चंदौली। विशेष न्यायाधीश पाक्सो राजेंद्र प्रसाद ने शुक्रवार को बलात्कार के मामले की सुनवाई करते हुए दोष सिद्ध होने पर आरोपी रामअशीष यादव को 12 साल की कठोर कारावास की सजा का फैसला सुनाया। उन्होंने आरोपी पर 10 हजार रुपया जुर्माना भी लगाया। अदा न करने पर छह माह की अतिरिक्त सजा भुगतने का निर्देश दिया।
चकिया कोतवाली क्षेत्र की 16 वर्षीय पीड़िता के पिता ने प्रभारी निरीक्षक को लिखित तहरीर देते हुए आरोप था कि वह सैदूपुर में फर्नीचर की दुकान से काम कर शाम साढ़े सात बजे घर पहुंचा तो उसकी बेटी नहीं थी। कुछ देर बाद पत्नी आयी तो उससे बेटी के बारे में पूछा तो पता चला कि वह शौच करने गई है। लेकिन काफी देर बाद वह घर नहीं आयी तो उसकी खोजबीन शुरू किया। इस बीच वह रात आठ बजे के करीब घर वापस आयी तो उसने आपबीती बतायी कि शौच जाते समय गांव का ही रामअशीष यादव मुंह दबाकर ले गया और जबरन बलात्कार किया। पुलिस ने तहरीर के आधार पर 376आईपीसी व 3/4 पाक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया। अभियोजन की ओर से विशेष अधिवक्ता पाक्सो शमशेर बहादुर सिंह, अवधेशनारायण सिंह और रमाकांत उपाध्याय ने मुकदमें की पैरवी व तर्क प्रस्तुत किया। बताया कि पुलिस ने विवेचना कर कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल किया था। इस मामले की सुनवाई स्पेशल जज पाक्सो की अदालत में हुई। इसमें दोष सिद्ध होने पर आरोपी रामअशीष यादव को धारा 4 (1) पाक्सो एक्ट में 12 वर्ष की कठोर सजा सुनाई गई। आरोपी पर 10 हजार रुपया जुर्माना भी लगाया गया। नहीं देने पर छह माह की अतिरिक्त सजा भुगतने का आदेश दिया गया है।
चंदौली। पुलिस-प्रशासन ने अपनी चेतावनी के बाद शुक्रवार को बड़ी कार्यवाही की। श्रीराम जानकी शिव मठ मंदिर के सामने खाली सरकारी जमीन पर अवैध तरीके से पार्किंग करने वाले मोटर मालिकों ने सदर कोतवाल की चेतावनी को नजरअंदाज किया तो एसडीएम सदर अजय मिश्रा व सीओ सदर रामवीर सिंह मौके पर पहुंचे। इस दौरान पुलिस वालों ने सरकारी जमीन पर खड़े वाहनों का एक-एक कर चालान करना शुरू कर दिया, जिससे वहां मौजूद मोटरमालिकों में हड़कंप की स्थिति मच गयी। पुलिस ने कुल डेढ़ दर्जन चार चक्का वाहनों का चालान काटा।
चालान काटती कोतवाली पुलिस
इस बाबत एसडीएम सदर अजय मिश्रा ने बताया कि दुर्गा पूजा महोत्सव के मद्देनजर नगर में गश्त व भ्रमण किया जा रहा था, तभी श्रीराम जानकी मठ मंदिर के सामने सरकारी जमीन पर अवैध तरीके से गाड़ियां खड़ी मिली। इस पर सदर कोतवाली पुलिस ने चेतावनी के बाद कार्यवाही करते हुए वहां खड़े सभी वाहनों का एक-एक कर ई-चालान करना शुरू किया, जिससे वहां हड़कंप की स्थिति मच गयी। पुलिस ने आगाह किया कि यदि अगले दिन गाड़ियां खड़ी मिली तो फिर से पुलिस महकमा कार्यवाही करेगा। लिहाजा अपने-अपने वाहनों को अन्यत्र खड़ा करने का बंदोबस्त कर लें। एसडीएम ने बताया कि उक्त भूखण्ड का उपयोग सरकारी इस्तेमाल में लिया जाएगा, लिहाजा उसे खाली कराया जा रहा है। चेतावनी के बाद भी लोगों ने गंभीरता नहीं दिखाई। यदि अब मौके पर वाहन मिले तो फिर से चालान काटने के साथ मोटर मालिक के खिलाफ कानूनी कार्यवाही अमल में लायी जाएगी। बताया कि नगर में इधर-उधर वाहनों को पार्क करने से बचे। ऐसा करने पर पुलिस वाहन का चालान करने के साथ विधि सम्मन कार्यवाही करेगी। साथ ही उन्होंने सभी ने दुर्गा पूजा व दशहरा महोत्सव को सद्भाव व शांति के साथ मनाने का आह्वान किया। इस अवसर पर एसआई सहिपाल यादव, संतोष सिंह, रूप नारायण, मनीष गुप्ता, अखण्ड प्रताप सिंह आदि उपस्थित रहे।
Young Writer: देशाटन को सदियों से महत्वपूर्ण माना गया है। राजशाही व्यवस्था के दौरान राजा-महाराज अपनी प्रजा के सुख-दुख को जानने समझने और अपने साम्राज्य की सीमाओं के अंदर उनके राजाज्ञाओं के प्रभाव व दुष्प्रभाव को जानने के लिए समय-समय पर देशाटन करते थे ताकि उन्हें राजमहल के बाहर की दुनियां में क्या चल रहा है उसकी सही व सटिक जानकारी मिल सके। वर्तमान में देशाटन यानी यात्राओं को नई जगह, नए लोग, नई भाषाएं और नई सामाजिक ताने-बाने को जानने व समझने का सबसे स्रोत माना गया है। तेजी से भागती दुनिया में मन व शरीर की थकावट को दूर करनी हो तो भीड़ व कंक्रीट के जंगल से बाहर निकलकर लोग पर्वतों-पहाड़ों व पेड़ों के बीच कुछ समय के लिए जा बसते हैं। यही छोटी बसावट उनके तन-मन से थकान को निचोड़कर उसे उसमें उत्साह, उमंग व उल्लास के रंग भरता है जिससे थक चुका मन फिर से चंचल और शरीर चुस्त-दुरूस्त हो उठता है। प्रकृति की झलक और उसके औषधीय स्पर्श को चिकित्सक भी जरूरी मानते हैं।
