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Thursday, October 22, 2026

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लला फिरि आइयो खेलन होरी

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

पद्माकर बड़े विदग्ध कवि हैं। विदग्धता उनकी वाणी में बगरी हुई, विथुरी हुई है। प्रायः घरों में कीमती और बेशकीमती चीजों के होने के स्थान होते हैं। नियत जगह पर, जो कुल जगह में बहुत कम होती है, मूल्यवान को पाया जा सकता है। मगर पद्माकर की कविता का घर ऐसा है, जहाँ हर जगह मूल्यवान ही बिखरा पड़ा है। जहां जी चाहे देख लो। जहाँ मन आये पा लो।
जब वाणी विदग्ध हो जाती है, शब्द, शब्द नहीं रह जाते। शब्द भावसत्ता के विग्रह बन जाते हैं। शब्द भावराशि के रत्नाकर बन जाते हैं। बूँद में समुद्र समाहित हो जाता है। शब्दों से अर्थ निकालने की चीज नहीं रह जाता। अर्थ बहने लगता है। शब्दों से फूटकर अर्थ अनेक धाराओं में बह उठता है। शब्दों में जीवन व्यापार के दृश्य बोलने लगते हैं। कविता में शब्द का शब्द न रह जाना ही कविता का होना होता है, क्या? जहाँ शब्द अपनी लघु सत्ता को उलाँघ कर विराट सत्ता में विलीन होने लगते हैं, उस जगह का ही नाम मनीषियों ने कविता रख रखा है। कविता वाणी की विदग्धता में व्याप्त शक्ति है।
यह विदग्धता क्या चीज है? मैं नहीं जानता। मगर बड़ी अद्भुत है, यह जानता हूँ। समूची अस्मिता को आच्छादित कर लेती है, यह जानता हूँ। विदग्धता प्राणों को आप्यायित कर देती है, यह जानता हूँ। रसतोष से अस्तित्व को परिप्लुत कर देती है, यह जानता हूँ। मगर यह सब तो उसका प्रभाव है। प्रभाव जानता हूँ मगर पहचान नहीं जानता। उसकी परिभाषा नहीं जानता। जान भी कैसे सकता हूँ? मैंने तो वैयाकरणों के कुल की गरिमा का द्वार भी नहीं देखा है।
कभी-कभी मन में आता है कि जो कुछ भी जल जाने के योग्य है, उस सबके जलकर मिट जाने के बाद, जो बचा रह जाने योग्य है, वही विदग्धता है, क्या? कभी नष्ट न होने वाली, हमेशा बची रहने योग्य जो है, वही विदग्धता है, क्या? कभी नष्ट न होने वाली, हमेशा बची रहने वाली भाषा की विरासत को ही विदग्धता कहा जाता है, क्या? जो भी हो! छोड़िये। यह सब अपने वश का नहीं है। अपने बूते का नहीं है। फिर बात का छोर तो पद्माकर से जुड़ा है। पद्माकर की एक कविता है –
‘‘फागु की भीर, अभीरिन में गहि गोविन्दै लै गई भीतर गोरी।
भाई करी मन की पद्माकर, ऊपर नाई अबीर की झोरी।
छीनि पितम्बर कम्बर तें सु विदा दई मीड़ि कपोलन रोरी।
नैन नचाय कहीं मुसुकाइ, लला फिरि आइयों खेलन होरी।।’’
इस कविता में वसन्त के ब्याज से, होली के बहाने गूढ़ प्रेम व्यापार की प्रगल्भ व्यंजना की अनुगूँज व्याप्त है। व्यापार तो बस कहने भर को है, गूँज ही गूँज रही है।
द्वैत में अद्वैत के बोध की लीलाभूमि, ब्रजभूमि में फाग की धूम मची है। ब्रज भूमि, ब्रजन की भूमि है। विचरण की भूमि है। लीलोत्सव की भूमि है। लीला का उत्सव क्या है? ठहरी हुई चेतना के स्थिर केन्द्र पर काया के क्रियाशील वृत्त का ऐश्वर्य। ब्रज में राग के ऐश्वर्य का उत्सव हो रहा है। फाग की भीर मची है। भीड़-भाड़ में धक्का-धुक्की मची है। छीना-छोरी मची है। ठेलम-ठेल मची है। सब बेखबर है। किसी को अपनी खबर नहीं है। खबर है, तो राधा को है। उन्हें अपनी खबर है। अपने प्रिय की खबर है। अपने प्रेम की खबर है। वे प्रेम की पुजारिन हैं। उनकी साधना आनन्द के लिये नहीं ही प्रेम के लिए है। उनका प्रेम आनन्द के लिये नहीं है। उनका प्रेम, प्रेम के लिये है। उनका प्रेम प्रिय के लिये है। राधा को कुछ नहीं चाहिए। चाहिए तो केवल कृष्ण चाहिये।
फाग की भीर में राधा कृष्ण को पा लेती हैं। पा लेती हैं तो गह लेती हैं। गहना, पकड़ना नहीं है। पकड़ने से बहुत अधिक गहराई है, गहने में। इसमें आन्तरिकता की संम्पृक्ति की ध्वनि अधिक प्रभावी है, बाह्य पकड़ की बहुत कम। राधा, कृष्ण को गहकर भीर के बीच से उन्हें अभीर में- एकान्त में, ले जाती हैं। प्रिय को लेकर भीड़ में हो पाना संभव ही नहीं। प्रेम हमेशा आदमी को एकान्त में ले जाता है। एकान्त में स्थित करता है। राधा, रसराज, रसिकराज गोविन्द को भीड़ से, कोलाहल से अलग एकान्त में पाती हैं तो मन को भाने वाला सब कुछ करती हैं। जो मन आया सो किया। जो-जो मन भाया सो-सो किया। फाग का प्रयोजन पूरा हो गया।
फाग का प्रयोजन क्या है? शायद सबको पता है। सबको पता हो, न हो, मगर राधिका को पूरा पता है। पूरा-पूरा पता है। उन्हें पता है कि अपनी आन्तरिकता के रंग में अपने प्रियजन को रंग देना और अपने प्रिय की आन्तरिकता के रंग में रंग जाना ही फाग है। आन्तरिकता के समस्त भावों का तरल होकर उमड़ पड़ना ही रंग है। आन्तरिकता के विविध रंग ही रंगों की बहुवर्णी विविधता हैं। आन्तरिकता की विविधता में, स्निग्धता में, तरलता में, शीतलता में, मधुमयता में डूब जाना ही फाग है। राधा डूब गई। फाग हो गया। फाग हो गया तो फिर फाग के उपादानों को संभाले रखने का क्या औचित्य? कुछ नहीं। अब क्या होगा अबीर? इसीलिये पद्माकर कहते हैं पूरी-पूरी अबीर की झोरी कृष्ण के ऊपर उलट दी राधा ने। पूरी झोली का उलट देना कितनी मार्मिक व्यंजना से कविता को कितना समृद्ध बना देता है। यहाँ अर्थ शब्दों में नहीं, शब्दों को अतिक्रान्त करके कितने व्यापक सुदूर में गूँज रहा है। अपनी समूची आन्तरिकता के साथ किसी की आन्तरिकता में डूब जाना हर समय नहीं होता। कभी होता है। कभी नहीं, केवल वसन्त में होता है। फाग वसन्त में ही होता है। वसन्त में, जब जीवन में भी वसन्त उतर आये, उग आये तो कोई बात बने। पद्माकर की कविता वसन्त के साथ जीवन वसन्त में उमग पड़े फाग की कविता है।
इतना ही नहीं है। पद्माकर की कविता की राधा में जितनी गूढ़ता है, उतनी ही प्रगल्भता भी है। प्रगल्भता और गूढ़ता का संबंध बड़ा विरल होता है। प्रगल्भ गूढ़ता की छाप स्मृति में इतनी गहरी हो जाती है कि जल्दी धूमिल नहीं पड़ती। वह अबीर की झोली नट नागर के ऊपर तो डाल ही देती है। इसके बाद कमर में बँधे उनके पीताम्बर का फेटा भी खोलकर छीन लेती है। फागोत्सव का कृष्ण का बाना भी उतार लेती है। वह कृष्ण की अस्मिता की पहचान को अपने पास रख लेती है। राधा, कृष्ण को पूरा-पूरा पा लेती है। फिर कृष्ण को विदा देती है। कैसे विदा देती है? ‘मीड़ि कपोलन रोरी।’ उनको कपोलों पर रोरी मलकर विदा देती है। विजय का कैसा अपूर्व उल्लास बरस रहा है, राधा की भंगिमा में। पद्माकर की वाणी में चित्र नहीं, चित्रावलियाँ नृत्य कर उठती है। मोहक नृत्य। अपने प्रिय को अपने में पा लेने का कैसा अपूर्व आह्लाद उमड़ रहा है। पद्माकर की विदग्ध वाणी में राधा की विदग्धता कितनी मोहक बन पड़ी है।
फिर…..? पूछिये मत। पद्माकर की कविता का समाहार तो देखिये। यहाँ समाहार सिर्फ समाहार नहीं है। समाहार में बहुत कुछ समाया हुआ है। बहुत कुछ ही नहीं, समाहार में ही कविता की सारी समन्विति समाहित है – ‘‘नैन नचाय कही मुसुकाइ, लला फिरि आइयो खेलन होरी।’’
फिर वह कहती है। कुछ कहने में और नैन नचाकर कुछ कहने में बड़ा फर्क है। जमीन आसमान का फर्क है। सिर्फ वाणी का बोलना भी मार्मिक होता है। प्रभावकारी होता है। मगर वाणी के साथ जब काया भी बोलने लगे तो बात और हो जाती है। यह सच है कि नाटक में कविता के आ जाने से नाटक का प्रभाव बढ़ जाता है। लेकिन कविता में नाट्य का समाहित हो जाना तो सोना में सुहागा है। सोने में सुगन्धि का होना किसी चमत्कार से कम नहीं होता। पद्माकर की वाणी में सुगन्धित सोने का सच अपने दुर्निवार आकर्षण में हाथ-हिलाकर बुलाता खड़ दिखाई देता है।
आँखों को नचाकर और मुसुकाकर कहना साधारण कहना नहीं है। केवल मुसुकाकर कहने में ही कथन में बहुत मारकता आ जाती है। आँखों के दबाकर कहने में ही कथन में बहुत बेधकता भर जाती है। आँखों को नचाकर कहने का तो कहना ही क्या! फिर दो-दो विलक्षण अनुभावों का वाणी के साथ मिलकर कुछ कहना तो भावों की भीड़ खड़ी कर देना है। भाव नहीं, भावों की भारी भीर एक के बाद एक, एक-दूसरे को धकेलती, धकियाती पद्माकर की कविता में भरभराकर निकल आती है। निकलती ही जाती है। शब्द तिरोहित हो जाते हैं। डूब जाते हैं। विलीन हो जाते हैं।
प्रायः महत्वपूर्ण और मूल्यवान कविता में शब्द भावों के संवाहक बनकर आते हैं। वाहक बनकर आते हैं। भावों को वहन करके शब्द अपनी सार्थकता सिद्ध करते हैं। कभी-कभी, कहीं-कहीं कविता में शब्द भावसत्ता में अपने अस्तित्व के साथ डूबकर उसके श्रृंगार बन जाते हैं। जब-जब ऐसा होता है, हो पाता है, कविता विलक्षण बन जाती है। पद्माकर की कविता विलक्षण कविता बन पड़ी है।
इस कविता में क्या कह रही है, राधा? जो कह रही है, उसमें विजय का गर्व है, क्या? मगर विजय कैसी? प्रेम कोई युद्ध थोड़े ही है, जिसमें जीत, हार है। नहीं, प्रेम खेल भी नहीं है, जिसमें जीतना, हारना लगा होता है। प्रेम में तो जीत-जीतकर भी हार जाना होता है। हार-हार कर भी जीत हासिल हो जाती है। जहाँ जीत-हार नहीं है वही प्रेम है। प्रेम, जीवन का वह धरातल है, जहाँ गणित के सारे सूत्र फेल हो जाते हैं। प्रेम के तल पर गुणा-भाग, जोड़-घटाव सब बेमतलब हो जाता है। व्यर्थ हो जाता है। वहाँ एक धन एक दो नहीं होता। वहाँ एक धन एक बराबर एक होता है। वहाँ एक हमेशा एक में समाहित होकर एक हो जाने को आकुल रहता है।
अपने प्रेमी को ‘लला‘ संबोधित करने की सूझ कवि की विलक्षण उद्भावना है। श्रृंगार में वात्सल्य का स्पर्श कितना अद्भुत है। वात्सलय के श्रृंगार से संयुक्त हो जाने से श्रृंगार की गरिमा कितनी ऊँची उठ जाती है। वात्सल्य अपने आश्रय की अबोधता का बोधक है। अपने प्रेमी में अबोधता का बोध प्रेम को कितना गौरवपूर्ण और संरक्षणप्रद बना देता है। भारतीय नारी की गरिमा का यह कैसा निदर्शन है। अपने प्रेमी की नादानता को व्यंजित करने में वाणी कितने-कितने संकेतों को उजागर करती है, कह पाना बहुत कठिन है। कहने में न आने वाले कथ्य को शब्द से संकेतित कर देना कविता की चरम सार्थकता है। अपने को पूरा-पूरा देकर अपने प्रिय की नादानी को सयाना बनाने का आग्रह पद्माकर की कविता का आग्रह है। यही लालित्य है। यही लालित्यपूर्ण जीवन है। कविता लालित्यपूर्ण जीवन के सृजन के लिये है। वात्सल्यपूर्ण प्रेम, प्रेम का सुमेरू शिखर है, जिसे भारतीय मनीषा ने अन्वेषित किया है। उपलब्ध किया है। जिसे भारतीय कविता ने जीवन में प्रतिष्ठित किया है।
होली खेलने फिर आना। फिर फिर आना। फाग फिर-फिर खेलने का ही उत्सव है। यह अचूक उत्सव है। बीत जाने के बाद भी रह जाने वाला उत्सव है। अपने चले जाने के बाद भी अपनी निशानी छोड़ जाने वाला है। अपनी गहगह निशानी। अपनी महमह निशानी। अपनी निशानी में अपने को पूरा सहेजे हुये। होली का उत्सव जड़ों का उत्सव है। और उत्सव तो डाल-डाल के उत्सव है। डाल-पात के उत्सव हैं। फूल-पात के उत्सव हैं। मगर होली नहीं। होली में जीवन डाल से, पात से सिमटकर जड़ों में समाहित हो जाता है। जब डाल-डाल में पात-पात में फैला हुआ जीवन रस सिमट कर जड़ों में समाहित हो जाता है। समाहित होकर समुल्लसित हो उठता है, तब होली होती है।
जड़ों का स्वभाव रस के स्रोत में धँसने का स्वभाव है। स्रोत से रस सोखने का स्वभाव है। रस को सोखकर अपने में रखने का स्वभाव जड़ों का स्वभाव नहीं है। जड़ें रस को बाँट देती हैं। जिसके पास रसग्रहण की जितनी क्षमता है, उसे उतना दे देती है। जड़े रस संचित नहीं करतीं। वे रस वितरित करती हैं। रस के स्रोत में धंसकर रस का वितरण करने की योग्यता को पा लेना ही जीवन की सार्थकता है। होली, जीवन में, जीवन की सार्थकता को पा लेने की उत्प्रेरणा का उत्सव है।
रस के स्रोत से रस खींचकर तनों, डालों का, शाखों का, पातों का विस्तार करना, पोषण करना, श्रृंगार करना सृसृक्षा का सम्मान है। सबको पोषण प्रदान करके सृजन चेतना का अपनी जड़ में लौट आना स्रष्टा के अनुदेश का अनुवर्तन है। यह अनुवर्तन ही जीवन की सार्थकता का मूलमंत्र है। होली जीवन के मूलमंत्र के गान का महोत्सव है।
यह महोत्सव हमारे ऋतुचक्र में सहज है। परिधि के समूचे विस्तार में घूमकर केन्द्र में लौट आने का आमंत्रण होली का आमंत्रण है। हमारे जीवन का विस्तार सभ्यता में है, मगर केन्द्र सहज में है। सभ्यता की समृद्धि में सहज का अटक जाना, जीवन का भटक जाना है। पथभ्रष्ट हो जाना है। वसन्त मनुष्य जाति की पथभ्रष्ट होती चेतना का पथप्रदर्शक है। इसीलिये वसन्तु ऋतु नहीं है, ऋतुराज है। जो हमें सहज में स्थित करने की सामर्थ्य रखता है, वही हमारा राजा है। होली हमारे जीवन को सहज की ओर उन्मुख करने का उत्सव है। सहज में प्रतिष्ठित करने का उत्सव है। होली में सारी कृत्रिमताएँ सहज ही छूट जाती है। सारे भय, सारे संकोच, सारी आशंकाये स्वयं भहराकर गिर जाती हैं। अवधारण से उपार्जित अच्छा और बुरा का भेद मिट जाता है। अस्तित्व उजागर हो उठता है। अस्तित्व की अभ्यर्थना का उत्सव होली का उत्सव है।
जहाँ कुछ सीखना नहीं होता, वहीं जीवन होता है। जहाँ कुछ छिपाना नहीं है, दुराना नहीं है, वहीं फाग होता है। फाग जीवन का उत्सव है। जब कण्ठ के सारे अवरोध मिट जाते हैं, कविता का जनम होता है। पद्माकर की कविता फाग की अचूक कविता है उनकी कविता में मनुष्य जाति के लिये फिर-फिर होली खेलने का अम्लान आमंत्रण है, –
‘‘लला फिरि आइयो खेलन होरी।’’
पद्माकर पुकार पुकार कर कह रहे है,- आना होली खेलने फिर आना। होली ख्ेालने फिर-फिर आना। होली ख्ेालने फिरि-फिरि आना। लौट-लौट आना। चाहे जहाँ भी चले जाना। चाहे जितनी भी दूर चले जाना मगर होली खेलने फिर आना। कहीं भी जाना मगर अपने में लौट आना। अपनों में लौट आना। अपने से लौट आना। अपने से अपनों को रंग देना। अपनों से अपने को रँग लेना। यह होता रहे। फिर-फिर होता रहे। बार-बार होता रहे। बराबर होता रहे। यह क्रीड़ा बराबर चलती रहे। कभी रुके नहीं। कभी चुके नहीं। यह कविता में भारतीय जाति की सनातन अभीप्सा की अभिव्यक्ति है।

