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Tuesday, July 14, 2026

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कृष्ण जन्माष्टमी: ब्रजवासी शॉपिंग सेंटर की तरफ से दही मटकी फोड़ का हुआ आयोजन


चंदौली। कृष्ण जन्माष्टमी पर नगर के जिला पंचायत कार्यालय के परिसर में ब्रजवासी शॉपिंग सेंटर के मैनेजिंग डायरेक्टर झंमेजय सिंह की तरफ से गुरुवार को दही मटकी फोड़ कार्यक्रम का आयोजन किया गया । जिसका उद्घाटन मुख्य अतिथि ब्लाक प्रमुख संजय सिंह बबलू व विज़डम एजुकेयर की डायरेक्टर रूबी सिंह द्वारा फीता काटकर किया गया।

कार्यक्रम का उद्धाटन करते मुख्य अतिथि

कार्यक्रम में 20 फीट की ऊंचाई पर बांधे गये दही की मटकी को युवाओं ने चार लेयर बना कर जय कन्हैया लाल की नारा बोल कर तोड़ दिया। जिला पंचायत कटरे में आयोजित दही हांडी कार्यक्रम को देखने के लिए शाम से ही सैकड़ों की संख्या में महिला पुरुष जमे रहे । जबकि कार्यक्रम की शुरुआत शाम 7 बजे किया गया। इस दौरान श्री कृष्ण भगवान की झांकी के साथ पूरे परिसर को झालर और विभिन्न प्रकार के लाइटों से सजा दिया गया था।

जिसे देखकर लोग प्रफुल्लित हो उठे । वही ब्रजवासी शॉपिंग सेंटर की तरफ से लकी ड्रा का आयोजन किया गया। जिसमें एजीएम कोर्ट के कर्मचारी का मथुरा वृंदावन का टूर पैकेज निकला। इस दौरान अनिल सिंह, संतोष सिंह प्रदीप यादव, हिटलर सिंह, अश्विन कुमार, विक्की यादव, राम प्रकाश सिंह,प्रिया तिवारी,आँचल पांडेय, पीएन सिंह, दीलिप पासवान,आदि लोग उपस्थित रहे।

अकबरपुर जियारत को जा रहा पूरा परिवार सड़क हादसे में हताहत

सड़क दुर्घटना में शिकार लोगों के बड़गांवा स्थित आवास पर रोते बिलखते परिजन।
सड़क दुर्घटना में शिकार लोगों के बड़गांवा स्थित आवास पर रोते बिलखते परिजन।

एक के मौत की पुष्टि, मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका

Young Writer, चहनियां। बलुआ थाना क्षेत्र के मारूफपुर पुलिस चौकी अन्तर्गत बड़गांवा गांव निवासी पूर्व फौजी इसरार अहमद की पत्नी, बेटा, बहु, पौत्र, एक पड़ोसी व ड्राइवर सहित कुल दस लोग जियारत के लिए निजी बोलेरो गाड़ी से अकबरपुर के किछौछी शरीफ रवाना हुए थे। मकदुम शाह अकरम के दरगाह जाते समय मजार से करीब बीस किमी पहले ही सड़क हादसे में बोलेरो सवार सभी लोग बुरी तरह से घायल हो गए। इसमें अशरफ उर्फ छोटू के मौत की पुष्टि हो गई है अन्य कई लोगों के मौत की सूचना प्राप्त हो रही है। समाचार लिखे जाने तक मृतकों की संख्या आधिकारिक रूप स्पष्ट नही हो सकी है।
बताते हैं कि बड़गांवा गांव निवासी इशरत अहमद को छोड़कर उनके परिवार से उनकी पत्नी अफसरी बेगम(57), उनका छोटा पुत्र अशरफ उर्फ छोटू (38), बड़ी बहु बेबी (37), छोटी बहु सादिया (33वर्ष), सबसे छोटा पुत्र जीशान (22), पौत्र अनस (8), अमन(6), शिफा(4) व उनकी पड़ोसी सैफून (53वर्ष) पत्नी फारूख गुरूवार की अलसुबह करीब 04ः15 बजे सढान निवासी पप्पू (40वर्ष) के बोलेरो गाड़ी से अकबरपुर के किछौछी शरीफ स्थित मकदुम शाह अकरम की दरगाह पर जियारत करने के लिए निकले। करीब तीन घंटा की दूरी तय करने के बाद लौटोरवा पुलिस चौकी के पास पहुंचें ही थे कि विपरीत दिशा से आ रहे ट्रक व बोलेरो की सीधी भिड़न्त हो गई। भिड़न्त इतनी भयावह थी कि बोलेरो के परखचे उड़ गए। घटनास्थल पर उमड़ी भीड़ ने जेसीबी की मदद से बूरी तरह से घायल सभी बोलेरो सवारों को बाहर निकाला। जिसमें असगर उर्फ छोटू के मौत की पुष्टि हो गई है। शेष घायलों में से भी कई के मृत्यु का समाचार होने की बात परिजनों द्वारा बताई जा रही है, लेकिन समाचार लिखे जाने तक आधिकारिक रूप से अन्य मौतों की पुष्टि नहीं हो पाई है। घटना की खबर पाकर इशरार अहमद अपने नाते रिश्तेदारों के साथ सुबह करीब 7ः30 बजे रवाना हो गए। वहीं उनके सबसे बड़े पुत्र अरशद जो कि जौनपुर में पुलिस कांस्टेबल है वो भी करीब 10 बजे तक घटनास्थल पर पहुंच चुके है। इधर एक ही परिवार के करीब दर्जन भर लोगों के साथ हुई दुखद घटना से नाते रिश्तेदारों का रो रोकर बुरा हाल हो गया है। हादसे में शिकार लोगों के घर ग्रामीणों व नाते रिश्तेदारों की भीड़ जमा हो रही थी।

एसपी चंदौली ने छह इंस्पेक्टर व छह सब-इंस्पेक्टर का किया तबादला

तबादला

Young Writer, चंदौली। जनपद में कानून व्यवस्था की बेहतरी को एसपी अंकुर अग्रवाल ने एक बार फिर महकमे में बड़ा फेरबदल किया है। क्रम में गुरुवार एसपी ने जनपद में तैनात 16 निरीक्षक और उपनिरीक्षकों के कार्यक्षेत्र में बदलाव किया है। इसमें आठ इंस्पेक्टर और इतने ही दारोगा शामिल हैं। पांच चौकियों पर नए प्रभारियों की तैनाती दी गई है।
पुलिस अधीक्षक ने प्रभारी मिर्जा रिजवान अली बेग को पुलिस लाइन से चौकी प्रभारी दुलहीपुर, राकेश यादव को पुलिस लाइन से चौकी प्रभारी कचहरी थाना सदर, प्रियंका सिंह को पुलिस लाइन से थाना मुगलसराय, शिवानंद वर्मा को चौकी प्रभारी भूपौली से चौकी प्रभारी अमदहा, जलीलपुर चौकी प्रभारी कृष्ण कुमार को थाना मुगलसराय, दिलीप श्रीवास्तव को चौकी प्रभारी जलीलपुर, अमित सिंह को थाना अलीनगर से चौकी भूपौली और मनेश शंकर द्विवेदी को यातायात से थाना शहाबगंज भेजा गया है। वहीं आठ निरीक्षकों का तबादला भी किया है, जिसमें निरीक्षक जय सिंह को थाना चकिया से अपराध शाखा चकिया, धर्मेंद्र कुमार को शहाबगंज से प्रभारी जन शिकायत, श्रीकांत पांडेय को थाना अलीनगर से निरीक्षक अपराध थाना अलीनगर, महमूद आलम अंसारी को मुगलसराय से अपराध शाखा विवेचना सेल, संतोष श्रीवास्तव को प्रभारी जनशिकायत से अपराध शाखा विवेचना सेल, हंसलाल यादव को प्रभारी चुनाव सेल से अपराध शाखा विवेचना सेल, मधूप सिंह को प्रभारी एंटी रोमियो के साथ प्रभारी चुनाव सेल और अरविंद यादव को अपराध शाखा विवेचना सेल से सीओ कार्यालय मुगलसराय भेजा गया है।

स्वतंत्रता दिवसः पूर्वांचल कम्प्यूटर संस्था में धूमधाम से मना अमृत महोत्सव 

पूर्वांचल कम्प्यूटर में मुगलसराय विधायक को स्मृति चिह्न भेंट करते रामचंद्र यादव।
पूर्वांचल कम्प्यूटर में मुगलसराय विधायक को स्मृति चिह्न भेंट करते रामचंद्र यादव।

