी भी अच्छी तरह समझ रहा है। वह हमारी लाचारी से अपना लाभ भुनाने में लगा है। बाजार हमें दुह रहा है। हमारा दोहन करने में जी-जान से लगा है। वह विज्ञापन की भाषा में नये-नये गाने गढ़ रहा है। आकर्षक स्त्री स्वर में गा रहा है। रिझा रहा है। हम अपनी विरासत की गाँठ लुटा रहे हैं। लुटाते जा रहे हैं। फिर भी……।
फिर भी…..। फिर भी सवाल है कि क्या, हम जहाँ है, हम जिस दिखावे की नकली महफिल में जमे रहना चाह रहे हैं, वहाँ जमे रह पायेंगे। शायद नहीं। कर्ज लेकर, जमीन बेंचकर, मकान गिरवी रखकर वहाँ जमे रहना लम्बे समय तक मुमकिन नहीं है। हमारी गाँठ, खाली होनी ही है। हमें महफिल से बाहर होना ही है। हम बाहर होंगे मगर अपने गाँठ की सारी पूँजी गँवाकर।
जब-जब यह कहानी मुझे याद आती है, मेरा मन उदास हो जाता है। मुस्कराने की कोशिश करते अनगिन चेहरों के नीचे उफनता अवसाद गरजता हुआ सुनाई पड़ने लगता है। मैं अपने ही भीतर कहीं अस्फुट स्वर में अज्ञेय के खोये स्वर ढूंढने लगता हूँ-
‘‘अच्छी कुंठा रहित इकाई, साँचे ढले समाज से।
अच्छा अपना ठाट फकीरी, मँगनी के सुख् साज से।।’’
मैं देख रहा हूँ, हमारे समय में मँगनी के सामानों की महफिल से फकीरी ठाट मुँह लटकाये भ्रमवश जीवन संचित मधुकरियों की भीख लुटकर बाहर निकलता जा रहा है।

अभिनय की प्रतिष्ठा

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

हमारे समय में जीवन और व्यवस्था से जुड़े तमाम मुद्दों पर लोगों के बीच भारी मतभेद है। मगर अभिनय की श्रेष्ठता हर आदमी को एकमत से स्वीकार है। निर्विवाद रूप में हर क्षेत्र में अगर कोई उल्लेखनीय उपलब्धि है, तो वह अभिनय की प्रतिष्ठा है।
अभिनय निश्चित तौर पर प्रशंसनीय कला है। अभिनय की कला से हम इतने प्रभावित हुये हैं कि हमने उसे अपना समूचा जीवन ही समर्पित कर दिया है। अभिनय हमारे दिल-दिमाग में प्रवेश कर गया है। घुसकर उसने अपनी जगह बना ली है। जगह क्या बना ली है, समझिये कि पूरी जगह ही हथिया ली है। हमारे समय में अभिनय हमारा आचरण बन गया है।
अभिनय का आचरण बन जाना कैसा है, हमें नहीं मालूम। जैसा भी हो क्या फर्क पड़ता है। है तो, है। अभिनय आदमी का स्वभाव नहीं है। स्वभाव की अनुकृति है। अपने स्वभाव से बाहर निकल कर दूसरे के स्वभाव का अनुसरण, अभिनय होता है। जो अपना नहीं है, दूसरे का है, उसे अपना बना लेना अभिनय है। जो असली नहीं है, उसे असली की तरह, दिखा देना अभिनय है। नकली में असली का विश्वास पैदा कर देना अभिनय है। हमारे समय में अभिनय हमारा धर्म बन गया है। हमारा राष्ट्रधर्म बन गया है। क्या हमारे समय में हर आदमी अपने स्वभाव के निषेध में तल्लीन है। हर आदमी किसी दूसरे की नकल में तत्पर है। हर आदमी नकली को असली बनाने में, बनाकर हर किसी को दिखाने में निरत है। हर आदमी जो अपना नहीं है, उसे अपना बनाने के उद्योग में लगा है। कितना अद्भुत है।