सामूहिक अस्तित्व का मंगलघोष

वरिष्ठ साहित्यकार डा. उमेश प्रसाद सिंह।
वरिष्ठ साहित्यकार डा. उमेश प्रसाद सिंह।

oung Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

अमरकोश में लोक के सन्दर्भ में ‘लोकस्तु भुवने जने’ लिखा है। जन-जन से भुवन बना है। जन-जन में भुवन है। भुवन में जन व्याप्त है। जन में भुवन व्याप्त है। लोक सृष्टि की समूची अस्मिता का वाचक है। समूचा संसार जिसमें प्रकृति और प्राणि समुदाय समाहित हैं, लोक में व्याप्त है। जड़-चेतन की अभिन्नता का बोध लोक की व्याप्ति में सन्निहित है। अन्तर्सम्बन्धों की अर्थवत्ता और सहिष्णुता की मूल्यवत्ता में ही लोक प्रतिष्ठित होता है। यही लोक का प्राणतत्व है। इस प्राणतत्व को पलुहित करने वाली चेतना, लोक चेतना है।
प्रकृति के समस्त उपादानों- पृथ्वी, पहाड़, पठार, कछार, नदी, झरना, झील, पेड़ के साथ पशु-पक्षी की प्रजातियों और समस्त मनुष्य समुदाय का सजीव समुच्चय लोक कहा जाता है। लोक की धारणा सामूहिक अस्तित्व की उपासना की महनीय और उज्ज्वल धारणा के उत्कर्ष का प्रतिमान है। यह मानवीय चिन्तन की पवित्रता, महनीयता और मांगलिकता का एकत्र अभिधान है।
यह भिन्न-भिन्न सत्ताओं की अभिन्नता का आधार है। जन-जन के भिन्न होने के बावजूद भिन्न न होने का बोध ही लोक शब्द की व्यंजना है। इस व्यंजना की संवाहक चेतना को लोक चेतना कहा जाता है। लोक दार्शनिक अद्वैत की सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रवाचक है। दो की सत्ता का निषेध, नकार ही लोक के स्वरूप का निदर्शन करता हे। अपने में सबको और सबमें अपने को अनुभव करने का बोध लोक में व्यक्त होता है। समूह में व्यक्ति का विलयन और व्यक्ति में समूह की उपस्थिति लोक के अर्थ का प्रतिपादक है। यह मनुष्य जाति के चिंतन की महिमा का स्वर्ण शिखर है।
लोक चेतना मनुष्य जाति के सामूहिक मंगल की अन्वेषी चेतना है। इसमें व्यक्ति की महिमा सामूहिक मंगल विधान के उत्कर्ष पर आधारित है।
बड़ा आश्चर्यजनक है कि राजसत्ता को सारे अधिकार सौंपकर भी मनुष्य जाति के इतिहास निर्माण का समूचा उत्तरदायित्व लोकसत्ता अपने पास सुरक्षित रखती है। मनुष्य जाति की दशा और दिशा का निर्धारण लोकसत्ता के हाथ में होता है। मनुष्य जाति के नायक का निर्माण हमेशा लोक सत्ता ही करती है। मनुष्य जाति के मंगल विधान की चेतना, लोक चेतना है। आज तक एक भी लोकनायक किसी राजसत्ता ने पैदा किया हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता।
सामूहिकता और पारस्परिकता लोक चेतना में प्रतिष्ठित सारे मूल्यों का आधार है। यह मनुष्य के स्वभाव और उसकी सभ्यता दोनों में समान रूप से मूल्यवान है। लोकचेतना हमेशा राजसत्ता की निरंकुशता की संभावनाओं को अंकुश से नियंत्रित रखती है। लोकचेतना समूचे संसार में सामाजिक संरचना में सबसे शक्तिशाली कारक है। यह हमेशा व्यक्ति चेतना में अलक्षित सामूहिक चेतना की उपस्थिति के रूप में व्यक्त होती है। लोक चेतना में एक वचन को बहुवचन में व्यक्त करने की अद्भुत शक्ति और सामर्थ्य है। लोक चेतना असमाप्त संघर्ष की असीम ऊर्जा का अचूक स्रोत है। यह हमेशा निरंतर आहत होकर भी कभी हारती नहीं है। दिनकर के शब्दों में कहँू तो लोकचेतना मर्त्य मानव की विजय का तूर्य है। लोक चेतना का स्वरूप और उसकी शक्ति साहित्य में संचित और संरक्षित है।
लोकचेतना लोक जीवन में ही बसती है। उसका निवास लोक-जीवन के व्यवहार में लक्षित होता है मगर वह कहाँ बसती है, कहाँ-कहाँ, किसमें-किसमें वह वास करती है, कह पाना बड़ा मुश्किल है। स्थूल लोक जीवन में हमेशा लोकचेतना की पहचान आसान नहीं होती। प्रायः लोक जीवन में भी बहुत से व्यवहार लोक चेतना के विरूद्ध दिखते हैं, लेकिन शीघ्र ही वे लोक चेतना की धारा में लहर की भाँति विलीन हो जाते हैं। कभी-कभी लोकचेतना की व्यापक अभिव्यक्ति व्यक्ति चेतना में भी प्रगट होती है और व्यक्ति का विस्तार लोक में व्याप्त हो जाता है। व्यक्ति लोक का संरक्षक बन जाता है। व्यक्ति लोकनायक बन जाता है। व्यक्ति लोकमंगल का यशगायक बन जाता है। लोक चेतना में व्यक्ति और समूह का विस्मयजनक विलयन है। इसमें व्यक्ति कभी सामूहिक सत्ता का पर्याय बन जाता है। कभी समूह व्यक्ति की असीम संभावनाओं का विलक्षण उद्घाटक।
साहित्य लोक चेतना की भाषिक अस्मिता है। लोक चेतना साहित्य में व्यक्त है। अभिव्यक्त है। साहित्य लोक चेतना की ही वाणी है। साहित्य में लोक चेतना को देखा जा सकता है। सुना जा सकता है। समझा जा सकता है। छुआ जा सकता है। जिया जा सकता है। लोक चेतना के जीवन का स्पन्दन साहित्य में विद्यमान है।
वस्तुतः लोकजीवन लोक चेतना का पर्याय नहीं है। प्रायः लोक जीवन को लोकचेतना का वाहक मान लेने से हमारी बौद्धिकता बहुत-सी भ्रांतियों का शिकार बन जाती है। शायद इसी वजह से लोक साहित्य, लोक संगीत, लोक कला इत्यादि के अलग वर्ग हम सृजित करने लग जाते हैं। साहित्य और कला के आन्तरिक मर्म के धरातल पर इस तरह के वर्गों का कोई मतलब नहीं होता। लोक जीवन सामयिक होता है, मगर लोक चेतना केवल सामयिक नहीं है। वह सामयिक भी है मगर सामयिकता की सीमा को अतिक्रांत करने का स्वभाव लोकचेतना का स्वभाव है। सामयिकता को अतिक्रमित किए बगैर कोई भी चीज सार्वकालिक नहीं हो सकती। लोक चेतना एक सार्वकालिक सत्ता है। वह कल भी थी। आज भी है। कल भी होगी। अस्तित्व का प्रवाह अविच्छिन्न है। लोकचेतना, एक अविच्छिन्न सत्ता है। मनुष्य जाति के जीवन में, उसके जीवनबोध में उसका प्रवाह अविच्छिन्न है।
लोक किसी समूह का वाचक नहीं है। लोक बहुसंख्यक समुदाय नहीं है। लोक अल्पसंख्यक समुदाय का विलोम नहीं है। लोक शास्त्र का विरोधी नहीं है। विकल्प नहीं है। लोक, सत्ता का प्रतिपक्ष नहीं है। लोक प्रवंचित नहीं है। पिछड़ो का समूह नहीं है। लोक गॅवार नहीं है। लोक बनवासी नहीं है। गिरिजन नहीं है। कंगाल नहीं है। असहाय नहीं है। लोक कोई खण्ड, उपखण्ड नहीं है। वह खण्डित चेतना का वाहक कत्तई नहीं है। लोक समग्र का वाचक है। लोक समग्र सत्ता के समेकित रूप का संवाहक शब्द है। लोक विशेषणों की विशेषताओं को निरस्त करने वाली संज्ञा की गरिमा का विस्तार है। राजा, रंक, विद्वान, मूर्ख, बलवान, कमजोर, सुन्दर, कुरूप सबको मिलाकर एक साथ जो सत्ता है अस्तित्व की, लोक है। भिन्नता के असीम विस्तार में जो अभिन्न है, वह लोक चेतना है।
भिन्नता में अभिन्नता का बोध ही सहिष्णुता का जनक है। सहिष्णुता से पारस्परिकता का जन्म होता है। लोक चेतना सहिष्णुता और पारस्परिकता की संपोषक चेतना है। लोक चेतना समग्र को समग्र से जोड़ने वाली चेतना है। सम्पूर्ण के हर अवयव को हर अवयव से जो जोड़ने का काम है, वह चेतना करती है। कोई भी विशिष्ट लोक से बाहर नहीं है। विशिष्ट का अपशिष्ट भी लोक नहीं है। विशिष्ट से बचा हुआ लोक है, यह भ्रम है। यह लोक की धारणा का आयातित व्यतिरेक है। यह आधुनिकता बोध के छदम की भ्रांति है। यह भ्रांति स्वार्थपूर्ण भ्रान्ति है। यह भ्रान्ति विशेषाधिकार पर अधिकार जमाये रखने के लिए सुनियोजित भ्रान्ति है। यह जानबूझ कर प्रचारित और प्रसारित की गई है। यही भ्रान्ति हमारे लोकतंत्र को कलंकित करती है। कमजोर करती है। निर्बल बनाती है। निरीह बनाती है। इसी भ्रान्त अवधारणा में लोक हेय है। हीन है। वंचित है। शोषित है। विपन्न है। दया का पात्र है। अभावग्रस्त है। बुद्धिहीन है। ग्राम्य है। गिरिजन है। वनवासी है। आदिम है। तुच्छ है। भद्र से इतर भदेस है। दरअसल यह लोक नहीं है, यह सब ‘फोक’ है। ‘फोक’ संरक्षण के योग्य है। मगर लोक संरक्षक है। लोक सम्पूर्ण के मंगल विधान का स्रष्टा है।
लोक सत्ता का विरोधी नहीं है। शास्त्र का विरोधी नहीं है। लोक सत्ता का और शास्त्र का सर्जक है। वह सत्ता और शास्त्र का नियंत्रक है। सत्ता और शास्त्र को लोक सापेक्ष्य बनाये रखने का दायित्व लोक चेतना का आत्मधर्म है। लोक चेतना किसी भी तरह के विशिष्टताबोध को निरसत करने वाली चेतना है। जो सत्ता और शास्त्र का नियामक है, वह भी लोक है। उस लोक में जब भी अपने लोक धर्म के प्रति उपेक्षा का जन्म होता है, लोकचेतना उसे विशेषाधिकार से वंचित कर देती है। विशेष को लोक चेतना आत्मसात नहीं करती। विशेष बाहरी तत्व है, जब भी उसका प्रवेश लोक जीवन में होता है, लोकचेतना की आन्तरिक उर्जा सक्रिय हो उठती हैं सक्रिय होकर उसे बार-बार, बारम्बार बहिष्कृत करती रहती है। समाूहिकता के विरूद्ध हर विक्षेप को, सामूहिक जीवन से और व्यवस्था से बाहर करते रहने का स्वभाव, लोकचेतना का स्वभाव है।
लोक कोई स्थिर इकाई नहीं है। वह संरक्षण का मुखापेक्षी नहीं है। वह सहारे का याचक नहीं है। वह कृपाकांक्षी नहीं है। यह सब तो लोक के साथ हमारे लोकतंत्र का मजाक है। उपहास है।
लोक लघु नहीं है। विराट है। लघुता लोक की पहचान नहीं है। उदारता लोक का अभिज्ञान है। लोक का चरित्र उदार चरित्र है। लोक का कुटुम्ब बसुधाव्यापी कुटुम्ब है। लोक में अपना-पराया नहीं है। सब अपना है। ‘सब अपना है’ का बोध ही लोक चेतना का अपना बोध है। आत्म विस्तार की असीम परिणति ही लोक चेतना का आत्मतत्व है।
आत्मचेतना के असीम विस्तार की योग्यता ही लोकचेतना में विलीन होने की योग्यता है। जो आत्मविस्तार की योग्यता से परिपूर्ण है, वही लोक चेतना का संवाहक है। वह ही लोक चेतना में घटक की तरह मौजूद है। जिसमें यह योग्यता नहीं है, वह चेतना का व्यतिरेकी है। लोक चेतना उसे अपने से बहिष्कृत कर देती है। बहिष्कृत करती रहती है। साधारणता नहीं, सधारणता में व्याप्त असाधारणता लोक चेतना की पहचान है।
लोक चेतना ही समूची सृष्टि में नियामक चेतना है। यही अभ्यर्थनीय चेतना है। यही मंगलकारी चेतना है। विराट प्रकृति के साथ समस्त प्राणि समुदाय में सहिष्णुता और पास्परिकता के मैत्रीभाव की स्थापना लोक चेतना की स्थापना है। इस स्थापना के लिये ही जगत में लोक चेतना का साम्राज्य है।
सिंहासन पर कोई बैठे। ताज किसी के भी सिर पर बँधा हो। मगर मनुष्य जाति के हृदय पर शासन हमेशा लोकचेतना का रहता है। हमेशा रहेगा। सच्चे अर्थ में मनुष्य जाति में सम्राट हमेशा-हमेशा लोक चेतना ही है।
लोकचेतना को आत्मसात किये बिना लोकतंत्र व्यर्थ है। लोकचेतना की अभ्यर्थना के अभाव में लोकतंत्र एक फालतू का शब्द है, जिसका न तो भाषा में कोई अर्थ है, न जीवन में कोई मतलब। लोक चेतना की अनुपस्थिति में लोकतंत्र एक भयानक विध्वंस का विस्फोट है, जिसे सामूहिकता और पास्परिकता को विनष्ट करने के लिये प्रयोग किया जाता है। लोकतंत्र तब तक केवल कुछ लोगों के स्वार्थ को पूरा करने का साधन मात्र है जब तक लोक चेतना जन-जन में प्रतिष्ठित नहीं है। जब तक भुवन में प्रतिष्ठित नहीं है।
लोकचेतना आहत होती है, हत नहीं। वह क्षत होकर भी, विक्षत होकर भी अक्षत बनी रहती है। बहुत कुछ के अप्रतिष्ठित होने की आशंका की जा सकती है मगर सामूहिक अस्तित्व के मंगल घोष की अप्रतिष्ठा की आशंका कभी नहीं की जा सकती। लोकचेतना जन-जन को पुकारती आ रही है। पुकारती जा रही है-
‘‘बनो संसृति के मूल रहस्य, तुम्हीं से फैलेगी वह बेल।
विश्व भर सौरभ से भर जाय, सुमन से खेलो सुन्दर खेल।।’’

