Young Writer, इलिया। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र इलिया पर चिकित्सकीय सेवाएं बेपटरी है, जिस कारण स्थानीय लोगों को दवा-ईलाज के लिए घंटों इंतजार करने के साथ ही तमाम तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। शिकायत के बाद अस्पताल की सुविधाएं दुरूस्त नहीं हो पा रही है। ानी अबादी वाले इलाकों में बने स्वास्थ्य केंद्रों पर शुक्रवार को भी लोगों को प्राथमिक उपचार नहीं मिल पा रहा है। विभाग की लापरवाही के चलते इलाके में झोलाछाप मरीजों की जेब पर डाका डाल रहे हैं। जबकि करोड़ों की लागत से तैयार केंद्रों में बुनियादी सुविधाएं और कर्मचारियों की लापरवाही के कारण मरीजों को निजी क्लीनिक व अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है।
इलिया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात कर्मचारियों की लापरवाही देखने को मिली है, जहां अस्पताल के न तो खुलने का समय तय है और न ही चिकित्सकों के आने और जाने का। मरीज सुबह से ही चिकित्सालय परिसर में आकर डॉक्टर के आने का इंतजार करते हैं पर समय से कभी डॉक्टर अस्पताल नही आते हैं। बता दें कि सर्दी और गर्मी में पीएचसी खुलने का समय अलग-अलग है। गर्मी में पीएचसी खुलने का समय 8 बजे से 2 बजे तक है। जबकि अक्टबूर से मार्च के बीच इसका समय 10 से 4 कर दिया जाता है।
इलिया प्राथमिक अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाएं बेपटरी
गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा चंदौली कोट
पुरानी रंजिश में ताबड़तोड़ चली 10 से 15 राउंड गोली
Young Writer, चंदौली। मुख्यालय स्थित चंदौली कोट शुक्रवार को गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा। इस दौरान पुरानी रंजिश को लेकर ताबड़तोड़ गोलियां चली, जिससे आसपास के लोग दहशत में आ गए। पीड़ित पक्ष की सूचना पर सदर कोतवाली पुलिस चंदौली कोट पहुंची और घायलों को थाने ले आयी। उक्त घटना में घायल नामवर सिंह ने थाने में तहरीर देकर छह लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज करायी है। घटना की सीसीटीवी फुटेज सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है, जिसमें दो युवक असलहे से ताबड़तोड़ फायर करते दिख रहे हैं। पुलिस उक्त मामले में रिपोर्ट दर्ज कर आरोपियों की धर-पकड़ के साथ ही घायलों का दवा-ईलाज करा रही है।
पुलिस को दी गयी तहरीर के मुताबिक चंदौली कोट निवासी नामवर सिंह अपने छोटे भाई केदारनाथ सिंह के साथ घर पर बातचीत कर रहे थे, तभी शाम 03ः30 बजे पुरानी रंजिश को लेकर तुंगनाथ सिंह अपने लड़कों के साथ उनके घर में घुस आए और लाठी-डंडे से हमला कर दिया। इसी बीच उनके पुत्र अखिलेश सिंह व ज्ञानेंद्र सिंह ने टांगे से उन पर प्रहार कर किया। तभी वहां मौजूद दो युवकों ने असलहे से फायर करना शुरू कर दिया। यह देख दोनों भाई किसी तरह घर के अंदर भागकर अपनी जान बचाई। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक मौके पर करीब 10 से 15 राउंड फायर किया गया, जिससे आसपास दहशत का माहौल कायम हो गया और आसपास सड़कों पर मौजूद लोग घरों के अंदर भाग अपनी जान बचाए। अचानक हुई घटना से दहशतजदा नामवर सिंह व केदारनाथ सिंह ने पुलिस को फोन किया और जब कुछ समय बाद पुलिस जब घटनास्थल पर पहुंची तो घायल नामवर सिंह व केदारनाथ सिंह को अपनी सुरक्षा में थाने ले आयी। मारपीट की इस घटना में केदारनाथ के सिर में चोटे थीं। इस संबंध में सीओ सदर अनिल राय ने बताया कि मारपीट का मामले की तहरीर मिली है मुकदमा दर्ज कर पुलिस कार्यवाही कर रही है। जांच में यदि फायरिंग की पुष्टि होती है तो उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही की जाएगी। साथ ही असलहों के लाइसेंस निरस्तीकरण का कार्यवाही भी अमल में लायी जाएगी।
किसानों व नौजवानों का हित सपा में निहितः श्यामलाल
समाजवादी जनसंदेश यात्रा का जनपद के मुगलसराय में हुआ भव्य स्वागत
Young Writer, चंदौली। सपा के प्रदेश महासचिव श्यामलाल पाल समाजवादी जनसंदेश यात्रा लेकर शुक्रवार को चंदौली जनपद आए। इस दौरान मुगलसराय में जिले के सपाइयों ने यात्रा का नेतृत्व कर रहे श्यामलाल पाल का जोरदार स्वागत किया। साथ ही अखिलेश यादव को पुनः मुख्यमंत्री बनाने के संकल्प को दोहराया। वहीं बसपा के मुगलसराय के विधानसभा इकाई अध्यक्ष रामआसरे पाल अपने समर्थकों के साथ समाजवादी पार्टी की सदस्यता ली।
इस दौरान सपा प्रदेश महासचिव श्यामलाल पाल ने कहा कि यह सरकार किसानों, नौजवानों, गरीब-मजदूर, अतिपिछड़ों, पिछड़ों, शोषित, दलितों की दुश्मन है। 2022 में इस ज़ालिम सरकार को उखाड़ फेंकने की जरूरत है। प्रदेश में सर्वसमाज का सम्मान और हित सिर्फ समाजवादी पार्टी में ही निहित है। पूर्व विधायक जितेंद्र कुमार ने कहा कि प्रदेश के विकास व तरक्की के लिए यह जरूरी है कि समाजवादी पार्टी सत्ता में लौटे। क्योंकि दलित, अतिपिछड़ों को सपा ने ही उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व व भागीदारी देने का काम किया है। ऐसे में हम सभी को सपा प्रमुख अखिलेश यादव को पुनः मुख्यमंत्री बनाने के लिए संकल्पित होना होगा। सपा जिलाध्यक्ष सत्य नरायन राजभर ने सपा कार्यकर्ताओं को एकजुट होने का आह्वान किया। कहा कि एकजुट होकर ही विधानसभा चुनाव की चुनौती को पार पाया जा सकता है। इस दौरान पूर्वद विधायक बब्बन सिंह चौहान, परवेज अहमद, चंद्रशेखर यादव, नफीस अहमद, सुदामा यादव, अयूब खां, सुधाकर कुशवाहा, दिलीप पासवान, गार्गी पटेल, बाबूलाल यादव, चंद्रभानु यादव, योगेंद्र यादव चकरु यादव, इन्द्रेश यादव, महेंद्र पाल, डा. संजय पाल जित्तन देवी पाल आदि उपस्थित रहे।
पुरानें निर्णयों को अमल में लाए जिला प्रशासनः पेंशनर्स
Young Writer, चंदौली। कलेक्ट्रेट सभागार में शुक्रवार को पेंशनर दिवस का आयोजन किया गया। इस दौरान संयुक्त पेंशनर्स कल्याण समिति ने विगत वर्ष पेंशनर दिवस पर आयोजित निर्णयों के क्रियान्वयन संतोषजनक न होने पर नाराजगी व असंतोष जाहिर किया। साथ ही सात सूत्रीय मांग-पत्र प्रशासनिक अफसरों को सौंपा। मांग किया कि पेंशनर्स के हितों व सुविधाओं का ध्यान रखा जाय।
इस दौरान संयोजक दीनानाथ शर्मा ने पेंशनर की मृत्यु के पश्चात पारिवारिक पेंशन शीघ्र चालू किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं शासनादेश के बावजूद पेंशन स्वीकृत करने में विभाग द्वारा छह माह तक पेंशन स्वीकृत नहीं किए जाने की समस्या को पटल पर रखा। बतायाकि इससे पेंशनर को इधर-उधर भटकना पड़ता है। चिकित्सा दावों की प्रतिपूर्ति का निस्तारण नियमावली की व्यवस्था के अनुसार त्वरित गति से किया जाय। पेंशनरों के कम्प्यूटर पैकेज में जन्मतिथि संबंधी व्यवस्था करायी जाय, ताकि 80 वर्ष होने पर 20 प्रतिशत अतिरिक्त पेंशन का लाभ समय से प्राप्त हो सके। अविवाहित, तलाकशुदा, विधवा एवं विकलांग को पारिवारिक पेंशन मानते हुए उनका नाम अभिलेखों में अंकित किया जाय। साथ ही डिजिटल परिचय पत्र सभी पेंशनरों को दिया जाय। जनपद में पेंशन कक्ष की व्यवस्था की जाय। इस अवसर पर केएन सिंह, नन्दलाल, बजरंगी, रामसनेही, राजनाथ, जयराम यादव, श्रीपती सिंह, सुरेंद्र, नरोत्तम राम आदि उपस्थित रहे।
कैम्पस प्लेसमेंट के जरिए विद्यार्थियों के मिली नौकरी
Young Writer, चहनियां। मां खण्डवारी उच्च शिक्षण न्यास द्वारा संचालित पॉलिटेक्निक कॉलेज श्री त्रिदण्डी देव हनुमत टेक्निकल कॉलेज में इलेक्ट्रीकल, इलेक्ट्रानिक्स एवं मैकेनिकल इंजीनियरिंग ब्रांच के अन्तिम वर्ष एवं उत्तीर्ण छात्रों के लिए त कैम्पस प्लेसमेंट कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान लखनऊ की प्रतिष्ठित कम्पनी टेक्सट्रॉन टेक्नोलॉजी ने संस्था के 22 विद्यार्थियों का चयन सफलता पूर्वक 1.8 लाख पैकेज पर हुआ। इसे लेकर छात्र छात्राओं में उत्साह व खुशी देखने को मिली।
कैम्पस प्लेसमेंट हेतु टेक्सट्रॉन टेक्नोलॉजी के तुमुल जयसवाल (हेड-ऑपरेशन) एवं लोकेश कुमार सिंह (नेशनल हेड-टेक्निकल) के नेतृत्व में प्लेसमेंट टीम द्वारा लिखित परीक्षा एवं इन्टरव्यू के उपरान्त चयनित विद्यार्थियों को ऑफर लेटर प्रदान किया गया। छात्रों के सफलतापूर्वक सेवानियोजन पर खुशी जाहिर करते हुए संस्था के चेयरमैन डा.राजेन्द्र प्रताप सिंह एवं मां खण्डवारी ग्रुप ऑफ इंस्टिट्यूशन्स के निदेशक आशुतोष कुमार सिंह एवं निदेशक अवनीश कुमार सिंह ने विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना की एवं भविष्य में विद्यार्थियों के हित में ऐसे आयोजन किये जाने के प्रति आश्वस्त किया। प्रधानाचार्य राजेश कुमार सिंह एवं अरविन्द यादव द्वारा अतिथियों का स्वागत किया गया।
किसानों के हक में फैसला नहीं ले पा रहा जिला प्रशासन
Young Writer, चंदौली। सपा के राष्ट्रीय सचिव मनोज कुमार सिंह डब्लू ने शुक्रवार को जिला प्रशासन पर एक बार फिर बड़ा आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन किसानों के हक में फैसला लेने में नाकाम है। यदि वजह है कि किसानों की समस्या के समाधान के लिए चौबीस घंटे के अंदर फैसला नहीं ले पाया। इससे नाराज मनोज कुमार सिंह डब्लू शुक्रवार को एक बार फिर कलेक्ट्रेट पहुंचे और एडीएम उमेश कुमार मिश्रा से बातचीत के दौरान सैयदराजा विधानसभा में क्रय केंद्रों को बंद किए जाने के फैसले को औचित्यहीन बताया। कहा कि तीन क्रय केंद्रों को सिफ्ट करने का प्रशासनिक फैसला किसानों के लिए परेशानी का सबब है, वहीं रनिया में क्रय केन्द्र बंद किए जाने से स्थानीय किसानों की मुश्किलें बढ़ जाएगी, जिसके समाधान के लिए प्रशासन को तत्काल प्रभावी पहल करनी चाहिए।