अभिनय का आचरण में बदल जाना कितना अद्भुत है। शायद इसका हमें पता नहीं है। जो है, उसका हमें पता नही ंहोना कितना अद्भुत है। अपने निरन्तर नकली होते जाने की प्रक्रिया का हमें पता नहीं होना कितना अद्भुत है। अभिनय का सिनेमा के पर्दे से निकल कर जन-जन में व्याप्त हो जाना कितने विस्मय की बात है। मगर बात कुछ जन की नहीं हैं। एक-दो जन की बात होती तो कुछ बूझने की बुझाने की गुंजाइश भी रहती। यहाँ तो कूपहिं में भाँग पड़ी है। नहीं, कुँए में ही नहीं, कुँए कुएँ में हर कुएँ में भाँग पड़ी है। फाग कही नहीं है। भाँग, हर कहीं हैं। आनन्द कहीं नहीं है। उल्लास कहीं नहीं है। नशा हर कहीं है।
हमारे समय में हर नेता अभिनेता बनने को प्राण-पण से जूझ रहा है। इस कला की साधना में उसने अपना सारा समय और समूचा स्वत्व समर्पित कर दिया है। सत्ता पर कब्जा पाने के लिये कोई भी अभिनय से उसे इंकार नहीं है। किसी को अपना चेहरा याद नहीं है। किसी का अपना चेहरा नहीं है। मुखौटे हर किसी को याद हैं। हर किसी की स्मृति का भंडार मुखौटों से भरा पड़ा है। अभिनेताओं के पाँव तो राजनीति में अंगद के पाँव बन ही गये हैं। अभिनेताओं के नेता बनने की प्रक्रिया हमारे समकालीन जीवन में अभिनय की अपूर्व प्रतिष्ठा का पक्का सबूत है।
हम खुश नहीं हैं, रत्तीभर भी मगर चेहरे पर खुशी का पाउडर पोत कर घूम रहे हैं। हजार तरह के भय भरे हुये हैं भीतर। मगर निडरता का क्रीम चेहरे पर मलकर चमकाये चल रहे हैं। लोभ भरा हुआ है लबालब अंदर छलक-छलक पड़ रहा है आँखों से मगर त्याग का भाषण झाड़े जा रहे हैं। हम अन्दर बिल्कुल खाली हैं, मगर बाहर, बाहर भरा-भरा दिखने में, दिखाने में व्यस्त हैं। जो है, उसे हम पूरी ताकत लगाकर ढाँक-तोप रहे हैं। जो नहीं है, उसे सब तरह से सबको दिखा देने को बेकल हैं। हमें पता नहीं है कि हम क्या कर रहे हैं। हमारे समय की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि हम जो कुछ कर रहे हैं, उससे हम वाकिफ नहीं हैं। हम यह जानने को उत्सुक ही नहीं हो पा रहे हैं कि हमारे लिये घरों में भी ‘मेकअप’ में रहने की हमारी लाचारी हमारे लिये कितनी दुर्भाग्यपूर्ण है। हमारे घरेलू खर्च में ‘मेकअप’ का बढ़ता हुआ दबाव हमें भीतर से और बाहर से कितना कमजोर करता जा रहा है, हमें मालूम नहीं पड़ रहा है।
पहले हम नाटक देखने के लिये घर से बाहर जाया करते थे। अब हम घर में खुद ही नाटक करने लगे हैं। हम ही नाटक खेल भी रहे हैं, देख भी रहे हैं। पहले हम ‘मेकअप’ का तमाशा देखने ‘थियेटरों’ और सिनेमाघरों में जाया करते थे। अब ‘मेकअप’ का तमाशा हमारे घरों में घुस आया है। इतने तक भी गनीमत थी। इतने तक भी हमारे जीवनबोध को उतना खतरा नहीं था। हमारी परम्परा में गृहस्थ घर में रहता था। बाहर आता था, जाता था मगर रहता था घर में। वह घर में स्थित होता था। घर में स्थित होकर हर कहीं उपस्थित होता था। आज कोई भी घर में नहीं है। किसी के पास अपना घर नहीं है।
हमारे घर से, हमारा घर लापता हो गया है और हमें पता नहीं है। हमारे ही भीतर से हमारा विश्वास लापता हो गया है और हमें पता नहीं है। हमारे लाभ में से हमारा शुभ गायब हो गया है और हमें पता नहीं है। हमारे समय में जो हमारा लाभ है, वह शुभ नहीं है, न अपने लिये, न अपनों के लिये, दूसरों के लिय तो बात ही छोड़िये। ऐसा क्यों है?