आँखिन रंग बचाय के डार्यो

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

एक अदना-सा निवेदन है। निवेदन रागाकुल रमणी का है। निवेदन फागाकुल रमणी का है। मगर है, बड़ा मार्मिक। इतना मार्मिक है कि मन को मथ डालता है।
बड़ा अद्भुत आग्रह है। आग्रह में आमंत्रण भी है। वर्जना भी है। आमंत्रण प्रधान है या वर्जना प्रधान है, निर्णय कर पाना कठिन है। शायद यही कविता की मार्मिकता है। अर्थबोध की अधिकाधिक संभावनाओं को खुला छोड़ देना कविता को अधिक अर्थवान बनाता है, क्या? बार-बार ऐसा ही लगता है।
रीतिकालीन कविता के साथ आधुनिक समझ का व्यवहार सहिष्णुता का व्यवहार नहीं है। विचारों के प्रति सहिष्णुता का विज्ञापन करने वाली आधुनिकता की असहिष्णुता विस्मय में डालती है। ईमानदारी से देखा जाय तो आधुनिकता की ढोल में रीतिकालीनता के बोल रीतिकाल से कम नहीं है। फिर भी रीतिकालीन कविता की भर्त्सना करना शायद हमें अपने आधुनिक होने की अनिवार्य शर्त लगता है। प्रायः हम कविता की मूल्यवत्ता कविता के विषय पर जाँचने के आग्रही हैं। अक्सर हम भूल जाते हैं कि कविता विषय पर आधारित नहीं होती। विषय पर तो कविता का खिलवाड़ आश्रित होता है। कविता तो अपने में ही विषय को विनिर्मित करती है। खैर!
रीतिकाल की कविता में भले और बहुत कुछ हो न हो, अलग की बात है। मगर एक बड़ी मूल्यवान बात रीतिकाल की कविता में है, जो उतनी अधिक और कहीं नहीं है। घरेलू जीवन का, घर के भीतर के जीवन व्यवहार का जितना, सहज और व्यंजक वर्णन रीतिकालीन कविता में उच्छल रूप में विद्यमान है, अन्यत्र दुर्लभ है। घर का जीवन कविता के लिये अर्थवान है या नहीं, इस पर तो बहसों में रूचि रखने वाले लोग ही निर्णय कर सकते हैं।
इस कविता मे रमणी कहती है कि रंग डालना चाहते हो, डाल लो। तनिक भी मनाही नहीं है। सरेआम डाल लो, कोई हर्ज नहीं है। डालना ही है, तो खुल्लम-खुल्ला डाल लो, कौन रोकता है। जहाँ, जी चाहे डाल लो रंग। जहाँ-जहाँ जी चाहे रंग दो। मगर जरा आँखों को बचाकर। यह आँखों को बचाकर रंग डालने का आग्रह कितना लुभावना है। कितना विदग्ध आग्रह है। कितना व्यंजक आग्रह है। कितनी सर्जक वर्जना है। आँखों से बचाकर आँखों में रंग न डालने का आग्रह राग को कैसा अपूर्व उत्कर्ष देता है। कैसा मन को मुग्ध कर देता है।
नहला दो रंग में पूरा-पूरा कोई बात नहीं। सारे के सारे वसन भींग जायें कोई बात नहीं। पूरी देह पर रंग चढ़ जाय कोई चिन्ता नहीं। गालों पर रंग थिरक उठे कोई फिक्र नहीं। किस बात की फिक्र? रंग तो तुम्हारा ही है! रंग में तो तुम्ही हो। तुम्हीं में तो रँगना ही है मुझे। तुममें ही तो डूबना ही है मुझे। फिर क्या? फिर देर क्या? प्रतीक्षा क्या? हिचक क्या?
मगर एक बात याद रखने की है। याद रखनी है, वह यह कि आँखों को बचाना है। किसलिये? इसलिये कि आँखों से देखना है। आँखों से तुम्हारा रंग देखना। तुम्हारे रंग का निखार देखना है। तुम्हारे रंग की निकाई देखनी है। तुम्हे देखना है।
अगर आँख में रंग पड़ गया तो कैसे दिखेगा? फिर तुम्हारा ऐसा रंग कैसे दिखेगा? तुम कैसे दिखोगे? नहीं, नहीं यह ठीक नहीं होगा। ऐसा मत करना। आँखों को बचाकर रंग डालना।
आँखों का काम देखने का काम है। प्रेम देखने की चीज है। प्रेम का रंग देखने की चीज है। देखने से जी जुड़ा जाता है। जीवन पलुहित हो जाता है। जीवन फलित हो जाता है। सार्थक हो जाता है। प्रेम का रंग देख लेने से कुछ देखन को बाकी नहीं रह जाता।
आँखों में रंग पड़ जाने से यह सुख छिन जाने का अंदेशा है। जीवन की सार्थकता के खो जाने की आशंका है। जीवन खोने की नहीं, पाने की चीज है। जीवन का भाना ही जीवन है, प्यारे! जो भा जाय उसे गाना ही तो जिन्दगी का अर्थ है।
रंग से तनिक भी परहेज न रखते हुए आँखों को रंग से बचाने का यह प्रेमपूर्ण आग्रह मुझे इस मुरझाये हुये समय में भी हुलसा देता है। कविता से मन उमंगित हो उठता है। मगर अपनी तरफ सोचते ही उदास हो जाता है।
यह नायिका हमारे समय की नहीं है। चाहे जितनी भी कोशिश करके हम उसे अपने समय में नहीं ला सकते। हम लाख चाहें तो भी वह हमारे समय में नहीं आ सकती। हमारे समय में तो, जो है सो है।
हमारे समय में बहुत कुछ है। विकसित तकनीक के संचार माध्यम है। सूचनाओं के विश्व बाजार हैं। स्मार्टफोन हैं। एस.एम.एस. की उपलब्धि है। सिनेमा के प्रेमगीत हैं। अनन्त चालबाजियाँ हैं। लिव-इन-रिलेशन के नुस्खे हैं। स्वतंत्रता के नाम पर सम्बन्ध विच्छेद की सुविधाएं हैं।
हमारे समय में बूढ़ा वसन्त है। प्रदूषित नदियां हैं। सूखे तालाब हैं। पाट दिये गये पोखरे हैं। फूलने से पहले पाला खाये सरसों का समुद्र है। विषैले धुँए में जलती आम की मंजरियाँ हैं। रेलों में, बसों में, बाजारों में, गलियों में, बस्तियों में, हर कहीं बेलगाम भौंरे हैं। अपनी लाज को बचाये रखने में भय से सिकुड़ी-सिकुड़ी कलियाँ हैं।
हमारी होली में किसिम-किसिम के रंग हैं। चेहरे को बदरंग बना देने वाले रंग। वस्त्रों को बेकार बना देने वाले रंग। नजर को बदल देने वाले रंग। राग को, अनुराग को मसल डालने वाले रंग। भूख को भड़का देने वाले रंग। स्वार्थ को चमका देने वाले रंग। क्रूरता को उकसा देने वाले रंग। सहिष्णुता को कुचल डालने वाले रंग। लाभ को लहका देने वाले रंग। लोभ में बहका देने वाले रंग। सबका रंग बिगाड़कर अपना रंग चोखा कर लेने वाले रंग। न जाने कैसे-कैसे रंग, हर कहीं अपना रंग जमाये हैं। अपने में रँगने वाले रंग कहीं नहीं हैं। दूसरों पर फबने वाले रंग कहीं नहीं हैं। रंगों की भीड़ में, खुलने वाले, खिलने वाले रंगों का अभाव है। अभाव ही नहीं है, अकाल है।
जो भी रंग हैं, हमारे समय में आँख में पड़ जाने को आकुल हैं। आतुर हैं। जिनके हाथ में भी रंग है, आँख में डालने के लिये है। कपड़ा न भींगे कोई बात नहीं। देह न भींगे, कोई बात नहीं। मन न भींगे कोई बात नहीं। बस आँख न बचने पाये।
किसी भी कीमत पर आँख न बचने पाये। पूरा-पूरा रंगों का हमला आँख पर है। रंग भाषा का रूप पकड़कर आँख में घुस रहे हैं। रंग लिपि का रूप धरकर आँख में घुस रहे हैं। रंग दृश्य का बाना बाँधकर आँख में घुस रहे हैं। रंग उत्थान का रूप लेकर आँख में घुस रहे हैं। हमारे समय में हर दिन होली है। हमारे अपने, हमारे आत्मीय, हमारे रक्षक, हमारे संरक्षक सब होली खेल रहे हैं।
नहीं, आँखों को किसी भी तरह बचा सकना संभव नहीं है। जब रोज-रोज आँखों में धूल झोंकी जा रही है। रोज-रोज आँखों में उँगली घुसेड़ी जा रही है, तो होली में आँखों को बचाकर रंग डालने का आग्रह क्या अर्थ रखता है। व्यर्थ है। आँख आपकी। मर्जी आपकी। जो चाहें।
हम अपने समय में लाख प्रयास करके भी कैसे कहें, – ‘‘आँखिन रंग बचाय के डार्यो।’’