Young Writer, चंदौली। आजादी के 75वीं वर्षगाठ तथा 76वें स्वतंत्रता दिवस के महापर्व के अमृत महोत्सव पर पूर्वांचल कम्प्यूटर के प्रांगण में ध्वजारोहण किया गया। इसके बाद राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत गया गया। स्वतंत्रता दिवस समारोह में मुख्य अतिथि मुगलसराय विधायक रमेश जायसवाल द्वारा भारत माता की उद्धघोष व माल्यापण के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। शहीदों तथा स्वतंत्रता में भाग लिए महापुरुषों तथा गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया गया। वीर शहीदों की गौरव गाथा, प्रमुख घटनाओं व देश के विभाजन में देश की पीड़ा को जीवन्त जानकारी देते हुए संस्था के छात्र-छात्राओं को देश के स्वतंत्रता में कुर्बान हुए शहीदों तथा स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने तथा उनके प्रति देशवासियों की जिम्मदारी एवं दायित्व का बोध कराया। 

इस दौरान संस्था के छात्र-छात्राओं द्वारा राष्ट्रगीत, नृत्य तथा स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी प्रमुख घटनाओं जैसे-1857 की क्रान्ति, चम्पारण आन्दोलन, जलियावाला बाग हत्या काण्ड, असहयोग आन्दोल, चौरी चौरा काण्ड, काकोरी काण्ड, सविनय अवज्ञा, नमक सत्याग्रह, भारत छोडो आन्दोलन आदि घटनाओं मंचन किया। अन्त में सस्था के प्रबन्धक रामचन्द्र द्वारा देश के अमर शहीदों को नमन करते हुए उन्हें याद किया।  अखण्ड भारत के अनेकता में एकता तथा तिरंगे के लिए सभी नागरियो को तैयार रहना चाहिए, जो हमे अपने देश भक्तों तथा देश प्रहरियों द्वारा प्रदान की गयी है। कार्यक्रम में डा. महेन्द्र जायसवाल, संजय कन्नौजिया, विशाल तिवारी, श्रीकान्त विश्वकर्मा, धर्मवीर कुमार, रविकान्त, रामभरोष, अवधेश, आनन्द, श्रीकान्त, केशव कुमार, कौशल कान्त, सुनील कुमार, सना, हेमलता, राहुल तिवारी, सतीश कुमार सहयोंग रहा। अध्यक्षता सुजीत सिंह ने की।

किंवदन्तियों में कीनारामः इतिहास और लोक स्मृति

किंवदन्तियों में कीनाराम‚ डा. उमेश प्रसाद सिंह

Young Writer, साहित्य पटल। ललित निबंधकार डा. उमेश प्रसाद सिंह की कलम से

इतिहास निकटतर और दूरतर अतीत की घटनाओं, चरित्रों और सम्बन्धित विवरणों का साक्ष्यों के आधार पर निरूपण करता है। इतिहास तथ्यों का संग्रह करता है। संग्रहीत का विश्लेषण करता है। विविध सन्दर्भों में उसकी व्याख्या करता है। इतिहास का आधार तथ्य है। तथ्य का मतलब इतिहास के साक्ष्य हैं, जो अवशेष किसी न किसी रूप मे अब भी सुरक्षित है। सुरक्षा का सवाल संरक्षण से जुड़ा सवाल है। समय के प्रवाह में बहुत सी चीजें बनती और मिटती रहती है। बहुत-सी चीजें संरक्षण की सुविधा को पा लेने के कारण बहुत समय तक मिटने से बची रहती है। बहुत-सी चीजें संरक्षण के अभाव में बहुत जल्दी मिट जाया करती हैं। साक्ष्यों का संरक्षण सें बहुत गहरा सम्बन्ध है। प्रायः संरक्षण के उद्योग सत्ता की शक्तियों पर निर्भर करते हैं। संरक्षण करने का चुनाव राजसत्ता की रूचियों, प्रवृत्तियों और उसके हितों से जुड़ा होता है। जिसे हम इतिहास कहते है, समझते है वह अधिकंाश राज सत्ता से जुड़ी रूचियों, प्रवृत्तियों और उनके उत्थान-पतन से सम्बन्धित विवरणों का समुच्चय अधिक है। प्रसंगतः कुछ अवान्तर सन्दर्भ भी जुड़ जाते है, जो राजशक्ति को अपनी प्रभावशाली उपस्थिति से प्रभावित करने की सामर्थ्य से संवलित होते हैं।

राजसत्ता के केन्द्र में अधिष्ठित पुरूषों के यु़द्धों संघर्षों, उनके सपनों उनकी मान्यताओं और स्थापनाओं को इतिहास अधिक प्रश्रय देता है। इतिहास की आँख सत्ता के केन्द्र की तरफ खुलती है, और अधिकाधिक वहीं टिकी रहती है। तिथियों और स्थानों के साथ उनकी गतिविधियों का गहन अवलोकन और निरीक्षण करती है। इतिहास राजपुरूषों के प्रेम प्रसंगो और आन्तरिक कलह क्रियाओं का भी विवरण संयोजित करता है। इतिहास तिथियों और स्थानों के साथ उल्लिखित घटनाओं के लिये अपनी सत्यता का दावा करता है। उसका दावा गलत नहीं है। मगर यह भी सच है कि अपने समय की सारी सचाइयॉ साक्ष्यों के भरोसे ही नहीं रहती हैं। बिना साक्ष्य के भी जीवन -जीवन की सचाइयों का विपुल विस्तार फैला होता है। इस विस्तार के बाहर व्यापक जनजीवन का बचा हुआ सच लोक-स्मृति में सुरक्षित और संरक्षित रहता है।

इतिहास का संरक्षण प्रायोजित होता है। लोक स्मृति का संरक्षण सहज होता है। साहित्य और कला के अन्य माध्यम लोकस्मृति की ही अभिव्यक्तियाँ हैं। इन अभिव्यक्तियों की अर्थवत्ता इतिहास पर आश्रित नहीं है। इतिहास के सापेक्ष्य आधार पर इन अभिव्यक्तियों को परखने की धारणा मूलतः अन्यायपूर्ण अवैज्ञानिक अवधारणा है। इसीलिये कि लोकस्मृति स्वयं में इतिहास के समानन्तर एक स्वायत्त सत्ता है। यह इतिहास के विकल्प की सत्ता है। यह इतिहास के प्रतिरोध की सत्ता है। इसकी सत्ता व्यापक जनजीवन के विस्तार और गहराई से संवलित सत्ता है। इसकी सचाई और अर्थवत्ता के व्यापक निहितार्थ है, जो व्यापक जनजीवन की अपेक्षाओं को चरितार्थ करता है।

लोकस्मृति इतिहास का पूरक भी है, इतिहास का प्रतिरोध भी है, इतिहास का प्रतिपक्ष भी है।
लोकस्मृति की व्यापक भूमिका के सन्दर्भ में विचार करने पर हम पाएंगे कि कोई भी साहित्य रचना, लोक में सुरक्षित कोई भी किंवदन्ती या लोक में प्रतिष्ठित और पूजित कोई भी जननायक इसलिए कम महत्वपूर्ण नहीं हो जाता कि उससे सम्बन्धित वर्णन इतिहास के वर्णन से मेल नहीं खाते या इतिहास में उनकी वैसी स्थिति नहीं दिखती या इतिहास में उनकी उपस्थिति नहीं होती। इतिहास में परमर्दिदेव के सामान्य से सामन्त और सैनिक आल्हा-ऊदल का लोकस्मृति में वीरनायक के स्पृहणीय गौरव को पाकर लोकचित्त में आदर के आसन पर अधिष्ठित हो जाना अकारण नहीं कहा जा सकता। विक्रमादित्य और राजाभोज की न्याय प्रियता और प्रजावत्सलता की कहानियाँ जाने कबसे केवल इतिहास की मुखापेक्षी नहीं रह गई हैं। वे इतिहास की सीमाओं को अतिक्रमण करके लोकस्मृति की व्याप्ति का शंखनाद कर रही हैं। महाराणा प्रताप और झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई का स्वाभिमान और देशप्रेम इतिहास की सरहद को उलाँघ कर लोकस्मृति के विपुल विस्तार में गुंजित है। निकटतम इतिहास के महानायक गाँधी के आख्यान इतिहास के अध्यायों से अपने पाँव निकाल कर लोक की आराधना के विषय बन चुके हैं। उनके देशप्रेम, बन्धुत्व की उदात्त भावना और व्यापक मनुष्यता के प्रति गहन निष्ठा के आत्मीय सरोकार लोकस्मृति के अनन्त आकाश में किस्सों के पंख पसार कर ऊँची उड़ानें भर रहे हैं। बाबा कीनाराम की अपार करूणा की कथाएँ और उनके अत्याचार और अन्याय के प्रबल प्रतिरोध के किस्से लोकस्मृति की गहराई में पैठकर अपनी सुगन्धि का प्रसार करते मिलते हैं।
इतिहास का अपना अलग अनुशासन है और स्मृति की अपनी अलग मर्यादाएँ हैं। अध्ययन, चिन्तन, विचार, विश्लेषण और सृजन की भिन्न-भिन्न शाखाएँ मनुष्य जीवन के विस्तार और उसकी गहराई को जानने-समझने के उद्योग का परिणाम हैं। अलग-अलग अनुशासनों की भिन्नता के बावजूद सभी के केन्द्र में मनुष्य का जीवन है। कोई भी विधा या कोई भी अनुशासन अपने आप में पूर्ण नहीं है। मनुष्य जाति के जीवन के रहस्यों को समझने के सन्दर्भ में तो सारी विधाएँ और सारे अनुशासन अपने महत उद्योग के बावजूद छोटे पड़ जाते हैं। मनुष्य जीवन के चिरन्तन विकास और उसकी मर्यादाओं की सजीव अभिव्यक्ति लोकस्मृति में सहज रूप में सबसे अधिक मिलती है। लोकस्मृति जीवन के मूल्यों के विविध रगों की सबसे बड़ी चित्रशाला है। कीर्तिशाला भी। लोकस्मृति में सन्तो की कीर्तिकथाएँ हमेशा से संरक्षित है। इसलिये कि सन्त सर्वदा से ही लोक के संरक्षक है। बाबा कीनाराम का लोक संरक्षक का स्वरूप बड़ा ही भास्वर है। राज्य और लोक के बीच सनातन द्वन्द्व मौजूद है।