उत्तर आसान नहीं है। यह भी सच है कि इस जीवन स्थिति के पीछे कोई एक-दो कारण नहीं है। अनेकों हैं। मगर हमें लगता है कि जो प्रमुख कारण है, वह हमारा अभिनय का आचरण है। हमारा समूचा आचरण ही अभिनय बन गया है। बनता जा रहा है। अब तो स्थिति यहाँ तक आ गई है कि आदमी खुद के समक्ष भी अभिनय कर रहा है। किसान खेती कर नहीं रहे हैं, खेती करने का अभिनय कर रहे हैं। मजदूर, मजदूरी नहीं कर रहे हैं, मजदूरी करने का अभिनय कर रहे हैं। अध्यापक पढ़ाने का अभिनय कर रहे हैं। छात्र पढ़ने का अभिनय कर रहे हैं। अधिकारी, अधिकारी होने का अभिनय कर रहे हैं। बुद्धिजीवी, अपने बुद्धिजीवी होने का अभिनय कर रहे हैं। अभिनय साहित्यकार भी कर रहे हैं। खण्डित और क्षुद्र कालखण्डों के जीवन स्थितियों की बोध विहीन उत्तेजनाओं के सहारे कुछ भी लिखकर साहित्यकार होने की दुर्ललित वासना साहित्य के समग्र बोध को खण्डित करने का अभिनय सीख रही है। हम कर कुछ और रहे हैं मगर करते हुय कुछ और दीख रहे हैं। हम करना कुछ और चाहते हैं मगर कर कुछ और रहे हैं। हम जो कुछ भी कर रहे हैं, बिना मन के कर रहे हैं। हम जो कुछ भी कर रहे हैं, बिना रस के कर रहे हैं। हम अपने काम में अपने को जोड़ नहीं पा रहे हैं। सचमुच हमारे समय की यह कैसी विचित्र विडम्बना है।
हमारे जीवन की जड़ सूख रही है। हम निश्चिन्त नहीं हैं। हम चिन्तित हैं जरूर। हम उद्विग्न हैं। उद्विग्नता में हम पत्ता-पत्ता सींच रहे हैं। हम पत्ता-पत्ता सींच रहे हैं। जड़ प्यासी-प्यासी है। हम सींचते जा रहे हैं। सींचने में अफनाते जा रहे हैं। हरियाली सूखती जा रही है। हमारे वृक्ष छायाहीन होते जा रहे हैं। फलहीन होते जा रहे हैं। हम अपना घर ढूंढने बाजार में हलकान हैं। हम भूल गये हैं, घर बाजार में नहीं मिल सकता। हम भूल गये हैं अभिनय, आचरण नहीं है। हमारे समय में अभिनय की प्रतिष्ठा, आचरण की अप्रतिष्ठा से अलग नहीं है।

इतिहास की गवाही के बिना

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

हिन्दी साहित्य के इतिहास में बहुत से कवि ऐसे हैं, जिन्हें जानने के लिये आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का इतिहास पढ़ना जरूरी है। मगर बहुत कवि ऐसे भी हैं, जिन्हें लोग शुक्ल जी का इतिहास बिना पढ़े भी जानते हैं।
इतिहास का गवाह होना बुरा नहीं है। मगर इतिहास का अस्तित्व का प्रमाणकर्ता हो जाना जरूर अखरने की बात है। शुक्ल जी तक तो गनीमत है। मगर उसके बाद का इतिहास नियामक की भूमिका में फोटो को प्रमाणित करने वाले राजपत्रित अधिकारियों के हस्ताक्षरों का कार्यालयी दस्तावेज बनने की प्रक्रिया में अग्रसर दिखाई देता है। अपने पक्ष और अपनी पसंद को इतिहास के अध्याय बनाने के खड़यन्त्र इतिहास की विश्वसनीयता को ही संदिग्ध बनाने वाले बनते जा रहे हैं। इतिहास व्यक्तिगत पसन्द का अभिलेख नहीं है। व्यापक जनजीवन की भावनाओं के साथ जुड़ाव की परवाह किये बगैर श्रेष्ठता की स्थापनाएँ इतिहास की जवाबदेही के छद्म व्यवहार की पक्की निशानदेही हैं। मगर यहाँ बात इतिहास के बारे में नहीं करनी है।