भरोसे का भार

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

कहते हैं सौ बार धोखा खाने के बाद भी एक फिर अवसर आने पर जो विश्वास कर लेता है, सहज भाव से, वह सन्त है। संत वह है, जिसका विश्वास करने का स्वभाव है। विश्वास करना जिसने सीखा नहीं है, साधा नहीं है। विश्वास जिसका स्वभाव है, विश्वास जिसके स्वभाव है, विश्वास जिसके स्वभाव में है, संत है। विश्वास जिसकी वृत्ति है, वह साधु है। वह सज्जन है। भारत देश की आत्मा, सन्त आत्मा है।
इस देश की पहचान जिन लोगों के होने से होती है, आज भी उनमें विश्वास करने की उत्कष्ट वृत्ति है। विश्वास के प्रति भारतीय जन मानस में अगाध आस्था है। अडिग निष्ठा है। महत् संकल्प है। अपने भारतीय जाति में यह तितिक्षा का जो अपार बल है, वही उसे महान सिद्ध करता है। हजार तरह के दुःखों को सहते रहने के बावजूद किसी अच्छाई की संभावना के लिए एक और दुख को गले लगा लेने का धैर्य और उत्साह इस देश के साधारण जन की अभ्यर्थना के लिये हमेशा उत्प्रेरित करता रहता है।
स्वतंत्रता के बाद अपने शासन में भारतीय जनता बार-बार धोखा खाती रही है। वह बराबर विश्वास करती रही है। विश्वास टूटता रहा है, हर बार। फिर भी विश्वास की बान तनिक भी कमजोर नहीं हुई है। हमारे प्रधानमंत्री जी के नोटबंदी के फैसले का भारतीय जनता ने जैसा समर्थन दिखाया है, वह उसके विश्वास का अनूठा उदाहरण है। माननीय मोदी जी ने देश की जनता को बताया है कि सरकार के इस फैसले से कालाधन इकट्ठा करने वाले बईमान लोगों के धन्धे पर करारी चोट पड़ेगी। आतंकवाद की कमर टूट जायेगी। नकली नोटों की कालाबाजारी रुक जायेगी। आम जनता को जो ईमानदारी का जीवन जीती है, फायदा होगा।
आम जनता को फायदा हो, न हो इसकी उसे कोई चिन्ता नहीं। आम जनता आज भी यह मानती है कि उसका सबसे बड़ा फायदा भ्रष्टाचार के उन्मूलन में है। आज भी आमजन को बेईमानी बेहद नापसन्द है। वह अपनी पूरी आत्मिक ताकत के साथ बेईमानी के खिलाफ है। वह पूरे मन से बेईमानों के खिलाफ है। बेईमानों के खिलाफ तो नतमस्तक होने के लिए उसे राजनीतिक दल ही विवश करते हैं। भ्रष्ट, बेईमान, अपराधी और अत्याचारी लोगों को टिकट देकर राजनीतिक दल ही जनता को उन्हें अपना प्रतिनिधि चुनने को मजबूर करते हैं। घूसखोर और अन्यायप्रिय अधिकारियों को और अधिक अधिकार देकर सरकार ही जनता को उनका अनुशासन मानने को विवश करती रहती है। जनता तो इन सबके विरोध में अब भी अपनी जगह पर अडिग खड़ी ही है। ईमानदारी के प्रति अपनी पक्षधरता को इस देश की जनता ने नोटबंदी के प्रकरण में अभी सिद्ध करके दिखा दिया है।
अचानक नोटबंदी का फरमान सुनकर जनता सकते में जरूर आ गई। साधारण लोगों ने जो काट-कपट कर थोड़े-बहुत पैसे धर में दबा-छिपाकर गाढ़े वक्त के लिये रखे थे वे प्रायः बड़ी नोटों में ही थे। गृहणियों के गृहकोष में जो कुछ गुप्त धन था, वह भी उसी शक्ल का था, जो अब पाबन्द थी। यह आदेश घर-घर की आर्थिक गोपनीयता का भण्डाफोड़ करने वाला निकला। कालेधन पर कुठाराघात हो न हो यह तो बाद की बात है मगर महिलाओं के ‘प्रीवी कर्स’ पर तो वज्रपात हो ही गया। फिर भी उन्होंने हँसते-मुस्कुराते, झेंपते-लजाते यह आघात सिर-माथे लिया। किसलिये? इसलिये कि यह देश की भलाई के लिये है।
पूरा देश एक सुबह अचानक खालीहाथ होकर भौंचक एक-दूसरे को देखता रह गया। परेशानियों का पहाड़ सामने और पंगु हौसले पस्त। बहरे बाजार और चिल्लाती जरूरतें। दर-दर गिड़गिड़ाती बिमारी की रिरियाहट और आश्वासनों के बन्द दरवाजे। शादी-ब्याह की आपाधापी और खाली जेबों का कुहराम। अजीब हालत। काम की जगहों पर सन्नाटा और बैंकों के आगे अनियंत्रित भीड़। घरों में रुआंसी रसोइयां और सकताये चूल्हे। फिर भी कहीं कोई विरोध नहीं। किसिम-किसिम की आवाजों में विरोध का कोई भी स्वर पूरी तरह से अनुपस्थित। विपक्षी दलों के बयानों और संसद के हंगामे से जनता विचलित न हुई। उकसावे की तमाम कोशिशें निरर्थक सिद्ध हुई। एक अच्छाई के लिये जनता हजार दुख सहने को तैयार है।
धन्य है, इस देश की जनता। इस देश की जनता देश को परीक्षा के हर दौर में देवभूमि साबित कर देती है।
कोई भी ईमानदारी की बात कर दे, जनता उसके पीछे हो लेती है आँख मूदकर। कोई अच्छाई की बात कर दे, जनता खड़ी हो जाती है, उसके साथ, अपना काम छोड़कर। कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष का ऐलान कर दे, जनता उसे उठा लेती है, सिर आंखों पर। कोई देश का सम्मान दुनिया में बढ़ाने का उद्घोष कर दे, जनता उसकी जयनाद से आसमान गूँजा देती है। जनता की आज भी कितनी आस्था है, ईमानदारी के प्रति। बुद्धिजीवी भले यह घोषणा कर दें कि हमारे समय में भ्रष्टाचार सहज स्वीकृत होकर आचार बन गया है, मगर जनता उनके निष्कर्ष को नकार देती है। जनता के मन में देश के प्रति कितन प्रेम है, देश के आत्म सम्मान की कितनी उसे चिन्ता है, वह समय आने पर छाती फाड़कर दिखला देती है।
प्रधानमंत्री के रूप में माननीय मोदी के तात्कालिक तकलीफदेह फैसले का जनता का अपार समर्थन विस्मय में डाल देता है। यह समर्थन हमें कई तथ्यों की तरफ देखने को उन्मुख करता है, शायद हम जिन्हें महत्वपूर्ण नहीं मानते।
जनता के समर्थन का विश्वास, सरकार के जनपक्षीय चरित्र की उसकी प्रतीक्षित अभीप्सा का उद्घोष है। हमारे द्वारा चुनी हुई सरकार हमारे लिये हो, यह जनमानस की छाती में दबी हुई कितनी गहरी चाह है; इसे महसूसा जा सकता है। लोकतंत्र के मूल आदर्श के प्रति भारतीय जनता की कितनी उत्कष्ट निष्ठा है, उसे देखा जा सकता है।
यह प्रकरण इस बात की तरफ भी ध्यान ले जाता है कि काफी लम्बे अरसे से किसी प्रधानमंत्री ने कोई फैसला ही नहीं लिया। कोई ऐसा फैसला नहीं लिया, सरकारी मशनरी से बाहर जाकर जिससे जनता को लगे कि आमजन से उसका कोई सम्बन्ध है। प्रधानमंत्री के रूप में मोदी जी के फैसले से जनता के मन में अच्छाई की उम्मीद जगी है।
भारत की जनता ने अपना भरोसा अपने प्रधानमंत्री को दिया है। दे दिया है। भरोसे का भार अब उनके ऊपर है। भरोसे भार संभालना अब उनका काम है। इस बारे में सोचना अब उनका दायित्व है। अच्छा घटित हो यह उनकी जिम्मेदारी है।
जनता ‘ब्लैक मनी’ की पाबन्दी पर अपना पक्ष आशातीत ढंग से व्यक्त चुकी है। जनता ‘ब्लैक मैन’ को व्यवस्था से बाहर करने में अपने योगदान का आश्वासन दे रही है। उसका आश्वासन पक्का है। वह अच्छाई के लिये उठाये गये किसी भी असुविधाजनक कदम के साथ सारी कठिनाइयों को हँसते हुये सहते खड़ी है।
‘ब्लैक मैन’ कहाँ है? सबको पता है। उनका सुरक्षित ठिकाना व्यवस्था से बाहर नहीं, व्यवस्था के भीतर ही है। वे व्यवस्था बनाने में ही उसके अंग होकर बने पड़े हैं। वे व्यवस्था को जन विरोधी व्यवस्था बनाने में भिड़े है। जिनका दिल काला है, काला धन जुटाने में लगे हैं। देश के चेहरे पर कालिख पोतने में लगे हैं। समूचे तंत्र को कालातंत्र बनाने में लगे हैं। उनके बाहर होने से ही व्यवस्था साफ-सफेद हो सकती है।
यह बहुत आसान नहीं है। मगर बहुत कठिन भी नहीं है। इस देश की जनता बहुत कुछ नहीं मांग रही है। सदियों से कष्ट सहने की ताकत उसने पूरी-पूरी बना रखी है। अपने देश के किसान ‘कम्पनी प्रोडक्ट’ के मेगामार्ट से पहले देशी उत्पादों के खरीद के ‘मेगा सेन्टर’ मांग रहे हैं। मजदूर प्रतिदिन के काम मांग रहे हैं। बेरोजगार जीने-खाने भर के कमाने के अवसर मांग रहे हैं यह बस कुछ, कुछ अच्छा घटित होने की उम्मीद पर निर्भर है।
इस महान देश की जनता का भरोसा बचा लेना आपके हाथ है। यह बच जाय तो देश बचा रह जायेगा। यह भरोसा बढ़ जाय तो देश जरूर आगे बढ़ जायेगा।

जो तमाशा नहीं है

डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

गली-गली ढोल-नगाड़े बजा-बजाकर लोगों को जुटाया गया था। लोग इकट्ठे हो गये थे। एक खुली जगह में भारी भीड़ समायी हुई थी। वहाँ आदमी नहीं थे अब, केवल भीड़ थी। उत्सुकता थी। तमाशा शुरू हो चुका था। तमाशा शुरू करने से पहले मदारी ने भीड़ को भलीभाँति समझा दिया था कि तमाशा आपके लिये पेश किया जा रहा है। इस खेल का मकसद आपका स्वास्थ्य है। आपकी सुभीता है। आपकी सुरक्षा है। आपका विकास है।
भीड़ तमाशा देख रही थी। भीड़ तन्मय थी। भीड़ अवाक थी। भीड़ स्तब्ध थी। भीड़ ताली बजा रही थी। भीड़ जय बोल रही थी। तरह-तरह के करतब देखकर, सुनकर भीड़ चकित थी। भीड़ जब भी होती है, सबसे पहले चकित होती है। भीड़ हमेशा चकित होते-होते थकित हो जाती है। मुझे लग रहा था तमाशा भीड़ के लिये नहीं है। भीड़ तमाशा के लिये है।
मैं देख रहा था पेट की आग, आग के घेरे में कूद रही थी। कूदकर घेरा फाँद रही थी। भूख बड़ी गजब की चीज है। वह न जाने कैसे-कैसे करतब सिखला देती है। आदमी कुछ भी करने पर उतारू हो जाता है। कुछ भी कर लेता है। कुछ भी कर दिखाता है। खैर, पेट की भूख तो मामूली भूख होती है। मुट्ठी भर अन्न के दानों से, चुल्लू भर पानी से शान्त हो जाती है।
मगर यह तो मामूली भूख है। दौलत की भूख, शोहरत की भूख, शान की भूख, सत्ता की भूख, आश्चर्यजनक भूख है। वह सात समुन्दर का सारा पानी पीकर भी नहीं बुझती। वह बुझती नहीं कभी भी, केवल जलती है। वह तरह-तरह के तमाशे रचती है। बड़े-बड़े तमाशे। ऊँचे-ऊँचे तमाशे। लम्बे-लम्बे तमाशे। गहरे-गहरे तमाशे। वह तमाशे के लिये भीड़ जुटाती रहती है। तमाशा होता रहता है, भीड़ देखती रहती है। भीड़ तालियां बजाती है, चिल्लाती है। भीड़ जिन्दाबाद बोलती है। मुर्दाबाद बोलती है। भीड़ हंसती है। भीड़ रोती है। मगर भीड़ तमाशा देखती है।
मेरे मन में कुछ सवाल उठते हैं। तमाशा देखना भीड़ की नियति है, क्या?
तमाशा देखना भीड़ की नियति क्यों है? क्या केवल किसी तमाशा के लिये ही भीड़ होती है? बिना तमाशा के भीड़ होना संभव नहीं क्या? हमारे लोकतंत्र में जनता भीड़ क्यों बन गई है? जनता भीड़ कैसे बन गई है? मैं नहीं जानता ये सवाल वाजिब हैं या गैरवाजिब। मगर मैं क्या करूं। ये सवाल तो खड़े हो गये हैं। ये तमाशा के आगे खड़े हो गये हैं। तमाशा का मजा बिगाड़ने पर ये एकदम आमादा हैं। पूरी तरह उतारू हैं। मैं सवालों को पूरी ताकत से बैठाने की कोशिश करता हूँ।
मैं तमाशा देख रहा हूँ। मेरी आँखों के आगे मेरा देश खड़ा हो जाता है। मैं देख रहा हूँ, हमारे पूरे देश में तमाशा हो रहा है। जगह-जगह, हर जगह तमाशा हो रहा है। तमाशा दिखाने की संविधान सम्मत कंपनियां हैं। कंपनियां अपने तरह से अपनी पसंद के तमाशे दिखा रही हैं। दिल्ली में किसी कंपनी का तमाशा चल रहा है। लखनऊ में किसी दूसरी कम्पनी का। पटना में किसी दूसरी का। मगर चल रहा है हर कहीं।
राजा का सेवक बन जाना कभी-कभी मध्यकालीन या पुराकालीन आदर्श कथाओं में सुनने में आ जाया करता था। मगर सेवक का राजा बन जाना मौजूदा लोकतंत्र का ऐसा वैचारिक ‘लीजेण्ड’ है, जिसका केवल अचरज से मुँह ताकते रहा जा सकता है। समूचा हिन्दुस्तान अपनी पीड़ा में तड़फड़ा रहा है और हिन्दुस्तान की सेवा के लिये सेवकों में धक्का-मुक्की मची है। अधिनायक के अधिकार से भरे हुये सेवकों का हुजूम, राजसी वैभव से लदा-फँदा सेवकों का समूह; अपने रोब-दाब से दिलों को दहलाता सेवकों का जत्था, अपनी मनमानी पर उतारू सेवकों का दल, नहीं, दल ही नहीं दल का दल हिन्दुस्तान को अपनी सेवा समर्पित करने के लिये रौद रहा है। यह सेवा का तमाशा सबसे दिलचस्प तमाशा है।
यह सेवा का मिथक, मिथकों के इतिहास का सबसे नया, सबसे जटिल और सबसे दुर्बोध मिथक है, जिसका हमें सबसे अधिक बोध है।
कोई कम्पनी हिन्दुस्तान का चेहरा बदलने का तमाशा खेल रही है। उसका कहना है कि विश्व बाजार में हिन्दुस्तान का चेहरा ठीक नहीं है। वह ग्राहकों को लुभाने लायक नहीं है। उसका कहना है हिन्दुस्तान का चेहरा खिला होना चाहिए। हम खिलाकर दिखायेंगे दुनियाँ को। मगर कैसे? हिन्दुस्तान पूछना चाहता है। हमारे चेहरे पर तो बदहाली की हवाइयाँ उड़ रही हैं, बेरोजगारी के थप्पड़ों के लाल निशान हैं, असुरक्षा का आतंक है, अशिक्षा का कीचड़ है।
‘‘तो क्या हुआ। कीचड़ में ही तो कमल खिलता है।
‘‘कैसे खिलेगा?’’
‘‘यह ‘पे-टियम’ है न, यह खिला देगा। यह सबके चेहरे को खिला देगा। यह समूचे हिन्दुस्तान के चेहरे को खिला देगा। ताजे फूल की तरह प्रफुल्ल बना देगा।’’
‘‘अपने हाथों से हल छोड़िये, कुदाल छोड़िये, खुरपी छोड़िये, कलम छोड़िये, करघा छोड़िये। सबकुछ छोड़कर ‘पे-टियम’ गहिये।
‘‘पे-टियम’ आपको सबकुछ देगा। चावल देगा, आंटा देगा, आलू देगा। सबकुछ तो देगा ही पेट भरने के बाद की डकार भी देगा। फिर नींद में सपने भी।