इस दौरान उन्होंने एडीएम से बातचीत की। साथ ही रनिया क्रय केंद्र को बहाल किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ में आए किसानों की समस्याओं को एडीएम के समक्ष रखा और कहा कि आखिर ऐसी कौन-सी विवशता और मजबुरी है जिससे क्रय केंद्रों को इधर-उधर किया जा रहा है। कहा कि दो दिनों से शांतिपूर्ण ढंग से किसानों की समस्या के समाधान का प्रयास किया गया है, लेकिन अब यदि जिला प्रशासन में इस मामले में शिथिलता, लापरवाही या विलंब किया तो उसे किसानों के उग्र आंदोलन का सामना करना पड़ेगा। इसी चेतावनी के साथ जिला प्रशासन को पुनः चौबीस घंटे का वक्त दिया जा रहा है, ताकि वह किसानों के हक में फैसला ले सके। यदि ऐसा नहीं हुआ तो सैयदराजा विधानसभा के किसानों के नेतृत्व करते हुए बड़ा आंदोलन किया जाएगा, जिसके लिए जिला विपणन अधिकारी व जिले के आला अधिकारी जिम्मेदार होंगे। क्योंकि बार-बार मामले को संज्ञान में लाने के बाद भी जिला प्रशासन द्वारा उदासीनता व शिथिलता बरती जा रही है। इस दौरान संतोष उपाध्याय समेत तमाम लोग उपस्थित रहे। इसके मनोज डब्लू के कलेक्ट्रेट पहुंचने की सूचना पर गेट पर कोतवाल अनिल पांडेय भारी पुलिस फोर्स के साथ तैनात हो गए और जैसे ही सपा नेता गेट पर पहुंचे उन्हें वहां रोक लिया गया। इसके बाद आला-अफसरों से बातचीत के बाद मनोज सिंह डब्लू एडीएम दफ्तर गए और किसानों के मुद्दे पर बातचीत की।

गैर इरादतन हत्या के मामले में दो आरोपी दोषमुक्त
Young Writer, चंदौली। जनपद एवं सत्र न्यायाधीश विनय कुमार द्विवेदी ने गैर इरादतन हत्या के मामले में सुनवाई के बाद आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोष मुक्त कर दिया। इसके साथ ही न्यायालय ने जमानत पर रिहा दोनों आरोपियों के व्यक्तिगत बंध पत्र तथा जमानतनामे को निरस्त करने का भी आदेश दिया। इसके अलावा न्यायालय ने प्रतिभुओं को उनके दायित्वों से भारमुक्त किया है। उक्त मामले में बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता केशव सिंह यादव ने न्यायालय में तथ्य एवं तर्क प्रस्तुत किया।
जनपद के शहाबगंज थाना में दर्ज मुकदमा अपराध संख्या 29 सन् 2019 में आरोपी परवेज अहमद व शबाना बानो के विरूद्ध धारा-324, 304, 34 आईपीसी के तहत मामला दर्ज किया गया था। उस वक्त तत्कालीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा पत्रावली को 16 जुलाई 2019 को परीक्षण हेतु सत्र न्यायालय को सुपुर्द कर दिया। उक्त मामले में सत्र न्यायाधीश द्वारा गवाहों को सुनने व साक्ष्यों के अवलोकन किया। कोर्ट ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ ही घटना में प्रयुक्त चाकू की जांच की विधि-विज्ञान प्रयोशाला की रिपोर्ट को भी अवलोकन किया। सत्र न्यायालय ने बीते 13 दिसंबर को सुनवाई के वक्त जिला शासकीय अधिवक्ता दांडिक शशिशंकर सिंह व सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता अवधेश कुमार पांडेय के तर्क के साथ ही बचाव पक्ष की तरफ से अभियुक्त परवेज व शबाना बानो के अधिवक्ता केशव सिंह यादव के तर्क को भी सुना। इसके बाद आरोपी शबाना और परवेज अहमद को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त करार दिया। दोनों आरोपी जमानत पर हैं उनके जमानत को निरस्त करते हुए प्रतिभुओं को भारमुक्त करने का आदेश जारी किया।

रहिमन प्रीति सराहिये
Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से
मनुष्य के लिये सराहने के योग्य सिर्फ प्रीति है। संसार में अगर सराहना के योग्य कुछ है तो वह प्रेम है। संसार में प्रेम है, इसलिये संसार भी सराहना के योग्य है। रहीम कहते हैं कि प्रीति को सराहिये। और कुछ करिये, न करिये आपकी मर्जी। मगर इतना जरूर करिये कि प्रेम की सराहना करिये। प्रेम की सराहना करने से मनुष्य, मनुष्य हो जाता है। प्रेम की सराहना करने से प्रेम हो जाता है। प्रेम हो जाता है तो पनपने लगता है। सुगन्धि फैलने लगती है। रंग खिलने लगता है। जिन्दगी चहकने लगती है। धन्यता भरने लगती है। जीवन धन्य हो जाता है। प्रेम के होने से मनुष्य भगवान और भगवान मनुष्य हो जाता है। सबसे बड़ा भेद मिट जाता है। अभेद गा उठता है। अभेद का गान गूँज उठता है।
हमारा समूचा भक्ति काव्य प्रेम की भक्ति का काब्य है। प्रेम भक्ति का युग है। हमें पढ़ाया जाता है कि कबीर निर्गुण भक्त कवि हैं। तुलसी राम भक्त हैं। सूर और मीरा कृष्ण भक्त हैं। मैं कैसे कहूँ कि हमें झूठ पढ़ाया जाता है। मगर यह सच है कि हमें भक्ति की विभक्ति पढ़ाई जाती है। हमारा सारा जोर विभाजन पर होता है, भिन्नता पर होता है। एकता पर – एकरुपता पर – एक सूत्रता पर हमारा ध्यान बहुत कम होता है। प्रायः नहीं ही होता है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम अपनी रूचि, अपनी मतभिन्नता को लेकर कविता को परखने का प्रयत्न करते हैं और उसी को खोजकर प्रतिष्ठित करते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि हमारा अनुशीलन ही खिण्डन का संवाहक बन जाता है? अगर ऐसा है, तो चिन्ताजनक है। साहित्य तो मनुष्य के आन्तरिक ऐक्य की प्रतिष्ठा का प्रवर्तक है। खैर।
कबीर, तुलसी, सूर, मीरा, रहीम, रैदास सबके सब प्रेम के भक्त हैं। प्रेमी हैं। परमप्रेमी हैं। प्रेम के पुजारी हैं। उनके लिये बस नेह का नाता ही नाता है। और कोई सम्बन्ध उनके विधान में है ही नहीं। प्रेम की महिमा की अर्चना जैसी यहाँ हैं, दुर्लभ है। समूची भक्तिकालीन कविता के गौरव का आधार प्रेम है। रहीम कहते हैं कि प्रेम अद्भुत है। प्रेम अपूर्व है। प्रेम पूर्ण है। प्रेम सम्पूर्ण हैं। प्रेम में संसार की सारी अपूर्ण अस्मिता, सारा खण्डित अस्तित्व समाहित होकर पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। प्रेम मानवीय अस्मिताओं के विलयन का अद्भुत रसायन है। भिन्न-भिन्न मानवीय अस्मिताओं के विलयन का अद्भुत रसायन है। भिन्न-भिन्न सत्ताओं को समाहित करके एक अभिन्न सत्ता की रचना इस सृष्टि में केवल और केवल प्रेम के बूते की बात है। प्रेम के अलावा और किसी में यह सामर्थ्य नहीं है।
समूचे संसार को,-सम्पूर्ण जगत को अभिन्न स्वरूप में जान लेने का माध्यम बस प्रेम ही है। सारे संसार में मनुष्य और मनुष्य के बीच समत्व और अपनत्व का बोध प्रेम के द्वारा ही संभव है। प्रेम ही वह चीज है जो मनुष्य जाति को भिन्न सत्ता के स्वरूप से बदलकर अभिन्न सत्ता के स्वरूप में अधिष्ठित कर देती है। सुख और दुःख के अनुभव की यह एकात्मकता मनुष्य जाति की सर्वोच्च उपलब्धि है, जिसे प्रेम ने मानव जीवन को हमेशा से हमेशा के लिये प्रदान कर रखा है। रहीम की कविता प्रेम की अभ्यर्थना की कविता है। रहीम की कविता के प्रेम में वैयक्तिक अस्मिता का रंग सदा के लिये मिट जाता है और पारस्परिक अस्मिता का नया रंग रच जाता है। अलग-अलग रंग मिलकर जिस रंग में बदलते हैं, उसकी आभा, उसकी दीप्ति दूनी हो जाती है। अलगाव जब लगाव को पा जाता है, दूना चटक हो उठता है। अलगाव में हल्दी का पीलापन है, कमजोर, बीमार। अलगाव में चूने की क्षरित करने वाली सफेदी है, उदास। जब दोनों मिल जाते हैं- हल्दी और चूना आपस में मिल जाते हैं, तो दोनों अपना रंग छोड़ देते हैं। दोनों से अपना रंग छूट जाता है। हल्दी का पीलापन गायब हो जाता है। चूने की सफेदी गुम हो जाती है। अलगाव मिट जाता है, और नया रंग प्रगट हो जाता है। एक नये रंग की नयी अस्मिता उद्भासित हो उठती है। रहीम की कविता इसी अस्मिता के यशगान की कविता है। उनकी कविता हर किसी से प्रीति की सराहना के लिये आकुल अनुरोध की कविता है।
रहीम मेल के कवि हैं। उनकी कविता मिलाप की कविता है। रहीम की कविता विलाप की कविता नहीं है। विलाप में दुःख का विकल्प नहीं है। कविता दुःख के विकल्प की तलाश है। कविता जीवन संघर्ष में बल को बढ़ाने के लिये साधन है। कविता मनुष्य को उसकी अपरिचित शक्ति से परिचित कराने के लिये माध्यम है। कविता मनुष्य की सामर्थ्य को उद्घाटित करने के लिये उपादान है। रहीम के लिये कविता वाणी के व्यवहार की वस्तु नहीं है। उनके लिये कविता मानवीय अस्मिता की गरिमा के संरक्षण की अचूक विरासत है।
इस विरासत को रहीम ने बहुत संभालकर रखा हैै। सिर्फ संभालकर रखा ही नहीं, उसका मान भी खूब बढ़ाया है। उसके गौरव को काफी ऊँचा उठाया है। रहीम की कविता, कविता की भारतीय परम्परा का मान बढ़ाने वाली कविता है। उनकी कविता में जीवन की बाहरी अनुभूतियों की वह मार्मिक सच्चाई है, जो स्मृति में अनायास ही अपनी जगह स्थित कर लेती है। स्मृति में ठहर पाने की जद्दोहद में लथपथ कविताओं की भीड़ में रहीम के दोहे भीड़ से अलग खड़े मुस्कराते मिलते हैं। दोहे जैसे लगभग सबसे छोटे छन्द भीड़ से अलग खड़े मुस्कराते मिलते हैं। दोहे जैसे लगभग सबसे छोटे छन्द में रहीम ने जीवन के विराट बोध को रचने की जो सामर्थ्य प्रगट की है, वह अविस्मरणीय है। रहीम के दोहों की अविस्मरणीयता एक और तरह से अत्यन्त महत्वपूर्ण है, वह यह कि रहीम के दोहे धार्मिक नहीं हैं। प्रायः धार्मिक कलेवर के काव्य की लोकप्रियता के आधार में धर्म ही प्रधान होता है, काव्य नहीं। रहीम की कविता का कलेवर धर्म नहीं है। आन्तरिकता में धर्म है। इस दृष्टि से रहीम समूचे भक्ति काव्य की विशालधारा में अलग हैं। अलग तरह के कवि हैं। रहीम सन्त नहीं हैं। रहीम का कोई पंथ नहीं है। वे पंथ विहीन कविता के पंथी हैं। रहीम उस रास्ते के कवि हैं, जिस रास्ते से कवि होना सबसे कठिन होता है। रहीम सत्ता के केन्द्र में भी हैं। रहीम वैभव के केन्द्र में भी हैं। अधिकार की महत्ता के आसन पर भी विराजमान हैं। युद्ध के संचालक भी हैं। सेनाध्यक्ष भी हैं। महान दानी भी हैं। रहीम दानी हैं। याचक नहीं हैं। इन सब जगहों पर होने के बावजूद, इन सारी स्थितियों में होने के बावजूद रहीम कवि हैं। मुकम्मल कवि हैं। और सब जो वे हैं, उन सबमें सबसे अधिक वे कवि हैं। वे कवि शासक हैं। वे कवि मन्त्री हैं। वे कवि दानी हैं। वे कवि योद्वा हैं। वे कवि मित्र हैं। वे पहले कवि हैं, सबसे पहले वे कवि हैंे और बाद में भी वे कवि ही हैं। बीच में और भी बहुत कुछ हैं, जो उनके कवि में समाहित है।