राज्य मनुष्य जाति के लिये एक अपरिहार्य बुराई है, जिसे उसको स्वीकार करना ही पड़ता है। राज्यसत्ता मनुष्य समाज की विवशता है, मजबूरी है, उसकी ऐच्छिकता नहीं। लोकसत्ता प्राकृतिक है। राज्यसत्ता निर्मित सत्ता है। वह प्रयत्न निर्मित है। लोकसत्ता शुद्ध सत्ता है। राजसत्ता विकारग्रस्त सत्ता है। राज्य का लोक के साथ सम्बन्ध भावनापूर्ण नहीं है, स्वार्थपूर्ण है। हार्दिक नहीं है, छलपूर्ण है। पाखण्डपूर्ण है। राज्य लोकहित का दिखावा करके लोकशासन का अधिकार प्राप्त करता है। लोकसत्ता राजसत्ता के प्रति समर्पण करती है। राजसत्ता उसके समर्पण से लाभ लेती है। वह लोकसेवा के स्थान पर लोकशासन को वरीयता देकर छल करती है। लोकसत्ता राजसत्ता के छलपूर्ण व्यवहार से आहत होती है, जिससे संघर्ष का सूत्रपात होता है। संघर्ष का सूक्ष्य स्वरूप इनके बीच हमेशा विद्यमान रहता है। कभी उभर कर सतह पर आ जाता है कभी भीतरी तहों में आन्दोलित रहता है। चूँकि राजसत्ता एक व्यवस्था है, जिसमें रूढ़ियाँ और खामियां स्वाभाविक रूप से उपजती रहती हैं। प्रभुत्व और लोभ से प्रेरित राजव्यवस्था में लोकसत्ता के प्रति क्रूरता और दमन की प्रवृत्तियाँ मौजूद ही रहती हैं। लोकसत्ता का इन प्रवृत्तियों के प्रति प्रतिरोध हमेशा किसी न किसी रूप में विद्यमान रहता है। इसलिए इनके बीच द्वन्द्व हमेशा सक्रिय रहता है। सन्त पुरूष के चरित में कोई लोभ नहीं होता। उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं होता है। उसका जीवन त्याग और परहित के केन्द्र पर गतिशील होता है। इसलिए वे हमेशा लोकसत्ता के सहायक और संरक्षक के रूप में लोक स्मृति में प्रतिष्ठित होते हैं। बाबा कीनाराम का चरित लोक के संरक्षक के रूप में लोकस्मृति में संरक्षित है।

बाबा कीनाराम का चरित इतिहास की भी धरोहर है। लोकस्मृति में उनकी गौरव गाथाओं की गूँज उसके सीमान्तों में गुंजित है। काशी नरेश महाराज चेत सिंह की अहमन्यता के बिडम्बन की कथा और औरंगजेब के अत्याचारी विचारों के भर्त्सना के आख्यान इतिहास में अविस्मरणीय अध्याय की तरह सुरक्षित हैं। उनकी प्रस्तुति यथोचित स्थान पर उल्लिखित होगी। जीवन की आरंभिक अवस्था में ही बाबा कीनाराम का लोक संरक्षक का स्वरूप स्पष्ट और ऊर्जस्वित रूप में दिखाई पड़ने लगता है।

बाबा की विवाहिता कात्यायनी देवी के देहावसान के कुछ ही दिनों बाद उनकी माता मनसा देवी का भी इहलोक से प्रयाण हो गया। उसके बाद उसी वर्ष में थोड़े ही दिनों के अन्तराल पर पिता अकबर सिंह की भी जीवनयात्रा पूर्ण हो गई। अब वे अपने किशोरवय में ही सारे लौकिक दायित्वों से मुक्त होकर परमपथ की यात्रा पर अग्रसर हो चले। बाबा का सहज वैराग्य में लीन चित्त परिभ्रमण के लिए समुत्सुक हो उठा। अपनी जन्मभूमि रामगढ़ से वे बाहर निकल पड़े। बाबा इस वसुधा के विपुल विस्तार में विचरण करने लगे। वे तो जन्मसिद्ध महापुरूष थे। उनके अन्तस्तल में अनन्त की विभुता का वैभव विराजित था। वे आमोदपूर्ण थे। अपने गाँव से निकलकर बाबा कीनाराम भ्रमण करते हुए कई जगहों पर ठहरकर रमते रहे। इन स्थानों में महुअर, परानपुर, नईडीह और मारुफपुर उल्लेखनीय हैं। इन गाँवों में उनके ठहरने के स्थान पर आसन की पूजा का प्रबन्ध रखा गया। अब भी इन स्थानों पर वैष्णव मठ विराजमान हैं।

करुणा का उज्ज्वल उपहार
बाबा कीनाराम विचरण करते हुए गाजीपुर जनपद के कारो गाँव से गुजर रहे थे। अब यह गाँव बलिया जिले के अन्तर्गत आता है। अपनी यात्रा में बाबा ने मार्ग में एक स्त्री को विलपते-विलखते देखा। वे वहीं ठहर गए। उस स्त्री के करुण रुदन से द्रवित होकर उसके पास करुणार्द्र स्वर में बाबा ने उसके दुख का कारण पूछा।
‘‘माता इस कदर काहे विलाप कर रही हो। तुम्हारे दुख का क्या कारण है। मुझे निःसंकोच होकर बताओ। मैं यथाशक्ति तुम्हारे दुख को दूर करने का उपाय करूँगा।’’
उस स्त्री ने आँसुओं में डूबा अपना मुँह ऊपर उठाकर देखा। उसके सामने संक्षिप्त वस्त्र में एक युवक साधु खड़ा था। स्त्री अपने दुख से व्यथित थी। जो व्यक्ति उसे सहायता देने की अनुकम्पा कर रहा था, उसकी दृष्टि में वह खुद असहाय लग रहा था। कोई समर्थ व्यक्ति होता उसकी दृष्टि में तो जरूर उसे कुछ आशा बँधती। वह दुख के आवेग में झल्ला उठी।
‘‘जाओ बाबा, तुम माँगो खाओ। हमारी मुसीबत के बीच न पड़ो। इसमें तुम कुछ कर न पाओगे।’’
बाबा नाराज नहीं हुए। क्रोधित नहीं हुए। उस स्त्री का वैसा कहना अनुचित नहीं था। बल्कि उसकी उपेक्षा से उन्होंने उसके दुख के कारण की गंभीरता का अनुमान किया। उनका चित्त और अधिक दयार्द्र हो उठा।
‘‘नहीं, माँ तुम्हे इस तरह दुखी छोड़कर मैं आगे नहीं बढ़ सकता। तुम्हारा दुख चाहे जैसा भी हो मैं उसे दूर करके ही जाऊँगा।’’
बाबा के वाणी की दृढ़ता से स्त्री के मन में ढाढ़स का संचार हुआ। ‘हरि अनाथ के नाथ’ की भावना का उद्रेक हुआ। साधुओं की चामत्कारिक शक्तियों का स्मृति में उदय हुआ। वह बाबा की दयार्द्रता से विह्वल हो उठी। दुख मे किसी का सहारा पाते ही मनुष्य का हृदय दुगुने आवेग से उमड़ पड़ता है। उसका कलेजा मुँह को निकल आया। वह पुक्का फाड़कर रो पड़ी। रो-रोकर उसने अपने दुख की कथा सुनाई।
उसने बताया कि गाँव के जमींदार का उसके ऊपर पोत चढ़ गया है। कर्ज की रकम वे अदा नहीं कर पा रहे हैं। सूद बढ़ता जा रहा है। तकादे पर तकादे के बावजूद जब वे जमींदार का उधार नहीं दे पाए तो आज उसने अपने लठैत कारिन्दों से उसके जवान बेटे को अपने दरवाजे धर बुलाया है। उसके हाथ-पाँव बाँधकर उसे लाठियों से बुरी तरह पीट-पीटकर बेदम कर दिया है। उस निर्दय ने बाबा मेरे बेटे को गर्मी की विषैली धूप में तपती जमीन पर पार दिया है। बेटे की यह यातना मुझसे सही नहीं जाती है। मेरा कलेजा फआ जा रहा है। इतना दुख देखने से अच्छा तो मर जाना है। हमारा अपराध हमारी गरीबी है महाराज! गरीबी, जिसका आर-पार नहीं है।