किसानों का अनाज खलिहान में पड़ा रहे, कोई बात नहीं। किसानों को खाद पर सब्सिडी न मिले कोई बात नहीं। आपदा-राहत का चेक बीच रास्ते से गायब हो जाय कोई चिन्ता नहीं। हम गाँव-गाँव में ‘मेगा मार्ट’ बनायेंगे। ‘फास्ट फूड के प्रोडक्ट हैं न! कोई फिक्र नहीं।’
कोई कम्पनी कहती है कि हम हिन्दुस्तान का कलेजा हाथी जैसा बनायेंगे। कलेजा मजबूत रहेगा तो देश सब कुछ सह लेगा। भ्रष्टाचार का ओला पड़ता रहे, सह लेगा। बेईमानी की आंधी चलती रहे कोई बात नहीं। मजदूरों के हाथों को काम न मिले कोई बात नहीं। जब देश हाथी जैसा होगा तो चलता रहेगा अपने रास्ते। कुत्ते भौंकते रहें तो भौंकते रहें, उनकी कोई परवाह नहीं।
एक तमाशा कम्पनी मंच पर पारिवारिक कलह के उत्तेजक खेल पूरे कौशल से दिखाकर बता रही है कि हमारे परिवार में कोई विवाद नहीं है। हम सब एक हैं। अब परिवार में कोई दिक्कत नहीं है यानी अब देश में कोई दिक्कत नहीं है। उनके लिये अपना परिवार ही अपना देश है। यह समूचा देश उनके परिवार का है। पूरे देश को अपने परिवार का बनाने खातिर कुछ भी करने में उनको कोई हिचक न होगी।
यह देश हमारा कैसे हो जाय इसके लिये सारी कंपनियां खून-पसीना बहाकर दिन-रात एक किये हैं। किसिम-किसिम के करतब इजाद कर रही है। लगातार अभ्यास में लीन है। प्रदर्शन में मशगूल है।
सारा देश तमाशा देख रहा है। नये-नये तमाशे। शेर की तरह गरजने वाले तमाशे। घड़ियाल के आंसू रोने वाले तमाशे। गीदड़ की तरह माँद में घुस जाने वाले तमाशे। साँप और नेवले की लड़ाई वाले तमाशे। जीती-जागती शहादत वाले तमाशे। झूठ के अनगिनत तमाशे। रोज-रोज। हर रोज। हर कहीं।
अब तमाशे की मुनादी के लिये ढोल-नगाड़े का इस्तेमाल नहीं है। उसका युग बीत गया। उसका उपयोग भारत में होता था। अब हम इंडिया में हैं। हम तकनीकी क्रांति के युग में चरण जमा चुके हैं।
हम उत्थान की सीढ़ियां चढ़कर ‘डिजिटल’ के सोपान पर खड़े हैं। अब तमाशे की मुनादी के लिये हमारे पास इंटरनेट है, स्मार्टफोन है, टी.वी. में समाचार के स्वतंत्र चैनल हैं, बकायदा। अब तमाशा देखने के लिये बड़ा सुभीता है। अब घर बैठे सारे तमाशे का सजीव प्रसारण पूरे दृश्यबोध के साथ आपके लिये सुलभ है। अब आदमी के लिये आँख कान की जरूरत नहीं है। अब हमारे आँख-कान समाचार चैनल हैं। जो दिखा दे, सुना दें, उनकी मर्जी। हमें वहीे देखना है, जो वे दिखाना चाहें। वही सुनना है, जो वे सुनाना चाहें। हम सब भीड़ हैं। हम सब देख रहे है। हम वह सब कुछ देख रहे हैं जो तमाशा नहीं है।

प्राणों के दीप जलाकर

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

दीवाली आ रही है। वह बाजार के बहुत नजदीक है। घरों से अभी दूर है।
दीवाली पहले बाजारों में क्यों आ जाती है? दीवाली की उजास से बाजार लम्बे समय तक क्यों जगमग बने रहते हैं? बाजार की रोशनी से चमकती आँखों की ओर आँख उठाकर ताकतें हमारे घरों का मुँह भकुआ क्यों जाता है? हर बार दीवाली आने से पहले ये सवाल आकर मुझे घेर लेते हैं। मैं उजबक की तरह उनका मुंह ताकता रह जाता हूँ।
मगर प्रश्न, प्रश्न हैं और त्योहार, त्योहार। हमारे त्योहारों में हमारे पारंपरिक विश्वास इतना बल है कि वह प्रश्नों की पूरी फौज को पराजित करके अपनी विजय का ध्वज समय की छाती पर, गाड़ देते हैं। हमारे पर्व हमारी अदम्य जिजीविषा के अचूक स्रोत के मार्गदर्शक आकाश दीप हैं, आँधियों में भी अकम्प जलने वाले आकाश दीप।

दीवाली से पहले हमारे बाजार मोम के दीयों से पट गये हैं। दुकानें सज गई हैं। रंग-बिरंगे मोम के दीपक हमारा चित्त लुभा रहे हैं। हमारे समय के बाजार में जो दीये दिख रहे हैं, उपलब्ध हैं सब बुझे हुये दीये हैं। जलते हुये दीपों की, जलते रहने वाले दीपों की कोई दुकान हमारे समय के बाजार में नहीं है। क्यों नहीं है? हमें पता नहीं है। हमें पता है कि मोम के दीये बाती जलते ही गलने लगते हैं। जरा-सी रोशनी की आँच में पिघल जाते हैं। रोशनी बाँटने का दम भरने वाले खुद रोशनी में आते ही गलने लगने लग जाते हैं। गलते-गलते कुछ ही समय में पूरा गल जाते हैं। उगते-उगते ही ढल जाते हैं। अँधरे में समा जाते हैं। वे सिर्फ अपने होने की जगह पर छोड़ जाते हैं, कालिख का एक भद्दा निशान। निशान, जो हमारी जमीन को धब्बेदार बना देता है। फिर भी, हमें दीवाली मनानी है- मनानी ही होगी इन्हीं दीयों के सहारे।

मिट्टी के दीये खोजने पर बड़ी मेहनत से मिलते हैं। मिल जाते हैं, कहीं-कहीं। मगर मशक्कत के साथ। हमारे समय में अपनी माटी की चीजें मिट्टी में मिला दी गई हैं। मिट्टी बन गई हैं। मिट्टी हो गई हैं। हमारे गाँवों में दीये गढ़ने के लिये कुम्हारों के पास जमीन नहीं है, माटी निकालने के लिए। उनके घरों में अब चाक नहीं है, जो चाक गीली मिट्टी को जाने कितने-कितने रूप और रंग देता था, अब उनके पास नहीं है। उनके पास सिर्फ उनके हाथ में एक प्रमाण पत्र है। जाति का प्रमाण पत्र। हमारे अंचल के सारे कुम्हार अनुसूचित जनजाति के खरवार हो गये हैं। हमारी सरकार ने उनके हाथों में यह प्रमाण पत्र थमा दिया है। वे अपने खाली हाथों में प्रमाण पत्र थामे, विकास और सुनहरे दिनों के वायदों का मुंह ताक रहे हैं।
हमारे गाँवों में अब माटी के दीये नहीं हैं। हमारे कपास के खेत अपनी सूनी आँखों से रूई की बाती के लिए कोलतारी सड़कों के सहारे सौदा-सुलुफ की भाषा सीखने के लिये कहीं दूर ताक रहे हैं। अब हमारे गाँवों के घरों में घी नहीं है। दूध ही नहीं बचा तो घी कहाँ से होगा। हमारे गाँवों में सिर्फ चाय भर दूध मुश्किल से बच पा रहा है। बाकी सबका सब डेयरियां हजम कर जा रही हैं। अपने मुनाफे के पेट में।

हम मार्टी के दीयों में घी की बत्तियाँ जलाकर अपनी ड्योढ़ी में रोशनी रखते रहे हैं। ड्योढ़ी में रखे घी के दिये घर के अंदर भी रोशनी करते रहे हैं और घर के बाहर भी। हमारे घर भी प्रकाशित होते रहे हैं, हमारा पड़ोस भी प्रकाशित होता रहा है। हमारी पारस्परिकता भी प्रकाशित होती रही है। हमारी पारस्परिकता में हमारे देश का प्रकाश दुनिया में फैलता रहा है। अब हमारी दीवाली में बारूदी पटाखों का भयावह विस्फोट है, विषैला धुँआ है, हमारी पारस्परिकता का ठहाका नहीं है। पारस्परिकता के अट्टहास के बिना हमारे पर्वों के कण्ठ गूँगे हो गये हैं। हमारी परम्परा में माटी के दीये जलाकर दीवाली मनाने वाले गाँव-गाँव में घर-घर में होते रहे हैं। आज हमारे समय में दीवाली मोम की दीवाली बनकर रह गई है। हमारा समय मोम के पिघलते स्तंभों का समय बनकर रह गया है।

हम दीवाली मना रहे हैं, मगर हमारे प्रणों में पैठा अँधेरा घट नहीं रहा है। हम मकान बनाते जा रहे मगर हमारा पड़ोस गुम होता जा रहा है। हम बड़ी-बड़ी कालोनियों बसाते जा रहे हैं, हमारी पारस्परिकता उजड़ती जा रही है। हम अपने घरों में किसिम-किसिम के सामान भरते जा रहे है, हमारा अन्तर खाली होता जा रहा है। हम खुशी के लिये पटाखे फोड़ते जा रहे हैं, हमारे भीतर उदासी भरती जा रही है। हम बहुत कुछ पीते जा रहे हैं, हमारी प्यास बढ़ती जा रही है। हम बहुत कुछ पढ़ रहे हैं मगर कीचड़ से आगे बढ़ नहीं रहे हैं। हम पढ़ते जा रहे हैं फिर भी लड़ते जा रहे हैं।

हमारे समय के प्राणी बुझे हुये प्राणों के प्राणी होते जा रहे है। नहीं, भाई नहीं, बुझे हुये प्राण को लेकर दीवाली कैसे होगी। दीवाली तो जलते हुये प्राणों का पर्व है। जलते हुये प्राणों की पारस्परिकता की श्रृंखला ही राष्ट्र की अस्मिता है। अपनी विरासत का वैभव है। अपनी आस्था का आलोक है।

हम जाने कबसे सूनेपन की मस्ती भूल चुके हैं। जिस सूनेपन में सामूहिक अस्तित्व की एकता का संगीत बजता है, उसे सुनने का हमारे पास अवकाश नहीं है। हमारे प्राणों के स्पन्दन में सम्बन्धों की ऊष्मा सोये हुये चूल्हे की तरह ठंडी पड़ गई है। हमारी सांसों के सपने में घर नहीं है, परिवार नहीं है, राष्ट्र नहीं है। हमारे ठिठुरते हुये गणतंत्र में हमारे प्राण सिकुड़ रहे हैं। दीवाली वैयक्तिक उत्कर्ष के आग्रह का पर्व नहीं है। यह सामूहिक अभ्युन्नति, सामूहिक समृद्धि और सामूहिक उल्लास की आराधना का आलोकपर्व है। हमारी दीवाली, दीप नहीं, दीपमाला के अनुष्ठान का आयोजन रचती है। जलते हुये दीपों की श्रृंखला से प्रकाश की अविरल धारा का प्रवाह पैदा करने का उल्लास और उत्साह ही दीवाली का प्राण है। स्वयं प्रकाशित होने और अपने प्रकाश से दूसरों में प्रकाश के स्रोत को जगा देना, हमारे प्रकाश पर्व की अभीप्सा है। हमारे प्रकाश पर्व की इस अभीप्सा को अपने प्राणों की अभीप्सा बना लेना हमारे समय की पुकार है।
दीवाली के समय महादेवी जी की एक कविता की पंक्तियाँ स्मृति को बहुत उद्वेलित कर रही हैं-
‘‘अपने इस सूनेपन की मैं हूँ रानी मतवाली
प्राणों के दीप जलाकर करती रहती दीवाली।।’’
दीवाली के मौके पर मैं महादेवी की कविता का उद्वेलन अपने समय के सभी साथियों को बांटने का बहुत-बहुत मन रखता हूँ।
हम दीवाली पर अपने प्राणों के दीप जलायें। अपने-अपने प्राणों के दीप जलायंे। जले हुये प्राणों के दीपों से दीपमाला सजायें। अपने उजास से, अपने-अपने उजास से अपने राष्ट्र को अलोकित कर दें। हमारे आलोक की अभीप्सा जन-जन के मँगलेच्छा की अभीप्सा है। हमारी अभीप्सा अंधकार के उच्छेद की अभीप्सा है। अंधकार के अलोप की अभीप्सा है,- ‘‘अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाये।’’ मित्रों! प्राणों के दीप जलाकर चलो मनायें दीवाली।