सत्ता के चरित्र में दानी और याचक दोनों होता है। दोनों बराबर-बराबर होता है। इसीलिये सत्ता का चरित्र जटिल होता है, सरल नहीं। कवि के चरित्र में केवल दानी होता है, याचक नहीं। रहीम के चरित्र में दानी है, याचक नहीं। इसीलिये सत्ता में होकर भी रहीम का चरित्र भिन्न है। उनका चरित्र सत्ता का चरित्र नहीं कवि का चरित्र है। सरल है, जटिल नहीं। सहज है, कृत्रिम नहीं। आकर्षक है, उत्तेजक नहीं।
रहीम के दोहे जीवन से इतने संश्लिष्ट है कि उनमें जीवन जी उठा है। बड़ा अद्भुत है। बड़ा विस्मयजनक है। इतनी छोटी-सी जगह में, इतने स्वल्प स्वरूप में जीवन की विराटता मुस्करा रही है कि देखकर आदमी अवाक रह जाता है। मुग्ध हो जाता है। विस्मय विमुग्ध हो उठता है। होना पड़ता है। रहीम अभिव्यक्ति की सत्ता के सम्राट हैं उनका एक-एक दोहा अपने विषय के एक पूरे प्रबन्ध के सामने गर्व से सिर तान कर खड़ा रहने की सामर्थ्य का स्वामी है। अद्भुत है। रहीम की काव्यभाषा व्यवहार की भाषा नहीं है। उनकी भाषा बोध की भाषा है। बोध को बोध में ले जाने की भाषा है। बोध को बोध में बो देने की भाषा है। बोध को बोध में उगा देने की भाषा है। बोध को बोध में फलित कर देने की भाषा है। काव्य भाषा की यही मर्यादा है। रहीम काव्यभाषा को मर्यादा देने वाले कवि है।
न जाने रहीम ने कहना कहां से सीखा था? किससे सीखा था? बार-बार पूछने का मन होता है। वेैसे ही मन होता है जैसे कविवर पन्त का मन हुआ था चिड़िया से पूछने का-‘‘कहाँ, कहाँ हे बाल विहंगिनि पाया तूने स्वर्मिक गाना।’’ मगर मैं पूछ नहीं पाता। इसलिए नहीं पूछ पाता कि मैं जानता हूँ कि रहीम ने सीखा नहीं था। सीख कर वैसे कहा ही नहीं जा सकता, जैसे रहीम कहते है। कुछ सीखकर बिहारी जैसा कहा जा सकता है, रहमी जैसा नहीं। सीखा व्यवहार जाता है, जीवन नहीं। बिहारी व्यवहार के कवि है, जीवन व्यवहार के। उनकी भाषा व्यवहार की भाषा है। रहीम जीवन के कवि हैं। उनकी भाषा जीवन की भाषा है।
रहीम कविता के लिये प्रार्थी कवि नहीं हैं। कविता प्रार्थी है उनमें लिख जाने के लिये। कविता प्रार्थी है, उनसे लिख जाने के लिये। जो कविता के पीछे-पीछे दौड़ते हैं, कविता को पकड़ लेने के लिये, वे कवि नहीं होते हैं, कविता के लोलुप होते हैं। वे कविता के सौन्दर्य के, कविता की समृद्धि के, कविता के वैभव के, कविता की शक्ति के लोलुप होते हैं। जो कविता के पीछे-पीछे दौड़ते हैं, वे कविता को कभी पा नहीं पाते। कविता को जो प्रिय होता है, कविता का जो प्रिय होता है, अनायास ही पा लेता है। कविता जिसमें रच बस जाती है, हमेशा रहती है। सोते-जागते, उठते-बैठते रहती है। खाते-पीते रहती है। जो सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते, बोलते-बतियाते, लड़ते-भिड़ते, हारते-जीतते हमेशा होती है, वही कविता होती है। नहीं तो व्यवहार की कविता होती है। प्रेम की कविता में और प्रेम-व्यवहार की कविता में बड़ा फर्क होता है।
‘‘कहत, नटक, रीझत-खिझत, मिलत, खिलत लजियात। भरे मौन में करत हैं नैनन ही सों बात।’’ बिहारी का प्रसिद्ध दोहा है। दोहा आँख के बारे में है। आँखों से सम्पन्न होने वाले प्रेम व्यवहार के बारे में है। दोहा आँख के बारे में है, मगर दोहे में आँख नहीं है। आँख अनुपस्थित है। आँख से सारी क्रियायें निष्पन्न हो रही हैं मगर आँख नदारद है। इसमें आँख नगण्य है। प्रेम व्यवहार का वर्णन है, मगर प्रेम नहीं है। प्रेम की लीला है। अभिनय है। मगर प्रेम नहीं है। अभिनय में प्रेम हो भी कैसे सकता है। आँखें बात तो कर रही हैं। बड़ी विदग्धतापूर्वक कर रही हैं। मगर आँखों में आँखें नहीं हो पा रही हैं।
आँख के बारे में ही रहीम का भी एक दोहा है। रहीम के दोहे में आँख कोई क्रिया नहीं कर रही है। बिना किसी क्रिया व्यापार के भी आँख दोहे में पूरी-पूरी है। अपनी सम्पूर्ण अस्मिता में, अपने पूरे अर्थ में, अपनी पूरी गहराई में, अपने पूरे विस्तार में आँख कविता में मौजूद है।
एक किरकिरी के परे, जियरा होत बेहाल
कहु रहीम कैसे रहैं, जिन आँखिन महुँआँख।।
कविता आँख के बारे में ही नहीं है। आँख के बहाने पूरी-पूरी प्रेम के बारे में है। आँख के बहाने ही प्रेम पहचान में आता है। प्रेम को पहचानने का माध्यम आँख ही है। आँख ही प्रेम की आँख है। आँख में ही प्रेम का सारा मर्म समाया हुआ है। आँख में आँख का समा जाना ही प्रेम में होना होता है। प्रेम का होना होता है।
रहीम प्रेम व्यवहार के नहीं, प्रेम के कवि हैं। आँखों में आँखों को लेकर रहना ही प्रेमी का रहना होता है। कैसे रहना होता है, इसे रहीम जानते हैं। इस मर्म को जान लेना ही रहीम होना है। अपनी आँखों में आँखों को बसा लेने के कारण ही रहीम आँखों में बसे रहने के योग्य बन सके हैं।
रहीम मूलतः प्रेम के कवि हैं। उन्होंने जीवन में प्रेम को उपलब्ध किया था। प्रेम की महिमा को उन्होंने अपने जीवन में पाया था। रहीम ने कविता को बड़ी महंगी कीमत चुकाकर पाया है। अपने जीवन का सबकुछ चुकाकर उन्होंने कविता को सहजे रखा। इसलिये कि उन्होंने जान लिया था कि मनुष्य के जीवन में सबसे बहुमूल्य चीज मनुष्य ही है। मनुष्य बने रहने के लिये और मनुष्य बचे रहने के लिये कविता ही एक मात्र सहायक है। कविता ही आदमी को आदमी बनाने की शक्ति रखती है। बाकी कुछ भी नहीं। रहीम के अनुभव में कविता हमेशा ही राजशक्ति से श्रेष्ठ और बहुमूल्य रही है।
बहुत बचपन में ही रहीम ने सत्ता की महत्वाकांक्षा की कुत्सा को देख लिया था। मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठापना के महानायक अपने पिता बैरम खाँ की जघन्य हत्या के खड़यंत्रकारी राजसिंहासन की जुगुप्सित अस्मिता उन्होंने पहचान ली थी। पिता को खोकर पितृत्व के आश्रय से वंचित होकर रहीम ने सत्ता के हत्यारे चरित्र को पहचान लिया था। सत्ता की महत्ता के प्रति रहीम का जुगुप्सा का बोध उनका आपना बोध है। पितृहन्ता सत्ता के हत्यारे आश्रय में पलने-बढ़ने के अभिशाप की वेदना ने रहीम को कवि बनाया था। रहीम ने अपने जीवन के अनुभव से जान लिया था कि सत्ता का चरित्र दोहरा है, दो रंगा है। क्षुद्रता भीहै और महत्ता भी है। जो महत्ता है, वह क्षुद्रतापूर्ण महत्ता है। क्षुद्रता को महत्ता की तरह दिखाने का कौशल राजनीति का मूल है। राजनीति के प्रति रहीम के मन में वितृष्णा का स्थिर भाव था। वे सत्ता में थे मगर सत्ता से निःसंग थे। सत्ता से निःसंग होने के कारण ही वे कवि थे। रहीम की रचना का सारा संघर्ष क्षुद्रता में महत्ता को बचाये रखने का संघर्ष है। इस संघर्ष में कविता ही उनका एकमात्र बल है।
एक-एक दोहे के लिये रहीम ने अपना सबसे बहुमूल्य बलिदान किया है। बहुत खोकर उन्होंने कविता रची है। कविता रचकर उन्होंने बहुत कुछ खोया है। अपने पिता को, खोकर, अपने पुत्र को खोकर, अपने पद को खोकर रहीम ने कविता की अर्चना की है। रहीम ने एक दोहा लिखा था – जहाँपनाह जहाँगीर के शासन में- रहिमन राज सराहिये, ससि सम सुखद जो होय। कहाँ बापुरो भानु है, तपै तरैयनि खोय।’’ चुगलखोरों ने जहाँगीर को दोहे का अर्थ समझाकर रहीम के प्रति भड़का दिया। दोहे में वर्णित सचाई से मुँह न चुराने के कारण रहीम को जीवन की समस्त पूँजी से वंचित होना पड़ा था। काव्य सत्य की रक्षा के लिये रहीम को सबकुछ गँवा देने में तनिक भी विचलन नहीं था।
जो बगैर कोई कीमत चुकाये कविता लिखते रहते हैं, उनके लिये कविता व्यवहार की चीज है। जो मुकम्मल कीमत चुकार कविता रचते हैं, उनके लिये कविता जिन्दगी से तनिक भी भिन्न नहीं होती। रहीम के लिए कविता व्यवहार नहीं विश्वास है। रहीम की कविता में विश्वास है। रहीम की कविता विश्वास की कविता है। रहीम विश्वास के कवि है।
रहीम की कविता में कहीं भी धन की, ऐश्वर्य की, प्रभुता की अभ्यर्थना नहीं है। रहीम के लिये ये सारी चीजें जीवन की उपादन हैं। इन सबसे अधिक मूल्यवान उनके लिये कुछ और है। वह कुछ और मनुष्य का जीवन है। मनुष्य में मनुष्य की आभा है, कान्ति है, चमक है, पानी है। पानीदार जिन्दगी रहीम की कविता का काम्य है। जीवन में जीवन का पानी बचाने के लिये वे सब कुछ को दाव पर लगा देने में तनिक भी नहीं हिचकते। रहीम कहते हैं कि पानी उतर जाने पर मनुष्य उबर नहीं सकता। बिना पानी के सब सूना हैै। राज-पाट, लाव-लश्कर, हाथी-घोड़ा, महल-खजाना सब बेकार है। बिना पानी का आदमी पानी में डूब जाता है। डूबकर मर जाता है। बेपानी आदमी पर रहीम को हमेशा तरस आता है। वह उन्हें दया का पात्र लगता है, भले ही वह जहाँपनाह ही क्यों न हो। रहीम के लिये पानी का मतलब आत्मजागृति है। रहीम के लिये पानी का अर्थ जीवन के उपादनों में नहीं बल्कि जीवन में अनुराग है।
रहीम की कविता कहती है कि पानीदार आदमी की आँख में ही पानी होता है। जिसकी आँख में पानी होता है, उसे अपने गोत को बढते हुए देखकर प्रसन्नता होती है। आदमी को आदमीयत का विस्तार होते देख सुख होता है। जो मनुष्य है और मनुष्य होने का मर्म जानता है, उसे मनुष्यता के विस्तार को देखकर खुशी होती है। मनुष्यता का विस्तार ही उसके जीवन का प्रयोजन होता है। उसे बढ़ते देखकर उसके जी में सुख होता है। कितना स्पृहणीय सुख है, रहीम का।
रहीम अपनी कविता में जिस तरह का दृष्टान्त जिस तरह से रचते हैं, वह अद्भुत होता है। दृष्टान्त का पूरी तरह कविता वन जाना। कविता का पूरी तरह दृष्टान्त बन जाना, रहीम के काव्य विवेक का बेजोड़ प्रमाण है। उनके कौशल का अमिट शिलालेख है। रहीम दृष्टान्त के बादशाह है। एकछत्र बादशाह। दृष्टान्त का इतना बड़ा कवि हिन्दी में दूसरा कोई नहीं है। दूसरे कारणों को लेकर बहुत बड़े-बड़े कवि हमारी परम्परा में हैं मगर दृष्टान्त के सबसे बड़े कवि रहीम हैं।
रहीम कहते हैं कि जैसे बड़ी-बड़ी आँखों को देखकर आँखों को सहज ही सुख होता है। सुख बिना प्रयास के, बिना सोचे, बिना समझे उत्पन्न हो जाता है। छा जाता है। ‘‘ज्यों बड़री अँखिया निरखि, आँखिन को सुख होत।’’