बाबा उसकी बात सुनकर शान्तभाव से बोले। ‘‘तुम दुखी न होओ माता। थोड़ी देर ठहरो। मैं तुम्हारे बेटे को छुड़ाकर लाता हूँ।
उस महिला ने बड़े विश्वास के साथ बाबा की ओर देखा। बाबा जमींदार के दरवाजे की तरफ बढ़ गए।
बाबा निःशंक जमींदार के चबूतरे पर चढ़ गए।
उन्होंने देखा एक युवक अपने ऊपर पड़ी मार की चोटों से बिलबिला कर बेदम जमीन पर पड़ा था। वह जलती हुई जमीन पर नंगे बदन तड़प रहा था। बाबा ने जमींदार की तरफ देखा। वे शान्त किन्तु गंभीर वाणी में बोले, – ‘‘मनुष्य के लिए मनुष्य के प्रति ऐसी क्रूरता शोभनीय नहीं है। आप इस युवक को दया करके छोड़ दीजिए।’’
जमींदार ने बाबा के अभिप्रया की उपेक्षा की। ‘‘नहीं, यह मुमकिन नहीं है। यह दया का पात्र नहीं है। यह बदमाश और कामचोर आदमी है। मेरे पैसे चुकता नहीं करता और काम भी नहीं करता। बुलाने पर भागता है। इसे बिना पैसा वसूले मैं छोड़ूंगा नहीं।’’
‘‘आप साधू हैं इस मामले में मत पड़िए। आपको भोजन, जलपान की जरूरत हो तो मंगा दूँ। आप अपने रास्ते चले जायं, अच्छा होगा।’’
‘‘मैं भूखा नहीं हूँ। मैं भीख नहीं माँगता। अपने लिए मुझे किसी की दया की जरूरत नहीं। मैं परमेश्वर के राज्य का नागरिक हूँ। वहाँ किसी तरह का अभाव नहीं है। वहाँ अन्याय भी नहीं है। अत्याचार भी नहीं है। आप इस बालक को छोड़ दीजिए।’’

‘‘हरगिज नहीं। बिना अपना बकाया वसूले इसे मैं कदापि नहीं छोड़ सकता।’’ जमीदार और अकड़ गया।’’
‘‘तो ठीक है। आप जहाँ खड़े हैं, वहीं अपने पैर के नीचे की जमीन कोड़िये। आपको अपना बकाया भी मिल जायेगा और खोदने का खर्च भी।’’ जमींदार बाबा की दृढ़ता से अवाक रह गया।
पैर के नीचे से मिट्टी हटाई गई। खनखनाहट के साथ सिक्के निकल आए। वहाँ मौजूद सारे लोग सन्न रह गए। जमींदार हाथ जोड़ गिड़गिड़ाने लगा।
‘‘अपने पैसे लीजिए और बालक को छोड़ दीजिए। परमात्मा के विधान में मनुष्य के प्रति दया का भाव ही मंगलकारक है। यही धर्म है। उत्पीड़न पाप है। दया के व्यवहार के लिए प्रभु की तरफ से हमेशा पुरस्कार मिलता है। पाप के लिए किसी पुरस्कार का विधान नहीं है। आगे से आप दया का व्यवहार करेंगे तो पुरस्कार के भागीदार बनेंगे।’’
जमींदार के आदेश से बालक के बन्धन खोल दिए गए। वह दौड़कर आया और बाबा के चरणों में गिर पड़ा। वह उनकी अपार कृपा से कृतकृत्य था।
बाबा ने उसे हाथ पकड़कर उठाया। वे अत्यन्त तीव्रता से उसे अपने साथ लेकर जमींदार के दरवाजे से उतर आए। बाबा के पीछे वहाँ सन्नाटा पसरा था। उदासी और पछतावे की लहरें सन्नाटे के संगीत में सिर धुन रही थीं।

बाबा लौटकर उस महिला के पास पहुंचे। उन्होंने देखा वह अब भी आँचल में मुँह ढाँपकर बेजार रो रही थी। उसे अपने अथाह दुख से त्राण पाने की कोई उम्मीद नहीं थी। बाबा ने आवाज दी, ‘‘माता लो यह अपने बेटे को संभालो।’’
उसे वाणी पर विश्वास न हुआ। उसने मुँह उठाकर देखा। उसका बेटा उसके सामने खड़ा था। वह झटके से उठकर उससे लिपट गई। लिपटकर फफक-फफक कर रोती रही। आँसुओं में उसकी सारी पीड़ा बह गई। मन का सारा मैल निकल गया।
वह बाबा के पैरों में गिर गई। वह अब वह स्त्री नहीं रह गई थी, जो कुछ समय पहले थी। अब उसके हृदय में प्रेम की पुलक थी। उसका विवेक जाग गया था। उसकी असहायता तिरोहित हो चुकी थी। वह जनम की दरिद्र पारस पा चुकी थी। उसने पारस को पहचान लिया था। उसका अनन्त सौभाग्य उसके सम्मुख खड़ा था।
उसका गला भर आया था। अपने सौभाग्य के भावेद्रेक से। बाबा की असीम करुणा के प्रति कृतज्ञता से। वह सोच रही थी, जगत में दीनबन्धु कौन है? अहैतुक कृपा की बरसात करने वाला कौन है?
नहीं, नहीं यह मनुष्य के वश की बात नहीं है। यह मनुष्य से ऊपर बहुत ऊपर उठे चरित का स्वभाव है। मनुष्यता का श्रृंगार करने में वे ही पुरूष समर्थ होते हैं जो सारी मानवीय क्षुद्रताओं से पार जा चुके होते हैं।
उसके मन में प्रार्थना उमड़ने लगी। प्रार्थना पवित्र मन का उद्गार है। वह वृद्धा संस्कृत नहीं जानती थी। जानती तो जरूर वह प्रार्थना में यह श्लोक बोलती-

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव।।

संस्कृत क्या वह तो भाषा भी ठीक से नहीं जानती थी। मगर भाव तो बिना भाषा के भी व्यक्त होते ही हैं। वह भाव में डूब रही थी। भाव उससे बह रहा था। उसके रोम-रोम से बह रहा था।
वह हाथ जोड़कर बाबा से बोली, ‘‘महाराज, केवल बच्चे को जन्म देने के कारण ही कोई माता-पिता नहीं होता। असली माता-पिता तो वह है, जो विपत्ति से रक्षा करता है। असली माता-पिता तो वह होता है, जो भरण-पोषण में समर्थ होता है। असली माता-पिता तो वह होता है, जो बालक के उत्थान का मार्ग प्रदान करता है। अब मेरे बच्चे के असली माता-पिता और माता-पिता से बढ़कर सब कुछ आप ही हैं। मैं तो वह अभागी माँ हूं जो उसे भरपेट भोजन भी नहीं दे सकती। अब मैं अपने ममता के आश्रय इस विग्रह को आपको सौंप रही हूँ। अब आप इसे अपने साथ ले जायं महाराज! अबसे यह मेरा बेटा नहीं, आपका सेवक है। मैं अपने दिन किसी तरह गुजार लूँगी।’’
हरे यह क्या! बाबा उसकी बात सुनकर भौंचक रह गए। अभी कुछ देर पहले यह स्त्री अपने इसी बेटे लिए इतनी विकल थी। इतनी व्यथित थी। इतना विलाप कर रही थी। अब बेखटक इसने अपने प्राणप्रिय पुत्र को मुझे दे दिया। कितना बड़ा दान है इसका। कितनी महिमामयी है यह देवी। कितना अद्भुत है। बाबा रोमांचित हो उठे।
उन्होंने उस देवी को बहुत समझाया। बहुत तरह से समझाया। मगर वह नहीं मानी। हारकर बाबा को उस बालक को अपने पास रखना पड़ा। अपने साथ लेना पड़ा।
वह लौटकर गाँव की ओर जा रही थी। बाबा उस बालक को लेकर गाँव से बाहर के रास्ते निकल पड़े।