अनर्थकरी विद्या का व्यवसाय

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

अर्थकारी विद्या ही सुख और समुन्नति का साधन होती है, ऐसा हमारे शास्त्रों में बार-बार कहा गया है। हमारा दुर्भाग्य यह है कि हम अर्थ के मायने धन के अलावा कुछ और भी होता है, बिल्कुल भूल चुके हैं। अर्थ के और भी अर्थ होते हैं, यह हमारी स्मृति में है ही नहीं। जीवन व्यवहार के लिए अविष्कृत भाषा का रूढ़ हो जाना, मनुष्य जाति के लिये जितना पीड़ादायक है उतना और कुछ भी नहीं। भाषा के व्यापक विस्तार का संकुचित हो जाना, हमारे जीवन विस्तार के संकुचन को ही प्रमाणित करता है। बहुस्तरीय अर्थव्यंजना के शब्दों का इकहरे अर्थ में सीमित होते जाना हमारे जीवन-बोध के निरन्तर उथले होते जाने की करुण नियति का साक्ष्य है।
हमारे पारंपरिक चिन्तन में व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण स्वतंत्रता की गरिमा के साथ समाज की इकाई है। राष्ट्र का तत्व है। शिक्षा, व्यक्ति को समाज और राष्ट्र द्वारा सुलभ कराई जाती है। वह समाज का और राष्ट्र का अवदान है, व्यक्ति के लिए। एक शिक्षित व्यक्ति दूसरों की तुलना में अधिक ऋणी है, समाज का और राष्ट्र का। मगर हमारे समय में ऐसा नहीं है।
ऐसा क्यों नहीं है? यह बड़ा ही पीड़ादायक प्रश्न है। इस प्रश्न के सामने हम खड़ा होने का साहस ही नहीं जुटा पाते। स्वतंत्रता के बाद हमने जिस शिक्षा-व्यवस्था का विकास किया है, उसके बड़े ही विस्मयजनक परिणाम हमारे सामने हैं। हमारे समय का हर शिक्षित आदमी सोचता है कि समाज और राष्ट्र उसका ऋणी है। किसी भी हालत में समाज और राष्ट्र से उसे अपना ऋण ब्याज सहित वसूलना है। इसका उसे जन्मजात हक है। हमारी शिक्षा का पहला काम आदमी को उसकी जड़ से काटना है। जहां आदमी जनमा है, हरा हुआ है, जीवनरस पीकर बड़ा हुआ है, उस परिवार से, उस समाज से उसे उखाड़कर आत्मकेन्द्रित बनाने का काम शिक्षा का प्राथमिक काम है। कितना विस्मयजनक है- एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर आत्मकेन्द्रित मनुष्यों की बेशुमार आबादी का बढ़ते जाना। कैसा विपर्यय है व्यवस्था के आदर्शों के विपरीत व्यवस्था का परिणाम। हमारी समूची सामाजिक व्यवस्था अगर अपने आदर्शों के विपरीत परिणाम प्रगट कर रही है तो क्या यह इस बात का स्वयं प्रमाण नहीं है कि हमारी पूरी व्यवस्था ही छद्म व्यवस्था है। हम व्यवस्था में नहीं व्यवस्था के छद्म में जी रहे हैं। आकाश पर्यन्त फैले छद्म के वितान के नीचे जिन्दगी कैसी दारुण यातना है, उसे हमारा समय सबसे अधिक जानता है।
परिवार, समाज और राष्ट्र के साथ व्यक्ति के जो पारस्परिकता के सम्बन्ध सूत्र हैं, हमारी शिक्षा उसे विच्छिन्न करने वाली शिक्षा है। इन्हीं आपसी सम्बन्धों को अर्थ प्रदान करने वाली विद्या को हमारी परम्परा में अर्थकारी विद्या कहा जाता रहा है, धन हड़पने के हथकण्डों को नहीं। विद्या केवल पेट पालने के कौशल और वैयक्तिक सुख-सुविधाओं के विस्तार का साधन नहीं है। शिक्षा व्यक्ति के साथ समाज और राष्ट्र की अभ्युन्नति का विवेक और शक्ति प्रदान करने वाला अपूर्व रसायन है। मगर यह बड़ा अजीब सच है कि हमारी स्वतंत्रता के बाद की समूची शिक्षा व्यवस्था हमारी पारस्परिकता को खण्डित और विच्छिन्न करने वाली साबित हो रही है। ऐसा क्यों है? यह सबसे विचारणीय प्रश्न है, जिस पर विचार करने का हमारा ध्यान ही नहीं जाता।
स्वतंत्रता के बाद जिस तरह के शिक्षित हमारे देश में तैयार हुये हैं, उनके विचार में और व्यवहार में पारस्परिकता, सामाजिकता और राष्ट्रीयता का कोई मूल्य बोध ही नहीं है। हम आज भी यह मानते हैं कि हमारे विकास में अशिक्षा सबसे बड़ी बाधा है। मगर सच यह है कि हमारे विकास में हमारी शिक्षा सबसे बड़ी बाधा है। राष्ट्रीय विकास के संसाधनों को अपने निजी विकास का जरिया बनाने वाली जमात अशिक्षितों की नहीं, शिक्षितों की है। पता नहीं हमारी शिक्षा की कैसी विडम्बना है कि हमें जो पढ़ाया जा रहा है, सिखाया जा रहा है, उसमें हमारी कोई रूचि नहीं है। जो नहीं पढ़ाया जा रहा है जो हमारे पाठ्यक्रमों के बाहर है, उसकी दक्षता में हम पूरे निपुण हैं। मसलन हमें पढ़ाया जाता है, पुल बनाना, सड़क बनाना, भवन बनाना और हम सीख लेते हैं पूरा-पूरा कमीशन बनाना। हमें पढ़ाई जाती है करुणा, हम सीखत लेते हैं क्रूरता। हमें सिखायी जाती है, मानव शरीर की सर्जरी, हम सीख लेते हैं, जेब काटने की कला। हमारी शिक्षा बेहद स्वार्थी क्रूर, हिंसक और लोलुप नागरिक तैयार कर रही है। हमारी शिक्षा, समाज को और राष्ट्र को कमजोर करके अपने को मजबूत बनाने का सपना देखने वाले मनुष्यों का उत्पाद बाजार मे ंउतार रही है। सचमुच यह कितना भयानक है। हमारे समय में देश सबका है, मगर देश का कोई नहीं है।
हमारे लोकतंत्र का मूल आधार बन्धुत्व है। बन्धुत्व के साथ संयुक्त होकर ही स्वतंत्रता अर्थवान होती है। बन्धुत्व के साथ ही समता का कोई अर्थ होता है। पारस्परिकता का विकास ही लोकतंत्र का अर्थ विस्तार है। कितना विस्मयजनक है लोकतंत्र के भीतर पारस्परिकता का क्षरण। क्षरण ही नहीं ध्वंस! हम अपने आदर्शों में लोकतंत्र का ढोल पीट रहे हैं और व्यवहार में पारस्परिकता का भयानक विध्वंस देख रहे हैं। परिवार से होकर राष्ट्र तक भयानक विघटन का विस्तार बराबर बढ़ता जा रहा है। बड़ा अद्भुत विपर्यय है कि जबसे हमने लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू की है अपने देश में, परिवार में विघटन की बाढ़ आ गई है। अब तो संयुक्त परिवार नाम की चीज पुरातात्विक धरोहर जैसी रह गई है। यह क्या है? कुछ समझ में नहीं आता, ऐसा क्यों है? हमने बाग लगाये आम के पेड़ तैयार हुए बबूल के। पारिवारिकता, पारस्परिकता, बन्धुत्व का विकास तो दूर उल्टे इनका समूल नाश ही हो गया।
अब परिवार, परिवार नहीं है। पड़ोस, पड़ोस नहीं है। गाँव, गाँव नहीं है। देश, देश नहीं है। दुनियां, दुनियां नहीं है। अब बस केवल स्वार्थ है। अपने स्वार्थ के साथ आदमी अकेला खड़ा है। बिल्कुल अकेला। सबसे अलग। उद्भ्रान्त-सा। बन्धुत्व को तो गोली मारो, हम किसी भी तरह के सम्बन्ध से हीन होकर रह गये हैं। हमारी समूची शिक्षा सिर्फ स्वार्थ को उत्प्रेरित और पोषित करने वाली शिक्षा होकर रह गई है। स्वतंत्र भारत के विकास में शर्मिन्दगी के जितने भी नायक मंच पर अभिनय कर रहे हैं, सभी शिक्षित हैं। शिक्षित ही नहीं उच्च शिक्षित हैं। हमारी शिक्षा ने जिस नस्ल के आदमियों को निर्मित किया है, उनकी प्राथमिकता में समाज नहीं है, देश नहीं है, परिवार नहीं है। उनकी प्रतिबद्धता पारस्परिक उत्कर्ष के प्रति नहीं, आत्मिक उत्कर्ष के प्रति है।
हमारे मनीषियों ने कभी कहा था,- परिवार के हित के लिये एक व्यक्ति को, गाँव के लिये एक परिवार को, देश के लिये एक गांव को और विश्व समुदाय के कल्याण के लिये एक देश को त्याग देना धर्म है। आज हम अपने हित के लिए, व्यक्तिहित के लिये-गांव, समाज, देश और विश्व मानव के हित को नहीं देख पा रहे हैं। हम अपने सिवाय किसी को नहीं, कुछ को नहीं देख रहे हैं। हम अन्धे हैं। हम अन्धे हो गये हैं। हम पढ़े-लिखे हैं मगर अन्धे हैं। हम अन्धे हैं मगर हमें पता नहीं है कि हम अन्धे हैं। फिर क्या उपाय है? क्या उम्मीद है? हमारी शिक्षा हमें हमारे अन्धेपन की खबर नहीं दे रही है।
यह शिक्षा अनर्थकारी शिक्षा है। हमारे समय में गांव-गांव में, बाजार-बाजार में, शहर-शहर में अनर्थकरी विद्या का व्यवसाय पसरा हुआ है।
हमारी अर्थकारी विद्या की विरासत अनर्थकरी विद्या के व्यवसाय में डूब रही है। शायद हमें, पता नहीं है। शायद हमें, पता है।