ऐसी ही एक यात्रा हमने भी शुरू की। यात्रा थी काशी की हिस्सा रहे चंदौली से पुणे की। होश संभालने से लेकर अब तक मैंने केवल पुणे की बातें सुनी थी उसका नाम सुना था लेकिन कभी वहां जाने और उससे जानने का अवसर ही नहीं मिला। लेकिन 24 जुलाई 2022 की मध्य रात्रि को तीनों अपने यात्रा के पहले पड़ाव यानी मुगलसराय जंक्शन, जिसे अब एकात्मवाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम से देश व दुनिया जानती है। रूटीन के कामकाज के बोझ व तनाव को घर पर ही छोड़कर हम सभी मुगलसराय जंक्शन पहुंचे। वहां थोड़ी इंतजार के बाद हमारी ट्रेन प्लेटफार्म पर पहुंची और हम अपने बोगी में सवार होकर अपने-अपने सीट तक पहुंचे। मध्यरात्रि बीत चुकी थी और चौथा पहर शुरू होने वाला था। लेकिन यात्रा की उत्सुकता के कारण निंद आंखों से गायब थी। ट्रेन अपने निर्धारित समय पर धीमी गति से प्लेटफार्म को छोड़ते हुए गंतव्य के लिए रवाना होती है और इसके साथ ही हम सभी का रोचक सफर शुरू होता है।
25 जुलाई का पूरा दिन हमारा ट्रेन में कट जाता है। मसलन दिनचर्या के सभी कामकाज हमें ट्रेन में निपटाने पड़े। सुबह उठे तो ट्रेन मध्य प्रदेश की सीमा में थी। रास्ते में पड़ने वाले स्टेशन पर हम सभी ने सुबह की चाय चखी और कुछ हल्का नाश्ता किया। ट्रेन यात्रा के दौरान घर के खाते का स्वाद की याद आने के साथ ही घर से दूर होने का हल्का ऐहसास भी हुआ। पूरे दिन ट्रेन का पहिया चलता-रूकता रहा और उसके साथ हमारी यात्रा आगे बढ़ती गई। ट्रेन पहाड़ी इलाकों से गुजरती तो हरी-भरी प्रकृति मन को स्पर्श कर जाती। पूरा दिन ट्रेन की बर्थ पर नजारे देखते और गाने सुनते हुए बीत गया। शाम के वक्त जैसे ही अंधेरा हुआ हमारा आर्डर किया हुआ खाना हम तक पहुंचा। भूख सभी को लगी थी लिहाजा सभी ने बिना देर किए खाने के पैकेट को खोना। देखने में खाना की गुणवत्ता अच्छी लगी रही थी, लेकिन जब हमने उसे चखा तो वह भी बेदम व स्वाद रहित निकला। पेट की आग बुझानी थी लिहाजा स्वाद को भूलकर सभी ने जल्दी-जल्दी खाना खाया। इसके बाद अपनी-अपनी सीट पर लेट गए। समय बीतने के साथ ही ट्रेन हम सभी को लेकर अपने गंतव्य के करीब तेजी से पहुंच रही थी। बीच-बीच में हमारा मेजबान यानी गोविंद हमारी लोकेशन वाट्सऐप चैट के जरिए पूछता रहता। ट्रेन सुबह पांच बजते-बजते पुणे जंक्शन पहुंची और हम अन्य यात्रियों के साथ प्लेटफार्म पर उतरे और गोविंद के बताए हुए रास्ते से जंक्शन से बाहर आए।
बाहर आते ही गोविंद से हमारी मुलाकात हुई। आत्मीय मुलाकात के बाद हम सभी गाड़ी में बैठकर अपने नए पड़ाव यानी गोविंद के घर के लिए निकल पड़ते हैं। 15 मिनट की ड्राइव के बाद पिंपरी चिंचवड महानगर पालिका की सरहद में पहुंचे और घर पहुंचने से पहले हम सभी ने रुककर सुबह की चाय की चुस्की ली। चाय पीते ही ट्रेन यात्रा की थकान से थोड़ी ताजगी मिली। फिर हम सभी घर पहुंचते हैं और अपने-अपने बैग को जहां जगह मिला वहीं छोड़कर आराम करने लग जाते हैं। थोड़े विश्राम के बाद हम सभी के दिन की शुरूआत होती है। गोविंद के घर में काफी सुसज्जित और स्वच्छ था। हर चीज जगह पर और सही तरीके से रखी गयी थी। दैनिक उपयोग की सभी चीजें घर के अंदर मौजूद थी या हूं कहें कि जितनी जरूरत हो उससे कुछ ज्यादा ही। पहला दिन घर पर खाने-बनाने और बातचीत में बीत गया। दिन ढलता है और शाम होती है। जो कब रात में बदल जाती है दोस्तों से बातचीत में पता ही नहीं चल पाता। देर रात तक हम सभी एक-दूसरे से बातें करते हैं और सुबह घूमने की योजना के साथ अपने-अपने बिस्तर पर लेट जाते हैं। यात्रा की थकान और नर्म गद्दा। नींद अभी पूरी भी नहीं होती है कि गोविंद की आवाज हम सभी के गांवों में अलार्म की तरह गूंजने लगती है। सुबह के चार बज रहे होते हैं। हम सभी फुर्ती के साथ बिस्तर छोड़कर उठते हैं और खुद को बाहर जाने के लिए तैयार करते हैं। यात्रा का पहला दिन पौ फटने से पहले ही शुरू हो जाता है और इसका पूरी क्रेडिट गोविंद को जाता है जो पूरी सजगता के साथ हमें शहर से निकालकर पहाड़ों की ओर ले जाता है।