कारो गाँव में अप्रत्याशित रूप में जिस बालक को माँ ने बाबा कीनाराम को सौंपकर अपना जीवन धन्य समझा उस बालक का नाम आगे चलकर बीजाराम हुआ। बीजाराम बाबा कीनाराम की जीवन यात्रा के अन्त तक उनके साथ रहे। वे उनके अनन्य सेवक और प्रधान शिष्य के रूप में औघड़ समाज में प्रतिष्ठित और पूजित हैं। वे बाबा कीनाराम की विभूति के वारिस बने। बाबा कीनाराम के क्रीं कुण्ड पीठ के उनके बाद वे पहले उत्तराधिकारी अधिष्ठित हुए।
बाबा कीनाराम का जीवन चरित जो भिन्न-भिन्न पुस्तकों में वर्णित है, वह सब बाबा बीजाराम द्वारा भोजपत्र पर उनकी हस्तलिपि में लिखित ‘राम कीना कथा’ पर आधारित है।
बीजाराम जी कीनाराम महाराज के सेवक भी थे, सहचर भी और शिष्य भी। वे जीवन भर उनके साथ उनकी छाया की तरह मोजूद थे। वे उनके जीवन की महत्तम उपलब्धियों, अनुभूतियों, स्थितियों और घटनाओं के साक्षी भी रहे और सहभोक्ता भी।
बीजाराम जी बाबा कीनाराम के लिए उनकी करुणा के उज्ज्वल उपहार की तरह उनके साथ शोभित हैं। बीजाराम की माँ के दुख से द्रवित होकर बाबा ने अपनी अलौकिक शक्ति के उपयोग से उनको दुख से छुटकारा दिलाया था। मगर ईश्वरीय अनुकम्पा से अभिसिंचित होकर माँ का हृदय दिव्य अनुप्ररेणा से आपूरित हो उठा था। उन्होंने ईश्वरीय शक्ति का जीवन में लौकिक उपयोग स्वीकार नहीं किया। ईश्वरीय अनुग्रह को प्राप्त करके उन्होंने ईश्वर प्रेम में अपने जीवन को ही समर्पित कर दिया। अपने प्राणप्रिय पुत्र को बाबा की सेवा के लिए अर्पण कर दिया। वह माँ धन्य थी। उनकी महिमा के अभिनन्दन में वाणी श्लथ हो उठती है। उस अद्भुत अलौकिक दृश्य को याद करके हृदय रोमांचित हो उठता है। उस सन्दर्भ के विषय में सोचते हुए अनायास कालिदास के रघुवंश का यह श्लोक बरबस याद हो उठता है-

जनस्य साकेत निवासिनस्तौ, द्वावप्य भूतामभिवन्द्यसत्तौ।
गुरु प्रेदयाधिकनिस्पृहोर्थी, नृपोर्थि, कामादधिकश्च प्रदश्चः।।

बीजाराम की माँ की महिमा विरल है। वन्दनीय है। उनके हृदय की शुचिता अभिनन्दनीय है। उनकी निष्ठा की महत्ता अर्चनीय है। उनके हृदय की सारी पवित्रता और उच्चता ही बीजाराम के विग्रह में फलीभूत होकर लोक में अक्षय कीर्ति का आधार बन सकी। यह सच है कि प्रायः मनुष्य स्वर्ग की स्पृहा करते रहते हैं मगर यह भी सच है कि बहुत से ऐसे महिमावान व्यक्ति पृथ्वी पर अवतरित होते रहते है, जिनकी गरिमा के आगे स्वर्ग हमेशा विनत होता रहता है। महान वही होते हैं जो मनुष्यता का श्रृंगार करके पृथ्वी का गौरव बढ़ाते हैं। इतिहास उनके चरित को अपने हृदयमें धारण करके धन्य होता है। लोक उनकी गाथा को गा-गाकर अपनी वाणी को पुनीत बनाने का निरन्तर उद्योग करता रहता है।

जहाँ पत्थर सुनते हैं-
हाँ, यह सच है। मगर सच भी सबके लिए एक जैसा नहीं है।
क्यों? यह बड़ा बुनियादी सवाल है। सवालों से बचकर निकल जाने के लिए हमने अनगिनत सुविधाएं तलाश ली हैं। सवाल बेचैन करते हैं। मगर आदमी जीवन में बेचैनी से हमेशा बचना चाहता है। बचने की तरकीबें तलाशता रहता है। असल में सच का सम्बन्ध आदमी की जानकारी और अनुभव से जुड़ा हुआ है। व्यक्ति की जानकारी और अनुभव की सीमाएँ हैं। सीमाएँ छोटी हों या बड़ी कोई फर्क नहीं पड़ता। जानकारी और अनुभव की भिन्नता के कारण एक का सच दूसरे के लिए सच साबित नहीं हो पाता। दुनियाँ जिसे सच नहीं मानती यानी उसके लिए जो झूठ है उसके आँखों के आगे घटित होने की स्थिति को वह चमत्कार कहती है। सृष्टि असीम है, सच असीम है। असीम का सीमाबद्ध दृष्टि में घटित हो पाना संभव नहीं। असीम को जानने की प्रक्रिया सीमा के मिटने की प्रक्रिया है। बिना मिटे सच को जानना मुमकिन नहीं है। सच विराट है। सृष्टि विराट है। विराट को जानने के लिए क्षुद्रता की सारी सीमाओं का मिट जाना जरूरी है। सीमाओं के मिट जाने से सब कुछ एक हो जाता है।
सृष्टि का रहस्य अद्वैत के बोध में अन्तर्निहित है। अद्वैत के बोध में ही अभेद की प्रतीति निर्भर है। समूची संसृति में एक ही अन्तर्धारा प्रवाहित है। एक ही तत्व की उपस्थिति उद्भासित है। भिन्नता है मगर भेद नहीं है। जिसके लिए जड़-चेतना में भेद नहीं है, स्त्री’-पुरूष में भेद नहीं है, ऊँच-नीच में भेद नहीं है उसके लिए सृष्टि की व्यापकता विदित है। कामयनी के आरंभिक प्रसंग का यह पद उसी विराट बोध का संकेत देता है-

नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन।
एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतना।।

अद्वैत और अभेद का बोध बिल्कुल एक ही है, केवल शब्दों की भिन्नता है। सबमें एक ही तत्व की विद्यमानता का अनुभव ही अभेद के विवेक का आधार है। जड़ और चेतन को तत्वतः एक जानने वाले की आज्ञा और अनुरोध जड़ और चेतन के लिए भिन्न नहीं रह जाता है। प्रायः कोई भी महापुरूष स्वचालित प्रकृति की व्यवस्था में अकारण या केवल लोकरंजन के लिए हस्तक्षेप नहीं करता। वह जब भी कभी अपनी अलौकिक शक्तियों का उद्घाटन करता है, उसके गहरे अभिप्राय उसमें सन्निहित रहते हैं।
एक बार बाबा कीनाराम विचरण करते हुए गुजरात की मशहूर रियासत जूनागढ़ में पहुँचे हुए थे।
वहाँ पहुँच उन्होंने एक पेड़ के नीचे अपना आसन जमाया। बाबा ने बीजाराम को आदेश दिया कि जाओ भिक्षाटन कर आओ। बीजाराम जी भिक्षा के लिए नगर में गए। उस वक्त जूनागढ़ में मुसलमान शासक का आदेश था कि जो कोई साधु भिक्षा माँगते मिल जाय उसे कारागार में भेज दिया जाय। बीजाराम जी भिक्षा माँगते पकड़े गए। उन्हें पकड़कर सिपाहियों ने जेल में डाल दिया। जेल में पहुँचकर बीजाराम जी ने देखा कि वहाँ पहले से बहुत से साधुओं को कैद कर रखा गया है। सजा के तौर पर सबको चक्की में अनाज पीसने की मशक्कत करनी थी। एक चक्की बीजाराम को भी दे दी गई।
जब बहुत देर तक बीजाराम जी भिक्षाटन से नहीं लौटे तो बाबा कीनाराम ने ध्यान में उनकी खोज की। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि बीजाराम भिक्षा माँगने के अपराध में जेल में डाल दिए गए हैं तो वे खुद भिक्षा के लिए नगर में चल पड़े। बाबा भी भिक्षा माँगते हुए पकड़े गए और जेल में उनेक पास पहुँच गए। नबाब के इस अविचारी कानून से पीड़ित साध्ुाओं की दुर्दशा पर बाबा को बहुत क्षोभ हुआ। उन्होंने नबाब को धर्म की मर्यादा का पाठ पढ़ाने का मन में निश्चय कर लिया।
बाबा कीनाराम के आगे भी अनाज पीसने के लिए एक चक्की रख दी गई। बाबा का कौतुक जाग उठा। अलौकिक शक्ति के उपयोग का उचित अवसर समझकर उन्होंने चक्की को अपनी वाणी में आदेश दिया ‘‘चल रे, चल।’’