जो कवि बिना इतिहास पढ़े स्मृति में आ जाते हैं, कभी भूलते नहीं। परीक्षा में उनके बारे में प्रश्न न भी पूछे जायँ, कोई फर्क नहीं पड़ता। परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण कवियों के जीवन परिचय और कविता जो बड़े श्रम से याद की जाती है, परीक्षा बीतने के बाद ही भूल जाती है। जो याद नहीं किया जाता, जिसे याद नहीं करना पड़ता, याद रह जाता है। नरोत्तम दास से मेरा परिचय सहज ही बहुत बचपन में प्रारंभिक कक्षाओं में पढ़ते समय हो गया था। उनकी सरल-सी सीधी-साधी भाषा में कुछ सवैये, कुछ कवित्त जो स्मृति में आये फिर गये नहीं। वे एक बार आकर ठहर गये। बस गये। क्या स्मृति में आकर ठहर जाना कविता का बड़ा गुण है? अवश्य है। मैं कहना चाहता हूँ कि नरोत्तमदास बड़े कवि हैं। उनकी कविता बड़ी कविता है। उनकी कविता मूल्यवान कविता है।
कविता के मूल्यवान होने के केवल एक-दो या कुछ गिने हुये ही कारण नहीं होते। जितने कारण साहित्यशास्त्र के ग्रंथों में गिनाये गये हैं, उतने ही नहीं होते। उनके अलावा भी बहुत से कारण अनगिने भी बचे रह जाते हैं, जिनकी वजह से कविता मूल्यवान होती है। नरोत्तमदास की कविता गिने-गिनाये कारणों से बचे रह गये कारणों के कारण मूल्यवान कविता है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने इतिहास में नरोत्तमदास का उल्लेख सम्मानपूर्वक किया है। उन्हें सीतापुर जिले के बाड़ी कसबे का रहने वाला बताया है। शुक्ल जी ने उनकी भावुकता और भाषा की प्रशंसा की है। उन्हें नरोत्तमदास की कविता में घर की गरीबी का वर्णन सुन्दर लगता है। घर की गरीबी का सुन्दर वर्णन नरोत्तमदास जानते हैं। आचार्य शुक्ल उसे पहचानते हैं। गरीबी का सुन्दर वर्णन गरीब होने मात्र से संभव नहीं है। गरीब होकर भी गरीब न होने से संभव है। नरोत्तमदास गरीब होकर भी गरीब न होने वाले कवि हैं। जिन लोगों को गरीबी गरीब बनाने में हार जाती है, वे ही कवि बन पाते हैं। नरोत्तमदास की कविता गरीबी को हरा देने वाली कविता है। गरीबी में गर्व का होना ही कविता का होना होता है, क्या? लगता तो है।
स्मृति में ठहर जाना बड़ा सरल है मगर बड़ा विरल है। स्मृति में तो बहुत-सी चीजें आती हैं, मगर ठहर नहीं पातीं। कुछ-कुछ चीजें ही ठहर पाती हैं। ठहरने की शक्ति बड़ी विलक्षण शक्ति है। नरोत्तमदास की कविता विलक्षण कविता है। वे जीवन के विचक्षण कवि हैं। उनकी कविता में जीवन की गहराई की थाह है। जिन्दगी की अथाह गहराई को भाषा में रस की तरह भरने की अद्भुत सामर्थ्य है। उनकी कविता समर्थ कविता है।
नरोत्तमदास की कविता गरीबी की लघुता की कविता नहीं है। दीनता के दाँत निपोरने की कविता नहीं है। उसमें दैन्य की कातरता नहीं है। याचना नहीं है। उनकी कविता गरीबी में सौन्दर्य का सृजन करने वाली कविता है। उनकी कविता गरीबी में दीप्ति पैदा करने वाली कविता है। दमक पैदा करने वाली कविता है। उनकी कविता मैत्री के गरिमामय महाख्यान की कविता है। यह महाख्यान बहुत छोटा है। मगर कितना बड़ा है। नरोत्तमदास की कविता इसलिये अविस्मरणीय कविता है कि उसने समूची हिन्दी जाति को मित्रता की महनीयता का महामंत्र उपलब्ध कराया है। ‘सुदामा चरित’ सिर्फ कहने के लिये सुदामा चरित है। वास्तव में वह मित्र चरित है। सुदामा चरित में सुदामा का होना सुदामा के लिये नहीं है, कृष्ण के लिये है। कृष्ण के सन्दर्भ में ही सुदामा के होने का अर्थ है।