बिसापुर पहाड़ी की परिक्रमा हमारा डेस्टिनेशन होता है बिसापुर। एक सामान्य सा दिखने वाला इलाका। हम सभी हाइवे से होते हुए आधे घंटे की यात्रा के बाद बिसापुर के करीब पहुंचते हैं। रास्ते में चाय और महाराष्ट्र के ट्रेडनिशन फूड बड़ा पाव के साथ अपने दिन की शुरूआत करते हैं। आगे बढ़ने में प्रकृति का स्पर्श हम सभी को ताजगी से भर देता है। पहाड़ के नीचे गाड़ी पार्क करके जैसे ही हम बाहर निकलते हैं। ऐसा लगता है वहां चारों मौजूद धूंध और ठंडी हवाएं हमें पहाड़ों के करीब आने आमंत्रण दे रही हों। धुंध के कारण के वहां दृश्यता बेहद कम थी जिस कारण हमें कुछ भी लेकिन पेड़ों व उसकी आवरण के बीच मौजूद जीव-जंतुओं की आवाज हमारे कानों तक स्पष्ट पहुंच रही थी। इसके बाद हम सभी गोविंद के साथ पैदल ही पहाड़ की ओर निकल पड़ते हैं। 10 मिनट की पैदल गश्त के बाद हम सभी बिसापुर पहाड़ी की ट्रैकिंग प्वाइंट के पास पहुंचते हैं जहां पहले से ही कुछ लोग पहाड़ चढ़ने की तैयारी में थी। उनका ग्रुप बड़ा था और वे आपस में एक-दूसरे को हंसने-हंसाने मशगूल थे। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे ही प्रकृति सौन्दर्य के बीच जीवन अपने आप में रंग भरकर उसे निखार रही हो। उत्साह से भरपूर हम चार चढ़ाई के लिए चट्टान की ओर आगे बढ़ते हैं। पेड़ों के बीच आते ही हम सभी को घनघोर जंगल जैसा माहौल मिलता है। हम एक-दूसरे से बातें करते हुए मोबाइल से फोटो व वीडियो बनाते हुए आगे बढ़ते हैं। इस बीच पेड़ों पर उझल-कूद मचा रहे बंदर हमें यह एहसास दिला रहे थे वहां हम अकेले नहीं है। कोई है जो हमारी गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है। इसके साथ ही एक ओर चीज थी जो हमें निगरानी में रखें हुए थी और वो था हम सभी का मोबाइल। पहाड़ चढ़े नहीं कि फोटो व वीडियो बनाने का सिलसिला शुरू हो गया। गोविंद अपने स्वभाव के अनुरूप बेहद सादगी के साथ बिसापुर की फिजाओं को इंज्वाय कर रहा था वहीं अशफाक अपने वाट्सऐप, फेसबुक व इंस्टाग्राम के लिए अच्छे फ्रेम की फोटो व वीडियो तलाश रहा था उसकी इस तलाश में पहाड़ की चढ़ाई कई बार रुकती, जिससे सभी को थोड़े समय के लिए अपनी-अपनी शारीरिक थकावट को दूर करने का मौका मिल जाता है।
पहाड़ की चढ़ाई में मैं पीठ पर बैग लिए सूरवीर की तरह तेजी से आगे बढ़ रहा था। इस बात की परवाह किए गए बगैर कि मेरा शारीरिक बनावट और दिनचर्या पहाड़ चढ़ना नहीं, बल्कि कम्प्यूटर के सामने बैठकर दिन भर दिमागी दंगल करना है। लेकिन मेरे दोस्त इस बात से भली भांति वाकिफ थे। उनके द्वारा मुझे बार-बार हिदायत दी जाती रही कि धीरे चढ़ो, नहीं तो थक जाओगे। लेकिन प्रकृति से मुलाकात की बेसब्री इस कदर थी कि तेजी से मैं आगे बढ़ता गया। चढ़ाई अब चंद कदमों की थी हम सभी अकेले ही पहाड़ पर चढ़े जा रहे थे। हालांकि पीछे से लोगों का कई जत्था आ रहा था, जिनके होने की आहत स्वच्छ व साफ वातावरण में स्पष्ट सुनी जा सकती थी। तेजी से चढ़ाई करने के कारण थकान से मेरे शरीर को अपने चपेट में ले लिया। सभी नीचे और मुझसे पीछे थे। इसलिए पत्थर वहीं बैठकर उनके आने का इंतजार करने लगा, ताकि आगे की चढ़ाई उनके साथ पूरी की जा सके। लेकिन जब वे पास आए तो मैं पूरी तरह से बदहाल हो चुका था। मेरी चेतना धीरे-धीरे शून्य होने लगी और जैसे ही दोस्त पास आए पूरा बदन ढीला पड़ गया। कुछ मिनटों के लिए वहां क्या हुआ मुझे पता ही नहीं चला। लेकिन जैसे ही मेरी आंख खुली सभी चिंतित व परेशान हाल मिले। थोड़ी देर वहीं रुकने के बाद हम सभी नई ताजगी के साथ आगे बढ़े और चंद मिनटों में बिसापुर की पहाड़ी पर पहुंच गए। वहां पहुंचते थे आसपास का जो नजारा था वह किसी जन्नत से कम नहीं था।
ठंडी हवाओं ने हमारी नशों व शरीर में नई जान फूंक दी और हम सभी भूल गए कि पहाड़ चढ़ते समय रास्ते में कुछ हुआ भी था। फिर हमने अपने साथी या यूं कहें सारथी गोविंद की अगुवाई में पहाड़ के परिक्रमा करने की योजना बनाई, ताकि बिसापुर की वादियों को हम सभी अच्छे से देख व निहार सके उसे अपनी स्मृतियों में कैद कर सके। ताकि जब भी उदासी हमारे मन-मस्तिष्क को अंधेरे में खींचने का प्रयास करे उसे इन यादों की रौशनी से रौशन किया जा सके। हम चलते गए और एक से बढ़ एक अद्भुत नजारे हमारे आंखों के सामने से गुजरते गए। ऐसा लग रहा था कि हम चलते रहें और यह यात्रा यूं ही आगे बढ़ती जाए। लेकिन कुछ ही मिनटों में भगवान भास्कर भी अपनी मौजूदगी का ऐहसास हमें कराते हैं। तब प्रतीत होता है कि अब पहाड़ों से नीचे उतरने का वक्त हो गया है, लेकिन हमारा अभी भी अदृश्य और काफी दूर था, जिसे जैसे-तैसे हम सभी ने पूरा किया और वहां पहुंचे जहां से हमने परिक्रमा पूरी की थी। दिन चढ़ आया था और हम सभी कुछ स्पष्ट दिख रहा था लोगों की आमद भी भारी मात्रा में पहाड़ पर हो चुकी थी। हम संभल कर पत्थरों पर अपने पैर जमाते हुए पूरी सावधानी से नीचे उतरते हैं और गाड़ी में सवार होकर घर के लिए निकल पड़ते हैं। घर पहुंचने के बाद सभी आराम फरमाने लगते हैं। शाम को फिर से हम सभी शहर की चकाचौंध देखने के लिए निकल पड़ते हैं।