उनके आदेश के बाद भी चक्की नहीं चली। बाबा को रोष हुआ। उन्होंने कुबड़ी (टेढ़ी-मेढ़ी छड़ी) उठाकर अपने सामने की चक्की पर ठोंक दिया। वहाँ अद्भुत दृश्य उपस्थित हो गया। एक साथ जेल की सारी चक्कियां अपने आप चलने लगीं। उस समय वहाँ 981 चक्कियां मौजूद थीं। सभी स्वचालित चलने लगी। सबमें अनाज पीसा जाने लगा। देखने वालों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। सारे बन्दी साधु बाबा का ऐश्वर्य देखकर उल्लसित हो उठे और उनकी जयकार करने लगे। सारा कारागार बाबा के जयनाद से दहल उठा।
बड़ी शीघ्रता से नबाब के पास यह खबर पहुँचाई गई। नबाब ने बाबा को तुरन्त दरबार में सम्मान के साथ उपस्थित करने का आदेश दिया।
राजा के अधिकारियों ने बाबा से दरबार में चलने की प्रार्थना की। बाबा राजी हो गए। उन्होंने आदेश दिया ‘‘चलो विजयराम चलते हैं।’’ बाबा बीजाराम के साथ दरबार में पहुँच गए।
दरबार में पहुँचते ही नबाब ने अपने आसन से उठकर बाबा का स्वागत सम्मान किया। उन्हें सम्मानजनक आसन पर विराजित कर पूजा-अर्चना की। अपनी गलतियों के लिए क्षमा माँगी।
नबाब ने एक रत्नों से भरा थाल बाबा के चरणों में रखकर भेंट की।
बाबा ने उसमें से दो-चार रत्न उठाकर मुंह में डाले और थूक दिया। बाबा ने कहा, अरे! ये तो न खट्टे हैं, न मीठे। इनमें तो कोई स्वाद नहीं है।’’
नबाब विस्मित होकर बाबा के चरणों में गिर पड़ा।
बाबा ने नबाब को धर्म का उपदेश किया, ‘‘अपने को श्रेष्ठ और शासक समझने का दम्भ ही अधर्म है। अहंकार के कारण आदमी पतित हो जाता है। मनुष्य की पद मर्यादा से नीचे गिर जाता है। सभी प्राणियों के प्रति दया का भाव रखना धर्म है। असहायों को सहायता पहुँचाना राजा का कर्तव्य है। राजा के लिए समूची प्रजा एक समान है। अपनी प्रजा को पुत्र स्नेह के साथ पालना धर्म है।’’
बाबा का उपदेश पाकर नबाब में धर्मबुद्धि का उदय हुआ। उसे कृतार्थता का अनुभव हुआ। उसने बड़ी विनय के साथ हाथ जोड़कर सेवा का अवसर और आज्ञ माँगी।
बाबा नबाब के भक्तिभाव से प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, ‘‘सेवा करना चाहते हो तो आज से जो भी साधु-महात्मा तुम्हारे राज्य में आएँ उन्हें ढाई पाव सीधा बाँटने का प्रबन्ध करो।’’
‘‘जेल में बन्द सारे साधुओं को तुरन्त मुक्त करके उन्हें सादर भोजन कराओ।’’
नबाब ने सिर झुकाकर बाबा की आज्ञा शिरोधार्य की। तुरन्त राजाज्ञा जारी कर दी।
बाबा ने आशीर्वाद दिया, ‘‘तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा। तुम्हारी वंशवृद्धि होगी।’’
दरबार बाबा के जयनाद से गूँज उठा।
जूनागढ़ के दरबार में, कारागार में, हाट-बाजार में सब जगह बाबा कीनाराम की चर्चा व्याप्त हो रही थी। सारे बन्दी साधु मुक्त कर दिए गए। राजकोष से साधुओं के लिए सदावर्त की व्यवस्था शुरू कर दी गई।

हिंगलाजः देवी के द्वार पर अनुग्रह की बरसात
जूनागढ रियासत में बहुत काल रमण करने के उपरान्त बाबा के हदय में हिंगलाज देवी के दर्शन की उत्प्रेरणा उत्पन्न हुई वे वहाँ से चल पड़े। उन्नत आत्मचेतना से सम्पन्न शक्तियों के बीच भाव संप्रेषण की सूक्ष्य गोपन प्रणाली हमेशा से चलती आई है। बाबा देवी के आमंत्रण पर निकल पड़े। वे कच्छ की खीड़ी के किनारे के रास्ते चल पड़े। अत्यन्त दुमार्ग के कठिन दलदलो को अपनी अलौकिक शक्ति के सहारे पार करते वे देवी के मन्दिर पहुँच गए।
अब यह मन्दिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में लारी तहसील के दूरस्थ पहाड़ी इलाके में एक सँकरी घाटी में स्थित है। यह कराची के उत्तर पश्चिम में 250 कि0मी0 अरब सागर के तटीय प्रदेश में पड़ता है। गुफा मन्दिर हिगोंल नदी के पश्चिमी तट पर मकरान रेगिस्तान के खेरथार पहाड़ियों की एक श्रंखला के अन्त में बना हुआ है।
मन्दिर से थीड़ा दूरी पर बाबा ने धूनी रमाकर अपना डेरा डाल दिया। वे चिन्तन में आत्मलीन हो अभिरमण करने लगे।
बाबा की जरूरतों का जिम्मा एक कुलीन स्त्री ने संभाल लिया था। वे अनाहूत ही आ गई थीं और बाबा के लिए सारी सुविधाओं का बन्दोबस्त बड़ी संजीदगी से करने लगी थीं। नियत समय पर उन्हें जलपान भोजन उपलब्ध करा देना उन देवी ने अपना कर्तव्य निर्धारित कर लिया। वे बहुत ही मनोहर और दिव्य थीं। सौन्दर्य और ममता की अगाध पूंजी उनकी असाधारणता को उद्घोषित करने वाली थी। वे आतीं बाबा को बड़े स्नेह और दुलार से भोजन करातीं, उनकी सारी सुविधाओं को संयोजित करतीं और फिर जाने कहां अन्तर्धान हो जातीं। वे बाबा की सुश्रूषा करके ऐसे मुदित होतीं जैसे माँ अपने बेटे को तृप्त देखकर हुलस उठती है। यह सिलसिला चलता रहा। दिन बीतते रहे।
एक दिन जब दोपहर में वे ममतामयी देवी भोजन लेकर बाबा के सामने पहुँची तो बाबा का ध्यान उनकी तरफ आकृष्ट हुआ। बाबा ने उनके रूप में उनके ऐश्वर्य की गरिमा देखी। उन्होंने उनकी आँखों में उनकी दिव्यता की दमक देखी। उनकी अलौकिक आभा और अपार्थिव ममता की विभूति से बाबा कीनाराम का चित्त पर्युत्सुक हो उठा।
बाबा ने सामने परसे गए भोजन को हाथ नहीं लगाया। उन्होंने विनम्र वाणी में निवेदन किया, ‘‘कृपा करके मुझे आज आप अपना परिचय बताएँ।। आप कौन हैं? किस कुल को सुशोभित करती हैं? इतने दिनों से आप मेरे लिए इतना कष्ट उठा रही हैं, क्यों?