बड़ी-बड़ी आँखें भरी-भरी आँखें होती है। बड़ा वही होता है, जो भरा होता है। रिक्तता आदमी को छोटा बनाती है। खालीपन का बोध मनुष्य को तुच्छ बना देता है। आकाश के अपार खालीपन को चाँदनी की स्निधता भरकर शोभन बना देती है। बड़ी आँखों का बड़प्पन सबकी आँखों को सुख से भर देता है। किसी का ऊँचाई में बड़ा होना, बल में बड़ा होना, धन में बड़ा होना, पद में बड़ा होना सबको सुख दे, न दे मगर किसी की आँख का बड़ा होना सबको सुख देने वाला होता है।
रहीम रहते तो थे महल में मगर उनके मन को जंगल पुकारा करते थे। महल की भव्यता के मुकाबले वन की शान्ति के संगीत में उनका मन अधिक रमता था। उनकी बागवानी में किसिम-किसिम के पेड़, पौधों और सुवासित फूलों का वैभव इठलाता था। अकबर और जहाँगीर के उद्यानों की शोभा के वे सहभोक्ता थे। मगर उनकी कविता में राज प्रसाद और राजोद्यान की कोई प्रशस्ति नहीं है। उनकी कविता में यशगान है, तो घोर घने जंगल में पत्थर के कठोर कलेजे पर हरियाली की मस्ती में झूमते उस पेड़ का है, उस पेड़ की अपराजेय जिजीविषा का है, जिसके लिये राम के अलावा दूसरे किसी का भरोसा नहीं है। जो दूसरे के भरोसे नहीं है, रहीम कविता, उसकी प्रशस्ति की कविता है-
‘‘रहिमन बिरवा बाग में, सींचे ते कुम्हिलाय
रहै भरोसे राम के, पाथर पर हरियाय।।’’
रहीम सन्त की सत्ता में भले न हों मगर वे सत्ता के सन्त अवश्य हैं। रहीम का होना सत्ता में सन्त के होने की तरह होना है। रहीम का होना तूफान से विक्षुब्ध सागर में चाँदनी के खेलते हुये प्रतिविम्ब की तरह होना है। रहीम का होना झंझावात में भींगती हुई, नहाती हुई, झूमती हुई हरियाली की तरह-होना है। रहीम का होना कहीं होकर भी वहाँ न होने और कहीं न होकर भी वहाँ होने जैसा होना है। रहीम का होना अनोखी रीति से कविता का होना है।
रहीम के पिता दूसरे देश से हिन्द देश में आये थे। वे इस देश की जमीन को आक्रान्त करने के लिये आये थे। वे इस देश पर अधिकार करने के लिये आये थे। वे मुगल साम्राज्य की स्थापना के अधिनायक थे। उन्होंने इस देश पर अधिकार किया? मुगल सत्ता के प्रति उनकी निष्ठा और उनकी बहादुरी का कितना मूल्य है? क्या पुरस्कार है? यह सब इतिहास का विषय है। इसका उत्तर तो इतिहास ही देगा। मगर रहीम मात्र एक पीढ़ी के भारतीय मुसलमान थे। उन्हें मुसलमान तो इतिहास कहता है। उन्हें मुसलमान कहना तो इतिहास की लाचारी है। दरअसल हमने परिचय के पारंपरिक तौर पर इतने भोंड़े और बेजान पैमाने ही गढ़ रखे हैं कि हमें व्यक्ति की पहचान के लिये जाति और धर्म का उल्लेख करना ही पड़ता है। मगर यह रहीम के लिये बेकार है। रहीम मुसलमान माता-पिता की सन्तान जरूर थे मगर वे मुसलमान नहीं थे। वे भारतीय थे। वे मनुष्य थे। वे कवि थे। वे बड़ी आँख को देखकर खुश होने वाले थे। वे अपने कुल-गोत का विस्तार देश, धर्म और जाति की सीमाओ को अतिक्रान्त करके करने के आकांक्षी थे। रहीम के लिये तुलसी भी उन्हीं के कुल के थे। वे भी तुलसी के कुटुम्ब के ही कुटुम्बी थे।
मात्र एक पीढ़ी के रहीम अपनी कविता की बनावट और बुनावट में जैसे भारतीय हैं वह पीढ़ी दर पीढ़ी के भारत के वाशिन्दे के लिये भी दुर्लभ है। स्पृहणीय है। रहीम की तरह का भारतीय होना आज भी किसके मन में स्पृहा नहीं जगा देता है। रहीम का राष्ट्रप्रेम भाषा में नहीं है, आन्तरिकता में है। उनकी कविता में देश प्रेम, काव्यवस्तु में नहीं है, काव्य भाषा में नहीं है, बल्कि काव्यसत्ता की सम्पूर्ण अस्मिता की व्याप्ति में है। उनका देश प्रेम भूगोल में नहीं है। भूगोल में व्याप्त सांस्कृतिक चेतना में है। विराट सांस्कृतिक चेतना में असीम अनुरक्ति के कारण, रहीम भारत के गौरवपूर्ण नागरिक हैं। अपने प्रेम के कारण, इस भारत भूमि की गरिमा के प्रति अपने समर्पण के कारण रहीम ने भारतीय चेतना पर अधिकार पा लिया। जो अधिकार बैरम खाँ अथक यु़द्ध करके नहीं पा सके। वह रहीम ने समर्पण करके पा लिया। हो सकता है इतिहास की स्मृति में मुगल शासन की स्मृतियां धूमिल पड़ जायं मगर साहित्यिक जगत में रहीम की स्मृति कभी मन्द होने वाली नहीं है।
रहीम के लिये कविता साधन नहीं है। साधना नहीं है। साध्य भी नहीं है। उनके लिये कविता जीवन से अभिन्न चीज है। उनके लिये कविता जीवन में है। जो जीवन में है, वही कविता है। उनमें कविता सहज है। उसके लिये कोई आयास नहीं है। कोई प्रयास नहीं है। जिन्दगी का कविता बन जाना और कविता का जिन्दगी बन जाना हमेशा नहीं, कभी-कभी होता हैं रहीम कभी-कभी होने वाले कवियों के गौरव के उत्तराधिकारी कवि हैं।
रहीम की कविता अपनी सत्ता में सत्ता के विस्थापक चरित्र की विरोधी कविता है। विस्थापन के वेदना कीरहीम की कविता में बड़ी मार्मिक व्यंजना है। सत्ता अपनी स्थापना के लिये सबको विस्थापित करती है। अपनी जगह, अपने अधिकार से, अधिसंख्य को विस्थापित करके ही सत्ता स्थापित होती है। रहीम ने देखा था- आँखों का पानी, जो आँखों में होकर चमक होता है, आँखों से कढ़कर यानी कि बाहर निकलकर आँसू बन जाता है। दुख का संवाहक हो जाता है। रहीम के लिये जिसके होने की जो जगह है, उस जगह उसका न होना ही आँसू है। रहीम कहते हैं,-‘‘रहिमन अँसुआ नयन कढ़ि, जिय दुख प्रगट करेइ।’’ आँसू आँखों से निकलकर दुख को प्रगट कर देते हैं। आँसू की जगह, आँसुओं के होने की जगह आँख है। आँसू आँख में होते हैं तो आँखों की चमक बढ़ जाती है। निकल जाते हैं बाहर तो आँखें उदास हो जाती हैं, निष्प्रभ। उसी तरह मनुष्य अपनी जगह से, अपने विरासत से वंचित कर दिया जाता है, तो दुख का संवाहक हो जाता है। रहीम का यह बोध उस समय का बोध है, जब मुगल सत्ता भारतीय जाति को उसकी विरासत से वंचित कर देने के अभियान का शंखनाद कर रही थी। रहीम उस अभियान के संचालक होकर भी उस अभियान के अवसाद को पहचान रहे थे। वे उस दारुण अवसाद को अपनी कविता में रच रहे थे। वे अपनी कविता में कह रहे थे कि जिसे अपने घर से निकाल दिया जायेगा, वह कैसे नहीं भेद कह देगा। अवश्य कह देगा। इस आचरण से मनुष्य और मनुष्य के बीच अभेद का बोध, अभेद का व्यवहार मिट जायेगा और भेद का, भिन्नता का बोध बढ़ता जायेगा। शासक और शासित का भेद, मुसलमान व हिन्दू का भेद, आक्रामक और आक्रान्ता का भेद, उत्पीड़क और उत्पीड़ित का भेद, मनुष्य और मनुष्य के बीच अभेद का भंजक है। रहीम की कविता इस भेद के विस्तार के व्यवहार की भर्त्सना की कविता है। इसीलिये रहीम कहते हैं-
’’रहिमन धागा प्रेम का तोड़ो मत चटकाय
टूटे पर फिर ना जुडै, जुड़ै गाँठ पड़ि जाय।।’’
आदमी और आदमी के बीच प्रेम का जो सम्बन्ध है, वही एक-दूूसरे की आन्तरिकता को आपस में जोड़ने का सूत्र है। वह सूत्र जब टूट जाता है फिर नहीं जुड़ता। जुड़ भी जाता है, तो गाँठ पड़ जाती हैै। मगर आदमी है कि मानता ही नहीं। बार-बार तोड़ता है। बार-बार जोड़ता है। इसीलिये हमारे समाज में गाँठ ही गाँठ है। जाति की गाँठ, सम्प्रदाय की गाँठ, धर्म की गाँठ, ऊँच-नीच की गाँठ, धनी-गरीब की गाँठ, अनगिनत गाँठ है। धागा गाँठ-गाँठ हो गया है। गाँठ इतनी ज्यादा है कि गाँठ ही दिखाई देती है धागा तो दिखाई ही नहीं देता। रहीम की कविता मनुष्य जाति के इस अनन्त दुर्भाग्य के दुःख पर आँसू बहाती कविता है।
आँसू बहाते हुये भी रहीम जोड़ने का आग्रह बारम्बार अपनी कविता में दुहराते रहते हैं। वे टूटने की विडम्बना के विरूद्ध जोड़ने के आग्रह के अथक आग्रही कवि हैं,-रहिमन फिर-फिर पोहिये, टूटे मुक्ता हार।। हार का हर दाना मोती का है। बड़ा बेशकीमती है। समाज की हर इकाई बहुमूल्य है। सबको एक में गूँथकर रखने में ही उसकी मूल्यवत्ता है। उसका अर्थ है। टूट जाने पर सब व्यर्थ है। मोती चाहे जितना कीमती हो मगर उसमें से प्रेम सम्बन्ध के धागे से जुड़ने की योग्यता नहीं है, तो वह सौन्दर्य को सजाने का अलंकार नहीं बन सकता। हिन्दू भी महत्तम है, मुसलमान भी महत्तम है, ब्राह्मण भी महत्तम है, भिस्ती भी महत्तम है, मगर सबकी महत्ता एकमें जुड़कर माला बन जाने में ही है। सारी इकाई टूट गई है, हार बनकर ही समय का श्रृंगार कर सकती है। माला टूट गयी है, दाने बिखरे हैं, तो बेकार है। ऐसे मोती के दाने किसी काम के नहीं हो सकते। बस अधिक से अधिक बिगड़ैल बन्दर के खेल के काम के हो सकते हैं। बन्दर जब तक मन होगा दानों से खेलेगा फिर घूरे-डबरे पर फेंककर हाथ झार लेगा। रहीम की वाणी एकता के मन्दिर में गूँजती हुई है। प्रार्थना के शिल्प में न होते हुये भी महिमामय आलोक रहीम की कविता में उद्भसित है।
रहीम के लिये ‘जन’ में जो ‘सु’ है वह लगाव का बोध है। जो ‘कु‘ है वह अलगाव का वाचक है। जो जन लगाव का व्यवस्थापक है, वह सुराज है। अलगाव का प्रवर्तन करने वाली राजव्यवस्था कुराज है। रहीम कुराज की भर्त्सना करने वाले कवि है। वे सुराज की अभ्यर्थना में कविता रचते हैं। वे सुजन के सुयश का गान करते है। रहीम की कविता ‘जन’ में ‘सु’ की प्रतिष्ठा की कविता है। रहीम का अटल विश्वास है कि सुजन के होने से ही समय के सौभाग्य का उदय होता है।
रहीम धन के, वैभव और समृद्धि की आराधना के कवि नहीं है। वे संचय के उपासक कवि नहीं है। रहीम के अनुभव में धन जीवन निर्वाह की जरूरतों को पूरा करन सकने का माध्यम भर है। जहाँ, जरूरत है, वहाँ धन को होना चाहिए। आवश्यकता के सम्मुख ही धन का अर्थ है। आवश्यकता के अभाव में धन का संचय और भंडारण बड़ा खतरनाक है। वह जीवन को वैसे ही डुबा देने वाला हो जाता है, जैसे नदी में चलती हुई नाव में पानी का भर जाना है। नाव में पानी भर जाने से नाव डूब जाती है। नाव में पानी का इकट्ठा होना नाव के डूब जाने का सूचक है और जिन्दगी में धन का इकट्ठा होना जीवन के डूब जाने का सूचक है। नाव में पानी का और जिन्दगी में धन का इकट्ठा होना जीवन के डूब जाने का। नाव पानी में चतली है। जीवन धन में होकर गुजरता है। जिन्दगी धन के सहारे आगे बढ़ती है। मगर नाव में पानी का भर जाना और जीवन में धन का भर जाना,- जीवन की व्याप्ति में धन का जगह बना लेना, देानों को डूबा देने के लिये पर्याप्त हो जाता है। इसीलिये रहीम ने अपनी कविता में आकांक्षा व्यक्त की है कि-