मेरे लिए पूरे नई जगह थी इसलिए वहां मौजूद एक-एक इलाके जानने की उत्सुकता हमेशा मन में बनी रहती थी। ऊंची-ऊंची बिल्डिंगे मानों पुणे के विकास में लिखी गई इबारत के साथ एक दस्तख्त के रूप में मौजूद हो। शहर बड़ा था, लेकिन वहां साफ-सफाई व आम लोगों का जीवन काफी अनुशासित था। अधिकांश आबादी वहां नौकरीपेशा थी और शनिवार को विकेंड होने के कारण होटल, रेस्टूरेंट में खाने व खिलाने वालों का तांता जगह-जगह लगा था। हम भी खाने पहुंचते मिसेल पाव। यह भी पाव था लेकिन कुछ अलग तरह था। जिसे खाने का अंदाज भी अलग था और वहां रेस्टूरेंट में खिलाने का अंदाज भी काफी अलग था। यानी आपके पेट में जितनी जगह है मिसेल पाव से भर लीजिए उसका कोई अतिरिक्त पैसा नहीं लगने वाला है। हम पांच थे और उसमें मैं ही एक ऐसा शख्स था जिसने पहले कभी मिसेल पाव नहीं खाया था। गोविंद और उसका लोकल फ्रेंड राजीव इस खाने के स्वाद से बखूबी वाकिफ थे। हम सभी खाना शुरू करते हैं और जल्दी ही मेरे साथ इरफान और अशफाक की पेट पूजा पूरी हो जाती है। लेकिन गोविंद और राजीव पूरे इत्मीनान के साथ मिसेल पाव को इंज्वाय करते हैं। इसके बाद हम सभी लोग शहर में ही थोड़ी पैदल यात्रा करते हैं और वापस अपनी गाड़ी के पास पहुंचते हैं। अगले दिन मुलसी की पहाड़ियों पर जाने की योजना बनती है और एक बार फिर देर रात तक बातचीत का दौर आपस में चलता रहता है।
मुलशी की सुंदरता में मिली सुकून व शांति सुबह फिर से गोविंद की पुकार पर सभी उठते हैं और मुलशी की पहाड़ियों को निकल पड़ते हैं। यात्रा की शुरूआत चाय से ही होती है। हम सभी जैसे ही शहर को पीछे छोड़कर आगे निकलते हैं। पहाड़ों पर बसी आबादी और टिमटिमाती रौशनी को सुबह होने से पहले देखना भी अपने आप में एक अलग रोमांच पैसा करता है। यात्रा के दौरान ही रात का अंधेरा धीरे-धीरे छट जाता है और सुबह होते-होते हम सभी ऐसी जगह होते हैं जहां प्रकृति खुद का श्रृंगार करके अपनी सुंदरता से हम सभी को रिझा रही थी। पहाड़ों व पेड़ों से धुंध ऐसे लिपटी थी जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेयशी के बाहों में लिपटा पड़ा हो। रविवार होने के कारण लोग भागदौड़ भरे जीवन को पीछे छोड़कर पहाड़ों पर काफी आगे निकल चुके थे। हर कोई संडे की सुबह को अपने अंदाज में अपने तरीके से इंज्वाय कर रहा था। हम सभी अपने तरीके से मस्ती कुंड में पूरी तरह से डूबोए पड़े थे।
मुलशी के शुरूआती प्वाइंट पर रुकने के बाद हम सभी धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। जैसे-जैसे हमारी गाड़ी आगे बढ़ती है पहाड़ों के विहंगम दृश्य को देखकर हम सभी यह तय नहीं कर पा रहे थे कि जिस दृश्य को देख और किसी ना देखें। वहां कण-कण में सुकून था। हर मोड़ में एक नया दृश्य हमारे आंखों के सामने आ जाता, जो हमें अचरज में डाल देता। जिसे देखकर हम सभी यह सोचने पर विवश थे कि काश हमारा हर दिन ऐसे ही शुरू हो जैसा कि आज है। यह आज कभी बीते हुए कल में ना बदले। लेकिन समय का चक्र कहां किसी के लिए रुका है जो आज हमारे लिए रुकता है। ऐसे में हम भी जगह-जगह रुकते गए हंसते और एक-दूसरे को हंसाने के साथ ही प्रकृति को स्पर्श को महसूस करते हुए उसे अपने-अपने मोबाइल में कैद करते हुए आगे बढ़े। लम्बी दूरी चलने के बाद हमने पहाड़ों पर रुकने का फैसला किया। हम जहां रुके वहां से नीचे का दृश्य साफ दिख रहा था। पहाड़ों के बीच एक बड़ा औद्योगिक शहर झीलनुमा नदी किनारे बसा था जो दूर से बेहद शांत और सुंदर नजर आ रहा था। वहां भी कुछ सेल्फी, फोटो व वीडियो बनाने के बाद हमारी गाड़ी मुड़ती है और हम फिर से लौटने लगते हैं अपनी यात्रा को पीछे छोड़कर कुछ दूर चलने के बाद हम एक ढाबे पर रुकते जहां चाय के साथ बड़ा पाव खाने को मिलता है। थोड़े पड़ाव के बाद हम फिर से वापसी की राह पर निकल पड़ते हैं। हम भले ही वापस लौट रहे थे लेकिन हमारा मन अभी भी उन पहाड़ों में ठहरा हुआ था। वहां का दृश्य भुलाए नहीं भुल रहा था। मुलसी की पहाड़ियों को देखकर लगा कि जन्नत कहीं है तो वह है प्रकृति की गोद में। जहां प्रकृति, पेड़ व पहाड़ है असली जीवन वहीं है हम तो बस कंक्रीट के जंगल में आधुनिक वनवास काट रहे हैं जो बेमतलब है। हमारी अंधाधूंध भागदौड़ चंद पैसों के लिए है जो दैनिक जरूरतें तो पूरी करती है, लेकिन सुकून नहीं देती।