जिसके ‘सीस पगा न झगा तन में‘ है। जिसकी कोई पहचान का सूत्र नहीं, – ‘प्रभु जाने को आहि बसैं केहि ग्रामा। जो परिचय विहीन है। जिसकी ‘धोती फटी-सी लटी दुपटी’ है। जो नंगे पैर है। जो महल को देखकर चकित है। जो कृष्ण का ठौर पूछ रहा है। कितना तुच्छ है, सुदामा। वही सुदामा पल भर में मित्रता की पारसमणि से छूकर कितना महनीय हो जाता है। कितना स्पृहणीय हो उठता है। उसकी गरीबी कितनी गर्वीली हो उठती है, जब कृष्ण राजकाज त्याग कर दौड़ पड़ते हैं। दौड़कर सुदामा को अँकवार में भर लेते हैं। गरीबी कितनी इठलाने के योग्य सौभाग्य में बदल जाती है। नरोत्तम की कविता गरीबी के सौभाग्य में बदलने के रसायन के अनुसंधान की कविता है। उनकी कविता भारतीय जाति की अनाहत अभीप्सा की कविता है। उनकी कविता पारस्परिकता के जयगान की कविता है। उनकी कविता संबन्धों की पवित्रता के पाँव परात के पानी को हाथ से छुये बिना नैनन के जल से धोने के अनुष्ठान की कविता है। कितनी गौरवपूर्ण कविता है।
सुदामा की गरीबी में दंश नहीं है। लोभ नहीं है। अमर्ष नहीं है। केवल जीवन के प्रति अकुंठ आस्था है। कोदो-साँवा का भात भी भरपेट मिल जाय तो दूध-दही और मिष्ठान्न की लिप्सा नहीं है। उनकी गरीबी लोलुप नहीं है। उनके घर में जो गरीबी है, उसके प्रति उनके मन में, दुत्कार नहीं है। जुगुप्सा नहीं है। सहिष्णुता का अभाव नहीं है। शायद, इसी वजह से कविता में गरीबी के चित्र सुंदर बन पड़े हैं। गरीबी का सुन्दर चित्र अस्वाभाविक तौर पर एक विलक्षण उपलब्धि है, जो चित्त को चमत्कृत करता है।
नरोत्तम की कविता राजा के मित्र होने की कविता है। भारतीय जाति के मन में स्थित राजा के मित्र होने की अदम्य आकांक्षा की कविता है। क्या हमारे मन की आकांक्षा कविता की उत्प्रेरणा नहीं है? यह सच है, यह आकांक्षा एक अघटनीय असंभावना है। मगर असंभावना में भी संभावना के द्वार कविता में खुलते रहे हैं। यहाँ तो बात कुछ और ही है। यहाँ तो असंभावित सच आँखों के आगे नाच रहा है। नरोत्तम की कविता अपने समय के सबसे विपन्न आदमी और सबसे सम्पन्न आदमी की मैत्रीपूर्ण पारस्परिकता के सच की कविता है। दुर्लभ कविता है।
नरोत्तम की कविता अपने समय के सबसे छोटे आदमी और सबसे बड़े आदमी के बीच की पारस्परिकता के सच के साक्ष्य की कविता है। यह मनुष्य जाति के जीवन में निराशा और अविश्वास के अछोर विस्तार के बीच आश्वासन की गवाही की कविता है। इतिहास के लिये यह बड़ी मूल्यवान कविता है। स्मृति में इस कविता का बचे रहना, बने रहना मनुष्य जाति के जीवन में पारस्परिकता की महत्ता के बचे रहने की निशानी है।
पांचाल नरेश द्रुपद अपने मित्र द्रोण को उनकी याचना के बावजूद एक गाय नहीं दे सके। यह भी सच है। मित्रता के धिक्कार का यह राजधर्म भी सच है। वहीं द्वारिकाधीश कृष्ण सुदामा की दीनदशा देखकर रोने लगते हैं। कृष्ण अपने वैभव के बराबर वैभव सुदामा को बिना मांगें दे देते हैं। कृष्ण का देना देखकर रूक्मिणी घबरा जाती है। यह दान नहीं है। यह मित्रता का मान है। यह राजा और प्रजा की पारस्परिकता में मैत्री का अपूर्व गौरव है। नरोत्तम की कविता इसी गौरव का गान है। यह कविता हमारी स्मृति में संचित विरासत की कविता है।
नरोत्तमदास की कविता इतिहास में दर्ज भक्ति-काव्य के फुटकर खाते से निकलकर मेरी स्मृति में बराबर कौंध जाती है। हमारे समय में हमारे लोकतंत्र का गौरव है। लोकतंत्र की गरिमा का वितान हमारे सिर के ऊपर तना है। सहिष्णुता के विज्ञापन हमारी आँखों के आगे चमक रहे हैं। पारस्परिकता के प्रचार के नारे हमारे कानों में गूँज रहे हैं। बन्धुत्व के विरद हमारे समय के संचार माध्यम गा रहे हैं।
अपने बन्धुत्व से वंचित समय में नरोत्तमदास के मैत्री के महाख्यान की कविता का अर्थ मैं बार-बार सोचता हूँ। उनकी कविता की उपस्थिति बेचैन करने वाली उपस्थिति से भिन्न नहीं है।

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