‘‘पानी बाढ़ै नाव में घर में बाढ़े दाम
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानों काम।’’
कितना विचित्र है कि हम कबसे रहीम की कविता पढ़ते हुय अब भी सयाने नहीं हो सके हैं। कैसी विडम्बना है कि रहीम की कविता की प्रशस्ति गाते हुय भी हमने अभी भी उनकी पुकार अनसुनी कर रखी है। कविता का हमारे जीवन में न होकर पूजा घर में होना कितना विस्मयजनक है। मगर हमारे समय के लिये क्या? हमारा तो पूरा समय ही विस्मय का समय है। हमारे समय में सब कुछ विस्मयजनक है। हमारे समय में कुछ भी विस्मयजनक नहीं है। कुछ भी होना हमारे समय में संभव है। हमारे समय में कोई विश्वास नहीं है। सब कुछ अविश्वसनीय है। हमारा समय असंभावनाओं की संभावना का समय हो गया है, ओफ, कितना दारुण है। ऐसे दारुण समय में भी रहीम की कविता हमें पुकार कर कही रही है’ भाई हे! कुछ भी करो न करो तुमरी मर्जी। जो कुछ कर रहे हो सब करो। मगर एक काम बस और करो। हमारे कहने से जरूर करो। प्रेम की सराहना जरूर करो। प्रेम को जरूर सराहो। इसमें एक पैसे का भी खर्च नहीं है। प्रेम की सराहना करने के लिये कवि होना जरूरी नहीं है। शिक्षित होना जरूरी नहीं है। बस आदमी होना जरूरी है और आदमी हर कोई है।
आज हर कोई अपनी जमीन से बेदखल किया जा रहा है। हर किसी के पाँव के नीचे जमीन खिसक रही है। हर कोई घर से निष्कासित होता जा रहा है। भले इसका पता हो, न हो। घर-घर में अभेद मिट रहा है। भेद बढ़ रहा है। आदमी कायर, नपंुसक और स्वार्थी होकर अपनी अस्मिता गँवाता जा रहा है। कुछ पाने की लिप्सा में सब कुछ खोता जा रहा है। अपने को खोकर कुछ पाने की खतरनाक वंचना ने आदमी को दबोच ली है। मगर रहीम की कविता है कि वह आज भी चुप नहीं है। वह अथक भाव से टेरती आ रही है, – रहिमन प्रीति सराहिये।’’
रहीम संतुष्ट थे- सम्पति में भी और विपत्ति में भी। अविरोध की साधना उमें सिद्ध थी। उन्होंने जान लिया था कि विरोध ही, जीवन में भार है। जो कुछ है उसकी अस्वीकृति ही जीवन को बोझ बना देती है। वह दुख के अपार पारावार का सृजन कर देती है। रहीम ने अपने जीवन में सारे भार को ‘भाड़’ में झोंक दिया था। उनका सारा बोझ जल गया था। दुख के विस्तार को उनहने पार कर लिया था। उनके लिये दुःख की वैतरणी नहीं थी। हाँ, यह बात अलग है कि दुख की वैतरणी को उन्होंने गाय की पूँछ पकड़कर नहीं पार किया था। पार किया था जिन्दगी के बोझ को जलाकर।
जीवन में सारे भार को जलाकर रहीम जीवन में सन्तुष्टि को पा सके थे। वे जीवन से संतुष्ट थे। जो अभी-अभी प्राप्त है, उपलब्ध है, उसमें वे संतुष्ट थे। संतोष की कीमत उन्हें मालूम हो गयी थी। उनके लिये यही सबसे बड़ा धन है। जब तक हम अपने जीवन से, जीवन में संतुष्ट नहीं है, गोधन, गजधन, वाजिधन, रतनधन और अचूक खजाना हमारे लिये मूल्यवान है। मगर ये सारे धन चाहे जितने मूल्यवान हों, लेकिन हमें भरते नहीं है। खाली ही करते हैं। हमें रिक्त करते हैं। खोखला बनाते हैं। हमें खोखला बनाकर हमारे खालीपन में खुद भरते आते हैं। जैसे ही हम जीवन से संतुष्ट हो लेते हैं, हम भीतर से भर जाते हैं। जीवन में, जीवन का रस भर जाता है, आनन्द भर जाता है। कोई अवकाश नहीं बचता। सारे धन धूल के समान व्यर्थ हो जाते हैं। रहीम भरे हुये आदमी हैं। रस से भरे हुये। जीवन रस से भरे हुये। कोई भरा हुआ आदमी ही प्रेम को पा सकता है। प्रेम को पाकर ही प्रेम को गा सकता है। रहीम की कविता प्रेम के यशगान की कविता है। रहीम की कविता प्रेम के यशगान के लिए अकुंठ उत्प्रेरणा की कविता है।
सम्पर्क प्राचार्य
माँ गायत्री स्नातकोत्तर महिला महाविद्यालय
हिंगुरतगढ़-चन्दौली, 232105
मो0नं0- 9450551160
चंचरीक जिमि चंपक बागा
काशी विशेषांक—–
Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से
श्री त्रिभुवन नारायन सिंह भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के एक आलोक स्तम्भ थे। वे भारतीय जनतंत्र के महान कीर्तिलेख में एक स्मरणीय अध्याय की तरह अपने समय में स्थित थे। आगाध राष्ट्रप्रेम, अटल कर्तव्यनिष्ठा, अचूक धैर्य, आचरण की पवित्रता, देश के विकास की अथक लगन और संविधान की मर्यादाओं के प्रति अटूट निष्ठा ने उनके व्यक्तित्व को लोकतंत्र के श्रृंगार की तरह सजाया था। लोकतांत्रिक आदर्श की कसौटी की तरह उनकी उपस्थिति स्वातंत्रयोत्तर भारतीय राजनीति की गरिमा को आलोकित करने वाली थी। मगर लोग उनको भूल गए हैं।
क्यों भूल गए है? यह सवाल मन को बराबर बेधता रहता है। उनका ईश्वरगंगी का मकान बड़े उदास भाव से सड़क पर आने-जाने वालों को ताकता रहता है मगर उधर कोई नजर उठाकर नहीं देखता। उन्हे कभी कोई राजनीतिक दल किसी भी अवसर पर याद नहीं करता। उनकी कभी कोई जन्मतिथि या पुण्यतिथि नहीं मनाई जाती। भूलना हमारे समय में आदमी का स्वभाव बन गया है, क्या? भूलना हमारे समय में सफलता पाने की अनिवार्य योग्यता हो गई है, क्या? शायद हाँ….हाँ….हाँ।
आज हमारा समूचा राजनीतिक परिदृश्य अपनी स्वाधीनता आन्दोलन की समूची विरासत भूल चुका है। हम अपने स्वाधीनता-संघर्ष के सारे संकल्प भूल चुके हैं। आज हमारे समय मेें हमारे सामूहिक जन-जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि जिसे हमें याद रखना था उसे हम भूल चुके हैं। जो कुछ भूलने के लिये था उसे हमने अपनी स्मृति में अंकित कर लिया है। कितना दारूण सच है, जिसे हम जी रहे हैं। मुझे त्रिभुवन नारायण सिंह को भूल जाना अपनी विरासत को भूल जाने से कत्तई भिन्न नहीं लगता। हम क्या करें? हम कर ही क्या सकते हैं। हमारे समय में तो अपनी विरासत से वंचित होने की विपन्नता ही हमारी सम्पन्नता की निशानी बनकर हमें हर वक्त चिढ़ा रही है। हम चिढ़ रहे हैं, कुढ़ रहे है। तिलमिला रहे हैं, तमतमा रहे हैं। मगर कर कुछ नहीं पा रहे हैं। बड़ा अजीब है। समूचा भारतीय जन-जीवन एक अजीब जीवन-स्थिति में पिस रहा है, मगर कुछ कर नहीं पा रहा है। जिसे हम प्राण-पण से अस्वीकार करना चाह रहे हैं, उसे ही हम स्वीकार करने को लाचार हैं। पता नहीं हमारे लोकतंत्र को किसने नजरा दिया है। न जाने किसकी टेढ़ी नजर, तीखी नजर हमारे लोकतंत्र को कलुषित और कुत्सित बना रही है। कलंकित बना रही है। खैर…..।
मुझे लगता है त्रिभुवन नारायण सिंह को याद रखना हमारे समय के लिये बेहद असुविधाजनक हो गया है। हमारे समय में व्यवस्था जिस तरह के यंत्र मानव का निर्माण करने को उद्यत है, वह उसकी पारंपरिक स्मृति को मिटाकर ही संभव है। इसीलिए इस व्यवस्था के हमला का केन्द्र हमारी जातीय स्मृति बन गई है। हमारी व्यवस्था हमारे समय के आदमी को इतिहास की स्मृति से विहीन छिन्नमूल असहाय आदमी बना देने को तत्पर है। ऐसे समय में त्रिभुवन नारायण सिंह की सादगी की स्मृति सत्ता हथियाने के लुटेरे अभियान में बहुत बड़ी बाधा है। उसे याद रखना आत्महन्ता उद्योग की तरह खतरनाक है। इसलिये याद नहीं रखना है। उनकी सत्यनिष्ठा, उनकी ईमानदारी हमारी ऐश्वर्य लोलुप लालसा के लिये दूध के कटोरे में गिरी हुई मक्खी की तरह मन बिदकाने वाली है, इसलिये उसे याद नहीं रखना है। सो हमने उन्हे याद नहीं रखा है। अपने लोक-तांत्रिक आदर्शो में अटल निष्ठा के चलते वे खुद लाल बहादुर शास्त्री के उत्तर राजनीतिक काल में राजनीति में अप्रासंगिक होते चले गए मगर उन्होने उसकी कत्तई परवाह नहीं की। उनके कदम अपनी धुन में कहीं और चले जा रहे थे, राजनीति का रास्ता कहीं और चला जा रहा था। सर्वेश्वर की कविता इस नियति की मार्मिकता को बड़ी विदग्धता से व्यंजित करती है-
हम कहीं और चले जाते हैं, अपनी धुन में,
रास्ता है, कहीं और चला जाता है।‘‘
वे स्वतंत्र भारत की पहली निर्वाचित सरकार के पं0 जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट में महत्वपूर्ण मंत्री थे। इससे देश में उनकी राजनैतिक हैसियत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। गाँधी के जीवनादर्शों और जीवन मूल्यों को अपनी जिन्दगी में धारण करने वाले वे अप्रतिम पुरूष थे। आजादी उनके प्राण की प्यास थी। देश सेवा उनके जीवन का परितोष था। पद उनके लिये गर्व और गौरव की चीज नहीं था। केवल अपने कर्तव्य की अभिव्यक्ति का माध्यम था। विशिष्टताबोध का उनमें नितान्त अभाव था। वे जहाँ कहीं भी थे, सहज थे। सामान्य थे। वे गाँधीवादी नहीं थे। गाँधीवाद उनके लिये कोई वाद नहीं था। कोई दर्शन नहीं था। कोई अवधारणा नहीं था। जो कुछ थोड़े से लोग गाँधी के साथ गहन तादात्म्य की स्थिति को प्राप्त कर सके थे, उन्ही लोगो में से वे एक थे। गाँधी की विचार और आचार पद्धति उनकी भी अपनी आन्तरिक अभीप्सा थी।
त्रिभुवन नारायण सिंह का जन्म वाराणसी के ईश्वरगंगी मुहल्ले में 08 अगस्त 1904 को हुआ था। उनकेे पिता का नाम प्रसिद्ध नारायण सिंह था। वे चार भाई थे। ईश्वरगंगी मुहल्ला वाराणसी का एक मुहल्ला होकर भी शहर के बीच एक बड़े गाँव जैसा था। शहर के बीच में शहर होने से बचा हुआ गाँव। गाँव का रहन-सहन और तौर-तरीका वहाँ जीवित और जीवन्त था। भारतीय ग्रामीण जीवनबोध का उन्हे गहरा और आत्मिक अनुभव था। वाराणसी के हरिश्चन्द महाविद्यालय से उन्होने स्नातक की शिक्षा प्राप्त की थी।
स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधानमंत्री, जय जवान, जय किसान के मंत्र के उद्गाता लाल बहादुर शास्त्री उनके अभिन्न सहपाठी मित्र थे। गाँधी जी के आह्वान पर अध्ययन अध्यापन छोड़कर भारत माँ को गुलामी की यातना से मुक्ति दिलाने के संघर्ष में कूद पड़ने वाले अनेक स्वनामधन्य लोगांे में त्रिभुवन नारायण सिंह भी एक प्रमुख और स्मरणीय व्यक्तित्व के रूप में अपना ऐतिहासिक महत्व रखते हैं।