दो दिनों तक लगातार पहाड़ों पर चढ़ने व चलने से हमारा शरीर काफी थक चुका था और हम ऐसी स्थिति में बिल्कुल नहीं थे कि अब अगले दिन कहीं जा सके। इसलिए हमने अगले दिन ब्रेक लेने का फैसला किया और सभी लोग थकान से चूर बेफिक्र होकर सो गए और सुबह काफी समय तक बिस्तर पर ही चादरों में लिपटे रहे। पुणे का मौसम बेहद शानदार और एकरस था जहां न तो अधिक गर्मी का एहसास था और ना ही ठंड ही उतनी थी कि लोगों को उससे बचाव का कोई यतन करना पड़े। पूरा दिन हमने छुट्टी कर तरह काटा और शाम होते ही शहर के लिए निकल पड़े। कई मॉल व शापिंग सेंटर पर गए और कुछ तरह के सामान भी खरीद भी हम सभी ने की। इस दौरान स्थानीय लोगों से कभी भी बातचीत का मौका ही नहीं मिला। अब बारी थी खाने की। आज कुछ नया टेस्ट करने का मन हुआ तो गोविंद और राजीव हम लोगों को दाल-बाटी खिलाने के लिए ले गए। बाटी हमारे लिए कोई नई चीज नहीं थी। हम अक्सर रही बाटी-चोखा, बाटी-मुर्गा और बाटी-बकरा का स्वाद चखते रहते थे। लेकिन शहरवासियों के बाटी यूनिक फूड था और उसे दाल के साथ चखना और भी यूनिक। इसका पता उस वक्त चला जब हम सभी लोग बाटी खिलाने वाले के पास पहुंचे। जहां इतनी गाड़ियां खड़ी थी जिसे देखकर अंदाजा लग गया कि यहां की बाटी के लोग दीवाने है। हम सभी गाड़ी पार्क कर रहे थे तभी राजीव भागकर गया और रजिस्टर में नाम दर्ज कराकर लौटा। पूछने पर बताया यहां खाने के लिए नंबर लगता है। नाम पुकारा जाता है तब जाकर सीट मिलती है और सीट मिलेगी, तभी खाने को भी मिलेगा। करीब 40 मिनट के बाद हमारा भी नंबर आता है और हम सभी अपनी-अपनी सीट तक पहुंचते हैं और बाटी के साथ दाल परोसा जाता है। पहला निवाला खाते ही यह महसूस हो जाता है कि आखिर यह जगह इतनी मसहूर क्यों है। कुछ तो बात थी कि वहां की बाटी और दाल में।
सिंहगढ़ः जहां मिलते हैं प्रकृति और इंसान अगला दिन हमारी यात्रा का अंतिम दिन होता है और सभी लोग सिंहगढ़ पहाड़ चलने की योजना बनाते हैं। फिर से सुबह हमारी यात्रा वैसे ही शुरू होती है जैसे पिछले दो दिनों में हुई थी। हमसभी करीब एक घंटे की यात्रा के बाद रास्ते में रुकते हुए सिंहगढ़ की पहाड़ियों पर पहुंचते है। यहां भी पहाड़ों को धुंध अपनी आगोश में लिए हुए थी। हम सभी ऊपर पहुंचने के बाद वहां पार्किंग में अपनी गाड़ी खड़ा करके जैसे ही बाहर निकलते हैं वहां की आबोहवा हमें तरोताजा कर देती है। ऐसा लग रहा था मानो पहाड़ों पर हवाएं नहीं, बल्कि अमृत बह रही है जो भी उसका पान कर ले वह अमर हो जाए। पहाड़ों की चाय को चखने के बाद हम सभी ऊपर मौजूद सिंहगढ़ किले के अवशेष व वहां मौजूद प्राकृतिक सौंदर्य अपनी यादों में समेटने के लिए निकल पड़े। कुछ सीढ़ियां चढ़ने के बाद हमें सिंहगढ़ किले का द्वार दिखता है जो आज भी उसी मजबूती के साथ तटस्थ जैसा वह राजा-महाराज के दौर में हुआ करता था। सिंहगढ़ किले की अपनी कहानी है, जिसे हर किसी को पढ़नी व जाननी चाहिए। हम चलते और चढ़ते हुए किले के ऊरूज पर पहुंचते हैं जहां ठंडी हवाएं पूरे दम से पेड़ों की पत्तियों व टहनियों को झंकझोर रही थी। वहां में नमी और बूदों का मिश्रण हमारे चेहरों व आंखों को ठंडक पहुंचाने के साथ ही हमारे मन-मस्तिष्क को भी शीतलता प्रदान कर रहा था।
हम सभी ने फिर से किले के एक छोर से चहलकदमी शुरू की। आवागमन में सुविधा व सहूलियत के लिए महाराष्ट्र सरकार के पर्यटन विभाग की ओर से पैदल चलने वाले रास्तों का निर्माण पूरे किले में कराया गया था और भी बहुत कुछ था जो वहां बन चुका था या फिर बनने की प्रक्रिया में था। वहां दूरदर्शन केंद्र के साथ-साथ मोबाइल टावर तक स्थापित थे ताकि कम्युनिकेशन में कोई बाधा न आए। साथ ही पर्यटकों को रिझाने के लिए रिसार्ट आदि की भी सुविधाएं स्थापित नजर आ रही थी। लेकिन इस सब चीखों को दरकिनार कर हम पहाड़ी के कोनों पर प्राकतिक से मिलने को व्याकुल और आकुल नजर आ रहे थे, यहां भी हमारे साथियों के कैमरे का फ्लैस खूब चमक रहा था। किले के कोन-कोने को जानने व समझने के लिए जगह-जगह दिशा-सूचक बोर्ड के साथ ही सूचना पट्टिकाएं स्थापित की गयी थी, जहां वहां मौजूद हर छोटी-बड़ी चीज के ऐतिहासिक व प्राचीनता का प्रतीक थी। हम घुमते टहलने, हंसते हंसाते किले का चक्रमण करते हुए आगे बढ़ते रहे। बीच में रुके तो वहां किले के अंदर ही महिलाएं अपनी आजीविका के लिए प्याज के पकौड़े और चाय की दुकान लगाए हुए मिली। वहां मौजूद दरवाजे से मैं नीचे तक गया और कुछ दूर चलने के बाद वह रास्ता पेड़ों के बीच खो गया। हम सभी वहां रुके कुछ फोटो खींची और चाय के साथ पकौड़े को चखा। वापसी के वक्त मौसम साफ हुआ तो आसपास की पहाड़ियां भी नजर आने लगी। लेकिन वहां पल-पल मौसम बदलता रहता। कभी धुंधा छट जाती तो कभी घनघोन धुंध किले को अपनी आगोश में ले लेती। वापसी के समय किले में लोगों की चहल-पहल अच्छी खासी हो गयी और वहां कई दुकानें भी खाने-पीने की खुली हुई नजर आयी, जो स्थायी रूप से पहाड़ों पर ही रहते हैं और पर्यटकों की मेजबानी करके अपनी आजीविका चलाते हैं।