‘‘कष्ट…?’’ देवी ने स्मित हास के साथ कहा, ‘‘आप कैसे कह सकते हैं कि मैं कष्ट उठा रही हूँ। क्या आपको मैं खिन्न दिखती हूं?
‘‘नहीं, कत्तई नहीं। बाबा ने संकोचपूर्वक कहा।
‘‘फिर कष्ट कैसा? कष्ट कैसे? जो कुछ करके आदमी उल्लसित हो उठे उसे कष्ट नहीं आनन्द कहते हैं।’’
‘‘आपके लिए मैं जो कुछ करती हूँ आनन्दित होने के लिए करती हूँ। आपके पास आने से आपकी सेवा कर पाने से मैं आनन्द से ओत-प्रोत हो उठती हूँ महात्मन!’’
‘‘आप भोजन ग्रहण करें।’’ देवी ने अनुरोध किया।
‘‘यह संभव नहीं हो रहा है देवि! मेरा चित्त विभ्रान्त हो उठा है। मैं आपके वास्तविक स्वरूप को जानना चाहता हूँ।’’
‘‘आपकी सेवा मेरा धर्म है। इतना जान लेना कम नहीं है।’’
‘‘मगर क्यों?’’
‘‘इसलिए कि आप मेरे अतिथि हैं।’’

‘‘नहीं देवि! मैं यहाँ किसी और के आमंत्रण पर आया हूँ। उनसे अभी मेरा साक्षात नहीं हुआ। मैं अपने आने का सन्देश उन्हें भेजने की निरन्तर चेष्टा कर रहा हूँ।’’
‘‘अगर ऐसा है तो बड़ा शोचनीय है। यह तो बड़ा भारी अनाचार है, देव पुत्र। यह आतिथेय की मर्यादा का स्खलन है।’’
’’नहीं, नहीं ऐसा मत महिए महीयसी। ऐसा सुनकर मेरे हृदय में ठेस पहँुचेगी। यह आक्षेप उनकी मार्यादा के अनुकूल नहीं।’’
‘‘तो ऐसा भी होना चाहिए क्या? किसी को आमंत्रित करके उसके आने से अवगत न होना अनवधानता नहीं है, क्या? अतिथि के आने का इंतजार और उसके आने से पहले ही उसके स्वागत की सारी तैयारी आतिथेय का धर्म है।’’
बाबा की आँखे वार्तालाप के बीच एक दिव्य दीप्ति से कौंध उठीं। उनके हृदय में अद्भुत शीतल और आह्लादक अनुभूति का संचार हो उठा।
‘‘तो आप…..?
‘‘हाँ मैं वही हूँ। मैं वही हूँ, जिसने आपको बुलाया है। जिसके दर्शन के लिये आप रोज मंदिर मे ंजाते हैं। मैं तो कबसे आपके पास हूँ। आपके साथ हूँ।’’
‘‘बाबा का हृदय अथाह ममता के प्रसाद से कृतार्थ हो उठा। वे गदगद हो उठे।
‘‘अब आपको मन्दिर में जाने की जरूरत नहीं। आप जहाँ भी, जब भी मेरा स्मरण करेंगे मुझे अपने सम्मुख उपस्थित देखेंगे।’’
‘‘मेरा परम सौभाग्य है माता।’’

‘‘अब मुझे अपने पुराने नगर में वापस ले चलो पुत्र! मैं काशी में पुनः लौटना चाहती हूँ। लौटने का समय आ गया है वत्स! अब मैं वहीं निवास करुँगी।’’
‘‘आपकी अपरम्पार कृपा से कृतकृत्य हूँ माता। आपने अपने वात्सत्य का आलम्ब बनाकर मुझे धन्य किया है। माता आप काशी में कहाँ निवास करना चाहेंगी?’’
‘‘मैं काशी के केदार खण्ड में ‘क्रीं कुण्ड’ में निवास करुंगी। आप यात्रा से लौटकर काशी पहुँचेंगे तो मेरे निवास की सब व्यवस्था स्वतः सम्पन्न हो जाएगी। उसके लिए आपकेा विशेष प्रयत्न नहीं करना होगा।’’
‘‘अपने काशी निवास की योजना में मुझे निमित्त बनाने की कृपा करने के लिए मैं खुद को भाग्यवान समझता हूँ, देवि! मेरी प्रणति स्वीकार करें माता।’’
देवी ने अपने दोनों हाथ उठाकर बाबा के सिर पर रख दिया। बाबा का हृदय अद्भुत ऋद्धियों के वैभव से भर उठा। देवी की आँखों से अनुग्रह बरस रहा था। बाबा भींग रहे थे।
आपके यहाँ आने का प्रयोजन पूरा हुआ, देव! अब आप यहाँ से आगे चले जायें। अब से समस्त ऋद्धियां आपकी अनुचर होंगी। आपका परम कल्याण होगा। शुभमस्तु।
बाबा को अपने अलौकिक आशीर्वचन से परिपूर्ण कर देखते ही देखते देवी अन्तर्धान हो गईं। बाबा ने उस स्था पर जगाई अपनी धूनी को ठंडा किया। वहाँ से वे घोड़े पर बैठकर मुलतान की ओर चले गए।

किंवदन्तियों में कीनाराम‚ डा. उमेश प्रसाद सिंह

किंवदन्तियों में कीनाराम पुस्तक का तृतीय अध्याय

गंगा का जलस्तर फिर बढ़ा, बलुआ के तटवर्ती इलाकों में बढ़ी बेचैनी

बलुआ घाट पर डूबा आधा चेंजिंग रूम,शमशान घाट पर चढ़ा पानी
बलुआ घाट पर डूबा आधा चेंजिंग रूम,शमशान घाट पर चढ़ा पानी

Young Writer, चहनियां। गंगा के जलस्तर 18 दिन के बाद फिर बढ़ने लगा है। बिगत तीन दिनों में करीब 50 सेंटीमीटर के ऊपर पानी बढ़ा है। मन्दिर पुनः डूबने के साथ फिर से महिला चेंजिंग रूम आधा डूब गया है। तटवर्ती गांव के ग्रामीणों में फिर से दहशत दिखने लगा है।
गंगा के जलस्तर में 18 जुलाई से पानी धीरे धीरे बढ़ना शुरू हुआ। 11 दिनों तक लगातार बढ़ोतरी के बाद बलुआ स्थित पश्चिम वाहिनीं गंगा तट पर बना मन्दिर पूरा डूबने के साथ महिला चेंजिंग रूम भी डूब गया था। शमशान घाट को पानी अपने आगोश में ले लिया था। 1 अगस्त से पानी के घटने का क्रम शुरू हो गया। करीब चार पांच दिनों में घाट पर बना मन्दिर फिर से दिखने लगा था। दोनों महिला चेंजिंग रूम से पानी काफी नीचे चला गया था। 18 दिन बाद फिर से गंगा जलस्तर में बढ़ोतरी शुरू हो गयी है। गत तीन दिनों में पानी करीब 50 सेंटीमीटर बढ़ा है। बलुआ स्थित पश्चिम वाहिनीं गंगा तट पर बना मन्दिर फिर से पूरा डूबने के बाद दोनो महिला चेंजिंग रूम आधा डूब गया है। पानी घटने पर गंगा तट के किनारे बसे गांव कांवर, महुअरिया, बिसुपुर, महुआरी खास, सराय, बलुआ, डेरवा, महुअर कला, हरधन जुड़ा, बिजयी के पूरा, गणेश पूरा, टाण्डाकला, बड़गांवा, तीरगांवा, हसनपुर, नादी निधौरा आदि गांवों के किसानों व ग्रामीणों ने राहत की सांस ली थी किन्तु फिर से तेजी से जलस्तर बढ़ने से गंगा कटान की चिन्ता सताने लगी है। अब तक उक्त गांवो के किसानों की हजारो एकड़ उपजाऊ जमीन गंगा में समाहित हो चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि पानी का रफ्तार फिर से बढ़ने लगा है। गंगा कटान रोकने का प्रयास केवल हवा हवाई साबित हुई है।

ऐलही काली मंदिर पर मृत मिला अधेड़‚ पारिवारिक कलह बना मौत का कारण

चंदौली पोस्टमार्टम हाउस पर जुटे मृतक परिजन।
चंदौली पोस्टमार्टम हाउस पर जुटे मृतक परिजन।