स्वाधीनता आन्दोलन के दौर में निर्मित राजनेताओं में प्रायः महत्वपूर्ण लोगों में यह विशेषता दिखती है कि पत्रकारिता से उनका गहरा जुड़ाव रहा है। सामाजिक गतिविधियों के साथ-साथ बौद्धिक विमर्श में उनकी गहरी संलग्नता खास मायने रखती है। वैचारिक धरातल के निर्माण और उन्नयन के लिये पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय सहभागिता स्वाधीनता आन्दोलन में वैचारिक केन्द्र की सशक्त अभिव्यक्ति का साक्ष्य प्रस्तुत करती है। आज की विचार-विहीन राजनीति के समक्ष उस दौर की विचारपूर्ण राजनीति की विरासत भूलने की चीज नहीं है। त्रिभुवन नारायण सिंह शुरू से लेकर जीवन में लम्बे समय तक ‘डेली टेलीग्राफ‘ ‘हिन्दुस्तान टाइम्स‘ और ‘नेशनल हेराल्ड‘ समाचार पत्रों के सम्पादन से जुड़े रहकर अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को बराबर अभिव्यक्त करने में संलग्न रहें। उनके राजनीतिक व्यक्तित्व का यह बेहद मूल्यवान पक्ष अत्यन्त ही स्मरणीय और प्रेरणाप्रद है।
उन्होने एक वर्ष काशी विद्यापीठ में अध्यापन का कार्य भी किया था। अध्यापन और पत्रकारिता से जुड़कर राजनीति की गरिमा किस तरह उद्भासित हो उठती है, यह सोचकर मन रोमांचित हो उठता है। आमजन की राजनीति का रंग त्रिभुवन नारायण सिंह के व्यक्तित्व में अपनी पीढ़ी के संपूर्ण वैशिष्टय के साथ बड़ा साफ और आकर्षक दिखाई पड़ता है।
भारत सरकार के केन्द्रीय मंत्री, योजना आयोग के सदस्य, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में उनकी सेवाएँ राजनीतिक क्षेत्र में निर्विवादिता और निष्कलुषता की मिशाल की तरह आज भी हमारी स्मृति में प्रतिष्ठित हैं।
त्रिभुवन नारायण सिंह की स्मृतियाँ बचपन से ही मेरे उपर छायी हुई हैं। उनका प्रभाव निरन्तर गाढ़ा और गहरा ही होता रहा है। उनको याद करते हुए तमाम घटनाओं और दृश्यों की भीड़ ठेलमठेल मचाने लगती है। उन सबका प्रकाशन न तो संभव ही है, न समीचीन ही।
हमारे बाबा उमराव सिंह बताते थे कि पहली बार बाबू त्रिभुवन नारायण सिंह उन्नीस सौ बावन के आम चुनाव में प्रचार के लिये हमारे गाँव मेें पं. कमलापति त्रिपाठी के साथ हाथी पर बैठ कर आएं थे। उन दिनो गाँव में आने जाने के लिये रास्ते नहीं थे। केवल हाथी या घोड़े की सवारी ही यात्रा का साधन हुआ करता था। हमारे बाबा स्वतंत्रता सेनानी थे। वे कांग्रेस की जिला कमेटी के अध्यक्ष भी रह चुके थे। चूँकि हमारा गाँव सन् उन्नीस सौ उन्तालीस के करबन्दी आन्दोलन में कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन का केन्द्र रह चुका था। यहाँ के गोलीकाण्ड की गूँज राष्ट्रीय स्तर पर ख्यात थी। यहाँ की घटना को लेकर पं. जवाहर लाल नेहरू ने काँग्रेस की तरफ से वक्तव्य जारी करके सीधे हस्तक्षेप किया था, इसलिये हमारे गाँव की पहचान काँग्रेस के केन्द्र के रूप मेें हो चुकी थी। उनका हाथी हमारे दरवाजे पर आकर रूका था। उन लोगो ने यहीं रात्रिविश्राम किया और यहीं से कांग्रेस के लिये वोट मांगने का अभियान प्रारम्भ किया। उन दिनों त्रिभुवन नारायण सिंह चन्दौली संसदीय सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार थे और पं.कमलापति त्रिपाठी चकिया विधान सभा सीट से। बाबा बताते थे कि पहली बार आकर ही उन्होने कहा था कि आपका घर हमारे लिये अपने घर जैसा है। फिर त्रिभुवन नारायण सिंह और पं. कमलापति त्रिपाठी जी ने जीवन पर्यन्त हमारे घर को अपना घर माना। तब से लेकर जब तक वे लोग जीवित रहे वर्ष में दो बार बराबर हमारे घर आते रहे। त्रिभुवन नारायण सिंह को हरे चने की पकौड़ी और कमलापति जी को दहीबड़ा बहुत पसन्द था इसलिये चने के मौसम में उनका आना प्रायः सुनिश्चित होता था। चाहे वे जहाँ और जिस पद पर रहे मगर उनका वह कार्यक्रम चलता रहा। कांग्रेस के बँटवारे के बाद जब टी0एन0 सिंह संगठन कांग्रेस में हो गए और पण्डित जी सत्तारूढ़ कांग्रेस में। फिर उनके आने के समय अलग-अलग हो गए।
त्रिभुवन नारायण सिंह बड़े स्नेहिल, सादगी पसंद और ईमानदार व्यक्ति थे। उनकी सादगी और ईमानदारी उनकी आत्मिक ऊँचाई को भव्यता से मण्डित करती थी, जो बड़ी ही आकर्षक थी। अपनी सारी विशिष्टताओं के बीच उनकी सामान्यता ही उनके जीवन की सबसे मूल्यवान निधि थी। उनके जीवन में जो सबसे अधिक मूल्यवान था वह सबके लिये सुलभ था।
एक घटना की धुँधली-सी याद अब भी स्मृति में बिल्कुल अपने टहक रंग में टँकी है, जो अब भी हृदय को हुलसा देती है। तब मैं बहुत छोटा था लगभग पांच छः बरस का। हमारे गाँव के प्राइमरी स्कूल पर वोट पड़ रहा था। सारे गाँव की भीड़ वहाँ जमा थी। मैं भी भीड़ में बच्चों के साथ था। उस दिन कांग्रेस की प्रचार सामग्री में सीने पर पिन से टाँकने वाला बिल्ला नही था। तब कांग्रेस का चुनाव चिह्न दो बैलों की जोडी हुआ करता था। सोशलिस्ट पार्टी के चुनाव चिह्न बरगद का बिल्ला लगाकर हमारे साथी हमें चिढ़ा रहे थे। मेरा मन अपनी शर्ट में बिल्ला लगाने को बेहद मचल रहा था। मगर वैसा संभव नहीं था। खैर बहुत देर तक मैं किसी तरह अपने को जब्त किये रहा। मगर कब तक? आखिर धैर्य की भी एक सीमा होती है। आखिर बहाना बना कर मैं वोट डालने की जिद पर अड़ गया और रोने लगा। किसी के समझाने का कोई फायदा नहीं हुआ। समझाने वालों के सारे तर्क मेरे लिये बेमतलब और व्यर्थ थे। उसी बीच पोलिंग बूथ का भ्रमण करने त्रिभुवन नारायण सिंह आ पहुँचे। मैं और तेज रोेने लगा। उन्होने मेरे रोने का कारण पूछा। बाबा ने कारण बता दिया। फिर सबसे पहले उन्होने अपने कुर्ते से बिल्ला निकालकर मेरी शर्ट में टाँक दिया। फिर अपनी रूमाल से मेरे आँसू पोंछ कर गोद में उठा लिया। मुझे गोद में लिये वे पोलिंग बूथ के अन्दर गए। फिर अपना मतपत्र लेकर उन्होने मुहर मेरे हाथ में दे दी। मैंने मुहर दो बैलों की जोड़ी पर लगा दी। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मैंने वह बाजी मार ली थी जो मेरे उम्र के किसी को किसी भी तरह नहीं मिल सकती थी। उस वक्त जैसी खुशी मैं महसूस कर सका था, वैसी या उस टक्कर की किसी दूसरी खुशी की मुझे याद नहीं है। इतनी बड़ी खुशी उपलब्ध कराने के कारण वे बहुत बचपन में ही मेरे बहुत निकट बन गए थे। बचपन की वह निकटता जीवन पर्यन्त अनायास बढ़ती ही गई। वह याद आज भी मुझे रोमांचित कर देती है। एक रात हुए बच्चे के भीतर खुशी का तूफान भर देने की शक्ति ही राजनीति की वास्तविक शक्ति है. क्या, मन बार-बार पूछ पड़ता है।
एक बार लोहिया जी ने नेहरू जी से त्रिभुवन नारायण सिंह की शिकायत कर दी थी कि ये अपने चुनाव क्षेत्र में जाते हैं तो ठाकुरों के यहाँ हुक्का पीते हैं। उनका आरोप जातीयता की भावना को उभारने का आरोप था। नेहरू जी ने उन्हे बुलाकर जब इस बनिस्पत पूछा तो उन्होने ईमानदारी और दृढ़ता के साथ बताया कि हाँ मैं हुक्का पीता हूँ। घर में भी पीता हूँ और प्रचार के दौरान भी जहाँ व्यवस्था रहती है पीता हूँ। क्या हुक्का पीना गलत काम है? सिगरेट पीना ठीक है? नेहरू जी मुस्कुरा कर रह गए थे। यह बात उन्होने मेरे दरवाजे पर हुक्का पीते समय हँसते हुए बताई थी।
एक बार जब वे केन्द्र में भारी उद्योग और इस्पात मंत्री थे, उनके बड़े लड़के रूस में इंजीनियरिंग पढ़ रहे थे। समाजवादी नेता राजनारायण जी ने उन पर आरोप लगा दिया कि इन्होने अपने पद के प्रभाव का दुरूपयोग करके लड़के को इंजीनियरिंग पढ़ने भेजा है। त्रिभुवन नारायण सिंह बड़े दुखी हुए। उन्होने चुनौती दी कि राजनारायण जी प्रमाणित करें कि मैंने अपने प्रभाव का दुरूपयोग किया है। अगर ऐसा है तो मैं तत्काल अपने पद से इस्तीफा देता हूँ। अगर हमारे संविधान में ऐसी व्यवस्था है कि किसी मंत्री के लड़के का इंजीनियरिंग पढ़ना अपराध है तो मैं इस्तीफा देता हूँ। उनकी ईमानदारी और दृढ़ता के सामने राजनारायण जी को झुकना पड़ा और उन्होने अपने आरोप के लिये माफी माँगकर मामला शान्त किया।
त्रिभुवन नारायण सिंह की राजनैतिक मूल्यनिष्ठा के दो अप्रतिम उदाहरण भारतीय राजनीति के अविस्मरणीय दस्तावेज हैं। पहला उदाहरण है जब वे 18 अक्टूबर 1971 को उत्तर प्रदेश की संविद सरकार के मुख्य मंत्री मनोनीत हुए थे। चूँकि वे विधानमण्डल दल के सदस्य नहीं थे, इसलिये उन्हे उपचुनाव लड़ना था। इंदिरा गाँधी ने लाल बहादुर शास्त्री की संदिग्ध मृत्यु के बाद से शास्त्री जी के निकटतम मित्र होने के कारण त्रिभुवन नारायण सिंह को सक्रिय राजनीति से दूर रखने की नीति अपना रखी थी। उपचुनाव में उन्हे हराने के लिये इंदिरा जी ने केन्द्र सरकार की सारी शक्ति उड़ेल दी। चन्द्रभान गुप्त जी ने त्रिभुवन नारायण सिंह से कहा कि इंदिरा जी का षड़यन्त्र नाकाम करने के लिये हमें सरकार की शक्ति का उपयोग करने की छूट दो। मगर उन्होने सरकारी शक्ति का इस्तेमाल चुनाव के लिये असंवैधानिक बताकर कत्तई उपयोग के लिये मना कर दिया। वे मुख्यमंत्री रहते चुनाव हार गए। उन्होने चुनाव हार कर संविधान की मर्यादा की रक्षा की। उनका यह अपूर्व त्याग लोकतंत्र के लिये सदैव स्मरणीय बना रहेगा।
दूसरा उदाहरण पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के पद से त्यागपत्र का मामला है। जनता दल की सरकार के पतन के बाद इंदिरा गांधी प्रचण्ड बहुमत के साथ सत्तासीन हुई। इंदिरा जी ने त्रिभुवन नारायण सिंह से कहलवाया कि वे कलकत्ता छोड़कर जयपुर चलें जाएँ। राजस्थान के राज्यपाल का राजभवन सबसे अधिक भव्य हैं। मगर उनकी सलाह को उन्होने संवैधानिक मर्यादा की अवहेलना समझा और 12 सितम्बर 1981 को राज्यपाल के पद से त्यागपत्र दे दिया। त्यागपत्र देकर उनके काशी लौटने के बाद जब मैं उनसे मिला था तब उन्होने कहा था कि देखो जिस इंदिरा को मैने गोद में खिलाया है, वह अब मुझे राजनीति की शिक्षा दे रही है। त्रिभुवन नारायण सिंह के बारे में जब भी मैं कुछ सोचता हूँ मुझे तुलसीदास की चौपाई याद आती है,-
‘‘तेहि पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा।ʺ