वहां से लौटने के बाद हम सभी घर वापसी की तैयारी में जुट गए। सामान को बैग में फिर से समेटने का वक्त आया था। हम वो सबकुछ पीछे छोड़े जा रहे थे जो हमारे जेहन को सुकून पहुंचा रही थी। लेकिन यह यात्रा भी कभी न कभी खत्म होती ही। जैसे एक दिन हम सभी की जीवन यात्रा खत्म हो जाएगी और हम न चाहते हुए हम सबकुछ यहीं पीछे छोड़ जाएंगे। अपने घर-परिवार, चाहने वाले यार-दोस्त और भी बहुत कुछ जिन्हें पाने के लिए हम सभी आज अपना जीवन खपा रहे हैं। कुछ पाने की लालसा में अपनों से दूर होकर जीवन के कीमती वक्त को यूं ही जाया कर रहे हैं। शाम को एक बार फिर और हम शहर घुमने निकले और रात को वहां की एक मशहूर रेस्टोरेन्ट पहुंचे, जो बेहतरीन बिरयानी खिलाने के लिए जाना जाता है। बिरयानी खाने की योजना पहले से थी तो वही आर्डर किया गया। जैसे ही हमने उसके निवाले को चखा, लगा कि खाने में टेस्ट है जो उस रेस्टूरेंट को बेस्ट बनाता है। अगली सुबह हम सभी जाने की तैयारियों में लगे रहे। देखते ही देखते शाम हुई और हम सभी फिर से उसी पुणे स्टेशन के लिए रवाना हुए जहां से हम सभी का यह शानदार सफर शुरू हुआ था। ट्रैफिक जाम में फंसते-फंसाते हम स्टेशन तक पहुंचे और अब गोविंद व इरफान ने हमें और अशफाक को गले मिलकर विदा किया। वापसी में हम दो ही लौटे। गोविंद अपने जिंदगी में फिर से व्यस्त हो गया। 28 घंटे की यात्रा के बाद हम और अशफाक मुगलसराय जंक्शन पहुंचे और फिर आटो से अपने-अपने घर हो लिए। इसके बाद जिंदगी फिर से उसी पटरी पर लौट आयी।
पुणे की यात्रा बेहर शानदार रही। इसे गोविंद के साथ ने और भी शानदार बनाया। इरफान व अशफाक का बाहर घुमने के पुराने अनुभव ने इस यात्रा में रंग भरने का काम किया। ऐसी यात्राएं इंसान को बहुत कुछ सिखाती है। हम सभी ने भी इस यात्रा को इंज्वाय करने के साथ बहुत कुछ सीखा। मेरी नजर में वहां के लोगों का जीवन शांत, संतुलित व अनुशासित नजर आया। वहां कर कोई काम करके खुश नजर आ रहा था। शहर हो या गांव वहां की महिलाएं कामकाजू थी और छोटे-मोटे व्यवसाय करके अपने आप को सशक्त व स्वावलम्बी बना रखा था। यही वजह थी कि उनके अंदर खुद का आत्मबल काफी मजबूत नजर आ रहा था। दोस्तों के साथ यह मेरे जीवन की पहली और शानदार यात्रा रही, मुझे हमेशा याद रहेगी।
शहाबगंज। थाना क्षेत्र के कस्बा में गुरुवार की रात पनीर खाने से एक ही परिवार के तीन बच्चों की हालत बिगड़ गयी। घटना से पूरे परिवार में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में परिजनों ने तत्काल चारो को निजी चिकित्सालय में भर्ती कराया जहा उसका सभी का उपचार चल रहा है। बताते हैं कि कस्बा निवासी बबलू साहनी घर पर खाना बनाने के लिए बाजार के एक दुकान से पनीर व सफल मटर खरीद कर घर गए। बबलू की पत्नी पानपत्ती ने पनीर की सब्जी बना कर अपने तीनो बच्चों को खिला दिया।
खाना खाने के बाद कुछ देर बाद ही उसके तीनो बच्चों की हालत बिगड़ने लगी घटना से पूरे परिजनों में हड़कंप मच गया। कुछ समझ मे नही आने पर पानपत्ती ने खाने को चखा तो उसकी भी तबियत बिगड़ने लगी पिता ने तत्काल अपने बच्चे विशाल 12 वर्ष प्रतिमा 10 वर्ष कुमकुम 16 वर्ष पत्नी पानपत्ती 40 वर्ष को निजी चिकित्सालय में भर्ती कराया जहा उनका इलाज़ चल रहा है। घटना को लेकर लोगो मे तरह -तरह की चर्चाएं व्याप्त है। वही सूचना पाकर मौके पर पहुची पुलिस परिजनों में बात कर जांच पड़ताल में जुट गई।
चंदौली। सदर पीएचसी पर गुरुवार को सेवा पखवाड़ा के तहत कोविड टीकाकरण शिविर का आयोजन किया गया। इसका शुभारम्भ मुख्य अतिथि विधायक रमेश जायसवाल व ब्लाक प्रमुख संजय सिंह बबलू ने फीता काटकर किया। वहीं सदर पीएचसी समेत संचालित उपकेंद्रों के कुल 19 गांवों में 3420 लोगों को बुस्टर डोज लगाया गया। सदर पीएचसी पर कुल 840 लोगों को बुस्टर डोज लगाया गया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि विधायक रमेश जायसवाल ने कहा कि केंद्र व प्रदेश सरकार कोरोना संक्रमण से बचाव और रोकथाम को लेकर हर स्तर से प्रयासरत रही। अस्पतालों में आक्सीजन प्लांट सहित अन्य उपकरणों से लैस किया गया। वहीं लोगों को तेजी के साथ कोविड वैक्सीन लगाने का काम किया गया। यही कारण है कि आज टीकाकरण लगाने के मामले में देश सबसे अगली पंक्ति में खड़ा है। आज सेवा पखवाड़ा के तहत वैक्सीन का दो टीका लगवाने वाले लाभार्थियों को बूस्टर डोज लगाने का काम किया जा रहा है। वहीं ब्लाक प्रमुख संजय सिंह बबलू ने कहा कि गरीबों के स्वास्थ्य सुविधा को लेकर प्रदेश सरकार गंभीर है। सरकार ने तमाम स्वास्थ्य संबंधित योजनाएं चला रखी है। स्वास्थ्य केंद्रों पर मेला आयोजित कर गरीबों को स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराया जा रहा है। इसका लाभ गरीबों को मिल रहा है। इस अवसर पर एडीशनल सीएमओ सीपी सिंह, पीएचसी प्रभारी गुरुचरण, स्वास्थ्य शिक्षाधिकारी जेपी सिंह, बीपीएम प्रवीण कुमार, अमित सहित भाजपा जिला महामंत्री जितेंद्र पांडेय, आशुतोष सिंह, बिंदू जायसवाल सहित अन्य मौजूद रहे।