कबिरा खड़ा बाजार में

Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

कबीर बेधड़क बाजार में आने-जाने वाले आदमी हैं। बीच बाजार में खड़े होने का असम साहस कबीर में है। वे अपने काते-बुने कपड़े भी लेकर बाजार में निकलते रहे हैं। वे अपनी कविता भी लेकर बाजार में निकलते रहे हैं। वे अपनी लुकाठी लेकर भी बाजार में निकलते रहे हैं। कबीर के हाथ में वस्त्र भी था। कविता भी थी। लुकाठी भी थी। बड़ा विस्मय होता है। इस विस्मय जनक विरल आदमी को देख पाने के लिए बराबर मन मचलता रहता है। मन का क्या, मन तो जाने किस-किसके लिये, किन-किन चीजों के लिये मचलता रहता है। मगर कुछ भी कहाँ हो पाता है। लगता है, हमारे समय में हमारा और हमारे जैसों का मन सिर्फ मचलने के लिये ही रह गया है। खैर!
कबीर की कविता जीवन के अन्तर और बाह्य दोनों छोरों के सच को छूती कविता है। कबीर के वस्त्र उनके न होने के बाद भले सुलभ न रह गये हों मगर उनकी कविता आज भी हमारे लिये ओढ़ने-पहनने के काम की बनी हुई है। कविता का ओढ़ने पहने के काम का बने रहना कविता के लिये कैसा है, इसका निर्णय बड़ा मुश्किल है।
अभी थोड़े दिनों पहले मैंने एक प्रख्यात लेखिका का कबीर के बारे में एक लेख पढ़ा। उस लेख में उन्होंने कबीर के हिन्दू होने के पक्ष में अपनी कल्पनाशक्ति से कबीर की कविता से अनेकों उद्धरण देकर उनको हिन्दू सिद्ध करके ही दम लिया। उनका तर्क है कि कबीर की कविता में हिन्दू धर्म के प्रतीकों, पद्धतियों और आचार-व्यवहार की जितनी गहरी पकड़ मिलती है, उससे उनका हिन्दू होना सिद्ध होता है। मजेदार बात है कि कबीर की जाति के बारे में इतिहास में बहस करने का अवकाश है। तर्क रखने की गुंजाइश है। मैं सोच में पड़ गया हूँ कि कबीर की जाति तय कर लेने से उनकी कविता के अर्थ में, उसकी व्यंजना में, उसकी व्याप्ति में कुछ फर्क पड़ने की संभावना दिखाई देती है, क्या? अगर ऐसा है, तो ठीक। चलो पहले जाति ही तय कर लें। कविता जो जाति-धर्म की सरहदों को पार करके पैदा होती है, उसको समझने के लिये जाति-निर्धारण की आवश्यकता कितनी बेधक है।
जहाँ तक हिन्दू प्रतीकों, विश्वासों और व्यवहारों की जानकारी और कविता में प्रयोग की बात है तो इसी तर्क के आधार पर जायसी और रहीम को भी हिन्दू होना ही पड़ेगा। मेरा मन उन लेखिका से बार-बार यह पूछ लेना चाहता है कि कबीर के हिन्दू ठहरा दिये जाने से हिन्दुओं को कोई अतिरिक्त लाभ मिल सकेगा क्या? कबीर के हिन्दू न होने की दशा में हिन्दुओं को उनकी वजह से कुछ नुकसान उठाना पड़ता है क्या?
इस लेख के पढ़ने के आस-पास ही एक प्रतिष्ठित पत्रिका में एक प्रतिष्ठित मुसलमान लेखक का कबीर के बारे में एक और लेख पढ़ा। इस लेख में उन्होंने बड़े परिश्रम से यह प्रमाणित किया है कि कबीर को मुस्लिम धर्म-व्यवहार की सही जानकारी नहीं थी। उनकी कविता में इस्लाम की रीति-नीति का त्रुटिपूर्ण वर्णन अनेक जगहों पर मिलता है। उनके विचार से कबीर मुसलमान जाति के नहीं मालूम पड़ते हैं।
कितना विलक्षण विपर्यय है। कबीर को लेकर यह विपर्यय कितना बेधक है। एक हिन्दूवादी लेखिका कबीर को हिन्दू साबित करने पर तुली हैं। एक धर्मनिरपेक्ष कहा जानेवाला मुसलमान लेखक कबीर को मुसलमान न मानने पर आमादा हैं। दोनों की निष्पत्तियाँ एक ही हैं। कितना आश्चर्यजनक है, विचार के दो ध्रुवों पर स्थित विचारकों का कबीर को लेकर एक जैसा निर्णय। साहित्य के लिये दोनों की सोच कितनी निरर्थक है। पता नहीं क्यों, पता नहीं कैसे हमारे समय में कबीर से अधिक महत्व की चीज उनकी जाति हो गयी है। क्या अब कविता के बारे में भी राजनीतिक दलों की गर्हित चिन्तन धारा के समान्तर जातीय आधार पर सोशल इंजीनियरिंग के नुस्खे आजमाने का समय शुरू होने वाला है? अगर ऐसा होने वाला है तो कितने शर्म की बात है! कितनी ग्लानि की बात है!
अभी-अभी एक मुलाकात में दलित विमर्श के एक क्रान्तिकारी कवि ने बताया कि उनका पक्का विश्वास है कि कबीर की स्वाभावित मृत्यु नहीं हुई थी, बल्कि कट्टरपंथियों ने उनकी हत्या कर दी थी। उन्होंने बताया कि उनके विश्वास का आधार यह है कि कबीर की क्रान्ति चेतना को कट्टरपंथी कभी बर्दाश्त कर ही नहीं सकते। कबीर जैसी कविता लिखने वाले की हत्या अवश्यंभावी है। इस दारुण सच पर इतिहासकारों ने जान-बूझकर पर्दा डालने के लिये चामत्कारिक घटनाओं की परिकल्पना रचकर उनकी मृत्यु से संबन्धित अविश्वसनीय और चामत्कारिक किंवदन्तियों को प्रचारित कर दिया है।
यह सब पढ़कर और सुनकर मैं तबसे तहप्रभ हूँ। स्तंभित हूँ। मेरा मन कबीर के समय में अपने को और अपने समय में कबीर को देखने को विकल है।
मैं देख रहा हूँ, हमारे समय में कबीर बीच बाजार में खड़े हैं। उनके हाथ में लुकाठी है। जलती हुई लुकाठी। उनकी लुकाठी में उनकी कविता की आग जल रही है। यह आग उनके आत्मबोध के तेल से प्रज्ज्वलित है। बिना आत्मबोध के पाखण्ड को जलाने वाली कोई आग जल ही नहीं सकती। मगर हमने तो कबीर की कविता में व्याप्त उनके आत्मबोध को न जाने कबसे ठुकरा रखा है। केवल पाखण्ड विडम्बन को पकड़ रखा है। अब उनके पाखण्ड बिडम्बन को भी हम भुनाने की जुगत में लगे हैं। हिन्दू सोच रहे हैं, हिन्दुओं के पाखण्ड पर प्रहार करने वाला हिन्दू ही हो तो बेहतर है। इसलिये वे कबीर को हिन्दू सिद्ध करने पर तुले हैं। मुसलमानों को इस्लाम में व्याप्त पाखण्ड को उजागर करने वाला मुसलमान किसी हाल में कबूल नहीं है। इसलिए वे कबीर को मुसलमान न मानने के पक्ष में हैं।
इधर कबीर हैं कि हमारे लोकतंत्र के सट्टा बाजार में अपनी कविता की लुकाठी लिये खड़े हैं। कबीर उस बाजार में खड़े हैं, जहां आदमी आदमी नहीं महज एक वोट है। वोट खरीदने और बेंचने की दुकानें सजी हैं। जाति के मूल्य पर, धर्म के मूल्य पर, धर्म निरपेक्षता के मूल्य पर, पिछड़े और दलित के मूल्य पर, विकास के वायदे के मूल्य पर, वोट खरीद-फरोख्त का धन्धा बाजार में अपने रंग में है। हर दुकानदार कबीर को अपनी दुकान में घसीट लाना चाहता है। सारे दुकानदारों ने कबीर की लुकाठी पर पानी फेंक कर बुझा दिया है। सबने मिलकर उनकी लुकाठी उनसे छीनकर सड़क पर फेंक दी है। बीच सड़क पर कबीर की बुझी हुई लुकाठी पड़ी है। कबीर को अपनी दुकान में अपने उत्पाद के विज्ञापन के लिये खींच लाने को दुकानदारों में धक्का-मुक्की मची हुई है।
सभी अपनी-अपनी दुकान की तरफ खींच रहे हैं कबीर को। मगर कबीर हैं कि टस से मस नहीं हो रहे हैं। कबीर बीच बाजार में, बीच सड़क में खड़े हैं, सभी दुकानों से समान दूरी पर। कबीर अकेले रहेंगे मगर किसी दुकानदार के साथ नहीं जायेंगे। वे न हिन्दू दुकानदार के साथ होंगे न मुस्लिम दुकानदार के साथ, न किसी अन्य जाति के दुकानदार के साथ। कबीर की कविता दुकानों से बाहर रहकर दुकानदारों को धिक्कारती रहेगी। कबीर हिन्दू साबित हों, न हों कोई फर्क नहीं पड़ता। वे हिन्दू धर्म के निन्दक नहीं है। वे सिर्फ हिन्दू अन्धता के समर्थक नहीं हैं। कबीर को मुसलमान मानें न मानें वे इस्लाम के विरोधी नहीं है। वे सिर्फ इस्लामिक कठमुल्लेपन के उपासक नहीं है। जहाँ भी पाखण्ड है, अन्धापन है, छल है, दिखावा है, कबीर की कविता उसका उपहास करती रहेगी।
किसी भी समय में बाजार चाहे जितना कुत्सित रूप धारण कर ले, चाहे जितना हत्यारा रूप अख्तियार कर ले मगर उसकी स्वार्थी कट्टरता कभी भी कबीर की कविता की हत्या करने की कूबत नहीं पा सकती। कबीर की कविता हमेशा-हमेशा दुकानदारों को बीच बाजार धिक्कारती रहेगी।

राष्ट्रगान से बाहर होता राष्ट्र

Dr. Umesh Prasad Singh
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

आजादी के आन्दोलन के दौरान स्वतंत्रता की अभीप्सा से उत्क्रान्त भारतीय चेतना की बिल्कुल नयी, मौलिक और ठोस उपलब्धि राष्ट्र की परिकल्पना है। राष्ट्र के स्वरूप से प्रेम और राष्ट्र की अस्मिता के प्रति पूजा का यह भाव भारतीय इतिहास की महत्तम उपलब्धि है।
बहुसंख्यक देवताओं के इस देश में राष्ट्र देवता की उपस्थिति बहुत-बहुत अर्थों में बेहद मूल्यवान है। यह देवता चेतना के सूक्ष्म धरातल पर अवलम्बित न होकर हमारे प्रत्यक्ष बोध पर आधारित है। वह इतना ठोस और प्रत्यक्ष है कि हम अपने हर व्यवहार में उससे अनायास जुड़े हैं। इतना ही नहीं, वह हमारे बीच पहली बार एक ऐसे देवता के रूप में है जिसके अस्तित्व में हमारा अस्तित्व ही घटक के रूप में मौजूद है। हर देशवासी देश की अस्मिता के तत्व में मौजूद है। हमारे देवता का स्वरूप हमारे ही स्वरूप के सामूहिक संयोजन का स्वरूप है। ‘राष्ट्र देवता’ की अस्मिता में राष्ट्र के हर नागरिक की,- प्रथम नागरिक से लेकर अन्तिम नागरिक तक की अस्मिता समाहित है। अपने ही अस्तित्व के पूंजीभूत विग्रह से मिला हुआ यह देवता अन्यतम है।
हमारी परंपरा में कुल देवता और ग्राम देवता पहले से मौजूद थे। राष्ट्र देवता के रूप में उनका उन्नयन भारतीय जाति के चिन्तन के विस्तार और उत्कर्ष का साक्ष्य बन जाता है। राष्ट्र देवता की परिकल्पना में हमें अनायास ही कृष्ण की गोवर्धनपूजा के मन्तव्य का आधुनिक विकास भी सुलभ हो जाता है। ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रदेव की धारणा हमारी गौरवपूर्ण उपलब्धि बन जाती है। राष्ट्र पूजा और राष्ट्र प्रेम की आस्था के पीछे और कुछ नहीं भारतीय जाति की सामूहिक उन्नति, सामूहिक उत्कर्ष, सामूहिक समृद्धि और सामूहिक मजबूती की अदम्य अभिलाषा ही जाग्रतहोकर सजीव हो उठी थी। राष्ट्र की देवता के रूप में अधिष्ठापना भारतीय जनमानस की सामूहिक अस्मिता की पहचान की उद्घोषणा से अलग नहीं है। इसी उद्घोषणा का सम्पूर्ण उद्घोष भारतीय अस्मिता को वैश्विक धरातल पर प्रतिष्ठित करने वाले कवि गुरु रवीन्द्र नाथ ठाकुर के राष्ट्रगान में व्यक्त है।
रवीन्द्र नाथ ठाकुर के राष्ट्रगान में हमारी आस्था और हमारे प्यार का केन्द्र राष्ट्र अपने सारे अवयवों और उपादानों के साथ अपनी समूची आन्तरिक समृद्धि में उपस्थित है। इसमें बंकिम चन्द के ‘वन्दे मारतम्’ की समूची गरिमा भी गुंजित है। इसमें जयशंकर प्रसाद के ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ की असीमता का गौरव बोध भी समाहित है। हमारे राष्ट्रगान में राष्ट्रबोध और राष्ट्रभक्ति का अपूर्व सामासिक संयोजन चामत्कारिक रूप से घटित हो सका है। हम कह सकते हैं कि स्वाधीनता आन्दोलन के समूचे सर्वथा मौलिक मूल्याबोध को राष्ट्रगान अकेले पूरी तरह से व्यक्त करने में सफल सिद्ध हो सका है।
भारत को जन-गण का नहीं अपितु जन-गण-मन का अधिनायक कहकर कवि ने सबसे कम शब्दों में अपूर्व रीति से बहुत बड़ी बात कहने में सफलता सिद्ध की है। अभी तक अधिनायक जन समूहों पर शासन करने वाले होते रहे हैं। मगर अभी-अभी जो भारत नाम का देवता हमारे बीच अधिष्ठित हुआ है, वह समस्त देशवासियों के हृदय पर प्यार पूर्ण शासन करने वाला है। उसका शासन प्यार का अनुशासन है। उसे सबने अपना हृदय दे रखा है। हृदय का सारा प्यार दे रखा है।
वस्तुतः राष्ट्रगान में ‘भारत भाग्य विधाता’ सम्बोधन पद नहीं है। संबोधन पद सिर्फ भारत है। यहाँ भारत का कोई भाग्य विधाता नहीं है। भारत ही सबका भाग्य विधाता है। समस्त भारतवासियों का अलग-अलग भाग्य नहीं है। बल्कि समस्त देशवासियों के भाग्य का निर्माण करने वाला, उनके भविष्य को बनाने वाला स्वयं भारत है। राष्ट्र से ही समस्त राष्ट्रवासियों का भाग्य जुड़ा हुआ है। बड़ी ही सादी किन्तु आलंकारिक शैली में कवि ने भारत राष्ट्र को संबोधित किया है। साभासिक भाषा में इतने विपुल अर्थ विस्तार का संयोजन कविता के क्षेत्र में यहाँ एक दुर्लभ घटना की तरह शोभित है। विराम और समास चिह्नों के साथ यदि कविता का आलेखन हो तो प्रारंभिक राष्ट्रगान की पंक्तियों का पाठ कुछ इस तरह का होगा –
’’जन (के) गण (के) मन (का) अधिनायक,
जय हे, भारत! भाग्य विधाता’’
यह पता नहीं हमारा दुर्भाग्य है या दुर्विपाक! जो भी कहें, मगर हमेशा ही हमारे बीच कुछ अपने को महत्तम समझने वाले लोगों की बुद्धि में अपनी राष्ट्रीय उपलबिधयों की हेयता को प्रमाणित करने की सूझ कौंध ही जाती है। राष्ट्रगान में भी कौंधी। उन्होंने राष्ट्रगान में ‘भारत भाग्य विधाता‘ पद को संबोधन समझ कर उसकी खोज शुरू कर दी। इस तलाश की मुकम्मल अभिव्यक्ति हिन्दी के विशिष्ट कवि रघुवीर सहायक की कविता की पंक्तियों में व्यक्त है –
राष्ट्रगान में भला कौन वह भारत भाग्य विधाता
पहन सुथन्ना जिसके हरिचन्ना गुन गाता।।
राष्ट्रगान में भारत के भाग्य विधाता की खोज छिद्रान्वेषी दम्भी बुद्धिजीविता ने शुरू की और उपाधिधर्मी साहित्यिक अनुसंधानों की तरह जार्ज पंचम को खोज भी लिया। तब से अब तक एक वर्ग का दुष्प्रचार राष्ट्रगान के साथ चस्पा कर दिया गया कि यह कविता जार्ज पंचम के स्वागत के लिये जार्ज पंचम को संबोधित स्वागत गान है। राष्ट्रगान को स्वागतगान में बदलने वाली सूझ पर हमें गर्व करना चाहिये या ग्लानि में लज्जित होना चाहिए, यह तो भारतीय गणतंत्र के भावी उत्तराधिकारियों के गौरव पर निर्भर है। मगर हमें यह कत्तई नहीं भूलना चाहिये कि लोकतंत्र की अवधारणा का जन्म ही व्यक्ति सत्ता के निषेध और सामूहिक सत्ता की गरिमा की अभ्यर्थना से हुआ है। सामूहिक अस्तित्व की अभ्यर्थना ही राष्ट्र की अभ्यर्थना है, लोकतंत्र की अभ्यर्थना है। हम यह गर्व के साथ कहना चाहते हैं कि रवीन्द्र नाथ ठाकुर राष्ट्र और लोकतंत्र की गरिमा की अर्चना के आधुनिक भक्त कवि हैं।
हमारे राष्ट्रगान में हमारे राष्ट्र का ठोस और चाक्षुष स्वरूप भी मूर्तिमान है और उसका तरल आत्मिक स्वरूप भी उसमें बिम्बित है। ‘पंजाब-सिन्ध-गुजरात-मराठा’ में उसकी ठोस संरचना व्यक्त है और ‘विन्ध्य-हिमाचल-यमुना-गंगा’ में उसकी सांस्कृतिक आत्मचेतना बिम्बित है। इस विशाल देश की असीम जनभावना की भक्ति को-देश भक्ति- को कवि ने ‘तव शुभ नामे जागे’ कह कर जो मार्मिक उद्घाटन किया है, वह अन्यतम है। हृदयहारी है। देश के समस्त देशवासियों का जागरण देश के नाम के साथ होने का बोध देशभक्ति के अपूर्व भाव की अनूठी अभिव्यक्ति है। देश के नाम से जागकर अपनी सारी दिनचर्या को देशसेवा के लिये अर्पित करके फिर देश देवता से ही अपनी अभ्युन्नति के लिये आशीष मांगने का समुज्ज्वल भावबोध भगवद्भक्ति और देशभक्ति में अभेद की प्रतिष्ठा करता है।
भगवद्भक्ति की भिन्न प्रणालियों और भिन्न बोधों के बीच देश भक्ति की सर्वथा नयी प्रणाली और नये बोध को जोड़ने के कारण भक्ति के इतिहास में यह एक नये अध्याय का आविर्भाव है। इस अध्याय का हमारा राष्ट्रगान मंगलाचरण है। इस अध्याय का पाठ हमारे राष्ट्र और हमारे लोकतंत्र के वर्तमान और भावी गौरव का आधार है।
खेद की बात है कि हम औपचारिकता के निर्वाह में राष्ट्रगान तो गा लेते है मगर अपने सारे अवयवों और उपादानों के साथ राष्ट्रबोध से वंचित रह जाते हैं। हमारे राष्ट्रगान में राष्ट्र अनुपस्थित होता जा रहा है। राष्ट्रबोध के माध्यम से राष्ट्रभक्ति का सही पाठ हमारे राष्ट्रगान में संरक्षित है। भारतीय जन-मन में जय हे भारत! की गूँज ही भारत की अक्षुण्ण अभ्युन्नति की एकमात्र मंत्रशक्ति है। व्यक्ति की जयगाथा नहीं, दल की जयगाथा नहीं, देश की जय गाथा, देश के अन्तिम व्यक्ति की जयगाथा का अनुष्ठान ही देशभक्ति है।