भरत अयोध्या का राजकाज देख रहे थे। मगर राजा बनकर नहीं। राजा राम थे और राम का काम भरत सँभाल रहे थे। त्रिभुवन नारायण सिंह राजकाज देख रहे थे। राज भारत की जनता का था। वे उसका काम उसकी तरफ से देख रहे थे। मैं नहीं जानता भ्रमर चम्पा के बाग में चम्पा की सुवास और उसके पराग से विल्कुल अनासक्त कैसे रहता है। मगर तुलसीदास जानते हैं कि भरत अयोध्या के वैभव से बिना राग के अयोध्या में राम में तन्मय होकर कैसे रहते थे। मैने भी त्रिभुवन नारयण सिंह को सत्ता के केन्द्र में रहकर सत्ता के समस्त सुखो से उदासीन, निरासक्त रहते देखा है। मौजूदा मूल्यहन्ता राजनीति के चिन्ताजनक समय में हम जब भी मूल्यनिष्ठ राजनैतिक विकल्प के स्वरूप के बारे में चिन्तन को उन्मुख होंगे त्रिभुवन नारायण सिंह की स्मृति जरूर हमें विश्वास और बल प्रदान करेगी। हमें जिन्हे याद रखना था मगर हम भूलते जा रहे हैं, उनमें एक नाम त्रिभुवन नारायण सिंह का भी है। मैं उनकी और उनकी विरासत की स्मृति को सादर नमन करता हूँ।
सम्पर्क
डा. उमेश प्रसाद सिंह
प्राचार्य
माँ गायत्री स्नातकोत्तर महिला महाविद्यालय
हिंगुतरगढ़-चन्दौली-232105
मो0- 9450551160
मैं तुम्हे लाँघ जाऊँगा
Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से
अँधेरा था, – अथाह, अपार, अभेद्य।
उदासी थी, – अतल, अगम्य, अफाट।
अन्तराल था, असीम।
अन्तराय थे, अनगिनत उन्मत्त अट्टहास करते हुए।
वह अकेला था। एक अँधेरे टीले पर एक हाथ की हथेली पर दूसरे हाथ की मुट्ठी को धुनता हुआ।
सामने खजुराहो के राज प्रासाद से उठती आग की विकराल लपटें थीं, सर्वस्व को स्वाहा करती हुई।
वे लपटें एक चिता की लपटों से लिपटी हुई थी। एक चिता जिसमें उसका सबसे प्रिय, उसके जीवन का सबसे अधिक अनमोल जल चुका था।
वह श्री हर्षदेव द्वारा स्थापित धंगदेव, गंडदेव द्वारा पोषित चन्देल साम्राज्य के पतन का द्रष्टा, अपराजेय योद्धा धवलकीर्ति परम भट्टारक विद्याधर देव का पौत्र कीर्तिवर्मा था।
कीरत के अन्तर से एक शंखनाद गूँज रहा था, – मैं तुझे लांघ जाऊँगा। इस गूँज को सुनने वाला कोई नही था। था केवल,-कीरत, कीरत, कीरत।
एक चिता और जल रही थी, वाराणसी के हरिश्चन्द घाट पर। वह चिता एक पिता के पराजित संघर्ष की चिता थी। उस चिता पर असहायता से हत जिजीविषा का शव रखा था। वह चिता एक रचनाकार के, जो न दैन्यं न पलायनं के मंत्र का अटल उपासक था के बेटी की चिता थी। वह अकाल काल कवलित मंजु की चिता थी। उस चिता में शिव प्रसाद सिंह के जीवन का सबसे मूल्यवान उनका छोह जल रहा था। उनका दुलार जल रहा था। चारो तरफ अँधेरा था, उदासी थी, अन्तराल था, अन्तराय था।
शिव प्रसाद सिंह के अन्तर में एक शंखनाद गूँज रहा था, – ’’मैं तुझे लाँघ जाऊँगा।’’ वहाँ बहुत से लोग थे, परिजन थे, शिष्य थे, मित्र थे, शुभचिन्तक थे। वह गूँज कोई नही सुन रहा था। सुन रहे थे,- केवल शिव प्रसाद सिंह।
’नीलाचाँद’ केवल एक उपन्यास नहीं है। एक घटना है। एक परिघटना है। इसमें रचनाकार और रचना के संकल्प और संघर्ष अभिन्न हो उठे हैं। हजारों वर्षो के अन्तराल को उलाँघ कर मनुष्य के आन्तरिक चेतन धरातल के केन्द्र का स्फोट एक हो उठा है। ’नीलाचाँद’ एक उदाहरण बन सका है, इतिहास से इतिहास के अतिक्रमण का। इतिहास से वर्तमान के अतिक्रमण का। वर्तमान से इतिहास के अतिक्रमण का। विश्वास से व्यक्तित्व के अतिक्रमण का। ’नीलाचाँद’ परम्परा से परम्परा का भी अतिक्रमण है।
साहित्य का मूल स्वभाव काल के अतिक्रमण का स्वभाव है। बहुत सी चीजों, स्थितियों और चित्तवृत्तियों के सम-विषम घात-प्रतिघात को मनुष्य जाति की स्मृति में अँकित, सुरक्षित और संरक्षित कर देने का उद्योग साहित्य का मुख्य उद्योग है। काल की अविच्छिन्नता भारतीय चिन्तन परंपरा का मूल आधार है। इस परंपरा को खण्डित करने का अपराध आधुनिक चिन्तन की रूढ़ अवधारणा से उत्पन्न विकृति का परिणाम है। मनुष्यजाति के जीवन की चित्तवृत्तियाँ कालखण्डो में विभाजित नहीं है। इतिहास और वर्तमान कम से कम एक-दूसरे के विलोम तो नही ही हैं। जैसे हमारे समाजिक जीवन में हमारी संकीर्ण साम्प्रदायिक सोच का दुष्परिणाम हिन्दू और मुसलमान को एक-दूसरे के विलोम के रूप में प्रतिष्ठित करने की अपराधी है, वैसे ही आधुनिक चिन्तन की विकृति हमें इतिहास और वर्तमान को परस्पर विरोधी और विजातीय मनवाने की उत्तरदायी है। शायद यही कारण है कि प्रायः हम ऐतिहासिक उपजीव्य के लेखन के सन्दर्भ में शव साधना के प्रतीक की कभी इधर और कभी उधर के पक्ष में व्याख्या में उलझकर रह जाते हैं। हमारे विचार के केन्द्र में इतिहास प्रधान हो जाता है, साहित्य गौड़। साहित्य की रचना के प्रभावांकन में रचना का गौड़ हो जाना कितना दुर्भाग्य जनक है, कहने की जरूरत नहीं। शायद यही कारण है कि हिन्दी में एक समय ऐतिहासिक लेखन की पहचान ऐतिहासिक आंचलिकता बन गई थी। ’नीलाचाँद’ ऐतिहासिक आंचलिकता के व्यामोह से प्रायः मुक्त उपन्यास है।
इतिहास में जाने के अनेकों कारण होते हैं। कभी-कभी तो कोई केवल रोमांच के लिये इतिहास में चला जाता है, फिर वहाँ जाकर खुद खो जाता है। इतिहास में जाकर अपने को और अपने समय को भूल जाना एक ऐसी दुर्घटना है, जिसे सिर्फ उससे बचने के लिये याद रखना जरूरी रह जाता है। कभी-कभी कोई इतिहास में मनोरंजन के लिये भी चला जाता है और विस्मृति के गर्भ में खोई चीजों को उलट-पुलट कर ताजगी का मजा पाने की कोशिश करता है। कभी-कभी कोई महाराज मुचकुन्द की तरह अपने संघर्षो से थका-माँदा अबाध विश्राम के लिये भी इतिहास की गोद में चला जाता है। मगर एक रचनाकार का इतिहास में जाने का मकसद कुछ और ही होता है। वह जीवन सत्यों की गहराई में जमी जड़ो की पहचान के लिये जाता है। वह चेतना की आन्तरिक सतह में होने वाले उद्वेलनों की अन्तक्रियाओं के उलझे छोर ढूढ़ने जाता है। वह जाता है, अपने समय की दिगन्तव्यापी यातना से मुक्ति के लिये आश्वासन की छाँव तलाशने। एक रचनाकार का इतिहास में जाना अपने समय के असहन्य दबाबो के उत्क्षेप के कारण ही घटित होता है। शिव प्रसाद सिंह मनुष्य जीवन के गहरे सरोकारों के सजग रचनाकार हैं। ’नीलाचाँद’ उपन्यास में अपने समय की भीषण विभीषिका का ताप और परिताप उसके आन्तरिक संघठन में स्पष्ट परिलक्षित होता है। साहित्य में यथार्थ केवल चित्रों में ही नही होता ध्वनियों में भी होता है और ध्वनियों के रंग और ढंग अनगिनत हैं।
किसी भी रचना का मूल स्रोत अपने सामयिक जीवन की विडम्बनाओं में व्याप्त होता है। किसी भी व्यवस्था का ढाँचा और उसकी प्रणाली उसके अच्छे और बुरे होने की उत्तरदायी नही होती। मुख्य चीज तो व्यवस्था के संचालन के घटकों की भूमिका होती है। व्यवस्था का जनपक्ष के प्रति प्रतिबद्धता का व्यवहार होता है। ’नीलाचाँद’ में तीन राजवंशो के चरित्र का चित्र आपको देखने को मिलेगा। एक वंश है,गाहड़वालों का जिसका नेतृत्व नृपति चन्द्रदेव के हाथ में है और जिसके संचालन का जिम्मा युवराज गोविन्द के कन्धो पर है। गाहड़वाल राजवंश अपनी आन्तरिक विवशताओं और अक्षमताओं के चलते कहने भर को राजवंश बचा हुआ है। काशी के कुछ हिस्सों पर ही केवल एक अपमानजनक सन्धि के चलते उसकी राजसत्ता अवशेष है। आर्य रज्जुक एक अद्भुत चरित्र के अन्यतम राजपुरूष है, जो अपनी नैतिकताओं में अनुकरणीय हैं। वे दम्भी और उदण्ड युवराज के अपमानों के कड़वे घूँट पीते रहने के बावजूद इस राजवंश के उद्धार के अपने संकल्प पर अडिग अग्रसर हैं। आर्य रज्जुक गाहड़वाल के चलते ही कीर्तिवर्मा के काशीवास का केन्द्र यह राजकुल बनता है।
एक राजवंश है कलचुरी लक्ष्मीकर्ण का। वाराणसी के अधिकांश पर आधिपत्य कायम करके कर्णघण्टा के कर्णमेरू में उसकी राजसत्ता अधिष्ठित है। अपनी श्रेष्ठता को राजवंशो पर थोपने के लिये वह अपने को सप्तम चक्रवर्ती घोषित करने का प्रबल आग्रही है। कर्ण चाटुकारो को सम्मानित करता है, विद्वानो को अपमानित करता है। उसके अधिकारी स्वेच्छाचारी और भोग वासना में डूबे हुए है। प्रजा का उत्पीड़न उसके शासन में अबाध जारी है। कृष्णमिश्र के शब्दों में कर्ण भी अपने को आर्य कहता है। वह भी आर्य रक्त का संवाहक है। वह भी माहेश्वर है। फिर भी कर्ण ने चन्देलवंश की परम विदुषी और अप्रतिम सुन्दरी राजरानी तारा देवी को पाने की वासना में युद्धविरत देववर्मा की हत्या कर दी। खजुराहो के राज प्रासाद को अग्नि के हवाले कर दिया। राजकोश लूट लिया। खजुराहो के विश्व पूजित मन्दिरों का सर्वनाश कर दिया।
एक राजवंश है, चन्देलों का। विश्वविश्रुत परम भट्टारक अप्रतिहत योद्धा विद्याधर देव की गरिमामय विरासत का उत्तराधिकारी कीर्तिवर्मा सत्ताच्युत राजकुमार है। आर्य परंपरा और भारतीय जीवन के गरिमामय मूल्यों की प्रतिष्ठा कीरत का ध्येय है। अपने पादाक्रान्त राजसत्ता की पुनर्प्रतिष्ठा का संकल्प कीरत के जीवन का केन्द्र है।
कलचुरी कर्ण और कीर्तिवर्मा का संघर्ष आर्य-अनार्य का संघर्ष नही बल्कि एक पतित आर्य के अनार्य आचरण के विरूद्ध आर्य जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा का संघर्ष है। इस उपन्यास में युद्धों का बड़ा रोचक और रोमांचक वर्णन बड़े विस्तार में है मगर युद्ध के मूल में हर कहीं मूल्य निष्ठा प्रतिष्ठित है।
कर्ण के शासन की उत्पीड़न की दलन की, दमन की, प्रवंचना की प्रत्येक घटना में हमारे लोकतन्त्र के महनीय मूल्यो के ह्रास की प्रतिध्वनि इस उपन्यास में अन्तर्भुक्त है। खजुराहो के मन्दिरों की अग्नि लीला में हमारे अपने समय केे सद्भाव और सहिष्णुता के पूज्य प्रतिष्ठानों की विध्वंस लीला भी समाहित है। किसी मन्दिर का और राज प्रसाद का ध्वस्त हो जाना या कि भस्म हो जाना उतना यातनादायक नही होता जितना कि सदियों के संघर्ष से सृजित और उपोषित मूल्यों का, विश्वासों का विनष्ट हो जाना पीड़ादायक होता है। एक गर्वोन्नत जाति के लिये यह पीड़ा से हजार गुना मारक लज्जाजनक पीड़ा होती है। हमारे समय की लज्जाजनक पीड़ा का दर्द ’नीलाचाँद’ में कीरत कोे बार – बार उन्मथित करने वाले दर्द में प्रतिविम्बित दिखाई दे जाता है। इतिहास की छाया जब वर्तमान के चेहरे को आच्छादित करती है, बहुत आसानी से दिखाई दे जाती है मगर जब वर्तमान की फूँक इतिहास के सोये शंख में बजती है, सुन पाना कठिनाई से संभव हो पाता है। ऐतिहासिक उपन्यास का पाठ अपेक्षाकृत कठिन और जटिल पाठ होता है।