चंदौली। सदर कोतवाली क्षेत्र के जामडीह गांव राजभर बस्ती में गुरूवार को बलवंत राजभर के घर खाना बनाते समय अचानक गैस सिलेंडर के पाइप में लीकेज होने के कारण आग लग गया। अगलगी की इस घटना में पांच लोग गंभीर रूप से झुलस गए। आनन-फानन में परिजन निजी साधन से सकलडीहा सीएचसी लेकर पहुंचे। हालत गंभीर होने पर डाक्टरों ने प्राथमिक उपचार के बाद जिला अस्पताल भेज दिया। घटना को लेकर गांव में खलबली मची है।
जामडीह गांव के बलवंत राजभर की बेटी गीता की सगाई कार्यक्रम था। ओड़वली गांव से वर पक्ष के लोग आने वाले थे। जिसे लेकर हलुवाई द्वारा घर के आंगन में खाना बनाया जा रहा था। इसी बीच हलुवाई पानी लेने के लिये बाहर गया हुआ था। अचानक गैस सिलेंडर में पाइप लीकेज के कारण धू धूंकर सिलेडर जलने लगा। आसपास खड़े लोग आग बूझाने के प्रयास जुट गये। लेकिन आग की लपट तेज होने के कारण कारण 45 वर्षीय बलवंत राजभर, 38 वर्षीय पत्नी नीलम राजभर और 18 वर्षीय आशीष राजभर, 16 वर्षीय रूपेश राजभर और 26 वर्षीय धर्मेन्द्र गंभीर रूप से झुलस गये। आनन-फानन में परिजन सकलडीहा सीएचसी लेकर पहुंचे। जहां सीएचसी अधीक्षक डा. संजय यादव ने प्राथमिक उपचार के बाद जिला अस्पताल भेज दिया। इस बाबत सीएचसी अधीक्षक डा. संजय यादव ने बताया कि जले हुए लोग खतरे से बाहर है।
चंदौली पुरानी बाजार में पुलिस फोर्स के साथ गश्त करते कोतवाल संतोष्सि कुमार सिंह।
Young Writer, चंदौली। श्रीराम जानकी शिव मठ मंदिर के सामने सरकारी जमीन को पार्किंग बनाए कतिपय लोगों के खिलाफ चंदौली पुलिस एक्शन मोड में दिखी। कोतवाल संतोष कुमार सिंह ने पैदल गश्त के दौरान चांदनी मार्केट में खाली पड़ी जमीन पर खड़ी गाड़ियों के मालिकों को आगाह किया। चेताया कि शुक्रवार से गाड़ियों की पार्किंग ना करें, अन्यथा पुलिस कड़ी कार्यवाही करेगी। अब दोबारा किसी को हिदायत नहीं दी जाएगी।
उन्होंने बताया कि श्रीराम जानकी मठ मंदिर के सामने सरकारी जमीन को लोग गलत तरीके से पार्किंग के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। यह पूरी तरह से गलत है। जिन लोगों की गाड़ियां खड़ा होती है वह अपने वाहनों की पार्किंग के लिए अन्यत्र जगह तलाश लें। पुलिस भ्रमण व जांच के दौरान यदि किसी भी व्यक्ति की गाड़ी उक्त सरकारी स्थल पर खड़ी मिली तो चालान करने के साथ ही मालिक के विरूद्ध कड़ी कार्यवाही की जाएगी। उन्होंने बताया कि चांदनी मार्केट से लगायत शंकर मोड़ तक पुरानी बाजार के अंदर लोगों ने जगह-जगह अपने मकानों के सामने रास्ते को पार्किंग बना रखा है, जिससे आवागमन में अवरोध उत्पन्न होता है। कई लोगों द्वारा एंबुलेंस आदि वाहनों के आने-जाने में दिक्कत होने की शिकायत दर्ज कराई गयी है। ऐसे लोग भी अपने वाहनों के पार्किंग की व्यवस्था सड़क से हटाकर कहीं अन्य स्थान पर कर लें, अन्यथा पुलिसिया कार्यवाही कभी भी उनके खिलाफ हो सकती है। रास्तों व सार्वजनिक स्थलों पर अवैध पार्किंग से जाम की समस्या उत्पन्न हो रही है, जिसकी लगातार शिकायतें मिल रही हैं।
धानापुर पठान टोली में रास्ते पर जमा नाबदान के पानी से होकर गुजरता साइकिल सवार।
पैदल, साइकिल व बाइक चालकों को आवागमन में हो रही दिक्कत
Young Writer, धानापुर। शहीदी धरती धानापुर लम्बे समय से गंदगी व जलजमाव की चपेट में है। कस्बा स्थित पठान टोली के जाने वाला रास्ता जल निकासी का समुचित प्रबंध नहीं होने के कारण नाले में तब्दिल हो गया है। स्थानीय लोग आने-जाने में हो रही दिक्कत, दुर्गंध व अन्य दैनिक दुश्वासियों को देखते हुए जिम्मेदार अफसरों व जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई। लेकिन समस्या के प्रति किसी ने भी गंभीरता नहीं दिखाई। धानापुर पठान टोली से होकर गुजरे मुख्य मार्ग पर लम्बे समय से नाबदान का पानी बह रहा है, जिससे अक्सर लोग साइकिल सवार व पैदल राहगीर गिरकर चोटिल होते रहते हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत महिलाओं व स्कूली बच्चों के साथ ही वृद्धजनों को होती है। इसके अतिरिक्त नमाजियों को भी उसी गंदे पानी भरे रास्ते से गुजरना पड़ता है। क्योंकि मस्जिद तक जाने का कोई और रास्ता नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जल निकासी का समुचित प्रबंध कर दिया जाए तो इस समस्या से काफी निजात मिल जाएगी। निरंतर जलजमाव होने से अब रास्ता भी क्षतिग्रस्त हो गया है, जो अब आवागमन योग्य नहीं रहा। यदि जल्द समस्या का समाधान नहीं किया गया तो पठान टोली के साथ ही आसपास के लोगों और दिक्कत होगी। प्रधान रामजी कुशवाहा का कहना है कि उक्त समस्या के समाधान के लिए मशीन से सफाई कराई गई थी, लेकिन समस्या हल नहीं हुई। इसका प्रस्ताव भेजा गया है स्वीकृति मिलते ही नाली व सड़क दोनों का निर्माण करा दिया जाएगा।