सुन्दर की प्रतिष्ठा ही साहित्य का प्राण है

डा. उमेश प्रसाद सिंह।
डा. उमेश प्रसाद सिंह।

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

जीवन-जगत में सुन्दर और असुन्दर दोनों निर्विवाद रूप में हर काल में स्थित है। ऐसा नहीं है कि अतीत के काल खण्डों में सबकुछ सुन्दर ही सुन्दर रहा हो। ऐसा भी नहीं है कि भविष्य में सबकुछ सुन्दर ही होगा। यह भी सच नहीं है कि वर्तमान समय में असुन्दर अपेक्षाकृत अधिक है। यह सच है कि वर्तमान में हमें असुन्दर अधिक दिखाई देता है। इसका कारण केवल यह है कि हम वर्तमान काल को अधिक नजदीक से देख पाते हैं और बाकी काल की अपेक्षा। उसके साथ हमारे गहरे सरोकार हैं और हमारी सजीव अनुभूतियाँ जुड़ी हैं। फिर भी मनुष्य जाति की स्मृति हमेशा सुन्दर को ही अपने में सँजोने का स्वभाव रखती है। सुन्दर के साथ होने की मनुष्य की आकांक्षा उसकी सहजात है।
साहित्य मनुष्य के स्वभाव का ही सृजन है। मनुष्य और मनुष्य के बीच के पारस्परिक सम्बन्धों में व्याप्त सौन्दर्य की आन्तरिक धरातल पर प्रतिष्ठा ही साहित्य का प्राण है। बाह्य धरातल पर यही काम शासन-व्यवस्था करती है। शासन-व्यवस्था और साहित्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। स्वभावतः तो दोनों एक-दूसरे के सहयोगी ही हैं। मगर जब-जब शासन, कुशासन का रूप ग्रहण कर लेता है, साहित्य उसका विरोधी दिखाई पड़ने लगता है। शासन में प्रायः ही वर्चस्व और स्वार्थ की लालसा समाहित रहती है, इसलिये साहित्य का स्वर सत्ता के विरोधी स्वर के रूप में अधिकतर पहचान रखता है।
सुन्दर की प्रतिष्ठा का सीधा अर्थ असुन्दर की अप्रतिष्ठा से है। जब साहित्य सुन्दर की प्रतिष्ठा करता है तो अपने आप असुन्दर अप्रतिष्ठित और निरस्त होता है। हमारे जीवन में सुंदर और असुंदर दोनों मौजूद है। साहित्य जीवन की पूर्णता में दोनों को देखता है। वह असुन्दर को इस तरह से देखता है, इस तरह से दिखाता है कि वह हमारे जीवन में अप्रतिष्ठित हो सके। असुन्दर के अप्रतिष्ठा की उत्कष्ट प्रेरणा ही आधुनिक चिंतन के यथार्थवाद की जननी है। हमारी साहित्य परम्परा में सौन्दर्यबोध का आधार और नीति निर्माण की भूमि वैयक्तिक स्वतंत्रता की सुरक्षा और पारस्परिक सौहार्द के बीच संतुलन के खोज में ही निर्मित होती रही है। खेद का विषय है कि समकालीन साहित्य जीवन में व्याप्त असुन्दर की अप्रतिष्ठा में अपनी भूमिका नहीं निभा पा रहा है। आज हमारे जीवन में निरन्तर साहित्य की जगह कम होती जा रही है।
जीवन में साहित्य की जगह का कम होते जाना मनुष्य जाति की अस्मिता के लिये सबसे भयानक संकट है। यह हमारे समय की सबसे त्रासद चिन्ता है, जिसकी तरफ हमारा ध्यान नहीं है। अपने समय के जीवन से साहित्य के बाहर होते जाने के विषय में जब भी बात होती है, उसकी सारी जिम्मेदारी हम दूसरों के मत्थे मढ़कर अपनी जवाबदेही से मुक्त हो लेते हैं। कुछ लोग प्रकाशकों को जिम्मेदार ठहराकर चिंतामुक्त हो लेते हैं। कुछ लोग पुस्तकों की खरीद की नीति को दोषपूर्ण और भ्रष्ट बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं। मगर शायद यह समूची वास्तविकता नहीं है। मुझे लगता है कि इस स्थिति के पीछे सबसे अधिक जिम्मेदार हमारे लेखक ही हैं। हमारी रचना जनजीवन में प्रतिष्ठित क्यों नहीं हो पा रही है? नहीं हो पा रही है तो इसकी सबसे अधिक जिम्मेदारी हम रचनाकारों की ही है। हम सिर्फ दूसरों को दोषी ठहराकर अपने दायित्व से छुट्टी नहीं ले सकते। हमें अपने रचनाकर्म की आन्तरिक उत्प्रेरणा और उसकी फलश्रुति की सारी अन्तर्क्रियाओं की प्रक्रिया की पूरी पड़ताल में अपने को ईमानदारी से लगाना होगा।
‘‘क्या हमारे समय का साहित्य अपने समय में जीवन में व्याप्त असुन्दर को अप्रतिष्ठित करने में कारगर हो पा रहा है?’’ हम थोड़ा भी आत्मसम्मोहन और आत्ममुग्धता से अलग होकर जवाब तलाशेंगे तो उत्तर नहीं में होगा। सारी साहित्यिक प्रतिबद्धताओं के तुमुल शोर में भी हमारे जीवन में धनबल, बाहुबल और अनीतिबल की प्रतिष्ठा दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। हर आदमी पर किसी न किसी रूप में इन सबका आतंक छाया हुआ है। जातीय संकीर्णता, नये तरह का छुआछूत, धार्मिक असहिष्णुता, पद प्रतिष्ठा का दंभ और वैयक्तिक उत्थान का ज्वर सामूहिक हित को कंपकपा रहा है। इन सबके विरूद्ध साहित्य रचना के सारे संकटों के बावजूद बाजार में साहित्य की भरमार है। हम जिसकी अप्रतिष्ठा के लिये लिख-लिखकर किताबों का ढ़ेर खड़ा किये जा रहे हैं, वह अप्रतिष्ठित क्यों नहीं हो रहा है। जरूर कहीं न कहीं कोई बात है, जिसका सामना हम नहीं करना चाहते हैं।
हमारा दावा है कि हम जन-जीवन के दुख के बारे में, उनके कष्टों और उनकी मुसीबतों के बारे में लिखते हैं। हम उनके पक्षधर हैं। हम उनके प्रवक्ता हैं। हमारी चिंताएँ हमारे समय के शोषित, पीड़ित, वंचित और दलित जीवन के दुःख की चिन्ताएँ हैं। हम जनता के उस दुःख के बारे में, कविता, कहानी, उपन्यास लिखते हैं जिसे वह भोगती है। जनता भोगती है, हम लिखते हैं। हम जो कुछ लिखते हैं जनता उसे नहीं जानती। हम जो लिखते हैं, जिसके लिये लिखते है, वह सब उसके समझ के बाहर की चीज है। साहित्य के हलके में जनपक्ष का साहित्य आम जन की समझ और उसकी भाषा की पकड़ के बाहर की चीज है। वह कुछ थोड़े से बुद्धिजीवियों के बीच बहस की चीज है। जनता का दुःख, जनता साहित्यकारों से अधिक गहराई के साथ जानती है। जनता को अपने दुःख से परिचय और उसकी पहचान की उतनी जरूरत नहीं है, जितनी उस दुख को सहने की शक्ति की जरूरत है। हमारा साहित्य दुख को सहने और दुख से लड़ने की शक्ति जनता को दे सकने में कहाँ सक्षम हो पा रहा है? फिर साहित्य में जनता दुख का प्रदर्शन लेकर क्या करेगी? बच्चन जी के शब्दों में – ‘‘मैं क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी’’
शायद हम वह लिख रहे हैं, जहाँ हम नहीं हैं। जहाँ हम नहीं हैं जिसमें हम शामिल नहीं हैं, वहाँ के बारे में हमारा लिखा हुआ विश्वसनीय कैसे हो सकता है? साहित्य में जीवन और जीवन में साहित्य के न हो सकने का संकट हमारे समय का सबसे बड़ा संकट है।
हमारे समकालीन साहित्य में सबसे चिन्ताजनक बात यह भी है कि हमारे जीवन में जो कुछ भी असुन्दर है, हम आधुनिक के व्यामोह में अपने यथार्थवादी होने के दर्प में, अपनी निर्भीकता को प्रदर्शित करने के गुमान में जाने-अनजाने उसके औचित्य को प्रतिष्ठित करने में अपने को धन्य मानने लगे हैं। सामूहिक जीवन के सौहार्द को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूल्य पर बलि चढ़ा देने में हम तनिक भी नहीं हिचकते। हमारे बहुत से प्रतिष्ठित कहानीकारों की कहानियाँ असुन्दर को जिस तरीके से जस्टीफाई करती है, भाषा और भंगिमा दोनों स्तरों पर उससे हमारा जीवन बोध आहत ही होता है। आन्तरिक और बाह्य जीवन-संघर्षों में जन-जीवन की साहित्य से शक्ति प्राप्त करने की हमेशा से आकांक्षा रही है। जनता के जीवन में साहित्य की भागीदारी तभी सुनिश्चित हो सकती है, जब साहित्य उसकी प्रवृत्तियों, उसके विश्वासों और उसके नैतिक बोध में उसका सहभागी होगा। साहित्य से जब जनता को अपने संघर्षों के लिये शक्ति प्राप्त होगी, तभी उसका उसके जीवन में स्थान होगा। केवल साहित्य की भाषिक पक्षधरता में जनता का उसी तरह विश्वास नहीं है जैसा कि राजनीति की स्वार्थी और छद्म पक्षधरता में नहीं है। कहीं हमारा साहित्य विचार और व्यवहार के विषम अंतराल के कारण राजनीतिक अविश्वसनीयता के करीब तो नहीं जा रहा है?
संकटग्रस्त जनजीवन को शक्ति, सम्बल और विश्वास की जरूरत है। हमारे जनतंत्र में इस वक्त जनता उसे कहा जाता है, जो सबके काम की है मगर जिसके लिये कोई का का नहीं है। न राजनीति, न साहित्य, न शिक्षा, न चिकित्सा, न न्याय। वह इन सबके होने के लिये है। इन सबके काम के लिये है। जनता का वजूद अपने लिये नहीं रह गया है। दूसरों के वजूद को बनाये और बचाये रखने के लिए बस उसका वजूद कायम रखा गया है। इस असहाय और लाचार स्थिति में जनता को नपुंसक पक्षधरता की नहीं भागीदार भूमिका की जरूरत है। हमें उस साहित्य की जरूरत है, जो हमारे जीवन में आन्तरिक शक्ति का, उल्लास का, उत्साह का, प्रेम का, विवेक का और सह अस्तित्व के औदार्य का सृजन कर सके। हम जिन प्रवृत्तियों के उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं, उनकी अप्रतिष्ठा की हमारे समय को साहित्य से उम्मीद है। सुन्दर की प्रतिष्ठा से ही साहित्य की प्राणशक्ति पलुहित हो सकेगी।

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