’नीलाचाँद’ उपन्यास में चरित्रों और घटनाओं का महामेला है। चरित्रों का गठन प्रवृत्तियों पर अवलम्बित है। दो तरह के चरित्र पूरे उपन्यास में दिखाई पड़ेगंे। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है- ’’द्वौं भुतसर्गौ लोकेस्मिन दैव आसुर एव च’’। इस अपार जनसमूह में समस्त मनुष्यों की दो प्रजाति है। एक प्रजाति लोकहित की साधना में निरत है, एक प्रजाति आत्महित को साधने में व्यस्त। बाणभट्ट की आत्मकथा में एक जगह आचार्य द्विवेदी ने कहा है,- ’सत्य वह है, जिससे लोक का आत्यन्तिक कल्याण होता है’। प्रधानवस्तु लोककल्याण है, वह जिससे सधता है, वही सत्य है, वही धर्म है, वही राजनीति है। ’नीलाचाँद’ की तमामतर कथाओं, उपकथाओं में साध्य यही लोक कल्याण है। कीरत, कीरत के संरक्षक, सहयोगी, शुभचिन्तक जो चरित्र हैं, उनका संघठन लोक कल्याण की साधना का अन्वेषी है। आर्यरज्जुक, सेनापति गोपालभट्ट, सेनापति अनन्त, सुबोधदेव, माँ शीलभद्रा, पाशुपताचार्य ऋतध्वज और वृषध्वज, गोमती, मीनाक्षी, सुनन्दा, बब्वरनट, लोचनगोड़, सूरजकाका, रामचन्दर केवट, भरत डोम, बलदेव ओझा आदि के साथ चरित्रों की पूरी फौज है, जो अलग-अलग जीवन क्षेत्रो से सम्बद्ध होते हुए भी परस्पर सौहार्द और सहिष्णुता की मिसाल बन कर खड़ी है। दूसरी तरफ कलचुरी लक्ष्मीकर्ण, उसकी सौन्दर्य गर्विता हूणरानी आवल्ल देवी, सेनापति अश्वगंध, रूद्रपाल, दिद्दापाल, जामाता जातवर्मन, राजकुमारी वीरश्री, यशकर्ण, कौलाचार्य चण्डेश्वर और विनायक भट्ट जैसे चरित्र हैं जो आत्मसुख के लिये जगत को केवल अपना साधन समझते हैं। इस उपन्यास को पढ़ते हुए महाभारत में एक जगत युधिष्ठिर से कीे हुए ऋषि माण्डव्य के वचन बराबर याद आते है,- ’’राजन! जो मनुष्य अपने सुख में उतरा नहीं जाता है और जो मनुष्य अपने दुख में डूब नहीं जाता है, वही मनुष्य, मनुष्य है। उसी मनुष्य में धर्म प्रतिष्ठित है। नीलाचाँद में धर्म के पाखण्ड की अप्रतिष्ठा और धर्म की आत्मदीप्ति की प्रतिष्ठा का अद्भुत आयोजन है।
इतिहास वह नहीं है, जो आज नहीं है। वह तो खण्डित आधुनिक दृष्टि का विकार है। मनुष्य का जीवन सिर्फ उतना ही नहीं है, जितना प्रगट है। जो कभी प्रगट होकर आज अप्रगट है, वह भी जीवन में समाहित हैै। जो आज प्रगट होकर कल अप्रगट हो जाने को आकुल है, वह भी जीवन का अंग है। जो आज अप्रगट होकर भी कल प्रगट होने के लिये मचल रहा है, वह भी जीवन का हिस्सा है। मनुष्य का, मनुष्य जाति का जीवन बड़ा विचित्र है। इस विचित्र मनुष्य जाति के जीवन का सम्यक चित्र ही साहित्य है। साहित्य अस्तित्व की व्यापकता का सन्धान है। शिव प्रसाद सिंह साहित्य की भारतीय चिन्तन परम्परा के उन्नायक रचनाकार हैं। उनकी दृष्टि खण्डित की नहीं समग्र की उपासक है। वे काल और कर्म दोनों की समग्रता के उपासक रचनाकार हैं। उनके लिये आधुनिकता परम्परा से पृथक नहीं है। उनके लिये परम्परा आधुनिकता के विपरीत नहीं है। वे संश्लेषण की प्रक्रिया के मर्म को बूझने के मार्ग के संधान के आग्रही रचनाकार हैं। परस्पर विरूद्धों के समाहन की प्रक्रिया में समाहित हो सकने का मार्ग ही साहित्य का अपना रास्ता है। साहित्य की अपनी शक्ति है। साहित्य का अपना सौन्दर्य है।
पारंपरिक भारतीय इतिहास दृष्टि का बड़ा सुन्दर आधार महाभारत में व्यक्त है। अपने इतिहास काव्य में अपने समय के तमाम पेंचीदे प्रश्नो के समाधान स्वंय तहर्षि व्यास ने पुराने दृष्टान्तों के माध्यम से किये है। पूरे के पूरे शन्ति पर्व में धर्मराज युधिष्ठिर के अधिकांश सवालो का जवाब पितामह भीष्म ने पुराख्यानो के उदाहरणों से दिया है। हमारी पारंपरिक दृष्टि में बीता हुआ काल मृत नहीं है। मृत का मृत से नहीं। मृत का जीवित से नहीं। जीवित का मृत से नहीं। जीवित का जीवित से संश्लेषण इतिहास लेखन का आधार है। विश्वास वह चिरजीवित शक्ति है, जो हजार बार मरकर भी कभी नहीं मरता। ’नीलाचाँद’ उस विश्वास की प्रतिष्ठा की रचनात्मक उपलब्धि है, जिसे उसका रचनाकार अमोध इच्छाशक्ति कहता है। यह इच्छाशक्ति मनुष्य में हमेशा ही उससे अभिन्न हर काल में मौजूद है।
’नीलाचाँद’ उपन्यास का मूल प्रतिपाद्य अपनी खोई हुई विरासत की पुनर्प्रतिष्ठा है। समूचे उपन्यास की मूल अन्तर्ध्वनि ओज की ध्वनि है। समूची कथा भाषा में ओज की अन्तर्दीप्ति देखने लायक है। इस भाषा में थोड़ा अलग तरह का ताप दिखाई पड़ता है। वह ताप अनुभव की तीक्ष्णता का ताप है। कथात्मक भाषा में यह तीक्ष्णता उपन्यास को अपनी पूर्व परम्परा से अलग स्थिति प्रदान करती है। ’नीलाचाँद’ की भाषा स्वंय शिव प्रसाद सिंह के पूर्व के प्रसिद्ध उपन्यास अलग-अलग वैतरणी ’और गली आगे मुड़ती है’ से भिन्न भाषा है। यहाँ अलग-अलग वैतरणी की बिम्बधर्मिता और सांकेतिकता की जगह सपाट भाषा की मारकता नये रूप में लक्षित की जा सकती है। भाषा में अभिधा की शक्ति का विस्तार अपनी स्पष्टता और तीक्ष्णता में ध्यान खींचता है। ’नीलाचाँद’ की भाषा में मर्यादा के भीतर जो स्पष्टता, ताप और तीक्ष्णता है, वह हमारे समकालीन लोकतांत्रिक जीवन में वांछित भाषा के स्वरूप का सन्धान प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास में अस्वीकार और असहमति को मर्यादित रूप में व्यक्त करने की शक्ति भाषा में रूप ग्रहण करती दिखाई देती है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस उपन्यास की भाषा आवरणों और आवेष्टनों को तोड़कर संवेग के सहज स्वरूप को व्यक्त करने का स्वरूप गढ़ती है। ’नीलाचाँद’ की भाषा लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति को मजबूती का नया आयाम प्रदान करती है। बिना धिक्कार की वितृष्णा के प्रतिरोध के शालीन किन्तु दृढ़ भाषा के निर्माण की दिशा में इस उपन्यास के रचनाकार का अवदान स्मरणीय है।
’नीलाचाँद’ के एक और महत्वपूर्ण अवदान की चर्चा करके मैं अपनी बात समाप्त करूँगा। इस उपन्यास में माँ शीलभद्रा के चरित्र की अवतारणा अद्भुत है। हमारे समय में धार्मिकता और धर्मान्धता, आस्था और उन्माद, शील और औधित्य, तप और तृष्णा आपस में दूध और पानी की तरह मिलकर इस कदर एकमेक हो गए हैं कि सब कुछ गड्डमड्ड हो गया है। धर्म के नाम से हमारे समय का भारतीय बुद्धिजीवि इतना डरा हुआ है कि कहने लायक नहीं। उसे भय है कि धर्म के बारे में कुछ कहते ही उसकी बौद्धिकता विनष्ट हो जायेगी। वह न तो धर्म के पाखण्ड का प्रतिकार कर पा रहा है न उसकी शक्ति की अम्यर्थना ही। ऐसे समय में शिव प्रसाद सिंह ने माँ शीलभद्रा की प्रतिष्ठा के माध्यम से धर्म और राजनीति के अन्तर्सम्बन्ध की जिस उच्चता का निदर्शन प्रस्तुत किया है, वह अभ्यर्थनीय है। बौद्ध धर्म के पतन के प्रसार के प्रतीक वज्रयानियों के पाखण्ड की जैसी भर्त्सना जिस साहस से उन्होने की है, वह अभिनन्दनीय है। गन्दा धर्म और गन्दी राजनीति का गठजोड़ समाज को किस कदर पतन के गर्त में ले जाता है, इसका उदाहरण इस उपन्यास में कर्ण की राजसत्ता और वज्रयानियों की धर्म सत्ता के कुत्सित भोगवाद में बड़ा स्पष्ट व्यक्त होता है। इसी तरह लोक मंगलकारी धर्म और लोकमंगलकांक्षी राजनीति के संयोग से अभ्युन्नत समाज के विकास का मार्ग माँ शीलभद्रा और कीर्तिवर्मा की पारस्परिकता में प्रकाशित होता है। लोकहित में धर्म की प्रतिष्ठा ’नीलाचाँद’ में प्रतिष्ठित है। माँ शीलभद्रा के व्यक्तित्व में समाहित अतिमानवीय शक्तियों की अभिसन्धि, असहाय, पीड़ित जनों के प्रति उनकी अगाध करूणा और लोकहित में तत्पर राजशक्ति को उनका संरक्षण नीलाचाँद की चरित्र योजना की महत्तम उपलब्धि है। अध्यात्मशक्ति, राजशक्ति और जनशक्ति के संतुलन का उजास ’नीलाचाँद’ का अपना उजास है।
’नीलाचाँद’ को पढ़ते हुए कीरत के राजनीतिक मूल्यों को स्पृहणीय सम्मोहन के बीच हमें अपने महान लोकतंत्र के पाखण्ड की प्रवंचना की और यातना की बराबर याद आती रहती है। किसी रचना को पढ़ते हुए हमें अपने समकालीन जीवन के दंश की चुभन अगर तीव्रता में अनुभव होती है, तो यह भी यथार्थ जीवन बोध को जागृत करने की एक रचनात्मक प्रणाली है। इस प्रणाली का निदर्शन इस उपन्यास में साफ-साफ दिखाई देता है। शिव प्रसाद सिंह रचनात्मक रूढ़ियों के अनुवर्ती रचनाकार कदापि नहीं है। रचनात्मक जगत में अभिव्यक्ति और अभिव्यंजना के नये आयामों का संधान उन्हे हमेशा अभिप्रेय रहा है। इस दिशा में ’नीलाचाँद’ उनके प्रयोगो की प्रशस्त प्रयोगशाला है।
मित्रो, मैं जानता हूँ, हमरे समय में किसी से भी, कोई भी सवाल पूछना बहुत बड़ा गुनाह है। क्या करूँ, बार-बार सजा पाने के बावजूद बान नहीं बदलती सो लाचारी है। गुस्ताखी माफ करने की अपील के साथ मैं आपसे पूछना चाहता हूँ, क्या आपकी आँखो में धधकती किसी चिता की लपट बेचैन करती है। अन्याय, अत्याचार के आगे असहायता में खोये अपने किसी प्रिय व्यक्ति की, अपनी किसी प्रिय वस्तु की, अपने किसी विश्वास की, अपने किसी सँकज्प की, अपने किसी सपने की, अपनी किसी विरासत की कोई चिता, किसी चिता की विकराल स्मृति आपको उन्मथित करती है। यदि हाँ, तो ’नीलाचाँद’ निश्चय ही आपको एक कथा से अधिक मालूम पड़ेगा। कथा के कुतूहल से अधिक एक आश्वासन आपकी बेचैनी को अपने पार्श्व, परिपार्श्व में सहलता आपको खड़ा मिलेगा। संभवतः यही किसी साहित्यिक रचना की चरितार्थता है। साहित्य से हमें क्या चाहिए, बस यही, अपने भीतर के विश्वास के बल के लिये एक उत्प्रेरणा, जो यातना की, अवसाद की जटिल घेरेबन्दी में अफनाते आदमी से कह सके कि,- मैं तुझे लाँघ जाऊँगा।
सम्पर्क
डा. उमेश प्रसाद सिंह
प्राचार्य
माँ गायत्री स्नातकोत्तर महिला महाविद्यालय
हिंगुतरगढ़-चन्दौली-232105
मो0- 9450551160










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