Young Writer, कमालपुर। जिला पंचायत सदस्य अंजनी सिंह ने विधायक सुशील सिंह का ध्यान आकृष्ट कराते हुवे मांग किया कि क्षेत्र के नौरंगाबाद से अकबालपुर तक सड़क कि स्थिती काफी जर्जर हो चुकी है जिसपर आए दिन राहगीर गिर कर घायल हो जा रहे हैं। कवई पहाड़पुर, अकबालपुर, हेतमपुर, करजौरा, मिर्जापुर जीयनपुर सहित अन्य कई गांवों के क्षेत्रीय ग्रामीण इस रास्ते प्रतिदिन आवागमन करते हैं जिससे महिलाओं बुजुर्गों युवाओं सभी का इस रास्ते आवागमन करना काफी मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा कि जनहित को ध्यान में रखते हुए विधायक शासन से धन अवमुक्त कराकर सम्बंधित विभाग के जरिए तत्काल सड़क निर्माण कराने का कार्य करें, ताकी क्षेत्रीय जनता को राहत मिल सके। साथ ही ग्रामीणों को आवागमन में सुगमता हो सके। मांग किया कि धानापुर नौरंगाबाद मार्ग में धानापुर से अकबालपुर तक सात किलोमीटर सड़क प्रधानमंत्री सड़क योजना अंतर्गत निर्मित हुई है जिसमें शेष बचा हुआ अकबालपुर से नौरंगाबाद तक लगभग दो किलोमीटर मार्ग को भी प्रधानमंत्री सड़क योजना अंतर्गत स्वीकृति दिलाने का कार्य करें, ताकी सड़क की गुणवत्ता बढ़ सके और क्षेत्रीय जनता के हित में बेहतर विकास कार्य हो सके।
चंदौली कलेक्ट्रेट में पर्यटन को लेकर अफसरों के साथ बैठक करती डीएम।
जनपद में टूरिज्म के विकास को लेकर गंभीर दिखीं जिलाधिकारी
Young Writer, चंदौली। जिलाधिकारी ईशा दुहन की अध्यक्षता में जिला पर्यटन एवं संस्कृति परिषद की बैठक कलेक्ट्रेट सभागार में बुधवार को हुई। बैठक में अनुपस्थित रहने पर यूपी आरएनएन के प्रोजेक्ट मैनेजर को स्पष्टीकरण जारी करने के निर्देश दिए। कहा कि जनपद में टूरिज्म विकास पर विशेष फोकस रहेगा इससे आर्थिक प्रगति के साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार भी उपलब्ध होगा।
जिलाधिकारी ने कहा कि जिले में पर्यटन की संभावनाओं को देखते हुए उसी के अनुरूप पर्यटन विभाग कार्ययोजना बनाये, ताकि सरकार को भेजा जा सके। उन कार्ययोजनाओं को सरकार से मंजूरी मिलने के बाद जिले को पर्यटन के दृष्टिकोण से विकसित किया जाएगा, जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिल सके। जिलाधिकारी ने जिला विद्यालय निरीक्षक एवं जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को निर्देशित किया है कि छात्र-छात्राओं को पर्यटन एवं सांस्कृतिक विकास एवं संरक्षण के सम्बन्ध में जागरूक करने के लिए शैक्षिक भ्रमण कार्यक्रम तैयार कराया जाए। उसकी सूची पर्यटन विभाग को उपलब्ध कराते हुए बच्चों को भ्रमण कराने हेतु कार्यक्रम भी आयोजित किये जाएं, ताकि जिले के छात्र-छात्राओं को जिले में स्थित ऐतिहासिक एवं पौराणिक,प्राकृतिक पर्यटन स्थलों के बारे में जानकारी मिल सके। उन्होंने राजदरी-देवदरी में अधूरे कार्यों को जिलाधिकारी ने सीएनडीएस कार्यदाई संस्था को निर्देशित करते हुए एक सप्ताह में प्रत्येक दशा में कार्य को गुणवत्तापूर्ण ढंग से पूर्ण कराया जाए। इको टूरिज्म के अंतर्गत वन विभाग द्वारा प्रस्तावित राजदरी में ग्लास स्काई ब्रिज स्थापना की कार्यवाही में तेजी लाने के निर्देश दिए। साथ ही नेचर ट्रेल, पर्यटकों के खाने-पीने के लिए दुकानें, सांस्कृतिक बेहतर गतिविधियां आदि का प्लान किए जाने के निर्देश दिए। जनपद में प्रमुख स्थानों पर स्ट्रीट लाइट का प्रपोजल बनाकर प्रस्तुत करने के निर्देश जिलाधिकारी ने संबंधित विभाग के अधिकारियों को दिए। जनपद की झीलों व तालाबों में वाटर स्पोर्ट, वोटिंग आदि के प्रपोजल बनाए जाए। जनपद में टूरिस्ट सर्किट बनाने हेतु जिलाधिकारी ने निर्देशित किया। कहा कि औरवांटाड, छानपातरदरी आदि का पर्यटन विकास एवं अन्य सभी प्रस्तावों पर बेहतर रणनीति बनाकर प्रपोजल तैयार करने के निर्देश दिए। कहा कि सभी प्रस्ताव को शासन को भी प्रेषित किया जाए।जनप्रतिनिधि गण जनपद में ऐसे स्थलों को चिन्हित करें जो पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है उस सभी पर्यटन की दृष्टि से उनको विकसित किया जाएगा। इस अवसर पर मुख्य विकास अधिकारी अजीतेंद्र नारायण उपस्थित रहे। बैठक का संचालन पर्यटन सूचना अधिकारी नितिन द्विवेदी ने किया।