Young Writer, चंदौली। सैयदराजा थाना क्षेत्र के ऐलही गांव स्थित काली मंदिर के चबूतरे पर गुरुवार की सुबह 40 वर्षीय एक व्यक्ति मृत अवस्था मिला। सुबह मंदिर पर दर्शन-पूजन के लिए गए ग्रामीणों ने काफी देर तक लावारिश पड़े व्यक्ति को देखा तो उसके मुंह से खून निकल रहा था। सूचना पर आसपास के अन्य ग्रामीण भी जमा हो गए। ग्रामीणों ने तत्काल इसकी सूचना थाना पुलिस को दी। ग्रामीणों ने मृतक की शिनाख्त 40 वर्षीय मुन्ना सिंह के रूप में की। पुलिस ने शव का पंचनामा कर अंत्य परीक्षण के लिए जिला अस्पताल भेज आगे की कार्यवाही में जुट गयी।
जानकारी के मुताबिक नहरन कला निवासी शिवमूरत सिंह के पुत्र मुन्ना सिंह 40 वर्ष पारिवारिक कलह की वजह से परेशान चल रहे थे। वह गुरुवार को घर से निकले और किसी तरह ऐलही काली मंदिर पर पहुंचे और वहीं अचेत अवस्था में चबूतरे पर पड़े रहे। काफी देर तक उनके शरीर में कोई हरकत नहीं होने पर गुरुवार की सुबह मंदिर पर दर्शन-पूजन के लिए एकत्रित हुए ग्रामीणों ने किसी अनहोनी की आशंका में पास गए तो देखा कि चबूतरे पर पड़े मुन्ना सिंह के मुंह से खून निकल रहा है। कुछ ही देर में खबर पूरे गांव में फैल गयी और ग्रामीणों की भारी भीड़ मंदिर पर जमा हो गयी। स्थानीय ग्रामीणों ने मृतक की शिनाख्त नरहन निवासी मुन्ना सिंह के रूप में की और पुलिस के साथ-साथ परिजनों को घटना की सूचना दी। कुछ ही देर में स्थानीय पुलिस व मृतक परिजन ऐलही काली माता मंदिर पर पहुंच गए। पुलिस ने शव का पंचनामा कर अंत्य परीक्षण के लिए जिला अस्पताल भेज दिया। मौत की खबर मिलते ही परिजनों में कोहराम मच गया और वे दहाड़े मारकर रोने लगे। ग्रामीणों ने आशंका जाहिर किया कि पारिवारिक कलह से ऊबकर मुन्ना सिंह ने किसी विषाक्त पदार्थ का सेवन कर लिया होगा, जिससे उनकी मौत हो गयी। मृतक मुन्ना सिंह अपने पीछे पत्नी, एक पुत्र व पुत्री छोड़ गए।

अमृत महोत्सवः जनपद पुलिस ने निकाला तिरंगा यात्रा

चंदौली। आजादी की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में अमृत महोत्सव के रुप में मनाया जा रहा है। इस क्रम में विशेष सप्ताह के आखिरी दिन बुधवार को यूपी-112 के पीआरवी वाहनों द्वारा पुलिस लाइन से तिरंगा मार्च पास्ट निकाला गया है। उक्त तिरंगा मार्च पास्ट का उद्देश्य आम जनमानस में राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करना व उनमें सुरक्षा व शान्ति हेतु पुलिस के प्रति विश्वास कायम रखना है।

दूसरी ओर आजादी के अमृत महोत्सव में अपनी सहभागिता देने के लिए बुधवार को कोतवाल संतोष सिंह के नेतृत्व में कोतवाली पुलिस ने भारत माता की जय के साथ नगर में तिरंगा यात्रा निकाला और नगर भ्रमण करते हुए कोतवाली पर जाकर समाप्त हुआ। इस दौरान कोतवाल ने नगरवासियों से हर घर में तिरंगा फहराने की अपील की गई। तिरंगा यात्रा के दौरान एसआई धर्मेंद्र शर्मा, अरविंद यादव, संतोष सिंह, चंद्र शेखर यादव आदि लोग उपस्थित रहे।

धानापुर प्रतिनिधि के अनुसारः धानापुर थाना प्रभारी विनय प्रकाश सिंह के नेतृत्व में पुलिस कर्मियों ने बुधवार को  तिरंगा यात्रा निकाला। पुलिसकर्मी हाथों में तिरंगा लेकर पुलिस कस्बे का पैदल भ्रमण किया। इस दौरान देशभक्ति के नारों से माहौल देशभक्ति हो गया। लोग भी भारत माता की जय का नारा लगा रहे थे।इस दौरान उन्होंने कहा कि इस वर्ष 75 वीं वर्षगांठ पर पूरा देश अमृत महोत्सव मना रहा है। तिरंगा हमारे देश की आन बान शान और गौरव का प्रतीक है। जो हम सभी में राष्ट्रवाद की भावना जागृत करता है। इस दौरान उपनिरीक्षक सलीम खान,रामधनी,अमित सिंह सहित सभी पुलिस कर्मी मौजूद रहे।

पिकनिक मनाने आए युवक की बंधी में डूबने से मौत,परिजनों में मचा कोहराम


चकिया ।कोतवाली क्षेत्र के गनेशपुर बंधी में बुधवार दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने आए 23 वर्षीय अभिषेक दिक्षित की डूबने से मौत हो गई | सूचना मिलने पर मौके पर पहुंची पुलिस ने गोताखोरों की मदद से देर शाम तक युवक के शव को बंधी से बाहर निकलवाया| पुलिस ने युवक के शव को जिला संयुक्त चिकित्सालय के मर्चरी में रखवा दिया है|
मिर्जापुर जनपद के जमालपुर थाना अंतर्गत जफरपुरा गांव निवासी उमाकांत दीक्षित का पुत्र अभिषेक कैलहट ( चुनार) के एक कालेज से आईटीआई कर रहा था| अभिषेक अपने दोस्त गौतम पासवान, पिन्टू,प्रदुम्न गोढ अमित और करन सिंह के साथ बुधवार की सायं 4 बजे के आसपास चकिया कोतवाली क्षेत्र के गनेशपुर बंधी पर पिकनिक मनाने आया था। जहां अभिषेक और उसके दोस्त बंधी से कुछ दूरी पर भोजन बना रहे थे| उसी दौरान अभिषेक अपने दोस्तों के साथ बंधी में नहाने के लिए चला गया| जहां नहाने के दौरान वह गहरे पानी में चला गया और चीखने चिल्लाने लगा| साथी दोस्त जब तक कुछ कर पाते उसकी डूबने से मौत हो गई| काफी देर तक खोजने के बाद भी युवक का शव नहीं मिलने से परेशान दोस्तों ने घटना की जानकारी परिजनों को दी|
घटना की जानकारी मिलते ही शिकारगंज चौकी पुलिस तत्काल मौके पर पहुंच गई, जहां गोताखोरों की मदद से घंटों मशक्कत के बाद युवक के शव को बाहर निकाला गया| कोतवाल राजेश यादव ने बताया कि युवक के शव को मर्चरी में रखवा दिया गया है गुरुवार की सुबह पंचनामा कर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेजा जाएगा|
अभिषेक की मौत से पिता उमाकांत, माता पुष्पा देवी और पत्नी नेहा भाई अश्विनी बहन लक्ष्मी का रो रो कर बुरा हाल था|

चंदौली चिकित्सा शिविर में 146 मरीजों का हुआ नि:शुक्ल स्वास्थ्य परीक्षण

चंदौली। जिला मुख्यालय स्थित हरिओम हॉस्पिटल एवं ट्रामा सेंटर के द्वारा बुधवार को आजादी के 76 वें अमृत महोत्सव के अवसर पर आयोजित नि:शुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन किया गया। जिसमे 146 मरीजों का इलाज किया गया ।
वहीं मरीजों को मुफ्त दवा भी वितरित किया गया।


इस दौरान हॉस्पिटल के संचालक डॉ विवेक कुमार सिंह ने बताया कि डॉक्टरों की टीम द्वारा शिविर में आए हुए कुल 146 मरीजों का चेकअप किया गया और उनके रोगों के अनुरूप डाक्टरों द्वारा परामर्श दिया गया है। साथ ही उन्हें उचित दवा करने की सलाह दी गयी है। गरीब मरीजों को नि:शुल्क दवा व चेकअप का भी कार्य किया गया। आयुष्मान के मरीजों को उनके गोल्डन कार्ड बनाने का भी कार्य इस शिविर में किया गया है।

इस दौरान रजनीश कुमार मिश्रा ,विकास चौहान, मुस्कान अंसारी, शिबू ,राकेश कुमार ,संदीप शर्मा ,शिव , रानी राय ,अमरेंद्र कुमार, बृजेश कुमार, शब्बीर खान, शालिनी कुमारी ,सपना बानो ,दयानंद राजभर ,छाया कुमारी, तारा कुमारी, रीचा सिंह, सरिता कुमारी, राजेश, करण तथा राम अजोर चौहान आदि लोग उपस्थित रहे।

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